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न सांसद हैं-न विधायक फिर भी लेटरहेड पर ‘अशोक स्तंभ’: TMC प्रवक्ता साकेत गोखले ने किया ‘राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह अधिनियम’ का उल्लंघन

                                           साकेत गोखले (फोटो साभार-india today)
मोदी सरकार पर संविधान और लोकतंत्र को ख़त्म करने का आरोप लगाने वाले ही संविधान और लोकतंत्र की धज्जियाँ उड़ाने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे। बने फिर रहे हैं संविधान की रक्षक के चौधरी। 

तृणमूल कांग्रेस के पूर्व सांसद साकेत गोखले का केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को लिखा पत्र विवादों में आ गया है। उन्होंने पत्र में भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक से सरकार को संपर्क करने का आग्रह किया है, लेकिन पत्र के लिए जिस लेटरहेड का इस्तेमाल किया, उसमें राष्ट्रीय प्रतीक ‘अशोक स्तंभ’ बना हुआ है, साथ ही मोटे अक्षरों में ‘पूर्व सांसद’ लिखा हुआ है। नियम के मुताबिक, पूर्व सांसद को ऐसे लेटरहेड के इस्तेमाल की अनुमति नहीं है, जिसमें राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह हों।

क्या लिखा है खत में

तृणमूल कांग्रेस के पूर्व सांसद ने खत में केन्द्र सरकार से आग्रह किया है कि वह सोनम वांगचुक से संपर्क कर उनका भूख हड़ताल खत्म करवाए। वांगचुक NEET और CBSE परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं के विरोध में 28 जून 2026 से अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर हैं। गोखले ने सोशल मीडिया पर अपने उस पत्र की कॉपी को साझा किया।

गोखले ने यह पत्र 15 जुलाई 2026 को लिखा है। इसमें वांगचुक के बिगड़ते स्वास्थ्य का हवाला देते हुए कहा गया है कि उनका वजन महज दो सप्ताह में 8 किलोग्राम से अधिक कम हो गया है। उन्होंने मंत्री से अपील की है कि वे कम से कम उनसे संवाद करें और देश भर के लाखों छात्रों की चिंता का समाधान करें।

                                                           (साभार-x@sakeygokhale)

साकेत गोखले ने अपने निजी स्टेशनरी पर राष्ट्रीय प्रतीक का उपयोग करके कानून का उल्लंघन किया है, क्योंकि पूर्व सांसदों और विधायकों को राष्ट्रीय प्रतीकों का इस तरह से इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं है। यह भारत के राज्य प्रतीक (उपयोग विनियमन) नियम, 2007 का सीधा उल्लंघन है, जो भारत के राज्य प्रतीक (अनुचित उपयोग निषेध) अधिनियम, 2005 (State Emblem of India – Prohibition of Improper Use Act, 2005) के तहत बनाए गए थे।

इन नियमों के नियम 10 में स्पष्ट रूप से कहा गया है कि न केवल पूर्व सांसद और विधायक, बल्कि पूर्व मंत्री, पूर्व न्यायाधीश और सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी भी किसी तरह से राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह का उपयोग नहीं कर सकते हैं। नियम 10 में कहा गया है, “इन नियमों के तहत अधिकृत व्यक्तियों के अलावा कोई भी व्यक्ति (जिनमें सरकार के पूर्व पदाधिकारी, जैसे पूर्व मंत्री, पूर्व सांसद, पूर्व विधानसभा सदस्य, पूर्व न्यायाधीश और सेवानिवृत्त सरकारी अधिकारी शामिल हैं) किसी भी प्रकार से प्रतीक चिन्ह का उपयोग नहीं करेगा।”

