किसान हैं ही नहीं, कांग्रेस और “आप” के गुंडे हैं ; देश के खिलाफ युद्ध का ऐलान है; सरकार कुचल दे ऐसे लोगों को

सुभाष चन्द्र 

चुनाव आते ही सरकार को अस्थिर करने वाले लोग सक्रिय हो जाते हैं। यह अस्थिरता कई वजहों से फैलाने की कोशिश की जाती है। अपनी ताकत दिखाकर राजनीतिक पर दबाव बनाने की कोशिश भी इनमें एक शामिल है। इस बार भी विधानसभा चुनाव से बस कुछ दिन पहले ही किसान आंदोलन के नाम पर यह प्रक्रिया शुरू कर दी गई। साल 2021 में भी ऐसा ही आंदोलन शुरू किया गया। तब उत्तर प्रदेश में चुनाव होने वाले थे। इन आंदोलनों के कारण दिल्ली-एनसीआर के लाखों लोगों को समस्याएँ झेलनी पड़ी थी और लोगों ने सुप्रीम कोर्ट का रूख किया था।

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किसान आंदोलन की आड़ में देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने का काम करा रही है कांग्रेस और अमेरिका में  बैठा गुरपतवंत सिंह पन्नू भड़का रहा है सिखों को प्रधानमंत्री मोदी के घर पर खालिस्तान का झंडा लगाने के लिए कांग्रेस के जयराम रमेश ने खुल कर कहा है कि आज राहुल गांधी अंबिकापुर में किसान संगठनों से मुलाकात कर रहे हैं और “आज ही के दिन पंजाब, हरियाणा, यूपी और अलग अलग देशों के किसान दिल्ली आ रहे हैं”, यानी कांग्रेस देश को राज्यों को अलग अलग देश बता रही है

आज के कथित किसान कांग्रेस, “आप”  और George Soros के पैसे से खरीदे हुए गुंडे हैं और राहुल “कालनेमि” की मोहब्बत की दुकान के Salesmen हैं केजरीवाल को समझ लेना चाहिए कि चाहे वो रामलला के दर्शन कर आया या कथित किसानों को भड़का ले, ED में उसका “सुंदर कांड” होकर रहेगा

उधर आंदोलन में शामिल लोग कह रह रहे हैं “हमको छोड़ दो, खालिस्तान बनाने दो …. हम पाकिस्तान के साथ जुड़ जाएंगे” आंदोलन करने वालों ने ट्रैक्टर इस तरह modify किए जिससे वह पुलिस के  बेरिकेड तोड़ सके, आग का सामना कर सके और आंसू गैस का भी इन पर असर न हो भला कौन किसान एक आंदोलन के लिए इतना खर्च कर सकता है इनका मकसद पन्नू की कॉल पर प्रधानमंत्री मोदी के आवास को घेरने का है एक खबर के अनुसार आजतक के रिपोर्टर को कथित किसानों ने गोली भी मार दी है

इस आंदोलन में छिपे किसानों पर पिछले अक्टूबर-नवंबर, 2023 में पंजाब की भगवंत मान सरकार ने लाठियां बरसाई थी और उनका आंदोलन कुचलने के प्रयास किए थे आज उसी “आप” का मंत्री गोपाल राय इन कथित किसानों के हक़ में खड़ा हुआ कह रहा है, “ ब्रिटिश हुकूमत की तरह केंद्र की भाजपा सरकार ने सड़कों पर कीलें बिछा दी हैं, दीवारें खड़ी कर दी हैं जिससे किसान दिल्ली में न आ सकें भाजपा गुलामी का कालखंड याद करा रही है” यानी गोपाल राय चाहता है कथित किसान दिल्ली सरकार के खिलाफ बगावत करने में सफल हो जाएं और उन्हें रोका न जाए

इन कथित किसानों की अबकी बार की मांग लगता है केवल दिखावा है जिसका मकसद केवल अराजकता फैलाना है ये लोग मांग रहे हैं:-

-58 साल की उम्र से ज्यादा के किसानों के लिए 10 हजार रुपए महीने की पेंशन दी जाए;

-किसानों को फसल बीमा दिया जाए;

-भारत WTO से बाहर आ जाए; और 

-मनरेगा में 200 Employment Days सुनिश्चित किए जाएं

इस तरह की मांगे, या तो कोई विदेशी ताकतें बना सकती है या कांग्रेस बना सकती है किसान तो कभी नहीं बना सकते अगर वे किसान हैं

चुनाव से ठीक पहले माहौल बिगाड़ने के लिए विपक्ष ने कुछ दिन पूर्व हल्द्वानी में शाहीन बाग़ खड़ा करने की कोशिश की और अब फर्जी किसान आंदोलन खड़ा करने की कोशिश की गई है लेकिन जैसे हल्द्वानी में सख्ती से काम लिया गया, दिल्ली में इन कथित किसानों को भी पूरी ताकत से कुचल देना चाहिए

बार एसोसिएशन ने कथित किसानों के आंदोलन पर स्वत: संज्ञान लेने का भी आग्रह किया। हालाँकि, स्वत: संज्ञान वाले मामले पर सीजेआई ने क्या कहा, इसके बारे में कोई बात सामने नहीं आई है, लेकिन किसानों के पिछले आंदोलन और साल 2019 में शुरू हुए शाहीन बाग प्रदर्शन पर गौर करें तो ऐसा नहीं लगता कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले संज्ञान लेगा।

