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कश्मीर में गिरिजा टिक्कू तो इजरायल में शानी लौक, एक मजहबी सोच ने यहूदी और हिंदुओं को सदियों से किया तबाह

                                                                                                                          साभार 
मुग़ल आतताइयों से लेकर पाकिस्तान प्रायोजित जिहादी आतंकवादियों ने जिस तरह का तांडव 1990 में भारत के कश्मीर में किया था उसी तरह का तांडव 7 अक्टूबर हमास आतंकियों ने इजरायल में किया। भारत से करीब 4 हजार किलोमीटर की दूरी पर इजरायल स्थित है। जगह बदल गया, चेहरे बदल गए लेकिन मजहबी सोच, जिहादी बर्बरता कायम रही। कश्मीर में गिरिजा टिक्कू तो इजरायल में शानी लौक, एक मजहबी सोच ने यहूदी और हिंदुओं को सदियों तक तबाह किया है। कश्मीर में साल 1990 में जिहादी आतंकवादियों ने नंगा नाच किया था। कश्मीरी पंडितों की बस्तियों में सामूहिक बलात्कार और लड़कियों के अपहरण किए गए। नरसंहार में सैकड़ों पंडितों का कत्लेआम हुआ। लाखों कश्मीरी पंडित अपना घर-बार छोड़कर पलायन करने पर मजबूर हुए थे। इसी तरह इजरायल में सैकड़ों यहूदियों की हत्या कर दी गई। जिहादी आतंकवादियों ने लड़कियों, महिलाओं के साथ बलात्कार किया, उनका अपहरण कर लिया। केवल एक गांव में 40 बच्चों को मार दिया गया। जिहादियों ने बर्बरता की सीमा पार करते हुए उनका गला तक काट दिया।

मुंबई हमले के अंदाज में इजरायल पर किया गया हमला
हमास के आतंकियों ने 7 अक्टूबर को इजरायल पर हमला 26/11 के मुंबई हमले के आतंकियों के स्टाइल में हमला किया। इससे शक की सुई पाकिस्तान भी जाता है कि पाकिस्तानी सेना ने हमास आतंकियों को प्रशिक्षित किया है। हालांकि मुंबई हमले में 10 आतंकवादी शामिल थे जबकि इजरायल पर सैकड़ों आतंकवादियों ने बड़े पैमाने पर हमला किया गया। इजरायल की जमीन पर पहुंचते ही इन आतंकियों ने अंधाधुंध फायरिंग शुरू कर दी। गाजा पट्टी के करीब आतंकियों ने एक महिला को भी मार डाला। लेकिन इन आतंकियों को इसे मारने भर से ही सुकून नहीं मिला, बल्कि उन्होंने इसके शव को नग्न किया, हाथ पैर बांध कर गाड़ी पर बांध दिया। इसके बाद आतंकी फिलिस्तीनियों के बीच इसका शव घुमाने लगे। उसके बात पता चला है कि यह इजरायल की नहीं बल्कि एक जर्मन नागरिक थी। हमास ने जो इजराइल में किया उसकी धमकी भारत के जिहादी सोच वाले मुसलमान हिंदुओं को बार-बार देते रहे हैं। हिंदुओं को अपनी जाति भूलना पड़ेगा, एक होना पड़ेगा क्योंकि एक मजहबी सोच वाली किताब में सभी हिंदुओं को काफिर ही कहा गया है। आज हर भारतीयों की इनसे सतर्क रहने की जरूरत है।

जिहादी आतंकवादियों की दरिदंगी, बच्चों के सिर काट दिए
इजरायल की सेना एक कस्बे में गई तब वहां 40 बच्चों की लाश मिली जिनमें गर्दन काट दिए गए थे। 20 महिलाओं की लाश मिली जिनके साथ बलात्कार करके मारा गया था। ये जिहादी सोच वाले दरिंदे हैं, यह राक्षस हैं जो पूरी इंसानियत और मानवता के लिए खतरा है और जो इनका समर्थन कर रहे हैं वह इसे भी बड़ा दरिंदा है। दक्षिणी इज़राइल के किबुत्ज़ बेरी में प्रवेश करने वाले आईडीएफ सैनिकों को 100 से अधिक बच्चे मिले जिनके सिर कटे हुए थे, पूरे परिवारों को हमास के आतंकवादियों ने बिस्तर पर ही गोलियों से भून दिया था। यह कट्टरपंथी इस्लामवादियों का असली चेहरा है। आज की सभ्य दुनिया में कट्टरपंथी इस्लामिक आतंकवाद का समूल नाश जरूरी है।

कश्मीर में गिरिजा टिक्कू के साथ सामूहिक बलात्कार के बाद हत्या
इस्लामिक आतंकवाद का बर्बर रूप कश्मीर को झेलना पड़ा। 11 जून 1990 को जब गिरिजा कुमारी टिक्कू सैलरी लेने के लिए स्कूल गईं थीं। वह स्कूल में लैब असिस्टेंट का काम करती थीं। स्कूल बांदीपोरा जिले में था और सैलरी लेने के बाद वह उसी दिन उसी गांव में जहां स्कूल था अपनी एक सहकर्मी के घर मिलने गईं। इस बीच उन पर आतंकियों की नजर थी जैसे ही वह उस घर में पहुंची उनका अपहरण हो जाता है। गांव वालों को यह बात पता चली लेकिन आतंकियों के डर से कोई आगे नहीं बढ़ा। आगे गिरिजा कुमारी के साथ क्या हुआ यह सुनकर आपके रोंगटे खड़े हो जाएंगे। आतंकियों ने न केवल अपहरण किया बल्कि सामूहिक बलात्कार भी किया। दरिंदों का मन जब इससे भी नहीं भरा तो जिंदा आरा मशीन के बीच में रखकर गिरिजा को काट दिया। आतंकी इससे कई संदेश देना चाहते थे और कश्मीरी हिंदुओं के बीच डर बैठाना चाहते थे। एक लंबा अरसा बीत जाने के बाद विवेक अग्निहोत्री की फिल्म कश्मीर फाइल्स में इस दर्द को बयां किया गया।

खून से लथपथ, हिंसा से आक्रांत मजबूर लोगों को घर छोड़ना पड़ा
अमेरिका में कश्मीरी मूल की लेखिका सुनंदा वशिष्ठ का एक वीडियो फिल्म आने के बाद काफी वायरल हो रहा है। जिसमें वह प्रदेश से धारा 370 को समाप्त किए जाने का समर्थन करते हुए कहती हैं कि मेरे माता-पिता कश्मीरी पंडित हैं, मैं हिंदू कश्मीरी पंडित हूं। हम कश्मीर के उस पीड़ित समुदाय से आते हैं जिन्हें इस्लामिक कट्टरपंथ के कारण अपना घर छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। हिंदू महिलाओं का गैंगरेप किया गया और उनके शव के टुकड़े कर के फेंके गए। खून से लथपथ, हिंसा से आक्रांत हम मजबूर और डरे हुए लोग थे जिन्हें अपना घर छोड़ना पड़ा। सुनंदा ने उस दौर की भयानक हिंसा को याद करते हुए कहा कि हमारे घर जलाए गए, बागों में आग लगाई गई। धार्मिक पहचान के आधार पर निशाना बनाया गया। आतंकियों ने गिरिजा टिक्कू जैसी महिलाओं का गैंगरेप किया, उनके शव के टुकड़े-टुकड़े किए गए। सुनंदा वशिष्ठ का 2019 का वीडियो अब वायरल हो रहा है।

‘अल्लाह हू अकबर’ के नारों के बीच शानी लौक का शव अर्धनग्‍न घुमाया
कश्मीर में हिंदुओं की नफरत की तरह इजरायल में यहूदी की नफरत में अंधे इन आतंकियों ने सड़क पर मौजूद हर शख्स को गोलियों से भूनना शुरू कर दिया। जब महिला को मारने का वीडियो सामने आया था, तब ऐसी रिपोर्ट थीं कि यह इजराली सेना की एक सैनिक है। लेकिन अब इस लड़की की पहचान जर्मनी की रहने वाली शानी लौक (Shani Louk) के रूप में हुई है। 30 साल की शानी एक संगीत समारोह में थीं, जो शांति के लिए आयोजित किया गया था। लेकिन अचानक से आतंकियों ने यहां तांडव मचाना शुरू कर दिया। एक ट्रक पर शानी लौक की अर्धनग्न डेड बॉडी रखकर आतंकवादी इज़राइल पर अपने हमलों का जश्न मनाते हुए “अल्लाहु अकबर” का नारा लगा रहे थे।

इस्लामी आतंकवाद का क्रूर चेहरा था डायरेक्ट एक्शन डे
भारत ने इस्लामी आतंकवाद का एक क्रूर चेहरा उस वक्त भी देखा था जब आजादी मिल रही थी और मोहम्मद अली जिन्ना ने पाकिस्तान की मांग मनवाने के लिए डायरेक्ट एक्शन डे का एलान कर दिया था। स्वतंत्रता प्राप्ति के ठीक एक साल पहले 16 अगस्त 1946 को भारत ने मजहबी कट्टरपंथ का वह रूप देखा जो दशकों तक याद रखा जाने वाला था। भारत की आजादी की दास्तां खून की स्याही से लिखी गई है। इतिहास के पन्नों में दर्ज कहानियां इसकी गवाह हैं कि ब्रिटिश हूकूमत से स्वाधीनता की लड़ाई में जितना खून बहा था। उससे कहीं ज्यादा खून आजादी मिलने के वक्त मजहबी सोच के कारण बहा था। इसमें अंग्रेजों की बंटवारे और फूट की राजनीति आग में घी का काम किया था। जैसे-जैसे स्वाधीनता की दिन नजदीक आता जा रहा था, नेहरू और जिन्ना में मतभेद और मनभेद भी शुरु हो गये थे। जिन्ना ने 16 अगस्त 1946 को डायरेक्ट एक्शन डे की घोषणा कर दी। बंगाल में उस दिन 16 अगस्त 1946 को सुबह भी सबकुछ सामान्य था। लेकिन मस्जिदों में सामान्य दिनों की तुलना में अधिक भीड़ नजर आ रही थी। इतने सारे लोग कहां से आये थे कोई नहीं जानता था। इसके बाद सड़कों पर हजारों की संख्या लोग हाथों में लाठी-ठंडे और अन्य हथियारों से लैस होकर एकत्रित होने लगे।

