राकेश किशोर (बाएँ) और CJI गवई (दाएँ) (फोटो साभार- ANI/MInt) मुख्य न्यायाधीश बी आर गवई ने भगवान विष्णु पर विवादित टिप्पणी कर जो फूस में चिंगारी छोड़ी है उसे शांत करने में कितने मुख्य न्यायाधीशों को झुलसना पड़ेगा यह भविष्य के गर्भ में छिपा है। अयोध्या में रामजन्मभूमि मन्दिर विवाद और नूपुर शर्मा केस से सोशल मीडिया पर एक बात बहुत गरमाई हुई है कि हिन्दुओं के संयम की अग्नि परीक्षा मत लो। "सिर तन से जुदा" नारे को समर्थन देने पर क्या कार्यवाही की? कन्हैया लाल के कातिलों को अब तक क्यों नहीं फांसी हुई? है सुप्रीम कोर्ट के पास कोई जवाब? बस सनातन के विरुद्ध सारे कानून और दलाल वकीलों की बहार आ जाती है?
सुप्रीम कोर्ट में सोमवार (6 अक्टूबर 2025) को कार्यवाही के दौरान CJI पर जूता फेंकने के आरोपित वरिष्ठ वकील राकेश किशोर ने अब कहा, ”मैं बेहद गौरवान्विंत हूँ कि भगवान ने इसके काम के लिए 100 करोड़ हिंदुओं में से सिर्फ मुझे चुना, मैं न झुकूँगा न डरूँगा, भगवान विष्णु के लिए खजुराहो जाकर अनशन करूँगा। मेरी तैयारी पूरी है इसके लिए मुझे भगवान से आदेश प्राप्त हो गया है।“
घटना से बाद से ही हम आरोपित वकील का इंटरव्यू करने के प्रयास में थे लेकिन तीसरे दिन (गुरुवार 9 अक्टूबर) आरोपित वकील डॉ. राकेश किशोर से उनके मयूर विहार स्थित आवास पर मुलाकात हुई इससे पहले सोसायटी के गेट पर सुरक्षाकर्मी ने पूरी जाँच पड़ताल और वकील से बात कराने के बाद ही हमें अंदर जाने दिया।
दरवाजे पर घँटी बजाने पर बाहर आए वकील डॉ. राकेश किशोर ने जालीदार गेट के अंदर से पूरा परिचय और उद्देश्य जानने के बाद ही हमें अंदर बुलाया। इसके बाद उनकी पत्नी और वहाँ पहले से मौजूद एक उनके दोस्त ने हमारी पूरी पड़ताल के बाद ही कैमरे पर हमसे बात करने के लिए तैयार हुए।
हाल चाल पूछने पर वकील डॉ. राकेश किशोर अपनी जान पर खतरा बताते हुए कहते हैं कि कुछ लोग हमेशा सर तन से जुदा करने में दिलचस्पी रखते हैं। मुझ पर कभी भी अटैक हो सकता है मुझे लगातार धमकियाँ मिल रही हैं हो भी सकता है कि सनातन की आवाज हमेशा के लिए बंद हो जाए। मैंने डर के कारण बाहर जाना यहां तक कि बाहर टहलना भी बंद कर दिया है, लेकिन भगवान पर भरोसा रखते हुए एक शेर सुनाते हैं…
फानूस बनकर जिसकी हिफाजत हवा करे,
वो चिराग क्या बुझे जिसकी हिफाजत खुदा करे।।
आगे डॉ. किशोर कहते हैं कि भगवान के आदेश से मैं खजुराहो अनशन के लिए जा रहा हूँ तैयारी पूरी कर ली है। अपने भगवान विष्णु की प्रतिमा को फिर से स्थापित कराने के लिए मैं जान भी देने के लिए तैयार हूँ। इस जन्म में यह काम नहीं हुआ तो एक-दो जन्म लेकर करूँगा।
डॉ. राकेश किशोर ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट की कथन-करनी में अंतर आ गया है। नुपूर शर्मा की जिंदगी आज तबाह हो गई है। वो अंडर ग्राउंड है। वो कहाँ है उसका परिवार कहाँ है किसी को नहीं पता ऐसी जिंदगी कौन जीना चाहेगा? ये सब एक सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के कारण हुआ। कोर्ट ने नुपूर शर्मा को तो फटकार लगा दी, लेकिन जिन लोगों ने सर तन से जुदा की धमकी दी उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हुई। वो(नुपूर शर्मा) बेचारी मर-मर के जी रही है। उधर कन्हैयालाल की हत्या करके हत्यारों ने वीडियो बनाया, लेकिन उसके हत्यारे आज भी आजाद घूम रहे हैं।
इससे साफ है कि बात सनातन की कोर्ट में आती है तो जज साहब टिप्पणी करते हैं और बात जब सर तन से जुदा वालों की आती है तो चुप्पी साध लेते हैं। हिम्मत है तो दूसरे लोगों के लिए टिप्पणी करके देखिए, लेकिन अब ऐसा नहीं चलेगा।
डॉ. राकेश किशोर ने कहा कि इस देश में सनातन की आज ये जो हालत है वह इसलिए कि हम सनातन के अपमान पर आज तक चुप रहे और सिर्फ लेख लिखते रहे कभी कोई कदम नहीं उठाया।
डॉ. राकेश किशोर ने कहा, “वो(मुस्लिम) गजवा ए हिंद की तैयारी कर रहे हैं। वह भारत को ईरान की तरह बनाना चाहते हैं। इसकी एक झलक मैंने अपनी आँखों से पश्चिमी उत्तर प्रदेश और झारखंड में देखी है। 1947 में मुस्लिम देशों की संख्या 10-12 थी लेकिन आज उनकी संख्या 57 हो गई है। ये अब देश के युवाओं की चिंता है कि अगर कल को भागना पड़े तो वह भारत से कहाँ जाएँगे?”