यह याद रखना चाहिए कि पिछले किसान आंदोलनकारी नेताओं के साथ किसी तरह का जनमत नहीं था क्योंकि वे सभी लोग किसी चुनाव में अपनी जमानत भी नहीं बचा पाए थे - इसलिए बिना किसी हिचक, सरकार को इस बार कथित किसानों के आंदोलन को कुचल देना चाहिए, जो उनके पीछे खड़े हैं, उन्हें अंदर कर देना चाहिए - शांति बनाए रखने के लिए यदि पुलिस को गोली भी चलानी पड़े, तो उसमे भी पीछे नहीं रहना चाहिए -

दरअसल, नागरिकता संशोधन बिल (CAA) और नागरिक पंजीकरण रजिस्टर (NRC) के विरोध में दिल्ली के शाहीन बाग में लंबा प्रदर्शन किया गया था। उस समय भी इलाके को जाम कर दिया गया था, जिसके कारण महीनों तक लोगों की समस्याओं का सामना करना पड़ा था। तब फरवरी 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि फिलहाल इस मामले में वह हस्तक्षेप नहीं करेगा। हालाँकि, कोर्ट ने दोहराया था कि सार्वजनिक जगहों पर प्रदर्शन करना वाजिब नहीं है और जगह खाली कराने के लिए अधिकारियों को आगे आने के लिए कहा था।

इसी मामले पर अक्टूबर 2020 में जब सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की तो कहा था कि सार्वजनिक स्थानों पर अनिश्चितकाल के लिए कब्जा नहीं किया जा सकता है। अदालत ने कहा था कि धरना-प्रदर्शन का अधिकार अपनी जगह है, लेकिन अंग्रेजों के राज वाली हरकत अभी करना सही नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सार्वजनिक जगहों पर प्रदर्शन लोगों के अधिकारों का हनन है। कानून में इसकी इजाजत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संविधान विरोध करने का अधिकार देता है, लेकिन इसे समान कर्तव्यों के साथ जोड़ा जाना चाहिए।

इस तरह की गोलमोल टिप्पणी साल 2021 के किसान आंदोलनों के दौरान भी सुप्रीम कोर्ट ने दिया था। उस दौरान केंद्र की मोदी सरकार ने किसानों की भलाई के लिए तीन कृषि कानून लागू किए थे। इन कृषि कानूनों को किसान विरोधी बताकर हरियाणा-पंजाब के कथित किसान सड़कों पर आ गए थे। उन्होंने इस दौरान कई हिंसा की वारदातों को भी अंजाम दिया था। प्रदर्शन स्थल पर एक व्यक्ति की मौत भी हो गई थी। तब भी सुप्रीम कोर्ट ने इसका स्वत: संज्ञान नहीं लिया था।

तीन कृषि कानूनों के खिलाफ दायर की गई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए तत्कालीन CJI एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्र से कहा था कि न कृषि कानूनों पर रोक क्यों नहीं लगा रहे? उन्होंने कहा कि अगर केंद्र सरकार जिम्मेदारी दिखाते हुए इसे रोकने का आश्वासन देती है तो सुप्रीम कोर्ट एक समिति बना कर इसे देखने को कहेगा। तब तक इसे रोक कर रखा जाए। उन्होंने पूछा कि आखिर इसे क्यों जारी रखा जा रहा है? इस दौरान CJI ने बार-बार दोहराया कि वो इन कानूनों के कार्यान्वयन को रोक देंगे। हालाँकि, बाद में नंवबर 2021 में केंद्र सरकार ने इन कानूनों को रद्द कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने किसानों के हिंसक आंदोलन को लेकर कोई संज्ञान तो नहीं लिया, लेकिन 12 जनवरी 2021 को किसान आंदोलन को लेकर एक कमिटी का गठन किया था। इस कमिटी में कृषि विशेषज्ञ अशोक गुलाटी, डॉ. प्रमोद कुमार जोशी और अनिल घनवटे शामिल थे। सुप्रीम कोर्ट ने 4 सदस्यीय टीम बनाई थी, लेकिन किसान नेता भूपिंदर सिंह मान ने इससे खुद को अलग कर लिया था। इस कमिटी ने अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में दे दी, लेकिन रिपोर्ट केंद्र सरकार द्वारा कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा के पाँच महीने बाद आई।

इस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि देश भर के 86 फीसदी किसान संगठन सरकार के तीनों कृषि कानूनों से खुश थे। ये किसान संगठन करीब 3 करोड़ किसानों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। इन सबके बावजूद केंद्र सरकार को इन कानूनों को वापस लेना पड़ा। घनवटे के मुताबिक, सीलबंद रिपोर्ट में भी कृषि कानूनों को रद्द न करने की सलाह दी थी। घनवट ने कहा था कि इन कृषि कानूनों को रद्द करना या लंबे समय तक लागू न करना उन लोगों की भावनाओं के खिलाफ है, जो इसका मौन समर्थन करते हैं। 

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