डायरेक्ट एक्शन डे में 10 हजार से अधिक हिंदू मारे गए
ख्वाजा नजीमुद्दीन और बंगाल के मंत्री हसन शहीद सुहरावर्दी ने इस भीड़ के बीच में भाषण दिया। इस भाषण के बाद भीड़ बिल्कुल निरंकुश हो गई थी। बंगाल में हुए इस भीषण रक्तपात के लिए इतिहास सुहरावर्दी को ही साजिशकर्ता मानता है। इस सांप्रादायिक हिंसा के दौरान सैकड़ों हिंदू मौत के घाट उतार दिए गए थे। हजारों लोग जख्मी हुए थे और महिलाओं के साथ दुष्कर्म की घटनाओं को अंजाम दिया गया था। यह रक्तपात 22 अगस्त चलता रहा था। इसमें मरने वालों का आंकड़ा 10 हजार के बीच का है। इसके साथ ही बहुत सारे हिंदुओं को मारकर हुगली नदी में फेंक दिया गया। इसके अलावा 1200 के करीब भीषण आगजनी की घटनाएं हुईं. इनमें कितने लोग जिंदा जले, बता पाना मुश्किल है।

हिंदुओं के खून से लाल हो गया था कलकत्ता
16 अगस्त के एक दिन पहले तक किसी को यह नहीं पता चला था कि आखिरकार मुस्लिम लीग का डायरेक्ट एक्शन डे क्या है? तत्कालीन बंगाल में मुस्लिम लीग का ही शासन था और वहां सत्ता में बैठा हुआ था प्रधानमंत्री हसन शहीद सुहरावर्दी जिसे बंगाल में हिन्दुओं के खिलाफ किए गए भीषण नरसंहार का साजिशकर्ता माना जाता है। उसकी शह पर मुस्लिम लीग ने डायरेक्ट एक्शन के नाम पर बंगाल में खुलकर अपने हिन्दू विरोधी मंसूबे पूरे किए। मुस्लिमों ने जमकर तांडव मचाया। राजा बाजार, केला बागान, कॉलेज स्ट्रीट, हैरिसन रोड और बर्राबाजार जैसे इलाकों में हिन्दुओं के घरों और दुकानों को जलाया जाने लगा। हिंदुओं को चुन-चुन कर मारा गया, हिन्दू महिलाओं के साथ बलात्कार किया गया, हिंदुओं की संपत्तियों को जला दिया गया। पूर्वी बंगाल के नोआखाली में भी हिन्दुओं का भीषण नरसंहार हुआ। मुस्लिम की भीड़ हिन्दुओं पर भूखे भेड़ियों की तरह टूट पड़ी थी। कलकत्ता में ही 72 घंटों के भीतर लगभग 6 लाख हिन्दू मार दिए गए। मजहबी दंगाइयों के शिकार हुए लगभग 20,000 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हुए और लगभग 100,000 लोगों को अपना सबकुछ छोड़कर जाना पड़ा।

कलकत्ता की सड़कों पर गूंजते रहे, ‘अल्लाह-हु-अकबर’, ‘लड़ के लेंगे पाकिस्तान’
एक अन्य प्रत्यक्षदर्शी ने बताया था कि 17 अगस्त जो कि डायरेक्ट एक्शन डे का सबसे खतरनाक दिन माना जाता है, उस दिन कलकत्ता की सड़कों पर चारों ओर सिर्फ, ‘अल्लाह-हु-अकबर’, ‘नारा-ए-तकबीर’, ‘लड़ के लेंगे पाकिस्तान’ और ‘कायदे आजम जिंदाबाद’ ही सुनाई दे रहा था। भारत के स्वतंत्रता संग्राम पर गौर से नजर रखने वाले अमेरिकी पत्रकार फिलिप टैलबॉट ने इंस्टीट्यूट ऑफ करंट वर्ल्ड अफेयर्स को भेजे गए अपने खत में डायरेक्ट एक्शन डे के बाद हुई मौतों के बारे में लिखा था, हालांकि जिस तरीके से मुस्लिम भीड़ ने कलकत्ता और उसके आसपास के इलाकों में दंगे को अंजाम दिया था उससे यह नहीं लगता कि मरने वाले हिन्दुओं की संख्या इतनी कम रही होगी। इसके अलावा हिन्दुओं की लाशों को नदी में भी बड़ी संख्या में फेंक दिया गया था। इसलिए मौतों का सही आंकड़ा क्या था, यह कहना बहुत मुश्किल है। जुगल चंद्र घोष नाम के एक स्थानीय प्रत्यक्षदर्शी ने बताया था कि उसने 4 ट्रक देखे थे जिसमें 3 फुट की ऊंचाई तक लाशें भरी हुई थीं और इन लाशों से खून और विभिन्न अंग बाहर आ रहे थे। हर बार की तरह इस बार भी हिन्दुओं की मौतों का आंकड़ा बस इतिहास के पन्नों में सिमटकर रह गया।

मुगलकाल के बाद भारत के हिंदुओं पर मोपला में हुई जिहादी बर्बरता
भारत में इस्लाम अरब व्यापारियों के ज़रिये केरल के मालाबार तट के रास्ते आया था। मालाबार क्षेत्र की चेरामन जुमा मस्जिद, भारत में इस्लाम के प्रवेश का प्रतीक है। उस वक्त जो लोग जाति और वर्ण व्यवस्था से पीड़ित थे उन्होंने इस्लाम अंगीकार कर लिया। 20 अगस्त 1921 को मालाबार इलाके में मोपला विद्रोह की शुरुआत हुई थी। यहां हत्यारे थे मोपला मुसलमान और पीड़ित थे हिन्दू। इसे बड़ी चालाकी से वामपंथी इतिहासकारों के गिरोह ने ‘जमींदारों के खिलाफ किसानों की बगावत’ बता कर कई पीढ़ियों को झूठ की घुट्टी पिलाई। लेकिन सच्चाई यही है कि मोपला में जिहादी सोच वालों ने हिंदुओं का कत्लेआम किया। मोपला मुलसमानों के निशाने पर बड़े पैमाने पर हिंदू आए। इसमें हजारों हिंदुओं की हत्या कर दी गई। हजारों का धर्म परिवर्तन कर मुसलमान बना दिया गया। हिंदू महिलाओं के साथ बलात्कार किए गए। हाल के 100 साल के इतिहास में मोपला विद्रोह को हिंदुओं के खिलाफ मुसलमानों का पहला जिहाद कहा जाता है।

खिलाफत आंदोलन की आड़ में किया गया हिंदुओं का नरसंहार
केरल के मालाबार इलाके में हुआ मोपला विद्रोह खिलाफत आंदोलन के साथ भड़का था। दरअसल प्रथम विश्वयुद्ध में तुर्की की हार हुई थी। इसके बाद अंग्रेजों ने वहां के खलीफा को गद्दी से हटा दिया था। अंग्रेजों की इस कार्रवाई से दुनियाभर के मुसलमान नाराज हो गए। तुर्की के सुल्तान की गद्दी वापस दिलाने के लिए ही खिलाफत आंदोलन की शुरुआत हुई। भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल मुस्लिम नेताओं अबुल कलाम आजाद, जफर अली खां और मोहम्मद अली जैसे नेताओं ने खिलाफत आंदोलन का समर्थन किया। इस आंदोलन को बापू का भी समर्थन प्राप्त था। महात्मा गांधी इस आंदोलन के जरिए अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में हिंदू और मुसलमानों को एकसाथ लाने की कोशिश कर रहे थे। लेकिन जिहादी सोच वालों के मन में कुछ और चल रहा था और उन्होंने हिंदुओं का नरसंहार कर दिया।

मोपला में हजारों हिंदू मारे गए, स्वामी श्रद्धानंद की भी गोली मारकर हत्या
मोपलाओं ने कई पुलिस स्टेशनों में आग लगा दी। सरकारी खजाने लूट लिए गए। अंग्रेजों को अपने निशाने पर लेने के बाद इन लोगों ने इलाके के अमीर हिंदुओं पर हमले शुरू कर दिए। कहा जाता है कि मोपला विद्रोह के दौरान हजारों हिंदू मारे गए, उनकी महिलाओं के साथ बलात्कार हुए, हजारों हिंदुओं को धर्म परिवर्तन करना पड़ा। बाद में आर्य समाज की तरफ से उनका शुद्धिकरण आंदोलन चला। जिन हिंदुओं को मुस्लिम बना दिया गया था, उन्हें वापस हिंदू बनाया गया। इसी आंदोलन के दौरान आर्य समाज के नेता स्वामी श्रद्धानंद को उनके आश्रम में ही 23 दिसंबर 1926 को गोली मार दी गई।

जिहादी बर्बरता भारत में वही, भारत से 4600 किलोमीटर दूर इजरायल में भी वही
एक शिशु था। अपनी मां का स्तनपान कर रहा था। अचानक से कुछ जिहादी दंगाई आते हैं और मां की छाती से लगे उस बच्चे को छीन लेते हैं। फिर उस बच्चे के दो टुकड़े कर देते हैं। यह मोपला में हिंदुओं के साथ की गई बर्बरता की कहानी कहता है। इस घटना के बारे में कांग्रेस पार्टी पार्टी की पूर्व अध्यक्ष एनी बेसेंट ने भी लिखा है। इसी तरह भारत से 4600 किलोमीटर दूर, करीब 102 वर्षों बाद इजरायल में जिहादी सोच वालों की मानसिकता नहीं बदली है। इजरायल के एक गांव में हमास आतंकियों द्वारा बच्चों का गला काट दिया जाता है। उनका अंग-अंग काट डाला जाता है। नन्हे-नन्हे बच्चों को जला दिया जाता है। युद्ध कोई नई बात नहीं है लेकिन इतनी बर्बरता इस जिहादी सोच वालों में क्यों है। क्या किसी मासूम से बच्चे का गला रेतते समय इनके मन में क्षण भर भी ये ख्याल नहीं आता कि इसकी क्या गलती है? जिहादी 102 वर्ष पहले भी वही थे, आज भी वही हैं। भारत में ये वही हैं और भारत से 4600 किलोमीटर दूर भी वही हैं। ऐसे आतताइयों के लिए मानवता दिखाने की बात की जाती है। इन्हें पीड़ित बताया जाता है। इनके लिए भारत में मुसलमान सड़क पर उतरते हैं। धिक्कार है, लानत है!

