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मैं कोई तिरंगा-विरंगा नहीं… राजदीप सरदेसाई ने इस बार किया राष्ट्रीय ध्वज का अपमान: क्या ऐसे होते हैं वरिष्ठ पत्रकार?

                               सौरभ द्विवेदी और राजदीप सरदेसाई (फोटो साभार: द लल्लनटॉप)
इंडिया टुडे के वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई अपने मुँह से अनाप-शनाप निकालने की वजह से अक्सर सोशल मीडिया पर ट्रोल होते हैं। इस बार भी वह इसी कारण से गाली खा रहे हैं। उन्होंने एक वीडियो में तिरंगे को लेकर अपने मन की बात रखी और वही बात सोशल मीडिया पर वायरल हो गई।

 देख सकते हैं कि ‘द लल्लनटॉप’ के सौरभ द्विवेदी के साथ उनकी बातचीत क्रिकेट मैच देखने पर चल रही थी। इसी दौरान सौरभ बताने लगे कि वो स्टेडियम में बैठकर मैच देखने को लेकर इतने उत्साहित हैं कि उन्होंने निर्णय लिया है कि वो कलाई पर तिरंगा भी बनवाएँगे। इसके बाद उन्होंने कैमरे पर दिखाया कि वो अपने डेस्क पर भी हमेशा तिरंगा रखते हैं जिसे भारतीय सेना के बलिदानियों की विधवा (वार विडोज) द्वारा बनाया जाता है। उन्होंने बताया कि ये तिरंगा उनके दोस्तों ने उन्हें दिया था इसलिए वो हमेशा मेज पर रहता है।

इसे सुन राजदीप सरदेसाई बड़ी हैरानी के साथ आँख निकालकर पूछते हैं- तो इसे आप लेकर जा रहे हो? इस पर सौरभ कहते हैं कि वो बस बात बता रहे हैं क्योंकि उन्हें याद आ गया है।तुरंत बाद राजदीप सरदेसाई कहना शुरू करते हैं, “मैं कोई तिरंगा-विरंगा नहीं रखता। तिरंगा मेरे दिल में है।”

सौरभ उनकी बात सुन नाराज होते हैं और उन्हें उनकी इस भाषा के लिए टोंकते हैं। वह समझाते हैं, :आप हमेशा कहते हो कि हिंदी आपकी पहली भाषा नहीं और उसके बाद आप ऐसी बात कहते हो। तिरंगा-विरंगा मत कहो।”

इस पर राजदीप बात को संभालते हुए कहते हैं, “मैं तिरंगे को अपने दिल में रखता हूँ और मैं इंडिया की शर्ट पहनूँगा लेकिन तिरंगा हाथ पर नहीं बनवाऊँगा।” इस पर सौरभ चुटकी लेते हुए कहते हैं- “अब आपकी ये सब करने की उम्र भी नहीं है।”

राजदीप सरदेसाई की यही क्लिप सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है। लोग इसे देखने के बाद राजदीप पर भड़क रहे हैं। कहा जा रहा है कि जिसके मन में तिरंगे के प्रति सम्मान नहीं होता वही इस तरह की बातें करता है।

कुछ यूजर्स इसे सीधे तौर पर भारत के राष्ट्रीय ध्वज का अपमान बता रहे हैं। राजदीप के बड़बोलेपन पर कार्रवाई करने की बातें हो रही हैं।

सवाल खड़ा किया जा रहा है कि जो व्यक्ति खुद को वरिष्ठ पत्रकार कहता है उसे ये भी नहीं पता क्या कि वो शब्द कैसे इस्तेमाल कर रहा है।

किसी का राजदीप सरदेसाई की वीडियो देख कहना है कि ये लोग कॉन्ग्रेसी पत्रकार हैं भारत का अपमान तो करेंगे ही।

‘मुगल महान, हिंदुओं ने बौद्ध मंदिर तोड़े’: मुगलों के ‘प्रवक्ता’ राजदीप सरदेसाई को साथी पत्रकार गौरव सावंत ने पानी पिला-पिला कर धो दिया

                                    मुगल इतिहास पर बात करते हुए राजदीप सरदेसाई और गौरव सावंत
NCERT किताबों में मुगल इतिहास पर विवाद बढ़ता जा रहा है। इसी क्रम में हर न्यूज रूम में इस पर बहस हो रही है। एक पक्ष का कहना है कि स्कूली शिक्षा में मुगलों के बारे में पढ़ाया जाना अनिवार्य होना चाहिए ताकि पता चले कि उन्होंने भारत के लिए कितना कुछ किया। वहीं दूसरे पक्ष का कहना है कि मुगलों का इतिहास शिक्षा का हिस्सा हो लेकिन उसे बिन किसी तोड़-मरोड़ के पेश किया जाए ताकि ये पता चले कि मुगलों ने भारत में कितनी तबाही मचाई।

अब यही बहस न्यूजरूम्स तक भी पहुँच गई है। इंडिया टुडे के एंकर व कंसल्टिंग एडिटर राजदीप सरदेसाई भी ऐसी ही एक चर्चा में शामिल हुए जहाँ उन्होंने अपने ‘प्रोपेगेंडा’ को गोल-मोल करके पेश करने का प्रयास किया। हालाँकि, इस दौरान शो में बैठे एंकर व मैनेजिंग एडिटर गौरव सावंत ने उन्हें जमकर लताड़ लगाई। उन्हें तथ्यों से वाकिफ करवाते हुए बताया कि आखिर किस तरह मुगलों ने भारत में हिंदुओं को चुन-चुनकर मारा था जिसे इतिहास की किताबों में चालाकी से छिपा दिया गया।

