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सरस्वती वंदना और गायत्री मंत्र का विरोध करने वालों को छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट से झटका, कोर्ट ने कहा- संस्कार सिखाना गलत नहीं

छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने स्कूलों में सरस्वती वंदना और गायत्री मंत्र जैसी प्रार्थनाएं कराने के सरकारी आदेश को चुनौती देने वाली याचिका को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि यह फैसला बिल्कुल सही है, क्योंकि किसी भी छात्र को जबरदस्ती ये प्रार्थनाएं गाने के लिए मजबूर नहीं किया जा रहा है। राज्य के सरकारी स्कूलों में सुबह की सभा के दौरान सरस्वती वंदना, गायत्री मंत्र, गुरु मंत्र और शांति मंत्र के पाठ को शुरू करने के सरकारी आदेश के खिलाफ दायर याचिका को खारिज कर हाई कोर्ट ने एक बड़ा और स्पष्ट संदेश देते हुए कहा है कि स्कूलों में संस्कार सिखाना गलत नहीं है। जस्टिस अमितेंद्र किशोर प्रसाद की एकल पीठ ने न केवल इस याचिका को  खारिज किया, बल्कि यह भी साफ कर दिया कि भारत की समृद्ध ज्ञान परंपरा और नैतिक शिक्षा को किसी संकीर्ण सांप्रदायिक चश्मे से नहीं देखा जा सकता। यह फैसला देश में ‘सांस्कृतिक जागरूकता बनाम छद्म धर्मनिरपेक्षता’ की बहस में एक मील का पत्थर साबित होगा।

वंदना के खिलाफ याचिकाकर्ताओं की मंशा राजनीतिक तुष्टिकरण

इस पूरा विवाद तब शुरू हुआ, जबकि राज्य के स्कूल शिक्षा विभाग का 12 जून 2026 को एक सर्कुलर जारी किया। इसमें शैक्षणिक सत्र 2026-27 से स्कूलों में राष्ट्रगान और राष्ट्रगीत के साथ-साथ सरस्वती वंदना और छुट्टी के समय गायत्री मंत्र के गायन का निर्देश दिया गया था। इस आदेश के आते ही देश का एक खास वर्ग सक्रिय हो उठा। हाई कोर्ट में इस आदेश को चुनौती देने वालों में छत्तीसगढ़ वक्फ बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष अब्दुल सलाम रिजवी, अल्पसंख्यक विभाग के पूर्व अध्यक्ष महेंद्र छाबड़ा और बिलासपुर के सामाजिक कार्यकर्ता शफीक अहमद शामिल थे। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि सरकारी धन से चलने वाले स्कूलों में इन मंत्रों का पाठ संविधान का उल्लंघन है, जो धार्मिक शिक्षा देने पर रोक लगाते हैं। हालांकि, इसके पीछे छिपी कुत्सित मंशा साफ तौर पर राजनीतिक तुष्टिकरण और बहुसंख्यक समाज की सांस्कृतिक विरासत को ‘सांप्रदायिक’ घोषित करने की थी।

किसी भी बच्चे या माता-पिता को इससे कोई शिकायत नहीं

राज्य सरकार ने कोर्ट में अपना पक्ष मजबूती से रखा। सरकार ने कहा कि ये मंत्र और वंदनाएं किसी धर्म विशेष की नहीं, बल्कि भारत की संस्कृति और अच्छे संस्कारों का हिस्सा हैं। इनका मकसद बच्चों में अनुशासन, बड़ों के प्रति आदर और पर्यावरण के प्रति प्रेम जगाना है। सरकार ने यह भी बताया कि यह नियम लागू हो चुका है और किसी भी बच्चे या माता-पिता को इससे कोई शिकायत नहीं है। स्कूल शिक्षा विभाग के इस नियम के मुताबिक, राज्य के सभी सरकारी स्कूलों में सुबह की सभा में राष्ट्रगान, राष्ट्रगीत, दीप मंत्र, सरस्वती वंदना और गुरु मंत्र का पाठ करना होता है। इसके साथ ही महापुरुषों की कहानियाँ सुनाई जाती हैं। दोपहर के खाने से पहले भोजन मंत्र और स्कूल की छुट्टी होने से पहले गायत्री मंत्र और शांति मंत्र का पाठ किया जाता है।

देश के राज्यों की स्थिति: कहां-कहां गूंजते हैं ये मंत्र?
भारत के कई राज्यों में सुबह की प्रार्थना सभाओं में सरस्वती वंदना और वैदिक मंत्रों का गायन एक पुरानी और स्थापित परंपरा रही है। लेकिन छत्तीसगढ़ में शैक्षणिक परिसरों में अनुशासन, एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा का संचार करने वाले वैदिक श्लोकों को जबरन अल्पसंख्यक अधिकारों के हनन से जोड़कर समाज में एक विभाजनकारी विमर्श खड़ा करने का प्रयास किया गया। उनकी मंशा भारतीय ज्ञान प्रणालियों को शिक्षा से दूर रखकर छात्रों को अपनी ही जड़ों से काटने की थी।
1. किन राज्यों में लागू: उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात और उत्तराखंड जैसे राज्यों के अधिकांश सरकारी स्कूलों में सरस्वती वंदना और शांति पाठ को नैतिक शिक्षा का अभिन्न अंग माना गया है।
2. सांस्कृतिक शुरुआत: इन राज्यों का मानना है कि विद्या की देवी सरस्वती की वंदना किसी विशिष्ट पूजा पद्धति की अनिवार्य ही नहीं, बल्कि ज्ञान की साधना की एक सांस्कृतिक शुरुआत भी है।

3. रोक की स्थिति: देश के किसी भी राज्य में कानूनन सरस्वती वंदना पर पूर्ण प्रतिबंध जैसी स्थिति नहीं है, लेकिन केरल, तमिलनाडु और कुछ गैर-भाजपा शासित राज्यों में सरकारी स्तर पर ऐसी प्रार्थनाओं को अनिवार्य करने से परहेज किया जाता है। वहां केवल राष्ट्रगान या धर्मनिरपेक्ष प्रार्थनाओं को प्राथमिकता दी जाती है। 

मन पर तीन प्रभाव डालती है यह वंदना

मनोवैज्ञानिकों और शिक्षाविदों का मानना है कि सुबह की सभा में सामूहिक मंत्रोच्चार का बच्चों के मानस पर गहरा और सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। गायत्री मंत्र और सरस्वती वंदना केवल धार्मिक श्लोक नहीं हैं, बल्कि उनके भीतर छिपी ध्वनि तरंगें और शब्द विन्यास वैज्ञानिक दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण हैं:

  1. एकाग्रता और मानसिक शांति: गायत्री मंत्र का सस्वर पाठ मस्तिष्क की कोशिकाओं को सक्रिय करता है, जिससे छात्रों में एकाग्रता और स्मरण शक्ति का विकास होता है।
  2. सकारात्मक ऊर्जा का संचार: सुबह-सुबह सामूहिक स्वर में तमसो मा ज्योतिर्गमय या ‘शिल्प-ज्ञान-विवर्धिनी’ जैसे श्लोकों का उच्चारण बाल मन में अज्ञानता के अंधकार को मिटाकर ज्ञान के प्रकाश की ओर बढ़ने की प्रेरणा जगाता है।
  3. संस्कार और अनुशासन: यह बच्चों के मन में शुरू से ही अपनी सांस्कृतिक जड़ों के प्रति गौरव का भाव पैदा करता है और उन्हें नैतिक रूप से सुदृढ़ बनाता है, जो आज की आधुनिक और तनावपूर्ण जीवनशैली में बेहद जरूरी है।
छत्तीसगढ़ में पक्ष-विपक्ष का राजनीतिक घमासान
अदालत के बाहर इस मुद्दे पर छत्तीसगढ़ की राजनीति में पक्ष-विपक्ष आमने सामने आ गए हैं। राज्य के उपमुख्यमंत्री अरुण साव और शिक्षा मंत्री ने इस फैसले का पुरजोर स्वागत किया है। सरकार का स्पष्ट कहना है कि यह कदम हमारी राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2000 के सिद्धांतों के अनुरूप है, जिसका उद्देश्य छात्रों को भारतीय ज्ञान प्रणालियों से जोड़ना है। भाजपा के अनुसार, यह नई पीढ़ी में देशभक्ति, अनुशासन और उच्च नैतिक संस्कारों को सिंचित करने का एक ऐतिहासिक अभियान है। दूसरी ओर तुष्टिकरण की नीति के चलते विपक्षी दल कांग्रेस ने इस कदम की आलोचना करते हुए इसे हिन्दुत्व के एजेंडे को लागू करने और शिक्षा के ‘भगवाकरण’ का प्रयास बताया है। विपक्ष का आरोप है कि सरकार जानबूझकर धार्मिक और संवेदनशील मुद्दों को हवा दे रही है।
फैसले से कानून और संस्कृति के बीच बेहतरीन संतुलन
वास्तविकता यह है कि छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट ने इस फैसले के जरिए कानून और संस्कृति के बीच एक बेहतरीन संतुलन कायम किया है। अदालत ने यह स्पष्ट करके विपक्ष और याचिकाकर्ताओं के डर को पूरी तरह खारिज कर दिया कि यह आदेश ‘बाध्यकारी’ या ‘दबाव डालने वाला’ नहीं है। संविधान का अनुच्छेद 28(1) भले ही राज्य पोषित संस्थानों में ‘धार्मिक कर्मकांड या संकीर्ण धार्मिक शिक्षा’ पर रोक लगाता हो, लेकिन वह देश की साझा सांस्कृतिक विरासत, नैतिक मूल्यों और ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की भावना सिखाने वाले सार्वभौमिक विचारों पर पाबंदी नहीं लगाता। स्कूल केवल किताबी ज्ञान देने वाले कारखाने नहीं हैं; वे नागरिक गढ़ने के केंद्र हैं। ऐसे में सरस्वती वंदना और गायत्री मंत्र जैसी पावन परंपराओं को विवादों के घेरे में खींचना अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है। हाई कोर्ट के इस फटकार के बाद उम्मीद की जानी चाहिए कि तुष्टिकरण की संकीर्ण राजनीति अब शिक्षा के पवित्र प्रांगण से दूर रहेगी।

 

छत्तीसगढ़ : 70 साल का हमीउद्दीन कई दिनों तक गायों के साथ करता रहा अश्लीलता, रायपुर पुलिस ने किया गिरफ्तार


छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में 70 साल के मुस्लिम बुजुर्ग हमीउद्दीन को गाय के साथ छेड़छाड़ करते हुए वीडियो सामने आई। इस वीडियो पर आपत्ति जताते हुए गौ सेवकों ने पुलिस थाने में आरोपित के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया। इसके बाद पुलिस ने आरोपित को गिरफ्तार कर लिया।

दरअसल, क्षेत्र में एक वीडियो वायरल हुई, जिसमें मूलरूप से यूपी के महाराजगंज का रहने वाला हमीउद्दीन गाय के साथ आपत्तिजनक हरकतें करते दिख रहा है। इस वीडियो पर गौ सेवक ने आमानाका थाने में शिकायत की। शिकायत में बताया गया कि हमीउद्दीन पिछले 7 दिनों से गायों के साथ ऐसा गंदा काम कर रहा था।

गौ सेवक की शिकायत पर पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 299 के तहत पशु क्रूरता निवारण अधिनियम की धारा 11 के तहत मुकदमा दर्ज किया। जाँच के बाद आरोपित को गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस ने कहा कि ऐसी घटनाओं से लोगों की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचती है और साफ कहा कि ऐसे मामले में सख्त कार्रवाई की जाएगी।

भारत में वामपंथ के पूरे हुए 100 साल, स्वतंत्रता संग्राम का विरोध, चीन का समर्थन और सैंकड़ों सुरक्षाकर्मियों की हत्या: कम्युनिस्टों की ‘विदेशी विचारधारा’ ने देश को हिंसा की आग में जलाया


भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के 100 साल पूरे होने पर इसके नेता और समर्थक जश्न और पुरानी यादों के साथ इस मौके को मना रहे हैं। हालाँकि, सौ साल का सफर सिर्फ यादें ताजा करने के लिए नहीं होता, बल्कि यह समय आत्म-मंथन और गंभीर मूल्यांकन का भी है। राजनीतिक आंदोलन केवल अपनी उम्र से प्रासंगिक नहीं बनते, बल्कि वे अपने परिणामों (कामयाबियों) से अपनी अहमियत साबित करते हैं।

पिछली एक सदी में, भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन ने खुद को गरीबों, मजदूरों और किसानों की आवाज के रूप में पेश किया है। इसने हमेशा यह दावा किया कि वह भारतीय लोकतंत्र के लिए एक लंबी अवधि का समाधान है और नैतिक रूप से अन्य राजनीतिक परंपराओं से बेहतर है। हालाँकि, अपनी इस छवि के बावजूद, आज कम्युनिस्ट आंदोलन चुनावी रूप से सिमट गया है, विचारधारा के मामले में काफी सख्त (जड़) हो गया है और भारत की सामाजिक व आर्थिक सच्चाइयों से पूरी तरह कटता जा रहा है।

इससे एक ऐसा अनिवार्य सवाल खड़ा होता है जिसे महज नारों या अतीत की पुरानी यादों के सहारे टाला नहीं जा सकता:

क्या भारतीय कम्युनिस्ट आंदोलन ने वाकई भारत की सेवा की, या फिर इसने देश के राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक ताने-बाने को नुकसान पहुँचाया?