मुगलकाल में तोड़े गए 60 हजार से ज्यादा मंदिर
जिहादी सोच वालों ने मुगलकाल में भारत में करीब 60 हजार मंदिर तोड़ दिए गए थे। काशी, मथुरा, दिल्ली, आगरा से लेकर मध्य प्रदेश के धार तक मंदिर-मस्जिद का विवाद जारी है। इन विवादों में हिंदू पक्ष का दावा है कि मुस्लिम आक्रांताओं ने हिंदुओं की आस्था पर चोट पहुंचाई थी। 60 हजार से ज्यादा मंदिरों को तोड़ डाला गया था। कई मंदिरों को तोड़कर मस्जिदों का निर्माण कराया गया था। इन मंदिरों में ज्यादा हिंदू, जैन और बौद्ध मंदिरों को तोड़ दिया गया था। मुगलकाल में आक्रांताओं ने काफी तरह से भारत की संस्कृति, हिंदू धर्म की आस्था को खंडित करने की कोशिश की। मंदिरों को तोड़ने का काम इसी में से एक है। मुगल काल में तोड़े गए मंदिरों की एकदम सही संख्या बता पाना मुश्किल है, क्योंकि उस दौरान का इतिहास भी मुगल शासकों ने अपने अनुसार लिखवाया था। ये जरूर कहा जा सकता है कि कई हजार मंदिरों को मुगलों ने तोड़ दिया था। कई के सबूत आज भी मौजूद हैं।

मुगल आक्रांताओं द्वारा तोड़े गए 10 प्रमुख मंदिर

1. सोमनाथ मंदिर, काठियावाड़ गुजरात
गुजरात के काठियावाड़ में 12 ज्योतिर्लिंगों में से एक सोमनाथ मंदिर है। ये समुद्र के किनारे स्थित है। इसका जिक्र महाभारत, श्रीमद्भागवत और स्कंद पुराण में भी विस्तार से है। कहा जाता है कि चंद्रदेव ने भगवान शिव को अपना नाथ मानकर यहां उनकी तपस्या की थी। चंद्रदेव को सोम नाम से भी जाना जाता है। इसलिए इस मंदिर का नाम सोमनाथ पड़ा। आक्रांताओं ने इसे 17 बार लूटा और क्षतिग्रस्त किया, लेकिन हर बार ये उतनी ही मजबूती के साथ फिर खड़ा हुआ। यह मंदिर ईसा पूर्व से पहले ही अस्तित्व में आ गया था। इसका पुनिर्निर्माण 649 ईस्वी में वैल्लभी के मैत्रिक राजाओं ने किया। पहली बार इस मंदिर को 725 ईस्वी में सिंध के मुस्लिम सूबेदार अल जुनैद ने तुड़वाया। इसके बाद राजा नागभट्ट ने इसका पुनिर्निर्माण 815 ईस्वी में करवाया। 1024 में फिर से महमूद गजनवी ने इस पर हमला बोला और मंदिर की पूरी संपत्ति लूटने के बाद इसे नष्ट कर दिया। महमूद गजनवरी के आक्रमण के बाद 1093 ईस्वी में गुजरात के राजा भीमदेव, मालवा के राजा भोज ने इसका पुनिर्निर्माण कराया। 1297 में अलाउद्दीन खिलजी के सेनापति नुसरत खां, 1395 में मुजफ्फरशाह, 1412 में उसके बेटे अहमद शाह, 1665 ईस्वी और 1706 में औरंगजेब ने इस पर हमला किया। मंदिर को क्षतिग्रस्त किया और लूटपाट की।

2. राम जन्मभूमि, अयोध्या, उत्तर प्रदेश 
इतिहासकारों के मुताबिक, 1528 में बाबर के सेनापति मीर बकी ने अयोध्या के राम मंदिर को तुड़वाकर बाबरी मस्जिद बनवाई थी। 1949 में कुछ लोगों ने गुंबद के नीचे राम मूर्ति की स्थापना कर दी थी। 1992 में कारसेवक ने विवादित ढांचे को तोड़ दिया। कोर्ट की लंबी लड़ाई के बाद 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने राम मंदिर के पक्ष में फैसला सुनाया।

3. काशी विश्वनाथ मंदिर, वाराणसी, उत्तर प्रदेश
कहा जाता है कि द्वादश ज्योतिर्लिंगों में प्रमुख काशी विश्वनाथ मंदिर अनादिकाल से काशी में है। 1100 ईसा पूर्व राजा हरीशचंद्र और फिर सम्राट विक्रमादित्य ने इसका जीर्णोद्धार कराया था। 1194 में मुहम्मद गौरी ने मंदिर में लूटपाट की और फिर तुड़वा दिया। बाद में इसे फिर हिंदू राजाओं ने बनवाया, लेकिन 1447 में जौनपुर के सुल्तान महमूद शाह ने इसे फिर तुड़वा दिया। 1585 ई. में राजा टोडरमल की मदद से पं. नारायण भट्ट ने फिर से यहां भव्य मंदिर का निर्माण करवाया। 1632 में इसे फिर से तोड़ने के लिए शाहजहां ने सेना भेज दी, हालांकि हिंदुओं के विरोध के चलते ये नहीं हो सका, लेकिन काशी के 63 मंदिरों को शाहजहां ने तुड़वा दिया। 18 अप्रैल 1669 में औरंगजेब ने फिर से मंदिर पर आक्रमण कर दिया। दावा है कि मंदिर तोड़कर यहां पर ज्ञानवापी मस्जिद बनवाई। 1777-80 में इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होलकर ने मंदिर का फिर से जीर्णोद्धार करवाया।

4. श्रीकृष्ण जन्मभूमि, मथुरा, उत्तर प्रदेश
ऐसा कहा जाता है कि औरंगजेब ने श्रीकृष्ण जन्म स्थली पर बने प्राचीन केशवनाथ मंदिर को नष्ट करके उसी जगह 1660 ईस्वी में शाही ईदगाह मस्जिद का निर्माण कराया था। 1770 में गोवर्धन में मुगलों और मराठाओं में जंग हुई। इसमें मराठा जीते। जीत के बाद मराठाओं ने फिर से मंदिर का निर्माण कराया।

5. मोढेरा सूर्य मंदिर, पाटन, गुजरात
अहमदाबाद से 100 किलोमीटर दूर पुष्पावती नदी के किनारे मोढेरा सूर्य मंदिर स्थापित है। इसका निर्माण सूर्यवंशी सोलंकी राजा भीमदेव प्रथम ने 1026 ईस्वी में करवाया था। कहा जाता है कि मुस्लिम आक्रांता अलाउद्दीन खिलजी ने मंदिर पर आक्रमण किया और इसे तुड़वा दिया। इसमें लूटपाट भी की। कई मूर्तियों को खंडित करवा दिया।

6. हम्मी के मंदिर, हम्पी डम्पी, कर्नाटक
हम्पी मध्यकालीन हिंदू राज्य विजयनगरम् साम्राज्य की राजधानी हुआ करती थी। कर्नाटक में स्थित यह नगर यूनेस्को द्वारा विश्व विरासत स्थलों की सूची में भी शामिल है। यहां एक समय दुनिया के सबसे बेहतरीन और विशालकाय मंदिर बने थे, लेकिन 1565 में बरार की सेनाओं ने इसपर हमला कर दिया। इसे काफी हद तक नष्ट कर दिया।

7. रुद्र महालय, पाटन, गुजरात
पाटन जिले के सिद्धपुर में रुद्र महालय है। सरस्वती नदी के किनारे बसा ये काफी प्राचीन नगर है। इसका निर्माण 943 ईस्वी में मूलाराज सोलंकी ने शुरू करवाया था, जो 1140 ईस्वी में राजा सिद्धराज जयसिंह के काल में पूरा हुआ। 1094 में सिद्धराज ने रुद्र महालय का विस्तार करके श्रीस्थल का सिद्धपुर नाम रखा। इतिहासकारों का कहना है कि 1410-1444 ईस्वी के दौरान अलाउद्दीन खिलजी ने इसका कई बार विध्वंस किया। अहमद शाह ने भी इसे तुड़वाया। इस मंदिर को आक्रांताओं ने तीन बार लूटा और बाद में इसके एक हिस्से पर मस्जिद बनवा दी।

8. मदन मोहन मंदिर, वृंदावन, मथुरा उत्तर प्रदेश
वैष्णव संप्रदाय के मदन मोहन मंदिर का निर्माण 1590 ईस्वी से 1627 ईस्वी के बीच रामदासी खत्री और कपूरी के द्वारा करवाया गया था। भगवान श्रीकृष्ण का एक नाम मदन मोहन भी है। भगवान की मूल प्रतिमा आज इस मंदिर में नहीं है। कहा जाता है कि मुगल शासन में प्रतिमा को राजस्थान स्थानांतरित कर दिया गया था। औरंगजेबकाल में इस मंदिर को भी निशाना बनाया गया था।

9. मार्तण्य सूर्य मंदिर, अनंतनाग कश्मीर
कश्मीर घाटी के अनंतनाग में कर्कोटा समुदाय के राजा ललितादित्य मुक्तिपाडा ने लगभग 725-61 ईस्वी में इस ऐतिहासिक और विशालकाय मार्तण्य सूर्य मंदिर का निर्माण करवाया था। ये कश्मीर के सबसे पुराने मंदिरों में शुमार है। अनंतनाग से पहलगाम के बीच एक जगह है, जिसे मटन कहा जाता है। कहा जाता है कि इसे मुस्लिम शासक सिकंदर बुतशिकन ने तुड़वाया दिया था। मुस्लिम इतिहासकार हसन अपनी किताब ‘हिस्ट्री ऑफ कश्मीर’ में लिखते हैं कि 1393 के आसपास सबसे ज्यादा कश्मीरी पंडितों पर सुल्तान बुतशिकन ने कहर बरपाया था। इतिहासकार नरेंद्र सहगल ने भी इसका जिक्र अपनी किताब व्यथित जम्मू कश्मीर में किया है। इसमें उन्होंने लिखा है, ‘पंडितों पर जब अत्याचार हो रहा था तब हजरत अमीर कबीर (तत्कालीन धार्मिक नेता) ने ये सब अपनी आंखों से देखा। उसने मंदिर नष्ट किया और बेरहमी से कत्लेआम किया।’

10. मीनाक्षी मंदिर, मदुरै, तमिलनाडु
भगवान शिव और देवी पार्वती को मीनाक्षी नाम से जाना जाता था। यह मंदिर उन्हीं को समर्पित है। राजा इंद्र ने इसकी स्थापना करवाई थी। हिंदू संत थिरुग्ननासम्बंदर ने इस मंदिर का वर्णन 7वीं शताब्दी से पहले ही कर दिया था। प्राचीन राजा पांडियन मंदिर के लिए लोगों से चंदा लेते थे। कहा जाता है कि 14वीं शताब्दी में मुगल मुस्लिम कमांडर मलिक काफूर ने मंदिर को तोड़ा और इसमें लूटपाट की। यहां से कई मूल्यवान आभूषण और रत्न लूटकर ले गया। बाद में अलग-अलग शासन में इसे हिंदू राजाओं ने बनवाया।


