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क्या The Hindu भारत विरोधियों के साथ है? The Hindu, दिल्ली को दहलाने वाले TERRORIST हैं… आदमी-आरोपित या संदिग्ध नहीं: वामपंथी मीडिया कब सुधारेगी अपनी भाषा, आतंकियों की पहचान छिपाने का इतिहास बहुत पुराना

                                   द हिंदू ने अपनी खबरो में दिल्ली ब्लास्ट के आतंकियों को अक्यूज लिखा है
दिल्ली के रेड फोर्ट के पास 10 नवंबर 2025 को हुए भयानक कार ब्लास्ट ने पूरे राष्ट्र को स्तब्ध कर दिया। एक सफेद ह्युंडई i20 कार में भारी मात्रा में अमोनियम नाइट्रेट और अन्य विस्फोटक लादकर सुसाइड बॉम्बर डॉक्टर उमर उन नबी ने धमाका किया। इस धमाके में 15 निर्दोष लोग मारे गए और 20 से अधिक घायल हुए।

दिल्ली पुलिस ने तत्काल यूएपीए और एक्सप्लोसिव्स एक्ट के तहत केस दर्ज किया, जबकि केंद्र सरकार ने इसे साफ तौर पर आतंकी हमला घोषित कर दिया। एनआईए की जाँच में सामने आया कि उमर पुलवामा का डॉक्टर था, जो फरीदाबाद के अल-फलाह यूनिवर्सिटी में असिस्टेंट प्रोफेसर था और जैश-ए-मोहम्मद और अंसार गजवात-उल-हिंद जैसे इस्लामिक मिलिटेंट ग्रुप्स से जुड़ा था।

उसके सहयोगी डॉक्टर मुजम्मिल अहमद गनई, अदील मजीद राथर, शकील और शाहीन सईद भी गिरफ्तार हुए, जो ‘टेरर डॉक्टर्स’ के नेटवर्क का हिस्सा थे। इस घटना ने ‘व्हाइट-कॉलर टेररिज्म’ को सबके सामने उजागर किया।

इसके बाद तो इसे आतंकी हमला कहने में कोई भी गुंजाइश भी नहीं बची। केंद्र सरकार की कैबिनेट ने भी इसे ‘एंटी-नेशनल फोर्सेस’ द्वारा किया गया हेसियन टेरर एक्ट करार दिया। जाँच में सीसीटीवी फुटेज से ये भी सामने आया कि उमर ने कार को रेड फोर्ट मेट्रो स्टेशन के पास पार्क किया और ट्रैफिक सिग्नल पर विस्फोट किया।

डीएनए टेस्ट से उमर की पहचान हुई, जो फरीदाबाद रेड्स के बाद घबराकर दिल्ली की ओर भागा था। एनआईए ने 2900 किलो विस्फोटक बरामद किए, जो जैश के हैंडलरों से जुड़े थे। यह साफ हो गया था कि पाकिस्तान में पल रहे टेरर मॉड्यूल एक्टिव हैं और उन्होंने ही देश में अशांति फैलाने की कोशिश की।

आतंकी शब्द से परहेज करता ‘द हिंदू’

ऐसे स्पष्ट प्रमाणों के बावजूद ‘द हिंदू’ जैसे वामपंथी मीडिया हाउस अपने पुराने ढर्रे पर चल रहे हैं। उन्होंने अपनी रिपोर्ट्स में ‘आतंकी’ शब्द लिखने से पूरी तरह परहेज किया।

द हिंदू ने ब्लास्ट के बाद से लेकर अब तक उमर को ‘डॉक्टर’, ‘आरोपित’, ‘संदिग्ध’ या ‘मैन’ ही लिखा है। 17 दिन बीतने के बाद भी उनकी हेडलाइंस अब तक अस्पष्ट हैं। हेडलाइन्स में ‘डॉक्टर उमर की कार में ब्लास्ट’, ‘आरोपित डॉक्टर गिरफ्तार’, ‘रेड फोर्ट ब्लास्ट में संदिग्ध की भूमिका’ लिखा गया है।

यहाँ तक कि जहाँ ‘टेररिस्ट’ लिखा, वहाँ इस शब्द को सिंगल कोट्स में डाल दिया, मानो अब तक उन्हें संदेह ही है। और ये वह पाठक के मन में भी पैदा कर रहे हैं। सोशल मीडिया पोस्ट्स में भी ‘कार ब्लास्ट’, ‘एक्सप्लोडिंग कार’ आदि का पैटर्न रहा बिना ‘आतंकवादी हमला’ लिखे।एक तरह से यह पत्रकारिता नहीं बल्कि टेरर सिम्पैथी कहा जाना चाहिए।​