इंडिया टुडे के डेमोक्रेटिक न्यूजरूम शो में देख सकते हैं कि राजदीप सरदेसाई कहते हैं, “इतिहास की बातें इतिहासकारों के हाथ में छोड़ दी जानी चाहिए, न कि उसे राजनेताओं को लिखने को देना चाहिए, क्योंकि ऐसा होते ही इतिहास में जहर भर जाता है। आप इतिहास से मुगलों को नहीं मिटा सकते। उन्होंने भारत के बहुलवादी संस्कृति का प्रतिनिधित्व किया है। आप उन्हें मिटाकर कैसे सिर्फ विलन दिखा सकते हैं। मैं नहीं कहता कि अकबर महान था। मगर कम-से-कम हमारे युवाओं को अकबर के बारे में पढ़ने तो दो। उन्हें देश के अन्य राजाओं के बारे में पढ़ने दो। लेकिन इस प्रकार चुन-चुनकर इतिहास मिटाना ताकि वो राजनैतिक एजेंडे को सूट करे वहाँ मुझे आपत्ति होती है। यही पाकिस्तान ने भी इतिहास के साथ किया था जिस वजह से वहाँ की पीढ़ी भारत पर निशाना साधती रहती है।”

गौरव सावंत ने लगाई राजदीप को लताड़

राजदीप की बात सुनने के बाद गौरव सावंत ने अपनी बात शुरू की। उन्होंने कहा कि वह राजदीप से सहमत हैं कि मुगल इतिहास को कभी भी बच्चों की किताबों से नहीं मिटाया जाना चाहिए। इस देश को पता होना चाहिए कि अकबर ने आखिर किया क्या था। पता होना चाहिए कि बाबर इस धरती का एक विध्वंसक था जो कहीं और से आया था। चित्तौड़ के युद्ध में कैसे 40 हजार हिंदू मारे गए थे और उनकी संख्या मापने के लिए उनके जनेऊ गिने गए थे।
उन्होंने कहा ये सब राजनेताओं द्वारा लिखित इतिहास की किताब में नहीं लिखा गया बल्कि इसे जेम्स स्टॉर्ट ने लिखा है। इसी तरह अकबर ने प्रयागराज और बनारस में क्या किया। बदायूनी को इसलिए ईनाम से नवाजा था क्योंकि उसने काफिरों के खून में अपने दाढ़ी भिगाने की बात कही थी। इसके बाद फादर मॉनसेराट ने भी लिखा है कि कैसे मुसलमानों ने हिंदुओं के मंदिरों और उसकी मूर्तियों को तोड़ा।

‘दीन-ए-इलाही’ की आड़ में छिपाया हिंदुओं का नरसंहार

कार्यक्रम में राजदीप सरदेसाई को कहते सुना जा सकता है कि गौरव नफरत फैलाने के अलावा भी बहुत सारा इतिहास है। उन्होंने दीन-ए-इलाही का उदाहरण रखकर इस्लामी बर्बरता पर सफाई देने का प्रयास किया। वहीं गौरव सावंत ने उन्हें ये कहकर चुप कराया कि मार्क्सवादियों द्वारा लिखे गए इतिहास में यही तो था कि उसमें दीन-ए-इलाही बता दिया गया, लेकिन ये नहीं बताया गया कैसे चित्तौड़ में हिंदू मरे। जहाँगीर के बारे में यह नहीं बताया गया कि कैसे उसने सिखों के पाँचवे गुरु को गर्म तवे पर बैठाकर मारा था।
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डेमोक्रेटिक न्यूजरूम की यह बहस यही नहीं रुकी। इस कार्यक्रम में राजदीप ने बहादुर शाह जफर को महान विद्वान बताया और ये भी कहा कि उन्होंने विलियन डार्लिम्पल के पॉडकास्ट से जफर के योगदान के बारे में जाना। कहा कि जिस दिल्ली में हम रहते हैं यहाँ भी मुगलों ने काफी योगदान दिया है। इस पर गौरव सावंत ने उनसे पूछा कि आखिर दिल्ली के बड़े-बड़े मंदिर कहाँ हैं। राजदीप ने आगे यहाँ तक कहा कि हिंदुओं ने बौद्धों के मंदिरों को तोड़ा जिसे सुन ट्विटर के ट्रू इंडोलॉडी अकॉउंट ने उन्हें चुनौती दी कि वो बस तीन ऐसे हिंदू राजाओं के बारे में बता दें, उसके बाद वह तमाम हिंदू राजाओं के बारे में बताएँगे जिन्होंने बौद्ध धर्म के लिए कितना कुछ किया।
बीते कुछ दिनों से ये चर्चा हो रही है कि 12 वीं की एनसीईआरटी किताबों से मुगल इतिहास के अध्याय हटाए जा रहे हैं। जबकि एनसीईआरटी के डायरेक्टर का कहना है कि ऐसा दावा करने वाले न्यूज आउटलेट सिर्फ झूठ फैला रहे हैं।

‘समाज को बाँटो मत’: इंटरव्यू में हिन्दू-मुस्लिम कर रहे राजदीप सरदेसाई को राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने दिखाया आईना

                                                                                                                        साभार : इंडिया टुडे 
केरल राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान कांग्रेस में रहते हुए भी बेबाक बोलने में चर्चित रहे हैं। जब तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गाँधी के कार्यकाल में शाहबानो निर्णय को मुस्लिम कट्टरपंथियों के कहने पर संसद के माध्यम से निरस्त किया जा रहा था, तब भी उन्होंने राजीव के उस निर्णय का पुरजोर शब्दों में विरोध किया था। आरिफ का मानना ही देश को हिन्दू-मुस्लिम में मत बांटों। मुस्लिम को भारतीय समझों, और इस मुद्दे पर मुस्लिम कट्टरपंथियों पर भी प्रहार करने से कभी नहीं चुके। देश की मुख्य समस्या यही है कि मुस्लिम कट्टरपंथियों ने सियासतखोर कुर्सी के भूखे नेता और पार्टियों को अपनी उँगलियों पर नचाकर मुस्लिमों को मुख्यधारा से अलग रखने की कोशिश करते रहे हैं, और वही देश में अराजकता फैलने का कारण भी है।    

इंडिया टुडे के पत्रकार राजदीप सरदेसाई को 9 अक्टूबर 2021 को केरल के राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान ने करारा जवाब दिया। खान ने बहुसंख्यक-अल्पसंख्यक के सवाल पर अपनी अस्वीकृति जाहिर करते हुए कहा कि जब भारत की बात आती है, तो इसके सभी नागरिकों को उनके धर्म की परवाह किए बिना ‘समान अधिकार’ दिए जाते हैं।