जिसके इशारे पर हुआ इजरायल में नरसंहार वो मारा गया, हमास की वायुसेना का मुखिया भी ढेर: इजरायल ने गाज़ा में 1000 ठिकानों पर बोला हमला

उत्तरी इजरायल स्थित लेबनान की सीमा के पास इजरायल का सैनिक (साभार: The Jerusalem Post/AYAL MARGOLIN/FLASH90)
इजरायल ने हमास ने वायुसेना अध्यक्ष को मार गिराया है। साथ ही जिस आतंकी सरगना के आदेश पर नरसंहार हुआ, उसे बह ढेर कर दिया गया है। इजरायल की सेना IDF ने जानकारी दी है कि अली क़ादी नामक अमानवीय और बर्बर आतंकवादी को मार गिराया गया है, जिसके आदेश पर 7 अक्टूबर, 2023 को इजरायल में नरसंहार हुआ। इजरायल ने कहा है कि उसे ढेर कर दिया गया है। साथ ही ऐलान किया कि हमास के जितने भी आतंकी होंगे, उन सबका यही हश्र होगा।

IDF ने बताया कि लगातार 7वें दिन इजरायली परिवारों को बम शेलटर्स का सहारा लेना पड़ा, ताकि वो गाज़ा की तरफ से की जा रही बमबारी से बच सकें। दक्षिणी इजरायल में एक बार फिर सायरन बज रहे हैं, यानी हमास फिर से रॉकेट दाग रहा है। सेन्ट्रल इजरायल में भी शनिवार (14 अक्टूबर, 2023) को ऐसे ही सायरनों की आवाज़ सुनाई दी। गाज़ा में अब भी इजरायल के 120 नागरिकों को बंधक बना कर रखे जाने की पुष्टि की गई है।

इजरायल ने हमास की वायुसेना के मुखिया अल मुराद को भी मार गिराया है। हमास अपने जिस मुख्यालय से सारे हवाई हमलों को मैनेज कर रहा था, उसे ही इजरायल ने निशाना बनाया है। 7 अक्टूबर को हुए नरसंहार में उसका भी बड़ा हाथ था। हमास के कमांडो फ़ोर्स के भी दर्जनों ठिकानों को निशाना बनाया गया है। इजरायल की तरफ से हताहतों की बात करें तो अब तक 1300 की हत्या की गई है। वहीं 3300 लोग घायल भी हैं।

वहीं IDF ने हमास के 1000 ठिकानों को निशाना बनाए जाने की जानकारी दी है। जहाँ तक अली क़ादी की बात है, वो ‘नकबा फ़ोर्स’ का मुख्य सरगना था। 2005 में भी उसे गिरफ्तार किया गया था लेकिन गिलाद शालित एक्सचेंज डील के तहत उसे लौटा दिया गया था। इजरायल ने गाजा में रहने वाले 6 लाख लोगों को वहाँ से हटने के लिए कह दिया है। इजरायल ने कहा है कि आम नागरिक हमारे दुश्मन नहीं हैं और हम उन्हें नुकसान नहीं पहुँचा रहे।


इजरायल में अब विपक्ष भी ‘सरकार’: ‘महिलाओं-बच्चों का अपहरण किया, ताकि उनका बलात्कार कर सकें’: कैमरे में कैद हुई फिलिस्तीनी आतंकियों की करतूत

               इजरायल में कई लोगों को उनके घर सहित ज़िंदा फूँक दिया गया (फोटो साभार: X/Israel)
इजरायल ने तस्वीरें जारी कर के बताया है कि कैसे हमास के आतंकियों ने देश में घुस कर आम लोगों के साथ क्रूरता की। वो घर-घर गए और लोगों को ज़िंदा जला दिया। घरों को ही फूँक दिया गया। कई जगह पूरे परिवार को ही खत्म कर दिया गया, छोटे-छोटे बच्चों को भी। किब्बुत्ज़ बीरी में सबसे ज़्यादा तबाही मचाई गई। इजरायल में अब इस आपात स्थिति से निपटने के लिए वहाँ का विपक्ष भी सरकार में शामिल हो गया है। बेन्नी गांट्ज़ की ‘नेशनल यूनिटी पार्टी’ सरकार में शामिल होगी और एक नई ‘वॉर कैबिनेट’ का निर्माण होगा।

भारत के विपक्ष को इजराइल के विपक्ष से सीखने की जरुरत है, जहाँ समूचा विपक्ष मुसीबत के समय सरकार के साथ आतंकवाद से लड़ने के लिए खड़ा है, लेकिन भारत में विपक्ष अपनी कुर्सी की खातिर सरकार द्वारा आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई में सरकार की ही आलोचना करता है, सरकार को मुस्लिम विरोधी बता आतंकवाद के विरुद्ध लड़ाई को मुस्लिम विरोधी बता दुष्प्रचार किया जाता है। 

वहीं हमास की तरफ से रॉकेट दाग कर अब सीधे इजरायल की राजधानी तेल अवीव को निशाना बनाया जा रहा है। एक बार फिर से इजरायल में सायरनों की आवाज़ गूँज रही है। वहीं इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने कहा है कि हमास, ISIS से भी ज़्यादा बुरा है। दक्षिणी इजरायल के सेदेरोट में एक स्कूल को भी निशाना बनाया गया है। वहीं मिस्र ने UN के साथ मिल कर गाज़ा में रफह सीमा के जरिए मदद पहुँचाने की योजना बनाई है।

वहीं अब इजरायल की सेना IDF ने लेबनान के आतंकी संगठन हिज़्बुल्ला के ठिकानों को भी तबाह किया गया है। IDF ने बताया है कि गाज़ा स्थित आतंकियों पर हजारों बम लगातार गिराए जा रहे हैं, दिन और रात की परवाह किए बिना। वहीं अमेरिका के राष्ट्रपति जो बायडेन ने इजरायल को पूरा समर्थन देने का ऐलान किया है। गाज़ा की सीमा पर इजरायल की सेना और हमास आतंकियों के बीच भयंकर गोलीबारी हुई है। कई देशों के विदेश अधिकारी भी इजरायल पहुँचे हैं और अपना समर्थन दिया है।

इजरायल के किब्बुत्ज़ में 40 बच्चों को हमास के आतंकियों ने मार डाला था। इजरायल के आधिकारिक ट्विटर हैंडल द्वारा शेयर की गई एक तस्वीर में एक घर का कमरा अस्त-व्यस्त दिख रहा है, साथ ही खून के धब्बे चारों तरफ फैले हुए हैं। वहीं एक वीडियो सामने आया है जिसके बारे में बताया जा रहा है कि उसमें मौजूद फिलिस्तीनी कह रहा है कि वो महिलाओं को अपने साथ ले जाते हैं, ताकि उनके साथ बलात्कार कर सकें। इसमें वो बच्चों तक के साथ बलात्कार करने की बात कर रहा है। 

‘घरों पर लेटर लगा बताते थे आज किसकी होगी हत्या’: अब ‘कश्मीर फाइल्स’ की वेब सीरीज, पीड़ित खुद बताएँगे किस बुजुर्ग की टाँगों में डाली कील, कैसे आयरन प्रेस से किया टॉर्चर

वेब सीरीज 'द कश्मीर फाइल्स: अनरिपोर्टेड' के ट्रेलर का एक दृश्य (फोटोशाभर: ZEE5)
जिस जम्मू कश्मीर को कभी धरती का स्वर्ग कहा जाता था, वो अपनी राजनीतिक भूक्षेत्र के कारण एक युद्ध के क्षेत्र में बदल गया। आखिर कश्मीरी पंडितों के पलायन और अनुच्छेद-370 को हटाए जाने के पीछे क्या-क्या कारण थे? इसी सवाल का जवाब देने ZEE5 नामक OTT प्लेटफॉर्म पर ‘The Kashmir Files: Unreported’ नामक वेब सीरीज आ रही है। ये डॉक्यूमेंट्री की शक्ल में है, जिसमें पीड़ितों और विशेषज्ञों से बात की गई है।

‘The Kashmir Files: Unreported’ के निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ही हैं, जिन्होंने ‘द कश्मीर फाइल्स’ बनाई थी। ट्रेलर की शुरुआत में एक महिला की आवाज गूँजती है, “कश्मीर में यश चोपड़ा फ़िल्में बना रहे थे, आप ‘शिकारा’ देखते थे। लेकिन, कश्मीर एक और अलग भी था जिसे हम देख रहे थे।” इसके बाद ‘आज़ादी-आज़ादी’ के नारे लगाती हुई भीड़ को दिखाया गया है। बैकग्राउंड में विवेक अग्निहोत्री की आवाज आती है, “ये कैसी पीड़ा थी, जिसे सहते-सहते आप मर भी जाएँ और उसका कुछ नाम ही न हो।”

इसके बाद वो महिला फिर से बताती हैं कि लाउडस्पीकर से जोर-जोर से आवाजें आती थीं – “हम क्या चाहते, आज़ादी।” एक बुजुर्ग महिला भी बताती हैं कि उस माहौल में डर लगता था, कि हम मरने वाले हैं। फिर लोगों ने बताया कि कैसे वो कहते थे कि हमें कश्मीर चाहिए, लेकिन हिन्दू महिलाओं के साथ, बिना हिन्दू मर्दों के। एक महिला ने बताया कि घर के बाहर लेटर्स लगा दिए जाते थे कि आज किसे मारा जाएगा। एक महिला ने बताया कि एक बुजुर्ग की टाँगों में कील डाल दी गई थी।

आतंकी कह रहे थे कि ये बूढ़े हैं, इन पर गोली क्यों खर्च करनी? एक व्यक्ति ने आयरन प्रेस से टॉर्चर किए जाने की बात कही। एक महिला ने बताया कि हम कश्मीरी कुत्ते-बिल्लियों की तरह मर रहे थे। स्क्रीन पर आकर विवेक अग्निहोत्री कहते हैं, “भारत के इतिहास में शायद ऐसा कभी नहीं हुआ।” फिर आतंकी बिट्टा कराटे का इंटरव्यू दिखाया गया है, जिसमें उसने कहा था कि अगर उसके आका उसकी माँ को मारने के लिए कहते तो भी वो मार देता।