पहले भी दिखा वामपंथ का नैरेटिव पैटर्न

यह कोई पहली बार नहीं है। द हिंदू की रिपोर्टिंग में अक्सर यह पैटर्न दिखता है कि जब भी किसी घटना को धो-पोंछना होता है, किसी आरोपित को पाक साफ दिखाना होता है को तो शब्दों से खेला जाता है। दिल्ली ब्लास्ट में भी द हिंदू की अब तक रिपोर्ट्स की हेडलाइंस इसी पैटर्न को दर्शाती हैं।
  • पहली– ‘रेड फोर्ट के पास कार ब्लास्ट, डॉक्टर संदिग्ध’- पर आतंकी नहीं।
  • दूसरी– ‘फरीदाबाद डॉक्टर आरोपित के रूप में नामित’
  • तीसरी– ‘ब्लास्ट जाँच में मैन की भूमिका’
  • चौथी– ‘उमर नबी- डॉक्टर जो कार चला रहा था’
  • पाँचवीं– ‘आरोपित डॉक्टरों का नेटवर्क’
  • छठी– ‘रेड फोर्ट इंसिडेंट में संदिग्ध गिरफ्तार’
  • सातवीं– ‘डॉक्टर उमर की आखिरी ड्राइव’
  • आठवीं– ‘ब्लास्ट के मैन की पहचान’
  • नौवीं– ‘आरोपित का बैकग्राउंड’
  • दसवीं– ‘संदिग्ध डॉक्टरों पर नजर’
ये हेडलाइंस द हिंदू की दुविधा साफ तौर पर दिखाती हैं। सरकार आतंकी कह रही, NIA यूएपीए (UAPA) लगा रही, लेकिन द हिंदू 27 नवंबर 2025 तक भी ‘टेररिस्ट’ बोलने से हिचक रही।​ उनकी रिपोर्ट्स में अक्सर ‘terrorist’ की जगह ‘militant’, ‘gunman’, ‘accused’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया जाता है। यह वही अप्रोच है जो अल-जजीरा जैसे अंतरराष्ट्रीय मीडिया में दिखती है। वहाँ भी आतंकी कहने से बचा जाता है और भाषा को इस तरह गढ़ा जाता है कि पाठक के मन में संदेह पैदा हो।

पुराने ढर्रे पर चल रहा द हिंदू

द हिंदू जैसे वामपंथी मीडिया हाउसेज का ये पुराना हथकंडा है। पुलवामा अटैक, 26/11 या ऑपरेशन सिंदूर के बाद भी इन्होंने टेररिस्ट को ‘मिलिटेंट’, ‘आरोपित’ कहा। शब्दों से खेलकर ये वामपंथी मीडिया हाउस अलग नैरेटिव बनाने की कोशिश में लगे रहते हैं- आतंकवादी हमले को ‘इंसिडेंट’ और हमलावर को आतंकी के बजाय ‘डॉक्टर’ और आरोपित लिखते हैं जैसे उसने लोगों को मारा नहीं बल्कि सिर्फ चप्पल चुराई हो।
द हिंदू, अल जजीरा की तर्ज पर ही काम करता है। जैसे अल-जजीरा हमास को ‘मिलिटेंट’ कहता है वैसे ही द हिंदू भी आतंकी को मानवीकरण करता दिखता है। इसके पीछे उसका उद्देश्य साफ है- पाठकों में संदेह डालना कि ‘क्या बंदा सच में टेररिस्ट था?’
वामपंथी मीडिया की कलाबाजी अब भी जारी है, भले आम जनता जाग चुकी हो। सोशल मीडिया पर ट्रोल्स इन्हें आड़े हाथों ले रहे हैं, लेकिन ये अपनी लाइन नहीं छोड़ते।​ इनकी कोशिश यही रहती है कि किसी भी घटना को इस तरह पेश किया जाए कि पाठक के मन में सरकार और एजेंसियों की बात पर सवाल उठे।
द हिंदू की यह मानसिकता कहीं न कहीं राष्ट्रीय सुरक्षा पर भी सवाल खड़े करती है। जब NIA जैश लिंक बता रही, तो ‘डॉक्टर नेटवर्क’ कहना आंतक को ग्लोरिफाई करता है फरीदाबाद में 2900 किलो आईईडी बरामद हुए, जो कार बॉम्ब में इस्तेमाल किए गए, फिर भी द हिंदू उसे ‘ब्लास्ट’ लिखता है। यह पत्रकारिता नहीं, प्रोपगैंडा है।
ऐतिहासिक संदर्भों को देखा जाए तो ‘द हिंदू’ का वामपंथी झुकाव साफ है। नेहरू युग से ये कॉन्ग्रेस-समर्थक रहे। इमरजेंसी में भी चुप्पी साधे रखी। अब मोदी सरकार के खिलाफ नैरेटिव बुनते रहते हैं।