इंडिया टुडे पर इंटरव्यू के दौरान राजदीप ने खान से पूछा कि वह एक भारतीय मुस्लिम के तौर पर अपनी पहचान को कैसे देखते हैं? उनके इस सवाल ने राज्यपाल को व्यथित कर दिया। फिर भी उन्होंने इसका जवाब दिया, “हम आज़ादी का अमृत महोत्सव मना रहे हैं। हमारी आजादी मुफ्त में नहीं आई। इसके साथ देश का विभाजन, देश का खूनी विभाजन हुआ। तब समुदायों के बीच बहुत हिंसा हुई थी … मुझे लगता है कि विभाजन इस काल्पनिक मुस्लिम प्रश्न के कारण हुआ। बहुसंख्यक और अल्पसंख्यक हिंसा का कारण बना।”

राज्यपाल ने समुदाय और धर्म के आधार समाज को बाँटने की मीडिया की कोशिशों पर नाराजगी व्यक्त की और कहा कि भारत की आजादी के 75 साल बाद भी यह दुखद है कि मीडिया सबका साथ, सबका विकास सबका विश्वास पर चर्चा करने के बजाय विभाजनकारी भाषण दे रहा है।

उन्होंने आगे कहा, “अंग्रेजों ने कभी भी भारत को एक राष्ट्र के रूप में मान्यता नहीं दी। वे इसे हमेशा समुदायों का समूह मानते थे। लेकिन, यह संविधान नागरिकों को भारत की इकाई मानता था। अब समुदायों का सवाल कहाँ है? मेरे गाँव में आओ और एक मुस्लिम से पूछो कि यह मुस्लिम सवाल क्या है। वह भ्रमित हो जाएगा। क्योंकि उन्हें भी उन्हीं समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है, जिनका सामना दूसरे समुदायों के किसानों को करना पड़ता है। सिर्फ इसलिए कि हैदराबाद में किसी ने कहा कि एक मुस्लिम सवाल है, हमने इसे गंभीरता से लिया है।”

केरल के राज्यपाल ने यह बातें दिल्ली में इंडिया टुडे कॉन्क्लेव के दौरान ‘बहुसंख्यक, अल्पसंख्यक: द बैटल ऑफ बिलॉन्गिंग’ विषय पर बोलते हुए कही। खान ने कहा कि भारतीय सभ्यता और ‘हमारी सांस्कृतिक विरासत’ में किसी के धर्म के आधार पर भेदभाव की कोई अवधारणा नहीं है।

उन्होंने अपने दावे को पुख्ता करने के लिए कुछ श्लोकों का हवाला देते हुए कहा, “भारतीय सभ्यता को कभी भी धर्म द्वारा परिभाषित नहीं किया गया है, अन्य सभी सभ्यताओं को या तो धर्म द्वारा परिभाषित किया गया है, ज्यादातर को धर्म द्वारा और उससे पहले भी नस्ल और भाषा द्वारा पिरभाषित किया गया।”

यह पूछे जाने पर कि क्या पिछले कुछ दशकों में भारतीय राजनीति अल्पसंख्यक तुष्टिकरण से बहुसंख्यकवाद की ओर बढ़ी है, खान ने कहा कि यह भारत का संविधान है, इसकी हजारों साल पुरानी परंपराएँ हैं, जिन्होंने कभी विभाजन और अलगाव की विचारधारा का समर्थन नहीं किया।

खान ने आगे कहा, “यह न केवल हमारा संविधान है जो लोगों को समान अधिकार देता है, बल्कि इससे भी अधिक हमारी सांस्कृतिक विरासत, भारतीय सभ्यता में धर्म के आधार पर भेदभाव की कोई जगह नहीं है। इसलिए दोनों को जोड़ना मुझे यह बेतुका लगता है।”

वैक्सीन पॉलिसी: पी चिदंबरम और राजदीप सरदेसाई ने कोरोना वैक्सीन को लेकर फैलाया था प्रोपेगंडा; चिदंबरम ने वापस लिया बयान

कांग्रेस नेता पी चिदंबरम ने जहाँ कोरोना वैक्सीन को लेकर भ्रम फैलाया, वहीं ‘इंडिया टुडे’ के पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने भी अपने पुराने बयान से यू-टर्न लेते हुए केंद्र सरकार के फैसले का श्रेय विपक्षी नेताओं को दे डाला। विपक्षी नेताओं ने सोशल मीडिया पर हंगामा करने में देर नहीं मचाई और दावा किया कि वैक्सीन नीति की प्रक्रिया ‘सेंट्रलाइज्ड’ हो, ये उनकी शुरू से माँग थी। पूर्व केंद्रीय मंत्री पी चिदंबरम ने भी यही किया।

उन्होंने दावा किया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘राष्ट्र के नाम सम्बोधन’ का संदेश यही है कि केंद्र सरकार ने अपनी पिछली गलतियों से सीख ली है और उसने जो दो प्रमुख गलतियाँ की थीं, उसे सुधारने का प्रयास किया है। लेकिन, साथ ही उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी पर झाँसा देने का आरोप लगाते ये भी कहा कि उन्होंने अपनी गलतियों के लिए विपक्ष को जिम्मेदार ठहरा दिया। उन्होंने दावा किया कि किसी ने भी ऐसा नहीं कहा था कि केंद्र को वैक्सीन की खरीद नहीं करनी चाहिए।

तमिलनाडु के कांग्रेस नेता ने आरोप लगाया कि अब मोदी कह रहे हैं कि राज्यों ने वैक्सीन की खरीद के लिए इच्छा प्रकट की थी, इसीलिए उन्हें ये सुविधा दी गई थी। उन्होंने सवाल दागा था कि किस राज्य के किस मुख्यमंत्री ने किस समय वैक्सीन की खरीद के लिए इच्छा प्रकट की थी या ऐसी माँग की थी? इसके बाद लोगों ने उनके सामने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का पत्र पेश किया, जिसमें उन्होंने यही माँग रखी थी।