माफ करने पर CJI को नहीं कहूँगा शुक्रिया
‘जूता कांड’ के बाद CJI बीआर गवई द्वारा खुद को माफ करने पर डॉ. किशोर कहते हैं, “मैं उन्हें शुक्रिया अदा नहीं करूँगा क्योंकि उन्होंने मुझे इसलिए माफ किया है कि वह नवंबर माह में सेवानिवृत्त हो रहे हैं। इसके बाद वह मेरी तरह सामान्य वकील हो जाएँगे। जब मैं अपना केस लड़ते हुए इनसे कोर्ट में सवाल करूँगा तो वह मेरे सवालों का सामना नहीं कर पाएँगे। उन्हें पता है कि मैं एक ईमानदार हूँ और मैं इनकी(CJI) की कलई खोल सकता हूँ। हालाँकि मुझे फँसाने और गिरफ्तार किए जाने के लिए नए तरीके से प्रयास हो रहे हैं। मेरे खिलाफ कर्नाटक में भी मुकदमा लिखवाया गया है, लेकिन मैं इनसे डरने वाला नहीं हूँ। मैं गिरफ्तारी देने के लिए तैयार हूँ।”
बीआर गवई पर जूता फेंके जाने पर वामपंथी और उदारवादी लोगों ने इसे 'दलित CJI पर हमला' करार दिया कुछ समय से देखा जा रहा है कि सुप्रीम कोर्ट दलाल वकीलों के इशारों पर काम करती हैं। दलाल वकीलों द्वारा दायर केस की फटाफट सुनवाई होती है, क्यों? सनातन धर्म और हिन्दू त्यौहारों पर सारे कानून याद आ जाते हैं लेकिन दूसरे मजहबों पर जरुरत से ज्यादा दयालु बनना क्या कोर्ट का अपमान नहीं? निचली अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक को इस गंभीर मुद्दे पर मंथन करना होगा। अभी जो अनहोनी घटना हुई है वह इसी घिनौनी मानसिकता के कारण हुआ। दलाल वकील तो मोटी रकम लेकर जनता ही नहीं माननीय अदालतों तक के स्तर को नीचे धरातल में धकेल रहे हैं। लेकिन जज किसी भी कोर्ट का हो जनता उसे भगवान के समान इज्जत देता है, और जजों को भी इस सोंच पर काम कर दलाल वकीलों के इशारों पर नाचना बंद करना होगा।
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) बीआर गवई पर एक 71 साल के वकील ने सुप्रीम कोर्ट में सरेआम जूता फेंका और चिल्लाए- “सनातन का अपमान नहीं सहेंगे!”, यह गुस्से से भरा एक भावनात्मक कदम था। यह कदम नासमझी भरा, निंदनीय भी है लेकिन साफ तौर पर आस्था से जुड़ा हुआ है।
मगर कुछ ही मिनटों में भारत के उदारवादी हलकों ने इस घटना को एक अलग नजरिए से देखना शुरू कर दिया। उन्होंने इसे जाति से जोड़ दिया। उनका कहना था कि यह जूता सनातन धर्म की रक्षा में नहीं फेंका गया बल्कि एक ‘दलित CJI पर हमला’ था।
भारत के कुछ वामपंथी-उदारवादी बुद्धिजीवी हर बात को सामाजिक दरार में बदलने की कोशिश करते हैं। आस्था से जुड़ा हर विरोध उनके लिए जाति की लड़ाई बन जाता है। यह एक तरह की उलटी सोच है, जहाँ धर्म की बात भी जातिवाद के चश्मे से देखी जाती है।
विपक्ष के बड़े नेताओं में से एक राहुल गाँधी ने खुद को लंबे समय से जाति के मुद्दों का योद्धा बताया है। वे दलितों, पिछड़ों और जनजातीय समाज के लिए मसीहा बनने की कोशिश करते हैं लेकिन असल में उनकी पहचान को सिर्फ वोटों की गिनती तक सीमित कर देते हैं।
कभी मंदिरों में तयशुदा अंदाज में दर्शन करना, तो कभी पूरे देश में जाति जनगणना की माँग। राहुल की राजनीति सशक्तिकरण से ज्यादा समाज को बाँटने की रणनीति लगती है। इसी तरह कई क्षेत्रीय पार्टियाँ भी जाति के नाम पर समाज में दरारें पैदा करती हैं और अपनी राजनीति को आगे बढ़ाती हैं।
लेकिन इस माले में हकीकत बिल्कुल साफ है। जूता फेंकने वाले वकील ने कहीं भी जाति का जिक्र तक नहीं किया। उन्होंने कोई अपमानजनक शब्द नहीं बोले। उसके मुँह से सिर्फ एक बात निकली- ‘सनातन धर्म का अपमान नहीं सहेंगे।’
यहाँ वकील का गुस्सा खजुराहो में भगवान विष्णु की खंडित मूर्ति की पुनरुद्धार को लेकर सुनवाई में की गई टिप्पणी से जुड़ा था। सुनवाई के दौरान CJI बीआर गवई ने टिप्पणी की, जिसे कई लोगों ने तंज के तौर पर लिया। उन्होंने कहा- ‘जाइए, भगवान से खुद कहिए कुछ करें। आप कहते हैं कि आप कट्टर भक्त हैं तो जाकर प्रार्थना कीजिए।”
किसी आस्थावान हिंदू के लिए ऐसे शब्द आस्था का अपमान लगते हैं, चाहे ये अनजाने में ही क्यों न कहे गए हों। खासकर जब वो देश की सबसे बड़ी न्यायिपालिका से आए हों। वकील की प्रतिक्रिया जरूर हद से ज्यादा थी और स्वीकार नहीं की जा सकती लेकिन वो भावनात्मक थी, जातिवादी नहीं।
फिर भी कुछ ही घंटों में जाति की राजनीति शुरू हो गई। सोशल मीडिया पर एक्टिविस्ट और कुछ ‘धर्मनिरपेक्ष’ पत्रकार चिल्लाने लगे- “दलित CJI पर जातिवादी हमला!” ऐसा लगा जैसे उनके तय ढाँचे में फिट ने बैठने वाली कोई भी हिंदू आस्था की अभिव्यक्ति, उन्हें बर्दाश्त नहीं होती।
