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आजादी के असली नायक कौन : काँग्रेस या गुमनाम कर दिये गये सेनानी व शहीद ?


Image result for सुभाष चन्द्र बोस indian struggle 1920-1942
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
नेताजी सुभाषचंद्र बोस के रहस्यात्मकता से गायब हो जाने के पश्चात बने जाँच आयोगों की तथाकथित सार्थकता, गंभीरता व सत्यता का विश्लेषण करने की जरुरत है। जिसके अंतर्गत काँग्रेस और इसके पुरोधाओं के असली कुरूप व निकृष्ट चरित्र का यथासंभव किंतु ऐतिहासिक सबूतों सहित तथ्यात्मक पोस्टमार्टम ही किया जाना है। 
देश आजाद होने के बाद संसद में कई बार माँग उठती है कि कथित विमान-दुर्घटना में नेताजी की मृत्यु के रहस्य पर से पर्दा उठाने के लिए सरकार कोशिश करेे मगर प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू इस माँग को प्रायः दस वर्षों तक टालने में सफल रहते हैं। भारत सरकार इस बारे में ताईवान सरकार (फारमोसा का नाम अब ताईवान हो गया है) से भी सम्पर्क नहीं करती।
अन्त में जनप्रतिनिगण जस्टिस राधाविनोद पाल की अध्यक्षता में गैर-सरकारी जाँच आयोग के गठन का निर्णय लेते हैं। तब जाकर नेहरूजी 1956 में भारत सरकार की ओर से जाँच-आयोग के गठन की घोषणा करते हैं।
लोग सोच रहे थे कि जस्टिस राधाविनोद पाल को ही आयोग की अध्यक्षता सौंपी जायेगी। विश्वयुद्ध के बाद जापान के युद्धकालीन प्रधानमंत्री सह युद्धमंत्री जनरल हिदेकी तोजो पर जो युद्धापराध का मुकदमा चला था, उसकी ज्यूरी (वार क्राईम ट्रिब्यूनल) के एक सदस्य थे- जस्टिस पाल।
मुकदमे के दौरान जस्टिस पाल को जापानी गोपनीय दस्तावेजों के अध्ययन का अवसर मिला था, अतः स्वाभाविक रुप से वे उपयुक्त व्यक्ति थे जाँच-आयोग की अध्यक्षता के लिए मगर नेहरूजी को आयोग की अध्यक्षता के लिए सबसे योग्य व्यक्ति शाहनवाज खान नजर आते हैं।

