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मोदी के दौरों पर जुबान खोलने से पहले ‘विचार’ करना सीखो, भगवंत मान ‘साहब’, विदेश नीति कॉमेडी का मंच नहीं ये बेहद गंभीर विषय: MEA ने भी दिखाया आईना; केजरीवाल की तरह उल्टा-पुल्टा बोलना छोड़ो

   मोदी के विदेश दौरे पर सीएम मान का शर्मनाक बयान ( फोटो साभार- X@narendramodi, @bhagwantmaan)
ये INDI गठबंधन को क्या हो गया है? क्या इसका मानसिक संतुलन ठीक है? इन अक्ल से पैदल लोगों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, बीजेपी और संघ का जितना अपमान करना करो, जी-भरकर गालियां दो, लेकिन सोरोस के टुकड़ों पर पलने वाले देश का ही अपमान कर रहे हैं। जितना अधिक भारत के विरुद्ध बोलेंगे उससे ज्यादा इनको नुकसान होगा, फिर चीखेंगे EVM ठीक नहीं, 5 बजे के बाद इतने वोट कैसे डाले गए आदि। अपनी हरकतें तो देखो। मुस्लिम कट्टरपंथी और कालनेमि बने हिन्दू जरूर वोट देंगे लेकिन देश से लेशमात्र भी सेवा भाव रखने वाला चाहे वह किसी जाति धर्म या मजहब से क्यों न हो बीजेपी को वोट देगा तुम्हारे जैसे पाखंडियों को नहीं। विदेश नीति का मजाक बनाते शर्म नहीं।            

पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की विदेश यात्राओं पर बेहद शर्मनाक बयान दिया है। ये बयान पीएम मोदी से ज्यादा देश की विदेश नीति पर है इसलिए विदेश मंत्रालय को भी इस पर संज्ञान लेना पड़ा है। विदेश मंत्रालय ने मान की टिप्पणी को गैर जिम्मेदाराना करार देते हुए कड़ी निंदा की है।

विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने कहा, “एक प्रदेश के मुख्यमंत्री का भारत के मित्र देशों के साथ भारत के संबंधों के बारे में की गई टिप्पणियाँ निराशाजनक और गैर जिम्मेदाराना है, ऐसे बयान किसी प्रदेश के मुखिया को शोभा नहीं देती। भारत सरकार ऐसे अनुचित बयानबाजी से खुद को अलग करती है।”

भगवंत मान ने कहा था, “पीएम कहाँ गए हैं? मुझे लगता है कि वह घाना गए हैं। वह वापस आएँगे, उनका स्वागत है। भगवान ही जानें वह किन-किन देशों में जाते रहते हैं, मैग्नेशिया, गैल्विसा, टार्विसिया। 140 करोड़ वाले देश के नेता वहाँ जा रहे हैं जहाँ 10 हजार लोग रहते हैं और वहाँ सर्वोच्च सम्मान पाते हैं। हमारे यहाँ तो 10 हजार लोग जेसीबी देखने इकट्ठा हो जाते हैं।”

भगवंत मान के बयान के बाद विदेश नीति के बारे थोड़ी समझ रखने वाला व्यक्ति भी आश्चर्यचकित रह गया है। क्योंकि अपने बयान से मान ने अपनी ‘समझ’ की पोल खोल दी है। राजनीति में आलोचना विपक्ष करता ही रहता है। लेकिन जब ये टिप्पणी देश की कूटनीति और प्रधानमंत्री के विदेशी यात्राओं से जुड़ी हो, तो ये राजनीति अंदरुनी नहीं आत्मघाती हो जाती है।

मोदी का दौरा वैश्विक स्थिति, रणनीतिक भागीदार, निवेश की संभावनाओं, सांस्कृतिक आदान-प्रदान जैसी तमाम पहलुओं से जुड़ी होती है। ये भारत के विदेश नीति का चेहरा बनती हैं और इसके दम पर देश की आन बान और शान की रक्षा होती है।

