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जमानत जब्त कराने की आदी केजरीवाल की आम आदमी पार्टी गुजरात और उत्तर प्रदेश में भी लड़ेगी चुनाव

आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 

दिल्ली वालों को मुफ्त की रेवड़ियां बांट सत्ता हथियाने वाली आम आदमी पार्टी को दिल्ली और पंजाब के बाहर कोई घास नहीं डालता, सभी जगह जमानत ही जब्त होती है। वैसे शायद भारतीय चुनाव इतिहास में यही एक पार्टी है जिसके अधिकतर उम्मीदवारों की जमानत ही जब्त नहीं होती बल्कि कई क्षेत्रों में तो NOTA से कम वोट मिलते हैं। 

कोरोना में रोहिंग्यों का पालन-पोषण करने प्रवासी मजदूरों को दिल्ली छोड़ने पर मजबूर कर राज्यों में अपनी साख खो चुके दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल फिर अपनी भद पिटवाने को आतुर हो रहे हैं। ऊपर से उत्तर प्रदेश में चौधरी बना दिया सुल्तानपुर में सिनेमा टिकट ब्लैक करने वाले संजय सिंह को। यानि अपनी बर्बादी की गाथा खुद ही लिखनी शुरू कर दी। प्रवासी मजदूरों को दिल्ली छोड़ने को मजबूर करने केजरीवाल बिहार विधान सभा में तो दूर ही रहे, हैदराबाद निगम चुनाव में भी खुलकर मैदान में आने की बजाए आज़ाद उम्मीदवार की हैसियत से चुनाव लड़ा। 
राजनीति के उलटे-पुलटे दांव आजमाने और कई राज्यों में अपनी जमानत गंवाने के लिए मशहूर रही आम आदमी पार्टी अब दिल्ली के अलावा दूसरे राज्यों में भी अपने पैर पसारने की ख्वाइशमंद है। पार्टी ने नए सिरे से उत्तर प्रदेश, बिहार, गुजरात, गोवा आदि राज्यों में अपनी तैयारी शुरू की है। पार्टी के मुताबिक वह आगामी चार राज्यों में विधानसभा चुनाव लड़ेगी। ये राज्य उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, पंजाब और गोवा हैं। इतना ही नहीं, केजरीवाल की अगुआई वाली यह पार्टी गुजरात के निकाय चुनावों में भी हिस्सा लेने का मन बना चुकी है, जहां उसे पहले के चुनावों में भारी शिकस्त का सामना करना पड़ा था।

अन्ना आंदोलन से निकली आम आदमी पार्टी अपने गठन से अब तक यानी सात साल के दौरान दिल्ली में तो तीन बार सरकार बनाने में सफल रही है। लेकिन, इस दौरान केजरीवाल ने दिल्ली से बाहर भी अपना राजनीतिक आधार बढ़ाने के लिहाज से गोवा, हरियाणा, मध्य प्रदेश, गुजरात, यूपी, पंजाब समेत कई राज्यों में लोकसभा और विधानसभा दोनों ही चुनाव में आम आदमी पार्टी को चुनावी मैदान में उतारा। यह अलग बात है कि पंजाब और दिल्ली छोड़कर सब जगह उसे बुरी तरह हार ही मिली। यही नहीं, पंजाब और दिल्ली को छोड़ दें तो आम आदमी पार्टी के प्रत्याशियों की जमानत तक नहीं बची है।

लोकसभा और MCD चुनाव में बुरा हाल

दिल्ली की जनता ने राज्य की सत्ता भले ही केजरीवाल की आम आदमी पार्टी को लगातार तीसरी बार सौंपी हो, लेकिन दिल्ली के नगर निगम और लोकसभा के चुनाव में लोगों ने उन पर अपना भरोसा नहीं जताया है। 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी ने सभी सातों सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे थे, लेकिन एक भी नहीं जीत सका। इस बार के लोकसभा चुनाव में AAP के प्रत्याशी कांग्रेस से भी पीछे रह गए थे।

अरविंद केजरीवाल 2015 में 70 में 67 सीटें जीतकर दिल्ली के मुख्यमंत्री बने थे, लेकिन दो साल के बाद 2017 में दिल्ली के नगर निगम चुनाव हुए थे, जिनमें आम आदमी पार्टी को करारी हार मिली थी। दिल्ली की 272 पार्षद सीटों में से आम आदमी पार्टी महज 48 सीटें ही जीत सकी थी जबकि बीजेपी 181 वार्डों में जीतकर एमसीडी की सत्ता को बचाने में कामयाब रही थी। 