शाहनवाज खान- उर्फ, लेफ्टिनेण्ट जनरल एस.एन. खान। कुछ याद आया? जी हाँ बॉलीवुडी शाहरूख़ खान की माँ लतीफ़ फातमा का पिता यानि शाहरूख़ खान का नाना तथा आईएनए / आजाद हिन्द फौज का तथाकथित मेजर जनरल शाहनवाज़ खान .
मेजर जनरल शाहनवाज़ खान, आजाद हिन्द फौज के भूतपूर्व सैन्याधिकारी, जो शुरु में नेताजी के दाहिने हाथ थे, मगर इम्फाल-कोहिमा फ्रण्ट से उनके विश्वासघात की खबर आने के बाद नेताजी ने उन्हें रंगून मुख्यालय वापस बुलाकर उनका कोर्ट-मार्शल करने का आदेश दे दिया था।
उनके बारे में यह भी बताया जाता है कि कि लाल-किले के कोर्ट-मार्शल में उन्होंने खुद यह स्वीकार किया था कि आई.एन.ए./आजाद हिन्द फौज में रहते हुए उन्होंने गुप्त रुप से ब्रिटिश सेना को मदद ही पहुँचाने का काम किया था। यह भी जानकारी मिलती है कि बँटवारे के बाद वे पाकिस्तान चले गये थे, मगर नेहरूजी उन्हें भारत वापस बुलाकर अपने मंत्रीमण्डल में उन्हें सचिव का पद देते हैं।
विमान-दुर्घटना में नेताजी को मृत घोषित कर देने के बाद शाहनवाज खान को नेहरू मंत्रीमण्डल में मंत्री पद (रेल राज्य मंत्री) प्रदान किया जाता है।
आजादी के असली नायक कौन? काँग्रेस या गुमनाम कर दिये गये सेनानी व शहीद ? भाग - 2
Image may contain: 2 people, people sitting and indoor1970 में (11 जुलाई) एक दूसरे आयोग का गठन करना पड़ता है। यह इन्दिराजी का समय है। इस आयोग का अध्यक्ष जस्टिस जी.डी. खोसला को बनाया जाता है।
जस्टिस घनश्याम दास खोसला के बारे में तीन तथ्य जानना ही काफी होगा:
1. वे नेहरूजी के मित्र रहे हैं;
2. वे जाँच के दौरान ही श्रीमती इन्दिरा गाँधी की जीवनी लिख रहे थे, और
3. वे नेताजी की मृत्यु की जाँच के साथ-साथ तीन अन्य आयोगों की भी अध्यक्षता कर रहे थे।
सांसदों के दवाब के चलते आयोग को इस बार ताईवान भेजा जाता है। मगर ताईवान जाकर जस्टिस खोसला किसी भी सरकारी संस्था से सम्पर्क नहीं करते- वे बस हवाई अड्डे तथा शवदाहगृह से घूम आते हैं। कारण यह है कि ताईवान के साथ भारत का कूटनीतिक सम्बन्ध नहीं है।
हाँ, कथित विमान-दुर्घटना में जीवित बचे कुछ लोगों का बयान यह आयोग लेता है, मगर पाकिस्तान में बसे मुख्य गवाह कर्नल हबिबुर्रहमान खोसला आयोग से मिलने से इन्कार कर देते हैं।
खोसला आयोग की रपट पिछले शाहनवाज आयोग की रपट का सारांश साबित होती है।
अब अटल बिहारी वाजपेयी जी प्रधानमंत्री हैं, दो-दो जाँच आयोगों का हवाला देकर सरकार इस मामले से पीछा छुड़ाना चाह रही थी, मगर न्यायालय के आदेश के बाद सरकार को तीसरे आयोग के गठन को मंजूरी देनी पड़ती है।
इस बार सरकार को मौका न देते हुए आयोग के अध्यक्ष के रुप में (अवकाशप्राप्त) न्यायाधीश मनोज कुमार मुखर्जी की नियुक्ति खुद सर्वोच्च न्यायालय ही कर देता है।
जहाँ तक हो पाता है, कांग्रेसियों की सरकार मुखर्जी आयोग के गठन और उनकी जाँच में रोड़े अटकाने की कोशिश करती है, मगर जस्टिस मुखर्जी जीवट के आदमी साबित होते हैं। विपरीत परिस्थितियों में भी वे जाँच को आगे बढ़ाते रहते हैं।
आयोग सरकार से उन दस्तावेजों (“टॉप सीक्रेट” पी. एम. ओ. फाईल 2/64/78-पी.एम.) की माँग करता है, जिनके आधार पर 1978 में तत्कालीन प्रधानमंत्री ने संसद में बयान दिया था, और जिनके आधार पर कोलकाता उच्च न्यायालय ने तीसरे जाँच-आयोग के गठन का आदेश दिया था। प्रधानमंत्री कार्यालय और गृहमंत्रालय दोनों साफ मुकर जाते हैं- ऐसे कोई दस्तावेज नहीं हैं,,होंगे भी तो हवा में गायब हो गये!
आप यकीन नहीं करेंगे कि जो दस्तावेज खोसला आयोग को दिये गये थे, वे दस्तावेज तक मुखर्जी आयोग को देखने नहीं दिये जाते, ‘गोपनीय’ एवं ‘अति गोपनीय’ दस्तावेजों की बात तो छोड़ ही दीजिये। प्रधानमंत्री कार्यालय, गृह मंत्रालय, विदेश मंत्रालय, सभी जगह से नौकरशाहों का यही एक जवाब-
“भारत के संविधान की धारा 74(2) और साक्ष्य कानून के भाग 123 एवं 124 के तहत इन दस्तावेजों को आयोग को नहीं दिखाने का“प्रिविलेज” उन्हें प्राप्त है!”
भारत सरकार के रवैये के विपरीत ताईवान सरकार मुखर्जी आयोग द्वारा माँगे गये एक-एक दस्तावेज को आयोग के सामने प्रस्तुत करती है। चूँकि ताईवान के साथ भारत के कूटनीतिक सम्बन्ध नहीं हैं, इसलिए भारत सरकार किसी प्रकार का प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष दवाब ताईवान सरकार पर नहीं डाल पाती है।
हाँ, रूस के मामले में ऐसा नहीं है। भारत का रूस के साथ गहरा सम्बन्ध है, अतः रूस सरकार का स्पष्ट मत है कि जब तक भारत सरकार आधिकारिक रुप से अनुरोध नहीं भेजती, वह आयोग को न तो नेताजी से जुड़े गोपनीय दस्तावेज देखने दे सकती है और न ही कुजनेत्स, क्लाश्निकोव- जैसे महत्वपूर्ण गवाहों का साक्षात्कार लेने दे सकती है। आप अनुमान लगा सकते हैं- आयोग रूस से खाली हाथ लौटता है।
Image may contain: one or more people and outdoorक्या आप मान सकते हैं कि आजाद भारत मे एक जगह ऐसी भी है,जहां भारत माता की जय और वंदेमातरम कहने पर सजा दी जाती है,प्रताणित किया जाता है ?
जी हाँ , यह बात सौ फीसदी सही है,दुरूस्त है। राष्ट्रवादी मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ जी के उत्तर प्रदेश के बलिया ज़िले मे बेलथरा रोड तहसील के G.m.inter College मे यह सब होता है।
बलिया ज़िला जहा से कभी पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर सिह जी सांसद हुआ करते थे !
G.m.inter College मे पढ रहे सैकड़ो छात्रों का ऐसा आरोप है कि इस काॅलेज मे अगर कोई छात्र भारत माता की जय घोष करता है तो उसको यहा के शिक्षकों और प्रिंसीपल द्वारा सजा दी जाती है,शिक्षक उन विद्यार्थियों को मारते-पीटते है और उनके नंबर प्रेक्टीकल परिक्षा मे काट दिये जाते है!
छात्रों द्वारा वंदेमातरम कहने पर उनको मुर्गा बना दिया जाता है,उनको कक्षा से बाहर कर दिया जाता है, वंदेमातरम कहने पर कई छात्रों को तो परिक्षा मे बैठने तक नही दिया गया!काॅलेज मे प्रति दिन होने वाली प्रार्थना तक नही करने दी जाती है,क्योकि काॅलेज की इमारत का डिजाइन मस्जिद के आकार मे बना है।
जब कुछ पत्रकारों ने काॅलेज के मुख्य अध्यापक से इस विषय मे जानना चाहा तो उनका कहना था कि वंदेमातरम और भारत माता की जय के बारे मे कोई सरकारी आदेश नही आया है,इस लिए हम सजा देते है और रही बात काॅलेज मे प्रार्थना करने की तो यह इस्लाम में हराम है इसलिए यह सब यहां मनाही है।
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बंगाल भारतीय जनता पार्टी नेता चंद्रकुमार बोस ने देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पर तीखा हमला करते हुए कह.....