UNSC की स्थायी सदस्यता के लिए भारत का समर्थन

भारत यूएनएससी में स्थायी सदस्यता का प्रबल दावेदार है। पीएम मोदी के दौरे के दौरान सभी 5 देशों ने भारत की दावेदारी का समर्थन किया है। इसका काफी महत्व है। ब्राजील में हुई ब्रिक्स सम्मेलन में भी इस मुद्दे पर भारत को बड़ी सफलता मिली और सदस्य देशों ने यूएनएससी के विस्तार और भारत की दावेदारी का समर्थन किया। इससे पहले कई देशों ने भी यूएनएससी विस्तार का समर्थन किया।

पीएम मोदी ने हाल में जिन 5 देशों की यात्राएँ की हैं। उनमें दो दक्षिण अमेरिकी देश ब्राजील, अर्जेंटीना है वहीं तीन अफ्रीकी देश त्रिनिदाद एंड टोबैगो, नामीबिया और घाना है। इन पाँच देशों में से 4 देशों ने पीएम मोदी को अपने सर्वोच्च सम्मान से नवाजा।

पीएम मोदी को मिल चुके हैं 27 देशों के सर्वोच्च सम्मान

अफ्रीकन देश घाना में ‘ऑफिसर ऑफ द ऑर्डर ऑफ द स्टार ऑफ घाना’ और त्रिनिदाद और टोबैगो में ‘ऑर्डर ऑफ द रिपब्लिक ऑफ त्रिनिदाद एंड टोबैगो’ से सम्मानित किया गया, जहाँ उन्होंने उनकी संसद को संबोधित किया। वे 20 से अधिक वर्षों में इन कैरेबियाई राष्ट्र की यात्रा करने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री बने। ये छोटे- छोटे देश ग्लोबल साउथ की रीढ़ हैं। भारत लगातार ग्लोबल साउथ के साथ संबंध मजबूत कर रहा है और इंटरनेशनल मंचों पर अपनी भूमिका मजबूत कर रहा है।

पीएम मोदी को अब तक 27 देशों ने सर्वोच्च सम्मान से नवाजा है। सिर्फ 2025 में ही अब तक पीएम मोदी को 7 देशों ने सम्मानित किया। 27 देशों में से 8 मुस्लिम देश हैं।

आर्थिक मोर्चे पर चीन से टक्कर के लिए जरूरी

पाँच देशों की यात्रा का महत्व आर्थिक दृष्टि से भी काफी अहम है। घाना, नामीबिया, त्रिनिदाद और टोबैगो, अर्जेंटीना और ब्राज़ील की यात्रा ने दुनिया का ध्यान खींचा। चीन से मुकाबला करने के एक रणनीतिक विकल्प, आतंकवाद के खिलाफ एक ज़िम्मेदार आवाज और ग्लोबल साउथ के एक विकास साझेदार के रूप में भारत की स्थिति को और मजबूत करना था।

नामीबिया के खनिज में भारत का निवेश

प्रधानमंत्री मोदी की सबसे हालिया यात्रा नामीबिया की थी। वह लगभग 30 वर्षों में वहाँ जाने वाले पहले भारतीय प्रधानमंत्री थे। गौरतलब है कि भारत लाए गए आठ चीते नामीबिया के रेगिस्तान से आए थे। नामीबिया अफ्रीका में एक स्थिर लोकतंत्र है जहाँ प्राकृतिक संसाधन मौजूद हैं। रेयर मिनर्ल्स, खनिज, यूरेनियम, कोबाल्ट, लिथियम और समुद्री हीरे शामिल हैं, और ये सभी भारत के लिए महत्वपूर्ण हैं। इसलिए खनन उद्योग में भारतीय कंपनियों ने यहाँ पहले ही 80 करोड़ डॉलर का निवेश किया है। नामीबिया भारत की महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति करने में अहम भूमिका निभा सकता है, जिससे चीन पर भारत की निर्भरता कम होगी।