फिर पी चिदंबरम ने अपने बयान को गलत बताते हुए कहा कि सोशल मीडिया एक्टिविस्ट्स ने मुख्यमंत्री ममता का पत्र शेयर किया है, जिसके बाद वो अपने बयान में भूल-सुधार करते हैं। चिदंबरम ने ये बयान ANI को दिया था। दरअसल, फरवरी 24, 2021 के उस पत्र में ममता बनर्जी ने माँग की थी कि राज्य सरकारों को प्राथमिकता के आधार पर राज्यों को बड़ी संख्या में वैक्सीन की खरीद की अनुमति देनी चाहिए।

इस दौरान पी चिदंबरम अपनी ही पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी का वो पत्र भी भूल गए, जो उन्होंने अप्रैल 8, 2021 को लिखा था। राहुल गाँधी ने तब माँग की थी कि वैक्सीन की खरीद में राज्य सरकारों की ज्यादा भूमिका होनी चाहिए। तब उन्होंने ‘सेंट्रलाइज्ड प्रोपेगंडा’ को गलत करार दिया था। खुद पी चिदंबरम ने NDTV को वैक्सीन की प्रक्रिया डिसेंट्रलाइज करने को कहा था। शेखर गुप्ता ने भी एक ट्वीट में लिखा था कि कई राज्यों ने ऐसी माँग की है।

ज्ञात हो कि टीकाकरण की रणनीति पर पुनर्विचार करने और 1 मई से पहले की व्यवस्था को वापस लाते हुए प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि राज्यों के जिम्मे जो 25 प्रतिशत टीकाकरण था, उसे अब भारत सरकार द्वारा करने का निर्णय लिया गया है। इस निर्णय को दो सप्ताह में अमल में ला दिया जाएगा। दो सप्ताह में केन्द्र और राज्य नए दिशा निर्देशों के मुताबिक जरूरी तैयारियाँ करेंगे। आगामी 21 जून से, भारत सरकार 18 वर्ष से अधिक आयु के सभी भारतीय नागरिकों को मुफ्त कोरोना वैक्सीन प्रदान करेगी।

वहीं राजदीप सरदेसाई ने राज्यों को वैक्सीन को वैक्सीन की खरीद का अधिकार दिए जाने के समय मनमोहन सिंह को श्रेय देते हुए उनकी तारीफों के पुल बाँधे थे, लेकिन अब वो इस प्रक्रिया के वापस लिए जाने के बाद विपक्षी नेताओं को श्रेय देते नहीं अघा रहे। उन्होंने दावा किया कि मोदी सरकार ने राज्यों और स्वास्थ्य विशेषज्ञों की सलाह मान ऐसा किया है। लेकिन, तब राजदीप ने कहा था कि मनमोहन की सलाह पर राज्यों को ये अधिकार मिला है।

डॉ देवी शेट्टी ने राजदीप को समझा दिया स्वास्थ्य सिस्टम के इतिहास से ऑक्सीजन सप्लाई के भूगोल तक

                       डॉक्टर देवी शेट्टी ने राजदीप सरदेसाई की लगाईं क्लास (फोटो साभार: इंडिया टुडे स्क्रीनग्रैब)
प्रोपेगंडा पत्रकार राजदीप सरदेसाई की जहरीला प्रोपेगंडा चलाने में जितनी बेइज्जती हुई है, शायद ही किसी अन्य पत्रकार की हुई हो। लेकिन प्रोपेगंडा पत्रकार से लेकर किसी भक्त पत्रकार तक ने ऑक्सीजन की कमी पर रोने वाले किसी नेता अथवा डॉक्टर से यह नहीं पूछा कि 'आखिर ऑक्सीजन की ऑडिट होने के डर से एकदम ऑक्सीजन कहाँ से पूरी होने लगी?' रोज हर चैनल पर चर्चा में कोई न कोई डॉक्टर होता है, लगता वह भी प्रोपेगंडा से ग्रहस्त होकर अपनी प्रसिद्धि को बनाने के लिए चिकनी-चुपड़ी बातों से राजनीती करने आते हैं, लेकिन डॉ देवी शेट्टी की भांति किसी डॉक्टर ने स्वास्थ्य सिस्टम की उन बारीकियों से एंकर और जनता को समझाने का प्रयास नहीं किया। 

राजदीप ने ‘नारायणा हेल्थ’ के संस्थापक डॉक्टर देवी शेट्टी का ‘इंडिया टुडे’ समाचार चैनल पर इंटरव्यू लेते समय अपने मोदी विरोधी एजेंडे को आगे बढ़ाना चाहा, लेकिन उन्हें करारा जवाब मिला। उन्होंने कहा कि ऑक्सीजन की कमी से लोगों की मौत हो रही है, ऐसे में बेड्स और ऑक्सीजन सप्लाई के मामले में मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर को बेहतर बनाने के कौन से तरीके अपनाए जाएँ?

इस प्रश्न के जवाब में 30 से भी अधिक मल्टी स्पेशलिटी अस्पतालों का संचालन करने वाले डॉ देवी शेट्टी ने कहा कि सबसे पहले तो सभी लोग सरकार की आलोचना करने में लगे हुए हैं क्योंकि ये सबसे आसान है। उन्होंने कहा कि आज भारत में कोरोना संक्रमित मरीजों की जितनी संख्या है, इसका प्रबंधन दुनिया की कोई भी सरकार नहीं कर सकती है। उन्होंने कहा कि अमेरिका, UK या किसी भी देश की सरकार इतनी बड़ी संख्या में कोरोना मामलों से नहीं निपट सकती।

उन्होंने कहा कि भारत में संक्रमितों की संख्या काफी ज्यादा है और बताया कि उन्होंने इसका खासा अध्ययन किया है कि ये कैसे हुआ। उन्होंने कहा, “सरकार ने कोई गलती नहीं की है। मेरा विश्वास कीजिए, केंद्र सरकार ने असाधारण कार्य किया है। सरकार ने लोगों तक ऑक्सीजन पहुँचाने के लिए सब कुछ किया है। लेकिन, दिक्कत ये है कि ऑक्सीजन की ज़रूरत सीधा 900 मीट्रिक टन से 9000 MT पहुँच जाए, तो इसे पूरा करने के लिए कोई लॉजिस्टिकल सपोर्ट सिस्टम ही मौजूद नहीं है।”