बताया गया है कि कैसे पाकिस्तान द्वारा आतंकियों को हथियारों का प्रशिक्षण दिया जा रहा था। एक महिला ने कहा कि हमें इसीलिए मारा गया क्योंकि हमने भारत का प्रतिनिधित्व किया। एक पीड़ित ने बताया कि अपने देश में डर कर रहना पड़ेगा, ये नहीं पता था। विवेक अग्निहोत्री की पत्नी पल्लवी जोशी भी इसमें दिखाई देती हैं। वो कहती हैं, “इन कश्मीरी पंडितों का सत्य आखिर क्या था?” एक कश्मीरी पंडित ने रोते हुए कहा कि वो रोज घर जाना चाहिए हैं, लेकिन होटल नहीं बल्कि अपने घर में।

निर्देशक विवेक अग्निहोत्री ने कहा कि ये इतिहास का वो चैप्टर है जिसे मिटाने की पूरी कोशिश की गई, लेकिन आपका हक़ बनता है कि आप इसे जानें। उन्होंने से सबसे ज्यादा मानवीय टच वाली वेब सीरीज करार दिया। बता दें कि इसे डॉक्यूमेंट्री स्टाइल में बनाया गया है। इस बारे में अधिकतर रिसर्च विवेक अग्निहोत्री और पल्ल्वी जोशी ने ‘द कश्मीर फाइल्स’ बनाने के दौरान ही कर ली थी। कई कहानियाँ फिल्म में छूट गई थीं, जिन्हें तथ्यों के साथ इसमें दिखाया जाएगा।


अफ्रीका : 144 की हत्या, 80 महिला-बच्चों का अपहरण: कांगो में IS के आतंकियों ने खंभे से बाँध गला काटा, बुर्किना फासो और नाइजीरिया में गोली मारी

कांगो और बुर्किना फासो (साभार: Getty/AFP)
मुस्लिमों के लिए पाक रमजान के महीने में इस्लामी आतंकियों ने अफ्रीकी देशों में एक बार फिर नरसंहार को अंजाम दिया है। बुर्किना फासो में आतंकियों ने 44 लोगों की हत्या कर दी है। वहीं, नाइजीरिया में हुए हमले में कम-से-कम 80 और कांगो गणराज्य में करीब 20 लोगों को मार दिया गया है।

पूर्वी कांगो गणराज्य में आतंकियों ने बड़ा हमला किया है। इस हमले में कम-से-कम 20 लोग मारे गए हैं। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, हथियारों से लैस बड़ी संख्या में आतंकी एक गाँव घुस गए और लोगों का कत्ल कर दिया। लोगों की हत्या के लिए आतंकियों ने चाकू का इस्तेमाल किया। इस हमले की जिम्मेदारी कुख्यात आतंकी संगठन इस्लामिक स्टेट (IS) ने ली है।

इलाके के सैन्य प्रशासक चार्ल्स ओमेगा ने कहा कि मुसंदबा गाँव से 20 लोगों के शव शुक्रवार (7 अप्रैल 2023) को बरामद किए गए। वहीं, एक स्थानीय कार्यकर्ता ने कहा कि अस्पताल में 22 शव लाए गए। शनिवार (8 अप्रैल 2023) को इस्लामी स्टेट ने इसकी जिम्मेदारी ली।

मारे गए लोगों में पुरुष और महिलाएँ हैं। ये सभी लोग किसान हैं। आतंकियों ने इन लोगों की गला काटकर हत्या की है। सोशल मीडिया पर साझा किए गए एक वीडियो में भीड़ लकड़ी के फ्रेम से बँधे एक व्यक्ति को घेर लेती है और फिर उसका गला काट दिया जाता है। इस तरह 20 लोगों के साथ यही अंजाम दिया गया था। ADF अब तक हजारों लोगों की हत्या कर चुका है।

हालाँकि, सेना और स्थानीय अधिकारियों ने पूर्वी कांगो में स्थित एक युगांडाई समूह एलाइड डेमोक्रेटिक फोर्सेस (ADF) पर हत्या का आरोप लगाया है। ADF एक इस्लामी समूह है, जिसे यूगांडा और कांगो ने आतंकियों की सूची में डाला है। कांगो और यूगांडा में नरसंहार के लिए ADF कुख्यात है। साल 2019 में ADF इस्लामिक स्टेट का हिस्सा बन गया।

इसी सप्ताह ADF ने इदुरी प्रांत में 30 लोगों की निर्मम तरीके से हत्या कर दी थी। पिछले महीने एक गाँव में आग लगाकर 39 लोगों को इस आतंकी संगठन ने मार दिया था। पिछले महीने संयुक्त राज्य अमेरिका (USA) ने ADF के सरगना सेका मूसा बालुकु के बारे में सूचना देने वाले को 5 मिलियन डॉलर (लगभग 41 करोड़ रुपए) इनाम की घोषणा की थी।

बुर्किना फासो में जिहादियों ने 44 लोगों की हत्या की

आतंकियों द्वारा हमेशा नरसंहार झेलने के लिए अभिशप्त बने पश्चिमी अफ्रीकी देश बुर्किना फासो के उत्तरी इलाके में जिहादियों ने दो गाँवों में हमले किए। इन हमलों में कम-से-कम 44 लोगों के मारे जाने की खबर है। बुर्किना फासो की सरकार ने बताया कि कोराकौ में 31 और तोंडोबी में 13 लोगों की हत्या की गई है।
साहेल क्षेत्र के गवर्नर लेफ्टिनेंट कर्नल पीएफ रोडोल्फ सोरगो ने कहा कि आतंकियों ने सेनो प्रांत के कूराकू और तोंदोबी गाँवों पर हमला किया। इन हमलों को ‘घृणित तथा बर्बर‘ बताया और कहा कि सरकार इलाके में शांति सुनिश्चित करने का प्रयास कर रही है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि गुरुवार (6 अप्रैल 2023) की शाम को हथियारों से लैस बड़ी संख्या में इस्लामी आतंकी गाँवों में घुस आए और लोगों पर अंधाधुन फायरिंग करने लगे। इसमें कम से कम 44 लोग मारे गए। मृतकों के शव अगले दिन मिला।
स्थानीय लोगों कहना है कि कुछ दिन पहले मवेशी चुराने की कोशिश करने वाले दो जिहादियों को गाँव वालों ने मार दिया था। इसके प्रतिशोध में इस गाँव को निशाना बनाया गया था। बता दें कि फरवरी 2023 में देस के उत्तरी इलाके देउ पर हमला कर आतंकियों ने 51 सैनिकों को मार दिया था। साल 2015 से अब तक आतंकियों ने 10,000 से अधिक लोगों की हत्या कर दी है।

नाइजीरिया में 80 हत्या और 80 का अपहरण

अफ्रीकी देश नाइजीरिया में आतंकियों ने शुक्रवार (7 अप्रैल 2023) को वसूली के लिए 80 लोगों का अपहरण कर लिया। इनमें अधिकतर महिलाएँ और बच्चे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि यह घटना जमफारा के त्सफे क्षेत्र के वानजमाई गाँव में हुआ। यह वह इलाका है कि जहाँ आतंकी अपहरण की घटना को सबसे अधिक अंजाम देते हैं।
दूसरी तरफ देश के एक अन्य हिस्से में अंधाधुन फायरिंग कर बंदूकधारियों ने कम-से-कम 30 लोगों को मौत के घाट उतार दिया है। स्थानीय अधिकारियों ने बताया कि शुक्रवार (7 अप्रैल 2023) की देर शाम को उत्तर-मध्य नाइजीरिया में स्थित विस्थापित लोगों के एक शिविर पर हमला कर दिया गया है।
पुलिस अधिकारी सेवेसी एनेने ने कहा कि बंदूकधारियों ने बेन्यू राज्य के मगबान गांव में नागरिकों पर हमला किया। यह भी तक यह साफ नहीं हो पाया है कि हमला किसने किया है, लेकिन माना जाता है कि चरमपंथी इस्लामी ग्रुप फुलानी द्वारा इसे अंजाम दिया गया है। इसके एक दिन पहले उमाजिदी गाँव में हमला कर 50 लोगों की हत्या कर दी गई थी।

म्यांमार का हिंदू नरसंहार याद नहीं करते रोहिंग्या के पैरोकार

                                                    रखाइन प्रांत में हिंदुओं का नरसंहार
“उन दिनों मेरी बेटी की तबीयत खराब थी इसलिए मैंने उसे ठीक होने के लिए अपने ससुराल छोड़ा था। बाद में पता चला कि ‘वे लोग’ मेरी सास और मेरी बेटी को अपने साथ ले गए हैं…. जब हम वहाँ गए तो इलाके में बहुत गंध थी। हम लोगों ने खुद घंटों हर जगह की खुदाई की। थोड़ी देर बाद मेरी नजर हाथ के कड़े और गले में पहनने वाले काले-लाल रेशम के धागे पर पड़ी जिसकी वजह से मैं अपनी बेटी के शव को पहचान पाया।”
-आशीष

“मेरे पति मेरी बेटी को लेकर पास के गाँव में काम करने गए थे। शाम को मेरी बहन को एक फोन आया और कहा कि ‘उन लोगों’ ने उन दोनों की कुर्बानी दे दी है। अब हमारे साथ भी यही होगा। डरकर मैं घर में तीन दिन छिपी रही। फिर फौज हमें शिविर में लेकर आई।”-कुकु बाला

आप सोच रहे होंगे ये क्या है? दरअसल, ये एक माँ और एक पिता का बयान है जिनकी बच्चियों ने और घरवालों ने साल 2017 में म्यामांर के रखाइन प्रान्त में रोहिंग्या ‘आतंकियों’ की उस बर्बरता का चेहरा देखा जो किसी की भी रूह कँपा दे। शुद्ध काले नकाब में तलवार, चाकू, रॉड, भाले जैसे कई हथियारों से लैस होकर सैकड़ों हिंदुओं का नरसंहार! कल्पना करने पर लगता है जैसे कोई ISIS का हमला हो। यह घटना है 25-26 अगस्त 2017 की। हमलावर भले ही ISIS से नहीं थे, पर उनके मनसूबे उतने ही नापाक थे।  

आशीष कुमार ने अपनी 8 साल की बेटी को खोया था। गर्भवती कुकु बाला ने अपने पति और बेटी को। इनके जैसे सैंकड़ों परिवार थे जिनकी सिसकियाँ रुकने का नाम नहीं ले रहीं थी। उस दिन ‘काले नकाब’ में रोहिंग्या ‘आतंकियों’ ने म्यांमार के रखाइन प्रांत के खा मॉन्ग सेक में जो तबाही मचाई उसकी गंध आज भी सैंकड़ों पीड़ित हिंदू नहीं भूल पाते। भूलें भी कैसे? जमीन में दबाई गई एक साथ 45 लाशें जो क्षत-विक्षत देखी थीं। मात्र दो गाँव से 99 लोग मार दिए गए थे। 1000 हिंदू लापता हो गए। 620 परिवारों को शिविरों में रहने को मजबूर होना पड़ा था।