यह लेख इस सवाल का जवाब किसी खोखली बयानबाजी या वैचारिक भेदभाव के आधार पर नहीं, बल्कि ऐतिहासिक रिकॉर्ड, राजनीतिक व्यवहार और ठोस परिणामों के जरिए देने की कोशिश करता है। क्योंकि 100 साल बीत जाने के बाद, कोई भी विचारधारा न तो बिना सोचे-समझे सम्मान की हकदार है और न ही बिना सोचे-समझे तिरस्कार की, बल्कि वह एक ईमानदार ऑडिट (सच्चे मूल्यांकन) की हकदार है।

साम्यवाद का क्षेत्र: भारतीय नहीं, स्वदेशी कभी नहीं

कम्युनिज्म (Communism) का उदय भारत की सामाजिक, सांस्कृतिक या आर्थिक हकीकत से नहीं हुआ था। यह एक यूरोपीय वैचारिक उत्पाद था, जो 19वीं सदी के यूरोप की खास परिस्थितियों में पैदा हुआ था। वे परिस्थितियाँ थीं- तेजी से होता औद्योगिकीकरण, फैक्ट्रियों में काम करने वाले मजदूर और पूंजीपतियों व औद्योगिक श्रमिकों के बीच गहरी वर्गीय खाई।

इस सिद्धांत को कार्ल मार्क्स ने विकसित किया था, जिन्होंने यूरोपीय पूंजीवाद का विश्लेषण किया, और बाद में इसे व्लादिमीर लेनिन ने अपनाया, जिन्होंने सत्ता हथियाने के लिए एक कड़े नियंत्रण वाले और ‘हरावल दस्ते’ (vanguard) के नेतृत्व वाली क्रांति की वकालत की थी।

इन दोनों विचारकों (मार्क्स और लेनिन) ने ऐसे समाजों में काम किया जो एक जैसे थे और जहाँ उद्योग मुख्य थे। वहाँ इंसान की असली पहचान उसकी आर्थिक स्थिति या ‘क्लास’ से होती थी। उनके काम करने का तरीका इन तीन बातों पर टिका था।

शोषक और शोषित की साफ पहचान: यानी समाज में एक पक्ष हमेशा जुल्म करने वाला और दूसरा जुल्म सहने वाला होता है।

न्याय के लिए हिंसा का रास्ता: यानी इंसाफ पाने के लिए पुरानी व्यवस्था को हिंसक तरीके से तोड़ना जरूरी है।

कड़ा सरकारी नियंत्रण: यानी गैर-बराबरी को खत्म करने के लिए सारी ताकत एक जगह (सरकार के हाथ में) रखना ही समाधान है।

लेकिन भारत की बनावट कभी ऐसी नहीं रही। भारतीय समाज हजारों साल पुरानी एक सभ्यता है, जो विविधताओं (अलग-अलग तरह के लोगों) से भरी हुई है। यहाँ समाज सिर्फ अमीर-गरीब (आर्थिक क्लास) से नहीं, बल्कि समुदायों, क्षेत्रों, धर्मों, भाषाओं और परंपराओं से बना है। इतिहास गवाह है कि भारत में सामाजिक बदलाव हमेशा सुधार आंदोलनों और आपसी तालमेल से आए हैं, न कि पुरानी व्यवस्था को पूरी तरह तबाह करके।

भारत की इसी खूबी और कम्युनिस्ट विचारधारा के बीच मेल न होना ही वह कारण है, जिसकी वजह से कम्युनिज्म को यहाँ गहराई से नहीं अपनाया गया। एक ऐसी विचारधारा जो केवल ‘दो पक्षों’ (शोषक और शोषित) की लड़ाई पर टिकी हो, वह उस सभ्यता में नहीं टिक सकती जो विविधता और सबको साथ लेकर चलने में विश्वास रखती है। भारतीय समाज लचीला और सबको साथ जोड़ने वाला है, जबकि कम्युनिज्म सख्त और बँटा हुआ है। यही विरोध भारत में कम्युनिज्म की असफलता की सबसे बड़ी वजह है।

देश से ऊपर विचारधारा: भारत छोड़ो आंदोलन और चीन युद्ध

नतीजे देने में फेल होने के साथ-साथ, भारतीय कम्युनिस्टों पर यह आरोप भी लगता है कि उन्होंने हमेशा देश के हित से ऊपर अपनी विचारधारा को रखा। इस विरोधाभास के दो बड़े उदाहरण गौर करने लायक हैं।

भारत छोड़ो आंदोलन (1942): जब CPI देश के साथ खड़ी नहीं हुई

अगस्त 1942 में, भारत ने ब्रिटिश शासन के खिलाफ अब तक का सबसे बड़ा जन-आंदोलन देखा, जिसे ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ कहा गया। महात्मा गाँधी के नेतृत्व में शुरू हुए इस आंदोलन में देश के हर कोने और हर समुदाय के लोग शामिल हुए थे। लेकिन ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी’ (CPI) ने इस आंदोलन का विरोध करने का फैसला किया।

CPI ने इस आंदोलन का साथ क्यों नहीं दिया? इसकी वजह जानकर आपको हैरानी हो सकती है। यह फैसला भारत के लिए नहीं, बल्कि उनकी विचारधारा से जुड़ा था। उस समय दूसरे विश्व युद्ध के दौरान सोवियत संघ (रूस) पर जर्मनी ने हमला कर दिया था, जिसके बाद रूस ने ब्रिटेन के साथ हाथ मिला लिया। चूंकि ब्रिटेन अब रूस का साथी बन चुका था, इसलिए CPI ने इस युद्ध को फासीवाद के खिलाफ ‘जनता का युद्ध‘ (People’s War) घोषित कर दिया।

उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं को निर्देश दिया कि वे अंग्रेजों के खिलाफ कोई रुकावट पैदा न करें और हड़ताल या विरोध प्रदर्शनों को रोकें। यहाँ तक कि कई मामलों में कम्युनिस्ट नेताओं ने ब्रिटिश सरकार का सहयोग भी किया। जब लाखों भारतीय अंग्रेजों की गोलियाँ खा रहे थे और जेल जा रहे थे, तब CPI हाथ पर हाथ धरे बैठी रही। ऐसा इसलिए नहीं था कि भारत आजादी के लिए तैयार नहीं था, बल्कि इसलिए था क्योंकि उनकी प्राथमिकता भारत नहीं, बल्कि ‘मॉस्को’ (रूस) के हित थे।

1962 का चीन युद्ध: चुप्पी, उलझन और चीन के प्रति लगाव

ठीक 20 साल बाद 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान फिर से वही पुरानी बात दोहराई गई। जब चीनी सेना ने लद्दाख और अरुणाचल प्रदेश में भारतीय सीमाओं को पार किया, तब पूरे देश को राजनीतिक एकता और स्पष्टता की उम्मीद थी। लेकिन इसके बजाय, कम्युनिस्ट आंदोलन के एक बड़े हिस्से ने चीन के प्रति हमदर्दी दिखाई और इस मामले पर गोल-मोल बात की। इसी विवाद की वजह से आगे चलकर CPI के दो टुकड़े हो गए और चीन का समर्थन करने वाले गुट ने अलग होकर ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी)’ यानी CPM बना ली।

देशहित से अलग हटकर सोचना तो कम्युनिज्म की असफलता का सिर्फ एक हिस्सा था। इससे भी ज्यादा नुकसानदेह वह तरीका था, जिसमें कम्युनिस्ट आंदोलन के कुछ हिस्सों ने लोकतांत्रिक राजनीति का रास्ता ही छोड़ दिया और हथियारों के दम पर बगावत शुरू कर दी। 1960 के दशक के आखिर से, भारत में कम्युनिस्ट विचारधारा ने न केवल सरकार का विरोध किया, बल्कि उसके खिलाफ युद्ध छेड़ दिया।

इसके बाद जो कुछ हुआ, वह मजदूरों के अधिकारों की लड़ाई नहीं थी, बल्कि हिंसा का एक लंबा दौर था। इसमें हत्याएँ की गईं, नरसंहार हुए, सरकारी संपत्तियों को तबाह किया गया और आम जनता को डराया-धमकाया गया। इस हिंसा के शिकार कोई विदेशी शासक या बड़े पूंजीपति नहीं थे, बल्कि भारत के आम लोग थे। जनजातीय (आदिवासी), किसान, जनप्रतिनिधि, पुलिसकर्मी और दिहाड़ी मजदूर। भारतीय कम्युनिज्म की असली मानवीय कीमत को समझने के लिए नारों या किताबों को नहीं, बल्कि कम्युनिस्ट उग्रवाद द्वारा छोड़े गए खून के निशानों को देखना होगा।

भारत में कम्युनिस्ट उग्रवादियों द्वारा किए गए 10 सबसे बड़े नरसंहार

दंतेवाड़ा नरसंहार (2010), छत्तीसगढ़– 6 अप्रैल 2010 को, ‘भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (नक्सली)’ के लड़ाकों ने छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में बहुत ही सोची-समझी साजिश के तहत हमला किया। इस हमले में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के 76 जवान शहीद हो गए थे। उग्रवादियों ने पहले बारूदी सुरंगों (landmines) का इस्तेमाल किया और फिर ऑपरेशन से लौट रहे जवानों पर अँधाधुँध गोलियाँ बरसा दीं। आजादी के बाद भारतीय सुरक्षा बलों पर हुआ यह अब तक का सबसे बड़ा और भयानक हमला माना जाता है। इस घटना के बाद देश में ‘नक्सलवाद’ के खिलाफ लड़ने के तरीके में बड़ा बदलाव आया।

झीरम घाटी नरसंहार (2013), छत्तीसगढ़- 25 मई 2013 को, नक्सली उग्रवादियों ने बस्तर के झीरम घाटी इलाके में कॉन्ग्रेस पार्टी के काफिले पर हमला किया था। इस हमले में वरिष्ठ राजनेताओं समेत 27 लोगों की जान चली गई। नक्सलियों ने यह हमला उस समय किया जब नेता जनता के बीच जा रहे थे। इस घटना ने यह साफ कर दिया कि माओवादी चुनाव लड़ने या लोकतंत्र में भरोसा रखने के बजाय, जनता द्वारा चुने गए नेताओं को खत्म करने की रणनीति पर काम करते हैं। इस हमले की पूरी देश में निंदा हुई और इसे भारत की लोकतांत्रिक व्यवस्था पर सीधा हमला माना गया।

नयागढ़ शस्त्रागार हमला (2008), ओडिशा- फरवरी 2008 में, नक्सली लड़ाकों ने ओडिशा के नयागढ़ में पुलिस के शस्त्रागार (जहाँ हथियार रखे जाते हैं) पर एक साथ मिलकर रात में हमला बोला। इस हमले में 15 पुलिसकर्मी मारे गए, भारी मात्रा में हथियार लूट लिए गए और सरकारी इमारतों को तबाह कर दिया गया। इस घटना ने दिखाया कि उग्रवादी कितने खतरनाक और बड़े हमले करने की ताकत रखते हैं। इस लूट के बाद उस इलाके में नक्सलियों के पास हथियारों की ताकत काफी बढ़ गई।

सुकमा हमला (2017), छत्तीसगढ़- 24 अप्रैल 2017 को, सुकमा जिले के चिंतालनार इलाके में नक्सलियों ने CRPF की एक टीम पर अचानक हमला कर दिया, जिसमें 25 जवान शहीद हो गए। उग्रवादियों ने इस हमले में देशी बमों (IED) और बहुत करीब से गोलीबारी का इस्तेमाल किया। उन्होंने वहाँ के मुश्किल रास्तों और खुफिया जानकारी के लीक होने का फायदा उठाया। इस घटना ने यह दिखाया कि सालों से चल रहे अभियानों के बावजूद, नक्सली उग्रवाद की ताकत अभी भी खत्म नहीं हुई है।

