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आखिर कौन महापागल लिख रहा राहुल की स्क्रिप्ट? झूठ के सरगना कांग्रेस नेता राहुल गाँधी एक ही बार में बोल गए सब पर झूठ: गाँधी, गोडसे और संविधान…

महात्मा गाँधी (बाएँ), राहुल गाँधी (बीच में), नाथूराम गोडसे (दाएँ), (फोटो साभार : Bharatdiscovery, Jagran & ndtv)
जिस तरह राहुल गाँधी एक से बढ़कर एक झूठ बोल रहे हैं LoP पद को भी कलंकित कर दिया है। LoP के मुंह से निकले शब्द ऐसे होने चाहिए कि विपक्ष(सत्तारूढ़ पार्टी) भी उसका खंडन करने को मजबूर हो। लेकिन यहां तो LoP ही इतना झूठ बोल जनता को गुमराह कर रहा है। समझ नहीं आता आखिर राहुल की स्क्रिप्ट कौन महापागल लिख रहा है? आखिर कांग्रेस का बुद्धिजीवी वर्ग कौन-से कोप भवन में छुपा बैठा है? जहाँ तक नाथूराम गोडसे की बात है कि महात्मा गाँधी को क्यों मारा? इस सच्चाई को जानने के लिए गोडसे के कोर्ट में दर्ज 150 बयानों को ध्यान से पढ़ना होगा। दूसरे, जब गोडसे ने गाँधी को गोली मारी कहते हैं कि गाँधी 40 मिनट तक जीवित थे, जबकि विल्लिंग्टन वर्तमान डॉ राम मनोहर लोहिआ होस्पिटल ज्यादा दूर नहीं था गाँधी को बचाया जा सकता था लेकिन कोई हॉस्पिटल लेकर नहीं गया, क्यों? 

यह दुनिया का रिकॉर्ड है कि जब आरोपी को माइक से अपने बयान पढ़ने की इजाजत दी गयी है। इतना ही नहीं कांग्रेस सरकार ने गोडसे के बयानों को सार्वजनिक होने पर बैन लगा दिया था, क्यों? देखिए संलग्न गोडसे पर लिखी श्रृंगला का एक पृष्ठ। समय आ गया है कि गोडसे समर्थकों को गोडसे के बयानों को घर-घर वितरित कर गोडसे विरोधियों को करारा जवाब देना चाहिए।    
बिहार के कटिहार में ‘वोटर अधिकार यात्रा’ के दौरान कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने महात्मा गाँधी, नाथूराम गोडसे और भारतीय संविधान को लेकर एक के बाद एक कई झूठ बोले, जिसने उन्हें सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना दिया है। हाथ में संविधान की लाल किताब लेकर, राहुल गाँधी ने दावा किया कि नाथूराम गोडसे ने महात्मा गाँधी की हत्या इसलिए की क्योंकि वह संविधान से नफरत करता था और महात्मा गाँधी ने इसी संविधान के लिए अपना जीवन दिया।

हालाँकि, उनके ये दावे ऐतिहासिक तथ्यों के आगे टिक नहीं पाते। हकीकत यह है कि जब महात्मा गाँधी की हत्या हुई थी, तब भारतीय संविधान का मसौदा (ड्राफ्ट) भी सामने नहीं आया था। नाथूराम गोडसे को भी संविधान लागू होने से पहले ही फाँसी दी जा चुकी थी। राहुल गाँधी का यह बयान सच्चाई से कोसों दूर है।

महात्मा गाँधी की हत्या और संविधान का अस्तित्व

राहुल गाँधी ने दावा किया कि गोडसे ने महात्मा गाँधी की हत्या इसलिए की, क्योंकि गोडसे संविधान से नफरत करता था और गाँधी जी ने संविधान के लिए अपना पूरा जीवन दिया। यह दावा पूरी तरह से निराधार है।

30 जनवरी 1948 को नाथूराम गोडसे ने महात्मा गाँधी की हत्या की थी। भारतीय संविधान को भारतीय संविधान सभा ने 26 नवंबर 1949 को अपनाया था और यह 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ था।

इन तारीखों से यह स्पष्ट है कि जब महात्मा गाँधी की हत्या हुई, तब भारत का संविधान अस्तित्व में नहीं था। संविधान का पहला मसौदा (ड्राफ्ट) भी गाँधी जी की हत्या के एक महीने बाद, यानी 21 फरवरी 1948 को प्रस्तुत किया गया था। इस प्रकार, यह कहना पूरी तरह से बेतुका है कि गोडसे ने उस चीज से नफरत की, जो उस समय मौजूद ही नहीं थी और गाँधी ने ऐसी चीज का बचाव किया, जिसका अस्तित्व उनके जीवनकाल में नहीं था।

गोडसे की फाँसी और संविधान का लागू होना

राहुल गाँधी का दूसरा बड़ा झूठ यह था कि गोडसे की नफरत संविधान से थी, जिसके कारण उसने गाँधी जी को गोली मारी। सच्चाई तो यह है कि गोडसे को संविधान लागू होने से पहले ही फाँसी दे दी गई थी।

दरअसल, 15 नवंबर 1949 को नाथूराम गोडसे को महात्मा गाँधी की हत्या के लिए फाँसी दी गई थी। भारतीय संविधान 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ था, यानि गोडसे को फाँसी दिए जाने के दो महीने बाद।

यह तथ्य ही राहुल गाँधी के पूरे कथन को खोखला साबित कर देता है। गोडसे को भारतीय गणराज्य द्वारा संविधान अपनाए जाने से पहले ही सजा मिल चुकी थी। ऐसे में, यह दावा कि उसकी नफरत संविधान से थी, हास्यास्पद है।

महात्मा गाँधी और संविधान सभा में उनकी भूमिका

राहुल गाँधी ने यह भी कहा कि महात्मा गाँधी ने संविधान के लिए अपना जीवन दिया। यह बात भी ऐतिहासिक रूप से सही नहीं है। जब 1947 में भारत को आजादी मिली तो महात्मा गाँधी ने खुद को संक्रमण प्रक्रिया से अलग कर लिया था। वह न तो अंतरिम सरकार का हिस्सा थे और न ही संविधान सभा के सदस्य थे। महात्मा गाँधी संविधान सभा का हिस्सा इसलिए नहीं बनना चाहते थे क्योंकि उनका मानना था कि इसका गठन वायसराय ने किया है और यह ब्रिटिश सरकार द्वारा बनाई गई है।

महात्मा गाँधी इसे एक सार्वभौम (Sovereign) सभा नहीं मानते थे। इसलिए उन्होंने खुद को इस प्रक्रिया से दूर रखा और इसमें शामिल नहीं हुए। महात्मा गाँधी ने कुछ विशिष्ट प्रस्ताव जरूर दिए थे, जैसे कि ग्राम-आधारित शासन मॉडल, जिसे ग्राम स्वराज के नाम से जाना जाता है। महात्मा गाँधी के अनुसार, सच्चा लोकतंत्र गाँव की संस्थाओं में निहित होता है, जो आत्मनिर्भर और स्वशासित हों।