                                                                                           जी टीवी की कवरेज से लिया गया स्क्रीनशॉट

खा मॉन्ग सेक नरसंहार ( Kha Maung Seik massacre )

25 अगस्त 2017 को खा मॉन्ग सेक ( Kha Maung Seik ) यानी फाकिरा बाजार के नजदीक रहने वाले हिंदुओं के लिए भयावह रात थी। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इस मामले में अपनी रिपोर्ट में रोहिंग्या ‘आतंकियों’ का हाथ बताया था। रिपोर्ट में एमनेस्टी ने कहा था कि इस नरसंहार को अंजाम देने वाले अराकान रोहिंग्या सैलवेशन आर्मी (आरसा) के गुर्गे हैं (म्यांमार में इन्हें रोहिंग्या आतंकी भी कहा जाता है)। उन्होंने ही पहले सुरक्षा बलों पर दर्जनों हमले किए। साथ ही हिंदू गाँव नॉक खा माउंग सेक ( Kha Maung Seik ) पर 25 अगस्त को हमला किया और कई हिंदू बंदी बना लिए गए। इनमें से अधिकांश को असहनीय यातनाएँ देकर मार डाला गया।  
रिपोर्ट्स बताती हैं कि दो दिन में 45 हिंदुओं के शव 3 गड्ढों में पाए गए थे। ये शव जब निकाले गए तो बुरी तरह क्षत-विक्षत थे। कुछ का गला काटा गया था, कुछ का सिर और कुछ के अन्य अंग। पहले शवों की गिनती 45-48 के बीच होती रही। फिर हमले में गायब कुल संख्या से मालूम हुआ कि लगभग 99 हिंदुओं को वहाँ मौत के घाट उतारा गया।
                                                                                                                 लाशों के लिए खोदे गए गड्ढे
कई मीडिया रिपोर्ट्स में इस पूरे नरसंहार को बिलकुल अलग कोण के साथ प्रस्तुत करने का प्रयास किया गया। तर्क-कुतर्क के नाम पर ARSA को बचाने की कोशिशें हुई। प्रश्न चिह्नों के साथ ये समझाया गया कि कैसे आखिर जो इल्जाम इस्लामिक आतंकियों पर लगाया जा रहा है वो सरासर गलत है। 
रोहिंग्या ‘आतंकियों’ की कार्रवाई पर मीडिया रिपोर्ट कैसी थी? इस पर हम अंत में थोड़ी चर्चा जरूर करेंगे। लेकिन उससे पहले इस नरसंहार की शुरुआत को समझिए। वैसे तो म्यांमार के रखाइन प्रांत में साल 2012 से ही बौद्धों और रोहिंग्या ‘आतंकियों’ के बीच सांप्रदायिक हिंसा शुरू थी। लेकिन साल 2017 में हालात तब भयानक हो गए, जब म्यांमार में मौंगडो बॉर्डर पर रोहिंग्या आतंकियों के हमले में 9 पुलिस अफसरों की मौत हो गई।
                                                                                      प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार: lepetitjournal)
रोहिंग्या कट्टरपंथियों ने 30 पुलिस थानों को अपना निशाना बनाकर 9 पुलिस कर्मियों को मौत के घाट उतारा था। जवाब में प्रशासन ने भी कार्रवाई की और करीब 90 हजार रोहिंग्या मुस्लिमों को गाँव छोड़कर बांग्लादेश जाना पड़ा। इन लोगों ने म्यांमार प्रशासन पर हत्याओं और बलात्कार का आरोप मढ़ा। इससे वैश्विक स्तर पर भी म्यांमार की तीखी आलोचना हुई। लेकिन म्यांमार ने इसे क्लीयरेंस ऑपरेशन बताते हुए रोहिंग्या चरमपंथियों के हमलों का वाजिब रिएक्शन करार दिया ।
आज इन्हीं रोहिंग्याओं के लिए इंसानियत के नाम पर जिस तरह छाती पीटी जाती है। बड़ी-बड़ी संस्थाएँ इन पर दया दिखाने की बात करती हैं। इन्हें शरण देने की पैरवी करती हैं। उसी ढंग से क्या आपने कभी भी रखाइन प्रांत के इन लाचार हिंदुओं के बारे में सुना है? जिनका न प्रशासन से कुछ मतलब था और न चरमपंथियों से। लेकिन तब भी वह इनकी बर्बरता का शिकार हुए।

महिला, बच्चे, पुरुष…सबको बनाया गया निशाना

पश्चिमी म्यांमार के हिंदू आबादी वाले गाँव में रीका धर ने अपने पति, 2 भाइयों और कई पड़ोसियों को नृशंसतापूर्वक मौत के घाट उतरते हुए अपनी आँखों से देखा। घटना के काफी दिनों बाद एक न्यूज चैनल से बातचीत में धर ने बताया  “कत्ल करने के बाद, उन्होंने बड़े-बड़े तीन गड्ढे खोदे और सबको उसमें फेंक दिया। उनके हाथ उस समय भी पीछे की ओर बँधे हुए थे और आँखों पर पट्टी बाँध दी गई थी।” 
इसी तरह 15 वर्षीया प्रोमिला शील ने बताया था, “पहाड़ियों में ले जाने के बाद उन्होंने हर किसी को मौत के घाट उतार दिया। मैंने अपनी आँखों के सामने यह सब देखा।” 
राजकुमारी ने कहा, “हमें उस तरफ देखने से मना किया गया था। उनके हाथ में चाकू, तलवारें और लोहे की रॉड थी। हमने खुद को झाड़ियों में छिपा लिया था। इसलिए हम वो सब देख पाए। मेरे पिता, मेरे चाचा और मेरे भाई…सबको उन्होंने काट डाला।”
सोचिए इस नरसंहार में बच्चे, महिला, पुरुष, बुजुर्ग किसी को नहीं छोड़ा गया। जब स्वजनों को खोजने के लिए अगले दो दिन खुदाई हुई तो हर जगह हड़कंप था। परिवारों की चीखें बंद होने का नाम नहीं ले रहीं थी। लोग एक दूसरे से लिपट-लिपट कर अपने परिजनों के लिए रो रहे थे। कुछ की आँखों से आँसू सूख चुके थे और कुछ इस इंतजार में थे कि क्या पता उनके स्वजन कहीं से लौट आएँ। 
पूरे नरसंहार ने हर जगह म्यांमार प्रशासन को  लेकर एक ओर जहाँ बहुत सारे सवाल खड़े कर दिए थे, वहीं हिंसा के बाद रोहिंग्या मुस्लिमों ने बांग्लादेश जाना शुरू कर दिया था। रखाइन प्रांत के दो गाँवों में हुए इस ‘आतंकी’ हमले के बाद सैकड़ों हिंदू भी बिखर गए। कइयों का पता नहीं चल पाया और कइयों को शिविरों में ठहराया गया। इस हमले से पहले वहाँ 14 हजार हिंदू रहते थे। बौद्ध और रोहिंग्या मुस्लिमों की तादाद के मुकाबले प्रांत में ये संख्या हमेशा से बहुत कम थी।

म्यांमार हिंदू नरसंहार पर क्या कहती है एमनेस्टी की रिपोर्ट?

एमनेस्टी की रिपोर्ट में स्थानीय लोगों की बयानों के हवाले से कहा गया कि उस रात नॉक खा मॉन्ग सेक ( Kha Maung Seik) नामक गाँव में काले नकाब पहनकर आए हमलावर ग्रामीणों की आँखों पर पट्टी बाँधकर शहर से बाहर ले गए। वहाँ उन्होंने सबसे पहले महिलाओं और बच्चों से पुरुषों को अलग किया। कुछ घंटों बाद 53 हिंदुओं का गला रेत दिया गया। ये शुरुआत पुरुषों से हुई। इस घटनाक्रम में नकाबपोशों ने 8 हिंदू महिलाओं समेत कुछ बच्चों को छोड़ने की बात मान ली। लेकिन वो भी तब, जब इन लोगों ने इस्लाम कबूलना स्वीकार कर लिया।
इस रिपोर्ट के अलावा जी न्यूज की ग्राउंड रिपोर्ट भी यह दावा करती है कि उन्हें म्यांमार के स्टेट काउंसलर से आधिकारिक जानकारी मिली थी। उसमें भी यही बात कही गई कि 300 रोहिंग्या आतंकियों ने 100 हिंदुओं का अपहरण किया और उनमें से 92 की हत्या कर दी गई, जबकि 8 महिलाएँ बच गईं क्योंकि उन्होंने इस्लाम स्वीकार करने को मजबूर किया गया और बाद में बांग्लादेश ले जाया गया।
                                                                                              एमनेस्टी की रिपोर्ट में पीड़िता का बयान
फॉर्मिला नाम की महिला ने एम्नेस्टी को बताया कि उसने हिंदू पुरुषों को मरते हुए भले ही नहीं देखा लेकिन जब नकाबपोश वापस लौटे तो उनके हथियार और हाथ पर खून था। उन्होंने महिलाओं को सूचित किया उनके आदमियों को मार दिया गया। बाद में फॉर्मिला समेत 7 अन्य महिलाओं को अलग ले जाया गया। उसने पीछे मुड़कर देखा तो ASRA के आतंकी महिलाओं और पुरुषों को भी मार रहे थे। फॉर्मिला ने एक घटना का जिक्र करते हुए कहा, “मैंने देखा कि एक आदमी ने महिला के बाल को पकड़ा हुआ था और दूसरे ने चाकू लेकर उसका गला काट दिया।”
घटना के उसी दिन उसी प्रात के एक अन्य गाँव Ye Bauk Kyar से 46 लोग लापता हो गए। इनके शव बहुत ढूँढने के बाद भी बरामद नहीं हो पाए। इसी तरह 26 अगस्त 2017 को ASRA आतंकियों मे मंगडौ शहर के पास Myo Thu Gyi गाँव में 6 हिंदुओं को गोली से मार दिया। 25 वर्षीय महिला ने बताया कि उसके पति और बेटी को उसके सामने नकाबपोशों ने मारा। हालाँकि वह उनका चेहरा नहीं देख पाई। लेकिन उनकी आँखे, बड़ी-बड़ी बंदूकें और तलवारे उसने जरूर देखीं। उसने कहा, “मेरे पति को जब मारा गया। मैं थोड़े होश में थी।”

मीडिया ने हिंदू नरसंहार और इस्लामी आतंक की खबर को कैसे परोसा?

