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2004, 2010, 2012, 2025… नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर बार-बार क्यों मचती है भगदड़, इस बार कैसे हुईं मौतें, अचानक प्लेटफॉर्म बदला जाना मुख्य कारण

                                                 नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर जुटी भीड़
नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भगदड़ घटना में 18 लोगों की जान चली गई और 10 लोग घायल हो गए। पहले बताया जा रहा था कि रेलवे स्टेशन पर भगदड़ वाला माहौल 15 फरवरी की रात तब बना जब 9:55 के करीब सूचना आई कि प्रयागराज जाने वाली एक ट्रेन दूसरे प्लैटफॉर्म पर है। उसी समय प्लैटफॉर्म नंबर 14, 15 पर खड़े होकर इंतजार कर रहे यात्री तेजी से भागे और स्थिति बिगड़ती गई। हालाँकि बाद में उत्तर रेलवे के जनसंपर्क अधिकारी ने बताया कि ये घटना एक यात्री के पैर फिसलने के बाद हुई।
                                                        नई दिल्ली पर भगदड़ के बाद की तस्वीरें

उत्तर रेलवे के मुख्य जनसंपर्क अधिकारी हिमांशु शेखर उपाध्याय ने समाचार एजेंसी एएनआई को बताया, “यह दुखद घटना उस वक्त घटी, जब पटना की ओर जाने वाली मगध एक्सप्रेस नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के प्लेटफॉर्म नंबर 14 पर खड़ी थी, और जम्मू की ओर जाने वाली उत्तर संपर्क क्रांति प्लेटफॉर्म नंबर 15 पर खड़ी थी। इस दौरान प्लेटफॉर्म 14-15 की ओर आ रहा एक यात्री सीढ़ियों पर फिसल कर गिर गया, और उसके पीछे खड़े कई यात्री इसकी चपेट में आ गए।”

उन्होंने बताया कि इस घटना की उच्च स्तरीय समिति द्वारा जाँच की जा रही है। कोई भी ट्रेन रद्द नहीं की गई, न ही प्लेटफॉर्म में कोई बदलाव किया गया… प्लेटफॉर्म पर स्थिति अब सामान्य है। सभी ट्रेनें अपने सामान्य समय पर चल रही हैं…”

भारतीय रेलवे ने इस घटना के बाद पीड़ितों को मुआवजा देने की घोषणा की है। मृतकों के परिजनों को 10 लाख रुपए का मुआवजा दिया जाएगा। गंभीर रूप से घायल लोगों को 2.5 लाख रुपए और मामूली रूप से घायल लोगों को 1 लाख रुपए का मुआवजा मिलेगा।

इस मामले की जाँच के लिए दो सदस्यीय समिति भी गठित की गई है। इसमें पीसीसीएम (रेलवे के प्रधान मुख्य वाणिज्य प्रबंधक), उत्तर रेलवे नरसिंह देव और पीसीएससी उत्तर रेलवे पंकज गंगवार शामिल हैं। समिति ने एनडीएलएस रेलवे स्टेशन के सभी वीडियो फुटेज को सुरक्षित करने का आदेश दिया है।

2004, 2010, 2012 में भी हुई थी भगदड़

ये पहली बार नहीं है कि नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भगदड़ मची हो। इससे पहले भी साल 2004, 2010 और 2012 में अलग-अलग कारणों से नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भगदड़ मची थी, जिसमें कई लोगों की जान गई थी।
साल 2004 में छठ के मौके पर भीड़ देखी गई थी। सबको घर लौटना था। प्लेटफॉर्म पर हर जगह लोग थे। अचानक से उस समय ट्रेन के दूसरे प्लेटफॉर्म पर होने की जानकारी लोगों को मिली और भगदड़ मचने लगी। इस घटना में 11 लोग घायल हुए थे और 5 लोगों की मौत हो गई थी।
इसी तरह मई 2010 में भी कुछ ऐसा ही हुआ था। समय गर्मियों की छुट्टी का था और पटना जाने वाले लोग क्रांति एक्सप्रेस का इंतजार कर रहे थे। ट्रेन को प्लेटफार्म 13 पर आना था लेकिन वो आई प्लैटफॉर्म नंबर 12 पर। यात्रियों को जैसे ही इसकी जानकारी हुई वहाँ तुरंत भगदड़ मच गई। इस आपाधामी में 2 लोगों की मौत हो गई जबकि कम से कम 15 यात्री घायल हुए थे।
इसके बाद साल 2012 में भी नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर एक दुर्घटना हुई थी। उस समय विक्रमशिला एक्सप्रेस अपने निर्धारित समय से 5 मिनट देरी से दोपहर 2.50 बजे प्लेटफार्म 12 की बजाय प्लेटफार्म 13 से रवाना हुई थी। इसके तुरंत बाद, यात्रियों की भीड़ प्लेटफार्म 13 पर खड़ी सप्त क्रांति एक्सप्रेस की ओर दौड़ पड़ी, जो आमतौर पर प्लेटफार्म 12 से चलती है। इस भगदड़ में 35 साल की महिला और 14 साल के लड़के की मौत हो गई थी।