जातिवाद के पीछे की राजनीति
इस तरह की घुमावदार बातें करने की वजह साफ है- आस्था हिंदुओं को जोड़ती है, जबकि जाति उन्हें बाँटती है।
साल 2014 के बाद जब नरेंद्र मोदी का उदय हुआ और पुरानी वोट-बैंक की राजनीति हिल गई तब से विपक्ष और उसके समर्थक लगातार हिंदू एकता को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। इसके लिए वे बार-बार जाति के पुराने मुद्दों को हवा देते हैं। हर चुनाव में वही पुरानी रणनीति दोहराई जाती है। आरक्षण खत्म होने की झूठी बातें, ‘ब्राह्मणवादी हिंदुत्व’ का डर फैलाना और अब नया शोर, ‘दलित CJI पर हमला।’
साल 2024 के चुनाव से पहले अमित शाह का एक एडिट किया हुआ वीडियो वायरल हुआ था, जिसमें झूठा दावा किया गया कि BJP जातिगत आरक्षण खत्म करना चाहती है? ये एक साजिश थी और अब वही सोच फिर से काम पर लग गया है। एक भावनात्मक विरोध को बहाना बनाकर दलित मतदाताओं को भड़काया जा रहा है और हिंदू समाज में दरार डालने की कोशिश हो रही है।
क्योंकि उनके लिए एकजुट हिंदू पहचान राजनीतिक रूप से खतरनाक है, खासकर जब सनातन धर्म से जुड़ी हो।
जब कुछ इस्लामी कट्टरपंथी ‘सर तन से जुदा’ जैसे नारे लगाते हैं, तब न तो वामपंथी सोच वाले लोग कुछ कहते हैं और न ही सुप्रीम कोर्ट इस्लामी विचारधारा पर कोई सवाल करता है। लेकिन जब कोई हिंदू अपनी आस्था की बात करता है तो सारा दोष उसी पर डाल दिया जाता है।
नूपुर शर्मा विवाद के दौरान दोहरापन साफ नजर आया। जब भीड़ खुलेआम सिर काटने की धमकी दे रही थी, पुतले फूँके जा रहे थे और मौत की माँग हो रही थी। तब सुप्रीम कोर्ट की मौखिक टिप्पणी ने चौंका दिया। कोर्ट ने कहा- “देश में जो हो रहा है, उसके लिए अकेली नूपुर शर्मा जिम्मेदार हैं।”
यानि कट्टरपंथी सड़कों पर खून माँग रहे थे लेकिन चर्चा का केंद्र बन गई एक महिला, जिसने उनके ही धर्मग्रंथों से उद्धरण दिया था। और वही वामपंथी-उदारवादी जमात, जो हर हिंदू विरोधी फिल्म पर ‘अभिव्यक्ति की आजादी’ का रोना रोती है, उस वक्त ‘सर तन से जुदा’ के नारों पर पूरी तरह चुप हो गई।
तब भारत के तथाकथित ‘धर्मनिरपेक्ष जमीर’ वालों में से किसी ने दंगाइयों की निंदा करने की हिम्मत नहीं दिखाई। उल्टा, उन्होंने नूपुर शर्मा को ही दोषी ठहराना आसान और फैशनेबल समझा, जैसे देश को आग लगाने वाली वही थीं। लेकिन आज जब एक भावनात्मक और निंदनीय प्रतिक्रिया सामने आती है तो उसे जातिवादी हमला बताकर नया नैरेटिव खड़ा किया जा रहा है। यही है सोच का असली विरोधाभास।
सामान्य संदिग्ध: इंदिरा जयसिंह से लेकर सबा नकवी तक और अनगिनत ऑनलाइन ट्रोल
अपनी आदत से मजबूर कार्यकर्ता और वकील इंदिरा जयसिंह ने जूता फेंकने वाली घटना को ‘जातिवादी हमला’ घोषिक करने में कोई संकोच नहीं किया।
Attorney General should take action for contempt of court for an ideological castest attack on a secular court https://t.co/Fk4XrWTGOX
किस आधार पर? किसी भी नहीं। न कोई जातिसूचक शब्द बोला गया, न कोई अपमानजनक टिप्पणी, न ही कोई जाति का जिक्र। लेकिन सच्चाई से किसी की नैरेटिव क्यों बिगाड़े?
सबा नकवी, वही ‘पत्रकार’ जिन्होंने ज्ञानवापी मस्जिद में मिले शिवलिंग का मजाक उड़ाते हुए उसे परमाणु मॉडल से तुलना करने वाला मीम शेयर किया था। उन्होंने इस बार भी अपनी ‘धर्मनिरपेक्ष बुद्धिमत्ता’ का परिचय देते हुए कहा कि इस घटना के ‘साफतौर पर सामाजिक पहलू’ हैं।
There are clear social dimensions to an attack on Dalit CJI when a lawyer attempted to throw a shoe at him. It is an assault on his dignity.
उदारवादी शब्दावली में ‘सामाजिक आयाम’ का मतलब है- हमारे पास साक्ष्य नहीं है लेकिन हम संदर्भ का आविष्कार कर लेंगे।
कॉन्ग्रेस और विपक्षी दलों के मुद्दों को आगे बढ़ाने वाले कई सोशल मीडिया ट्रोल्स ने भी इस मुहिम में शामिल होकर आरोप लगाया कि यह एक दलित CJI के खिलाफ ‘जातिवादी हमला’ है।
संघ के एजेंट की तरह काम ना करने पर CJI गवई पर एक संघी मानसिकता के वकील ने जूता फेंका।
सड़कों की बात छोड़ों, देश का मुख्य न्यायाधीश बनने के बाद भी दलित व्यक्ति सुरक्षित नहीं है नरेंद्र युग में। pic.twitter.com/eZJxAhE7Ls
— Rofl Gandhi 2.0 🏹 Commentary (@RoflGandhi_) October 6, 2025
पहचान की राजनीति के खतरनाक परिणाम
यहाँ सबसे दुखद बात यह है कि संवैधानिक पदों पर बैठे लोग आस्था के प्रति संवेदनशीलता कैसे दिखाएँ। इस असली सवाल को पहचान की राजनीति की आँधी में दबा दिया गया है।