इस नरसंहार ने विश्व के कोने-कोने मे रोहिंग्या मुस्लिमों की बर्बरता पर सवाल खड़े कर दिए थे। ऐसे में वामपंथियों की पहली जरूरत थी कि रोहिंग्याओं पर लगे दाग को साफ किया जाए। शायद इसीलिए मात्र कुछ महीनों के बाद ही द क्विंट, बीबीसी और द इंडिकटर जैसे वेबसाइट्स पर कई लेख छपे। 
इन आर्टिकल्स का मूल उद्देश्य लोगों के जेहन में ये बात डालना था कि आखिर जिस प्रकार से इस पूरे हमले के लिए संप्रदाय विशेष के चरमपंथियों पर मढ़ा जा रहा है, उसमें वास्विकता में म्यांमार सरकार का, वहाँ की सेना का और इलाके के बहुसंख्यकों का भी हाथ हो सकता है। अपने लेख को सही साबित करने के लिए इनमें यहाँ तक बता दिया गया कि आखिर ARSA के लोगों की क्या यूनिफॉर्म होती है, उनके नारे क्या होते हैं और क्यों ये काम उनका नहीं है।
तमाम हिंदुओं के बयान सुनने के बाद भी रिपोर्ट्स में पूछा गया कि आखिर रोहिंग्या मुस्लिम रखाइन प्रांत के हिंदुओं को क्यों मारेंगे, उनकी हालत तो खुद रोंहिंग्या की तरह है। मीडिया रिपोर्ट्स में यह भी आरोप लगाए गए कि म्यांमार प्रशासन ने हिंदुओं को रोहिंग्याओं से अलग करने के लिए काफी आगे तक निकल गए हैं। इसलिए बौद्धों ने जो हमला किया उसका इल्जाम रोहिंग्या पर थोपा जा रहा है। अपवादों के उदाहरण देकर यह एंगल रखने की कोशिश भी की गई कि नकाबपोशों ने संप्रदाय विशेष के लोगों को भी निशाना बनाया। 
जावेद अख्तर ने भी म्यांमार में हिंदू नरसंहार के लिए वहाँ की सैन्य कार्रवाई को दोषी ठहराया था। इसके बाद उनकी बहुत आलोचना हुई थी।
जावेद अख्तर ने ट्वीट करते हुए लिखा था, “अगर रखाइन में हिंदुओं की कब्र मिली है तो यह सब वहाँ की सेना की वजह से हुआ होगा। नहीं तो, सैकड़ों की संख्या में हिंदू लोग वहाँ से रोहिंग्याओं के साथ क्यों भाग गए।”

जब मोपला में हुआ हिंदुओं का नरसंहार, तब गाँधी पढ़ा रहे थे खिलाफत का पाठ

                                                   मोपला नरसंहार और मोहनदास करमचंद गाँधी
खिलाफत आंदोलन को दिया गया भारतीय नेताओं का समर्थन वो घात था जिससे शायद भारत कभी उबर नहीं सका। खिलाफत का उद्देश्य तुर्की में खलीफा पद की पुन: स्थापना को समर्थन देना था। ऐसे में मोहनदास करमचंद गाँधी को लगा कि खिलाफत को समर्थन देना, मुस्लिमों को उनके साथ असहयोग आंदोलन में जोड़ देगा। उन्हें ये भी लगा कि अगर खलीफा के समर्थन में मुस्लिमों का साथ दिया गया तो वो बड़ी भारी तादाद में राष्ट्रीय आंदोलन में शामिल होंगे।

हालाँकि, इसके बाद मोपला मुसलमानों की कट्टरता थी जिसने 10,000 हिंदुओं के नरसंहार, सैंकड़ों हिंदू महिलाओं के बलात्कार और हिंदू मंदिरों के विध्वंस को अंजाम दिया। मालाबार नरसंहार के दौरान मोपला मुस्लिम अंधाधुंध हिंदुओं को मार रहे थे वो भी बेहद बर्बर ढंग से। एक वाकया है जिसके अनुसार 25 सितंबर 1921 को 38 हिंदुओं का बेरहमी से सिर कलम किया गया था और उनकी खोपड़ी कुएँ में फेंक दी गई थी। ये बात दस्तावेजों में भी दर्ज है कि जब मालाबार के तत्कालीन जिलाधिकारी इलाके में गए तो कई हिंदू कुएँ से मदद के लिए गुहार लगा रहे थे।

मालाबार अकेला ऐसा नरसंहार नहीं था जब हिंदुओं को मौत के घाट उतारा गया। तत्कालीन डिप्टी कलेक्टर दीवान बहादुर सी गोपालन नायर ने अपनी पुस्तक में सांप्रदायिक संघर्ष की 50 से अधिक ऐसी घटनाओं का दस्तावेजीकरण किया है, जब मालाबार के मुसलमानों ने हिंदुओं पर अत्याचार किए थे। ऐसे इतिहास के बावजूद, उस समय कम से कम कहने के लिए तो भारतीय नेतृत्व की प्रतिक्रिया शर्मनाक थी। मोहनदास करमचंद गाँधी ने मालाबार मुसलमानों के खिलाफत आंदोलन को इस उम्मीद में निर्विवाद समर्थन दिया था कि यह मुसलमानों को ‘राष्ट्रवादियों’ में बदल देगा, जिसके परिणामस्वरूप वे हिंदुओं के साथ ब्रिटिश साम्राज्य से लड़ेंगे।

अब उस समय या तो एमके गाँधी हिंदुओं पर हुए अत्याचार के इतिहास से अपरिचित थे या उन्होंने खुद को मासूम दिखाना चुना…यह सोचना हमारे विवेक पर छोड़ दिया गया है क्योंकि इतिहास की किताबों में शायद ही कहीं भी भारत में इस्लामी कट्टरपंथ के विकास पर बात करते हुए मालाबार नरसंहार का या फिर खिलाफत आंदोलन की भूमिका का आलोचनात्मक विश्लेषण किया गया है। हालाँकि, गाँधी की मंशा उनकी एक भाषण से भी साफ होती है जो कि कालीकट में शौकत अली के साथ दी गई थी। वो तारीख 18 अगस्त 1920 की थी जब ‘महात्मा गाँधी ने असहयोग की भावना और खिलाफत के प्रश्न पर भाषण दिया था।

गाँधी ने कहा था वे मानते कि यदि भारतीय असहयोग की भावना को समझेंगे तो जरूर सफल होंगे और बर्मा के गवर्नर ने खुद कहा था कि अंग्रेज भारत पर शासन करना बलपूर्वक नहीं, बल्कि लोगों के समर्थन से जारी रखेंगे। इसके बाद उन्होंने लोगों से सरकार की गलतियों को बर्दाश्त नहीं करने का आह्वान किया।

वहाँ गाँधी बोले, “शाही (ब्रिटिश) सरकार ने जानबूझकर 70 लाख मुसलमानों द्वारा पोषित मजहबी भावनाओं की धज्जियाँ उड़ाई है।” गाँधी ने ये भी कहा कि उन्होंने खिलाफत के सवालों को ‘विशेष तरीके’ से समझा था और उन्हें विश्वास था कि ब्रिटिश सरकार ने मुसलमानों की भावनाओं को आहत किया है जैसा उन्होंने पहले नहीं किया था।

गाँधी ने कहा, “असहयोग की बातें उन्हें समझाई गई और यदि वे इसे स्वीकार नहीं करते तो भारत में रक्तपात होता। मैं मानता हूँ कि खून बहाने से उनकी बात नहीं मानी जाएगी। लेकिन जो आदमी क्रोध की स्थिति में है जिसके दिल को दुख पहुँचा है, वे अपने कर्मों के परिणाम की चिंता नहीं करता।”

भारतीय मुसलमानों द्वारा हिंदुओं पर की जा रही हिंसा को सही ठहराते हुए गाँधी ने कहा, “मैं आपको एक पल के लिए भारत के उत्तरी छोर पंजाब ले जाने का प्रस्ताव रखता हूँ ताकि दिखे कि दोनों सरकार ने पंजाब के लिए क्या किया है। मैं ये स्वीकार करने को तैयार हूँ कि अमृतसर में भीड़ कुछ समय के लिए पगला गई थी। उन्हें एक दुष्ट प्रशासन द्वारा उस पागलपन के लिए उकसाया गया था। लेकिन लोगों की ओर से दिखाया गया कोई भी पागलपन निर्दोषों के खून बहने को सही नहीं ठहरा सकता। उन्होंने इसके बदले क्या चुकाया? मैं यह कहने का साहस करता हूँ कि कोई भी सभ्य सरकार पंजाब में उपजी स्थिति के लिए लोगों को सजा नहीं देती। वहाँ निर्दोष पुरुषों को मॉक ट्रॉयल और आजीवन कारावास से गुजरना पड़ा।”

यहाँ मोपला मुस्लिमों की बात करते हुए उन्होंने जलियाँवाला बाग नरसंहार को उठाया, जिसे ब्रिटिशों ने अंजाम दिया था और मुस्लिमों द्वारा किए गए नरसंहार पर लीपापोती करते हुए बात की कि कैसे ब्रिटिश सरकार ने जलियाँवाला बाग जैसी घटना पर एक्शन नहीं लिया।

गाँधी ने जलियाँवाला बाग के बारे में बात करते हुए और मुसलमानों द्वारा की गई हिंसा को न्यायोचित दिखाने के लिए ये बताया कि अंग्रेजों ने धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाई थी। अपनी बात कहते हुए गाँधी मुसलमानों और इस्लाम के कारणों पर बोलते रहे। गाँधी ने आगे बताया कि असहयोग आंदोलन में भाग लेना अंग्रेजों द्वारा इस्लाम के अपमान का बदला लेने का तरीका था और अगर आंदोलन को ठीक से अपनाया गया, तो यह जीत में समाप्त होगा।

उन्होंने पूछा, “क्या भारत के मुस्लिम जिन्हें लगता है कि उनके साथ गलत हुआ वो आत्म बलिदान के लिए तैयार हैं। अगर हम सरकार को लोगों की इच्छा मुताबिक मजबूर करना चाहते हैं, जैसा कि हमें करना चाहिए, तो हमारे लिए एकमात्र उपाय असहयोग है।”