संविधान निर्माण का काम मुख्य रूप से डॉ बीआर अंबेडकर की अध्यक्षता में गठित प्रारूप समिति ने किया था। ऐसे में, यह दावा कि महात्मा गाँधी ने संविधान के लिए अपना जीवन दिया, सिर्फ एक राजनीतिक बयानबाजी है जिसका कोई ऐतिहासिक आधार नहीं है।

RSS और बीजेपी पर राहुल गाँधी का आरोप

राहुल गाँधी ने यह भी दावा किया कि RSS और बीजेपी ने संविधान को नहीं बनाया। दरअसल, बीजेपी का गठन 1980 में हुआ था, जबकि संविधान 1950 में लागू हो गया था। इसलिए, बीजेपी की संविधान बनाने में कोई भूमिका नहीं हो सकती। यह एक बेतुका दावा है। RSS एक सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है और उसकी संविधान निर्माण में कोई भूमिका नहीं थी।

राहुल गाँधी के ये दावे न केवल ऐतिहासिक तथ्यों से परे हैं, बल्कि वे एक बड़ी झूठ की बुनियाद पर टिके हैं। राहुल गाँधी की ये टिप्पणियाँ, जिसमें वह संविधान की प्रति हाथ में लेकर झूठे दावे कर रहे थे, न केवल देश के इतिहास को गलत तरीके से पेश करती हैं, बल्कि महात्मा गाँधी और संविधान के महत्व को भी कम करती हैं। राहुल गाँधी हमेशा से अपने राजनीतिक फायदे के लिए इतिहास को तोड़-मरोड़ के पेश करते हैं, जिसका मजाक वो खुद ही बनकर रह जाते हैं।

जब सुभाष चंद्र बोस की प्रपौत्री ने उतारी गोडसे की आरती, बोलीं- हमारे दिलों में बसते हैं