इस कानून में उन अधिकारियों की सूची दी गई है जो अपने स्टेशनरी पर इस प्रतीक चिन्ह का उपयोग कर सकते हैं, और इस सूची में पूर्व सांसदों और विधायकों को शामिल नहीं किया गया है। केवल संसद और विधान सभाओं या परिषदों के वर्तमान सदस्यों को ही इसका उपयोग करने की अनुमति है और वह भी आधिकारिक कार्यों के लिए। नियम में ये बताया गया है कि किस-किस काम के लिए इसका इस्तेमाल हो सकता है। साथ ही अधिनियम की अनुसूची 1 में अधिकारियों की पूरी सूची दी गई है, जो इसका इस्तेमाल कर सकते हैं।

किन लोगों को राज्य प्रतीक का उपयोग करने की अनुमति है

2007 के नियमों के अनुसार, राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ का उपयोग करने की अनुमति भारत के राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, राज्यपाल और उपराज्यपाल, भारत के मुख्य न्यायाधीश और उच्चतम न्यायालय, उच्च न्यायालय, लोकसभा और राज्यसभा, केंद्रीय मंत्रालय और विभाग, राज्य सरकारों के विभाग, भारतीय दूतावास और उच्चायोग, केंद्र एवं राज्य सरकार के वे कार्यालय जिन्हें नियमों के अंतर्गत अनुमति दी गई हो, कुछ वैधानिक निकाय और आयोग, यदि उन्हें केंद्र सरकार द्वारा अधिकृत किया गया हो। इनके लिए भी उपयोग केवल आधिकारिक कार्य, सरकारी पत्राचार, सील, दस्तावेज, भवन, वाहन आदि तक सीमित होता है।

यह प्रतिबंध इसलिए लगाया गया है ताकि किसी भी तरह से यह धारणा न बने कि कोई मैसेज आधिकारिक है या किसी संवैधानिक प्राधिकरण या सरकारी कार्यालय से आया है। गोखले ने अपने निजी लेटरहेड पर प्रतीक चिन्ह लगाकर यही भ्रम पैदा की है, जिसे कानून रोकना चाहता है।

नियम 10(1) के तहत साफ कहा गया है कि सरकार के सभी पूर्व पदाधिकारियों चाहे वह पूर्व राष्ट्रपति, पूर्व प्रधानमंत्री, पूर्व केंद्रीय मंत्री, पूर्व सांसद, पूर्व राज्यपाल या पूर्व जज हों, वे आधिकारिक स्टेशनरी या किसी भी दूसरे रूप में राष्ट्रीय प्रतीक अशोक स्तंभ का उपयोग नहीं कर सकते। जैसे ही कोई व्यक्ति अपने संवैधानिक पद को छोड़ता है, रिटायर होता है या उसका कार्यकाल समाप्त होता है, उसका राष्ट्रीय प्रतीक चिन्ह का उपयोग करने का अधिकार भी तुरंत खत्म हो जाता है।

