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तेलंगाना : कांग्रेस की हिटलरशाही, आलोचना करने वालों पर आतंकवाद वाला कानून क्यों? संविधान और लोकतंत्र का रोना-रोने वाले राहुल गाँधी चुप क्यों?


इमरजेंसी में जिस तरह प्रेस और अभिव्यक्ति की आज़ादी पर तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने गला घोंटा था उसका तेलंगाना कांग्रेस सरकार द्वारा जीवंत उदाहरण पेश कर रही है। फिर शोर मचाते हैं मोदी सरकार में लोकतंत्र और संविधान खतरे में हैं। जनता को गुमराह करती है कांग्रेस। हकीकत में  लोकतंत्र और संविधान कांग्रेस राज में ही खतरे में रहे हैं। अपने राज में कांग्रेस ने संविधान में इतने ज्यादा संशोधन कर संविधान की मूलभावना को ही चकनाचूर कर दिया। सुप्रीम कोर्ट तक चुपचाप बैठे देखती रही।  

कांग्रेस पार्टी और राहुल गाँधी राष्ट्रीय स्तर पर खुद को अभिव्यक्ति की आजादी का सबसे बड़ा चैंपियन बताते हैं। वे अक्सर भाजपा सरकार पर ‘आवाज दबाने’ का आरोप लगाते हैं, लेकिन तेलंगाना में उनकी अपनी सरकार का रवैया कुछ और ही कहानी बयाँ कर रहा है। तेलंगाना की रेवंत रेड्डी सरकार अब सोशल मीडिया पर आलोचना करने वालों के खिलाफ देश के सबसे कड़े कानून ‘यूएपीए’ (UAPA) का इस्तेमाल कर रही है।

X हैंडल पर UAPA लगाने का क्या है पूरा मामला?

दरअसल, तेलंगाना पुलिस के इंटेलिजेंस विभाग के डीआईजी (CI Cell) आर. भास्करन का एक आधिकारिक पत्र सामने आया है। 18 अप्रैल 2026 को जारी इस पत्र में एक्स कॉर्प (X Corp) को संबोधित करते हुए एक ट्विटर हैंडल @TeluguScribe के खिलाफ कार्रवाई की माँग की गई है। इस पत्र में भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 94 और गैरकानूनी गतिविधियाँ (रोकथाम) अधिनियम (UAPA) की धारा 43F का हवाला दिया गया है।

पुलिस ने अपने आधिकारिक पत्र में लिखा, “हम आपसे इस विशिष्ट एक्स (X) खाते से संबंधित निम्नलिखित विवरण प्रदान करने का अनुरोध करते हैं: खाता पंजीकरण की जानकारी, उपयोग लॉग और गतिविधि विवरण, तथा कोई भी अन्य प्रासंगिक डेटा जो हमारी जाँच में सहायता कर सके। यह जानकारी मामले की गहन जाँच के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।”

आलोचना पर आतंकवाद वाला कानून क्यों?

हैरानी की बात यह है कि UAPA जैसा सख्त कानून, जो आमतौर पर आतंकवाद और देश विरोधी गंभीर गतिविधियों को रोकने के लिए बनाया गया है, उसे महज कुछ ट्वीट्स के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। पत्र के अनुसार, उक्त हैंडल पर आपत्तिजनक भाषा और कथित तौर पर ‘पब्लिक फिगर’ की छवि खराब करने वाले ट्वीट किए गए थे। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या किसी सरकार या नेता की आलोचना करना अब आतंकवाद की श्रेणी में आता है?

कांग्रेस और मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी पर उठते सवाल

मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी के नेतृत्व वाली सरकार द्वारा इस कार्रवाई से कांग्रेस के दोहरे चरित्र को उजागर करती है। एक तरफ राहुल गाँधी ‘संविधान बचाने’ और ‘बोलने की आजादी’ का नारा देते हैं, वहीं दूसरी तरफ उनकी सरकार असहमति की आवाज को कुचलने के लिए UAPA जैसे दमनकारी प्रावधानों का सहारा ले रही है।

इस मामले को देखें तो साफ है कि तेलंगाना में सत्ता मिलते ही कांग्रेस की ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ वाली परिभाषा बदल गई है। क्या रेवंत रेड्डी सरकार इतनी डर गई है कि उसे साधारण ट्वीट्स से राज्य की सुरक्षा को खतरा महसूस होने लगा है? यह सीधे तौर पर लोकतंत्र में विपक्ष और जनता की आवाज को खामोश करने की एक तानाशाही कोशिश नजर आती है।

हरामफरमोश सलमान रुश्दी को उसके ही toolkit ‘दोस्त’ कर रहे गुमराह, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भारत में कम नहीं हुई है : इतिहास के ‘सच’ को सामने लाना छेड़छाड़ नहीं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और सलमान रुश्दी ( फोटो साभार-toi)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘कट्टरपंथियों में भी कट्टरपंथी’ और मोदी समर्थकों को टोडीज करने वाले सलमान रुश्दी एक बार फिर भारत सरकार पर ‘आजादी’ के नाम पर अमेरिका में बैठ कर आलोचना कर रहे हैं। उनका कहना है कि उनके ‘दोस्तों’ से भारत में ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ को लेकर बात होती है, तो पता चलता है कि उनके बोलने की आजादी सीमित है।

रुश्दी मियां जब 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' नहीं होने पर इतना बहुत कुछ मोदी के खिलाफ इतनी बकवासें की जा रही है। फिर भी बकवास करते हो 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' नहीं शर्म करो। किसी भी विदेशी मेहमान के भारत पर toolkit मैदान में आकर उपद्रव करता है। अगर यही काम तुम्हारे किसी मुस्लिम मुल्क होता हंगामा करने वालों का पता भी नहीं चलता। 

लेकिन उनके दोस्त ये नहीं बताते हैं कि भारत में ‘प्रेस की आजादी’ और ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ ही है कि मोदी सरकार के हर काम पर संसद के अंदर और बाहर बहस होती है। टीवी डिबेट होते हैं और हर किसी को बोलने की आजादी होती है। सोशल मीडिया मोदी विरोधियों के पोस्ट से भरा रहता है। देश में हर बुरे काम के लिए मोदी को जिम्मेदार बताया जाता है। 

यही वजह है कि बिहार चुनाव से पहले जब दिल्ली ब्लास्ट हुआ तो लोगों ने इसे आतंकी घटना मानने में मुँह सिल लिए। कई दिनों तक मुस्लिम आतंकी मॉड्यूल को लेकर खुलासे हुए। एनआईए ने कई सबूत रखे और 3000 किलो अमोनियम नाइट्रेट जमा करने के सबूत दिये, एके-47 जैसे हथियार बरामद किए। लेकिन कांग्रेस और आरजेडी ने तो इसे चुनाव में वोट पाने के लिए ध्रुवीकरण कह कर गला फाड़ते ही रहे, बाकी विपक्षी पार्टियों ने भी उनका साथ दिया। इस मामले का पूरा खुलासा होने के बावजूद किसी भी पार्टी ने माफी नहीं माँगी।

पीएम मोदी ने खुद कहा है कि उनके हर काम को सांप्रदायिकता के नजरिए से देखा जाता है और आलोचना की जाती है। प्रधानमंत्री मोदी की हर सामाजिक कल्याण की योजनाएँ सभी धर्मों और जातियों के लिए है। ऐसा नहीं है कि किसी को नाम, जाति, धर्म के आधार पर रोका जाता है। लेकिन देश से घुसपैठियों को हटाने को लेकर अगर मोदी सरकार गंभीर है तो इसमें आपत्ति क्या है।