अरनपुर IED हमला (2023), छत्तीसगढ़- अप्रैल 2023 में, नक्सली उग्रवादियों ने दंतेवाड़ा के अरनपुर इलाके में एक प्रेशर IED (बारूदी सुरंग) में धमाका किया। इस हमले में ‘डिस्ट्रिक्ट रिजर्व गार्ड’ (DRG) के 10 जवान और एक नागरिक ड्राइवर की जान चली गई। उग्रवादियों ने एक ऐसे वाहन को निशाना बनाया जो उग्रवाद विरोधी अभियान से लौट रहा था। यह घटना एक बार फिर नक्सलियों की उस रणनीति को दिखाती है, जिसमें वे सार्वजनिक सड़कों पर बिना सोचे-समझे बमों का इस्तेमाल करते हैं।

सेनारी गाँव नरसंहार (1999), बिहार- मार्च 1999 में, ‘माओवादी कम्युनिस्ट सेंटर’ (MCC) ने बिहार के सेनारी गाँव में 34 आम लोगों की बेरहमी से हत्या कर दी थी। मरने वाले ज्यादातर लोग आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के थे। उग्रवादियों ने इन लोगों को कतार में खड़ा करके गोलियों से भून दिया था और इसे ‘अमीर-गरीब की लड़ाई’ (क्लास स्ट्रगल) बताकर सही ठहराया। इस घटना ने नक्सलियों के नारों और उनकी असलियत के बीच के अंतर को साफ कर दिया।

बारा नरसंहार (1992), बिहार- फरवरी 1992 में, नक्सली उग्रवादियों ने गया जिले के बारा गाँव पर हमला किया और 37 ग्रामीणों की जान ले ली। निहत्थे ग्रामीणों के खिलाफ वामपंथी चरमपंथी हिंसा की यह शुरुआती बड़ी घटनाओं में से एक थी। इसी घटना के बाद बिहार में हिंसा और बदले का एक लंबा दौर शुरू हुआ जिसने राज्य को अस्थिर कर दिया।

लातेहार पुलिस वैन ब्लास्ट (2016), झारखंड- जुलाई 2016 में, नक्सलियों ने झारखंड के लातेहार जिले में एक लैंडमाइन धमाका किया, जिसमें गश्ती वाहन में सवार आठ पुलिस अधिकारी शहीद हो गए। यह हमला ग्रामीण इलाकों में पुलिस और सरकारी व्यवस्था को कमजोर करने की उनकी सोची-समझी कोशिश का हिस्सा था।

सुकमा रोड-ओपनिंग पार्टी हमला (2018), छत्तीसगढ़- मार्च 2018 में, सुकमा जिले में नक्सलियों ने CRPF की उस टीम पर हमला किया जो सड़क निर्माण की सुरक्षा में लगी थी। इस हमले में नौ जवान शहीद हुए। उग्रवादियों ने विकास के कामों को रोकने के लिए जानबूझकर सुरक्षा बलों को निशाना बनाया, क्योंकि वे जनजातीय क्षेत्रों में सड़कों और बुनियादी ढाँचे के विस्तार के खिलाफ हैं।
गिरिडीह लैंडमाइन ब्लास्ट (2007), झारखंड- अक्टूबर 2007 में, नक्सलियों ने गिरिडीह जिले में एक आम नागरिक वाहन के नीचे लैंडमाइन धमाका किया, जिसमें 14 लोग मारे गए। इस घटना ने दिखाया कि नक्सली हिंसा कितनी अंधी है, जहाँ सरकार को निशाना बनाने के चक्कर में अक्सर आम नागरिक अपनी जान गँवा देते हैं।

सौ साल, कोई सुधार नहीं

100 साल पूरे होने के बाद, भारतीय कम्युनिज्म का मूल्यांकन सिर्फ उनके इरादों, सिद्धांतों या भाषणों से नहीं किया जा सकता। इसका फैसला उनके रिकॉर्ड से होना चाहिए। वह रिकॉर्ड बताता है कि यह एक ऐसी विचारधारा है जो भारत के बाहर से आई, जिसने भारतीय समाज को कभी नहीं समझा, देश के हितों से ऊपर विदेशी ताकतों को रखा और देश से ऊपर हमेशा अपनी विचारधारा को चुना। जब चुनावों में उनकी ताकत कम हुई, तो इस आंदोलन के कुछ हिस्सों ने लोकतंत्र का रास्ता छोड़ दिया और हिंसा अपना ली। पीछे रह गए हजारों मृत नागरिक, शहीद जवान और तबाह हुए परिवार।
यह कहानी किसी ऐसी विचारधारा की नहीं है जो परिस्थितियों की वजह से हार गई। यह उस विचारधारा की कहानी है जो इसलिए फेल हो गई क्योंकि वह भारत की हकीकत, यहाँ की विविधता और लोकतांत्रिक सोच के साथ तालमेल नहीं बिठा सकी। इसलिए, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के 100 साल पूरे होना जश्न का नहीं, बल्कि हिसाब-किताब का मौका है। इन 100 सालों में कम्युनिज्म ने न तो गरीबों को आजाद किया, न लोकतंत्र को मजबूत किया और न ही देश की रक्षा की। इसने सिर्फ एक बात साबित की है, एक बाहर से आई विचारधारा जो खुद को देश से ऊपर रखती है, वह आखिर में देश और खुद- दोनों को नुकसान ही पहुँचाती है।

धर्मांतरण के खिलाफ छत्तीसगढ़ में भी आएगा कानून, 10 साल की सजा-लाखों के जुर्माने का प्रावधान: कई नियमों से कट्टरपंथियों पर कसी जाएगी नकेल

                                                                                                                   साभार : Grok & Canva
मौलाना मदनी जैसे कट्टरपंथियों की जिहाद आदि की धमकियों से डराने की कोशिश नहीं कर रहे  है उसका कारण है कि इनके द्वारा जो धर्मांतरण का नंगा नाच खेला जा रहा था उस पर लगाम लगनी शुरू हो गयी है। भारत का मुसलमान अगर इस मुगालते में जी रहा है कि ये हमारी दिक्कतों के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं साथ दो, उन्हें मालूम होना चाहिए कि इन धमकियों का विदेशों में क्या असर हो रहा है उसे समझना होगा। जिहाद की बात बोलने वाले मदनी ने एक बार Al Falah University के आतंकी डॉक्टरों के खिलाफ एक लब्ज नहीं बोलना साबित करता है कि जो कुछ हो रहा है इन कट्टरपंथियों के इशारे पर हो रहा है। 
कल(29 नवंबर) को Republic Bharat पर अपने शो "पूछता है भारत" में एंकर ऐश्वर्य कपूर ने बताया कि विदेशों में उसके बहुत पुराने डॉक्टर दोस्त बताते है कि "डॉक्टरों की इन हरकतों से मरीजों ने हमारे पास आना बंद कर दिया है", कपूर की इस बात का शो में शामिल "गरीब नवाज़" के अंसार रज़ा आदि और भी मुस्लिम भागियों के बीच ये बात कही। मदनी जैसे कट्टरपंथी मुसलमानों के लिए मुसीबत खड़ी कर रहे हैं। देखिए वीडियो:-     
इतना ही नहीं News18 की एंकर रुबिका लियाकत के शो "गूंज" की वीडियो देखिए:-   
            
छत्तीसगढ़ सरकार आने वाले शीतकालीन सत्र में एक नया धर्मांतरण निषेध कानून लाने वाली है। सरकार यह कदम इसलिए उठा रही है क्योंकि बस्तर, जशपुर और रायगढ़ जैसे जनजातीय इलाकों में काफी समय से धर्मांतरण को लेकर विवाद और तनाव बढ़ रहा है। कई बार हालात इतने खराब हुए कि पुलिस और प्रशासन को दखल देना पड़ा। अभी राज्य में मध्य प्रदेश का पुराना कानून लागू है, जिसमें धर्म बदलने से पहले DM की अनुमति लेनी होती है। लेकिन सरकार का मानना है कि यह कानून अब पर्याप्त नहीं है और इसे मजबूत करने की जरूरत है।

नए कानून का उद्देश्य साफ है- कोई भी व्यक्ति बिना पूरी कानूनी प्रक्रिया के धर्म नहीं बदल सकेगा। अगर किसी को डर दिखाकर, लालच देकर, दबाव डालकर या धोखे से धर्म परिवर्तन कराया जाता है तो ऐसे मामलों में कड़ी सजा का प्रावधान होगा। सरकार चाहती है कि हर धर्मांतरण की जानकारी कानूनी रूप से दर्ज हो, ताकि आगे किसी तरह का विवाद न हो और जनजातीय इलाकों में शांति बनी रहे। यह कानून धार्मिक स्वतंत्रता का सम्मान करेगा, लेकिन जबरन या अवैध धर्मांतरण पर सख्त रोक लगाएगा।

नए कानून में क्या-क्या बदलाव हो सकते हैं?

सरकार के नए ड्राफ्ट में सबसे बड़ी बात यह है कि अब धर्म बदलना पहले की तरह आसान नहीं होगा। किसी भी व्यक्ति को धर्म बदलने से पहले पूरी कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ेगा। उसे तय समय पर जिला मजिस्ट्रेट (DM) को लिखित जानकारी देनी होगी, ताकि सरकार को पता रहे कि धर्म परिवर्तन अपनी इच्छा से हो रहा है या किसी दबाव में। अगर कोई व्यक्ति बिना जानकारी दिए धर्म बदल लेता है, तो ऐसे धर्मांतरण को मान्य नहीं माना जाएगा। यानी कागजों पर वह धर्म परिवर्तन वैध नहीं होगा।

इसके साथ ही ड्राफ्ट में यह भी साफ कहा गया है कि अगर किसी ने किसी को लालच देकर, डर दिखाकर, धमकाकर या धोखा देकर धर्म बदलवाने की कोशिश की, तो उसके खिलाफ सख्त कानूनी कार्रवाई होगी। ऐसे मामलों में जेल की सजा भी हो सकती है और भारी जुर्माना भी लगाया जा सकता है। सरकार का मानना है कि जब तक प्रक्रिया को मजबूत और सख्त नहीं बनाया जाएगा, तब तक अवैध धर्मांतरण पर रोक लगाना मुश्किल है।

एक और अहम मुद्दा ‘शादी के बहाने धर्म परिवर्तन कराना’, जिसे कई राज्यों में लव जिहाद कहा जाता है। नए कानून में छत्तीसगढ़ भी इस तरह के मामलों पर सख्ती बढ़ा सकता है। अगर कोई व्यक्ति केवल शादी करवाने के मकसद से धर्म परिवर्तन करवाता है या किसी को ऐसा करने पर मजबूर करता है, तो ऐसी शादी को कोर्ट अवैध घोषित कर सकेगी। यानी सिर्फ शादी के लिए धर्म परिवर्तन की कोशिश अब गंभीर अपराध माना जा सकता है।

इस कानून का मकसद यह नहीं है कि किसी की धार्मिक स्वतंत्रता छीनी जाए। हर व्यक्ति को अपनी पसंद का धर्म अपनाने का अधिकार रहेगा, लेकिन यह अधिकार कानून के दायरे में रहकर ही मिलेगा। नए प्रावधान यह सुनिश्चित करेंगे कि कोई भी व्यक्ति दबाव, धोखे या लालच का शिकार न बने। सरकार का मानना है कि इससे खासकर जनजातीय इलाकों में फैल रहा तनाव कम होगा, वहाँ होने वाले झगड़े और सामाजिक विभाजन थमेगा और समाज में स्थिरता बनी रहेगी।

भारत के किन राज्यों में पहले से लागू है धर्मांतरण विरोधी कानून?