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कांग्रेस का हाथ आतंकवादियों के साथ आज पूरे देश में ये कथन सत्य होता दिख रहा है. कांग्रेस के नेता मणिशंकर ऐय्यर पाकि....

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भाजपा के प्रमुख बड़े नेताओं में डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी सबसे पहले आते है। कश्मीर में धारा 370 को खत्म करने या उस पर .....
कुछ स्थानिय अखबारों में यह खबर छपने के बाद D.M. ने फौरी तौर पर जांच के आदेश दिए तो जांच करने गये अधिकारी मुख्य अध्यापक के साथ काॅलेज मे दोपहर का भोजन करने मे मशगूल थे ।
योगी जी आप तो राष्ट्रवादी है,आप के उत्तर प्रदेश में यह कैसा तालिबानी फरमान जारी किया गया है।
उत्तर प्रदेश को अफगानिस्तान बनने से बचा लो,वर्ना यह तालिबानी संस्कृति उत्तर प्रदेश को नेस्तनाबूत करके रख देगी !!
मंगल पांडे को फाँसी❓
तात्या टोपे को फाँसी❓
रानी लक्ष्मीबाई को अंग्रेज सेना ने घेर कर मारा❓ 
भगत सिंह को फाँसी❓
सुखदेव को फाँसी❓
राजगुरु को फाँसी❓
चंद्रशेखर आजाद का एनकाउंटर अंग्रेज पुलिस द्वारा❓
सुभाषचन्द्र बोस को गायब करा दिया गया❓
भगवती चरण वोहरा बम विस्फोट में मृत्यु❓
रामप्रसाद बिस्मिल को फाँसी❓
अशफाकउल्लाह खान को फाँसी❓
रोशन सिंह को फाँसी❓
लाला लाजपत राय की लाठीचार्ज में मृत्यु❓
वीर सावरकर को कालापानी की सजा❓
चाफेकर बंधू (३ भाई) को फाँसी❓
मास्टर सूर्यसेन को फाँसी❓

ये तो कुछ ही नाम है जिन्होंने स्वतन्त्रता संग्राम और इस देश की आजादी में अपना सर्वोच्च बलिदान दिया❓


कई वीर ऐसे है हम और आप जिनका नाम तक नहीं जानते ❓

क्या भारत को पहली स्वतन्त्रता 21 अक्टूबर 1943 को मिली थी?

PM Narendra Modi at Red Fort
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आजाद हिंद सरकार की 75वीं वर्षगांठ पर अक्टूबर 21 को लाल किले पर राष्ट्रध्वज फहराया। इस मौके पर पीएम ने कहा, 'आज मैं उन माता पिता को नमन करता हूं जिन्होंने नेता जी सुभाष चंद्र बोस जैसा सपूत देश को दिया। मैं नतमस्तक हूं उस सैनिकों और परिवारों के आगे जिन्होंने स्वतंत्रता की लड़ाई में खुद को न्योछावर कर दिया।'
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आजाद हिंद फौज के दिग्गज श्री lalti रामजी
ने आज नई दिल्ली में फंक्शन से पहले अपनी वर्दी में 
मोदी ने कहा, 'आजाद हिन्द सरकार सिर्फ नाम नहीं था, बल्कि नेताजी के नेतृत्व में इस सरकार द्वारा हर क्षेत्र से जुड़ी योजनाएं बनाई गई थीं। इस सरकार का अपना बैंक था, अपनी मुद्रा थी, अपना डाक टिकट था, अपना गुप्तचर तंत्र था।' पीएम मोदी नेे आजाद हिंद संग्रहालय का उद्घाटन भी किया. इस कार्यक्रम में नेताजी के परिवार के सदस्‍‍‍‍‍‍यों समेत आजाद हिंद फौज से जुड़े लोग भी मौजूद हैं. पीएम मोदी ने इस सर्जिकल स्‍ट्राइक हमारी सरकार का फैसला
पीएम मोदी ने पाकिस्‍तान और चीन पर भी निशाना साधा. उन्‍होंने कहा हम दूसरे की भूमि पर नजर नहीं डालते. लेकिन भारत की संप्रभुता के लिए जो भी चुनौती बनेगा, उसको दोगुनी ताकत से जवाब देंगे.' पीएम मोदी ने कहा 'भारत उस सेना के निर्माण में आगे बढ़ रहा है जो सपना नेताजी ने देखा था. हमारी सेना दिनोंदिन सशक्‍त बन रही है. सर्जिकल स्‍ट्राइक हमारी सरकार का फैसला था.दौरान कहा 'नेताजी (सुभाष चंद्र बोस) ने ऐलान किया था कि इसी लाल किले पर एक दिन तिरंगा फहराया जाएगा.
उन्‍होंने कहा 'हमने कई बलिदानों के बाद स्‍वराज हासिल किया. अब यह हमारा कर्तव्‍य है कि हम इस 'स्‍वराज' को 'सुराज' के साथ बनाए रखें.' उन्‍होंने कहा कि वन रैंक, वन पेंशन को सरकार ने अपने वायदे के मुताबिक पूरा किया. पूर्व सैनिकों को एरियर भी पहुंचाया गया. 7वें वेतन आयोग का भी फायदा भी पहुंचाया गया.'