क्या देश से रोहिंग्या और बांग्लादेशी घुसपैठियों को निकालना गलत है? देश में साजिश के तहत डेमोग्राफी बदलाव हो रहा है। हिमाचल, उत्तराखंड जैसे पहाड़ी राज्यों से लेकर सीमावर्ती इलाकों में डेमोग्राफी बदलने की कोशिश हो रही है। इन पर एक्शन लेना क्या गलत है।

पीएम मोदी ने 2022 में हटवाई थी बैन

‘द सैटेनिक वर्सेज’ के बाद विवादों में आए लेखक सलमान रुश्दी की किताब 36 साल बाद पीएम मोदी ने ही बैन हटवाई थी। पूर्व पीएम राजीव गाँधी की सरकार ने साल 1988 में इस पर मौखिक तौर पर प्रतिबंध लगाया था। उस वक्त कांग्रेस सरकार प्रचंड बहुमत के बाद भी मुस्लिम वोट बैंक की खातिर मौखिक तौर पर प्रतिबंध लगा दिया था। लेकिन पीएम मोदी ने कुछ मुस्लिम संगठनों जैसे ऑल इंडिया उलेमा बोर्ड के विरोध के बावजूद द सेटनिक वर्सेज से प्रतिबंध उठा लिया। इसके बाद इस किताब की भारत में जबरदस्त बिक्री हुई।

भारत में मौखिक तौर पर प्रतिबंध का ये कारनामा कांग्रेस सरकार ने किया था, जिसे कोर्ट में चुनौती दी गई थी। सरकार कोर्ट में यह साबित नहीं कर पाई कि इस किताब पर कभी प्रतिबंध भी लगा था। इसके बावजूद रुश्दी जैसे बुद्धिजीवियों को कॉन्ग्रेस ‘लोकतांत्रिक’ नजर आती है।

क्या कहा सलमान रुश्दी ने

ताजा मामला सलमान रुश्दी के एक इंटरव्यू के बाद सामने आया है। इसमें उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी पर एक बार फिर ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ पर प्रतिबंध लगाने का आरोप लगाया है। ये इंटरव्यू ब्लूमबर्ग में 5 दिसंबर 2025 को छपा है। ये इंटरव्यू मिशल हुसैन ने लिया है।

इंटरव्यू में पीएम मोदी को लेकर पूछे गए सवाल पर सलमान रुश्दी ने कहा है कि पत्रकार, लेखक, बुद्धिजीवी, प्रोफेसर जैसे लोग भारत में परेशान हैं क्योंकि उन्हें पूरी ‘आजादी’ नहीं है।

ये पहला मौका नहीं है जब सलमान रुश्दी ने पीएम मोदी की आलोचना की हो। 2014 से पीएम बनने के बाद से उन्होंने कई मौकों पर पीएम मोदी की आलोचना की है। यहाँ तक प्रधानमंत्री बनने की संभावना पर चिंता जताई थी और कहा था कि बीजेपी के नेतृत्व वाली सरकार में जनता की अभिव्यक्ति औ साहित्यिक गतिविधियों की आजादी खतरे में पड़ जा सकती है।

रुश्दी के मुताबिक उनके कई दोस्त, जो भारत में ही रहते हैं, उनसे बात होती है और ये जानकारी उन्होंने दी है। इस दौरान उन्होंने नायपॉल का जिक्र किया और कहा कि मोदी सरकार इतिहास से छेड़छाड़ कर रही है।

उन्होंने कहा कि मौजूदा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना करने वालों का कहना है कि उनकी सरकार ने लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर किया है और प्रेस, सिविल सोसाइटी ग्रुप्स और राजनीतिक विरोधियों पर कार्रवाई की है। फिर भी, चुनाव होते हैं, भारतीय मीडिया आउटलेट्स को पब्लिश करने के लिए परमिशन की जरूरत नहीं होती है और बुनियादी अधिकारों की संवैधानिक गारंटी लागू रहती है।

रुश्दी के मुताबिक, ऐसा लगता है कि देश का इतिहास फिर से लिखने की इच्छा है, असल में हिंदुओं को अच्छा, मुसलमानों को बुरा कहना गलत है। यह विचार कि भारत एक हिंदू सभ्यता है जो मुसलमानों के आने से घायल हो गई है। इसे साबित करने के लिए बहुत एनर्जी लगी है। वी.एस. नायपॉल ने एक बार इसे ‘घायल सभ्यता’ कहा था।

सलमान रुश्दी उन पत्रकारों में शामिल हैं जिन्होंने ‘डिवाइन इन चीफ ‘ लिखने वाले पत्रकार आतिश तासीर की OCI रद्द करने पर मोदी सरकार को पत्र लिखा था।

दादरी हत्याकांड और पाकिस्तानी गायक गुलाम अली के भारत में विरोध जैसी घटनाओं पर नाराज होकर अशोक वाजपेयी और नयनतारा सहगल समेत 40 साहित्यकारों ने अपना सम्मान लौटाया, तो सलमान रुश्दी ने भी उनका साथ दिया और सरकार के खिलाफ विरोध दर्ज कराया।

मोदी सरकार के खिलाफ जब भी मौका मिला, रुश्दी ने अपनी आवाज बुलंद की। मोदी विरोधी हर प्रोपेगेंडा का उन्होंने समर्थन किया। फिर भी ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ की कमी उन्हें भारत में नजर आती है। मोदी सरकार में भारत में बोलने की आजादी इतनी है कि हर कोई अपनी बात बेखौफ कह सकता है, चाहे वह मोदी समर्थक हो या मोदी विरोधी।

हिन्दुओं-सनातन को गाली देने वाले वजाहत खान को सुप्रीम कोर्ट ने लताड़ा, कहा- बोलने की आजादी दूसरे के अपमान के लिए नहीं: सारी FIR एक साथ करने से भी किया इनकार

            हिंदूओं को गालियाँ देने वाले वजाहत खान को सुप्रीम कोर्ट ने लगाई फटकार (साभार: ऑपइंडिया अंग्रेजी)
सुप्रीम कोर्ट ने हिन्दुओं को गाली देने वाले वजाहत खान को जमकर फटकारा है। कोर्ट ने कहा है कि आजादी का दुरुपयोग नहीं करें। कोर्ट ने कहा कि सोशल मीडिया पर हो रहे अभिव्यक्ति की आजादी के गलत इस्तेमाल से मुकदमेबाजी बढ़ रही है। इससे न्यायिक सिस्टम धीमा पड़ जाता है और कई तरह की अड़चनें पैदा होती है।

अगर सुप्रीम कोर्ट इसी तरह सख्ती से इन जेहादियों और इनकी पैरवी करने वकीलों के साथ पेश आएगी, सनातन को अपमानित करने को नसीहत नहीं मिलेगी। क्योकि हिन्दू भी अपना संयम तोड़ने की सीमा के पास पहुँचने को आतुर है। नेताओं, उनकी पार्टियों  और जेहादियों ने सनातन को अपमानित कर अपने वोटबैंक को खुश करने की कसम खाई हुई है तो दूसरी तरफ हिन्दू भी इन लोगों के विरुद्ध लामबंद होना शुरू हो चुका है। जिस दिन हिन्दू इन लोगों के खिलाफ सड़क पर आ गया कोई सनातन विरोधी घर से बाहर निकलने की हिम्मत कर पाएगा, इस बात का इतिहास साक्षी है।   

वजाहत की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने लगायी फटकार

न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति केवी विश्वनाथन की पीठ वजाहत खान की अर्जी पर सुनवाई कर रही थी जिसमें भड़काऊ सोशल मीडिया पोस्ट को लेकर चार राज्यों में दायर आपराधिक मामलों को एक साथ जोड़ने का आग्रह किया गया था। लेकिन कोर्ट ने इस पर कोई फैसला नहीं किया है।