जाँच में दिखा जैश से संपर्क, द हिंदू ने छिपाया

रेड फोर्ट ब्लास्ट पर भी पाकिस्तान से जुड़ा लिंक और तथ्यों को छिपाया और जैश-ए-मोहम्मद को महज एक ‘ग्रुप’ कहा। दिल्ली ब्लास्ट में पकड़े गए सभी आरोपितों का सीधा जुड़ाव पाकिस्तान-स्थित आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद से था।
जाँच एजेंसियों ने पाया कि ‘हंजुल्ला’ नामक जैश हैंडलर ने डॉक्टरों और छात्रों को बम बनाने के वीडियो भेजे और उन्हें कट्टरपंथी बनाया। डॉक्टर उमर उन नबी, मुजफ्फर अहमद राठर और शहीन शाहिद जैसे आरोपितों ने छात्रों को भर्ती कर ‘व्हाइट कॉलर टेरर मॉड्यूल’ तैयार किया।
2019 में हुए पुलवामा हमलों में आरोपित तुफैल अहमद भी इसी नेटवर्क का हिस्सा था और दिल्ली हमलों में भी इसका हाथ था। इस मॉड्यूल को 26 लाख रुपये की फंडिंग मिली थी। इस लिहाज से ये पूरी तरह साफ है कि यह हमला कोई स्थानीय घटना या दुर्घटना नहीं थी बल्कि जैश का संगठित आतंकी ऑपरेशन था। इसके बावजूद द हिंदू संशय में दिख रहा है।
अल जजीरा फिलिस्तीन कवरेज में इजरायल को ‘ऑक्यूपायर’ कहता है वैसे ही द हिंदू भारत को ‘ऑप्रेसर’। दोनों का पैटर्न विक्टिम कार्ड खेलना है। लेकिन राष्ट्रहित में पत्रकारिता होनी चाहिए, न कि संदेह फैलाना।​
अल जजीरा फिलिस्तीन कवरेज में इजरायल को ‘ऑक्यूपायर’ कहता है वैसे ही द हिंदू भारत को ‘ऑप्रेसर’। दोनों का पैटर्न विक्टिम कार्ड खेलना है। लेकिन राष्ट्रहित में पत्रकारिता होनी चाहिए, न कि संदेह फैलाना।​

जनता को दिख रहा द हिंदू का सच

जब किसी को संदिग्ध कहा जाता हो तो इसका अर्थ है कि वह व्यक्ति जिसके बारे में शक हो कि उसने अपराध किया है, लेकिन उसके खिलाफ औपचारिक आरोप या सबूत अभी तक पुख्ता नहीं हुए। संदिग्ध शब्द पाठक के मन में और भी ज्यादा अनिश्चितता पैदा करता है। यह बताता है कि व्यक्ति पर शक है, लेकिन यह पक्का नहीं कि उसने अपराध किया।
इसके अलावा जब हम किसी को अक्यूज्ड या आरोपित लिखते हैं तो इसका मतलब है कि उसके ऊपर अपराध का महज आरोप लगा है। वह आतंकी नहीं हो सकता या कोर्ट ने उसे दोषी नहीं ठहराया तो वह सही भी हो सकता है।
इसके अलावा द हिंदू का ‘मैन’ शब्द का उपयोग अपराध की गंभीरता को कम करने जैसा है। यह व्यक्ति को सिर्फ एक आम इंसान की तरह पेश करता है, न कि आतंकी या अपराधी की तरह। इससे पाठक के मन में यह सवाल उठ सकता है कि क्या वह सच में आतंकी था या सिर्फ एक आम आदमी जिसे फँसाया गया।
अब पाठकों के सोचने का तरीका बदल चुका है। वे सही और गलत लिखने का फर्क समझने लगे हैं। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पहले ट्विटर) पर #HinduHidesTerror ट्रेंड हुआ। इस पर लोग द हिंदू की हेडलाइंस को साझा कर रहे थे।
ज्यादातर पाठक अब डिजिटल न्यूज पढ़ते हैं, जिसमें स्पष्ट रिपोर्टिंग और बात शामिल हो। मीडिया की भूमिका लोकतंत्र का चौथा खंभा है, लेकिन द हिंदू इसे तोड़ रहा। अगर आतंकी को ‘डॉक्टर’ कहा/लिखा जाएगा तो युवाओं में रेडिकलाइजेशन/ कट्टरपंथ को बढ़ावा मिलेगा। द हिंदू को आईना देखना चाहिए कि 17 दिन बाद भी वह किस दुविधा में है कि आतंकी को आतंकी लिखने में डर रहा है।
भले ही आज पाठक ज्यादा जागरूक हो गए हैं और उनके सोचने का तरीका बदल गया है, लेकिन द हिंदू जैसे वामपंथी मीडिया हाउस अब भी अपने पैंतरे दिखाने से बाज नहीं आते। इनकी कोशिश यही रहती है कि लोगों के दिमाग में शक की परत छोड़ दी जाए।