प्रधानमन्त्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से फिर फहराया 

तिरंगा; एक साल में दूसरी बार किया ऐसा

LIVE : आजाद हिंद सरकार की 75वीं वर्षगांठ पर पीएम मोदी ने लाल किले पर फहराया तिरंगामोदी ने कहा कि नेताजी का एक ही उद्देश्य था, एक ही मिशन था भारत की आजादी। यही उनकी विचारधारा थी और यही उनका कर्मक्षेत्र था।  भारत अनेक कदम आगे बढ़ा है, लेकिन अभी नई ऊंचाइयों पर पहुंचना बाकी है। इसी लक्ष्य को पाने के लिए आज भारत के 130 करोड़ लोग नए भारत के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहे हैं। एक ऐसा नया भारत, जिसकी कल्पना सुभाष बाबू ने भी की थी।

नेताजी के नाम से पुलिस सम्‍मान
इस दौरान उन्‍होंने कहा 'एक परिवार के लिए देश के सपूतों को भुलाया गया. देश के शहीदों को भुलाने की कोशिश की गई. पहले के शासकों ने भारत को इंग्‍लैंड के चश्‍मे से देखा.' पीएम मोदी ने कहा 'नेताजी का एक ही उद्देश्य था, एक ही मिशन था भारत की आजादी. यही उनकी विचारधारा थी और यही उनका कर्मक्षेत्र था. भारत अनेक कदम आगे बढ़ा है, लेकिन अभी नई ऊंचाइयों पर पहुंचना बाकी है. इसी लक्ष्य को पाने के लिए आज भारत के 130 करोड़ लोग नए भारत के संकल्प के साथ आगे बढ़ रहे हैं. एक ऐसा नया भारत, जिसकी कल्पना सुभाष बाबू ने भी की थी.' अपनी जान जोखिम में डालकर लोगों की जान बचाने वाले पुलिसकर्मियों को अब हर साल नेताजी के जन्‍मदिन पर 23 जनवरी को उनके नाम से सम्‍मान दिया जाएगा. 


PM @narendramodi hoists the national flag at the in New Delhi today to commemorate the 75th anniversary of .
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ये भी दुखद है कि एक परिवार को बड़ा बताने के लिए, देश के अनेक सपूतों, वो चाहें सरदार पटेल हों, बाबा साहेब आंबेडकर हों, उन्हीं की तरह ही, नेताजी के योगदान को भी भुलाने का प्रयास किया गया : पीएम मोदी

Image result for गांधी और बोसउन्होंने कहा, 'आज मैं निश्चित तौर पर कह सकता हूं कि स्वतंत्र भारत के बाद के दशकों में अगर देश को सुभाष बाबू, सरदार पटेल जैसे व्यक्तित्वों का मार्गदर्शन मिला होता, भारत को देखने के लिए वो विदेशी चश्मा नहीं होता, तो स्थितियां बहुत भिन्न होती। 
नेताजी का सपना पूरा कर रही सरकार
पीएम मोदी ने कहा 'वीरता के शीर्ष पर पहुंचने की नींव नेताजी के बचपन में ही पड़ गई थी. इसका उदाहरण उनके द्वारा 1912 में उनकी मां को लिखी चिट्ठी में दिखता है. उन्‍होंने उसमें लिखा कि मां क्‍या हमारा देश दिनोंदिन और अधिक गिरता जाएगा, क्‍या इस भारत माता का कोई एक भी पुत्र ऐसा नहीं है, जो अपने स्‍वार्थ को त्‍याग कर अपना संपूर्ण जीवन भारत मां को समर्पित करे. बोलो मां क्‍या हम सोते रहेंगे. उन्‍होंने अपने पत्र में यह भी लिखा था कि अब और प्रतीक्षा नहीं की जा सकती. अब और सोने का समय नहीं है, अब आलस्‍य त्‍याग कर कर्म में जुट जाना होगा.'
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बंगाल भारतीय जनता पार्टी नेता चंद्रकुमार बोस ने देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पर तीखा हमला करते हुए कह.....