अभिव्यक्ति की आजादी के साथ कर्तव्यों का करें पालन

कोर्ट ने वजाहत खान की सोशल मीडिया पर किए गये टिप्पणियों की आलोचना की और कहा कि सभी नागरिकों के लिए जरूरी है कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का इस्तेमाल करते समय संयम बरतें।
लोग अपने अधिकारों का इस्तेमाल तो कर रहे हैं लेकिन भाईचारा और सम्मान सुनिश्चत करने के लिए अपने कर्तव्यों की ओर ध्यान नहीं दे रहे हैं।
न्यायमूर्ति बी.वी. नागरत्ना ने कहा, “अभिव्यक्ति की आजादी एक बहुत ही अहम मौलिक अधिकार है। लेकिन अगर इस स्वतंत्रता का दुरुपयोग होता है, तो इससे मुकदमेबाजी होती है और अदालतें जाम हो जाती हैं।”

 कोर्ट में वजाहत खान के वकील ने खान के माफी माँग लेने की बात कही। उन्होंने कहा, “मेरे आचरण के लिए कोई बहाना नहीं है। मुझे वही गलती दोहराने का कोई अधिकार नहीं है जिसका आरोप मैंने दूसरों पर लगाया था। ये ट्वीट पुराने थे और कुछ बातों की प्रतिक्रिया में थे। मैंने पहले ही माफ़ी मांग ली है।”

वजाहत की शिकायत पर पनौली हुई थी गिरफ्तार

वजाहत खान की शिकायत पर ही ऑपरेशन सिंदूर को लेकर मुस्लिम समुदाय के खिलाफ भड़काऊ पोस्ट करने पर सोशल मीडिया इफ्लुएंसर शर्मिष्ठा पनोली को पश्चिम बंगाल पुलिस ने गिरफ्तार किया था। शर्मिष्ठा की गिरफ्तारी के बाद बंगाल पुलिस ने वजाहत के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज कर उसे गिरफ्तार किया था।
जहाँ एक ओर शर्मिष्ठा को दो हफ्ते तक जेल में रखने के बाद भी उसकी बेल को नामंजूर कर दिया गया था। वहीं वजाहत ने उसकी गिरफ्तारी का जश्न मुस्लिम समुदाय के साथ मनाया था।
वजाहत के सोशल मीडिया पर हिंदू धर्म के देवी-देवताओं के खिलाफ अपमानजनक पोस्ट दिखा थे। इसके बाद लोगों ने उसकी गिरफ्तारी की माँग की थी। अपने सोशल मीडिया पोस्ट में वजाहत ने लिखा था “कामाख्या देवी मंदिर में ब्राह्मण को अन्य हिंदुओं से कटी हुई योनि की पूजा करवानी पड़ती है। इसमें अंतर करना बहुत मुश्किल है कि यह अंधभक्ति है या कोई मानसिक बीमारी।”

हिन्दुओं को दी थी वजाहत ने गाली

हिंदूओं को गाली देते हुए वजाहत ने एक पोस्ट में लिखा था “तुझ जैसी रं* पेट की औलाद रसूल के बारे में मेरी बात करे ये जेब नहीं देता…तू इसकी बात कर, तेरा कृष्णा कैसा रंगीला था देख…सच्चाई देख वहम में मत जी…झं$% सा&% तूने जो भी कहा वो सब तो झूठ और बहुत है लेकिन ये तेरे ही किताब का है सच पढ़, सु& के पि%$”
इंस्टाग्राम पर एक आपत्तिजनक टिप्पणी करते हुए उसने लिखा “अबे भो, ब… अपनी बहन से जाकर सीख तेरा धर्म ला, तेरा धर्म जो तेरी बहन कोठे में बैठ कर सिखाती है… या फिर वही धर्म तेरे घर पे आकर सिखाती है, चु कर ब*… अपनी बीवी को तुझ जैसा संघी काम चो है दूसरे के लिए चो* देता है और अपनी बहन चो* है… ब… सुन रं पेट का जाना… मेरे अबाओ अजदाद कन्वर्ट हुए भी ते ना तो हमें उनपर फक्र है…के गंदा धर्म शैतानों का पूजा करने वाला, लिंग का पूजा करने वाला धर्म चो* कर… पाक साफ धर्म अपना और हक धर्म अपना…फखर है उनपे…जा तू लिंगम पूजा कर…लौ*
उसने ट्वीट किया था “एक हिंदू अपनी साली को अंग-अंग पर रंग लगाते हुए और अपने दोस्तों को भी उसके साथ ऐसा करने का निमंत्रण देते हुए…हिंदू.. यहीं है इनकी असलियत… बलात्कारी संस्कृति।”
अवलोकन करें:- 
एक अन्य पोस्ट में उसने लिखा था, “नहीं वो उसकी बात कर रहा है जिसकी 16108  रखैलों के साथ रंग रसिया मनाता था…या चुपके-चुपके लड़कियों को नहाते हुए देखता था..”
ऐसे ही उसने एक पोस्ट में लिखा था, “मेरे पास तुम्हारे लिए कुछ है… पहले अपने धर्म के बारे में पढ़ो। मूत्र पीने वाले बदमाश”

शर्मिष्ठा पर जिस मुस्लिम संगठन ने करवाई FIR, उसके पाकिस्तान में लिंक: कराची में भी है ऑफिस; शर्मिष्ठा पनौली को डच सांसद गीर्ट वाइल्डर्स का समर्थन, गिरफ्तारी को बताया ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ पर धब्बा: नुपुर शर्मा मामले में भी खुलकर आए थे आगे

                                               शर्मिष्ठा को पश्चिम बंगाल पुलिस ने गिरफ्तार किया है
कोलकाता पुलिस ने गुरुग्राम से 22 साल की लॉ स्टूडेंट शर्मिष्ठा पनौली को ऑपरेशन सिंदूर पर सांप्रदायिक सोशल मीडिया पोस्ट के लिए गिरफ्तार किया। इस मामले में अब नीदरलैंड के सांसद गीर्ट वाइल्डर्स ने शर्मिष्ठा का समर्थन किया है। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से अपील की कि शर्मिष्ठा के अधिकारों की रक्षा करें।

वाइल्डर्स ने एक्स पर लिखा, “शर्मिष्ठा को गिरफ्तार करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर धब्बा है। उन्हें पाकिस्तान और मुहम्मद के बारे में सच बोलने की सजा न दी जाए।” उनके पोस्टर में लिखा था, “All eyes on Sharmistha”।

वाइल्डर्स ने 2022 में भी बीजेपी की नूपुर शर्मा का समर्थन किया था। उन्होंने कश्मीर के रियासी में हिंदुओं पर हुए हमले के विरोध में भी पक्ष लिया था।

शर्मिष्ठा ने एक वीडियो में बॉलीवुड सितारों की ऑपरेशन सिंदूर पर चुप्पी की आलोचना की थी, जिसमें कथित तौर पर आपत्तिजनक टिप्पणियाँ थीं। वीडियो वायरल होने के बाद उन्होंने माफी माँगी और इसे हटा लिया, लेकिन कोलकाता में शिकायत दर्ज हो गई। इस दौरान इस्लामी कट्टरपंथियों ने उन्हें रेप और ‘सर तन से जुदा’ जैसी धमकियाँ दी, लेकिन कोलकाता पुलिस ने इस्लामी कट्टरपंथियों की जगह शर्मिष्ठा को ही गिरफ्तार कर लिया।

शर्मिष्ठा पर जिस मुस्लिम संगठन ने करवाई FIR, उसके पाकिस्तान में लिंक: कराची में भी है ऑफिस