1954 का कुंभ, 1000+ लोगों की मौत और PM नेहरू: किसे बचाने के लिए इसे कहा गया ‘कुछ भिखारियों की मौत’ – एकमात्र मौजूद पत्रकार ने जो-जो देखा-लिखा; दलाल मीडिया क्यों सच्चाई छुपा रहा है?

                     जवाहर लाल नेहरू, कुंभ 1954 में लाशों का ढेर (फोटो साभार: The StatesMan)
एक कहावत बहुचर्चित है कि अगर किसी का आशीर्वाद(दुआ) नहीं ले सकते बद्दुआ(हाय) मत लो। दोनों जीवन में अपना असर जरूर दिखाती है। लेकिन कांग्रेस जवाहर लाल नेहरू से लेकर वर्तमान कांग्रेस नेतृत्व हाय लेने में पीछे नहीं। मूर्ख हिन्दू कांग्रेस की चापलूसी करते रहे। निम्न लेख में लेखक ने इस बात पर प्रकाश डालने का प्रयास किया। नेहरू ने कुम्भ भगदड़ में मरने वाले साधुओं को भिखारी बताया, इंदिरा गाँधी ने 7 नवम्बर 1966 के दिन(गोपाष्टमी) गौ-हत्या पर प्रतिबन्ध लगा रहे निहत्ते साधुओं के खून की होली से पार्लियामेंट स्ट्रीट लाल कर दी थी, तब कृपालु जी महाराज ने इंदिरा को श्राप दिया था कि "इंदिरा जिस तरह हम निहत्ते साधुओं के खून की होली खेली जा रही है हिमालय से आधुनिक ड्रेस में एक तपस्वी कांग्रेस को ख़त्म करने आएगा।' सोनिया गाँधी ने हिन्दुओं के विरुद्ध Anti-Communal Violence Bill बनाया, अगर 2014 नरेंद्र मोदी की बजाए कांग्रेस आ गयी होती और यह बिल पास हो गया होता, हिन्दुओं का जीना दुभर हो गया होता। दूसरे, फिरोज जहांगीर खान का पौत्र राहुल गाँधी अपना दत्तात्रेय गोत्र बताने वाले कहते है मन्दिर जाने वाले लड़कियां छेड़ते हैं, प्रियंका हिन्दू क्षेत्रों में हाथ में कलावा बांधकर जाती है लेकिन मुस्लिम क्षेत्रों में बिना कलावा बांधे आदि आदि। 

प्रस्तुत है लेख:-         

एनएन मुखर्जी के संस्मरण के बारे में 4 फरवरी 2019 को द-स्टेट्समैन ने अंग्रेजी में छापा था। वो मूल रिपोर्ट स्क्रॉल की हिंदी वेबसाइट सत्याग्रह पर छपी थी। चूँकि सत्याग्रह वेबसाइट बंद हो गई है, ऐसे में ये रिपोर्ट सिर्फ द स्टेट्समैन पर ही उपलब्ध है।

तीर्थराज प्रयागराज में हर 12 साल बाद कुँभ मेले का आयोजन होता है। प्रयागराज महाकुंभ 2025 को लेकर बहुत कुछ लिखा-पढ़ा जा रहा है, लेकिन हम बताने चल रहे हैं आजादी के बाद आयोजित पहले कुंभ मेले के बारे में, जहाँ प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और उस समय राष्ट्रपति रहे डॉ राजेंद्र प्रसाद भी पहुँचे थे। लेकिन उनका पहुँचना इतना दुर्भाग्यपूर्ण रहा कि 1000 से ज्यादा लोगों को अपनी जान गँवानी पड़ी और 2000 से ज्यादा लोग घायल हो गए।