उन्होंने आगे समझाया कि लोगों को भले ही लगता हो कि फैक्ट्रियों में बड़ी मात्रा में ऑक्सीजन है, लेकिन इनका मात्र 3% ही ट्रांसपोर्ट किया जा सकता है और देश में 1000 से भी कम टैंकर्स हैं जिनका इस काम के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। उन्होंने आगे समझाया कि इन टैंकरों की गति 30 मील (48.28 किलोमीटर) प्रति घंटे से ज्यादा की रफ़्तार से आगे नहीं बढ़ सकती। उन्होंने जानकारी दी कि ऑक्सीजन का उत्पादन करने वाले अधिकतर स्टील प्लांट्स पूर्वी व पश्चिमी भारत में ही हैं।

पद्मश्री व पद्म भूषण से सम्मानित डॉ देवी शेट्टी ने राजदीप सरदेसाई को भूगोल समझाते हुए कहा कि कोरोना के अधिकतर मरीज उत्तर भारत में हैं और इन टैंकरों को पूर्वी और पश्चिमी भारत से हजारों किलोमीटर की दूरी तय करनी है, जो कि एक दुस्साध्य कार्य है। 15,000 से भी अधिक हार्ट सर्जरी का कीर्तिमान रच चुके डॉक्टर शेट्टी ने स्पष्ट कहा कि सरकार ने मरीजों तक ऑक्सीजन पहुँचाने के लिए सरे संभव माध्यमों व संसाधनों का इस्तेमाल किया।

उन्होंने स्वीकारा कि लोगों की जानें जा रही हैं और ये काफी दुःखद है कि हम लोगों की बेशकीमती जान बचाने में नाकामयाब हो रहे हैं पर इस रोग की प्रकृति ही यही है। लेकिन, उन्होंने वास्तविकता का भान कराते हुए ये भी कहा कि स्वतंत्रता के बाद से ही लगभग हर सरकारों ने स्वास्थ्य व्यवस्था को नज़रअंदाज़ किया। उन्होंने याद दिलाया कि स्वास्थ्य इन्फ्रस्टरक्चर के विकास पर देशों से ध्यान नहीं दिया गया, और आज हम उसके दुष्परिणाम भुगत रहे हैं।

इस इंटरव्यू के दौरान जब ‘हार्ट सर्जरी के हेनरी फोर्ड’ कहे जाने वाले डॉक्टर शेट्टी बोल रहे थे, तब शांत से राजदीप सरदेसाई अजीब से एक्सप्रेशंस के साथ बोर हो रहे थे। फिल्म निर्माता अशोक पंडित ने इस वीडियो को शेयर करते हुए लिखा, “अर्बन नक्सल पत्रकार सोच रहा होगा कि ज़मीन फटे और मैं अंदर समा जाऊँ!” अभिनेता परेश रावल ने टिप्पणी की, “धरती माँ भी ऐसा ज़हर निगल ने से इनकार कर देगी!”

इससे पहले राजदीप सरदेसाई ने प्रोपेगंडा फैलाया था कि कोरोना महामारी से लड़ने के लिए केंद्र की मोदी सरकार ने पंजाब को केवल 71 करोड़ रुपए दिए हैं। उन्होंने भ्रम पैदा करने की कोशिश की थी कि कांग्रेस शासित पंजाब के साथ भेदभाव हो रहा है। साथ ही पैसा जुटाने के लिए पंजाब में शराब की बिक्री शुरू करने की राज्य सरकार की दलील का समर्थन भी किया था। जबकि सच्चाई ये है कि पजांब को वर्ष 2020-21 के लिए राज्य आपदा प्रबंधन कोष (SDRMF) की पहली किस्त में 247 करोड़ रुपए मिले हैं।

अन्ना हजारे का आंदोलन कांग्रेस की मदद के लिए था… रास्ता भटक गया और केजरीवाल सारी मलाई चाप गए?

                            अन्ना हजारे के साथ अरविंद केजरीवाल (बाएँ) किताब का कवर (दाएँ)
यह अंश राहुल रोशन के द्वारा लिखी गई किताब “Sanghi Who Never Went To A Shakha” के अध्याय “Hindutva vs the Ecosystem” से लिया गया है।

नेहरू-गाँधी परिवार के विरुद्ध ‘इकोसिस्टम’ की चुप्पी को भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के समय भी देखा गया था। अन्ना हजारे की तत्कालीन टीम में किसी भी प्रभावशाली नेता, खासकर अरविंद केजरीवाल ने, एक भ्रष्ट नेता के तौर पर सोनिया गाँधी का नाम नहीं लिया था।

अगर अन्ना हजारे का धरना एक अलग तरीके से समाप्त हुआ होता, (कांग्रेस द्वारा अन्ना के इस आंदोलन पर हमला किए जाने और आंदोलन को आरएसएस की साजिश बताए जाने के बिना) तो इस आंदोलन ने कांग्रेस की सिर्फ सहायता ही की होती। इसका एक अंत यह भी हो सकता था कि राहुल गाँधी लोकपाल की नियुक्ति का वादा करते और अपने हाथों से संतरे का जूस पिलाकर अन्ना हजारे का आमरण अनशन समाप्त करते। इसे लगातार टीवी पर चलाया जाता।

2014 में यूपीए के तीसरे कार्यकाल में राहुल गाँधी जब प्रधानमंत्री बनते तो एक नैरेटिव चला कर 2जी, कॉमनवेल्थ और कोयला घोटालों का दोष मनमोहन सिंह पर डाल दिया जाता।

2014 के लोकसभा चुनावों से कुछ समय पहले तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने यह भरोसा जताया था कि इतिहास उनके साथ दयालु रहेगा। यह उनका विदाई वक्तव्य ही था क्योंकि उन्हें भी यह पता था कि चुनावों का परिणाम चाहे जो भी हो, वो दोबारा प्रधानमंत्री नहीं बनाए जाएँगे।