प्रधानमंत्री मोदी की घाना यात्रा पिछले 30 साल में किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री की पहली यात्रा थी। साझा लोकतांत्रिक सिद्धांत और आतंकवाद की दोनों देशों को चिंता है। अफ्रीका में सोने का सबसे बड़ा उत्पादक देश घाना है जहाँ लिथियम का भी भंडार है। ऐसे में भारत की इलेक्ट्रिक वाहन की जरूरत यहाँ से पूरी हो सकती है। चीन ने हाल ही में इसके निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया है।

यूपीआई, रक्षा सहयोग, एआई में भारत करेगा मदद

भारत के यूपीआई को ये देश अपनाने के लिए तैयार हैं। इसके अलावा भारत ने साइबर सुरक्षा सहायता, प्रशिक्षण और रक्षा सहयोग की दिशा में अहम भागीदार साबित होगा।
प्रधानमंत्री मोदी की त्रिनिदाद और टोबैगो यात्रा में इतिहास याद आ गई जब गिरमिटिया के रूप भारतीय इस देश का विकास करने गए थे। यही वजह है कि बड़ी संख्या में प्रवासी भारतीय अभी यहाँ रहते हैं।
इस यात्रा से दोनों देशों के बीच सांस्कृतिक, धार्मिक और आर्थिक संबंधों को मजबूती मिली। त्रिनिदाद कैरेबियाई क्षेत्र में UPI लागू करने वाला पहला देश बन गया।

अर्जेंटीना के ऊर्जा से भारत की जरूरत होगी पूरी

अर्जेंटीना की यात्रा का समय इससे बेहतर नहीं हो सकता था। भारत तकनीकी आत्मनिर्भरता के साथ-साथ सतत ऊर्जा की ओर एक महत्वपूर्ण बदलाव कर रहा है और यह दक्षिण अमेरिकी देश तांबा और लिथियम जैसे जरूरी खनिजों के लिए मशहूर है। दुनिया में दूसरे सबसे बड़े शेल गैस और चौथे सबसे बड़े शेल तेल भंडारों वाला अर्जेंटीना ऊर्जा के क्षेत्र में भारत का अहम साझीदार बन सकता है।
महत्वपूर्ण खनिज, यूपीआई का इस्तेमाल, रक्षा सहयोग और आतंकवाद विरोध, फार्मास्यूटिकल्स और प्रवासी भारतीयों से संपर्क, प्रधानमंत्री मोदी के दोनों महाद्वीपों के दौरे के प्रमुख विषय रहे। इस दौरान मिले राजकीय सम्मान ने वैश्विक मंच पर भारत को एक भरोसेमंद सहयोगी के रूप में पेश किया।

मान जी बोलें, लेकिन जरा जुबान संभाल के

प्रधानमंत्री मोदी का राजनयिक दौरा निश्चित रूप से देश को हर मोर्च में मजबूत बनाने वाला रहा। फिर भी, मान की कूटनीतिक नासमझी इसे पहचानने में विफल रही। आम आदमी पार्टी वैसे भी विदेश नीति के मामले में सिफर मानी जाती है। मान ने अपने बयान से इसे सच साबित कर दिया।
अरे भाई…राजनीति करो, लेकिन देश की कूटनीति पर हमला मत करो। तुम जैसे लोग सिर्फ वोट के लिए कुछ भी बोलते हो, लेकिन समझो कि पीएम के दौरे भारत को मजबूत बनाते हैं। अगली बार मुँह खोलने से पहले विदेश नीति पढ़ लो, समझ लो या फिर चुप ही रहो। ऐसे में पंजाब को संभालो, जहाँ किसान परेशान हैं, नशा फैला है, हर तरफ बर्बादी है। क्योंकि वैश्विक कूटनीति तुम्हारे बस की नहीं।