भारत में धर्मांतरण विरोधी कानून की शुरुआत बहुत पहले ओडिशा से हुई। ओडिशा ने 1967 में पहला कानून बनाया था, जिसमें जबरन या लालच देकर धर्म परिवर्तन करवाने पर सजा का प्रावधान रखा गया। इसके एक साल बाद मध्य प्रदेश ने भी ऐसा ही कानून लागू किया। समय बीतने के साथ, अलग-अलग राज्यों ने महसूस किया कि धर्मांतरण के मामलों में नए तरीके सामने आ रहे हैं, इसलिए उन्होंने कानूनों को और सख्त बनाना शुरू किया।

हाल के वर्षों में उत्तर प्रदेश, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक और राजस्थान ने अपने कानूनों में और कड़े नियम जोड़े हैं। इन राज्यों का साफ कहना है कि अगर कोई व्यक्ति किसी को डर दिखाकर, पैसा या नौकरी का लालच देकर, या शादी का झाँसा देकर धर्म परिवर्तन करवाने की कोशिश करता है, तो यह एक गंभीर अपराध माना जाएगा। ऐसे मामलों में दोषी को 3 साल से लेकर 10 साल तक जेल हो सकती है। इसके साथ ही लाखों रुपए का जुर्माना भी देना पड़ सकता है।

अधिकतर राज्यों में यह अपराध गैर-जमानती है। इसका मतलब है कि पुलिस बिना वारंट के भी आरोपित को गिरफ्तार कर सकती है और जमानत आसानी से नहीं मिलती। अगर पीड़ित व्यक्ति नाबालिग हो, महिला हो, या अनुसूचित जाति/जनजाति (SC/ST) समुदाय से हो, तो सजा और अधिक कड़ी कर दी जाती है, क्योंकि ये वर्ग ज्यादा संवेदनशील माने जाते हैं।

कई राज्यों में तो स्वेच्छा से, यानी अपनी इच्छा से धर्म परिवर्तन पर भी नियम बहुत साफ हैं। जिसे खुद से धर्म परिवर्तन करवाना है, उसे पहले जिला मजिस्ट्रेट (DM) को 30 से 60 दिन पहले लिखित रूप से बताना होता है। यह इसलिए किया जाता है ताकि अधिकारियों को पता रहे कि धर्म परिवर्तन पूरी तरह अपनी इच्छा से किया जा रहा है और इसके पीछे कोई दबाव या लालच नहीं है।

इन सभी कानूनों का मुख्य उद्देश्य एक ही है कि लोगों को सुरक्षा देना, उन्हें धोखे से बचाना और धार्मिक स्वतंत्रता को सही अर्थों में सुरक्षित रखना।

अवैध धर्मांतरण का गलत इस्तेमाल कैसे होता है?

धर्मांतरण को लेकर सबसे बड़ी चिंता तब पैदा होती है जब इसे किसी योजना के तहत, संगठित तरीके से किया जाता है। खासकर तब, जब कमजोर या सरल-सहज लोगों को निशाना बनाया जाता है। कई जगहों पर देखा गया है कि कुछ समूह धीरे-धीरे किसी इलाके में बड़ी संख्या में लोगों का धर्म बदलवाते हैं।

इसका असर सिर्फ धर्म तक सीमित नहीं रहता। इससे उस क्षेत्र की जनसंख्या का संतुलन बदलने लगता है। जब किसी एक समुदाय की संख्या अचानक बढ़ जाती है, तो स्थानीय राजनीति, पंचायतों के फैसले, प्रशासनिक ढाँचा और सामाजिक माहौल पर भी बड़ा असर पड़ सकता है। कई बार यह बदलाव वहाँ रहने वाले पुराने समुदायों के लिए चिंता और असुरक्षा की भावना पैदा कर देता है।

दूसरा बड़ा नुकसान तब होता है जब बाहरी या संगठित समूह जनजातीय समुदायों को उनकी अपनी परंपराओं, देवी-देवताओं और जीवनशैली से दूर करने की कोशिश करते हैं। जनजातीय समाज की अपनी विशिष्ट पहचान होती है, और जब उन्हें तेजी से किसी नए मजहब की ओर मोड़ा जाता है, तो समाज में विभाजन बढ़ता है। कई गाँवों में परिवार आपस में बँट जाते हैं, त्यौहार अलग-अलग हो जाते हैं और सामाजिक रिश्तों में तनाव पैदा हो जाता है।

कुछ मामलों में ऐसे धर्मांतरित व्यक्तियों का इस्तेमाल संगठन अपने प्रचार, अपनी संख्या बढ़ाने या गलत गतिविधियों के लिए भी करते हैं। कमजोर या भावनात्मक रूप से टूटे लोगों को प्रभावित करना आसान होता है और ऐसे लोग अनजाने में कट्टरपंथी सोच के शिकार बन सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट भी इस खतरे को समझ चुका है। कोर्ट ने साफ कहा है कि जबरन या लालच देकर धर्म परिवर्तन करवाना देश की सुरक्षा के लिए भी खतरा बन सकता है। इसलिए कई राज्य सरकारें कानूनों को और सख्त कर रही हैं, ताकि कोई भी व्यक्ति दबाव, डर, दिखावे या चालाकी से लोगों का धर्म परिवर्तन ना करवा सके। सरकारों का उद्देश्य यह नहीं है कि किसी की धार्मिक स्वतंत्रता छीनी जाए, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि हर धर्म परिवर्तन साफ, सुरक्षित और पूरी तरह अपनी इच्छा से हो, न कि किसी चाल या दबाव का नतीजा।

जहाँ गिरा माँ सती का कंधा, वहाँ हर साल अपने आप बढ़ती है भैरव बाबा की मूर्ति: 51 शक्तिपीठों में से एक ‘महामाया मंदिर’

छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले की धर्मनगरी रतनपुर में श्थित माँ महामाया मंदिर का मुख्य द्वार (फोटो साभार: भक्त वत्सल)
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर जिले में मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय ने बुधवार (12 नवंबर 2025) को रतनपुर में कलचुरी कलार समाज के वार्षिक महोत्सव में हिस्सा लिया। सबसे पहले, मुख्यमंत्री ने माँ महामाया देवी के दरबार में पूजा-अर्चना की और प्रदेश की सुख, समृद्धि और विकास के लिए आशीर्वाद माँगा।

मुख्यमंत्री साय ने माँगा छत्तीसगढ़ के लिए आशीर्वाद

सीएम विष्णुदेव साय ने इस मौके पर कहा कि माँ महामाया की कृपा से छत्तीसगढ़ तेजी से विकास के रास्ते पर आगे बढ़ रहा है। सीएम विष्णुदेव ने याद दिलाया कि कलचुरी राजवंश ने रतनपुर समेत देश में लगभग 1200 वर्षों तक शासन किया और उनका राज खुशहाली और समृद्धि का प्रतीक था।

मुख्यमंत्री ने घोषणा की कि माँ महामाया मंदिर के विकास के लिए ‘भारत दर्शन योजना‘ में एक प्रस्ताव भेजा गया है, जिसके बाद रतनपुर का पूरी तरह कायाकल्प हो जाएगा। उन्होंने कहा कि खनिज, वन और जल जैसे संसाधनों से भरपूर छत्तीसगढ़ को हम सब मिलकर देश के अग्रणी राज्यों में शामिल करेंगे।

जनता को सौगात देते हुए सीएम साय ने ऐतिहासिक नगरी रतनपुर में 100 बिस्तर वाला अस्पताल खोलने का ऐलान किया। साथ ही, उन्होंने कलचुरी समाज के सामुदायिक भवन निर्माण के लिए 1 करोड़ रुपए देने की भी घोषणा की।

माँ महामाया मंदिर: जहाँ गिरा था देवी सती का दाहिना कँधा

मुख्यमंत्री के इस बयान के बाद रतनपुर का माँ महामाया देवी मंदिर देश भर में चर्चा का केंद्र बन गया है। यह मंदिर न सिर्फ प्राचीन कलचुरी राजवंश की राजधानी रहा है, बल्कि यह छत्तीसगढ़ की सबसे बड़ी धार्मिक पहचान भी है।
यह पवित्र स्थान 51 शक्तिपीठों में से एक माना जाता है और इसे ‘कौमारी शक्तिपीठ‘ के नाम से भी जाना जाता है। सदियों से यहाँ देवी महामाया की पूजा कोसलेश्वरी देवी यानी दक्षिण कोसल की अधिष्ठात्री देवी के रूप में की जाती है।
पौराणिक मान्यता है कि जब भगवान शिव देवी सती के शरीर को लेकर वियोग में ब्रह्मांड में भटक रहे थे, तब इसी स्थान पर देवी सती का दाहिना स्कंध (कँधा) गिरा था, जिसके बाद यह शक्तिपीठ स्थापित हुआ।
मंदिर का निर्माण कलचुरी राजा रत्नदेव प्रथम ने लगभग 1050 ईस्वी में करवाया था। मंदिर की वास्तुकला 12वीं से 13वीं शताब्दी की अद्भुत कला को दर्शाती है। मंदिर मूल रूप से महाकाली, महालक्ष्मी और महासरस्वती तीनों देवियों को समर्पित था, लेकिन वर्तमान मंदिर में महालक्ष्मी और महासरस्वती की पूजा होती है। इसी परिसर में भगवान शिव और हनुमान जी के प्राचीन मंदिर भी मौजूद हैं, जो इसकी भव्यता को और बढ़ाते हैं।

भैरव बाबा का रहस्य और नवरात्रों की आस्था

यहाँ आने वाले भक्तों के लिए एक खास नियम है। वे माँ महामाया के दर्शन से पहले थोड़ी दूरी पर स्थित भैरव बाबा के मंदिर पर रुककर दर्शन करते हैं। स्थानीय लोगों के बीच यह विश्वास प्रचलित है कि भैरव बाबा की यह प्राचीन प्रतिमा की ऊँचाई हर साल अपने आप बढ़ती जा रही है, जो इसे रहस्य और आस्था का केंद्र बनाती है।

साल में दो बार आने वाले नवरात्रों के दौरान यहाँ विशेष उत्सव होता है। भक्त नौ दिनों तक उपवास रखते हैं और अपनी इच्छाएँ पूरी करने के लिए अखंड मनोकामना ज्योति कलश प्रज्वलित करते हैं, क्योंकि यहाँ की मान्यता है कि सच्चे मन से माँगी गई प्रार्थना कभी खाली नहीं जाती। रतनपुर का यह पवित्र धाम आस्था, संस्कृति और गौरव का एक अनूठा संगम है।

कैसे पहुँचे माँ महामाया के पवित्र दरबार तक?

रतनपुर स्थित माँ महामाया का यह पवित्र धाम छत्तीसगढ़ की धार्मिक पहचान और गौरव का प्रतीक है। मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय के आगमन ने भी इस पवित्र नगरी के प्रति राज्य की प्रतिबद्धता को मजबूत किया है। यदि आप इस शक्तिपीठ के दर्शन के लिए जाना चाहते हैं, तो यहाँ तक पहुँचना बहुत ही आसान है।

हवाई यात्रा- अगर आप हवाई जहाज से आ रहे हैं, तो रतनपुर से सबसे नजदीकी एयरपोर्ट रायपुर एयरपोर्ट है, जो यहाँ से लगभग 156 किलोमीटर दूर है। एयरपोर्ट से उतरने के बाद, भक्त टैक्सी या कैब किराए पर लेकर सीधे मंदिर तक पहुँच सकते हैं। यह रास्ता आरामदायक और सुगम है।

रेल यात्रा- रतनपुर का सबसे नजदीकी और प्रमुख रेलवे स्टेशन बिलासपुर जंक्शन है, जो यहाँ से सिर्फ 33 किलोमीटर की दूरी पर है। बिलासपुर जंक्शन पहुँचने के बाद, मंदिर तक जाने के लिए आपको नियमित रूप से टैक्सी और बस सेवाएँ आसानी से मिल जाएँगी।

सड़क यात्रा- सड़क मार्ग से रतनपुर की कनेक्टिविटी बहुत अच्छी है। छत्तीसगढ़ के सभी बड़े शहरों से रतनपुर के लिए नियमित राज्य परिवहन बसें और निजी वाहन (टैक्सी) सेवाएँ हर समय उपलब्ध रहती हैं। सड़क का सफर आरामदायक और सुविधाजनक है। यह पवित्र धाम अपनी आस्था और भव्यता के कारण दूर-दूर से भक्तों को खींच लाता है।

ईसाई मिशनरियाँ अब नहीं बदलवाती नाम, सरकारी योजनाओं-आरक्षण का लाभ लेने के लिए जारी रखते हैं पुरानी पहचान: पूर्वांचल में धर्मांतरण का सीक्रेट ट्रेंड, आशा वर्कर बन रही हथियार


पूर्वांचल के कई जिलों में धर्मांतरण का एक नया ट्रेंड सामने आया है। अब ईसाई मिशनरियाँ धर्म परिवर्तन कराने वालों से नाम या सरनेम बदलने को नहीं कह रही हैं। लोग अपनी पहचान, जाति और सरकारी दस्तावेज वही रखते हैं लेकिन धर्म बदल चुके होते हैं। ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि सरकारी योजनाओं, आरक्षण और अन्य सुविधाओं का लाभ पहले की तरह मिलता रहे और किसी को शक भी न हो।