यदि कांग्रेस चुनाव जीत जाती… और कांग्रेस के चुनाव जीतने की उम्मीदें भी बहुत ज्यादा होतीं, यदि अन्ना हजारे का आंदोलन मेरे द्वारा बताए गए उक्त तरीके से समाप्त होता… तो इतिहास मनमोहन के प्रति बिल्कुल भी दयालु नहीं होता। ऐसा इसलिए क्योंकि राहुल गाँधी को हीरो बनाने के लिए ‘दरबारी’ इतिहासकारों द्वारा मनमोहन सिंह को विलेन बना दिया जाता। इस योजना की एक रिहर्सल सितंबर 2013 में तब हुई थी, जब राहुल गाँधी ने अपनी ही सरकार का एक अध्यादेश सार्वजनिक रूप से फाड़ दिया था।

मेरे पास अपने कुछ कारण हैं, जिनसे मुझे विश्वास है कि भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन, कांग्रेस की सरकार को उखाड़ फेंकने के लिए शुरू नहीं हुआ था। अन्ना हजारे की टीम के मुख्य सदस्य स्वामी अग्निवेश को कथित तौर पर फोन से कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल (हालाँकि स्वामी अग्निवेश ने बाद में कहा था कि वो किसी और कपिल से बात कर रहे थे) से बात करते हुए सुना गया था, जहाँ उन्होंने अपने साथियों (आंदोलनकारियों) की तुलना पागल हाथी से की थी।

अग्निवेश को यह कहते सुना गया था कि अन्ना हजारे की टीम अपना रास्ता भटक चुकी है और एक पागल हाथी की तरह व्यवहार कर रही है, जो अपने नियत उद्देश्य पर रुकने को तैयार नहीं है। तो, क्या इसका मतलब यही था कि अन्ना हजारे की टीम को एक सीमित तरीके में ही अपना आंदोलन बनाए रखना था और एक नियत समय के बाद उसे समाप्त करना था?

संभवतः ऐसा था भी! क्योंकि ‘इकोसिस्टम’ द्वारा सुनियोजित सीमित समय का आंदोलन कांग्रेस  की ही सहायता करता। इसकी सहायता से ‘राजनैतिक वर्ग’ के भ्रष्ट होने का वातावरण निर्मित किया जाता, जिसमें कांग्रेस और भाजपा दोनों को भ्रष्टाचार रूपी एक ही सिक्के के दो पहलू दिखाए जाते। इससे जाहिर है भ्रष्टाचार के मुद्दे पर भाजपा को कोई लाभ नहीं होता- जैसे 2009 के लोकसभा चुनावों के दौरान हुआ था, जब घरेलू सुरक्षा के मुद्दे पर शासन में बैठे दल के स्थान पर सम्पूर्ण राजनैतिक वर्ग के विरुद्ध वातावरण बनाया गया था। अन्ना हजारे के आंदोलन की इकोसिस्टम की रणनीति सफल होती लेकिन पता नहीं कैसे, इसे कांग्रेस के कम्फर्ट से आगे खींचने का निर्णय लिया गया।

ऐसा लगता है कि इसके लिए कई वैश्विक कारक जिम्मेदार हो सकते हैं। इनमें 2010-12 की ‘अरब स्प्रिंग’ को महत्वपूर्ण माना जाना चाहिए। इस दौरान मध्य-पूर्व और उत्तरी अफ्रीका के कई देशों में सत्ता परिवर्तन हुआ। यहीं से भारत के ‘इकोसिस्टम’ को झूठी बँधी कि वह भी भारत में कांग्रेस के सहयोग के बिना भी सीधा शासन कर सकता है। इसी झूठी आशा के कारण वे, स्वामी अग्निवेश के शब्दों में, ‘पागल हाथी’ की तरह अपने लक्ष्य से भटक गए।

इस दौरान टीवी पत्रकार राजदीप सरदेसाई का 2012 का एक वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें वो मराठी में कहते हुए पाए गए कि उन्होंने अरविंद केजरीवाल को उस आंदोलन के साथ भारत में ‘तहरीर स्क्वायर’ जैसा कुछ करने की सलाह दी थी। (राजदीप सरदेसाई ने इस वीडियो की सत्यता स्वयं प्रमाणित की, जब उन्होंने अपनी किताब ‘2014 : The Election that Changed India, Penguin Books, New Delhi, 2014 में वही बात लिखी, जिसका जिक्र वीडियो क्लिप में किया गया था)

तहरीर स्क्वायर, मिस्त्र की राजधानी काइरो में है, जहाँ फरवरी 2011 में एक बड़ा जन आंदोलन हुआ था, जो ‘अरब स्प्रिंग’ की एक महत्वपूर्ण घटना के रूप में जाना जाता है। इस आंदोलन के कारण वहाँ के राष्ट्रपति हुस्नी मुबारक को सत्ता छोड़नी पड़ी थी। आंदोलन के पहले उन्होंने लगातार 30 वर्षों तक शासन किया था। 

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि ‘इकोसिस्टम’ ने सोचा था कि भारत में भी ‘अरब स्प्रिंग’ की तरह ही कोई क्रांति हो सकती है। यदि ऐसा था, तो वे सीधे सत्ता हासिल करने का प्रयास कर रहे थे, बजाय इसके कि कॉन्ग्रेस उन्हें सत्ता का एक छोटा सा हिस्सा दे। उनकी योजना उन अपराधियों या स्थानीय गुंडों के समान थी, जो किसी अन्य प्रत्याशी को समर्थन देने के स्थान पर खुद ही चुनाव लड़ने की सोचते हैं।

यदि ऐसी कोई योजना थी तो वह सफल नहीं हो सकी क्योंकि अन्ना हजारे के आंदोलन को वैसा जन सहयोग प्राप्त नहीं हो सका, जैसा अरब देशों में हुए आंदोलनों को मिला था। अन्ना हजारे की टीम दिल्ली से बाहर समर्थन प्राप्त करने में असफल रही। मुंबई में भी कुछ आंदोलन शुरू हुए थे लेकिन उन्हें भी पर्याप्त सहयोग प्राप्त नहीं हो सका था और दिल्ली में भी आंदोलन कमजोर होता जा रहा था। देश के अन्य हिस्सों में भी स्थानीय प्रदर्शनों के आह्वान को कोई खास सहयोग नहीं मिला। हालाँकि आंदोलन की जो प्रमुख टीम थी, उसमें ऊर्जा बनी हुई थी और वो समय-समय पर सोशल मीडिया के मंचों में दिखाई देती थी।