जाना पड़ सकता है जेल

2005 के अधिनियम में आगे यह प्रावधान है कि कोई भी व्यक्ति जो बिना पूर्व अनुमति के प्रतीक चिन्ह या उसके मिलते-जुलते रूप का उपयोग करता है, जिससे यह प्रतीत होता है कि यह सरकार से संबंधित है या एक आधिकारिक दस्तावेज है, तो उसे दो साल तक की जेल की सजा हो सकती है या उस पर जुर्माना लगाया जा सकता है अथवा जुर्माना और सजा दोनों ही दिया जा सकता है।
भारत के राज्य चिह्न (अनुचित उपयोग निषेध) अधिनियम, 2005 की धारा 3 में कहा गया है, “कोई भी व्यक्ति राज्य चिह्न या उससे मिलते-जुलते चिन्ह का उपयोग इस तरह नहीं करेगा कि जिससे यह आभास हो कि यह सरकार से संबंधित है या यह केंद्र सरकार या राज्य सरकार का आधिकारिक दस्तावेज है, जब तक कि केंद्र सरकार या अधिकृत अधिकारी से पूर्व अनुमति न मिल जाए।”
धारा 7 (1) में दंड के बारे में बताया गया है, “धारा 3 के प्रावधानों का उल्लंघन करने वाला कोई भी व्यक्ति दो वर्ष तक के कारावास या पाँच हजार रुपये तक के जुर्माने या दोनों से दंडित किया जाएगा। यदि वह अपने अपराध को दोहराता है तो हर बार अपने अपराध के लिए कम से कम छह महीने से दो वर्ष तक के कारावास और पाँच हजार रुपये तक के जुर्माने से दंडित किया जाएगा।”
यह कानून किसी भी व्यापार, व्यवसाय के उद्देश्य से प्रतीक चिन्ह का उपयोग करने पर दंड का प्रावधान भी करता है। इसलिए नियम में साफ कहा गया है कि सभी के निजी काम, निजी कंपनी, एनजीओ, सोसायटी, राजनीतिक दल, निजी कॉलेज, स्कूल या यूनिवर्सिटी, निजी अस्पताल, व्यापारिक प्रतिष्ठान, यूट्यूब चैनल, वेबसाइट या मीडिया संस्थान, अधिवक्ता, डॉक्टर, इंजीनियर या दूसरे पेशेवर अपनी निजी पहचान के लिए इसका इस्तेमाल नहीं कर सकते।
हालाँकि गोखले ने लेटरहेड पर खुद को ‘पूर्व सांसद’ के रूप में सही तरीके से लिखा है, लेकिन लेटरहेड पर अशोक स्तंभ की उपस्थिति यह बताती है कि उन्होंने लेटरहेड कानून का उल्लंघन किया है। पूर्व सांसदों को अपने व्यक्तिगत या राजनीतिक पत्राचार पर राजकीय प्रतीक चिन्ह का उपयोग करने का विशेषाधिकार प्राप्त नहीं है, यह प्रतिबंध सभी पूर्व सदस्यों पर समान रूप से लागू होता है।
साकेत गोखले जुलाई 2023 के उपचुनाव में तृणमूल कॉन्ग्रेस की तरफ से राज्यसभा के लिए चुने गए थे। चूँकि वे गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री लुइज़िन्हो फलेरो के इस्तीफे से खाली हुई सीट पर चुने गए थे, इसलिए उन्होंने राज्यसभा नियमों के अनुसार खाली सीट का पूरा कार्यकाल नहीं बल्कि शेष कार्यकाल पूरा किया। इसलिए गोखले की राज्यसभा सदस्यता अप्रैल 2026 में खत्म हो गई। पार्टी ने उन्हें फिर से राज्यसभा में नहीं भेजा। इसलिए वे पूर्व सांसद हैं।

कांग्रेस प्रवक्ता ने किया मोदी के दिवंगत पिताजी का अपमान कर पार्टी को पहुंचा दिया नुकसान

पंजाब कांग्रेस नेता नवजोत सिंह सिद्धू एक बात कहते थे कि 'कांग्रेस ही कांग्रेस को ख़त्म करेगी', वह शत-प्रतिशत ठीक साबित हो रही है, क्योकि आदमी गलतियों और ठोकर से सीखता है, लेकिन कांग्रेस प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरुद्ध अपशब्द बोलना बंद नहीं कर रही, जो कांग्रेस को उतना पीछे धकेल रही है। 2002 गुजरात दंगों से लेकर अब तक लगभग 90 गालियां दी जा चुकी हैं।   
कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी और राहुल गांधी के करीबी नेताओं द्वारा देश के सबसे लोकप्रिय प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को गाली देने का सिलसिला थम नहीं रहा है। कांग्रेस के प्रवक्ता पवन खेड़ा सोमवार (20 फरवरी, 2023) को जब अडानी स्टॉक विवाद मामले में मीडिया से बात कर रहे थे, तो उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के दिवंगत पिताजी को लेकर अपमानजनक बयान दिया। उन्होंने कहा, ‘ जब अटल बिहारी वाजपेयी जेपीसी का गठन कर सकते थे तो नरेंद्र ‘गौतम दास’ सॉरी दामोदरदास मोदी को क्या प्रॉब्लम है? ‘गौतम दास’ है या नरेंद्र ‘दामोदर दास’ है? नाम भले ही दामोदरदास है लेकिन काम गौतम दास का करते हैं।’