इसमें कोई हैरानी की बात नहीं, इसका प्रयोग पहले दिल्ली में हो चुका है, लेकिन दुर्भाग्य से 2014 में सत्ता परिवर्तन होते ही सबके सब अपने आप हिन्दू धर्म में उसी तरह वापस आ गए जिस तरह चुपचाप ईसाई बने थे। इतना ही नहीं हर रविवार रोहिणी के एक होटल में इस तरह का काम होता था, जब वहां के हिन्दू नेताओं ने पुलिस में इसकी शिकायत की, उल्टे उन्हीं नेताओं पर पुलिस ने केस बनाने शुरू कर दिए। लेकिन नेता होने के कारण पुलिस को केस वापस लेने पड़े। यहाँ भी 2014 में सत्ता परिवर्तन होते ही ईसाई धर्मांतरण का खेल बंद हो गया। 

जिस तरह देशव्यापी ईसाई मिशनरीज सक्रीय है तो हमारा गुप्तचर विभाग और हिन्दू स्वयंसेवी संस्थाएं क्यों खामोश है? मदर टेरेसा के रहते जो धर्मांतरण का खेल शुरू हुआ आज तक चल रहा है। दूसरे, जब मोदी सरकार गरीबों को मुफ्त राशन और मकान बनाकर दे रही है फिर क्यों ये लोग लालच में आकर धर्मांतरण कर रहे हैं। सरकार को ऐसे लोगों को चिन्हित कर ब्लैकलिस्टेड करना चाहिए, ताकि धन के लालच में दूसरे मजहब में जाने की सजा का अहसास हो। सरकार को इनके समर्थन में खड़े होने वाले नेता, पार्टियों, अदालतों और मानवाधिकारियों आदि के साथ भी सख्ती से पेश आना होगा। यही समय की मांग भी है। जातियों के नाम पर बनने वाली पार्टियां किसी पनवाडी की दुकान से कम नहीं।    

धर्मांतरण का नया तरीका

जाँच में खुलासा हुआ है कि मिशनरियाँ अब सीधे तौर पर प्रचार नहीं कर रहीं, बल्कि स्थानीय लोगों के बीच रहकर गुप्त तरीके से धर्मांतरण करवा रही हैं। इसके लिए उन्होंने आशा कार्यकर्ताओं, स्थानीय महिलाओं और कुछ बिचौलियों को जोड़ रखा है।

अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, जौनपुर की एक आशा कार्यकर्ता ने खुद मजहब बदला है और अब दूसरों को भी जोड़ने का काम कर रही है। वह कहती है, “पहचान वही है, बस एक लॉकेट पहन लिया है जो कपड़ों के अंदर रहता है। नाम बदलने की कोई जरूरत नहीं, बस प्रभु का नाम दिल में रखो।”

आशा कार्यकर्ता ने कहा कि जौनपुर में सख्ती के कारण सब लोग वाराणसी जाते हैं। पिछली बार 10-11 लोग टेंपो से बनारस के भुल्लनपुर क्षेत्र में गए थे। वहाँ 250 से 300 लोग जुटे थे। इस रविवार को फिर जाना है।

इतना ही नहीं अब ‘चंगाई सभा’ (प्रार्थना सभा) का तरीका भी बदल गया है। पुलिस की सख्ती के बाद अब ये सभाएँ ऑनलाइन या मोबाइल के जरिए होती हैं। हर रविवार और शुक्रवार को मुंबई से वीडियो के माध्यम से नए-नए लोगों को जोड़ा जाता है।

पैसे और सहानुभूति से धर्मांतरण

जाँच में पता चला है कि गरीब, दलित और पिछड़े वर्गों को निशाना बनाया जा रहा है। मिशनरियाँ सीधे परिवारों को नहीं, बल्कि उनके बच्चों के जरिए प्रवेश करती हैं। शिक्षा, शादी या इलाज के नाम पर आर्थिक मदद देकर सहानुभूति हासिल की जाती है।

एक व्यक्ति का धर्म परिवर्तन करवाने पर 25 से 50 हजार रुपए तक का कमीशन तय होता है। धीरे-धीरे परिवार चर्च की सभाओं में शामिल होने लगता है और अंततः धर्मांतरण कर लेता है।

जौनपुर के वीरेंद्र विश्वकर्मा ने बताया कि उनसे इलाज और शादी के बहाने धर्म परिवर्तन करवाया गया था। वह अब अपने मूल धर्म में लौट चुके हैं। उनका कहना है कि हर गुरुवार को सुबह और शाम सभाएँ होती हैं, जहाँ लोगों को ‘यीशु के नाम का पानी’ पिलाया जाता है और नाम रजिस्टर में दर्ज किए जाते हैं।

पुलिस की सख्ती और मिशनरियों की नई रणनीति

जौनपुर पुलिस ने इस साल धर्मांतरण के चार केस दर्ज किए और कई लोगों को गिरफ्तार किया। एसपी डॉ कौस्तुभ का कहना है, “जहाँ भी लोभ-लालच देकर धर्मांतरण के मामले सामने आते हैं, वहाँ छापेमारी कर सख्त कार्रवाई की जाती है।”

हालाँकि पुलिस की सख्ती के बावजूद मिशनरियों ने अब और चालाकी अपनाई है। अब वे सरनेम नहीं बदलवातीं, ताकि सरकारी रिकॉर्ड में व्यक्ति हिंदू ही दिखाई दे और आरक्षण व सरकारी लाभ जारी रहे।

छत्तीसगढ़ में भी खुलासा

ऐसा ही पैटर्न छत्तीसगढ़ के कोरबा और जांजगीर जिलों में भी सामने आया था। वहाँ महिला प्रचारक (लेडी मिशनरी) अपनी असली पहचान छिपाकर चंगाई सभा के नाम पर महिलाओं और बच्चियों को धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित कर रही थीं।

वो पहले दोस्ती करतीं, फिर बीमारियों और परेशानियों से जूझ रही महिलाओं को प्रार्थना के जरिए मुक्ति का रास्ता बतातीं। जब महिलाएँ चर्च जाने लगतीं, तो वहाँ आवेदन भरवाकर हर रविवार ‘प्रभु की प्रार्थना’ का वादा लिया जाता। 90% महिलाएँ धीरे-धीरे ईसाई महजब अपनातीं, जबकि 10% तब लौट आतीं जब कोई लाभ नहीं दिखता।

पूर्वांचल से लेकर छत्तीसगढ़ तक, धर्मांतरण का तरीका अब बदल चुका है। अब न नाम बदले जा रहे हैं, न कपड़े या रूप-रंग बस आस्था बदली जा रही है। सरकारी दस्तावेजों में लोग हिंदू दिखते हैं, मगर दिल से किसी और मजहब के अनुयाई बन चुके होते हैं

मिशनरियों ने फाड़े हिन्दू महिला के कपड़े; प्रार्थना सभा की आड़ में धर्मांतरण; बिलासपुर से दुर्ग तक प्रार्थना सभा की आड़ में धर्मांतरण को लेकर बवाल


छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में धर्मांतरण को लेकर तनाव बना हुआ है। 13 सितंबर 2025 को प्रार्थना सभा में करीब 300 लोगों को ईसाई बनाने के लिए प्रार्थना सभा का आयोजन किया गया था। वहीं दुर्ग में भी धर्मांतरण के विरोध में हिन्दू संगठन सड़क पर आ गए।

बिलासपुर में प्रार्थना सभा में करीब 300 लोग मौजूद थे। इनलोगों का धर्मांतरण कराया जा रहा था। इस मामले में सीपत पुलिस ने 7 लोगों के खिलाफ केस दर्ज किया है। इसको लेकर ईसाईयों ने जमकर बवाल किया।

प्रार्थना सभा की आड़ में धर्मांतरण

हिन्दू संगठन ने भी धर्मांतरण के विरोध में करीब 10 घंटे तक प्रदर्शन किया। इस लोगों ने मसीही समाज के लोगों के खिलाफ कार्रवाई की माँग की है। हिन्दू संगठनों का कहना है कि लगातार प्रार्थना सभा की आड़ में हिन्दुओं को लालच और पैसे देकर धर्मांतरण कराया जा रहा है। इनलोगों ने ईसाईयत और पुलिस प्रशासन के खिलाफ जमकर नारेबाजी की।

हिन्दू संगठनों ने थाने के सामने हनुमान चालीसा का पाठ भी किया। पुलिस के मुताबिक, प्रार्थना सभा की आड़ में धर्मांतरण की सूचना मिली थी। इसके आधार पर पुलिस घटनास्थल पर पहुँची और 7 ईसाईयों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर वैधानिक कार्रवाई की जा रही है।

बिलासपुर में धर्मांतरण का ये कोई पहला मामला नहीं है। इससे पहले बीते 28 अगस्त 2025 को प्रार्थना सभा की आड़ में धर्मांतरण की कोशिश की जा रही थी। हिन्दू संगठनों को जानकारी मिलने पर वे मस्तूरी थाना क्षेत्र के पेंड्री पहुँचे। यहाँ एक बंद पड़े पोल्ट्री फॉर्म में 15-20 लोगों का धर्मांतरण किया जा रहा था। इसके लिए प्रार्थना सभा का आयोजन किया गया था। पुलिस ने इस मामले में पास्टर संजीव सूर्यवंशी समेत 8 लोगों को गिरफ्तार किया था।

दुर्ग में भी धर्मांतरण को लेकर तनाव

छत्तीसगढ़ के दुर्ग के पद्मनाभपुर में रविवार (14 सितंबर 2025) को चर्च में प्रार्थना सभा का आयोजन किया गया था। इसको लेकर आस पास के लोगों ने हिन्दू संगठनों को जानकारी दी कि यहाँ धर्मांतरण के लिए लोगों को जुटाया गया है। इसके बाद हिन्दू संगठन वहाँ पहुँच गए और चर्च के बाहर हंगामा किया। मौके पर पहुँची पुलिस ने प्रार्थना सभा में मौजूद लोगों के नाम और पता नोट किए। हिन्दू समुदाय ने इस दौरान चर्च के बाहर भजन-कीर्तन किया।

विवाद बढ़ने पर पुलिस ने दोनों पक्षों को थाने लेकर गई। हिन्दुओं का कहना है कि चर्च से जुड़े जॉन को धर्मांतरण के लिए बाहर से फंडिंग होती है। उसकी बैंक खातों की जाँच की जानी चाहिए। उसे जिला बदर किया जाना चाहिए। इनका कहना है कि जॉन ने अपने गुर्गों के साथ मिलकर मारपीट किया और गालियाँ दी।

इन लोगों ने बजरंग दल कार्यकर्ता निर्मित कौर को धक्का दिया। यहाँ तक की उसके कपड़े फाड़ दिए। इसके बाद जॉन को बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने पीटा। फिलहाल जॉन को नजदीक के अस्पताल में भर्ती कराया गया है।

छत्तीसगढ़ : चायवाला बन गया रायगढ़ का मेयर: निकाय चुनावों में भाजपा का 10 नगर निगम और 36 नगरपालिका पर कब्जा

                        छत्तीसगढ़ के मंत्री ओपी चौधरी के साथ चाय बेचने वाले जीवर्धन चौहान (साभार: हिंदुस्तान)
छत्तीसगढ़ की नगर निकाय चुनावों में भाजपा ने शानदार जीत दर्ज की है। भाजपा ने राज्य के सभी 10 नगर निगम चुनावों में जीत हासिल करके कांग्रेस का सूपड़ा साफ कर दिया है। वहीं, नगर पालिका परिषद और नगर पंचायतों में भी भगवा आगे है। भाजपा ने 
कांग्रेस को पछाड़कर रायगढ़ नगर निगम का चुनाव भी जीता है। यहाँ से चाय का दुकान चलाने वाले भाजपा के मेयर प्रत्याशी जीवर्धन चौहान जीते हैं।

जीवर्धन चौहान ने कांग्रेस के प्रत्याशी जानकी काटजू को 34,000 वोटों के भारी अंतर से हराया है। जीवर्धन चौहान ने जीत का श्रेय रायगढ़ की जनता को दिया है। इसके साथ ही उन्होंने मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और रायगढ़ विधायक एवं राज्य के वित्त मंत्री ओपी चौधरी को धन्यवाद दिया, जिनकी वजह से उन्हें चुनाव लड़ने का मौका मिला। उन्होंने कहा कि वे रायगढ़ के महापौर के रूप में विकास का काम करेंगे।