इस पर चर्चा करने के बजाए कि क्या CJI गवई की पिछली टिप्पणी उच्च संस्थानों में हिंदू भावनाओं के प्रति बढ़ती असंवेदनशीलता को दर्शाती है। बात को मोड़कर एक और ‘दलित पीड़ित’ की कहानी बना दी गई।
यह सिर्फ बौद्धिक बेईमानी नहीं है, बल्कि समाज के लिए नुकसानदेह भी है। इससे यह संदेश जाता है कि अगर कोई हिंदू अपनी धार्मिक चोट को सामने रखता है तो उसे भी गलत ठहराया जाएगा। जब तक कि वह वामपंथी जातिगत गणित में फिट न बैठे।
आस्था कोई जातिगत विशेषाधिकार नहीं
यह याद दिलाना जरूरी है कि सनातन धर्म किसी एक जाति की जागीर नहीं है। जिस आस्था की बात उस वकील ने की है, वह दलितों, ब्राह्मणों, पिछड़ों और आदिवासियों की समान रूप से है। अयोध्या से लेकर तिरुपति तक देशभर के मंदिरों में दलित श्रद्धालु बड़ी संख्या में जाते हैं। संत रविदास से लेकर चोखामेला तक कई दलित संत हिंदू आध्यात्मिक परंपरा के केंद्र में रहे हैं।
जब कोई कहता है, ‘सनातन का अपमान नहीं सहेंगे’ तो वह किसी जाति की नहीं बल्कि एक सभ्यता की पहचान की बात करता है। उसे जातिवाद में बदल देना सिर्फ आलसी सोच नहीं है बल्कि यह सनातन धर्म की उस आत्मा का अपमान है जो जाति और पंथ से ऊपर है।
जूता विरोध और न्यायिक स्वतंत्रता पर वामपंथियों का दोहरा मापदंड
विडंबना देखिए कि जो वामपंथी इकोसिस्टम आज CJI गवई पर जूता फेंकने को लेकर शोर मचा रही है, वही लोग सालों तक ऐसे ही कृत्यों को ‘विरोध का जायज तरीका’ बताकर सराहते रहे हैं। जब किसी नेता, पत्रकार या सार्वजनिक व्यक्ति पर जूता फेंका गया तो उसे प्रतिरोध का प्रतीक बना दिया गया। मीम बनाए गए, ट्वीट्स में तालियाँ बजीं और जूता फेंकने वालों को ‘फासीवाद के खिलाफ बहादुर लड़ाके’ कहकर महिमामंडित किया गया।
साल 2009 में पत्रकार जरनैल सिंह ने उस वक्त के गृह मंत्री पी चिदंबरम पर प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान जूता फेंका था। यह विरोध था साल 1984 के सिख विरोधी दंगों में आरोपित दो कॉन्ग्रेस नेताओं को CBI द्वारा क्लीन चिट दिए जाने के खिलाफ।
उस समय कई उदारवादी हलकों ने जरनैल सिंह को राजनीतिक अन्याय के खिलाफ साहसी प्रतिरोध का प्रतीक बताया। इसी तरह 2008 में इराकी पत्रकार मुन्तज़र अल-ज़ैदी ने अमेरिका के राष्ट्रपति जॉर्ज बुश पर जूते फेंके थे। वामपंथी खेमे ने इसे अमेरिका के इराक पर कब्जे के खिलाफ प्रतिरोध की मिसाल बताया।
लेकिन जैसे ही निशाना एक दलित CJI बन गया और विरोध करने वाला व्यक्ति सनातन धर्म की रक्षा में खड़ा था। वामपंथी नैतिकता की दिशा ही बदल गई। वही जूता फेंकने की हरकत, जिसे पहले ‘विरोध का साहसिक तरीका’ कहा गया था, अब ‘दलित गरिमा पर हमला’ बन गई। उनकी यह चुनिंदा नाराजगी साफ दिखाती है कि उनके लिए विरोध की स्वीकार्यता सिद्धांतों से नहीं बल्कि विचारधारा से तय होती है।
यह बात भी गौर करने लायक है कि वामपंथी खेमे ने कभी न्यायपालिका का सम्मान नहीं किया जब उसने उनकी विचारधारा की गूँज नहीं दोहराई। पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़, जिन्हें कभी ‘प्रगतिशील प्रतीक’ माना जाता था, उन्हीं बुद्धिजीवियों के निशाने पर आ गए जब उन्होंने श्रीनिवासन जैन को दिए इंटरव्यू में वह चर्चित टिप्पणी की- “बाबरी मस्जिद का निर्माण ही अपवित्रता का मूल कार्य था।”
बस यही एक वाक्य काफी था कि जो व्यक्ति कभी उदारवादी ड्रॉइंग रूम्स का चहेता था, वह अचानक तीखी आलोचना का शिकार बन गया। वामपंथी पोर्टलों में एक के बाद एक लेख आए, जिनमें उनकी ‘धर्मनिरपेक्षता’ पर सवाल उठाए गए। कुछ ने तो उनके बयान को ‘खतरनाक’ और ‘पिछड़ापन दर्शाने वाला’ तक कह दिया।
तो जब वही जमात अचानक CJI गवई पर हुए जूता फेंकने की कोशिश पर आँसू बहाने लगती है तो यह न्यायपालिका की गरिमा या संस्थागत सम्मान की चिंता नहीं होती। यह सिर्फ एक राजनीतिक मौका होता है, एक ऐसा मौका जिससे सार्वजनिक बहस में जाति का तड़का लगाया जा सके और ‘दलित पीड़ित’ की पुरानी कहानी को फिर से दोहराया जा सके।
वामपंथी खेमे को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि CJI पर हमला हुआ। उन्हें सिर्फ इस बात की परवाह है कि इस घटना को कैसे हिंदू समाज में दरार डालने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है और जाति की राजनीति को गर्म रखा जा सके।
क्या यह वास्तव में जातिवादी हमला था या हिंदू एकता को कमजोर करने की वामपंथियों की हताशा?
