साभार: newindianexpress
दिल्ली की सीमाओं पर चल रहे कथित किसान आंदोलन में माओवादियों की घुसपैठ को लेकर आशंका बहुत समय से जताई जा रही थी। अब वे खुल कर सामने आ गए हैं। माओवादियों ने पूरे प्रदर्शन को समर्थन का ऐलान किया है।
तीन अलग-अलग माओवादी संगठनों ने एक संयुक्त बयान जारी करके पूरे प्रोटेस्ट के प्रति एकजुटता दिखाई है। इस बयान में अपील की गई है कि तीन कृषि कानूनों के ख़िलाफ़ प्रदर्शन को जारी रखा जाए।
प्रतिबंधित सीपीआई (माओवादी) के केंद्रीय समिति के प्रवक्ता अभय ने कहा कि देश भर में किसानों का आंदोलन ब्रिटिश भारत के रॉलेट एक्ट के विरोध की याद दिलाता है। ब्रिटिश काल से अब के समय की तुलना करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को साम्राज्यवादी दलाल कहा।
Now the outlawed Maoists extend their support to the farmers' protest @NewIndianXpress @TheMornStandard pic.twitter.com/Y87rtAmTCv
— Ejaz Kaiser (@KaiserEjaz) February 1, 2021
Poor farmers joining the protest pic.twitter.com/EbywejWWWQ
— Gabbbar (@GabbbarSingh) January 30, 2021
जवाब जरुर देना खालिस्तानी
— 𝒟ℐ𝒩ℰ𝒮ℋ𝒮ℰ𝒩 (@dineshs76833719) January 31, 2021
पाकिस्तान में जब गुरुद्वारा तोड़ा,बहु-बेटी को उठा ले गए, धर्म परिवर्तन कराया गया तब मर्दानगी कहां गई थी नमकहराम खालिस्तानियों?
😡
अभय ने आरोप लगाया “केंद्र सरकार किसानों की दलीलों के प्रति अपना अड़ियल रवैया दिखा रही है।” इस बयान में गणतंत्र दिवस (26 जनवरी 2021) के मौके पर हुई हिंसक ट्रैक्टर परेड रैली का पुरजोर और गर्मजोशी के साथ स्वागत किया गया है। इसमें कहा गया कि परेड वाले दिन किसानों के मार्ग में जान-बूझकर बैरिकेडिंग की गई थी। आँसू गैस छोड़े गए थे और लाठी चार्ज किया गया।
कानून-व्यवस्था के बिगड़ने के लिए माओवादियों ने पुलिस को जिम्मेदार बताया है। साथ ही दीप सिंधू और लख्खा जैसे लोगों को भाजपा का एजेंट कहा है। यह भी आरोप लगाया कि किसानों को लाल किले की ओर जान-बूझकर बढ़ने दिया गया।
किसान नेताओं पर हुए मुकदमों को इस बयान में ‘ब्राह्मणी हिंदूत्व फासीवादी मोदी सरकार के षड्यंत्रकारी प्लॉन’ का हिस्सा कहा गया है। बयान में पीएम मोदी को पाखंडी, जुमलेबाज तक बताया गया है। उन्हें साम्राज्यवादी और दलाल कॉर्पोरेट घरानों का प्रधान सेवक बताकर किसानों से अपील की गई कि इस लड़ाई को लंबा लड़ें।
इसे लेकर ट्विटर पर लग गयी इनकी क्लास :-
किसान का आलू 6 रु किलो बिकता है इसलिए वो दुखी है । हमें 30 रु किलो मिलता है , इसलिए हम दुखी हैं । बीच में 24 रु खाने वाले धरने पर बैठे हैं , फिलहाल वे दुखी हैं ।
— yogi devnath (@YogiDevnath2) February 1, 2021
दीपिका तू तो दलाल है
— Neha Chowdhry🇮🇳 (@NehaChowdhryIN7) February 1, 2021
राकेश डकैत की मुज्जफरनगर-महापंचायत में "अल्ला हो अकबर" के नारे लगे!
— साध्वी मिश्रा 🇮🇳🙏🙏 (@sadhvi006) February 1, 2021
प्रत्यक्षदर्शी सही कह रहे है कि बॉर्डर पर पड़गी बांधे लोगों में से 50% अब्दुल और 20% थॉमस और बाकी के खालिस्तानी हैं! pic.twitter.com/fcklaHwhpP
किसान नेता भानु प्रताप ने बताया कि वो क्यों इस आंदोलन से खुद को अलग कर रहे हैं, सुनिये👇
— श्रीष त्रिपाठी 🇮🇳 (@Shrish_1987) January 31, 2021
असली किसान भारत की मिट्टी के कण- कण को सिर आंखों पर रखते हैं।
वे भारत के तिरंगे का महत्व समझते हैं इसलिए वे इस आंदोलन से अलग हो गए।
बाकी सब बिचौलिए ,अकाली,खालिस्तानी, कांग्रेसी,आपिये,
👇 pic.twitter.com/oaEwKdT3nd
क्रांतिकारी आदिवासी महिला संगठन दंडकारण्य की प्रमुख रानीता हिचमी और दंडकारण्य आदिवासी किसान मजदूर संगठन के विजय मरकाम ने भी कानूनों को वापस लेने की माँग की है। उन्होंने आरोप लगाया कि ‘ये कानून कॉर्पोरेट कंपनियों का पक्ष लेंगे’। साथ ही यह भी दावा किया कि इससे देश की 80 प्रतिशत जनता प्रभावित होगी।
इससे पूर्व में कई बार ऐसे कयास लगाए गए थे इस कथित किसान आंदोलन को वामपंथियों द्वारा हाईजैक किया जा चुका है, जहाँ कभी दिल्ली दंगों की साजिश रचने वालों की तस्वीर दिख रही थी, कभी भीमा कोरेगाँव हिंसा का षड्यंत्र रचने वालों की। हालाँकि, किसान नेता इस बात से इनकार करते रहे और इसे अपनी लड़ाई बताते रहे। कुछ समय पहले समाचार चैनल ‘इंडिया टीवी’ पर प्रसारित एक रिपोर्ट में कहा गया था कि दिल्ली की सीमा पर चल रहे किसानों का विरोध एक स्वत: आंदोलन नहीं, बल्कि केंद्र सरकार के खिलाफ वामपंथी संगठनों द्वारा सावधानीपूर्वक रची गई साजिश है।

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