चुनाव जीतने के बाद भी जीवर्धन सिंह चौहान अपनी दुकान में लोगों को चाय पिला रहे हैं। भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा के प्रदेश मंत्री जीवर्धन ने कहा कि वे पहले भी चायवाला थे और अब भी चायवाला बनकर लोगों के बीच रहेंगे। उन्होंने कहा कि वे अपनी दुकान में रहकर ही लोगों की समस्याओं को सुनेंगे और उसका समाधान करेंगे। उन्होंने कहा कि वे रायगढ़ में मूलभूत सुविधाओं की कमी नहीं होने देंगे।

                              नगर निगमों में जीतने वाले उम्मीदवारों की सूची (साभार: दैनिक भास्कर)

जीवर्धन चौहान की जीत पर ओपी चौधरी कहा कि रायगढ़ की जनता जनार्दन का आशीर्वाद मिलने का पूर्ण विश्वास था। पिछले एक वर्ष में लोगों ने राज्य में विकास की नई राजनीति को देखा है। चाय का ठेला चलाकर ईमानदारी से जीवन-यापन करने वाले जीवर्धन चौहान और भाजपा पार्षदों को जनता ने जो आशीर्वाद दिया है, उसे हृदय से स्वीकार करते हुए भाजपा लोगों की आशाओं के अनुरूप कार्य करती रहेगी।

चुनाव प्रचार के दौरान जीवर्धन चौहान के लिए छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय और वित्त मंत्री ओपी चौधरी ने जमकर प्रचार किया था। इसके साथ ही अलग-अलग समय पर दोनों बड़े नेताओं ने जीवर्धन चौहान के ठेले पर चाय भी बनाई थी और लोगों को पिलाया था। इसके कारण चुनाव से पहले ही रायगढ़ के मेयर (महापौर) उम्मीदवार घोषित हो चुके जीवर्धन चौहान भारी मतों से जीते।

                                             नगरपालिका के उम्मीदवारों की सूची (साभार: दैनिक भास्कर)

रायगढ़ के नगर निकाय चुनाव में भाजपा को 33 वार्डों में जीत मिली है। वहीं, कांग्रेस 12 वार्डों में सिमट कर रह गई है। एक वार्ड में बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के प्रत्याशी ने जीत हासिल की है। इसके साथ ही 2 निर्दलीय भी जीते हैं। रायगढ़ में करीब 69.68 प्रतिशत मतदान हुआ है। यहाँ मेयर के लिए 7 और वार्ड पार्षद के लिए 144 प्रत्याशी चुनावी मैदान में थे।

रायपुर में भाजपा ने 15 साल बाद वापसी की है। भाजपा ने नगर निगम की सभी 10 सीटों पर जीत दर्ज की है। वहीं, 49 नगरपालिका में 36 पर भाजपा ने जीत हासिल की है, जबकि 7 में कांग्रेस, 1 में AAP और 5 निर्दलीय जीते हैं। बता दें कि 10 नगर निगमों में मेयर और पार्षदों के साथ 49 नगरपालिका और 114 नगर पंचायतों समेत 173 नगरीय निकायों के अध्यक्ष और पार्षद के चुनाव हुए हैं।

शिव कुमार तिवारी के बेटे सोनू को माँ परवीन बानो ने आधार कार्ड में बना दिया ‘फिरोज अंसारी’: माँ-मामा ने किया ‘खेला’

                      सोनू तिवारी को आधार कार्ड में बना दिया गया फ़िरोज़ अंसारी (चित्र साभार: दैनिक भास्कर)
छत्तीसगढ़ के दुर्ग से एक हिंदू युवक को आधार कार्ड में मुस्लिम बना देने का मामला सामने आया है। पीड़ित का नाम सोनू तिवारी है। उसके पिता शिव कुमार तिवारी है। लेकिन आधार कार्ड में उसका नाम फिरोज अंसारी और पिता का नाम राजू अंसारी कर दिया गया है।

शैक्षणिक प्रमाण-पत्रों में सोनू और उसके पिता का असली नाम दर्ज है। अब आधार कार्ड में हुए इस ‘खेल’ को दुरुस्त करवाने के लिए वह दफ्तरों के चक्कर काट रहा है। सोनू के अनुसार उसकी पहचान बदलने का ‘खेला’ उसकी माँ और मामा ने ही किया है। उसकी माँ परवीन बानो मुस्लिम है।

दैनिक भास्कर ने सोनू की पीड़ा को लेकर विस्तार से रिपोर्ट छापी है। रिपोर्ट के मुताबिक यह मामला दुर्ग जिले के कसारीडीह इलाके का है। सोनू के पिता शिव कुमार तिवारी अपने इलाके के हिस्ट्रीशीटर थे और मुस्लिम महिला परवीन बानो से लव मैरिज की थी। 8 सितंबर 1992 को परवीन ने एक बच्चे को जन्म दिया। इस बच्चे का नाम सोनू तिवारी रखा गया।

पीड़ित ने बताया कि उसकी प्रारम्भिक शिक्षा-दीक्षा सोनू तिवारी के ही नाम से कसारीडीह के प्राइमरी स्कूल में हुई। इस स्कूल से मिली टीसी और मार्कशीट में भी उसका नाम सोनू तिवारी दर्ज है। उसकी पढ़ाई के ही दौरान शिवकुमार तिवारी को किसी मामले में जेल हो गई। पिता के जेल जाने के बाद परवीन अपने बच्चे के साथ मायके चली आई। यहाँ सोनू तिवारी का नया आधार कार्ड बनवाया गया। इस आधार कार्ड में सोनू का नाम फ़िरोज़ अंसारी कर दिया गया।

सोनू का कहना है कि आधार कार्ड में उसके पिता का भी नाम बदला दिया गया है। शिव प्रसाद तिवारी की जगह आधार कार्ड में राजू अंसारी लिखा हुआ है। इसी आधार कार्ड पर सोनू तिवारी का ड्राइविंग लाइसेंस भी फ़िरोज़ अंसारी के नाम से बनवा दिया गया। सोनू तिवारी ने इस साजिश में अपने मामा की मिलीभगत भी बताई है। फ़िलहाल सोनू अपनी असली पहचान वापस पाने की लड़ाई लड़ रहा है।

वह 2 साल से जिले के तमाम प्रशासनिक अधिकारियों को प्रार्थना पत्र दे कर इस गलती को दुरुस्त करने की गुहार लगा रहा है। सोनू का कहना है कि वह हिंदू है और इसी पहचान के साथ रहना चाहता है। उसने SDM को इस संबंध में आवेदन दिया है। बताया जाता है कि अब उसकी माँ ने भी सहमति दे दी है। SDM मुकेश रावटे के अनुसार मामले में जाँच कर नियमानुसार निर्णय लिया जाएगा।

सांसद संतोष पांडेय ने पूछा –प्रवीण नेट्टारू और कन्हैया लाल को काटने वाले कौन थे?

                 राजनांदगाँव के सांसद संतोष पांडेय ने राहुल गाँधी पर हिंदुस्तान को बदनाम करने का लगाया आरोप
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के तीसरे कार्यकाल के पहले संसद सत्र में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर प्रतिक्रिया देते हुए नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने संपूर्ण हिन्दू समाज को हिंसक बता दिया। कॉन्ग्रेस पार्टी के पूर्व अध्यक्ष ने इस दौरान भगवान शिव की तस्वीर दिखाई और कहा कि वो त्रिशूल का उपयोग नहीं करते बल्कि उसे जमीन में गाड़ कर रखते हैं। छत्तीसगढ़ के राजनांदगाँव से भाजपा के सांसद संतोष पांडेय ने उनके इस प्रोपेगंडा का करारा जवाब दिया है, जिसका वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हो रहा है।

संतोष पांडेय ने कहा कि सोमवार (1 जुलाई, 2024) को रात के 12 बजे तक संसद चला और राहुल गाँधी ने जिस तरह की बातें की, इसके अगले दिन अखिलेश यादव ने शेरो-शायरी से बातचीत की, उसका जवाब देते के लिए भी वो शायरी का इस्तेमाल करना चाहते हैं। संतोष पांडेय ने सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव के लिए शबीना अदीब की गजल की पंक्तियाँ पढ़ीं – “जो ख़ानदानी रईस हैं वो मिज़ाज रखते हैं नर्म अपना, तुम्हारा लहजा बता रहा है तुम्हारी दौलत नई नई है।”

उन्होंने कहा कि नेता प्रतिपक्ष ने बार-बार भगवान शिव की तस्वीर दिखाई, वो भगवान भोलेनाथ हैं, भगवान शंकर हैं, ये कॉन्ग्रेस की फितरत है कि उसके पूर्व मुख्यमंत्री (भूपेश बघेल) जिन्हें छत्तीसगढ़ की जनता ने निपटा दिया और जो लोकसभा में निपट गए, वो ‘महादेव’ के नाम से सट्टा चला रहे थे। उन्होंने ‘महादेव’ सट्टेबाजी एप घोटाले का जिक्र करते हुए कहा कि ये 6000 करोड़ रुपए का था और इसका संचालन भूपेश बघेल कर रहे थे। संतोष पांडेय ने चेताया कि भगवान शिव को मजाक में न लें और बार-बार उनका चित्र दिखाने की कोशिश न करें।

‘महादेव’ सट्टेबाजी एप घोटाले के तार छत्तीसगढ़ से लेकर दुबई तक गए थे। इस मामले में छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यंत्री भूपेश बघेल, सौरभ चंद्राकर और रवि उप्पल के अलावा 16 अन्य के नाम FIR में आए थे। आरोप लगा कि UAE स्थित ‘महादेव’ सट्टेबाजी एप के प्रमोटरों से भूपेश बघेल ने CM रहते 508 करोड़ रुपए लिए। इस एप को बनाने वाला सुआरभ चंद्राकर भिलाई का रहने वाला है। इस मामले में रणबीर कपूर, श्रद्धा कपूर, साहिल खान, संजय दत्त, बादशाह, तमन्ना भाटिया, कपिल शर्मा, हुमा कुरैशी और हिना खान जैसों का नाम भी आया था, जिन्हें कार्यक्रमों में बुलाया गया था।

संसद में बोलते हुए संतोष पांडेय ने आगे कहा, “राहुल गाँधी ने जो शुरुआत की है, जिस तरह हिंदुत्व और BJP को हिंसक कहा था, उनसे मेरे कुछ सवाल हैं। क्या हिन्दू हिंसक हो रहा है? भाजपा हिंसा की बात करती है? हिंदुस्तान में हिंसा कौन फैला रहा है, हिन्दू कितना हिंसक है – पूरा भारत जानता है। कर्नाटक में BJYM कार्यकर्ता प्रवीण नेट्टारू और राजस्थान के टेलर कन्हैया लाल की गला रेत कर हत्या हिन्दू समाज ने की है? जम्मू कश्मीर में बम विस्फोट करने वाले कौन से समाज के हैं?”