पंजाब में गिरता ग्राफ 

दिल्ली के बाद आम आदमी पार्टी का राजनीतिक ग्राफ पंजाब में ऊपर उठता दिखा था। 2014 के लोकसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी चार सीटें जीती थी और 2017 के विधानसभा चुनाव में वो एक विकल्प मानी जा रही थी। यह अलग बात है कि उसे अपेक्षित कामयाबी नहीं मिल पाई और पार्टी 100 से अधिक सीटें जीतने का दावा कर रही थी, लेकिन 20 पर ही सिमट गई। हालांकि, पंजाब में मुख्य विपक्ष पार्टी बनी, लेकिन इसके बाद से उसका ग्राफ लगातार गिरता जा रहा है।

लोक इंसाफ पार्टी के साथ उसका समझौता टूटा। नेता प्रतिपक्ष एचएस फूलका ने पार्टी और विधायक पद से इस्तीफा दे दिया। विधायक सुखपाल सिंह खैहरा ने भी पार्टी छोड़ दी। इसके अलावा अब तक नाजर सिंह मानशाहिया, अमरजीत सिंह संदोआ, मास्टर बलदेव सिंह जैसे विधायक भी आप से निकल चुके हैं और 2019 के लोकसभा चुनाव में महज एक सीट ही आम आदमी पार्टी जीत सकी। 

हरियाणा में AAP हुई साफ

दिल्ली से सटे हरियाणा में आम आदमी पार्टी अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिश लगातार करती रही है। सीएम अरविंद केजरीवाल का गृह राज्य भी हरियाणा है। इसके बावजूद केजरीवाल का जादू हरियाणा में नहीं चल सका है। प्रदेश की कुल 90 में से 46 विधानसभा सीटों पर आम आदमी पार्टी ने उम्मीदवार उतारे, लेकिन एक भी सीट पर उसे जीत नहीं मिल सकी। पूरे राज्य में उसे आधे फीसदी से कम वोट मिले थे। इससे पहले हुए लोकसभा चुनाव में भी आम आदमी पार्टी अपनी जमानत नहीं बचा सकी थी।

गुजरात में जमानत जब्त पार्टी बनी आप

गुजरात में 2017 के विधानसभा चुनाव में उतरने के लिए आम आदमी पार्टी ने जोर-शोर के साथ तैयारी की थी लेकिन जब चुनाव का वक्त आया तो सिर्फ 20 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे। पार्टी को यहां से एक भी सीट नहीं मिली बल्कि कई प्रत्याशियों की जमानत जब्त हो गई। हालांकि, उससे पहले अरविंद केजरीवाल ने गुजरात में हार्दिक पटेल के साथ मंच साझा किया था।

राजस्थान में विफल रहे केजरीवाल

राजस्थान को लेकर अरविंद केजरीवाल कुछ ज्यादा ही गंभीर थे। उन्होंने पहले कुमार विश्वास को प्रभारी बनाया था, लेकिन बाद में उन्हें बदल दिया था। 2018 के चुनाव में कुल 200 विधानसभा सीटों में से आम आदमी पार्टी ने 141 सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारे थे, लेकिन एक भी जीतना तो दूर की बात जमानत भी नहीं बचा सका था। आम आदमी पार्टी के खाते में आधे फीसदी से भी कम वोट मिले थे।

एमपी-छत्तीसगढ़ में नोटा से भी कम वोट

मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में साल 2018 में हुए विधानसभा चुनाव में आम आदमी पार्टी पूरे जोर-शोर से लड़ी थी। एमपी की 208 सीटों पर आम आदमी पार्टी ने अपना प्रत्याशी उतारा था, लेकिन एक भी सीट नहीं जीत सकी और न ही कोई प्रत्याशी अपनी जमानत बचा सका।

ऐसे ही छत्तीसगढ़ में 85 सीटों पर आम आदमी पार्टी ने उम्मीदवार उतारे थे, लेकिन एक भी सीट पर जीत नहीं मिल सकी। इतना ही नहीं मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में आम आदमी पार्टी को नोटा से भी कम वोट मिले थे। इन दोनों राज्यों में एक फीसदी वोट भी पार्टी को नहीं मिल सका जबकि नोटा को दो फीसदी से ज्यादा वोट मिले थे।