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स्वतंत्रता संग्राम सेनानी नेताजी सुभाष चंद्र बोस के पोते आशीश रे ने नेहरू से लेकर पीएम मोदी तक सरकारों पर नेताजी क...
अब अगर आपसे कोई कहे कि 15 अगस्त 1947 देश का असली आजादी दिवस नहीं है तो क्या आप इस पर यकीन करेंगे? शायद नहीं, क्योंकि बचपन से स्कूलों में यही पढ़ाया गया है कि भारत 15 अगस्त 1947 को आजाद हुआ था। लेकिन यह बात पूरी तरह से सच नहीं है। दरअसल देश की पहली आजाद सरकार का गठन 21 अक्टूबर 1943 में हो गया था। इस दिन नेताजी सुभाष चंद्र बोस ने आजाद हिंद फौज के
सर्वोच्च कमांडर के तौर पर स्वतंत्र भारत की पहली अस्थायी सरकार बनाई थी और बाकायदा सिंगापुर की धरती पर इस सरकार का तिरंगा झंडा फहराया गया था। इस सरकार को जर्मनी, जापान, फिलिपींस, कोरिया, चीन, इटली और आयरलैंड जैसे प्रमुख देशों ने मान्यता भी दी थी। इसका अपना डाक टिकट  भी था। नेताजी ने आजाद भारत का संविधान लिखने के लिए कमेटी का गठन भी कर दिया था। उन दिनों अंडमान निकोबार द्वीप समूह पर जापान का कब्जा हुआ करता था। जापान ने 21 अक्टूबर के ही दिन आजाद भारत की इस पहली सरकार को अपने कब्जे वाला पूरा अंडमान निकोबार द्वीप समूह सौंप दिया था। यानी मौजूदा भारत का एक हिस्सा आजाद हो गया और यहां से ही नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने बाकी भारत को आजाद कराने की लड़ाई का एलान किया।
अंडमान से छिड़ी थी आजादी की जंग
अंडमान को अपना बेस बनाने के बाद सुभाष चंद्र बोस ने यहां का नया नामकरण किया। अंडमान का नाम शहीद द्वीप और निकोबार का नाम स्वराज्य द्वीप रख दिया गया। इसके फौरन बाद 30 दिसंबर 1943 को नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने खुद यहां पर आकर स्वतंत्र भारत का पहला झंडा फहराया। 4 फरवरी 1944 से आजाद हिंद फौज ने ब्रिटिश कब्जे वाले भारत के इलाकों पर जोरदार हमला बोल दिया। उन्होंने सबसे पहले नॉर्थ-ईस्ट के राज्यों के कुछ हिस्सों को अंग्रेजों से आजाद भी करवा लिया। ये वो समय था जब सुभाषचंद्र बोस की लोकप्रियता देश भर में चरम पर थी। हर किसी को उम्मीद थी कि उनकी सेना बहुत जल्द पूरे भारत को आजाद करवा लेगी। 6 जुलाई 1944 को नेताजी ने बर्मा के रंगून रेडियो स्टेशन से गांधी जी के नाम जारी एक प्रसारण में अपनी लड़ाई की जानकारी दी और बताया कि आजाद हिंद फौज तेजी से दिल्ली की तरफ बढ़ रही है। उन्होंने गांधी जी से अपील की कि देश की स्वतंत्रता की इस निर्णायक लड़ाई के लिए वो अपनी शुभकामनाएं दें। नेताजी के इन तेवरों से अंग्रेज ही नहीं, बल्कि गांधी, नेहरू और कांग्रेस भी बुरी तरह डर गए थे। अंग्रेजों के डरने की वजह यह थी कि बड़ी संख्या में अंग्रेजों की सेना के भारतीय सैनिक से बगावत करके आजाद हिंद फौज में शामिल हो रहे थे।  लेकिन गांधी और नेहरू का डर यह था कि सुभाषचंद्र ने अगर देश को आजाद करवा लिया तो आजादी के बाद भारत की सत्ता पर कांग्रेस के कब्जे का उनका सपना मिट्टी में मिल जाएगा। 22 सितम्बर 1944 को शहीदी दिवस मनाते हुए नेताजी बोस ने अपने सैनिकों से मार्मिक शब्दों में कहा – “हमारी मातृभूमि स्वतंत्रता की खोज में है। तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूँगा। यह स्वतंत्रता की देवी की माँग है। लेकिन बदकिस्मती से तभी पासा पलट गया। उन दिनों दूसरा विश्वयुद्ध चल रहा था नेताजी बोस को जर्मनी और जापान का समर्थन हासिल था। लेकिन युद्ध में जर्मनी ने हार मान ली और परमाणु हमले के बाद जापान को भी घुटने टेकने पड़े। कहा जाता है कि इसी दौरान टोक्यो जाते हुए विमान हादसे में नेताजी की मौत हो गई। हालांकि बाद में यह दावा पूरी तरह से गलत पाया गया। इसके बाद से आज तक नेताजी सुभाषचंद्र बोस की मौत एक राज़ है। 
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नेताजी सुभाषचंद्र बोस के बाद उनकी आजाद हिंद फौज का मनोबल बुरी तरह से गिर गया। लेकिन आजाद हिंद फौज तब तक अंग्रेजी राज की जड़ें हिला चुकी थी। अंग्रेजों को पता था कि नेताजी की सेना से निपटना उनके लिए आसान नहीं होगा और कुछ साल में ही वो उनसे भारत की सत्ता छीन लेंगे। क्योंकि अंग्रेजों की सेना के भारतीय जवानों की बगावत और तेज़ हो गई थी और उनके बिना लड़ाई लड़ पाना नामुमकिन था। 18 फरवरी 1946 को बंबई में नौसैनिकों ने विद्रोह कर दिया। यह बगावत कराची से लेकर कोलकाता तक फैल गई। इसके कुछ दिन बाद ही जबलपुर में फौजी बगावत हो गई। इन हालात में अंग्रेजों ने फौरन भारत की आजादी को लेकर कांग्रेस के नेताओं के साथ सौदेबाजी शुरू कर दी। 