नेताजी की प्रपौत्री ने की गोडसे की पूजा (वीडियो ग्रैब-ANI)
सुभाष चंद्र बोस की प्रपौत्री और अखिल भारत हिन्दू महासभा की नेता राजश्री चौधरी ने अपने समर्थकों के साथ महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोडसे की पूजा की है। समाचार एजेंसी एएनआई की ओर से जारी किए गए वीडियो में राजश्री चौधरी अपने समर्थकों  के साथ नाथूराम गोडसे की आरती उतारती दिख रही हैं। जो इस बात को सिद्ध करता है कि जितने भी वास्तविक स्वतन्त्रता सेनानी या उनके परिवार गोडसे को गाँधी से महान देशभक्त मानता है और मानता रहेगा। ये वीडियो मध्य प्रदेश के ग्वालियर का है। इस वीडियो में राजश्री चौधरी के साथ भगवा टोपी लगाए कई लोग दिख रहे हैं
वीडियो में एक स्थान पर नाथूराम गोडसे और झांसी की रानी की तस्वीर लगी हुई है। यहां पर लगभग दर्जन भर लोग गोडसे की तारीफ में आरती गा रहे हैं
कांग्रेस ने पेश की गलत छवि
राजश्री चौधरी ने कहा है कि नाथूराम अखिल भारत हिन्दू महासभा के केंद्रीय नेता हैं और वे हमारे दिलों में बसते हैं। राजश्री चौधरी ने कहा कि कांग्रेस की सरकार ने उन्हें बदनाम कर दिया है। उन्होंने कहा कि एक ऐसा वक्त आएगा, जब लोगों को सही इतिहास पता चलेगा
इस बात से इंकार भी नहीं किया जा सकता कि कांग्रेस ने अपनी सत्ता का दुरूपयोग करते नाथूराम गोडसे की गलत छवि जनता के सम्मुख प्रस्तुत की। क्या कारण था कि गाँधी का पोस्टमॉर्टेम तक नहीं करवाया गया? वो कौन-सी परिस्थितियां थी, जिन्होंने कोर्ट में दर्ज 150 बयानों के सार्वजनिक होने पर प्रतिबन्ध लगा दिया था, जबकि गोडसे ने अपने बयान माइक पर पढ़ कर जज के सुपुर्द किये थे? यदि समय रहते गोडसे के बयान सार्वजनिक हो गए होते, भारत में कोई गोडसे को इतना अपमानित दृष्टि से नहीं देखता, विपरीत इसके गाँधी को ही अपमानित दृष्टि से देखते। 
केवल तुष्टिकरण पुजारी ही नाथू राम गोडसे से अधिक महात्मा गाँधी को महान बता रहे हैं। किसी भी गाँधी भक्त में नाथू राम गोडसे के 150 बयान घर-घर वितरित करने का साहस नहीं। और किसी भी पार्टी से कल्पना करना भी व्यर्थ है, क्योकि जो घर-घर अपना घोषणा-पत्र तक तो वितरित नहीं कर सकते, गोडसे के बयान क्या वितरित करेंगे। आज हर पार्टी गाँधी की आड़ में तुष्टिकरण कर रही है। और जनता इन्हे अपना आदर्श मान रही है। 
संसद का करेंगे घेराव
राजश्री चौधरी ने कहा कि हिन्दू महासभा के कार्यकर्ता पर ग्वालियर में झूठी एफआईआर दर्ज कराई गई है, इसे तुरंत वापस लिया जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर इस एफआईआर को वापस नहीं लिया गया तो वे लोग संसद का घेराव करेंगे
हिन्दू महासभा के सदस्यों ने ग्वालियर में नाथूराम गोडसे का 70 बलिदान दिवस मनाया था। इस बावत हिन्दू महासभा के सदस्य पर पुलिस ने एफआईआर दर्ज की थी। राजश्री चौधरी ने एफआईआर को गलत करार दिया है और इसे वापस लेने की मांग की है
Image may contain: 2 people, people smilingजब स्वामी श्रद्धानंद की हत्या पर गांधीजी ने हत्यारे राशिद को कहा था अपना भाई 
किसी व्यक्ति का भारत देश की नब्ज पर हाथ रख कर बोलना कांग्रेस की दृष्टि में सांप्रदायिकता रही है, और यह संस्कार कांग्रेस को गांधीजी जैसे नेताओं से मिला है। यदि आप इस देश के विभाजन का कारण धर्मांतरण से मर्मान्तरण और मर्मान्तरण से राष्ट्रान्तरण की सहज प्रक्रिया को मानेंगे तो आप कांग्रेस और कांग्रेस के नेताओं की दृष्टि में सांप्रदायिक हैं। यदि आप हिन्दू समाज के लोगों को धर्मांतरित कर अपने संख्याबल को बढ़ाकर इस देश को फिर विभाजन की ओर ले जाने वाले लोगों का विरोध करेंगे और फिर बरगलाकर या बहकाकर धर्मांतरित किए गए अपने वैदिक हिन्दू भाइयों को अपने साथ लाकर जोड़ने का प्रयास करोगे तो भी आप इन लोगों की दृष्टि में सांप्रदायिक होंगे और न केवल सांप्रदायिक होंगे बल्कि उन्मादी भी होंगे, उग्रवादी भी होंगे।
कुल मिलाकर कांग्रेस और कांग्रेस के नेताओं की सोच रही है कि अपराध और अत्याचार को चुप रह कर सहन करते रहो, जख्म खाते रहो और गर्दन कटवाते रहो। यदि इन सबके विरुद्ध आपने कुछ बोला तो गलती आपकी ही होगी न कि उन लोगों की जो अत्याचार कर रहे हैं या अपराध कर रहे हैं। अत्याचारी चाहे लाख 'औरंगजेब' पैदा कर ले पर आप कोई 'महाराणा प्रताप या शिवाजी' पैदा नहीं करोगे।
स्वामी श्रद्धानंद इस देश की विभाजनकारी शक्तियों की सूक्ष्मता से समीक्षा कर रहे थे और उसका ऐसा प्रबंध कर रहे थे कि भविष्य में इस देश को तोड़ने वाली शक्तियां पैदा ही ना हों तो उन्हें एक अत्याचारी ने धोखे से मार दिया। स्वामी जी एक देश, एक देव, एक धर्म, एक धर्म ग्रंथ के समर्थक थे। इसी सिद्धांत ने इस सनातन राष्ट्र को प्राचीन काल में 'एक' बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
स्वामी श्रद्धानंद की हत्या के समय गांधीजी कांग्रेस के 1926 के गोहाटी अधिवेशन में भाग ले रहे थे। जब उन्हें स्वामीजी की हत्या का समाचार मिला तो गांधीजी ने कहा-‘‘ऐसा तो होना ही था। अब आप शायद समझ गये होंगे कि किस कारण मैंने अब्दुल रशीद ( स्वामी जी के हत्यारे ) को भाई कहा है और मैं पुनः उसे भाई कहता हूँ। मैं तो उसे स्वामीजी का हत्या का दोषी नहीं मानता। वास्तव में दोषी तो वे हैं जिन्होंने एक-दूसरे के विरुद्ध घृणा फैलायी।’’
गांधी ने स्वामीजी की हत्या के बाद एक मंच से कहा था कि ‘राशिद मेरा भाई है और मैं बार बार यह कहूंगा। हत्या के लिए मैं उसे दोषी नहीं ठहराता। दोषी वह लोग हैं जो एक दूसरे के खिलाफ नफरत फैलाते हैं। उसकी कोई गलती नहीं है और न ही उसे दोषी ठहराकर किसी का भला होगा।’ यदि किसी की वकालत स्वयं गांधी कर रहे हों तो कौन सा कानून आरोपी को सजा देता ? गांधीजी के प्रयासों से राशिद को छोड़ दिया गया।
इतना ही नहीं गांधी जी ने अपने भाषण में आगे कहा, -- " मैं इसलिए स्वामी जी की मृत्यु पर शोक नहीं मना सकता.… हमें एक आदमी के अपराध के कारण पूरे समुदाय को अपराधी नहीं मानना चाहिए । मैं अब्दुल रशीद की ओर से वकालत करने की इच्छा रखता हूँ।"
उन्होंने आगे कहा कि “समाज सुधारक को तो ऐसी कीमत चुकानी ही पड़ती है , स्वामी श्रद्धानन्द जी की हत्या में कुछ भी अनुपयुक्त नहीं है। “अब्दुल रशीद के धार्मिक उन्माद को दोषी न मानते हुये गांधीजी ने कहा कि “…ये हम पढ़े, अध-पढ़े लोग हैं , जिन्होंने अब्दुल रशीद को उन्मादी बनाया । स्वामी जी की हत्या के पश्चात हमें आशा है कि उनका खून हमारे दोष को धो सकेगा, हृदय को निर्मल करेगा और मानव परिवार के इन दो शक्तिशाली विभाजन को मजबूत कर सकेगा.“ (यंग इण्डिया, दिसम्बर 30, 1926).
ऐसे शब्द न कहकर यदि गांधीजी देश में धर्मांतरण के खेल के माध्यम से अपना संख्याबल बढ़ाकर देश को विभाजन की ओर ले जाने वाली शक्तियों का विरोध करते और भविष्य में देश का किसी भी प्रकार से विभाजन न् हो इस काम में लगे स्वामी श्रद्धानंद जी के बलिदान को बलिदान मानते तो गांधी जी का व्यक्तित्व सचमुच महान होता। समय पर सच को सच न कहने और झूठ का महिमामंडन या समर्थन या तुष्टीकरण करने की उनकी प्रवृत्ति देश के लिए घातक रही।
