“सिर तन से जुदा” नारा लगाने वालों के खिलाफ सबूत नहीं, लेकिन नूपुर शर्मा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट के पास सबूत थे कि उदयपुर कन्हैया हत्या के लिए वह दोषी है

सुभाष चन्द्र 

अजमेर कोर्ट की अतिरिक्त जिला जज (ADJ) रितू मीणा ने अजमेर दरगाह के खादिम गौहर चिश्ती सहित 6 आरोपियों को दरगाह के बाहर “सिर तन से जुदा” के नारे लगाने के आरोप पर्याप्त सबूत न होने पर 16 जुलाई को बरी कर दिया जबकि एक आरोपी अहसानुल्लाह फरार है जिसने गौहर चिश्ती को हैदराबाद में अजमेर से भाग कर अपने पास शरण दी थी। नारे लगाने पर केस दर्ज होने के बाद गौहर चिश्ती का फरार होना ही गुनाह का सबूत था। लेकिन जज रितु ने इस पर ध्यान नहीं दिया।  

ADJ रितु मीणा ने दरअसल गौहर चिश्ती और अन्य को उनके नारों पर अमल करने के लिए बरी कर दिया कि जाओ और जिस नूपुर शर्मा के लिए नारा लगाया था उसका “सिर तन से जुदा” कर दो। जज ने कहा कि कथित वीडियो जिसमें नारे लगाए गए, उनका सत्यापन अदालत में नहीं हुआ फिर आपने क्यों नहीं कहा पुलिस से कि videos की forensic जांच रिपोर्ट पेश करो या आपने स्वयं Forensic जांच की आदेश क्यों नहीं दिए और आपने यह कैसे मान लिया कि वे वीडियो झूठे थे जज ने कहा पुलिस ने मौके का नक्शा नहीं बनाया और जो पुलिस वाले मौके पर मौजूद थे वे अपनी मौजूदगी के दस्तावेज पेश नहीं कर सके

लेखक 
चर्चित YouTuber 
अक्टूबर 2019 में इस्लामी कट्टरपंथियों ने कमलेश तिवारी के दफ्तर में घुस कर उन्हें मार डाला था। उन पर गोली चलाई गई थी, साथ ही चाकू से भी वार किया गया था। मोहम्मद मुफ़्ती नईम काज़मी और इमाम मौलाना अनवारुल हक़ ने 2016 में ही उनकी हत्या का फरमान जारी करते हुए इनाम देने की घोषणा की थी। मुस्लिम कट्टरपंथियों का मानना था कि कमलेश तिवारी ने पैगंबर मुहम्मद का अपमान किया है। इसके पीछे गहरी साजिश का पता चला, 13 आरोपितों के खिलाफ मामला दर्ज किया गया।

ये criminal case में हर कोई जानता है कि सबूतों का Interpretation हर किसी व्यक्ति के विवेक पर निर्भर करता है, एक व्यक्ति की नज़र में सबूत और गवाह का बयान सही होता है तो दूसरे की नज़र में गलत, और प्रभावशाली आरोपियों को बरी करने के लिए तो सही सबूत को कैसे गलत माना जा सकता है, उसके लिए चढ़ावा  और भय भी प्रभाव डालता है और जज ही सबूत से छेड़छाड़ कर देता है उसकी विवेचना करते हुए। अजमेर में रहने वाली जज को भी भय हुआ हो सकता है

ऐसे ही सबूत के अभाव में 100 करोड़ हिंदुओं के क़त्ल की धमकी देने वाले अकबरुद्दीन ओवैसी को बरी कर दिया गया था। इसी तरह आतंक फ़ैलाने वालों को हिम्मत मिलती है।   

नूपुर शर्मा के खिलाफ आग उगलते हुए जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस पारदीवाला ने सुप्रीम कोर्ट के इतिहास की जो सबसे भयंकर “Hate Speech” दी थी उसे सुनकर लगा था कि उनके पास नूपुर शर्मा के खिलाफ कन्हैया हत्या के लिए जिम्मेदार होने के पुख्ता सबूत थे। दोनों जजों ने कहा :- 

she had a 'loose tongue' and that 'it set the entire country on fire’. They also said, "this lady is single-handedly responsible for what is happening in the country." They also made remarks like "She has a threat or she has become a security threat? The way she has ignited emotions across the country." They even blamed her for the killing in Udaipur. The justices asked her to apologize  to the whole nation” लेकिन आग किसने लगाई जस्टिस चंद्रचूड़ ने उसे छोड़ दिया

ये सूर्यकांत और पारदीवाला ही नहीं सुप्रीम कोर्ट के सभी जज हिंदुओं को कुचलने में लगता है किसी Tool Kit का हिस्सा बने हुए हैं। ये चाहते थे कि नूपुर शर्मा देश से माफ़ी मांगे लेकिन इन्हे नहीं पता कि 15 रिटायर्ड जजों, 77 रिटायर्ड वरिष्ठ नौकरशाहों और आर्मी के 25 रिटायर्ड अधिकारियों ने तत्कालीन CJI रमना को पत्र लिख कर दोनों के बयानों की घोर निंदा कर उनसे अपने बयान वापस लेने को कहा था लेकिन जजों की गर्दन तो अकड़ी हुई होती है कैसे अपना कसूर मान सकते हैं

न्यायपालिका को आत्मनिरीक्षण कर अपना आचरण सही करना जरूरी है वरना जो नहीं सुधरते, उन्हें वक्त सुधार देता है। 

एक बार फिर कहता हूं कि न्याय उस दिन होना शुरू होगा जिस दिन जज और उनके परिवार अपराध का शिकार होंगे। अजमेर कोर्ट के गौहर चिश्ती को बरी कर नूपुर शर्मा के लिए खतरा पैदा कर दिया है और अगर उसे कुछ होता है तो यह जज रितु मीणा समेत जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस पारदीवाला भी जिम्मेदार होंगे क्योंकि उनकी “Hate Speech” ने नूपुर शर्मा पर अपराध की कॉल उसी दिन दे दी थी

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