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इस दौरान सत्ता की खींचतान में ही भारत और पाकिस्तान के बंटवारे का भी फैसला हो गया। दूसरे विश्वयुद्ध में जर्मनी का साथ देने के कारण नेताजी सुभाषचंद्र बोस अंग्रेजों की नजरों में युद्ध अपराधी थे। हैरानी यह थी कि गांधी-नेहरू जैसे कांग्रेसी नेताओं ने भी नेताजी के साथ अपराधियों जैसा ही सलूक किया। माना जाता है कि आजादी के बाद कई साल तक नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने गुमनामी में जीवन बिताया। हाल ही में जारी पुराने दस्तावेजों से साफ हो चुका है कि तब के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू नेताजी के परिवार की जासूसी करवाया करते थे।
आजाद हिंद फौज थी अपने आप में नायाब
नेताजी सुभाषचंद्र बोस की सेना कई मायनों में बहुत खास थी। माना जाता है कि उन्होंने करीब एक लाख सैनिकों को अपने साथ जुटा लिया था। सेना में सभी रैंकों पर सभी धर्मों और जातियों के लोगों को समान रूप से जगह दी गई थी। ताकि किसी को अपने साथ नाइंसाफी होती न लगे। यहां तक कि महिलाओं की अलग रेजीमेंट भी थी। आजाद हिंद फौज ने भारत में सबसे पहले नगालैंड के रास्ते प्रवेश किया था। वहां से जंग जीतते हुए यह सेना मणिपुर तक पहुंच गई थी। आजाद हिंद फौज के सैनिक इन सभी जगहों पर अपना ध्वज फहराते हुए आगे बढ़े। इसलिए तकनीकी तौर पर देखें तो आजाद भारत की धरती पर आजादी का झंडा आजाद हिंद फौज ने ही फहराया था।
रेडियो मैसेज में क्या कहना चाहते थे नेताजी बोस
आजादी के करीब 70 साल बाद नेताजी सुभाषचंद्र बोस से जुड़ी कुछ सीक्रेट फाइलें सामने आई हैं। कुल 64 फाइलें पश्चिम बंगाल सरकार ने जारी की हैं। जिनमें फाइल नंबर-62 से बड़ा खुलासा हुआ है। इसमें साफ-साफ लिखा है कि 1945 के बाद नेताजी जिंदा थे और बंगाल में इंटेलिजेंस ब्यूरो उनके परिवार वालों की जासूसी कर रहा था। इसलिए ताकि अगर वो परिवार के संपर्क में आएं तो उन्हें पकड़ा जा सके। जिन 64 फाइलों को जारी किया गया है उनमें कुल 12744 पन्ने हैं। मतलब ये कि सारी बातें सामने आने में अभी काफी वक्त लग सकता है।
जो फाइलें जारी की गई हैं, उनमें एक चिट्ठी भी है। 18 नवंबर 1949 की ये चिट्ठी नेताजी के भतीजे अमियनाथ बोस ने अपने भाई शिशिर बोस को भेजी थी। शिशिर उस वक्त लंदन में डॉक्टरी कर रहे थे, जबकि अमिय कोलकाता में रहते थे। इस चिट्ठी में लिखा गया है- “करीब महीने भर से रेडियो पर एक अजीबोगरीब आवाज़ सुनाई दे रही है। शॉर्ट वेव पर 16एमएम फ्रीक्वेंसी पर जाते ही आवाज आने लगती है कि नेताजी सुभाषचंद्र बोस ट्रांसमीटर ए कौथा बोलते चाये (नेताजी सुभाषचंद्र बोस ट्रांसमीटर पर बात करना चाहते हैं) । यही बात बार-बार घंटों तक दोहराई जाती रहती थी। हमें पता नहीं कि ये मैसेज कहां से आ रहा है।” केंद्र की खुफिया एजेंसियां नेताजी के परिवार की एक-एक चिट्ठी खोलकर पढ़ते थे। उसी दौरान ये चिट्ठी उनके हाथ लगी थी।
परिवार से संपर्क की दूसरी कोशिश
फाइलों के मुताबिक नेताजी ने संभवत: एक बार फिर संपर्क करने की कोशिश की थी। एक फाइल में नेताजी के ही भतीजे एसके बोस की चिट्ठी है, जो उन्होंने नेताजी के बड़े भाई शरतचंद्र बोस को 12 दिसंबर 1949 को भेजी थी। इसमें उन्होंने लिखा है कि- “सिंगापुर में रेडियो पीकिंग ने बताया हैकि नेताजी थोड़ी देर में अपना मैसेज ब्रॉडकास्ट करेंगे। हमने हॉन्गकॉन्ग ऑफिस में इसे सुनने की कोशिश की, लेकिन फ्रीक्वेंसी मैच नहीं हुई। और हम कुछ सुन नहीं पाए।”
1970 तक होती रही थी जासूसी
बोस परिवार की 1970 तक की चिट्ठियां और उनके कहीं भी आने-जाने पर नज़र रखी गई। ये सारा कुछ सीक्रेट वीकली सर्वे के तहत इन फाइलों में दर्ज है। इस पूरे दौर में पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की सरकार हुआ करती थी और सिद्धार्थ शंकर राय मुख्यमंत्री थे। जाहिर है आज के समय में भी किसी आतंकवादी या अपराधी पर इस तरह नज़र नहीं रखी जाती होगी, जिस तरह से उस दौर में नेताजी सुभाषचंद्र और उनके परिवार के साथ किया गया।