ऑपरेशन सिंदूर के बाद पाकिस्तान के खिलाफ टिप्पणी करने वाली शर्मिष्ठा पनोली को पश्चिम बंगाल पुलिस ने गिरफ्तार किया है। यह गिरफ्तारी पश्चिम बंगाल के एक मुस्लिम संगठन ने करवाई है। शर्मिष्ठा पनोली पर इस्लाम के खिलाफ बोलने का आरोप कथित तौर पर लगाया गया है। इस बीच शर्मिष्ठा की मदद को एक हिन्दू संगठन आगे आया है।

श्री राम स्वाभिमान परिषद नाम के इस हिंदू संगठन ने 22 वर्षीय इन्फ्लुएंसर का समर्थन किया है। मीडिया से बात करते हुए इस संगठन के सचिव सूरज कुमार सिंह ने कहा कि जिस मुस्लिम संगठन ने शर्मिष्ठा के खिलाफ FIR दर्ज करवाई है, उसका एक कार्यालय पाकिस्तान के कराची शहर में है।

सिंह ने दावा किया है कि स्काई फाउंडेशन नामक संगठन के कुछ सदस्यों ने कोलकाता में शर्मिष्ठा के खिलाफ FIR दर्ज कराई और उनकी गिरफ्तारी की माँग की थी। उन्होंने कहा कि फाउंडेशन के सदस्यों ने यह भी धमकी दी थी कि अगर पुलिस शर्मिष्ठा के खिलाफ कार्रवाई नहीं करती है तो वे कानून अपने हाथ में ले लेंगे और उन्हें मार डालेंगे।

सूरज सिंह ने एक वीडियो दिखा कर यह भी दावा किया है कि स्काई फाउंडेशन के लोगों ने शर्मिष्ठा के गिरफ्तार होने के बाद कोर्ट में जश्न मनाया। उन्होंने शर्मिष्ठा के साथ कुछ होने का जिम्मेदार ममता सरकार को करार दिया है।

शर्मिष्ठा के खिलाफ लगातार इस्लामी कट्टरपंथी सोशल मीडिया पर अभियान चला रहे थे। इसके बाद कोलकाता में दर्ज एक FIR के चलते उन्हें गुरुग्राम से 30 मई, 2025 को पश्चिम बंगाल पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। शर्मिष्ठा को 14 दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया है।

शर्मिष्ठा को गिरफ्तार किए जाने की आलोचना आंध्र प्रदेश के डिप्टी सीएम पवन कल्याण और कॉन्ग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने भी की है। गौरतलब है कि शर्मिष्ठा ने अपने वीडियो के बाद माफ़ी भी माँग ली थी, इसके बाद भी पश्चिम बंगाल पुलिस उन्हें गिरफ्तार कर ले गई।

मनमोहन सिंह के समय ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ = मंत्री बनाने-हटाने वाले + मुफ्त विदेश यात्रा करने वाले एलीट पत्रकारों का इकोसिस्टम जब सरकारों को निर्देश देता था

                                              मनमोहन सिंह  के साथ जहाजों में घूमते पत्रकार 
पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह नहीं रहे। ईश्वर उनकी आत्मा को सद्गति दें। उनके जाने के बाद कमोबेश हर तबका उन्हें अच्छे शब्दों में याद कर रहा है, जो डॉक्टर साहब के सौहार्द्रपूर्ण व्यक्तित्व के लिए उचित भी है। मनमोहन सिंह को याद करने वाले पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और एक्टिविस्ट किस्म के लोगों के शोक संदेश में एक खास पैटर्न देखने को मिला है।

जैसे कि ‘हमने मनमोहन सिंह को JNU में काले झंडे दिखाए थे, हम उनके साथ विदेश यात्रा पर गए, संसद की कैंटीन या किसी पार्टी में चाय पर मिले, वे रेगुलर प्रेस कॉन्फ्रेंस करते थे, हमारे मुश्किल सवाल पर सिंह साहब नाराज नहीं हुए’ वगैरह-वगैरह।

इसका निष्कर्ष यह निकाला जाता है कि मनमोहन सिंह अभिव्यक्ति की आजादी के बहुत बड़े पैरोकार थे, लेकिन क्या यह वाकई अभिव्यक्ति की आजादी थी? या फिर यह बड़े मीडिया संस्थान के गिने-चुने पत्रकारों और राजधानी के खास एक्टिविस्टों को मिलने वाली टोकन छूट थी? 

क्या JNU की जगह पटना यूनिवर्सिटी में बिहार के किसी मंत्री को काले झंडे दिखाकर छात्र बच सकते थे? क्या गाँव का आम आदमी अपने प्रधान या तहसीलदार से मुश्किल सवाल पूछ कर बिना पिटे घर लौट सकता था? सबका जवाब ‘नहीं’ ही है।

मनमोहन को काले झंडे दिखाने वाले गिरफ्तार नहीं हुए, क्योंकि उनके साथ JNU की लिगेसी जुड़ी थी और दुलारे पत्रकारों के साथ उनके बड़े मीडिया संस्थानों की लेगसी जुड़ी थी। यही लेगेसी और एलीटिज्म उन्हें टोकन छूट दिलाती थी, जिसे उन्होंने ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के नाम से प्रचारित किया।

साल 2004 से 2014 के बीच अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ‘टोकन छूट’ वाला स्वर्णकाल था, जिसमें सरकार एलीट लेगेसी के सामने नतमस्तक होती रही। जहाँ बड़े पत्रकार शराब के नशे में मंत्री बनाने-हटाने का दावा करते थे। लाखों करोड़ का घोटाला करने वाले मंत्रियों से साथ उनकी गलबहियाँ होती थी। उनसे नीचे वाले प्रधानमंत्री के साथ सरकारी खर्चे पर विदेश यात्रा जाते थे।

उनसे भी नीचे वाले सरकारी खर्चे से चलने वाली सभाओं-गोष्ठियों में गाल बजाते थे। कुल मिलाकर एलीट पत्रकारों-बुद्धिजीवियों का पूरा इकोसिस्टम तैयार था, जो नेताओं के लिए सेफ्टी वॉल्व की तरह काम करते थे और बदले में संचारतंत्र पर एकाधिकार पाते थे। रवीश कुमार जैसे पत्रकारों ने इसी टोकन छूट की बदौलत अहंकारपूर्ण जुमले गढ़े कि ‘डरा हुआ पत्रकार मरा हुआ लोकतंत्र पैदा करता है’।

हालाँकि, पत्रकार और नेता दोनों लोकतंत्र की पैदाइश हैं, जिसका बीजारोपण जनता करती है। लेकिन, बड़े नेताओं की सोहबत से मिलने वाली छूट एलीट पत्रकारों को लोकतंत्र का ‘बाप’ होने का एहसास कराती रही। यह बिल्कुल ऐसा ही है, जैसे मस्जिद की मुंडेर पर बैठा कौआ खुद को मुअज्जन समझने लगे।

इमरजेंसी काल के बाद भारत में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के ठेकेदार पैदा हुए, जो अभिव्यक्ति की आजादी का दोहन करते हुए जनता के नाम पर बेलगाम हरकतें करते। हालाँकि, इस टोकन आजादी का एक कतरा भी आम जनता तक नहीं पहुँच पाता था। लुटियन दिल्ली से मिलने वाली टोकन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लुटियन के पत्रकारों और एक्टिविस्टों में ही बँट कर खत्म हो जाती थी। साल 2004 से 2014 के बीच दिल्ली के मुठ्ठी भर लोगों की अभिव्यक्ति ही पूरे देश की अभिव्यक्ति मान ली गई।