क्या दक्षिण से उठेगी सनातन रक्षा की लहर? क्या हिंदुओं की टूटेगी निद्रा? गुलाम भारत में अंग्रेज नहीं खिला पाए चर्बी, स्वतंत्र भारत में तिरुपति के बीफ वाले लड्डू खिला दिए

                         तिरुपति मंदिर में हिंदुओं की आस्था से खिलवाड़ (फोटो साभार: leonardo.ai)
तिरुपति बालाजी मंदिर में प्रसाद की शुद्धता से छेड़छाड़ का मामला कोई साधारण मामला नहीं है। सामने आई रिपोर्ट बताती है कि जो प्रसाद भगवान वेंकटेश्वर को चढ़ता था उसमें पिछले कुछ समय से जानवर की चर्बी वाला घी इस्तेमाल होता था। मामला गरमाया तो घी की जाँच रिपोर्ट सामने आई और ये पता चला कि घी में मछली का तेल, गोमांस और सूअर की चर्बी सब डली हुई थी।

समूचा देश इस रिपोर्ट को देख सन्न रह गया। किसी को उम्मीद नहीं थी कि इतने बड़ा आस्था का केंद्र तिरुपति मंदिर साजिश का शिकार होगा। सवाल उठने शुरू हुए, लोगों ने विरोध करना शुरू किया। लेकिन इन सबके बीच एक गैंग और एक्टिव हुई- लिबरल, वामपंथियों और इस्लामी कट्टरपंथियों की।


कुछ ने तो खुलेआम खुशी जताई कि आखिरकार हिंदुओं ने बीफ का सेवन कर ही लिया, लेकिन वहीं दूसरी कुछ लोग तर्क देते दिखे कि जो हो गया वो हो गया अब मामले पर आगे नहीं बोला जाना चाहिए क्योंकि ये कोई बड़ी बात नहीं है। उनके मुताबिक कई मंदिरों में घटिया क्वालिटी के घी का प्रयोग होता है और तमाम हिंदू मांसाहारी भी हैं तो इसलिए इस खुलासे से इतना फर्क नहीं पड़ना चाहिए।

बड़ी चालाकी से इस मामले को हिंदुओं के खान-पान से जोड़कर हल्का दिखाने का प्रयास हो रहा है जबकि विवाद खान-पान का नहीं आस्था और विश्वास का है।

भारत में विभिन्न वर्ग के लोग रहते हैं। सबका अपना खान-पान है। कोई शाकाहारी है कोई मांसाहारी। हिंदू भी ऐसे ही हैं। इनमें कुछ लोग हैं जो प्याज लहसुन को भी हाथ नहीं लगाते, लेकिन वही कुछ हैं जो नॉनवेज चाव से खाते हैं। अब खान-पान के हिसाब से इनकी तुलना की जाए तो इन्हें दो वर्गों में रखा जा सकता है, लेकिन आस्था की बात आते ही ये एक होते हैं।

हिंदू धर्म में गोमांस वर्जित है और सनातन मानने वाले इससे पूरा परहेज करते हैं…। फिर आखिर किस तरीके से ये कहा जा सकता है कि जो मांसाहारी हैं वो इस मुद्दे का बवाल न बनाएँ। खान-पान निजी मामला हो सकता है लेकिन उन्हें धोखे में रखकर ऐसी चीजें उन्हें खिलाना कहाँ तक उचित होता है?