गांधी जी और कांग्रेस स्वामी श्रद्धानंद जी के हत्यारे को भाई और देशभक्त मानें तो यह एक अलग बात है और गोडसे को इस देश का निवासी भी मान लिया जाए तो यह दूसरी बात है , क्या अजब मान्यताएं हैं?
Image may contain: 1 person, textदेश बचा गए गोडसे 
पाकिस्तान से दिल्ली की तरफ जो रेलगाड़िया आ रही थी, उनमे हिन्दू इस प्रकार बैठे थे जैसे माल की बोरिया एक के ऊपर एक रची जाती हैं। अन्दर ज्यादातर मरे हुए ही थे, गला कटे हुएl रेलगाड़ी के छप्पर पर बहुत से लोग बैठे हुए थे, डिब्बों के अन्दर सिर्फ सांस लेने भर की जगह बाकी थीl बैलगाड़िया ट्रक्स हिन्दुओं से भरे हुए थे, रेलगाड़ियों पर लिखा हुआ था,"आज़ादी का तोहफा" रेलगाड़ी में जो लाशें भरी हुई थी उनकी हालत कुछ ऐसी थी की उनको उठाना मुश्किल था, दिल्ली पुलिस को फावड़ें में उन लाशों को भरकर उठाना पड़ाl ट्रक में भरकर किसी निर्जन स्थान पर ले जाकर, उन पर पेट्रोल के फवारे मारकर उन लाशों को जलाना पड़ा इतनी विकट हालत थी उन मृतदेहों की... भयानक बदबू......
सियालकोट से खबरे आ रही थी की वहां से हिन्दुओं को निकाला जा रहा हैं, उनके घर, उनकी खेती, पैसा-अडका, सोना-चाँदी, बर्तन सब मुसलमानों ने अपने कब्जे में ले लिए थेl मुस्लिम लीग ने सिवाय कपड़ों के कुछ भी ले जाने पर रोक लगा दी थी। किसी भी गाडी पर हल्ला करके हाथ को लगे उतनी महिलाओं-बच्चियों को भगाया गया। बलात्कार किये बिना एक भी हिन्दू स्त्री वहां से वापस नहीं आ सकती थी ... बलात्कार किये बिना.....?
जो स्त्रियाँ वहां से जिन्दा वापस आई वो अपनी वैद्यकीय जांच करवाने से डर रही थी....
हम पर कितने लोगों ने बलात्कार किये हैं हमें भी पता नहीं हैं...उनके सारे शारीर पर चाकुओं के घाव थे
"आज़ादी का तोहफा"
जिन स्थानों से लोगों ने जाने से मना कर दिया, उन स्थानों पर हिन्दू स्त्रियों की नग्न यात्राएं (धिंड) निकाली गयीं, बाज़ार सजाकर उनकी बोलियाँ लगायी गयीं और उनको दासियों की तरह खरीदा बेचा गयाl
1947 के बाद दिल्ली में 400000 हिन्दू निर्वासित आये, और इन हिन्दुओं को जिस हाल में यहाँ आना पड़ा था, उसके बावजूद पाकिस्तान को पचपन करोड़ रुपये देने ही चाहिए ऐसा महात्मा का आग्रह था... क्योकि एक तिहाई भारत के तुकडे हुए हैं तो भारत के खजाने का एक तिहाई हिस्सा पाकिस्तान को मिलना चाहिए थाl
विधि मंडल ने विरोध किया, पैसा नहीं देगे....और फिर बिरला भवन के पटांगन में महात्मा जी अनशन पर बैठ गए.....पैसे दो नहीं तो मैं मर जाउगा....
एक तरफ अपने मुहँ से ये कहने वाले महात्मा जी, की हिंसा उनको पसंद नहीं हैं l दूसरी तरफ जो हिंसा कर रहे थे उनके लिए अनशन पर बैठ गए... क्या यह हिंसा नहीं थी ..अहिंसक आतंकवाद की आड़ में
दिल्ली में हिन्दू निर्वासितों के रहने की कोई व्यवस्था नहीं थी, इससे ज्यादा बुरी बात ये थी की दिल्ली में खाली पड़ी मस्जिदों में हिन्दुओं ने शरण ली तब बिरला भवन से महात्मा जी ने भाषण में कहा की दिल्ली पुलिस को मेरा आदेश हैं मस्जिद जैसी चीजों पर हिन्दुओं का कोई ताबा नहीं रहना चाहिए। निर्वासितों को बाहर निकालकर मस्जिदे खाली करे.. क्योंकि महात्मा जी की दृष्टी में जान सिर्फ मुसलमानों में थी हिन्दुओं में नहीं...जनवरी की कडकडाती ठंडी में हिन्दू महिलाओं और छोटे छोटे बच्चों को हाथ पकड़कर पुलिस ने मस्जिद के बाहर निकाला, गटर के किनारे रहो लेकिन छत के निचे नहीं l क्योकि...तुम हिन्दू हो..
4000000 हिन्दू भारत में आये थे, ये सोचकर की ये भारत हमारा हैं....ये सब निर्वासित गांधीजी से मिलाने बिरला भवन जाते थे तब गांधीजी माइक पर से कहते थे क्यों आये यहाँ अपने घर जायदाद बेचकर, वहीँ पर अहिंसात्मक प्रतिकार करके क्यों नहीं रहे ?
यही अपराध हुआ तुमसे अभी भी वही वापस जाओ.. और ये महात्मा किस आशा पर पाकिस्तान को पचपन करोड़ रुपये देने निकले थे ?
कैसा होगा वो मोहनदास करमचन्द गाजी उर्फ़ गंधासुर ... कितना महान ...?
जिसने बिना तलवार उठाये ... 35 लाख हिन्दुओं का नरसंहार करवाया ; 2 करोड़ से ज्यादा हिन्दुओं का इस्लाम में धर्मांतरण हुआ और उसके बाद यह संख्या 10 करोड़ भी पहुंचीl
10 लाख से ज्यादा हिन्दू नारियों को खरीदा बेचा गयाl
20 लाख से ज्यादा हिन्दू नारियों को जबरन तरह तरह की शारीरिक और मानसिक यातनाओं के बाद मुस्लिम बना कर अपने घरों में रखा गया।   
ऐसे बहुत से प्रश्न, वास्तविकताएं और सत्य तथा तथ्य हैं जो की 1947 के समकालीन लोगों ने अपनी आने वाली पीढ़ियों से छुपाये, हिन्दू कहते हैं की जो हो गया उसे भूल जाओ, नए कल की शुरुआत करो
परन्तु इस्लाम के लिए तो कोई कल नहीं .. कोई आज नहीं ...वहां तो दार-उल-हर्ब को दार-उल-इस्लाम में बदलने का ही लक्ष्य है पल.. प्रति पल विभाजन के बाद एक और विभाजन का षड्यंत्र ...
आपने बहुत से देशों में से नए देशों का निर्माण देखा होगा, U S S R टूटने के बाद बहुत से नए देश बने, जैसे ताजिकिस्तान, कजाकिस्तान आदि ... परन्तु यह सब देश जो बने वो एक परिभाषित अविभाजित सीमा के अंदर बने l और जब भारत का विभाजन हुआ .. तो क्या कारण थे की पूर्वी पाकिस्तान और पश्चिमी पाकिस्तान बनाए गए...क्यों नही एक ही पाकिस्तान बनाया गयाया तो पश्चिम में बना लेते या फिर पूर्व में l
परन्तु ऐसा नही हुआ .... यहाँ पर उल्लेखनीय है की मोहनदास करमचन्द ने तो यहाँ तक कहा था की पूरा पंजाब पाकिस्तान में जाना चाहिए, बहुत कम लोगों को ज्ञात है की 1947 के समय में पंजाब की सीमा दिल्ली के नजफगढ़ क्षेत्र तक होती थी ...यानी की पाकिस्तान का बोर्डर दिल्ली के साथ होना तय था ...मोहनदास करमचन्द के अनुसार l 
नवम्बर 1968 में पंजाब में से दो नये राज्यों का उदय हुआ .. हिमाचल प्रदेश और हरियाणा l
पाकिस्तान जैसा मुस्लिम राष्ट्र पाने के बाद भी जिन्ना और मुस्लिम लीग चैन से नहीं बैठे ...उन्होंने फिर से मांग की हमको पश्चिमी पाकिस्तान से पूर्वी पाकिस्तान जाने में बहुत समस्याएं उत्पन्न हो रही हैं l
1. पानी के रास्ते बहुत लम्बा सफर हो जाता है क्योंकि श्री लंका के रस्ते से घूम कर जाना पड़ता है l
2. और हवाई जहाज से यात्राएं करने में अभी पाकिस्तान के मुसलमान सक्षम नही हैं l इसलिए .... कुछ मांगें रखी गयीं 1. इसलिए हमको भारत के बीचो बीच एक Corridor बना कर दिया जाए....जो लाहोर से ढाका तक जाता हो ... (NH - 1)
3. जो दिल्ली के पास से जाता हो ...
4. जिसकी चौड़ाई कम से कम 10 मील की हो ... (10 Miles = 16 KM)
5. इस पूरे Corridor में केवल मुस्लिम लोग ही रहेंगे l
30 जनवरी को गांधी वध यदि न होता, तो तत्कालीन परिस्थितियों में बच्चा बच्चा यह जानता था की यदि मोहनदास करमचन्द 3 फरवरी, 1948 को पाकिस्तान पहुँच गया तो इस मांग को भी मान लिया जायेगा l
तात्कालिक परिस्थितियों के अनुसार तो मोहनदास करमचन्द किसी की बात सुनने की स्थिति में था न ही समझने में ...और समय भी नहीं था जिसके कारण हुतात्मा नाथूराम गोडसे जी को गांधी वध जैसा अत्यधिक साहसी और शौर्यतापूर्ण निर्णय लेना पडा l