‘इकोसिस्टम’ को बहुत जल्द यह आभास हो गया कि उसके द्वारा कांग्रेस को सत्ता से हटाकर सीधे शासन करने का जो सपना देखा जा रहा है, वो व्यावहारिक नहीं है। हालाँकि उन्होंने उम्मीद नहीं खोई थी और कांग्रेस को दरकिनार करने की उनकी अभिलाषा ‘आम आदमी पार्टी (AAP)’ के रूप में अस्तित्व में आई, जिसने दिसंबर 2013 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में बढ़िया प्रदर्शन किया। इस सफलता से उन्हें एक और आशा मिली कि 2014 के लोकसभा चुनावों में भी प्रभाव डाल पाएँगे, मगर अंत में उन्हें पता चल गया कि मोदी उनकी सोच से कहीं आगे की चीज हैं।

[Sanghi Who Never Went To A Shakha’रूपा पब्लिकेशन के द्वारा प्रकाशित (मार्च 2021) की गई है। इस पुस्तक के लेखक राहुल रोशन हैं जो एक सफल आंत्रप्रेन्योर, मीडिया प्रोफेशनल और वर्तमान में OpIndia डिजिटल समूह के सीईओ हैं](साभार)

अवलोकन करें:-

दिल्ली का झगड़ालू मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल

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आंदोलन से सत्ता की कुर्सी तक पहुंचने में, अरविंद केजरीवाल के व्यक्तित्व का 

फेक न्यूज़ के आरोप पर राजदीप सरदेसाई की इंडिया टुडे ने काट ली एक महीने की सैलरी

राजदीप सरदेसाई जैसाकि सर्वविदित है कि हमेशा मोदी विरोध के चक्कर में भ्रमित समाचार देने से नहीं चूकते। विरोध करना कोई अपराध नहीं, लेकिन विरोध का आधार होना चाहिए। 
इंडिया टुडे के वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई को लेकर खबर है कि प्रबंधन ने उन्हें ऑफ एयर कर दिया है। इसके अलावा उनकी एक माह की सैलरी भी काटे जाने की सूचना है। जानकारी के मुताबिक सरदेसाई पर यह कार्रवाई सोशल मीडिया पर उनके कुछ पोस्ट्स को लेकर की गई है। 

कथिततौर पर उनके ट्विट्स राष्ट्रपति कोविंद व 26 जनवरी के दिन मारे गए किसान से संबंधित थे। उन पर फर्जी खबर फैलाने का भी आरोप है। प्रबंधन ने राजदीप के ट्वीट्स को ग्रुप की सोशल मीडिया पॉलिसी से अलग माना है। इसीलिए अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए उन्हें 2 हफ़्ते के लिए ऑफ़ एयर कर दिया। साथ ही 1 महीने सैलरी न देने का निर्णय लिया।

किसानों का हुड़दंग टीवी पर लाइव देखने वाला हर व्यक्ति इस बात पर हैरान हो रहा था, अराजक तत्व ट्रेक्टर को लेकर इतना खतरनाक तांडव करने पर भी केवल टियर गैस और लाठी चार्ज तक ही क्यों सीमित है? उसके बावजूद ट्रेक्टर के पलटने से चालक की मौत को पुलिस की गोली से मरने का फेक ट्वीट क्यों किया?

इससे पहले राजदीप के बयानों के कारण उनका विरोध सोशल मीडिया पर खूब हुआ था। सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी एम नागेश्वर राव ने उन्हें लेकर लिखा था, “राजदीप भारत के विरोध में उकसाने के लिए जाने जाते हैं।” उन्होंने इंडिया टुडे से सरदेसाई की बातचीच का एक वीडियो शेयर करते हुए लिखा, “यह वीडियो स्पष्ट रूप से भारत सरकार के खिलाफ जंग छेड़ने के अपराध को स्थापित करता है जो आईपीसी धारा 121 के तहत दंडनीय है जिसकी सजा मौत या आजीवन कारावास होती है। दिल्ली पुलिस को इसे हिरासत में लेना चाहिए।”

अक्सर अपने ट्विटर अकाउंट से फर्जी खबरें फ़ैलाने वाले राजदीप सरदेसाई को लेकर लोगों में नाराजगी देखी जाती है। गणतंत्र दिवस की सुबह से ही किसानों के प्रदर्शन के बीच, दिल्ली के DDU मार्ग पर एक व्यक्ति की ट्रैक्टर पलटने के कारण मौत हो गई थी। आईटीओ के पास पूरे चौक पर सैकड़ों की संख्या में किसान ट्रैक्टर लेकर खड़े रहे। जिसे लेकर समाचार चैनल ‘इंडिया टुडे’ के पत्रकार राजदीप सरदेसाई ने एक और फेक न्यूज़ फैला दी और पोल खुलने पर अपना ट्वीट चुपके से डिलीट भी कर दिया।

राजदीप सरदेसाई ने तिरंगे में लिपटी मृतक की लाश की तस्वीर अपने ट्विटर अकाउंट से शेयर करते हुए लिखा कि इसकी मौत पुलिस की गोली से हुई है। राजदीप ने ट्विटर पर लिखा, “पुलिस फायरिंग में आईटीओ पर 45 साल के नवनीत की मौत हो गई है। किसानों ने मुझे बताया कि उसका ‘बलिदान’ व्यर्थ नहीं जाएगा।”

लेकिन हकीकत ये है कि ट्रैक्टर रैली और उपद्रव के दौरान जिस व्यक्ति की मौत हुई, वह पुलिस फायरिंग में नहीं, बल्कि ट्रैक्टर पलटने से मारा गया था। दरअसल, ड्राइवर ने काफी तेज रफ्तार से चल रहे ट्रैक्टर को अचानक से मोड़ दिया, जिसकी वजह से संतुलन बिगड़ गया और ट्रैक्टर पलट गया। इस दौरान किसान की मौत हो गई। सोशल मीडिया पर लोग ‘ट्विटर’ से सवाल कर रहे हैं कि क्या फेक न्यूज़ फ़ैलाने और राजधानी में दंगे भड़काने का प्रयास कर रहे राजदीप सरदेसाई का अकाउंट प्रतिबंधित किया जाएगा या नहीं?