कर्नाटक में PFI के गुर्गों ने प्रवीण नेट्टारू को कुल्हाड़ी से काट डाला था। दक्षिण कन्नड़ में हुई ये घटना प्रतिबंधित संगठन द्वारा 2047 तक भारत में इस्लामी राज्य की स्थापना के लक्ष्य के तहत थी। तुफैल MH और मुहम्मद जाबिर जैसे इसमें गिरफ्तार हुए थे। वहीं भाजपा की प्रवक्ता (अभी निलंबित) नूपुर शर्मा ने TV पर एक बहस के दौरान हदीथ में लिखा एक अंश बताया था जिसके बाद उनका एडिटेड वीडियो शेयर कर मुस्लिमों को भड़काया गया। उनका समर्थन करने पर उदयपुर में कन्हैया लाल का ‘सर तन से जुदा’ कर दिया गया। उनका बेटा 2 साल बाद भी न्याय के इंतज़ार में है, वो चप्पल नहीं पहनता।

संतोष पांडेय ने आगे पूछा कि समाज के अंदर चिल्ला-चिल्ला कर ‘फिलिस्तीन ज़िंदाबाद’ का नारा लगाने वाले किस समाज के हैं? उन्होंने संसद की परंपराओं को तोड़ने की कोशिश पर प्रहार करते हुए कहा कि ऐसे तत्व सफल नहीं होंगे। बता दें कि शपथग्रहण के दौरान हैदराबाद से AIMIM के सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने ‘फिलिस्तीन ज़िंदाबाद’ का नारा लगाया था और ‘अल्लाह-हू-अकबर’ कहा था। संतोष पांडेय ने इस दौरान सपा सांसद इमरान मसूर द्वारा छत्तीसगढ़ में मॉब लिंचिंग के आरोप लगाए जाने का भी विरोध किया।

सहारनपुर के जिन 2 लोगों की रायपुर में मॉब लिंचिंग हुई थी, उन पर गौ-तस्करी में लिप्त होने के आरोप लगे थे। कॉन्ग्रेस वालों ने उनसे परिजनों से मुलाकात भी की थी। संतोष पांडेय ने पूछा कि ऐसे लोग छत्तीसगढ़ में क्या करने गए थे? उन्होंने इस दौरान अटल बिहारी वाजपेयी की कविता ‘रग-रग हिन्दू मेरा परिचय’ की पंक्तियाँ भी पढ़ीं और कहा कि हिन्दू व हिंदुस्तान अलग नहीं हैं। संतोष पांडेय ने राहुल गाँधी पर पूरे हिंदुस्तान को बदनाम करने की कोशिश का आरोप लगाया।

उन्होंने पिछले 10 वर्ष में केंद्र सरकार द्वारा किए गए कार्यों और ‘मोदी है तो मुमकिन है’ नारे का जिक्र करते हुए कहा कि कश्मीर में असंभव को संभव किया गया। उन्होंने चेनाब नदी पर बने दुनिया के सबसे ऊँचे रेलवे पुल का जिक्र करते हुए कहा कि ये 8वाँ अजूबा है। उन्होंने कहा कि पहले सिर्फ ‘कश्मीर से कन्याकुमारी’ का नारा लगता था, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे सार्थक किया है। बता दें कि ये पुल एफिल टॉवर से भी 35 मीटर ऊँचा है। उन्होंने कोरोना महामारी के दौरान किए गए कार्यों का भी जिक्र किया।

संतोष पांडेय ने कहा कि उस दौरान विदेशी विशेषज्ञ कहते थे कि इतनी बड़ी जनसंख्या वाला भारत इस महामारी से कैसे निकलेगा, लेकिन पीएम मोदी ने वैक्सीन का निर्माण कराया, वैज्ञानिकों को प्रोत्साहन दिया, लोगों को राशन मुहैया कराया गया और 300 करोड़ टीके की डोज दी गई। उन्होंने कहा कि विपक्षी लोग विदेशी कंपनियों की वकालत कर रहे थे और स्वदेशी वैक्सीन का विरोध कर रहे थे। उन्होंने कहा कि ऐसे लोगों ने सेन्ट्रल विस्टा का भी विरोध किया। कोविड के दौरान PPE किट के निर्माण, ऑक्सीजन प्लांट्स के निर्माण और टेस्टिंग सेंटरों के निर्माण का जिक्र भी किया।

संतोष पांडेय ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के शासन को ‘अंत्योदय की सरकार’ बताते हुए कहा कि रक्षा, शिक्षा और पेयजल के क्षेत्र में भी इस सरकार ने सर्वांगीण उन्नति का कार्य किया था। संतोष पांडेय लगातार दूसरी बार राजनांदगाँव से सांसद बने हैं। उन्होंने कॉन्ग्रेस के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को 44,411 वोटों से हराया। 2019 में उन्होंने कॉन्ग्रेस के ही भोलाराम साहू को 1,11,966 मतों से परास्त किया था। अब उन्होंने संसद में राहुल गाँधी के हिन्दू-विरोध की बखिया उधेड़ी है।

छत्तीसगढ़ : जिस राम मंदिर का नक्सलियों ने किया ध्वंस, बंद करवा दी पूजा, 21 साल बाद वहाँ CRPF ने करवाई आरती: जवानों ने साफ-सफाई कर ग्रामीणों को सौंपा; Salute to CRPF

छत्तीसगढ़ में सीआरपीएफ जवानों ने मंदिर का करवाया पुन:निर्माण
छत्तीसगढ़ के सुकमा के केरलापेंदा गाँव में नक्सल आतंक के कारण 21 सालों से बंद पड़े हिंदू मंदिर को सीआरपीएफ के जवानों ने खोलकर, उसमें साफ सफाई करके उसे ग्रामीणों को सौंप दिया। इस दौरान मंदिर में पूजा आरती भी हुई।

सामने आई वीडियो में गाँव के बच्चों के साथ मिलकर सीआरपीएफ जवान मंदिर के पट को पानी से धो रहे हैं। इसके बाद वह अंदर रखी भगवान राम, माता सीता और लक्ष्मण जी की मूर्ति के आगे आरती भी करते हैं।

इस संबंध में सीआरपीएफ की 74वीं कोर के कमांडेंट हिमांशु पांडेय ने बताया कि सुकमा के लाखापाल में बीते 14 मार्च को सीआरपीएफ ने अपना कैंप लगाया था। लाखापाल में ही केरलापेंडा गाँव आता है।

सीआरपीएफ ने देखा कि गाँव में एक मंदिर टूटी-फूटी हालत में है। गाँव वालों से पूछा गया तो उन्होंने बताया कि ये मंदिर ऐतिहासिक है और यहाँ साल में एक बार मेला भी लगता था। इसके बाद नक्सलियों ने यहाँ पूजा-पाठ बंद करा दिया।

मंदिर के कपाट दोबारा खोले जाने पर ग्रामीणों ने अपनी खुशी जाहिर की है। बताया गया कि 2003 में नक्सलियों ने छत्तीसगढ़ के सुकमा स्थित इस मंदिर को तोड़-फोड़ दिया था। ग्रामीणों को धमकी दी गई थी कि इस मंदिर में कोई पूजा नहीं करेगा। हालाँकि अब सीआरपीएफ के जवानों के कारण इस मंदिर में दोबारा से पूजा पाठ शुरू होगी, यह देख गाँव के लोग बहुत खुश हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 1970 में राम मंदिर की स्थापना बिहारी महाराज द्वारा की गई थी। उस समय ग्रामीणों ने सिर पर सीमेंट, पत्थर, बजरी, सरिया लादा और सुकमा से लगभग 80 किलोमीटर दूर पैदल चलकर निर्माण सामग्री पहुँचाई थी। मंदिर का निर्माण हुआ तो रामभक्ति में पूरा क्षेत्र रम गया। धीरे-धीरे इलाके में मांसाहार, मदिरा का सेवन भी बंद हो गया।

बताया जाता है कि आज भी गाँव के 95 प्रतिशत लोग मांसाहार, मदिरापान का सेवन नहीं करते। ग्रामीणों ने बताया कि यहाँ कभी भव्य मेला भी लगता था। साधु-संन्यासी अयोध्या से आते थे, लेकिन नक्सल प्रकोप बढ़ने व नक्सलियों द्वारा पूजा-पाठ बंद करवा देने से मेला आयोजन बंद हो गया। नक्सलियों ने मंदिर को अपवित्र कर ताला लगा दिया।

मंदिर के कपाट दोबारा खुलने की खबर सोशल मीडिया पर देखने के बाद नेटिजन्स अपनी खुशी जाहिर कर रहे हैं। सीआरपीएफ के जवानों को आभार व्यक्त किया जा रहा है। लोग कह रहे हैं हमारी सेना और सीआरपीएफ देश और संस्कृति दोनों की रक्षा करती है।

‘हिंदू कोई धर्म नहीं, एक गाली… हिंदू का अर्थ चोर-डकैत-लुटेरा-गुलाम’: क्रिश्चियन मोर्चा , देवी-देवताओं पर भी अभद्र टिप्पणी

मंच से हिंदुओं के खिलाफ उगली गई आग (फोटो साभार : Youtube/Prasant Tirkey Vlogs)
छत्तीसगढ़ के जशपुर में जन जागृति सभा के नाम पर हिंदुओं, देवी देवताओं के खिलाफ जमकर आग उगली गई। इस सभा का आयोजन भारत मुक्ति मोर्चा, राष्ट्रीय क्रिश्चियन मोर्चा और राष्ट्रीय एकता परिषद की ओर से संयुक्त रूप से किया गया था। इस कार्यक्रम के वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं, जिसमें हिंदू देवी-देवताओं और हिंदुओं के खिलाफ जमकर आग उगली जा रही है। इस मामले में विहिप समेत तमाम हिंदूवादी संगठनों ने हस्तक्षेप करते हुए कार्रवाई की माँग की, जिसके बाद राष्ट्रीय क्रिश्चियन मोर्चा के 12 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज हुई है।

जानकारी के मुताबिक, जशपुर के कुनकुरी थाना इलाके में 27 फरवरी 2024 को इस सभा का आयोजन किया गया था। इस सभा के मंच से हिंदुत्व और ब्राम्हणों के खिलाफ अभद्र भाषा का इस्तेमाल करते हुए जमकर आग उगली गई। इस मामले में विश्व हिंदू परिषद के जिलाध्यक्ष करनैल सिंह ने हिंदू धर्म के खिलाफ अपमानजनक, अभद्र और गलत टिप्पणी करते हुए धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने की शिकायत दर्ज कराई। याचिका में कहा गया है कि आरोपितों ने अलग-अलग संप्रदाय और धर्म के लोगों के बीच शत्रुता और घृणा पैदा कर राष्ट्रीय अखंडता और संप्रभुता को धक्का पहुँचाया है।

मंच से हिंंदुओं और ब्राह्मणों के खिलाफ लोगों को भड़काते हुए कहा गया, “खुद को हिंदू कहना बंद करें। हिंदू कोई धर्म नहीं, हिंदू कहना गाली है। ये फारसी भाषा का शब्द है। जिसका अर्थ चोर, डकैत, लुटेरा, गुलाम होता है। जिस तरह से 3.5 परसेंट ब्राह्मणों के द्वारा हमें 4000 साल से गुलाम बनाए रखा जा रहा है, वैसे ही आज हमें हिंदू के नाम पर गुलाम बनाए रखने का काम किया जा रहा है।” इसे आप नीचे दिए गए वीडियो में 2.20 मिनट से सुन सकते हैं।

ईवीएम तोड़ने की भी अपील

इस सभा के मंच से लोकसभा चुनाव 2024 के दौरान लोगों से ईवीएम तोड़ने को भी कहा गया। इस दौरान एक वक्ता ने 2023 में हुए 3 राज्यों के विधानसभा चुनाव के परिणाम पर भी सवाल उठाए। वक्ताओं के विवादित बोल के वीडियो इंटरनेट पर शेयर किए जा रहे हैं।
मिस्टर सिन्हा नाम के एक्स यूजर ने इस घटना का वीडियो शेयर किया है, जिसमें उन्होंने इस मंच से बोले गए जहरीले बयानों को शेयर करते हुए छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णु देव साय से कार्रवाई की माँग की है।

12 लोगों के खिलाफ एफआईआर दर्ज

एसपी शशि मोहन सिंह ने कहा कि शिकायत और कार्यक्रम से जुड़े वीडियो की जाँच के बाद आयोजकों के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया गया है। कुनकुरी थाना पुलिस ने आरोपियों के खिलाफ धारा 153 (क), 153 (ख), 295(क), 505(2), 109, 294 के तहत मामला दर्ज कर लिया है। इस मामले में सुनील खलखो निवासी गोढ़ी थाना बागबहार, श्याम सुंदर मरावी निवासी कुनकुरी, मीरा तिर्की निवासी कांसाबेल, व्लासियुस तिग्गा निवासी अंबिकापुर, संजय सक्सेना निवासी कापू. रायगढ़, रेमिश तिर्की निवासी कांसावेल, दिनेश भगत निवासी नारियल डांड थाना कांसाबेल, हर्ष कुजूर निवासी पिराई थाना बगीचा, रूपनारायण एक्का निवासी जशपुर के साथ ही अज्ञात लोगों के खिलाफ भी मामला दर्ज हुआ है।

छत्तीसगढ़ : गरीबों के 125 प्रधानमंत्री आवास पर मुस्लिमों का कब्जा, मजार जैसा ढाँचा तैयार कर झाड़-फूँक

                          बिलासपुर का पीएम आवास के तहत बने मकान (साभार: दैनिक भास्कर)
छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत गरीबों के लिए बनवाए गए घरों पर अवैध कब्जा करने मामला सामने आया है। सामने आया है कि 125 से ज्यादा मकानों पर मुस्लिम समुदाय के लोग कब्जा करके उसमें अवैध रूप से रह रहे हैं। इतना ही नहीं, उन मकानों में गुंबद बनाकर उसे मस्जिद-मजार आदि का रूप दे दिया गया है और इसमें झाड़-फूँक का काम किया जा रहा है।