कांग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने जिस तरह मजाकिया अंदाज में प्रधानमंत्री मोदी के पूज्य पिताजी दामोदरदास मोदी का नाम लिया, वो कांग्रेस की निचले स्तर की मानसिकता को दर्शाता है। दरअसल कांग्रेस के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय टूलकिट का एक के बाद एक पर्दाफाश हो रहा है, इससे कांग्रेसी पूरी तरह हताश और निराश है। उनका मानसिक संतुलन बिगड़ चुका है। इसलिए उनकी जुबान भी लड़खड़ाने लगी है।

 

पीएम मोदी के पिताजी का अपमान
20/02/2023
कांग्रेस के प्रवक्ता पवन खेड़ा जब अडानी स्टॉक विवाद मामले में मीडिया से बात कर रहे थे, तो उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी के दिवंगत पिताजी को लेकर अपमानजनक बयान दिया। उन्होंने कहा, ‘ जब अटल बिहारी वाजपेयी जेपीसी का गठन कर सकते थे तो नरेंद्र ‘गौतम दास’ सॉरी दामोदरदास मोदी को क्या प्रॉब्लम है? ‘गौतम दास’ है या नरेंद्र ‘दामोदर दास’ है? नाम भले ही दामोदरदास है लेकिन काम गौतम दास का करते हैं।’

मल्लिकार्जुन खड़गे ने की तानाशाह से तुलना
08/01/2023
कर्नाटक में एक रैली को संबोधित करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल किया। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता खड़गे ने प्रधानमंत्री मोदी की तुलना तानाशाह से की। खड़गे ने कहा कि हर बात के लिए मोदी-मोदी…लोकतंत्र के लिए ठीक नहीं। लोकतंत्र में अगर एक व्यक्ति को आप को भगवान बनाते हैं, तो फिर लोकतंत्र नहीं रह जाता। यह कदम तानाशाही की ओर ले जाता है। उन्होंने कहा कि अगर आपके पास शक्ति है और आप एकजुट हैं, तो आपकी वैल्यू मिलेगी। लेकिन अगर आप एकजुट नहीं हैं, हर कोई आपको बांटकर राज करने वाला सिद्धांत आपके ऊपर लागू करेगा, जैसा अंग्रेजों ने किया था और अब मोदी कर रहे हैं।

मल्लिकार्जुन खड़गे ने की चूहे से तुलना
19/12/2022
राजस्थान के अलवर में एक रैली को संबोधित करते हुए खड़गे ने फिर से प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया। उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी की तुलना चूहे से करते हुए कहा कि हम चीन के आक्रमण पर चर्चा चाहते हैं लेकिन वह (सरकार) चर्चा के लिए तैयार नहीं है। वह बाहर शेर जैसे बात करते हैं लेकिन असल में वह चूहे की चाल चलते हैं।