इस मामले में वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कार्यकाल अलग नजर आता है। 2014 में प्रधानमंत्री बनने के साथ ही उन्होंने सबसे पहले इन ठेकेदारों को किनारे किया। उन्होंने मन की बात, सोशल मीडिया और रैलियों के माध्यम से सीधे आम जनता से संपर्क किया। मीडिया एजुकेशन में इसे ही ‘मास लाइन कम्युनिकेशन’ कहते हैं। नरेंद्र मोदी से पहले महात्मा गाँधी और चीनी क्रांति के नेता माओ इस ‘मास लाइन कम्युनिकेशन’ का सफल प्रयोग कर चुके थे। जो लुटियन पत्रकारों को रास नहीं आ रहा। 

दूसरी ओर, मनमोहन सिंह अपने कार्यकाल में दिल्ली के कुछ दर्जन चुने हुए पत्रकारों के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस करते थे। उन्हें अपनी यात्राओं पर साथ ले जाते थे। डॉक्टर मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी की संवाद शैली में सबसे बड़ा अंतर यही है। मनमोहन सिंह जनता तक अपनी बात पहुँचाने के लिए एलीट पत्रकारों को माध्यम बनाते थे। नरेंद्र मोदी सीधे जनता से संवाद करते हैं।

मोदी ने पत्रकारों की ‘गेट कीपिंग’ यानी मध्यस्थता को खत्म कर दिया। शायद यही कारण है कि एलीट पत्रकारों के लिए मनमोहन सिंह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के चैंपियन हैं और नरेंद्र मोदी ‘तानाशाह’। हालाँकि संचारशास्त्र की थोड़ी-बहुत जानकारी रखने वाला शख्स भी यह आसानी से समझ सकता है कि नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में भारत की आम जनता संवाद के मामले में अधिक सबल और स्वतंत्र हुई है।

अब उसे अपनी बात रखने के लिए किसी मार्फत की जरूरत नहीं। हाँ, इस दौरान एलीट पत्रकारों को मिलने वाली विशेष सुविधाएँ जरूर कम हुई हैं। उनकी विदेश यात्राएँ, सस्ते दर पर मिलने वाले फ्लैट और प्लॉट भी नहीं मिल रहे। इस सिलसिले में बड़े यूट्यूबर्स, जो मनमोहन सिंह के जमाने में टीवी एंकर हुआ करते थे, उनके गुस्से का कारण आसानी से समझा जा सकता है। शायद यही कारण है कि मनमोहन के कार्यकाल में लूटी ऐश के दबाव में मीडिया राहुल गाँधी पर बांग्लादेश पत्रकार द्वारा लगाए गंभीर आरोपों पर चुप्पी साधे हुए है, अगर यही आरोप बीजेपी के किसी नेता पर लगे होते यही मीडिया खूब चौपले लगा रहे होते।  

मीडिया शिक्षण संस्थानों में सामान्यतः प्रेस के 4 सिद्धांत अथवा सिस्टम पढ़ाए जाते हैं, लेकिन इन 4 सिद्धांतों में मीडिया का लोकतांत्रीकरण सिद्धांत शामिल नहीं होता। यह सिद्धांत मीडिया की जगह आम जनता के हाथ में संचार के माध्यमों को सौंपने की बात कहती है। यह सिद्धांत मीडिया के ब्यूरोक्रेसी और प्रोड्यूसर कंट्रोल की निंदा करती है।

इस सिंद्धांत के अंतर्गत छोटे चौपाल, चर्चा समूह, कम्युनिटी रेडियो वगैरह को तरजीह दी जाती है। लैटीन अमेरिकी मीडिया रिसर्चर पाउलो फ्रेइरे ने अपनी रिसर्च में साबित किया है कि भारत जैसे विकासशील देशों में मीडिया को लोकतांत्रीकरण सिद्धांत का पालन करना चाहिए। हालाँकि, भारत का एलीट मीडिया हमेशा ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के नाम पर संचार माध्यमों पर अपने एकाधिकार के लिए लड़ता रहा।

बड़े मीडिया टायकूंस, संपादक, बुद्धिजीवी और पूँजीपति नहीं चाहते कि आम जनता के हाथ में मीडियम की पहुँच हो। वे हमेशा से जनता को संचारतंत्र के ग्राहक के रूप में देखना चाहते हैं, ताकि उनका व्यापार और ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ का शगूफा चलता रहे।

पुनः अपने प्रारंभिक सवाल पर लौटते हैं। क्या वाकई मनमोहन सिंह जी का कार्यकाल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का स्वर्णकाल था? मेरी राय में ऐसा बिल्कुल भी नहीं था। जो लोग भी मनमोहन सिंह साहब को श्रद्धांजलि देते हुए ऐसा लिख रहे हैं, वह उनके अधिकारों का स्वर्णकाल जरूर हो सकता है। यह दौर हमेशा मीडिया मोनोपॉली और एलीट पत्रकारों को मिलने वाली टोकन छूट के रूप में याद रखा जाएगा।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के इस मॉडल ने नीरा वाडिया जैसे लॉबिस्ट-बचौलियों को फायदा पहुँचाया। बाकी एक प्रधानमंत्री, वित्तमंत्री और RBI गवर्नर के रूप में सेवाओं के लिए राष्ट्र डॉक्टर मनमोहन सिंह का आभारी रहेगा। खासतौर से उनकी वाणी की सौम्यता और उनका सौहार्द्रपूर्ण व्यक्तित्व आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्रोत होंगे।

कर्नाटक : ‘कांग्रेस के मेनिफेस्टो में मुस्लिम’ : सिर्फ इतना लिखने पर ‘भिकू म्हात्रे’ को पुलिस ने गिरफ्तार किया, बोलने की आजादी का गला घोंट लोकतंत्र बचा रही INDI?

राहुल गाँधी और कांग्रेस का फ्रीडम ऑफ स्पीच यानि अभिव्यक्ति की आजादी (फोटो साभार : HT/Bing AI)
कर्नाटक की कांग्रेस सरकार ने शनिवार (18 मई 2024) को देर शाम एक सोशल मीडिया इन्फ्लूएंसर को गोवा से गिरफ्तार कर लिया है। सोशल मीडिया इन्फ्लूएंसर ‘भिकू म्हात्रे’ नाम के फिक्शनल नाम से एक्स पर अपनी राय रखते हैं। उन्होंने कांग्रेस के मेनिफेस्टो पर बात रखी थी, जिसकी वजह से उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। खास बात ये है कि कांग्रेस के जिस मेनिफेस्टो पर लिखने के बारे में ‘भिकू म्हात्रे’ को गिरफ्तार किया गया है, उसी मेनिफेस्टो का प्वॉइंट नंबर-16 ‘अभिव्यक्ति की आजादी‘ की बात करता है।

भिकू म्हात्रे के बेटे नागेश नाईक ने इसकी सूचना एक्स पर दी। नागेश नाईक ने लिखा, “मेरे पिता @MumbaiChaDon को कर्नाटक की बेंगलुरु पुलिस गिरफ्तार करके ले गई है। ट्विटर ने ई-मेल के माध्यम से सावधान किया था, लेकिन अचानक शाम को पुलिस ने दरवाजे पर दस्तक दिया और मेरा पिता को साथ ले गई। महत्वहीन एफआईआर के नाम पर ये किया गया।”

बताया जा रहा है कि उन्होंने एक्स पर एक पोस्ट किया था, जिसमें कांग्रेस के मेनिफेस्टो में मुस्लिम शब्द के इस्तेमाल की बात कही थी। बेंगलुरु पुलिस द्वारा दर्ज एफआईआर में उस ट्वीट का जिक्र है। जिसमें भिकू म्हात्रे ने लिखा था, ‘ये हर लिबरल और पिद्दी के मुँह पर मारो, जो ये कह रहा है कि कांग्रेस के मेनिफेस्टो में ‘मुस्लिम’ शब्द का जिक्र नहीं है। इसमें एससी/एसटी का भी जिक्र है।’ उन्होंने कांग्रेस के मेनिफेस्टो से जुड़ी सामग्री भी पोस्ट की थी।