क्या टीवी पर बैठ रसगुल्ले जैसे मीठी और जलेबी की तरह घुमावदार बातों से भ्रमित करने वाले मौलाना और इस्लामिक विद्वान इन अवैध कब्जों के विरुद्ध कुछ बोलेंगे? क्या अवैध कब्ज़ा करने वालों को जगह खाली कर वास्तविक स्वामियों को मकान सौंपने आगे आएंगे या फिर बुलडोज़र आने पर victim card खेलने आएंगे? इन कट्टरपंथियों को मालूम होना चाहिए कि उनका victim card खेल भारत ही नहीं विश्व में बेअसर होना शुरू हो चुका है। इस victim card से षड़यंत्र नज़र आने लगा है। 

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, नगर निगम सीमा क्षेत्र के वार्ड संख्या 43 देवरीखुर्द में साल 2013 में हाउसिंग बोर्ड ने 400 प्रधानमंत्री आवास बनवाए थे। जिनके पास घर नहीं थे, उन परिवारों को 335 आवास आवंटित किए गए। बाकी बचे हुए 65 मकानों पर नगर निगम ने ताला लगा दिया था। इसके बाद धीरे-धीरे बाहरी लोग आए और इन 65 मकानों के ताले तोड़कर उसमें रहने लगे।

इतना ही नहीं, जिन 335 परिवारों को मकान आवंटित किए गए थे, उनमें से 60 परिवारों को डरा-धमकाकर उनके मकानों पर भी अवैध कब्जा कर लिया गया। इसके बाद इन मकानों में अवैध निर्माण करके उनमें गुंबद बनाकर इस्लामी पहचान दे दी गई। इसके साथ ही झाड़-फूँक का काम शुरू कर दिया गया। यहाँ झाड़-फूँक के जरिए रुहानी और जिस्मानी तकलीफों को दूर करने का दावा किया जाता है। 

                                     आवंटित मकान पर अवैध कब्जा (साभार: दैनिक भास्कर)

न्यूज 18 की रिपोर्ट में सामने आया है कि यहाँ के मकान नंबर 199 और 200 में मजारनुमा संरचना बनाकर झाड़-फूँक की जाती है। ये दोनों मकान शंकर धरु और सुखदेव के नाम पर आवंटित हैं। इन दोनों मकानों में कब्जा करके जाकिर खान रह रहा है। स्थानीय लोगों का कहना है कि यहाँ रोहिंग्या और बांग्लादेशी मुस्लिम भी पहुँचते हैं।

स्थानीय लोगों कहना है कि प्रधानमंत्री आवास के ज्यादातर मकानों को बेच दिया गया है। हालाँकि, इसके प्रावधान कहते हैं कि इन मकानों को बेचा नहीं जा सकता है। वहीं, ज्यादातर मकानों में लोग अवैध कब्जे करके रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यहाँ के 125 से अधिक मकानों पर अवैध कब्जा कर रखा गया है। यहाँ बाहरी लोगों की आवाजाही लगी रहती है।

हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी के अध्यक्ष बीपी सिंह कहना है कि प्रधानमंत्री आवास में पिछले कुछ सालों से मजार जैसा ढाँचा बना दिया गया है और उसकी आड़ में असामाजिक लोगों का जमावड़ा लगा रहता है। यहाँ तालापारा के लोग आकर शराबखोरी करते हैं। उन्होंने बताया कि देवरीखुर्द में बांग्लादेश और उत्तर प्रदेश के लोग रह रहे थे, लेकिन उनका वेरीफिकेशन तक नहीं किया गया है।

बीपी सिंह ने कहा कि यहाँ बहुत सारे ऐसे लोग हैं, जिनके पास न तो वोटर आईडी कार्ड है और न ही राशन कार्ड है। उन्होंने कहा कि नगर निगम प्रशासन से यहाँ रहने वाले लोगों का सत्यापन करने और अवैध रूप से रहने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई करने की माँग की गई है। उन्होंने यह भी कहा कि प्रशासन से मजार को हटाने के लिए भी कई बार माँग की जा चुकी है।

मामले ने जब तूल पकड़ा तो नगर निगम के कार्यपालक अभियंता सुरेश बरूआ ने कहा कि देवरीखुर्द के प्रधानमंत्री आवास में अवैध निर्माण की जानकारी उन्हें मिली है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री आवास के निर्माण में बदलाव करना गलत है। इस मामले में कब्जाधारियों को नोटिस जारी करके अवैध निर्माण तोड़ने की कार्रवाई की जाएगी।

इतना ही नहीं, यहाँ लव जिहाद का मामला भी सामने आ चुका है। यहाँ 13 साल की एक किशोरी को इमरान नाम के एक शख्स ने झाँसा देकर उत्तर प्रदेश भगा ले गया था। हालाँकि, हिंदू संगठनों के प्रयास के बाद पुलिस ने बच्ची 10 फरवरी 2024 को बरामद कर लिया। इस मामले में पुलिस FIR दर्ज करके मामले की जाँच कर रही है। वहीं, आरोपित इमरान फिलहाल फरार है।

कांग्रेस को छोड़ NOTA से भी पिछड़ गईं I.N.D.I. गठबंधन की पार्टियाँ

मोदी-योगी को हटाने जो विपक्ष ने I.N.D.I.alliance का गठन कर एकजुट होने का प्रयास हुआ, उतनी ही तेजी से इसके निष्फल  होने की अटकलें चल रही है, जो अभी संपन्न हुए 5 राज्यों में हुए चुनावों में नज़र आ गया है। विपक्ष(गैर-कांग्रेस) इस बात से शायद से अज्ञान या अज्ञान होने का ड्रामा कर रहे हैं कि कांग्रेस मुस्लिम वोट बैंक को वापस अपनी झोली में रखने में व्यस्त है। कर्नाटक और तेलंगाना में कांग्रेस का यह प्रयोग सफल रहा, जो गठबंधन में शामिल अन्य पार्टियों के लिए बहुत नुकसानदायक सिद्ध होने वाला है, क्योकि सभी तुष्टिकरण अपनाते हुए मुस्लिमों को रिझाने में दिन-रात लगी रहती हैं, लेकिन उसी वोटबैंक को कांग्रेस अपने पाले में रख इन सबके नीचे से चादर खींच रही है।   
आम आदमी पार्टी (AAP) के नेताओं को एक तरफ अदालत से जमानत नहीं मिल रही है। वहीं जनता की अदालत में भी उसकी जमानत जब्त हो रही है। घोटालों और भ्रष्टाचार में AAP नेता सत्येंद्र जैन, मनीष सिसोदिया और संजय सिंह जेल में बंद हैं और उन्हें अदालत से जमानत नहीं मिल रही है। वहीं पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में AAP ने 200 से ज्यादा सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे थे और जनता की अदालत में भी उसके नेताओं की जमानत जब्त हो गई। यहां तक कि NOTA से भी कम वोट मिले हैं। राष्ट्रीय पार्टी होने का दंभ भरने वाली आम आदमी पार्टी ने राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनावों में अपनी किस्मत आजमाया, लेकिन वह एक भी सीट जीत नहीं पाई बल्कि उसके उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई। इससे पहले 2022 में हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में उसने 67 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे और सभी की जमानत जब्त हो गई थी। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में कई रैलियां और रोड शो किए और चुनाव प्रचार में मुफ्त बिजली, शिक्षा देने जैसे कई प्रलोभन दिए। लेकिन इन रेवड़ी के झांसे को जनता ने नकार दिया। 

केजरीवाल की रैलियां और रोड शो काम नहीं आई, मुंह की खानी पड़ी
इसी साल राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा प्राप्त करने वाली आम आदमी पार्टी ने मध्य प्रदेश छत्तीसगढ़ और राजस्थान में पूरे दमखम से चुनाव लड़ा। पार्टी के मुखिया और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने पंजाब के सीएम भगवंत मान के साथ में कई रैलियां और रोड शो किए थे। बावजूद इसके आप को इन चुनावों में मुंह की खानी पड़ी है।

चुनावों में केजरीवाल की रेवड़ी काम नहीं आई
केजरीवाल ने दिल्ली-पंजाब की तरह इन राज्यों में भी मुफ्त बिजली-पानी और शिक्षा का वादा किया था। लेकिन इसका भी कोई फायदा नहीं मिला। एक तरह से जनता ने रेवड़ी कल्चर को नकार दिया। तीनों राज्यों में चुनावी दांव खेलते हुए पार्टी के संयोजक एवं दिल्ली सीएम अरविंद केजरीवाल ने रैलियों में फ्री बिजली देने की बात कही थी। राजस्थान में एक रैली में उन्होंने कहा था कि एक मौका दें 300 यूनिट बिजली मुफ्त देंगे। सभी कच्चे टीचर्स को पक्का करेंगे। पूरा इलाज फ्री करने की व्यवस्था करेंगे। शहीद सम्मान राशि एक करोड़ की जाएगी। सभी कच्चे कर्मचारियों को पक्का किया जाएगा। सभी बच्चों के लिए रोजगार की व्यवस्था की जाएगी। लेकिन केजरीवाल की ये रेवड़ियां काम नहीं आई।

मुफ्त बिजली, शिक्षा समेत अन्य प्रलोभन का फायदा नहीं मिला
आम आदमी पार्टी ने मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ तीनों राज्यों में जमकर चुनाव प्रचार किया था। पार्टी संरक्षक एवं दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने चुनाव प्रचार में मुफ्त बिजली, शिक्षा देने समेत कई प्रलोभन दिए। इन प्रलोभन का लाभ जैसे उसको पंजाब, गोवा में मिला, उसके उलट राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ में खाता तक नहीं खुला। पिछले साल हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी आप को सिर्फ 1.1 प्रतिशत वोट मिला था।

मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान में वोट शेयर 1 प्रतिशत से कम रहा
केजरीवाल गुजरात विधानसभा चुनाव के बाद मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान में भी पार्टी की वोट शेयर बढ़ाने पर काम कर रहे थे, लेकिन इस बार AAP की उम्मीदों पर पानी फिर गया है। 2022 में हुए गुजरात चुनाव में जहां AAP का वोट शेयर करीब 13 प्रतिशत रहा था वहीं 2023 में राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ के चुनावों में उसे 1 प्रतिशत से भी कम वोट मिला है। मध्य प्रदेश में उसे 0.44 प्रतिशत,राजस्थान में 0.37 प्रतिशत और छत्तीसगढ़ में 0.93 प्रतिशत वोट मिला। इससे साफ जाहिर है कि आम आदमी पार्टी से जनता का मोहभंग हो चुका है और अब लोग रेवड़ी के लालच में फंसने वाले नहीं हैं।

मध्य प्रदेश में AAP के सभी 70 प्रत्याशियों की जमानत जब्त
मध्य प्रदेश की 70 सीटों पर प्रत्याशियों को उतारने वाली आम आदमी पार्टी को एक भी सीट पर जीत नहीं मिली। यहां पार्टी की जमानत जब्त हो गई है। मध्य प्रदेश की दमोह सीट से आम आदमी पार्टी ने चाहत पांडेय को चुनावी मैदान में उतारा था। चाहत पांडेय एक टीवी एक्ट्रेस हैं और एमपी के दमोह की ही रहने वाली हैं। इन्होंने इसी साल जून में आम आदमी पार्टी ज्वॉइन की थी। चाहत पांडेय का जादू भी नहीं चल पाया और उन्हें हार का सामना करना पड़ा। वह 2292 वोट पाकर पांचवे नंबर पर रही। दमोह से बीजेपी प्रत्याशी जयंत मलैया ने जीत हासिल की है।

राजस्थान में 88 सीटों पर जमानत जब्त
राजस्थान में आम आदमी पार्टी पहली बार 88 सीटों पर चुनाव लड़ रही थी। सभी सीटों पर उसका बुरा हाल रहा है। सीकर में केजरीवाल ने चुनाव से ठीक पहले रोड शो किया था और AAP ने दावा किया था कि 50,000 लोग इकट्ठा हुए थे, AAP को वहां कुल 2.25 लाख वोटों में से केवल 555 वोट मिले। सीकर में नोटा को 695 वोट मिला। सीकर में आम आदमी पार्टी नोटा से भी कम रही। आम आदमी पार्टी ने राजस्थान की उन सभी 88 सीटों पर जमानत खो दी, जहां उन्होंने चुनाव लड़ा था।

अवलोकन करें:-

AAP ने उतारे 215 उम्मीदवार, मिली 0 सीट, 1% वोट भी नहीं मिला

छत्तीसगढ़ में 57 सीटों पर जमानत जब्त
छत्तीसगढ़ में आम आदमी पार्टी ने 57 उम्मीदवारों को चुनाव मैदान में उतारा था। लेकिन यहां भी जमानत नहीं बचा सके। छत्तीसगढ़ में AAP को 0.93 प्रतिशत वोट मिला।