TV डिबेट पर गाली-गलौज और धमकी देते कांग्रेस, AAP और SP के नेता

                                    सुप्रिया श्रीनेत, रागिनी नायक और अलका लंबा (बाएँ से दाएँ)
एक समय था या यूँ कहा जाए कि गुजरा जमाना, जब सभ्य, ईमानदार, और प्रतिष्ठित जनसेवा करने वाले ही राजनीति में आते थे, लेकिन बदलते दौर में आज परिस्थितियां एकदम विपरीत हैं। 
आज राजनीति में जनसेवा और देशभक्ति का चोला ओढ़ सफेदपोशी गुंडों का समावेश हो गया है। पार्षद से लेकर सांसद तक निर्वाचित अथवा पराजित कितने ऐसे नेता है, जिन पर आपराधिक मामला न दर्ज हो। इनका इतना दोष नहीं, जितना जनता का है, वह भी 500 रूपए, शराब या फिर फ्री की बिजली और पानी के लालच में आकर इनको अपना नेता मान वोट दे आती है। कोई इस गहराई में जाने की कोशिश भी नहीं करता कि जब पार्टी प्रवक्ता अथवा नेता टीवी पर किसी चर्चा में जिस भाषाशैली का प्रयोग कर रहे हैं क्या किसी सभ्य व्यक्ति को शोभा देता है? माना किसी आवेश में आकर अपशब्द निकल गए, माफ़ी तो मांग लें, नहीं; इतना ही नहीं पार्टी भी कोई कार्यवाही नहीं करती, यानि आज जनसेवा के नाम पर गुंडागर्दी का ही बोलबाला होने वाला है।  
लोगों का भरोसा हासिल करने के लिए मजबूत नेतृत्व के साथ मजबूत इरादों का होना भी अति आवश्यक है। लेकिन कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों में इसका अभाव स्पष्ट रूप से दिखता है। यही कारण है कि कांग्रेस, आप और अन्य विपक्षी दलों के प्रवक्ताओं को अक्सर टीवी पर बहस के दौरान गाली-गलौज व अपमानजनक भाषा का प्रयोग करते हुए देखा जाता है। भाजपा को बदनाम करने के लिए ये दल सोची-समझी रणनीति के तहत निम्न स्तरीय व्यवहार करते हैं, जो उनकी घटिया मानसिकता का परिचय देता है।

लंबे समय से विपक्षी प्रवक्ताओं ने अपनी पार्टी की कमियों पर पर्दा डालने के लिए गाली-गलौज का सहारा लिया है। हाल ही में, एक ट्विटर यूजर @moronhumour ने अपने अकाउंट से 18 ऐसे उदाहरणों का उल्लेख किया है, जब कॉन्ग्रेस और आप के नेता ने अपने विरोधियों के खिलाफ अभद्र भाषा का प्रयोग किया।

कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत

पिछले हफ्ते कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत ने आज तक न्यूज चैनल पर एक लाइव बहस में असभ्य भाषा का प्रयोग किया था। उन्होंने भाजपा नेता संबित पात्रा को ‘नाली का कीड़ा’ कहा था। मालूम हो कि श्रीनेत कभी NDTV की पत्रकार रह चुकी हैं।

हालाँकि, यह कोई पहली घटना नहीं थी, जब श्रीनेत ने लाइव बहस के दौरान असभ्य भाषा का प्रयोग किया था। अगर उनकी कुछ पुरानी बहसों को एक बार फिर से देखा जाए तो वह इसमें भी अभद्र भाषा का प्रयोग करते हुए नजर आ रही हैं। वह अपने विरोधियों द्वारा दिए गए तर्कों और विचारों को सुनना ही नहीं चाहती हैं, केवल अपनी ही बातों को सबसे सटीक बताने का प्रयास करती हैं। यही कारण है कि इस दौरान जब अन्य दलों के प्रवक्ता उनके बयानों का खंडन करने की कोशिश करते हैं, तो वह अपना आपा खो बैठती हैं। वह अपमानजनक भाषा का प्रयोग कर विरोधियों को रोकती हैं।