राजदीप के लिए कभी दाऊद इब्राहिम भी था ‘विक्टिम’

रिया के झूठ की पोल खोलता सुशांत का पुराना इंटरव्यू वायरल, राजदीप और रिया के  PR स्टंट का पर्दाफ़ाश | द छीछालेदरफिलहाल रिया चकवर्ती का ‘प्रायोजित साक्षात्कार’ करने को लेकर राजदीप सरदेसाई विवादों में हैं। सुशांत सिंह राजपूत की मौत के मामले में रिया मुख्य आरोपित हैं। वैसे यह पहला मौका नहीं है जब राजदीप ने अपने पाखंड से आरोपित का इमेज गढ़ने की कोशिश की है।
अंडरवर्ल्ड डॉन दाऊद इब्राहिम के लिए भी वे सालों पहले ऐसी ही दरियादिली दिखा चुके हैं। यह वाकया 1993 का है, जब मुंबई सिलसिलेवार बम धमाकों से दहल गया था। इन धमाकों में 257 लोगों की मौत हुई थी और 1,400 लोग घायल हुए थे। पाकिस्तान की कुख्यात खुफिया एजेंसी ISI की शह पर दाऊद ने इसे अंजाम दिया था। लेकिन उस वक्त टाइम्स ऑफ इंडिया में काम करने वाले राजदीप ने एक लेख लिखकर उसे ऐसे पेश किया जैसे वह ही पीड़ित हो। ठीक वैसे ही जैसा अभी उन्होंने रिया चकवर्ती के मामले में करने की कोशिश की है।
riya chakravarthi now with sushant singh rajput
क्या रिया चक्रवर्ती और महेश भट्ट के
मकरकाल में फंस गए थे सुशांत सिंह ? 
रिया के साथ साक्षात्कार में राजदीप ने सुशांत सिंह की कथित मानसिक बीमारी पर ज़ोर दिया। इसे ऐसे पेश किया मानो मानसिक बीमारी का आरोप वास्तविक तथ्य है, जबकि सुशांत सिंह का परिवार इस मुद्दे पर अपना पक्ष पहले ही रखा चुका है। उन्होंने कहा था कि पहले कभी सुशांत सिंह को इस तरह की कोई दिक्कत नहीं हुई थी। न ही किसी विशेषज्ञ ने उनके संबंध में ऐसा कुछ कहा था।
सुशांत पर मानसिक रूप से बीमार होने का आरोप अभी तक सिर्फ और सिर्फ रिया चक्रवर्ती ने लगाया है, जिन पर खुद इस मामले के संबंध में जाँच चल रही है। इतना ही नहीं इंटरव्यू के दौरान राजदीप ने रिया को अपनी कहानी सुनाने का भरपूर मौका देते हुए उन सवालों का जिक्र तक नहीं किया जिनके कारण रिया कठघरे में हैं।
ये कोई पहला मामला नहीं है जहाँ राजदीप सरदेसाई अपराधियों का सहयोग कर रहा हो, इस से पहले इसने कुख्यात आतंकवादी दावूद इब्राहीम को देशभक्त भी बताया था।  
India First - "MUSLIMS AND THE BLASTS Must They Wear A... | Facebookइसी तरह 1993 के बम धमाकों के बाद राजदीप ने अपने लेख में लिखा था। जिस पर पूर्व पत्रकार एसजी मूर्ति ने इस मुद्दे को चार साल पहले उठाया था और बताया था साल 1993 में राजदीप ने कैसे अपने लेख में दाऊद को ‘राष्ट्रवादी’ बताकर उसे बचाने का प्रयास किया था। लेकिन राजदीप ने तब प्रतिक्रिया के रूप में एक वीडियो बना दी और कई कुतर्क करते हुए दोबारा अपने उस दावे को सही ठहराने की कोशिश की, जहाँ उन्होंने दाऊद को ‘राष्ट्रवादी’ बताया था। इस वीडियो में उन्होंने बताया कि जिस दोषपूर्ण मानदंडों पर उन्होंने उसे राष्ट्रवादी कहा, उसकी पैरोकारी शिवसेना अध्यक्ष बाला साहब ठाकरे भी किया करते थे।
हालाँकि, यदि राजदीप के उस आर्टिकल पर नजर डाली जाए तो ये मालूम चलता है कि वाकई राजदीप ने दाऊद को राष्ट्रवादी नहीं कहा था। बल्कि वो आर्टिकल तो पूर्णत: इस बात पर था कि चूँकि भारत में मुस्लिमों को दबाया जाता है, इसलिए दाऊद ने मुस्लिम होने के नाते यह ब्लास्ट करवाए।
इसलिए यह कहना गलत नहीं है कि भले ही राजदीप ने तब दाऊद को राष्ट्रवादी नहीं कहा, लेकिन अपने कुतर्कों से उसे पीड़ित दिखाने की कोशिश जरूर की और उसको साल दर साल जस्टिफाई करते रहे। साल 2015 में उन्होंने हिंदुस्तान के एक लेख में फिर अपने पुराने प्रश्न का जिक्र किया कि आखिर साल 1992 में भारत-पाक मैच में तिरंगा लहराते हुए, भारतीय टीम को तोहफे देने वाला दुबई का स्मगलर 6 महीने में कराची का आतंकी कैसे बन गया? क्या उसके लिए बाबरी मस्जिद एक टर्निंग प्वाइंट था?
राजदीप सरदेसाई के लिए पत्रकारिता का मतलब प्रोपेगेंडा शुरुआत से ही रहा है। उनके लिए गुजरात दंगों के मामले में नरेंद्र मोदी को सुप्रीम कोर्ट से मिली क्लीनचिट मायने नहीं रखती, लेकिन दूसरी ओर चिदंबरम से माफ़ी माँगते उन्हें देर नहीं लगती। याद दिला दें कि सीएनएन आईबीएन में रहते राजदीप पर कैश फॉर वोट की स्टिंग की सीडी भी डकारने के आरोप लगे थे। इसके अलावा राडिया केस में भी राजदीप का नाम उछल चुका है।