हाँ, उस वकील का व्यवहार बेहद अनुचित था और कानून के अनुसार उसे सजा भी मिलनी चाहिए। लेकिन इस घटना पर जो प्रतिक्रिया सामने आई, वह भारत के बुद्धिजीवी वर्ग की एक और चिंताजनक तस्वीर दिखाती है कि उनका पहला स्वभाव समझने का नहीं बल्कि बाँटने का होता है।
किसी एक भी वामपंथी विचारक ने इस मुद्दे को गहराई से देखने या संतुलित दृष्टिकोण अपनाने की कोशिश नहीं की। किसी ने एक आसान सवाल पूछना भी जरूरी नहीं समझा- उस वकील ने ऐसा क्यों किया? उसे किस बात ने उकसाया? उस समय उसकी मानसिक स्थिति क्या थी? अगर सिर्फ उसके इरादे को समझने की कोशिश की जाती, तो तस्वीर काफी हद तक साफ हो सकती थी।
आत्मचिंतन कभी वामपंथी खेमे की ताकत नहीं रही। तथ्य जानने की कोशिश करने के बजाए उन्होंने तुरंत हंगामा खड़ा कर दिया और इस घटना को ‘दलित CJI पर जातिवादी हमला’ कहकर प्रचारित करने लगे। न मंशा की परवाह की गई, न हालात की, बस नैरेटिव चलाना था। उनके लिए हिंदू की आस्था कट्टरता है लेकिन मुस्लिम की चोट ‘न्यायसंगत गुस्सा’ बन जाती है।
कोर्ट में एक 71 साल के वकील ने शायद जरूरत से ज्यादा प्रतिक्रिया दी हो लेकिन उससे भी बड़ा अपराध है उन बुद्धिजीवियों की बौद्धिक बेईमानी, जिन्होंने इस घटना को हथियार बनाकर एक बार फिर हिंदू समाज को बाँटने की कोशिश की।
गवई और दिवंगत जज लोया (साभार: पीटीआई/इंडियन एक्सप्रेस) भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) बीआर गवई पर सोमवार (6 अक्टूबर 2025) को एक मामले की सुनवाई के दौरान जूता फेंकने की कोशिश की गई। रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह घटना उस समय हुई जब CJI गवई की अध्यक्षता वाली बेंच में कुछ मामलों की सुनवाई चल रही थी।
इस दौरान 71 वर्षीय अधिवक्ता राकेश किशोर अचानक न्यायाधीशों के मंच के पास पहुँचे, अपना जूता उतारा और उसे CJI की ओर फेंकने का प्रयास किया। हालाँकि, मौके पर मौजूद सुरक्षा कर्मियों ने उन्हें तुरंत रोक लिया और अदालत से बाहर ले गए।
बताया जा रहा है कि इस दौरान अधिवक्ता ने चिल्लाकर कहा, “सनातन का अपमान नहीं सहेंगे।” इसके बाद उन्हें पुलिस के हवाले कर दिया गया। हालाँकि, सुप्रीम कोर्ट की रजिस्ट्री ने उन पर कोई मामला दर्ज कराने से इनकार कर दिया जिसके बाद पुलिस ने उन्हें छोड़ दिया।
बाद में बार काउंसिल ऑफ इंडिया ने अधिवक्ता राकेश किशोर का वकालत लाइसेंस निलंबित कर दिया। घटना के बावजूद सुप्रीम कोर्ट की कार्यवाही प्रभावित नहीं हुई। CJI ने अदालत में मौजूद वकीलों से कहा कि वे सुनवाई जारी रखें।
CJI गवई की ‘हिंदू विरोधी टिप्पणी’ से परेशान था वकील
जूता फेंकने की कोशिश करने वाले वकील राकेश किशोर ने मीडिया से बातचीत में कहा कि वे CJI गवई की ‘हिंदू विरोधी टिप्पणी’ से बेहद परेशान थे। उनका कहना था कि चीफ जस्टिस ने पिछले महीने एक मामले की सुनवाई के दौरान भगवान विष्णु के एक भक्त की आस्था का मजाक उड़ाया था। इसी बात ने उन्हें अंदर तक चोट पहुँचाई।
यह मामला मध्य प्रदेश के खजुराहो स्थित जावरी मंदिर में भगवान विष्णु की मूर्ति की पुनरुद्धार से जुड़ा था। उस याचिका की सुनवाई के दौरान CJI गवई ने याचिकाकर्ता से तंज भरे लहजे में कहा था, “यह तो पब्लिसिटी के लिए दायर याचिका लगती है। आप खुद भगवान से जाकर कहिए कि वे कुछ करें। आप कहते हैं कि आप भगवान विष्णु के कट्टर भक्त हैं, तो जाकर प्रार्थना कीजिए।”
कानूनी तौर पर यह याचिका तकनीकी कारणों से खारिज की जा सकती थी लेकिन CJI गवई की इस व्यंग्यात्मक टिप्पणी को लेकर काफी आलोचना हुई। इसमें आस्था का मजाक उड़ा गया और कई लोगों ने इसे पूरी तरह अनावश्यक और असंवेदनशील बताया।
कांग्रेस और वामपंथी-लिबरल गैंग ने CJI की जाति को बनाया मुद्दा
हालाँकि, CJI पर हिंदू विरोधी टिप्पणी को लेकर जूता फेंकने का प्रयास किसी भी तरह से सही नहीं ठहराया जा सकता लेकिन कांग्रेस और वामपंथी-लिबरल समूह ने इस मौके का इस्तेमाल अपने राजनीतिक नैरेटिव को आगे बढ़ाने के लिए किया। उन्होंने पूरे मामले को CJI गवई की जाति से जोड़ दिया।
कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने घटना की निंदा करते हुए कहा कि यह घटना इस बात की याद दिलाती है कि जातिगत पूर्वाग्रह और मनुवादी सोच अब भी समाज में बनी हुई है। वहीं, ब्राह्मण विरोधी रुख के लिए जानी जाने वाली वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह भी इस बहस में शामिल हो गईं और उन्होंने भी इस घटना को CJI गवई की जाति से जोड़ने की कोशिश की। जयसिंह के अनुसार, यह घटना मुख्य न्यायाधीश की जाति के चलते की गई है और संस्थान के भीतर से उन्हें अलग-थलग करने की कोशिश है।
कई लोगों के लिए यह समझना मुश्किल हो सकता है कि CJI की जाति का उस व्यक्ति की हरकत से क्या संबंध है, जिसने हिंदू विरोधी टिप्पणी से आहत होकर जूता फेंकने की कोशिश की थी। लेकिन कांग्रेस और वामपंथी नैरेटिव में यह पूरी तरह फिट बैठता है। उनके लिए न तो यह किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत प्रतिक्रिया है और न ही कोई वास्तविक जातिगत भेदभाव। उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण हमेशा उनका नैरेटिव ही होता है बाकी सब कुछ उसके बाद आता है।