कांग्रेस प्रवक्ता रागिनी नायक

श्रीनेत के अलावा कांग्रेस के कई अन्य प्रवक्ता भी हैं, जो न्यूज चैनल में बहस के दौरान अपने विरोधियों का मुकाबला करने के लिए अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते हैं। रागिनी नायक भी उन्ही में से एक हैं। आज तक पर एक डिबेट के दौरान कांग्रेस प्रवक्ता रागिनी नायक ने बीजेपी के गौरव भाटिया को सड़क छाप, तोतला, थाली के बैगन, तूझे जूते पड़ेंगे और बदतमीज कहा। दरअसल, उन्होंने (रागिनी) ने इस तरह की अपमानजनक भाषा से डिबेट की शुरुआत इसलिए की, क्योंकि उनके पास बीजेपी प्रवक्ता का मुकाबला करने के लिए बाजिब तर्क नहीं थे। ध्यान दें कि कॉन्ग्रेस की यह प्रवक्ता DUSU अध्यक्ष भी रह चुकी हैं।
दरअसल, नायक को भी टीवी पर बहस के दौरान अपना आपा खोने की आदत है। साल 2018 में, रागिनी ने इंडिया टीवी पर एक न्यूज़ शो के दौरान गौरव भाटिया को कहा था, “तेरा बाप चोर है।”
कांग्रेस नेता अलका लाम्बा 
एक अन्य कांग्रेस नेता जो टीवी डिबेट में असभ्य भाषा का प्रयोग करने के लिए जानी जाती हैं, वह अलका लांबा हैं। अलका पहले आम आदमी पार्टी (AAP) की सदस्य थीं। अलका ने इस साल की शुरुआत में भाजपा प्रवक्ता गौरव भाटिया का अपमान किया था। उन्होंने इंडिया टीवी पर एक डिबेट में कहा था, “बदतमीज इनका बाप होगा, बदतमीज इनकी माँ होगी।”
इसके अलावा जब अलका को अपने विरोधियों का खंडन करने के लिए कोई तर्क नहीं मिलता है, तो कॉन्ग्रेस वह विरोधियों का मजाक उड़ाने की कोशिश करती हैं। उनके नामों का मजाक उड़ाती है, संभवत: उन्हें उकसाने के लिए। न्यूज 18 पर एक बहस के दौरान, लांबा ने भाजपा प्रवक्ता गुरु प्रकाश पासवान का मजाक उड़ाते हुए कहा था, “गुरु प्रकाश में नहीं, गुरु अंधकार में है।”
कांग्रेस के स्व नेता राजीव त्यागी 
कॉन्ग्रेस के कुछ प्रवक्ता वाद-विवाद के दौरान उनसे पूछे गए सवालों से इतने बौखला गए थे कि वे शो के एंकर को गाली देने से भी नहीं हिचके। कॉन्ग्रेस पार्टी के दिवंगत राजीव त्यागी ने 2018 में एक टीवी डिबेट के दौरान पत्रकार अमीश देवगन को ‘भड़वा’ और ‘दलाल’ कहा था।
वहीं, एक बार राजीव त्यागी बहस के दौरान अपनी बात रखने के लिए सीएनएन आईबीएन7 के एंकर सुमित अवस्थी पर हमला करने के लिए उठ खड़े हुए थे। बाद में एंकर ने उन्हें सीट पर बिठाया था।
आप के पूर्व सदस्य एम सी अब्बास 
एमसी अब्बास, जो कभी ‘आप’ के टिकट पर विधायक चुनाव लड़े थे, वह अब ‘स्वतंत्र राजनीतिक विश्लेषक’ के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने एक बार रिपब्लिक टीवी पर बहस के दौरान भाजपा की नूपुर शर्मा को दादी माँ, आंटी, एकता कपूर, वैंप कहकर परेशान करना शुरू कर दिया था।
सपा नेता अनुराग भदौरिया 
समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता न केवल गलियाँ देने के लिए, बल्कि भाजपा प्रवक्ताओं पर हमले करने के लिए भी मशहूर हैं। समाजवादी पार्टी के अनुराग भदौरिया ने एक बार बीजेपी के गौरव भाटिया को इंडिया टीवी के स्टूडियो में धक्का दिया था।