केरल : नाथूराम गोडसे के लिए किया कमेन्ट तो प्रोफ़ेसर पर हो गई FIR, सच्चाई से घबराते तुष्टिकरण करने वाले

                                                                                                                               साभार: NIT-C
केरल के कोझिकोड में एक महिला प्रोफ़ेसर पर नाथूराम गोडसे के समर्थन में कमेन्ट करने पर FIR हो गई है। केरल के कोझिकोड की पुलिस ने उनके विरुद्ध दंगा भड़काने की धारा के अंतर्गत मामला दर्ज कर लिया है। उनके खिलाफ केरल के वामपंथी छात्र संगठन ने FIR दर्ज करवाई है।
यह कार्यवाही इस बात को शत-प्रतिशत सिद्ध कर रही है कि छद्दम धर्म-निरपेक्षों और तुष्टिकरण करने वालों ने कितनी भ्रांतियां फैलाई हुई थी/हैं कि सच्चाई सुनने को तैयार नहीं। गोडसे विरोधियों को मालूम होना चाहिए कि जस्टिस खोसला ने गोडसे को उनके 150 बयान पढ़ने के लिए माइक और लाउड स्पीकर की इजाजत दी थी, जो आज तक विश्व रिकॉर्ड हैं। सेवानिर्वित होने के बाद एक पाक्षिक को सम्पादित करते शीर्षक "गोडसे ने गाँधी को मारा क्यों?" शृंखला प्रकाशित की थी।(सामने देखिए पृष्ठ) अवलोकन कीजिए नीचे दिए लिंक।  
दूसरे, अगर गोडसे ने गाँधी को मार अपराध किया है, फिर क्यों तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने गोडसे के कोर्ट में दर्ज 150 बयानों को सार्वजनिक होने पर क्यों प्रतिबन्ध लगाया था? गोडसे विरोधियों को यह भी मालूम होना चाहिए कि परिवार ने आज तक गोडसे की अस्थियों को सुरक्षित रखा हुआ है। गोडसे ने कहा था कि "अखंड भारत होने पर सिंधु नदी में विसर्जन किया जाए।" 
अवलोकन करें:-
महात्मा गाँधी प्रेमियों को गोडसे के 150 बयान घर-घर बंटवाने में क्या आपत्ति है?
NIGAMRAJENDRA.BLOGSPOT.COM
महात्मा गाँधी प्रेमियों को गोडसे के 150 बयान घर-घर बंटवाने में क्या आपत्ति है?
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार "I have however no doubt that had the audience of that day been constituted into a jury and entrusted with...

क्या महात्मा गांधी जन्मजात हिन्दू विरोधी थे ?
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क्या महात्मा गांधी जन्मजात हिन्दू विरोधी थे ?
आज देश नहीं बल्कि तुष्टिकरण पुजारी महात्मा गांधी जयंती मना रहे है। आप जानते ही होंगे कि महात्मा गांधी ने आजादी में...

जब मोपला में हुआ हिंदुओं का नरसंहार, तब गाँधी पढ़ा रहे थे खिलाफत का पाठ

जब अंबेडकर ने गाँधी के लिए कहा था- बगल में छुरी मुँह में राम, ‘हत्या’ को देश के लिए बताया था ‘अच्छ

जिन महिला प्रोफ़ेसर के विरुद्ध FIR दर्ज की गई है, वह नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ़ टेक्नोलॉजी (NIT) कालीकट में वरिष्ठ प्रोफ़ेसर हैं। उनका नाम शैजा अन्दावन है। वह NIT में मैकेनिकल इंजीयनियरिंग विभाग में पढ़ाती हैं। उन्होंने 30 जनवरी को महात्मा गाँधी की हत्या की बरसी पर एक पोस्ट पर कमेन्ट किया था। पोस्ट में नाथूराम गोडसे को भारत में अनेकों लोगों का नायक बताया गया था। इसमें उन्होंने नाथूराम गोडसे का समर्थन किया था।

उन्होंने एक पोस्ट पर कमेन्ट किया, “भारत को बचाने के लिए गोडसे पर गर्व है।” यह पोस्ट गोडसे के समर्थन में किया गया था। उनके इस कमेन्ट का स्क्रीनशॉट वायरल हो गया। हालाँकि, उन्होंने यह कमेन्ट बाद में हटा दिया। यह पोस्ट एक हिंदूवादी वकील कृष्णा राज की पोस्ट पर किया गया था। जब प्रोफ़ेसर अन्दावन से इस सम्बन्ध में बात की गई तो उन्होंने कहा कि वह यूनिवर्सिटी में विवाद नहीं पैदा करना चाहती, इसलिए उन्होंने कमेन्ट हटा दिया।

कमेंट डिलीट करने के बावजूद उनके खिलाफ वामपंथी छात्र संगठनों ने दो FIR दर्ज करवा दी। उनके खिलाफ राजद्रोह की धाराओं में मामला दर्ज करवाया गया है। वामपंथी छात्र संगठनों का प्रोफ़ेसर पर आरोप है कि उन्होंने इस कमेन्ट के जरिए द्वेष फैलाने का प्रयास किया। इन संगठनों ने उन्हें NIT से निष्कासित करने की माँग की है। केरल के कोझिकोड से कॉन्ग्रेस सांसद एमके राघवन ने NIT के डायरेक्टर को पत्र लिखकर उनके खिलाफ कार्रवाई की माँग की है।

प्रोफ़ेसर शैजा अन्दावन ने इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में बताया, “मेरा कमेन्ट गाँधीजी की हत्या की प्रशंसा करना नहीं था और ना ही मैं कभी ऐसा करना चाहती थी। मैंने गोडसे की ‘मैंने गाँधी को क्यों मारा’ किताब पढ़ी है। इस किताब में कई खुलासे और जानकारियाँ हैं, जो कि आम लोगों को नहीं पता। गोडसे ने इस किताब में हमें वह बताया है। मैंने इसी सम्बन्ध में फेसबुक पर डाली गई एक पोस्ट पर कमेन्ट किया था। जब मैंने देखा कि लोग मेरे कमेन्ट का गलत मतलब निकाल रहे हैं, तो मैंने वह हटा दिया।”

हाल ही में NIT कोझिकोड में श्रीराम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा एक विरोध में एक छात्र ने यहाँ पूरे कैम्पस में पोस्टकार्ड लहराए थे, जिसके बाद विवाद हो गया था। उसने यहाँ कुछ छात्रों द्वारा प्राण प्रतिष्ठा उत्सव मनाए जाने का विरोध किया था।