इससे पहले, शनिवार (18 मई 2024) को खुद भिकू म्हात्रे (एक्स प्रोफाइल नाम) ने ही एक्स द्वारा भेजे गए मेल की सूचना दी थी, जिसमें एक्स ने एफआईआर की सूचना दी थी और सावधान किया था। उन्होंने लिखा था, ‘ तो कांग्रेस मुझे सच बोलने के लिए दबाना चाहती है। मैं किसी भी अन्याय के खिलाफ लड़ाई के लिए तैयार हूँ और पूरी न्यायिक लड़ूँगा, चाहे इसके लिए मुझे सर्वोच्च न्यायालय तक ही क्यों न जाने पड़े। मैंने कभी भी किसी को नुकसान पहुँचाने वाला या कम्युनल कमेंट पोस्ट नहीं लिखा है।’

एक्स ने उन्हें मेल के माध्यम से सूचित किया था, “हमें बेंगलुरु सिटी मजिस्ट्रेट की तरफ से आपके एक्स अकाउंट (@MumbaichaDon) को लेकर कोर्ट ऑर्डर मिला है, जिसमें आपके अकाउंट से जुड़ी जानकारी माँगी गई है।” एक्स ने आगे लिखा था कि हम आपको कानूनी सहायता तो नहीं दे सकते, लेकिन आप अपने वकील से इस बारे में जरूर चर्चा कर लें।

भारतीय जनता पार्टी के महासचिव विनोद तावड़े ने कांग्रेस पर जोरदार हमला बोला। उन्होंने कहा कांग्रेस मेनिफेस्टो पर अपनी राय रखने वाले @MumbaiChaDon की कर्नाटक पुलिस द्वारा गिरफ्तारी की निंदा करता हूँ। ये अभिव्यक्ति की आजादी पर हमले का बेहद खराब और खतरनाक उदाहरण है। कांग्रेस वालों को ये समझने की जरूरत है कि विभिन्न विचारों से लोकतंत्र मजबूत होता है, विचारों को कुचलने से नहीं।

इस मामले में एक्स पर कई लोगों ने कांग्रेस की निंदा की है। बता दें कि ये पहला मामला नहीं है, जिसमें एक्स पर रखे गए विचारों की वजह से कॉन्ग्रेस की सरकारों ने इतना बड़ा कदम उठाया हो। पहले भी ऐसे मामले आ चुके हैं। पंजाब की आम आदमी पार्टी की सरकार ने तो मुजफ्फरनगर से यूट्यूबर रचित को दिन-दहाड़े उठा लिया था। वो दिल्ली से एक पारिवारिक विवाह समारोह में शामिल होने गए थे।

अगर नूपुर शर्मा गलत है, फिर उसी बात के लिए ज़ाकिर नाइक गलत क्यों नहीं? इस्लामी देशों को भड़काने की कोशिश में भी टूल किट

बीजेपी की पूर्व प्रवक्ता नूपुर शर्मा प्रकरण के बाद इस्लामिक देशों ने जिस तरह से कई दिन बाद विरोध करना शुरू किया, उसको लेकर लोगों की शंका गहरा गई है। बताया जा रहा है कि इसके पीछे भी टूलकिट का हाथ है। किसान आंदोलन के समय जिस तरह से मियां खलीफा के साथ दुनिया भर के लोगों से ट्वीट करा कर सोशल मीडिया पर माहौल खराब करने की कोशिश की गई, उसी तरह से नूपुर शर्मा मामले में मोदी सरकार को बदनाम करने के लिए मुस्लिम देशों का इस्तेमाल किया गया। नूपुर शर्मा की टिप्पणी के पांच दिनों बाद तक सब कुछ शांत रहा, लेकिन जैसे ही एक जून को कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और उनके बेटे राहुल गांधी को ईडी ने समन भेजा। टूटकिट गैंग हरकत में आ गई।

इसके साथ ही यूक्रेन-रूस संकट के बाद भारत जिस तरह से रूस से सस्ते तेल के लिए सौदा कर रहा था, उससे अमेरिका के साथ कतर नाराज था। साथ ही हाल में में भारत ने जिस तरह से अमेरिका और यूरोपीय देशों को मानवाधिकार और नस्लवादी हिंसा पर खुद के गिरेबान में झांकने को कहा, उससे इस मुद्दे ने उन्हें भारत के खिलाफ एक मौका दे दिया और उन्होंने इस्लामिक देशों को भड़काना शुरू कर दिया

आखिर क्या था मामला?

नूपुर शर्मा ने एक न्यूज चैनल पर चर्चा के दौरान शिवलिंग को फव्वारा बताए जाने पर सवाल किया कि जैसे लोग बार-बार उनके भगवान का मजाक उड़ा रहे हैं, वैसे ही वो भी दूसरे धर्मों का भी मजाक उड़ा सकती हैं। इसके बाद नूपुर ने जो कुछ भी कहा, उसे मुस्लिम मौलाना जाकिर नाइक भी कह चुका है। सोशल मीडिया पर कई यूजर्स ने जाकिर नाइक का वो वीडियो भी शेयर किया, जिसमें वो हदीस के हवाले से मुसलमानों के बीच कहता दिख रहा है कि पैगंबर ने 6 साल की बच्ची से शादी की थी और 9 साल की उम्र में उससे शारीरिक संबंध बनाए थे। लेकिन यही बात जब नूपुर शर्मा ने कही तो दुनिया भर में बवाल हो गया। यहां आप सुनिए कि जाकिर नाइक ने क्या कहा था। 

पाकिस्तान ने चलाया भारत विरोधी कैंपेन
इस मामले में सामने आए टूलकिट से यह भी पता चलता है कि पाकिस्तान ने सोशल मीडिया पर बढ़-चढ़कर भारत विरोधी अभियान चलाया। इसके लिए कई फर्जी सोशल मीडिया अकाउंट और पत्रकारों और कई राजनेताओं के अकाउंट का इस्तेमाल भारत के खिलाफ माहौल बनाने के लिए किया गया।

नूपुर शर्मा की टिप्पणी के बाद दुनिया भर के इस्लामी देशों ने विरोध करना शुरू कर दिया। इन मुस्लिम देशों में जहां ना तो सही मायने में लोकतंत्र है ना दूसरे धर्म को मानने की पूरी आजादी, दूसरों से धर्मनिरपेक्षता की बात करने लगे। इससे उन्होंने एक बात फिर साबित करने की कोशिश की कि कोई गैर-मुसलमान इस्लाम के बारे में कुछ नहीं बोल सकता, चाहे वो सही हो या गलत। जबकि हिंदू धर्म के बारे में चाहे कुछ भी बोल लो।

दूसरे, अब चर्चा यह भी हो रही है कि नूपुर के विरोध में कतर और अन्य मुस्लिम देशों के खड़े होने पर, भारत सरकार ने जिस दिन वहां काम कर रहे 40+ लाख लोगों को वापस बुला लिया, ये सभी घुटनों के बल बैठ माफ़ी मांगते नज़र आएंगे। कभी भारत के विरुद्ध बोलने या कोई षड़यंत्र करने का साहस नहीं कर पाएंगे। बस इंतज़ार है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साहसिक निर्णय का। 

सबसे बड़ी बात तो यह है कि जो नूपुर शर्मा को बयान को अपने धर्म का अपमान बता रहे थे वो खुद दूसरे की आस्था और धर्म का मजाक उड़ा रहे थे। एक तरह से इसने हिंदू धर्म के लोगों को एकजुट और जागृत करने का ही काम किया। लोग नूपुर शर्मा के पक्ष में खड़े हो गए।