जज लोया केस में वामपंथी-लिबरल गैंग ने CJI गवई के बयानों को किया खारिज
जब 2014 में सीबीआई जज बीएच लोया की मौत हुई थी तब CJI गवई या उनके बयान का वामपंथी-लिबरल समूह पर कोई असर नहीं पड़ा था। CJI गवई ने 2017 में NDTV से बातचीत के दौरान जज लोया की मौत को लेकर फैलाई जा रही सभी साजिशी बातों को सिरे से खारिज किया था।
उस समय वह बॉम्बे हाईकोर्ट में कार्यरत रहे थे। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि जज लोया की मौत में कोई गड़बड़ी नहीं थी। गवई खुद उस अस्पताल में मौजूद थे जहाँ जज लोया को दिल का दौरा पड़ने के बाद भर्ती कराया गया था।
CJI गवई ने कहा था कि उन्होंने ICU में जज लोया का शव देखा जहाँ डॉक्टर उन्हें बचाने की पूरी कोशिश की थी। उन्होंने यह भी बताया था कि जज लोया के कपड़ों पर कोई खून के निशान नहीं थे और उन्हें किसी तरह की संदिग्ध स्थिति नहीं दिखी।
इसके बावजूद कांग्रेस और वामपंथी-लिबरल समूहों ने उस समय CJI गवई के बयान को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। उन्होंने जज लोया की मौत को लेकर झूठी कहानियाँ फैलाते हुए बीजेपी को निशाना बनाना जारी रखा। इन अफवाहों और आरोपों के पीछे उनका मकसद सिर्फ यह था कि जज लोया उस समय सोहराबुद्दीन एनकाउंटर केस की सुनवाई कर रहे थे, जिसमें उस वक्त बीजेपी अध्यक्ष और वर्तमान में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह मुख्य आरोपी थे।
इंदिरा जयसिंह और उनके गैंग ने जब न्यायपालिका की छवि खराब करने की कोशिश की
इंदिरा जयसिंह और उनके गैंग ने पहले भी न्यायपालिका की छवि खराब करने की कोशिश की थी। उस समय जस्टिस गवई बॉम्बे हाई कोर्ट में थे और अब वही भारत के चीफ जस्टिस हैं। जयसिंह का सर्वोच्च न्यायालय के प्रति सम्मान का इतिहास अच्छा नहीं रहा ह और अब जूता फेंकने की घटना को न्यायपालिका पर हमला बता रही हैं। लेकिन पहले वे खुद न्यायपालिका को बदनाम करने वाले गिरोह का हिस्सा थीं।
कांग्रेस से जुड़ी मानी जाने वाली इंदिरा जयसिंह उस लॉबी का हिस्सा थीं जिसने जज लोया की मौत को लेकर झूठ फैलाया। उस लॉबी ने यह आरोप लगाने की कोशिश की थी कि अमित शाह और बीजेपी का इसमें हाथ था। जबकि सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में कहा था कि जज लोया की मौत प्राकृतिक थी और इसमें किसी तरह की साजिश नहीं थी।
इंदिरा जयसिंह के साथ वरिष्ठ वकील दुष्यंत दवे और प्रशांत भूषण भी इस अभियान में शामिल थे। सुप्रीम कोर्ट ने इन तीनों को अदालत की गरिमा को ठेस पहुँचाने और न्याय की प्रक्रिया में रुकावट डालने की कोशिश के लिए फटकार लगाई थी।
उस समय चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा, जस्टिस ए.एम. खानविलकर और जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ की पीठ ने कहा था कि इन वरिष्ठ वकीलों की याचिकाएँ न्यायाधीशों की छवि को नुकसान पहुँचाने और पूर्वाग्रह फैलाने की कोशिश हैं, खासकर बॉम्बे हाई कोर्ट के जज बी.आर. गवई के खिलाफ।
विडंबना यह है कि वही इंदिरा जयसिंह जिन्होंने पहले जस्टिस गवई की प्रतिष्ठा पर हमला किया था। वो अब उनकी जाति और न्यायपालिका पर हमले की बात कर रही हैं। जब वे बॉम्बे हाई कोर्ट में थे तब उन पर सवाल उठाना उन्हें सही लगा लेकिन अब जब वे चीफ जस्टिस हैं तो वही बात जातिगत भेदभाव बताई जा रही है।
आज तक भी कुछ लोग जज लोया की मौत को लेकर झूठी कहानियाँ फैलाते रहते हैं। वे लगातार यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि इस मामले में केंद्र सरकार की कोई भूमिका थी और यह साबित करना चाहते हैं कि न्यायपालिका जैसी संस्था भी सरकार के प्रभाव में है। इन साजिशी दावों के लिए कभी कोई सबूत नहीं दिया जाता है। जज लोया से जुड़े वे सभी तथ्य और बयान जो वामपंथी नैरेटिव के खिलाफ जाते हैं। उन्हें जानबूझकर अनदेखा कर दिया जाता है।
उस समय वामपंथी सोच रखने वाले कई विचारकों ने यहाँ तक कहा था कि जज गवई वरिष्ठ न्यायाधीशों को दरकिनार कर चीफ जस्टिस बनेंगे क्योंकि उन्होंने जज लोया की मौत को लेकर किसी गड़बड़ी से इनकार किया था।
विडंबना यह है कि वही जज गवई, जिन्हें पहले ‘सरकारी आदमी’ या ‘सरकार के इशारों पर चलने वाला’ बताया गया था, अब वामपंथी-लिबरल वर्ग के ‘प्रिय’ बन गए हैं। ऐसा लगता है कि भगवान विष्णु से जुड़े मजाक के बाद ये समूह उन्हें अपने नए नैरेटिव में फिट मानने लगे हैं।
जूता फेंकने की घटना पर कांग्रेस और वामपंथी-लिबरल समूह की प्रतिक्रिया ने उनकी दोहरी सोच और पाखंड को उजागर कर दिया है। ये लोग किसी सिद्धांत या सच्चाई के लिए नहीं बल्कि सिर्फ अपनी जहरीली और स्वार्थी विचारधारा के लिए खड़े रहते हैं। उनकी राजनीति देश में विभाजन फैलाने पर टिकी हुई है।
इनके लिए न CJI गवई में और न ही पूर्व CJI डी.वाई. चंद्रचूड़ में कोई अंतर है। चंद्रचूड़ जो कभी वामपंथी वर्ग के प्रिय थे राम मंदिर पर फैसला सुनाने के बाद उनके निशाने पर आ गए। इस समूह के लिए हर व्यक्ति तब तक उपयोगी है जब तक वह उनके राजनीतिक हितों की सेवा करता है। जैसे ही कोई उनके एजेंडे से बाहर चला जाता है, वह उनके लिए बेकार हो जाता है।