‘हे राम’ में गाँधी हत्याकांड : ‘जीवित नाथूराम गोडसे ही नहीं, उसकी लाश और राख तक से डर गई थी नेहरू सरकार’: प्रखर श्रीवास्तव

              पत्रकार प्रखर श्रीवास्तव की पुस्तक 'हे राम: गाँधी हत्याकांड की प्रामाणिक पड़ताल' का हुआ विमोचन
दिल्ली के लोधी गार्डन्स में स्थित ‘इंडिया इंटरनेशनल सेंटर (IIC)’ में शनिवार (28 जनवरी, 2023) को ‘जनसभा’ पब्लिकेशन के बैनर तले प्रखर श्रीवास्तव की पुस्तक ‘हे राम: गाँधी हत्याकांड की प्रामाणिक पड़ताल’ का विमोचन हुआ, जिसमें वरिष्ठ इतिहासकार मीनाक्षी जैन और ‘Zee News’ के कंसल्टिंग एडिटर दीपक चौरसिया भी मौजूद रहे। इस दौरान पुस्तक के लेखक प्रखर श्रीवास्तव ने बताया कि कैसे उस समय की कांग्रेस सरकार महात्मा गाँधी को बचाने में नाकाम रही। 
शंका उन लोगों की शिक्षा पर होती है, जो गोडसे को पहला आतंकवादी कहते हैं। उन अशिक्षित हुए शिक्षित पागल लोगों को इतना भी नहीं मालूम कि महात्मा गाँधी से पहले हत्या हुई थी राजपाल की, और राजपाल से पहले हत्या हुई थी स्वामी श्रद्धानन्द की और इन दोनों की हत्या करने वाले मुस्लिम थे और इन हत्यारों के बचाव में गाँधी खड़े हुए थे, यही वजह है कि अज्ञानी हुई शिक्षित गाँधी के नाम की माला जपते हैं। 
गोडसे द्वारा गोली मारे के 40 मिनट तक गाँधी जीवित थे, क्या कारण था कि अति निकट विल्लिंग्टन वर्तमान डॉ राम मनोहर लोहिया हॉस्पिटल क्यों नहीं ले जाया गया? क्या तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व भी अंदरखाने गाँधी के विरुद्ध था? वास्तव में तत्कालीन कांग्रेस नेतृत्व गोडसे से इतना भवभीत था कि माइक(विश्व रिकॉर्ड है, जब किसी आरोपी को माइक से बयान पढ़ने की कोर्ट ने इजाजत दी) से पढ़कर गोडसे के कोर्ट में दर्ज 150 बयानों को सार्वजनिक होने पर क्यों प्रतिबन्ध लगाया था? 

प्रखर श्रीवास्तव ने इस दौरान उपस्थित लोगों से कहा कि गाँधी हत्याकांड में फ़िल्म स्टार पृथ्वीराज कपूर को फँसाने की कोशिश क्यों हुई थी और गाँधी की वो करीबी महिला कौन थी, जो गोडसे को गाँधी के बारे में सारी जानकारी देती थी – इस संबंध में और अधिक जानने के लिए आपको ये पुस्तक पढ़नी चाहिए। उन्होंने बताया कि महात्मा गाँधी के शिष्य जवाहरलाल नेहरू और सरदार वल्लभभाई पटेल सरकार में होने के बावजूद उन्हें सुरक्षा देने में नाकाम रहे। 

इस दौरान उन्होंने महात्मा गाँधी की हत्या के बाद हुए चितपावन ब्राह्मणों के नरसंहार की भी बात की और बताया कि कैसे वीर विनायक दामोदर सावरकर के भाई नारायण सावरकर की भीड़ ने हत्या कर दी। नारायण सावरकर स्वतंत्रता सेनानी थे। प्रखर श्रीवास्तव ने बताया कि न सिर्फ जीते-जी नाथूराम गोडसे से तत्कालीन कांग्रेस सरकार डरी हुई थी, बल्कि उसकी लाश और राख से भी वो डर गई थी। नाथूराम गोडसे का अंतिम संस्कार जेल में ही कर दिया गया था।

पद्मश्री मीनाक्षी जैन ने इस दौरान बताया कि कैसे भारत सरकार ने पहले आरसी मजूमदार को स्वतंत्रता संग्राम इतिहास लिखने का काम दिया था, लेकिन बाद में एक ऐसे व्यक्ति को चुन लिया गया जिनके रिसर्च का फिल्ड इतिहास का ये काल था ही नहीं। कार्यक्रम में मौजूद तांत्या टोपे के वंशज पराग टोपे ने इस दौरान ध्यान दिलाया कि कैसे भारत के हर जगह का इतिहास जुबानी रूप से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक आता रहा है।

National Archives of India : जेल में बंद नाथूराम गोडसे को धर्मांतरित कर ईसाई बनाने का हुआ था प्रयास, नेहरू को पता था निर्दोष हैं सावरकर: दस्तावेजों से खुलासा

                       गोडसे को ईसाईयत में धर्मांतरण की कोशिश (साभार: सोशल मीडिया)
केरल के भाजपा नेता टीजी मोहनदास (TG Mohandas) ने महात्मा गाँधी की हत्या करने वाले नाथूराम गोडसे (Nathuram Godse) को लेकर सनसनीखेज दावा किया है। मोहनदास ने कहा कि जेल में रहने के दौरान गोडसे का धर्मांतरण कर ईसाई (Religious Conversion in Christianity) बनाने की कोशिश की गई थी।

मोहनदास का दावा है कि इसकी जानकारी उन्होंने नई दिल्ली स्थित भारत के राष्ट्रीय अभिलेखागार (National Archives of India) से जुटाई है। उन्होंने कहा कि इसके लिए उन्होंने हजारों दस्तावेजों को खंलागा है। इससे संबंधित एक दस्तावेज की कॉपी भी उन्होंने ट्विटर पर शेयर किया है।

अपने ट्वीट में मोहनदास ने कहा, “मैंने महात्मा गाँधी की हत्या पर भारत के राष्ट्रीय अभिलेखागार में लगभग 11,000 दस्तावेजों का निरीक्षण किया है। सबसे दिलचस्प चीजों में से एक जो मैंने पाया वह यह थी कि मुकदमे के तहत जेल में रहे गोडसे को ईसाई धर्म में परिवर्तित करने का प्रयास किया गया था!”