नीदरलैंड के नेता ने लगाई लताड़
इतना ही नहीं नीदरलैंड्स के नेता गीर्ट विल्डर्स ने नूपुर शर्मा पक्ष लेते हुए कहा कि अलकायदा जैसे इस्लामिक आतंकियों के सामने ना झुकें क्योंकि ये संगठन बर्बरता का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्होंने यह भी कहा कि उन पाखंडियों की मत सुनें। इस्लामिक देशों में लोकतंत्र नहीं है। कोई नियम, कानून या स्वतंत्रता नहीं है। वे अल्पसंख्यकों का उत्पीड़न करते हैं और मानवाधिकारों का अपमान करते हैं।

नूपुर शर्मा को मिला पाक पत्रकार का साथ
नूपुर के पक्ष में एक पाकिस्तानी पत्रकार तहा सिद्दीकी का एक बयान वायरल हो रहा है। तहा ने एक ट्वीट में कहा है कि आयशा के 9 साल की उम्र में मोहम्मद से शादी करने को लेकर ‘सत्यापित’ हदीसों का हवाला देने के लिए भारतीय जनता पार्टी और नूपुर शर्मा पर हमला करने के बजाए मुस्लिम नेताओं को एक साथ आना चाहिए और अगर गलत लिखा है तो उसे हटा देना चाहिए। लेकिन अगर यह सच नहीं है तो कोई भी मोहम्मद पर बाल विवाह करने का आरोप नहीं लगा सकता है।

भले ही कतर सहित मुस्लिम देशों ने नूपुर मामले में भारत के खिलाफ विरोध जताया और भारतीय वस्तुओं के बहिष्कार की बात करने लगे, लेकिन उन्हें जल्दी ही इस बात का एहसास हो गया कि उनके पास तो भारत को देने के लिए सिर्फ तेल है जो वो रूस या दूसरे देशों से मंगा सकता है, लेकिन अगर भारत ने उन्हें गेहूं, चावल, सब्जी, फल के साथ मांस भेजना बंद कर दिया तो उनके लिए एक हफ्ता भी गुजारा मुश्किल हो जाएगा। इस लिए अब ज्यादा चिंता करने की बात नहीं है। कतर जैसे दूसरे मुस्लिम देश भी जल्द रास्ते पर आ जाएंगे। बस अपने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर भरोसा रखिए।

बेंगलुरु दंगा : सामने आया कांग्रेस पार्षद के शौहर कलीम पाशा का नाम

कलीम पाशा (लाल घेरे में) साभार टाइम्स नाउ
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
जन्माष्टमी के पर्व पर बंगलुरू के हिन्दू युवा श्रीकृष्ण के फोटो डालकर बधाई दे रहे है,,,
 तभी एक मुस्लिम युवक ने कमेंट किया,,, कृष्ण की कितनी बीबियाँ थी ,
उस पर कांग्रेस विधायक के भतीजे ने पूछ लिया, पैगम्बर ने कितनी शादियां की थीं ? 
बस,,,,,, 
ये बात मुस्लिमों को बुरी लग गई ।
व्हाट्सएप ग्रुप में msg आने लगे, पैगम्बर का अपमान हुआ है,  इकट्ठा हो जाओ,,,
हज़ारों लोगों की भीड़ कांग्रेस के दलित विधायक के घर पे हमला करती है,,
 पेट्रोल बम, पत्थर, ईंटें, हथियार सब चलते हैं, 
विधायक का परिवार घर के पीछे से कूद कर जान बचाकर भागता है,,, 
फिर वो उग्र भीड़ घर, ऑफिस में आग लगा देती है,,, उस मोहल्ले में रखी 300 से ज्यादा हिंदुओं की गाड़ियां जला देती है । 
पुलिस आती है, तो पुलिस पर हमला होता है, 60 पुलिस कर्मी घायल हो जाते हैं ।
पूरे मोहल्ले के लोग छतों से कूद कर भाग जाते हैं, किसी के पास अपनी सुरक्षा का कोई साधन नहीं था ।
अब बात करते हैं, राजनीति की,,