करीब 1000 लोगों के मारे जाने की वजह थी, भगदड़ का मचना.. जिसके बारे में अलग-अलग जगहों पर अलग-अलग दावे किए जाते हैं। हालाँकि हम प्रकाशित कर रहे हैं वो सबसे विश्वसनीय आँखों देखी, जिसके हमेशा से छिपाने की कोशिश की गई।

             कुंभ 1954 के हादसे की तस्वीर, जो एनएन मुखर्जी ने खींची थी (फोटो साभार: TheStatesman)

कुंभ 1954 में भगदड़ का नेहरू कनेक्शन

भारत को आजादी 1947 में मिली थी। सन 1954 में पहली बार आजाद भारत के प्रयाग (तत्कालीन इलाहाबाद) में कुंभ का आयोजन होने वाला था। हालाँकि 1948 में अर्धकुंभ का आयोजन हो चुका था। चूँकि कुंभ 1954 का आयोजन खुद प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के शहर इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में हो रहा था, तो इसमें नेहरू की निजी रुचि भी थी। लेकिन दूसरे शाही स्नान (मौनी अमावस्या) में खुद नेहरू के शामिल होने के फैसले ने प्रयाग में लाशों के ढेर लगा दिए।
इन घटनाओं को कॉन्ग्रेस की सरकारों ने दबाने के भरसक प्रयास किए, यहाँ तक कि इस 1000 लोगों के मारे जाने की घटना को कुछ ‘भिखारियों’ की मौत कह कर भी सरकार ने प्रचारित किया और असलियत को दबाने की कोशिश की, लेकिन आनंद बिहार पत्रिका के एक पत्रकार की वजह से घटना खुल गई। सबूत के तौर पर तस्वीर भी छप गई। इसके बावजूद इस घटना को कॉन्ग्रेसियों ने पूरी ताकत से छिपाने की कोशिश की। हालाँकि इस घटना के खुल जाने और हादसे के चलते निराशा में घिर चुके उस समय के मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत बेहद नाराज हुए थे और पत्रकार के लिए ‘हरा#$%दा’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया था।

कैसे गई थी कुंभ 1954 में हजार से ज्यादा लोगों की जान?