नेहरू ने देश को धोखा दिया--चंद्रकुमार बोस

'हिटलर ने नहीं, जवाहरलाल नेहरू ने दिया देश को धोखा'
बंगाल भारतीय जनता पार्टी  नेता चंद्रकुमार बोस ने देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू पर तीखा हमला करते हुए कहा कि उन्‍होंने देश को धोखा दिया। क्रांतिकारी नेताजी सुभाषचंद्र बोस के पोते चंद्रकुमार बोस ने यह गंभीर आरोप नेहरू पर लगाया। इस क्रम में उन्‍होंने नेहरू की तुलना जर्मन तानाशाह हिटलर से की और कहा कि उसने कभी देश को धोखा नहीं दिया। उन्‍होंने हिटलर को 'राष्‍ट्रवादी' बताया, जिसकी मंशा 'बस यूरोप पर विजय' की थी।
भाजपा नेता ने नेहरू पर वार करते हुए ट्विटर पर लिखा, 'हिटलर एक राष्‍ट्रवादी था, जिसका मकसद बस यूरोप विजय था, लेकिन उसने कभी देश को धोखा नहीं दिया। वहीं, नेहरू ताज तो चाहते थे, लेकिन लड़कर नहीं, बल्कि अंग्रेजों की चाटुकारिता कर। संक्षेप में कहें तो नेहरू ने देश को धोखा दिया।' अपने इस ट्वीट पर विवाद बढ़ने के बाद चंद्रकुमार ने सफाई दी और कहा कि उनका उद्देश्‍य बस इतना था कि हिटलर नेहरू की तरह धोखेबाज नहीं था।


Well Hitler was a nationalist who's intention was to conquer Europe- but he never betrayed his nation. Nehru wanted to sit on the throne without fighting- but sucking up to the British. In short Nehru betrayed his nation .
उन्‍होंने एक अन्‍य ट्वीट में कहा, 'मैं हिटलर का समर्थन नहीं कर रहा हूं। निश्चित तौर पर वह तानाशाह था, लेकिन नेहरू की तरह धोखेबाज नहीं था, जो देशभक्ति की आड़ में दरअसल, अंग्रेजों के चाटुकार थे। अंग्रेजों ने यहां 200 साल तक राज किया और इस दौरान हजारों लाखों लोगों को मार डाल डाला और यातनाएं दी, लेकिन नेहरू उनके साथ गलबहियां करते रहे।'


I'm not supporting Hitler-of course he was a devil- but he was not fraudulent like Nehru - who in the guise of being a nationalist was actually a British lackey.TheBritish tortured&killed millions of Indians over a period of 200 years-but wined&dined with them!