कांग्रेस प्रवक्ता अलोक शर्मा 
कॉन्ग्रेस प्रवक्ता आलोक शर्मा को तो सभी जानते हैं। इन्होंने एक बार न्यूज 24 चैनल पर लाइव डिबेट के दौरान बीजेपी नेता पर गिलास में भरा पानी फेंक दिया था।
आप सदस्य निशांत वर्मा 
कभी ‘आप’ पार्टी के टिकट पर चुनाव लड़ चुके निशांत वर्मा ने पिछले साल रिपब्लिक टीवी पर एक बहस के दौरान बीजेपी प्रवक्ता संबित पात्रा को उल्टा लटकाने की धमकी दी थी। वर्मा ने पात्रा को कहा था, “तुझे उल्टा टांग दूँगा।”
कांग्रेस वरिष्ठ नेता पवन खेरा 
भले ही यह कॉन्ग्रेस पार्टी की टिप्पणी थी, लेकिन पाकिस्तानी नेताओं की भाषा में की गई थी। कॉन्ग्रेस प्रवक्ता पवन खेड़ा ने एक बार इंडिया टीवी पर डिबेट के दौरान पीएम नरेंद्र मोदी पर आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए MODI का फुल फॉर्म मसूद अजहर, ओसामा, दाऊद और आईएसआई बताया था।
कांग्रेस हमदर्द राजीव देसाई 
राजीव देसाई, जो कॉन्ग्रेस के प्रति सहानुभूति रखने के लिए जाने जाते हैं और कथित तौर पर इस पार्टी के प्रवक्ता भी हैं। उन्होंने टाइम्स नाउ पर बहस करते हुए भाजपा नेता नुपुर शर्मा को मूर्ख, पागल और बबलहेड कहकर गाली दी थी।
आप विधायक सोमनाथ भारती 
‘आप’ नेता सोमनाथ भारती ने भी टीवी चैनल पर अपमानजनक भाषा का प्रयोग किया था। उन्होंने एक बार सुदर्शन टीवी की एक महिला एंकर को गलियाँ दी थीं। उन्होंने कहा था, “भड़वागिरी बंद करो, धंधे पर बैठ जाओ।”
कांग्रेस प्रवक्ता सुजाता पॉल 
ऐसा लगता है कि टीवी पर बहस के दौरान विपक्ष के प्रवक्ताओं का नाम बिगाड़ना कॉन्ग्रेस नेताओं का शौक है। रिपब्लिक टीवी पर एक डिबेट शो में कॉन्ग्रेस की सुजाता पॉल ने संबित पात्रा को ‘दया पात्रा’ जैसे नामों से बुलाना शुरू कर दिया, ताकि उन्हें अपनी बात कहने का मौका ना मिल सके।
कांग्रेस नेता संजय निरुपम 
कॉन्ग्रेस नेता संजय निरुपम ने केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी (उस समय बीजेपी नेता) के खिलाफ सेक्सिस्ट और अपमानजनक टिप्पणी की थी।। उन्होंने 2012 में एक बहस के दौरान कहा का था कि कल तक तो आप टीवी पर ठुमके लगा रही थीं और आज चुनावी विश्लेषक बन गईं।
कांग्रेस प्रवक्ता अखिलेश प्रताप सिंह 
जब अयोग्य लोगों के पास अपना बचाव करने के लिए कोई तर्क नहीं होता है, तब कॉन्ग्रेस प्रवक्ता टीवी एंकरों को धमकाते हैं। कॉन्ग्रेस के अखिलेश प्रताप सिंह ने दो वरिष्ठ एंकर दिवंगत रोहित सरदाना और मानिक गुप्ता को धमकी दी थी कि वे अपनी नौकरी को बचाने के लिए लाइन में लग जाएँ।
बताए गए 18 उदाहरण में आप देख सकते हैं कि किस तरह विपक्षी दलों के प्रवक्ता नेशनल न्यूज चैनल पर अमर्यादित भाषा का जमकर इस्तेमाल करते हुए नजर आए। इस तरह की कई और घटनाएँ भी हैं, जो इस सूची में शामिल नहीं हैं।
इन उदाहरणों में साफ दिखाई दे रहा है कि बीजेपी पर हमला करने के लिए कॉन्ग्रेस, आप पार्टी के नेताओं को गालियाँ, धमकी और अपमानजनक भाषा का प्रयोग करने से कोई गुरेज नहीं है। जब वाजिब तर्क नहीं होते हैं, तब लोग ऐसा ही करते हैं।