ये दिन था 3 फरवरी 1954… मौका था कुंभ के दूसरे शाही स्नान यानी मौनी अमावस्या का। जवाहरलाल नेहरू खुद ही प्रयाग पहुँचे थे और उनके साथ थे राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद। समय था सुबह के करीब 10.20 बजे का, जब नेहरू जी और राजेंद्र बाबू की कार त्रिवेणी रोड से आई और बैरियर को पार करके किला घाट की ओर बढ़ी। इस दौरान नेहरू को देखने के लिए भीड़ उमड़ पड़ी, तो मेले में आ रहा हुजूम और मेले से निकल रहा हुजूम आमने-सामने आ गया। भगदड़ मच गई। लोग खाईं से नीचे गिरने लगे, तो पास का ही बड़ा कुआँ लाशों से भर गया।
आनंद बाजार पत्रिका के लिए मेला कवर कर रहे फोटो जर्नलिस्ट एनएन मुखर्जी ने साल 1989 में ‘छायाकृति’ नाम की पत्रिका में छपे अपने संस्मरण में इन बातों को विस्तार से बताया है। दरअसल, इस मेले में हुए हादसे की भयावहता की पोल उन्हीं की तस्वीर से खुली थी। वो हादसे के समय वो संगम चौकी के पास एक टॉवर पर खड़े थे।
उन्होंने अपने संस्मरण में बताया था कि प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को उसी दिन संगम स्नान के लिए आना था। इसलिए सभी पुलिस और प्रशासनिक अधिकारी उनके आगमन की तैयारियों में व्यस्त थे। लेकिन सुबह 10.20 बजे जब दोनों कार से किला घाट की तरफ बढ़े, तो भीड़ बेकाबू हो गई। हर तरफ लाशें थी। वो खुद कई लाशों के ऊपर से चढ़ कर आगे गए थे और तस्वीरें खींची थी।
उन्होंने हैरानी जताते हुए लिखा था कि इस बड़ी घटना के बावजूद हादसे वाली जगह से दूर रहे शीर्ष अधिकारी सरकारी आवास पर शाम 4 बजे तक चाय-नाश्ते में व्यस्त रहे, और उन्हें इस हादसे के बारे में जानकारी तक नहीं मिली। वहीं, जब एनएन मुखर्जी करीब 1 बजे अपने दफ्तर पहुँचे, जहाँ संपादक समेत तमाम पत्रकार साथी उनके जिंदा बचने पर हैरानी जताते हुए उनके आने पर खुशी जताई।
ये मामला अंतर्राष्ट्रीय सुर्खियों में न जाए, इसलिए उस समय की सरकार ने इसे ‘कुछ भिखारियों की मौत’ कहकर खारिज करने की कोशिश की। लेकिन एनएन मुखर्जी ने वो तस्वीरें अधिकारियों के सामने रख दी, जिसमें कई महिलाएँ महँगे कपड़े और गहने पहने हुई थी, जिससे साफ जाहिर होता था कि मृतक कोई भिखारी नहीं थे, बल्कि वो संपन्न परिवारों से थे और सरकारी अव्यवस्था के शिकार हुए थे।
इस घटना में मारे गए लोगों के शव किसी को दिए नहीं गए, बल्कि ढेर के ढेर लगाकर सामूहिक रूप से जला दिए गए। एनएन मुखर्जी ने बताया था कि वो किसी तरह से उन शवों के ढेर के पास पहुँचे थे। उन्होंने पुलिसकर्मी के पैर पकड़ते हुए उससे से कहा था कि वो अपनी “मृत दादी को आखिरी बार देखना चाहते हैं”, जिसके बाद उन्हें शवों के पास जाने दिया गया। इस बीच, एनएन मुखर्जी ने चुपके से छोटे कैमरे से सामूहिक रूप से जलाए जा रहे शवों की तस्वीर खींच ली थी।
आनंद बाजार पत्रिका ने हादसे की खबर तस्वीर के साथ छापी। चूँकि बाकी जगहों पर बहुत कम खबर छपी, ऐसे में कॉन्ग्रेसी सिस्टम हैरान था कि हादसे की तस्वीर छप कैसे गई। उन तस्वीरों को देखते ही मुख्यमंत्री गोविंद बल्लभ पंत ने चिल्लाकर कहा था, ‘कहाँ है ये ह$%#@मजा%$ फोटोग्राफर।’ एनएन मुखर्जी ने कहा कि इस बड़े हादसे से सबक लेकर सरकार ने आगे के सभी कुंभ मेले के लिए महीनों-सालों पहले से व्यवस्था करनी शुरू की थी। हालाँकि इस घटना के दौरान जवाहरलाल नेहरू की मौजूदगी को छिपाने के प्रयास अब तक चले आ रहे हैं।

पीएम मोदी ने मंच से की सही बात, तो गलत ठहराने में जुटा मीडिया गैंग

इस पूरी घटना को हमेशा से छिपाने की कोशिश होती रही है। तथ्यों को भी तोड़-मरोड़कर पेश किया जाता है। साल 2019 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कौशांबी की एक जनसभा में इस वाकये का जिक्र किया था। उन्होंने साफ तौर पर कहा था कि प्रयागराज कुंभ 1954 की लोहमर्षक घटना को छिपाने, दबाने के प्रयास किए गए। इसके बाद तो मानों पालतू मीडिया गैंग को कोई चारा मिल गया हो। तुरंत ही ऐसे गवाह पेश कर दिए गए, जिनका उस स्थान से कोई खास लेना-देना नहीं था और जवाहर लाल नेहरू के नारनामे को छिपाने के लिए ‘सुनी-सुनाई’ बातों को छापा गया। इस मामले को लेकर 12 साल पहले भास्कर ने भी एक रिपोर्ट छापी थी, लेकिन उसमें भी नेहरू की संलिप्तता को छिपा लिया गया था। बता दें कि हादसे के बाद इंडिया एक्सप्रेस ने इस घटना में सरकारी अधिकारियों के हवाले से सिर्फ 300 लोगों के मारे जाने की बात प्रकाशित की थी। हालाँकि टाइम पत्रिका ने हादसे में 500 लोगों के मारे जाने की बात कही थी, लेकिन नेहरू की मौजदूगी को हर तरफ से छिपाने की कोशिश ही की गई।
ऐसा ही एक किस्सा बीबीसी हिंदी ने भी छापा, जिसमें उसने ये बताने की कोशिश की थी कि उस समय का मीडिया बहुत आजाद था। लेकिन एनएन मुखर्जी को वो भूल गया और ये साबित करने की कोशिश में पूरा जोर लगा दिया कि उस हादसे की वजह जवाहरलाल नेहरू नहीं थे। यही नहीं, बीबीसी ने तो ये भी झूठ स्थापित करने की कोशिश की, कि जवाहरलाल नेहरू घटना के समय प्रयागराज में थे ही नहीं। अलबत्ता उसने राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को जरूर खींचने की कोशिश की, कि उनके सामने ही भगदड़ हुई।