जिनके घर पर इतना बड़ा हमला हुआ, वो कांग्रेस के विधायक हैं, अनुसूचित जाति के हैं,,,,, उनका घर , गाड़ियां सब जल गईं,,,,, मगर हैरान करने वाली बात है,,,कांग्रेस के किसी बड़े नेता का बयान नहीं आया,,, वाड्रा मैडम का ट्वीट नहीं आया,,,, किसी ने इस हमले की निंदा नहीं की,,, ऐसा क्यों ?
लेकिन जैसे-जैसे 11 अगस्त 2020 की रात बेंगलुरु में हुई हिंसा की जाँच आगे बढ़ रही है, बड़ी ख़बर सामने आ रही है। बेंगलुरु में हुए दंगों के मामले में पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज की है। इसमें जिन लोगों को आरोपित बनाया गया है उसमें 7वां नाम कांग्रेस पार्षद इरशाद बेगम के शौहर कलीम पाशा का है। पुलिस के मुताबिक़ दंगों की साज़िश रचने वाले मुख्य आरोपितों में एक नाम कलीम पाशा का भी है।
इरशाद बेगम बेंगलुरु नगरपालिका के नगवाड़ा वार्ड से कांग्रेस पार्षद हैं। लेकिन क्षेत्र के ज़्यादातर काम उसका पति कलीम पाशा ही देखता है। टाइम्स नाउ में प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक़ जब पुलिस कलीम को गिरफ्तार करने गई तब वह अपने घर पर नहीं था। पुलिस को अभी तक कलीम की कोई जानकारी नहीं मिली है। 
पूर्व कांग्रेस मंत्री केजे जॉर्ज
इसके अलावा कलीम पाशा के कांग्रेस नेता और पूर्व मंत्री केजे जॉर्ज से भी काफी अच्छे संबंध हैं। पिछले साल सितंबर में कर्नाटक राष्ट्र समिति ने केजे जॉर्ज पर प्रवर्तन निदेशालय को संज्ञान में लेते हुए मनी लॉन्ड्रिंग का मामला दर्ज कराया था। केजे जॉर्ज पर आरोप लगा था कि उनके पास विदेशों में करोड़ों की संपत्ति मौजूद है।
दंगों से संबंधित एफ़आईआर में और भी कई हैरान कर देने वाली बातें सामने आई हैं। एफ़आईआर में लिखा है कि 5 लोगों ने लगभग 200 से 300 लोगों की भीड़ का नेतृत्व किया। उनके पास मशाल से लेकर पेट्रोल बम जैसे ख़तरनाक हथियार मौजूद थे। साथ ही उन्हें इस बात के आदेश मिले हुए थे कि रास्ते में आने वाले हर पुलिसकर्मी को जान से मार देना है। बीते दिन पुलिस ने SDPI के 2 नेताओं को दंगों के मामले में गिरफ्तार किया था। वहीं SDPI के ज़िला सचिव का कहना था कि उनकी पार्टी के सदस्यों का दंगों से कोई लेना देना नहीं है। उनकी पार्टी से जुड़े लोगों पर झूठे आरोप लगा जा रहे हैं।  
कलीम पाशा
भूतपूर्व मुख्यमंत्री सिद्धारमैया के साथ पाशा 
बेंगलुरु में हुई दंगे की घटनाओं में लगभग 200 से 250 वाहन मौके पर ही जला दिए गए थे। कुछ ही समय पहले इस घटना का एक नया वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आया था। इस वीडियो में डीजे हल्ली पुलिस स्टेशन के कर्मचारी अपने वरिष्ठ अधिकारियों से आत्मरक्षा के लिए गोली चलाने की इजाज़त माँग रहे थे। वीडियो में साफ़ सुना जा सकता है कि इस्लामी भीड़ पुलिस वालों पर टूट पड़ी। हालात इतने भयावह हो जाने के बाद पुलिस कर्मियों ने वरिष्ठ अधिकारियों से आत्मरक्षा में गोली चलाने की अनुमति माँगी थी। 
जिस पर अधिकारियों ने साफ़ तौर पर कहा कि वह भीड़ को नियंत्रित करने के लिए जो ज़रूरी समझें, वह करें। वीडियो में पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों ने कहा, “आपको जो सही लगे वह करिए! इस समय आपको कोई और नहीं बचा सकता है। आपको अपनी सुरक्षा खुद से ही करनी होगी।” टीवी 9 कर्नाटक द्वारा प्रसारित इस वीडियो में साफ़ तौर पर देखा जा सकता है कि कैसे उग्र कट्टरपंथी मुसलमानों की भीड़ ने पूरे बेंगलुरु शहर को आग में झोंक दिया। राज्य सरकार ने इस मामले में न्यायिक जाँच के आदेश जारी कर दिए हैं।
न्यायिक जाँच का फैसला कर्नाटक के मुख्यमंत्री बीएस येदुराप्पा, गृहमंत्री बसवराज बोम्मई और पुलिस अधिकारियों की बैठक में लिया गया था। इस जाँच की अगुवाई मजिस्ट्रेट करेंगे। बेंगलुरु के पूर्वी और उत्तर पूर्वी इलाक़ों में हुए इन दंगों में 3 लोगों की जान जा चुकी है। साथ ही कई लोग घायल भी हुए हैं। 
कर्नाटक के गृहमंत्री बोम्मई ने इस बारे में जानकारी देते हुए कहा, “बेंगलुरु में हुई दंगों की न्यायिक जाँच होगी। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के तमाम नीति-निर्देशों को मद्देनज़र रखते हुए पूरे घटनाक्रम की जाँच मजिस्ट्रेट की निगरानी में होगी। इस जाँच के बाद षड्यंत्र रचने वाले असल आरोपित सामने आएँगे।” 
इस आगजनी के पीछे अयोध्या में राममंदिर की पीड़ा है, जिसे छद्दम धर्म-निरपेक्ष बन रही पार्टियों के हाथ होने से इंकार भी नहीं किया जा सकता, क्योकि इसमें स्थानीय कांग्रेस के नाम आ रहे हैं, जिन्हें सोनिया गाँधी द्वारा अब तक पार्टी से निष्कासित करना तो दूर, कोई कार्यवाही तक नहीं की गयी। क्योकि इतने वर्षों तक अयोध्या मुद्दे को लंबित रखने में वामपंथी, कांग्रेस और इनकी समर्थक पार्टियों का रहा है। देश और कोर्ट से सच्चाई छुपाकर भाजपा, विहिप, हिन्दू महासभा और अन्य हिन्दू संगठनों को साम्प्रदायिक करार कर बदनाम कर रहे थे। 
मुसलमानों को मोहरा बनाकर फिरकापरस्ती करती  पार्टियां 
आखिर सच्चाई को लम्बे समय तक छुपाया नहीं जा सकता। आज जनता को समझना होगा कि साम्प्रदायिक कौन? अयोध्या मुद्दे पर कांग्रेस मुसलमानों को मोहरा बना फिरकापरस्ती फैलाती रही और पहले दिल्ली में आम आदमी पार्टी द्वारा हिन्दू विरोधी दंगे के बाद अब बेंगलुरु में कांग्रेस, और दोनों ही दंगों में मुसलमानों के ही कन्धों का सहारा। अगर यही घिनौना खेल भाजपा या किसी हिन्दू संगठन ने खेला होता, ये जितने भी छद्दम धर्म-निरपेक्ष हैं, आसमान को सिर पर उठा रहे होते। इनके प्रायोजित #not in my name, #intolerance, #freedom of speech, #award vapasi और गंगा-जमुना तहजीब आदि गैंगस्टर भी बाहर आकर अराजकता फैला रहे होते, अब सब खामोश हैं। अगर अभी भी मुसलमान ने आंख नहीं खोल वास्तविकता से आमने-सामने का साहस नहीं कर सकता, फिर मुसलमान को क्या जाये, खुद फैसला करे?  
गंगा-जमुना तहजीब का क्या है औचित्य?
जब भी देश में साम्प्रदायिक दंगों में आरोपितों को पकड़ने की नौबत आने पर तुरंत गंगा-जमुना तहजीब का ढोल पिटना शुरू हो जाता है, और मुर्ख इस भ्रमित नारे की गूंज असली मुद्दे को दबाते आए हैं। यह किसी पर कोई आरोप नहीं कटु सच्चाई है, जिसे हर मानव को--साम्प्रदायिक को नहीं--मनन करना होगा, आत्मचिंतन करना होगा कि अगर इस इस नारे में वाकई सच्चाई है, फिर किस कारण अयोध्या मुद्दे पर झूठ बोला जा रहा था? क्यों कोर्ट से खुदाई में मिले मंदिर के हज़ारों सबूतों को छुपाया गया? क्यों पुरुषोत्तम श्रीराम को काल्पनिक बता गया? अगर राम काल्पनिक थे, फिर क्यों दशहरे के दिन रामलीला मंचन स्थल पर जाते थे? जो पार्टियां अपने ही देश के गौरवमयी इतिहास को धूमिल कर मुग़ल आक्रांताओं को महान बताकर पढ़ने के मजबूर कर रही हों, क्या उनसे देशहित की कल्पना की जा सकती है? अगर आज देश के सम्मुख वास्तविक इतिहास होता अयोध्या तो क्या काशी, मथुरा और अन्य स्थल बिना किसी अड़चन के ना जाने कब के सुलझ गए होता। 
गजब गजब के नरेटिव बनाते हो तुम लोग। क्योंकि हिन्दू मूर्ख हैं ना... नही समझता तुम्हारे अल तकिये... तुम्हारे षड्यंत्र... तुम्हारी वामपंथी चालें.. कोई समझाए भी गर तो हिन्दू शुतुरमुर्ग की भांति जमीन में सिर घुसाए All is well करता रहेगा। 
पहले आपत्तिजनक पोस्ट के विरोध में पूरा शहर जला दिया। 3 लोगो की जान ले ली। 60 से अधिक पुलिसकर्मी घायल, थाना फूंक दिया। लेकिन जब विरोध हुआ तो खुद को पाक साफ बताने के लिए गंगा जमुनी तहजीब दरिया में डुबकी लगाने का खेल शुरू कर दिया। जबकि दूसरी ओर कांग्रेस विधायक के भतीजे नवीन को कुत्ते की मौत मारने के लिए सोशल मीडिया पर खेल, क्या है ये ड्रामा? जनमानस कब इस गंगा-जमुनी तहजीब की सच्चाई जानेगा?


एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा हैं, जिसमे कुछ मुस्लिम युवक मानव-चैन बनाकर मन्दिर जलने से बचा रहे हैं। कट्टरपंथियों की हिंसा की खबरें दबाकर दक्षिण से लेकर उत्तर तक के न्यूज चैनलों में यही वीडियो चलाया जा रहा हैं। मुस्लिम कट्टरपंथियों की दंगाई, असहिष्णुता छोड़कर भाईचारे की खबरें चलाई जा रही हैं। इसे कहते है इकोसिस्टम.. कार्यप्रणाली..

हिंसा भी कर ली,  जान भी ले ली, सुरक्षा तंत्र भी कमजोर कर दिया, गैर-मुस्लिमों के भीतर डर, ख़ौफ़, भय भी भर दिया और फिर मन्दिर जलने से बचाकर "भाईचारा", सौहार्द, गंगा-जमुनी तहजीब भी कायम कर ली। अब इस गंगा-जमुनी तहजीब को भ्रमित और धूर्त न कहा जाए तो क्या कहा जाए?
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