घर में भगवान की पूजा करते समय प्रयास किए जाते हैं कि भगवान को लगने वाला प्रसाद शुद्ध तरीके से निर्मित हो, फिर इतने बड़े मंदिर में भगवान वेंकटेश्वर को चढ़ाए जाने वाले प्रसाद के साथ ऐसा खिलवाड़ बर्दाश्त योग्य कैसे योग्य हो सकता है।

इतनी बड़ी घटना के बाद भी हिंदू शांत हैं। उनके लिए शायद विरोध का अर्थ केवल सोशल मीडिया पोस्ट करना है। यदि ज्यादा गंभीर मामला है तो धड़ाधड़ पोस्ट करते हैं और अगर छोटा-मोटा मामला है तो एक दो ट्वीट के बाद भूल जाते हैं। लेकिन क्यायही मखौल अगर किसी अन्य मजहब का उड़ता तो क्या आपको लगता है वो इस प्रकार नाराजगी व्यक्त करते…।

ब्रिटिश भी नहीं खिला पाए थे गोमांस

एक समय ऐसा भी था जब गोमांस के सहारे ब्रिटिशों ने भी हिंदुओं की आस्था भंग करनी चाही थी। हालाँकि उस समय गुलाम देश में होते हुए हिंदुओं का विरोध जमीनी था। नतीजा ये हुआ कि भारतीय हिंदुओं ने ब्रिटिशों के दिए गेहूँ, आटे, रोटी किसी चीज को हाथ लगाना बंद कर दिया। घी में जानवरों की चर्बी की बात आई, दवाओं में गाय और सूअर के मांस के मिलावट की…। हिंदुओं ने सब छोड़ दिया।
कथिततौर पर ये सारी अफवाहें थीं, लेकिन उस समय में भी हिंदुओं ने इनका बहिष्कार करने से परहेज नहीं किया था और आखिर में जब ब्रिटिशों ने गोमांस वाली कारतूस उनके हाथ में थमानी चाही थी तो हिंदू उनके विरुद्ध इतनी मजबूती से खड़े हुए थे कि आज हिंदुओं के उसी विरोध को 1857 का विद्रोह भी कहा जाता है। सोचकर देखिए, जिन हिंदुओं ने एक भनक लगने पर अपने धर्म के लिए अपनी मूलभूत जरूरतों को त्याग दिया उनके लिए धर्म के साथ होने खिलवाड़ कितनी बड़ी बात होगी।

क्या दक्षिण से उठेगी फिर हिंदुत्व की लहर

इस घटना के बाद आज भले ही देश के अन्य हिस्सों में हिंदुओं का आक्रोश न नजर आ रहा हो, लेकिन दक्षिण में सनातन धर्म रक्षा बोर्ड को लागू करने की माँग अब जोरों पर हैं। खुद डिप्टी सीएम पवन कल्याण ने इस बोर्ड की माँग करते हुए हिंदुओं को एकजुट होने की अपील की है जिसके बाद उम्मीद की जा रही है कि शायद तिरुपति की इस घटना के बाद हिंदू के जागृत होने की लहर दक्षिण से ही उठेगी ठीक वैसे जैसे 1200साल पहले हुआ था।
अवलोकन करें : -
8वीं सदी में जब भारत भूमि पर सनातन पर खतरा धर्म क्षीण होने लगा था, हिंदू पथ से भ्रमित होने लगे थे तब धर्म की पुनर्स्थापना के लिए आदि शंकराचार्य अपनी यात्रा पर निकले। उन्होंने रणनीति बनाई और विभिन्न धर्म केंद्रों की यात्रा के दौरान उपस्थित धर्म गुरुओं को तर्क और शास्त्रार्थ की चुनौती देते रहे। यह आदि शंकराचार्य का चमत्कार ही था कि पूरे भारतवर्ष में उन्हें कोई भी नहीं हरा पाया। धीरे-धीरे धर्म छोड़कर गए धर्म गुरू वापस सनातन में लौटने लगे। उनके द्वारा स्थापित किए गए चार मठ (वर्धन पुरी मठ (जगन्नाथ पुरी), श्रंगेरी पीठ (रामेश्वरम्), शारदा मठ (द्वारिका) और ज्योतिर्मठ (बद्रीनाथ धाम)) ही हैं जिन्हें आज चार धाम के नाम से जाना जाता है।