सुप्रीम कोर्ट में सोमवार(अक्टूबर 6, 2025) को भारत के चीफ जस्टिस बीआर गवई पर जूता उछालने के मामले में आरोपी वकील के खिलाफ कोई कानूनी कार्रवाई नहीं की जाएगी। इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री का बयान सामने आया है। उन्होंने पुलिस को हिरासत में लिए गए वकील के खिलाफ एक्शन नहीं लेने के निर्देश दिए है।
सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को CJI के डाइस के पास एक वकील ने उन पर जूता उछालने की कोशिश की है। हालांकि इस दौरान वहां मौजूद पुलिसकर्मियों ने आरोपी वकील को रोक लिया। इस दौरान आरोपी वकील सनातन सनातन धर्म का अपमान, नहीं सहेगा हिंदुस्तान के नारे भी लगाए. अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री का बयान आया है।
सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री ने पुलिस को आदेश देते हुए कहा कि आरोपी वकील के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की जाएगी। जिसके बाद माना जा रहा है कि पुलिस अब जल्द ही हिरासत में लिए गए आरोपी वकील को छोड़ देगी। वहीं इस पूरे मामले में भारत के चीफ जस्टिस बीआर गवई आरोपी वकील को पहले ही माफ कर चुके हैं। आरोपी वकील की पहचान राकेश किशोर के रूप में हुई है। दिल्ली पुलिस के दो डीसीपी उससे पूछताछ कर रहे हैं।
CJI बोले- उन्हें फर्क नहीं पड़ता, उन्हें माफ करता हूं
दरअसल सुप्रीम कोर्ट में सोमवार को भारत के चीफ जस्टिस बीआर गवई एक मामले की सुनवाई कर रहे थे। इस दौरान ही एक वकील चीफ जस्टिस के पास पहुंच गया और अपना जूता निकालकर उनकी तरफ उछालने की कोशिश की। तभी वहां मौजूद सुरक्षाकर्मियों ने वकील को पकड़ लिया। इसके बाद वकील ने कोर्ट में नारेबाजी शुरू की दी है। इससे कुछ देर तक कोर्ट की कार्यवाही बाधित रही। वहीं इस घटना को लेकर चीफ जस्टिस ने उन्हें ऐसी घटनाओं से फर्क नहीं पड़ता है। मैं उन्हें माफ करता हूं।
सुप्रीम कोर्ट की बेंच में CJI गवई एक बौद्ध और दूसरा जज अगस्टीन मसीह, एक ईसाई, फिर हिंदू भगवान विष्ण
क्या है पूरा मामला?
पूरा मामला खजुराहो के जवारी मंदिर से जुड़ा है। पिछले दिनों चीफ जस्टिस ने इस मंदिर में भगवान विष्णु की मूर्ति स्थापित करने वाली याचिका खारिज कर दी थी। इतना ही नहीं सुनवाई के दौरान चीफ जस्टिस अपने दिए गए बयानों को लेकर सोशल मीडिया पर वायरल हो गए। इसके बाद सोशल मीडिया पर उनका विरोध शुरू हो गया था।
मैं सभी धर्मों का सम्मान करता हूं
सोशल मीडिया पर विरोध होने के बाद चीफ जस्टिस बीआर गवई ने इस मामले में अपना पक्ष रखा था। उन्होंने कहा कि था कि ‘किसी ने मुझे बताया कि मैंने जो टिप्पणियां की थीं, उन्हें सोशल मीडिया पर वायरल किया गया है. मैं सभी धर्मों का सम्मान करता हूं।’
CJI बीआर गवई की माता ने RSS कार्यक्रम का निमंत्रण ठुकराते हुए पत्र लिखा ( फोटो साभार: NagpurToday) महाराष्ट्र के अमरावती जिले में 5 अक्टूबर 2025 को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का एक कार्यक्रम होना है। यह कार्यक्रम विजयादशमी और संघ के 100 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में आयोजित किया जाएगा। भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) बीआर गवई की माँ कमलताई गवई को भी इस कार्यक्रम में आमंत्रित किया गया था।
लेकिन कमलताई गवई ने निमंत्रण ठुकरा दिया है। खुद को ‘आंबेडकरवादी’ बताते हुए हिंदू विरोधी भावनाओं का इजहार भी किया है। संघ के कार्यक्रम में शामिल होने का दावा करने वाली मीडिया रिपोर्टों को खारिज करते हुए कमलताई गवई ने मराठी में एक पत्र लिखा है।
पत्र में खुद को आंबेडकरवादी विचारधारा में ओत-प्रोत और भारतीय संविधान के प्रति प्रतिबद्ध बताया है। उन्होंने लिखा है कि वह किसी भी परिस्थिति में RSS के कार्यक्रम में शामिल नहीं होंगी। साथ ही कहा है कि किसी हिंदू त्यौहार के उपलक्ष्य में आयोजित कार्यक्रम में शामिल होने से ‘सामाजिक चेतना को नुकसान’ होगा।
कमलताई गवई ने पत्र में लिखा है, “महाराष्ट्र के अमरावती स्थित श्रीमती नरसम्मा महाविद्यालय मैदान में 5 अक्टूबर को शाम 6:30 बजे होने वाले RSS के विजयादशमी कार्यक्रम में मेरे शामिल होने के बारे में हाल ही में प्रकाशित खबरें पूरी तरह से झूठी हैं। आंबेडकरवादी विचारधारा से प्रेरित दादा साहेब गवई चैरिटेबल ट्रस्ट की संस्थापक अध्यक्ष और भारतीय संविधान के प्रति अपनी अटूट प्रतिबद्धता के कारण मैं ऐसे किसी कार्यक्रम में शामिल नहीं होऊँगी या उसका समर्थन करूँगी। विश्वास दिलाती हूँ कि मैं किसी भी तरह से सामाजिक चेतना को कोई नुकसान नहीं पहुँचाऊँगी।”
कमलताई गवई ने कहा है कि विजयादशमी का हिंदू संस्कृति में महत्व है। लेकिन उनके जैसे बौद्धों के लिए ‘अशोक विजयादशमी’ या मौर्य सम्राट अशोक द्वारा कलिंग युद्ध के बाद बौद्ध धर्म अपनाने और हिंसा का त्याग करना स्मरणोत्सव है। हालाँकि, यह उल्लेख करना जरूरी है कि इतिहासकारों का एक वर्ग और यहाँ तक कि पुरातात्विक साक्ष्य भी संकेत देते हैं कि अशोक का बौद्ध धर्म में परिवर्तन कलिंग युद्ध से पहले का है।