यमन : रमजान में 1641 रूपए जकात के लिए मर गए 85, 300 घायल

जकात लेने जुटे लोगों ने एक दूसरे को कुचला (फोटो साभार: न्यू इंडियन एक्सप्रेस)
यमन की राजधानी सना में रमजान के महीने में मची भगदड़ में 85 लोगों की मौत होने की खबर है। 300 से अधिक घायल हैं। मृतकों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। मिली जानकारी के अनुसार 20 अप्रैल 2023 को ईद से पहले जकात लेने के लिए भारी भीड़ जुटी थी। इस पर काबू पाने के लिए हाउती विद्रोहियों ने फायरिंग की। इसके बाद घबराए लोगों ने एक-दूसरे को ही कुचल दिया।

जकात दो कारोबारी बाँट रहे थे। जकात हासिल करने के लिए पहले धक्का-मुक्की हुई जो बाद में भगदड़ में तब्दील हो गई। हादसे के बाद दोनों कारोबारियों को हिरासत में लिए जाने की खबर है। जकात के तौर पर हरेक व्यक्ति को 5 हजार यमनी रियाल दिया जा रहा था। यह भारतीय मुद्रा में करीब 1641 रुपए होता है।

यमन की सरकार के अनुसार दोनों कारोबारी प्रशासन को जानकारी दिए बिना जकात बाँट रहे थे। इस कार्यक्रम में गरीबों को आर्थिक मदद दी जा रही थी। बड़ी संख्या में लोग जकात लेने को जुटे थे। चश्मदीदों अब्देल रहमान अहमद और याहिया मोहसिन ने स्थानीय मीडिया को जानकारी दी कि भीड़ को नियंत्रित करने के लिए हाउती विद्रोहियों ने हवा में फायरिंग की। गोलियाँ बिजली के तार से टकराई और पास के ट्रांसफॉर्मर में धमाका हो गया।

ब्लास्ट के बाद लोग घबरा गए और एक-दूसरे को कुचलते हुए भागने लगे। हादसे में कई लोगों के गंभीर रूप से घायल होने की भी खबर है। बताया जा रहा है कि मरने वालों की संख्या और बढ़ सकती है। नजदीकी अस्पतालों में 300 से ज्यादा घायल लोगों का इलाज जारी है। रिपोर्टों के मुताबिक जकात का यह कार्यक्रम एक स्कूल में आयोजित हो रहा था। सोशल मीडिया पर घटना से संबंधित कई वीडियो वायरल हैं। इसमें दर्जनों शव और चीखते लोगों को देखा जा सकता है। वीडियो में लोग पीड़ितों की मदद करते हुए भी दिखाई दे रहे हैं। हादसे वाली जगह पर खून के धब्बे, जूते और पीड़ितों के कपड़े जमीन पर बिखरे हुए हैं।

जकात एक तरह का दान होता है, जो अमीर मुस्लिम रमजान के महीने में गरीबों को देते हैं। कहते हैं कि अमीर मुस्लिमों को हर साल अपनी संपत्ति का कुछ हिस्सा गरीबों को दान करना फर्ज होता है। हादसे के बाद जकात बाँटने वाले व्यापारियों को हिरासत में लेकर उनसे पूछताछ की जा रही है। बता दें यमन पर साल 2014 से ईरान समर्थित हाउती विद्रोहियों का कब्जा है।