मोहनदास द्वारा साझा किए गए दस्तावेज में दिख रहा है कि पाकिस्तान में भारत के उच्चायुक्त वाईके पुरी ने भारत के विदेश मंत्रालय के अपर सचिव प्रेम कृशन को एक पत्र लिखा था। यह पत्र 14 सितंबर 1949 को पाकिस्तान के लाहौर शहर से लिखा गया था।

इस पर लिखा है, “प्रिय प्रेम कृशन जी, मैं दो एयरमेल पत्र भेज रहा हूँ, जिसमें ईसाइयत के बारे में उपदेश है। यह गाँधी जी की हत्या में आरोपित श्री नाथूराम विनायक गोडसे और नारायण आप्टे के लिए ब्रिटेन से आया है।”

मोहनदास कहते हैं कि ब्रिटेन द्वारा भेजा गया असली पत्र उपलब्ध नहीं है। उसका कवर लेटर ही सिर्फ उपलब्ध है। मोहनदास ने सवाल उठाया है कि क्या वह पत्र नाथूराम गोडसे को दे दिया गया था? अगर दिया गया था कि उनकी प्रतिक्रिया क्या थी? इसके बारे में किसी को कोई जानकारी नहीं है।

पाकिस्तान को लेकर महात्मा गाँधी के प्रयासों से क्षुब्ध होकर नाथूराम गोडसे ने महात्मा गाँधी की 30 जनवरी 1948 को गोली मारकर हत्या कर दी थी। इस मामले में गोडसे केे साथ-साथ नारायण आप्टे को भी गिरफ्तार किया गया था। दोनों को 10 फरवरी 1949 को फाँसी की सजा सुनाई गई थी और 15 नवंबर 1949 को अंबाला जेल में फाँसी दे दी गई थी।

महात्मा गाँधी की हत्या में कुल नौ आरोपितों को गिरफ्तार किया गया था। सुनवाई के दौरान सिर्फ एक व्यक्ति को बरी किया गया था, जिनका नाम विनायक दामोदर सावरकर है। गोडसे और आप्टे को फाँसी के अलावा बाकी छह लोगों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। इनमें गोडसे के भाई गोपाल गोडसे भी शामिल थे।

‘महात्मा गोडसे ने बलिदान देकर हिंदुस्तान को मुस्लिम बनने से बचा लिया, गजवा-ए-हिन्द फेल कर दिया’: कालीचरण महाराज के वो बयान

महात्मा गाँधी पर सच्चाई सामने आने पर छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार का उत्तेजित होना स्वाभाविक है, क्योकि गाँधी की तुष्टिकरण नीति के ही कारण कांग्रेस इतने वर्ष राज करती रही। शायद यही कारण था कि गोली लगने के बाद हुई मृत्यु पर चितपावन ब्राह्मणों के हुए भयंकर नरसंहार पर आज तक सभी नेता खामोश हैं, कोई जाँच तक की बात नहीं करता, क्यों? 1984 सिख दंगों की हो सकती है, चितपावन ब्राह्मणों के हुए नरसंहार नहीं, क्यों? क्या कोई नेता इसका जवाब देगा? दूसरे, ब्रिटिश सरकार के साथ नेताजी सुभाषचंद्र बोस के विरुद्ध हुए समझौते पर महात्मा गाँधी हस्ताक्षर क्यों किए थे? अब चर्चा यह भी होनी शुरू हो गयी है कि क्या छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार का यह कदम कांग्रेस के पतन का कारण बनेगा? 

महात्मा गाँधी की आलोचना करने के मामले में छत्तीसगढ़ पुलिस ने कालीचरण महाराज को 30 दिसंबर 2021 को गिरफ्तार कर लिया है। उन पर गाँधी की आलोचना करने और नाथूराम गोडसे की प्रशंसा करने का आऱोप है। मीडिया रिपोर्टों को मुताबिक, उन्हें मध्य प्रदेश के खजुराहो (Khajuraho) से गिरफ्तार किया गया है। उनपर आरोप है कि रायपुर में धर्म संसद के दौरान उन्होंने महात्मा गाँधी को लेकर विवादित बयान दिए। उनके भाषण का वो वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

नाथूराम गोडसे को दिया धन्यवाद

रायपुर की धर्म संसद में कालीचरण महाराज ने देश के हालात पर टिप्पणी करते हुए कहा, “हमारी आँखों के सामने दो-दो कब्जे देश पर हुए। ईरान, इराक और अफगानिस्तान तो पहले ही कब्जा चुके थे। बांग्लादेश और पाकिस्तान को उन्होंने हमारी आँखों के सामने कब्जाया। इन दोनों हिस्सों को देश से अलग करने के लिए राजनीति का इस्तेमाल हुआ। उस ह#$मी मोहनदास करमचंद गाँधी ने भारत को तबाह कर दिया। नाथूराम गोडसे जी को नमस्कार है। मार डाला उस ह#$मी को।”

वीडियो में कालीचरण महाराज आगे कहते हैं, “देखो ऑपरेशन करना बहुत जरूरी होता है, इन फोड़े-फुन्सियों का नहीं तो ये कैंसर बन जाते हैं। आपको मैं दंगे-धोपे करने को नहीं बोल रहा हूँ। इसकी जरूरत नहीं है और आप इसके लिए तैयार भी नहीं हो। मुस्लिम जरूर तैयार हैं, लेकिन आप नहीं। ये पुलिसवाले नहीं होते तो अपना सत्यानाश हो चुका था। इसमें धर्मात्मा लोग भी हैं, लेकिन ये हमारी साइड कभी नहीं लेते।”

उन्होंने आगे कहा, “ये पुलिसवाले हमारी साइड नहीं लेते हैं। ये हमें ही समझाते हैं कि तुम ज्यादा जुलूस मत निकालो। चिल्ला-पुकारा मत करो। मुस्लिमों के इलाके से भगवा रैली मत निकालो। इसमें पुलिसवालों का कसूर लगता है क्या आपको? नहीं! पुलिस भी गुलाम है। पुलिस को कौन नियंत्रित कर सकते। मैं पूरी-पूरी राजनीतिक बात कर रहा हूँ। अगर आप राजनीति से घृणा करोगे तो आप धर्म का नाश करोगे।”