कमलताई गवई ने मीडिया में आई उन खबरों की कड़ी निंदा की और उन्हें ‘RSS का प्रोपेगेंडा’ बताया। जबकि ज्यादातर रिपोर्ट्स में सिर्फ इतना कहा गया था कि RSS ने भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) की माता को अपने कार्यक्रम में आमंत्रित किया है, न कि उन्होंने उसमें शामिल होने की सहमति दी है।
उन्होंने कहा, “मैं महाराष्ट्र और पूरे भारत के लोगों से अपील करती हूँ कि इस बात पर ध्यान दें। विजयादशमी हिंदू संस्कृति में महत्वपूर्ण है लेकिन हमारे लिए धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस है, जिसे अशोक विजयादशमी भी कहा जाता है, जो कि सबसे ज्यादा मायने रखता है। मैं हाल ही में प्रकाशित खबरों को गलत जानकारी मानती हूँ और लोगों से आग्रह करती हूँ कि ऐसे सामाजिक दृष्टिकोण से भटकाने वाले प्रोपेगेंडा का शिकार न हों। मैं अपने सभी आंबेडकरवादी साथियों से कहती हूँ कि इस बात को समझें और मुझ पर भरोसा रखें। मेरी अनुमति या लिखित सहमति के बिना इस खबर को फैलाना RSS की साजिश है। मैं इस निमंत्रण को स्वीकार नहीं करती।”
कमलताई के दूसरे बेटे ने RSS कार्यक्रम में जाने का किया दावा
हालाँकि, कमलताई की तीखी प्रतिक्रिया के तुरंत बाद उनके दूसरे बेटे ने दावा किया कि वह RSS के कार्यक्रम में शामिल होंगी। रिपब्लिकन पार्टी के नेता और कमलताई के बेटे डॉ. राजेंद्र गवई ने एक वीडियो जारी कर कहा कि कमलताई RSS के कार्यक्रम में जरूर शामिल होंगी और उन्होंने खुद भी निमंत्रण स्वीकार कर लिया है।
दिवंगत पूर्व राज्यपाल आरएस गवई ने दीक्षाभूमि स्थित डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर स्मारक समिति के अध्यक्ष थे और उन्होंने इसके विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। उनके बेटे डॉ. राजेंद्र गवई वर्तमान में स्मारक समिति के सदस्य हैं।
दिलचस्प बात यह है कि कमलताई गवई की शुरुआती प्रतिक्रिया कि वह RSS द्वारा आयोजित किसी भी कार्यक्रम या विजयादशमी जैसे हिंदू त्योहार मनाने वाले किसी भी कार्यक्रम में कभी शामिल नहीं होंगी- क्योंकि वह और उनका परिवार ‘आंबेडकरवादी विचारधारा’ और भारतीय संविधान के प्रति प्रतिबद्ध हैं- मानो भारतीय संविधान बौद्धों या ‘आंबेडकरवादियों’ को RSS के कार्यक्रमों में शामिल होने या हिंदू त्योहार मनाने से रोकता हो।
1981 में RSS कार्यक्रम में शामिल आरएस गवई, साथ में भय्याजी सहस्रबुद्धे, बालासाहेब देवरस और बाबासाहेब पथाडे।
हालाँकि उनके दिवंगत पति रामकृष्ण सूर्यभान गवई, जिन्हें दादासाहेब गवई के नाम से भी जाना जाता है और जो रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया (RPI) के वरिष्ठ नेता थे। वे साल 1981 में नागपुर में आयोजित संघ शिक्षा वर्ग के समापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए थे।
आरएस गवई, बाबासाहेब अंबेडकर के करीबी सहयोगी थे और नागपुर स्थित दीक्षाभूमि स्मारक समिति के अध्यक्ष भी रहे। साल 1998 में वे रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर अमरावती लोकसभा सीट से सांसद चुने गए। इसके बाद 2006 से 2011 तक, जब केंद्र में कॉन्ग्रेस नेतृत्व वाली UPA सरकार थी। उस वक्त वे बिहार, सिक्किम और केरल के राज्यपाल रहे।
साल 2009 में केरल के राज्यपाल रहते हुए आरएस गवई ने मुख्यमंत्री अच्युतानंदन की अगुवाई वाली राज्य कैबिनेट की सिफारिश को दरकिनार कर दिया और CBI को कम्युनिस्ट नेता और वर्तमान में मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के खिलाफ SNC-लावालिन भ्रष्टाचार मामले में मुकदमा चलाने की अनुमति दे दी। उस समय केरल में कॉन्ग्रेस-UDF विपक्ष में थी। वहीं केंद्र की कॉन्ग्रेस नेतृत्व वाली UPA सरकार ने राज्यपाल गवई के इस फैसले का स्वागत किया।
CJI भूषण रामकृष्ण गवई ने खुद बताया कि उनके पिता दादासाहेब गवई कॉन्ग्रेस पार्टी से 40 साल से भी ज्यादा समय तक जुड़े रहे। वे कॉन्ग्रेसस के समर्थन से सांसद और विधायक भी रहे। CJI गवई के भाई राजेंद्र गवई, जो रिपब्लिकन पार्टी के नेता हैं, वे भी कॉन्ग्रेस से जुड़े हुए हैं।
इधर कमलताई गवई के पत्र ने विवाद खड़ा कर दिया। कुछ दिन पहले CJI बीआर गवई ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका की सुनवाई के दौरान भगवान विष्णु पर की गई टिप्पणी से देशभर में नाराजगी फैली। यह मामला 16 सितंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट की उस पीठ के सामने आया, जिसकी अध्यक्षता CJI गवई और न्यायमूर्ति ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह कर रहे थे।
याचिकाकर्ता राकेश दलाल, जो भगवान विष्णु के भक्त हैं, ने अदालत में कहा कि मूर्ति की पुनर्स्थापना सिर्फ पुरातत्व का मामला नहीं है बल्कि यह आस्था, सम्मान और हिंदुओं के अपने देवी-देवताओं की संपूर्ण रूप में पूजा करने के मूल अधिकार से जुड़ा है।
लेकिन CJI गवई ने इस याचिका को खारिज करते हुए हिंदू आस्था को लेकर कुछ अनावश्यक और तंज भरी बातें कह दीं। उन्होंने कहा, “यह सिर्फ पब्लिसिटी के लिए दायर याचिका है। जाओ, अब खुद भगवान से कहो कि कुछ करें। तुम कहते हो कि भगवान विष्णु के कट्टर भक्त हो तो जाओ और प्रार्थना करो।”