सबसे अधिक समस्या वाली बात जो गाँधी ने कही, “यदि भारत के मुसलमान खिलाफत पर न्याय सुरक्षित करने के लिए सरकार को असहयोग की पेशकश करते हैं, तो यह हर हिंदू का कर्तव्य है कि वह अपने मुस्लिम भाइयों के साथ सहयोग करे।” गौर करने वाली बात यह है कि गाँधी ने यह भाषण 1920 में दिया वो भी उस समय जब मुसलमानों ने पहले से ही खिलाफत स्थापित करने की माँग और तुर्की में खिलाफत के समर्थन में हिंदुओं का नरसंहार करना शुरू कर दिया था।

मुस्लिमों द्वारा हिंदुओं के नरसंहार के बावजूद गाँधी हिंदू-मुस्लिम एकता के नाम पर हिंदुओं से अपील कर रहे थे कि वो मुस्लिमों का सहयोग दें। उन्होंने कहा, “मैं हिंदुओं और मुसलमानों के बीच की सच्ची मित्रता को ब्रिटिश संबंध से असीम रूप से अधिक महत्वपूर्ण मानता हूँ। इसलिए, मैं यह सुझाव देने का साहस करता हूँ कि यदि वे मुसलमानों के साथ एकता के साथ रहना पसंद करते हैं, तो अब यह है कि उन्हें सबसे अच्छा अवसर मिला है और ऐसा अवसर एक सदी तक नहीं आएगा। मैं यह सुझाव देने का साहस करता हूँ कि अगर भारत सरकार और ब्रिटिश सरकार को पता चलता है कि खिलाफत और पंजाब के साथ हुए गलत को सही करने के लिए इस महान राष्ट्र का एक एक महान दृढ़ संकल्प है, तो सरकार हमारे साथ न्याय करेगी।”

ये जानना भी दिलचस्प है कि गाँधी ने पंजाब के सिखों की देशभक्ति को खिलाफत आंदोलन से जोड़ा जो कि तुर्की में खलीफा की पुन: स्थापना के लिए लड़ा जा रहा था। भारतीय मुसलमानों की इस्लामी खलीफा संबंधी माँगों को जायज दिखाने के इन्हीं प्रयासों ने हिंदुओं पर तमाम अत्याचारों को जन्म दिया था, जबकि गाँधी हिंदुओं से ये अपेक्षा कर रहे थे हिंदू स्वयं के उत्पीड़कों के साथ एकजुट होकर रहें। हिंदुओं पर इस आभासी एकता का भार डालकर गाँधी ने उन्हें समझाया कि साथ रहना उनका राष्ट्रीय कर्तव्य है। भले ही वो उन्हें मारें, परेशान करें, रेप करें। लेकिन हिंदुओं के चेहरे पर मुस्कान होनी चाहिए।

असहयोग के पहले चरण पर बात करने के बाद जो कि केवल ब्रिटिश ऑफर्स को नकारने तक था, शौकत अली ने कालीकट मुस्लिमों को अलग से खिलाफत आंदोलन के संबंध में अपनी माँग बताई। जैसा कि गाँधी की कालीकट में दी गई पहली स्पीच में देख सकते हैं कि उन्होंने भी हिंदुओं पर ही एकता का भार डाला जिनका पहले से नरसंहार हो रहा था। हकीकत में ये भाषण उस संदर्भ में था ही नहीं कि अंग्रेजों को भारत से खदेड़ा जाए। ये भाषण इस्लामी शासन की स्थापना के संदर्भ में संबोधित किया गया था।

एक ओर जहाँ गाँधी ने 18 अगस्त 1920 को ये स्पीच दी थी और 28 अप्रैल 1920 को खिलाफत आंदोलन आधिकारिक तौर पर शुरू हुआ था। वहीं एक प्रस्ताव अर्नाड तालुक के मुख्यालय मंजेरी में आयोजित किया गया।

                                                                गोपालन नय्यर की किताब का स्क्रीनशॉट

20 अगस्त 1921 के आसपास मुस्लिम जमातियों द्वारा हिंदुओं का मालाबार नरसंहार हुआ और मोहनदास करमचंद गाँधी ने 15 सितंबर 1921 की शाम को फिर से कालीकट की यात्रा की और उनका भाषण मद्रास के ट्रिप्लिकेन बीच पर दिया गया था।

जहाँ सैंकड़ों पुरुष काटे जा रहे थे, महिलाओं का रेप हो रहा था और बच्चे मारे जा रहे थे, गाँधी उस समय भी हिंदुओं को अहिंसा का पाठ पढ़ाते रहे। जिस दौरान मोपला मुस्लिमों ने कट्टरता के चलते हिंदुओं को मारा, गाँधी ने मुस्लिमों पर नाराजगी दिखाने की जगह ब्रिटिश सरकार को कोसा कि उनकी वजह से मुस्लिम इतने बेलगाम और हिंसक हुए।

अब नीचे पढ़िए कि 16 सितंबर 1920 को कालीकट में गाँधी की स्पीच पर मद्रास मेल ने क्या लिखा था (यहाँ कुछ प्रासंगिक अंशों पर प्रकाश डाला गया है):

ये सरकार पर निर्भर करता था क्योंकि उनके पास इतनी शक्ति थी कि वो अली भाइयों को और अन्य प्रवक्ताओं को मालाबार के प्रभावित इलाकों में बुलाते ताकि अमन और सुकून लाया जा सकता। गाँधी इस बात को लेकर आश्वस्त थे कि अगर ऐसा होता तो शायद हिंदुओं का खून नहीं बहता और न ही हिंदुओं के घर उजड़ते। लेकिन यहाँ उन्हें सरकार पर ये आरोप लगाने के लिए माफ किया जाना चाहिए कि उन्होंने (सरकार) इच्छा से आबादी को हिंसा के लिए भड़काया।

सरकारी तंत्र में बहादुर और ताकतवर लोगों के लिए जगह नहीं थी, ऐसे लोगों के लिए सरकार के पास सिर्फ जेल था। उन्होंने मालाबार में हुई घटना पर अफसोस जताया। मोपला जो कि काबू से बाहर थे वो पागल हो गए थे। उन्होंने खिलाफ़त के खिलाफ़ और अपने देश के विरुद्ध गुनाह किया। पूरा भारत अहिंसक बने रहने के बहकावे में था। कोई कारण नहीं था कि इस बात में संदेह हो कि ये मोपला असहयोग की भावना को नहीं समझे। असहयोगियों को भी प्रभावित हिस्सों में जाने से रोका गया। ये मानकर कि सारा दबाव सरकारी हलकों की ओर से आया और जबरन धर्म परिवर्तन एक सच था हिंदुओं को हिंदू- मुस्लिम एकता को दागदार नहीं करना चाहिए और इसे नहीं तोड़ना चाहिए।

प्रवक्ता हालाँकि ऐसे अनुमान लगाने के लिए तैयार नहीं थे लेकिन उन्हें इस बात के लिए मनाया कि जो लोग जबरन परिवर्तित किए गए हैं उन्हें प्रायश्चित की जरूरत नहीं है। याकूब हसन उन्हें बोल चुके थे कि जिन्हें परिवर्तित किया गया वो इस्लाम में स्वीकार्य नहीं हैं और उन्होंने अपने हिंदू धर्म में रहने के अधिकारों को नहीं खोया है। उजड़े घरों में राहत पहुँचाने के लिए सरकार कॉन्ग्रेस और खिलाफत कार्यकर्ताओं के रास्ते में हर बाधा डाल रही थी और खुद राहत पहुँचाने में कोई काम नहीं कर रही थी। सरकार ने उन्हें अनुमति दी या नहीं, यह उनका कर्तव्य था कि पीड़ितों की राहत के लिए धन इकट्ठा करें और यह सुनिश्चित करें कि उन्हें वह मिल गया जिसकी उन्हें आवश्यकता थी। उन्हें अभी यही नहीं पता कि सरकार इस भूमि के लोगों की ताकत और उत्थान को दबाने के लिए क्या करने जा रही थी। उनके पास इस गवाही पर विश्वास करने का कोई कारण नहीं था कि कई युवकों का अपमान किया गया क्योंकि उन्होंने खद्दर की टोपी और पोशाक पहनी थी। शांति के रखवालों ने नौजवानों के खद्दर के बनियान फाड़ दिए थे और उनको जला दिया था। मालाबार प्रशासन ने प्रताड़ित करने का एक नया तरीका खोजा था कि अगर किसी ने पंजाब में घटित चीजों से ज्यादा कुछ किया तो क्या किया जाएगा।

जब मालाबार मुसलमान हिंदुओं का नरसंहार कर रहे थे, महिलाओं का बलात्कार कर रहे थे और जबरन हिंदुओं का धर्मांतरण कर रहे थे, मोहनदास करमचंद गाँधी ने जोर देकर कहा कि उन्होंने ‘खिलाफत आंदोलन’ के खिलाफ गुनाह किया है, न कि हिंदुओं के खिलाफ। वास्तव में, उन्होंने आगे बढ़कर जोर देकर कहा था कि हिंदुओं को ‘अहिंसक’ रहना चाहिए चाहे कितने ही उकसावे का सामना करना पड़े।

गाँधी ने कहा कि भले ही यह सच है कि मुसलमान हिंदुओं को जबरन परिवर्तित कर रहे थे, मगर हिंदुओं को इस हिंदू-मुस्लिम एकता को तोड़ने नहीं देना चाहिए। यहाँ ध्यान रहे कि गाँधी के लिए बेशक, बलात्कार, हत्याएँ और जबरन धर्मांतरण एकता को नहीं तोड़ रहे थे, लेकिन हिंदू, जिन्हें सताया जा रहा था, संभावित रूप से अपने स्वयं के उत्पीड़न के बारे में हल्का गुस्सा करके उस ‘एकता’ को तोड़ सकते थे।

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यह स्पष्ट है कि नरसंहार के बावजूद, भारतीय नेतृत्व जिसमें प्रमुख रूप से गाँधी शामिल थे, उसने हिंदुओं को उनके चेहरे पर मुस्कान के साथ मरते रहने के लिए कहा और इस्लामी शासन स्थापित करने की माँग करने वाले आंदोलन को बेलगाम समर्थन दिया। ऐसे में इसके बाद हुए हिंदुओं के मालाबार नरसंहार को सीधे तौर पर उन नेताओं को जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए जिन्होंने कायरता का प्रदर्शन किया और उस समय के बर्बर मुसलमानों को छोड़कर और ‘एकता’ की वेदी पर हिंदू जीवन का बलिदान दिया।

(साभार : यह लेख ऑपइंडिया की एडिटर इन चीफ नुपूर जे शर्मा के मूल लेख पर आधारित है। इसका अनुवाद जयंती मिश्रा ने किया है।