चंद्रकुमार बोस पश्चिम बंगाल में 2016 में हुए विधानसभा चुनाव के दौरान ममता बनर्जी के खिलाफ भवानीपुर सीट से उमीदवार थे। इस चुनाव में वह हालांकि हार गए थे, पर उन्‍होंने बंगाल की राजनीति में बने रहने की बात कही थी।
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इसमें कोई दो राय नहीं, कि नेहरू द्वारा ब्रिटिश सरकार की चाटुकारिता करने के ही कारण भारत को आज़ादी मिलने में देरी हुई थी। लेकिन देश को पढ़ाया गया कि जवाहरलाल और महात्मा गाँधी के संघर्ष के कारण ही भारत स्वतन्त्र हो पाया और आज़ादी के वास्तविक स्वतन्त्रता सेनानियों के बलिदानों को दरकिनार कर दिया गया। 
जबकि जालिआंवाला बाग़ कांड के दोषी जनरल डायर को उधम सिंह द्वारा ब्रिटेन में जाकर मारने पर महात्मा गाँधी ने ब्रिटिश सरकार को कहा था कि "एक....की वजह से हमारे रिश्तों पर फर्क नहीं पड़ना चाहिए।" दूसरे, जयपुर में ब्रिटिश पुलिस की गोली का शिकार हुए शहीद जतिन दास को जब श्रद्धांजलि देने के लिए गाँधी (क्योकि उन दिनों गाँधी जयपुर में ही थे) को कहा गया, गाँधी ने स्पष्ट रूप से मना कर दिया। इतना ही नहीं, भगत सिंह और साथियों को एक दिन पहले, वो भी शाम के समय, फाँसी दी गयी, क्योकि गाँधी ने ब्रिटिश सरकार से कहा था "कांग्रेस का 30 मार्च को लाहौर में अधिवेशन होना है और भगत सिंह का जो करना है, जल्दी करो, ताकि अधिवेशन ठीकठाक चलता रहे।" गाँधी ने जितने भी धरने और प्रदर्शन किए, केवल क्रांतिकारियों द्वारा जब भी कोई सख्त कार्यवाही होती, जनता का ध्यान वहां से हटाने के लिए किए जाते थे।नाथूराम गोडसे ने स्पष्ट रूप से कोर्ट अपने       
मालवीय लाये थे मर्सी पेटिशन, गांधी-नेहरू ने साइन से कर दिया इंकार, भगत सिंह को हो गयी फांसी
गांधी और नेहरू के साथ साथ काँग्रेस पार्टी से हमारे नफरत के कई कारण है और उसमे से ये एक प्रमुख है। हाँ ये सच जरुर है की बनारस हिन्दू यूनिवर्सिटी के संस्थापक मदनमोहन मालवीय जी ने 14 फरवरी 1931 को लार्ड इरविन के सामने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फांसी रोकने के लिए मर्सी पिटिशन फ़ाइल की थी ताकि भगत सिंह राजगुरु और सुखदेव को फांसी न दी जाये, कुछ सजा कम की जाये
लार्ड इरविन ने कहा की चूँकि आप कांग्रेस के पूर्व अध्य्क्ष है इसलिए आपको इस पिटिशन के साथ मोहनदास गाँधी के साथ जवाहर लाल नेहरु सहित कांग्रेस के कम से कम 20 सदस्यों का पत्र होना चाहिए
लेकिन गाँधी और नेहरु ने भगत सिंह की मर्सी पिटिशन पर चुप्पी साध ली और अपनी सहमती नही दी, और नेहरू के मना करने पर अन्य कांग्रेसी नेताओं ने भी अपने पत्र नहीं दिए
ब्रिटेन में रिटायर होने के बाद लार्ड इरविन ने लन्दन में कहा था, “यदि गाँधी या नेहरु एक बार भी भगत सिंह के फांसी पर अपील करते तो हम उनकी फांसी रद्द कर देते लेकिन पता नही क्यों मुझे ऐसा महसूस हुआ की गाँधी और नेहरु को भगत सिंह को फांसी देने की अग्रेजो से भी ज्यादा जल्दी थी”
फाँसी देने से पहले लाहौर जेल के जेलर ने गाँधी को पत्र लिखकर पुछा था अगर इन तीन लड़कों को फाँसी दी जाती है तो देश में कोई बवाल तो नहीं होगा। गाँधी ने उस पत्र का लिखित जवाब दिया के आप अपना कार्य करें कुछ नहीं होगा।
प्रो. कपिल कुमार की किताब से गाँधी और लार्ड इरविन के बीच समझौता के समय इरविन इतना आश्चर्य में था की गाँधी और नेहरु दोनों में से किसी ने भी भगत सिंह राजगुरु और सुखदेव को छोड़ने की कोई चर्चा तक नही की ।
इरविन अपने दोस्तों से कहता था की “हम ये मानकर चल रहे थे की गाँधी और नेहरु भगत सिंह की रिहाई के लिए अड़ जायेंगे और हम उनकी ये मांग मान लेते”. भगत सिंह को फांसी देने के लिए जितनी दिलचस्बी अंग्रेज नहीं दिखा रहे थे, उस से अधिक गाँधी और नेहरू भगत सिंह को फांसी पर चढ़ा देना चाहते थे क्योंकि भगत सिंह दिन प्रतिदिन भारत के लोगों के बीच लोकप्रिय हो रहे थे और गाँधी नेहरू इसी से चिंतित थे, और चाहते थे की भगत सिंह को जल्द फांसी हो, लार्ड इरविन ने ये बात स्वयं कही। 
अब भी कोई भारतीय हमसे ये कहे की गाँधी और नेहरू महान थे, तो हमे उस भारतीय पर शर्म आती है, क्योंकि वो भी इस देश पर बोझ है और इन गाँधी नेहरू के वंशजो ने तो किताबों तक में भगत सिंह को “आतंकवादी” बता दिया।