‘गाँधी राष्ट्रपिता कहलाने लायक नहीं’: कालीचरण महाराज

कालीचरण महाराज के इस भाषण के बाद इस हंगामा मचा। इसके बाद उन्होंने एक और वीडियो जारी किया। इसमें उन्होंने कहा था उन्हें महात्मा गाँधी के खिलाफ इस तरह के शब्दों का इस्तेमाल करने पर कोई पछतावा नहीं है। उन्होंने बताया कि किस तरह 14 वोट प्रधानमंत्री पद के लिए सरदार वल्लभभाई पटेल को मिले, लेकिन शून्य वोट वाले जवाहरलाल नेहरू को पीएम बना कर उन्होंने वंशवाद फैलाया।
उन्होंने कहा कि अगर सरदार पटेल के हाथों में भारत की सत्ता गई होती तो हमारा देश आज जगद्गुरु होता और अमेरिका से भी आगे होता, लेकिन जनता के साथ विश्वासघात हुआ। उन्होंने कहा कि ज्योतिरादित्य सिंधिया जैसे प्रतिभावान लोगों को कॉन्ग्रेस में इसी कारण काम करने का अवसर नहीं मिला। उन्होंने कहा कि ‘साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल, दे दी आज़ादी हमें बिना खडग बिना ढाल’ गाना लिखने वाले को जूते मारने चाहिए। उन्होंने भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव को याद करते हुए पूछा कि क्या इन्होंने देश के लिए कुछ नहीं किया?
उन्होंने बताया कि किस तरह जिन क्रांतिकारियों को फाँसी पड़ी, जिनमें 80% सिख थे, 20 प्रतिशत अन्य क्रान्तिकारी थे। ये गाना लिखने वालों ने उन्हें श्रेय नहीं दिया। उन्होंने पूछा कि क्या कभी महात्मा गाँधी ने एक लाठी भी खाई? उन्होंने कहा कि गाँधी चाहते तो भगत सिंह, राजगुरु और सुखदेव की फाँसी रुकवा सकते थे, लेकिन उन्होंने ऐसा नहीं किया। कालीपुत्र कालीचरण महाराज ने गाँधी का तिरस्कार करने की बात करते हुए बताया कि कैसे उन्होंने अपनी लाश पर भारत का बँटवारा होने की बात कही थी, लेकिन पाकिस्तान और बांग्लादेश बन गया।
बँटवारे के बारे में बात करते हुए कालीचरण महाराज ने कहा, “गाँधी कहते थे कि बँटवारा मेरी लाश पर होगा। लेकिन जब बँटवारा हुआ तो वह जिंदा थे। बँटवारे के बाद हुए दंगों में लाखों हिंदू और सिख मारे गए थे। जिन्ना के ‘डायरेक्ट एक्शन डे’ पर 27 लाख हिंदुओं का नरसंहार किया गया। पाकिस्तान से ट्रेनों के जरिए हिंदुओं के शव भेजे जा रहे थे। महिलाओं के साथ सामूहिक दुष्कर्म किया गया। उनके स्तन कटे हुए थे। स्तन को बोरों में भरकर भेजा गया था। दूसरी ओर गाँधी भारत को पाकिस्तान को 55 करोड़ रुपए देने के लिए मजबूर करने के लिए आमरण अनशन पर बैठे थे।”
“जब दंगा पीड़ित सिखों ने ठंड में मस्जिदों में शरण लिया, तब उन्हें बाहर निकाल कर मुस्लिमों को मस्जिदें सौंपने के लिए गाँधी ने अनशन किया। इसीलिए, मैं नफरत करता हूँ गाँधी से। इसलिए मैं गाँधी से नफरत करता हूँ।” उन्होंने कहा कि ‘गजवा-ए-हिन्द’ के तहत भारत के इस्लामीकरण के लिए पाकिस्तान और बांग्लादेश को जोड़ने वाले हजारों वर्ग किलोमीटर का कॉरिडोर मुस्लिमों ने माँगा और उसे देने के लिए भी गाँधी अनशन करने वाले थे। उन्होंने बताया कि जब स्वातंत्र्य वीर सावरकर ने हिन्दू वर्ण व्यवस्था को तोड़ कर एक होने की बात कही तो गाँधी ने नकार दिया। उन्होंने कहा कि बाबा साहब डॉक्टर भीमराव आंबेडकर ने संस्कृत को राष्ट्रभाषा घोषित करने की बात कही, तब गाँधी ने इसके लिए अनशन नहीं किया।
कालीपुत्र कालीचरण महाराज ने पूछा कि जो राष्ट्र करोड़ों वर्षों से है, उसका राष्ट्रपिता कोई 200 वर्ष पहले आया व्यक्ति कैसे हो सकता है? उन्होंने कहा कि अगर राष्ट्र का पिता बनाना अनिवार्य ही है तो छत्रपति शिवाजी, गुरु गोविंद सिंह, आचार्य चाणक्य या महाराणा प्रताप को बनाना चाहिए। उन्होंने कहा कि अभी के महापुरुषों को बनाना है तो राष्ट्र को एक करने वाले सरदार पटेल को बनाया जाना चाहिए, जिन्होंने छोटे-छोटे रियासतों को एक कर के टुकड़ों में बँटे देश को एक किया।
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कालीपुत्र कालीचरण महाराज ने कहा, “अगर पाकिस्तान-बांग्लादेश को भारत में कॉरिडोर मिल जाता तो हिंदुस्तान कब का मुस्लिम बन गया होता। महात्मा नाथूराम गोडसे को कोटि-कोटि धन्यवाद है। उनके चरणों में साष्टांग प्रणाम है। उन्होंने अपना बलिदान देकर हिंदुस्तान को मुस्लिम बनने से बचा लिया। ‘गजवा-ए-हिन्द’ फेल कर दिया। सच बोलने की सज़ा मृत्यु है तो स्वीकार है। वीरों ने कुल के लिए बलिदान दे दिया तो मेरे जैसे करोड़ों कालीचरण धर्म के लिए मर सकते हैं। हम हिंदुत्व के लिए मृत्युदंड पाने के लिए भी तैयार हैं।”

देशवासियों को सत्य और अहिंसा के मार्ग पर चलना सिखाने वाले, बिना किसी हिंसा के अंग्रेजी हुकूमत से भारत को आजादी दिलाने में अपना अहम योगदान रखने वाले राष्ट्रपिता महात्मा गांधी जी का आज 150 वां जन्म दिवस है। आज सिर्फ भारत ही नहीं वरन पूरी दुनिया मोहनदास करमचंद गांधी को भारत के राष्ट्रपिता और महात्मा गांधी के नाम से जानती है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि उन्हें राष्ट्रपिता की ये उपाधि आखिर कैसे मिली। तो चलिए आज गांधी जयंती के इस खास मौके पर हम आपको बताते हैं, उनके बारे में जिन्होंने पहली बार महात्मा गांधी जी को राष्ट्रपिता कहकर संबोधित किया था।

1944 में सुभाष चन्द्र बोस ने सिंगापुर रेडियो से एक संदेश प्रसारित करते हुए महात्मा गांधी जी को राष्ट्रपिता कहकर पहली बार संबोधित किया। वहीं गांधी जी के देहांत के बाद भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू नें रेडियो के माध्यम से देश को संबोधित किया था और कहा था कि ‘राष्ट्रपिता अब नहीं रहे’। इस प्रकार समूचे देश ने गांधी जी को दी गयी “राष्ट्रपिता” की उपाधि को स्वीकार लिया।

वहीं एक बार लखनऊ की 11 वर्षीय स्कूली छात्रा ने महात्मा गांधी के बारे में जब एक पाठ पढ़ा था, तो उसने कई बार यह जानने की कोशिश की गांधी जी को राष्ट्रपिता क्यों बोला जाता है लेकिन उसे इस बारे में कुछ नहीं मिला। फिर उसने इस बारे में जानकारी निकालने के लिए अपने माता-पिता के सुझाव से प्रधान मंत्री कार्यालय (पीएमओ) को सूचना के अधिकार (आरटीआई) में याचिका भेजी। जिसका उत्तर यह मिला की इस संदर्भ में सरकार के पास कोई दस्तावेज उपलब्ध नहीं हैं।

लालकृष्ण आडवाणी नें कहा -

"मैं स्पष्ट कर सकता हूं कि हालांकि महात्मा गांधी को "राष्ट्रपिता" के रूप में जाना जाता है, लेकिन सरकार द्वारा इस तरह का कोई शीर्षक कभी औपचारिक रूप से प्रदान नहीं किया गया था।"