नवजात को चूल्हे में भून मार कर हँसने वाले पत्रकार को इजराइल ने मार गिराया : रो रहे जुबैर-राणा और वामपंथी गैंग

मारा गया पत्रकार, करता था हमास इस्लामी आतंकियों का समर्थन (फोटो साभार: Stop Antisemitism)
इजराइल-हमास युद्ध में रेफात अल-अरीर (Refaat Al-Areer) नाम का एक कथित पत्रकार मारा गया। रेफात की मौत 7 दिसंबर 2023 को हवाई हमले के दौरान हुई। हमास का समर्थन और प्रचार करना, इसके उलट इजरायल के खिलाफ प्रोपेगेंडा फैलाना और यहूदी-विरोधी बातें लिखना – मारे गए रेफात की कथित पत्रकारिता इन्हीं बातों के आसपास घूमती थी।

भारत में रह कर यहीं की रोटी खाने वाले ऐसे बहुत हैं जो ज्ञात-अज्ञात कारणों से फिलिस्तीन की सहलाते रहते हैं, उसके लिए आँसू बहाते हैं। मोहम्मद जुबैर ने इजराइल को बदनाम करने के लिए रेफात अल-अरीर की मौत का सहारा लिया।

सहानुभूति बटोरने के लिए जुबैर ने ट्वीट कर लिखा, “रेफात अल-अरीर को आज इजराइल ने मार डाला।” इस ट्वीट में जुबैर ने रेफात का हाल में दिए एक इंटरव्यू वीडियो को भी लगाया है। इसमें वो इजराइल हमले में गाजा के सभी लोगों के मारे जाने के डर से रो रहा है। हास्यास्पद यह है कि इसी शख्स ने माइक्रोवेव अवन में जला कर मार डाले गए इजरायली बच्चे की मौत का मजाक उड़ाया था।

मोहम्मद जुबैर ने ट्वीट किया तो राणा अयूब कैसे पीछे रहती! उसने भी रोना चालू रखा… बिल्कुल एकसमान अंदाज में। उसने ट्वीट किया, “और उन्होंने उसे मार डाला।”

29 अक्टूबर 2023 को डोविड इफ्यून नाम के एक पत्रकार ने खबर दी कि हमास के इस्लामी आतंकियों ने एक इजरायली यहूदी बच्चे की बेरहमी से हत्या कर दी। बच्चे की जली हुई लाश माइक्रोवेव अवन में मिली। ट्विटर इस खबर का मजाक उड़ाते हुए रेफात अल-अरीर (Refaat Al-Areer) ने लिखा था – “बेकिंग पाउडर के साथ या उसके बिना।”

                              बच्चे की मौत पर जिसको सूझा मजाक… वो खुद मारा गया

केक जैसी चीज बनाने के लिए बेकिंग पाउडर का इस्तेमाल किया जाता है। मतलब इस्लामी आतंकी हमास का समर्थक रेफात एक मरे हुए बच्चे की तुलना खाने लायक सामग्री से कर रहा था। लेकिन गाजा वाले हिस्से पर जब इजरायली सेना ने तबाही मचानी शुरू की तो रेफात को मौत का डर सताने लगा, विदेशी-वामपंथी मीडिया को रो-रो कर इंटरव्यू देने लगा।

रेफात अल-अरीर यहूदियों और इजरायल से कितनी नफरत करता था, उसके लिए 1 या 2 ट्वीट काफी नहीं हैं। वो कभी इजरायल के नेताओं को हिटलर के समान बताता था। कभी वो यहूदीवाद और नाजीवाद को एक ही बताता है।

यह जानना भी जरूरी है कि रेफात खुले तौर पर हमास का समर्थन और प्रचार करता था। उसके अनुसार इस्लामी आतंकी संगठन हमास को ‘फँसाने’ के लिए इजराइल ने अपने ही नागरिकों को मार डाला।