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भीमा कोरेगांव केस : नक्‍सलियों के लेटर में मिला दिग्विजय सिंह का मोबाइल नंबर

भीमा कोरेगांव केस : नक्‍सलियों के लेटर में मिला दिग्विजय सिंह का मोबाइल नंबर, पूछताछ संभव देश में नक्‍सलियों की मदद करने और उनके संपर्क में रहने के मामले में कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह का नाम भी सामने आया है. पुणे पुलिस के मुताबिक भीमा कोरेगांव केस की जांच के दौरान दिग्विजय सिंह का मोबाइल नंबर नक्‍सलियों के पास होने की बात सामने आई है. इसके उन्‍हें प्रमाण भी मिले हैं. दिग्विजय सिंह का नक्‍सली कनेक्‍शन सामने आने के बाद अब माना जा रहा है कि पुणे पुलिस उनसे भी भीमा कोरेगांव केस के संबंध में पूछताछ कर सकती है.
नक्‍सलियों के पास से मिले पत्र में दिग्विजय
का नंबर होने की पुलिस ने की पुष्टि.
दरअसल भीमा कोरेगांव केस की जांच कर रही पुणे पुलिस को नक्‍सलियों के पास से जो पत्र मिले थे, उनमें से एक पत्र ऐसा भी था, जिसमें एक मोबाइल नंबर लिखा था. उस नंबर को रखने वाले व्‍यक्ति को नक्सलियों ने अपना दोस्त बताया था. नक्‍सलियों ने जरूरत के समय इस शख्स से मदद लेनी की बात कही थी.
इस बात के सामने आने के बाद मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने इस सबमें कांग्रेस के दिग्गज नेता दिग्विजय सिंह के होने का आरोप लगाया था. अब पुणे पुलिस ने अपनी इंवेस्टिगेशन में इस नंबर को दिग्विजय सिंह के होने की बात को वेरीफाई कर लिया है. ज़ी न्यूज से आधिकारिक रूप से बातचीत में डीसीपी सुहास बावचे ने इस बात की पुष्टि भी की है. 
ज्ञात हो, ये वही दिग्विजय हैं, जिन्होंने मुंबई आतंकवाद हमले के बाद "भगवा आतंकवाद" का शोर मचा रहे थे, और हिन्दू विरोधियों द्वारा लिखित एवं प्रकाशित पुस्तक का विमोचन भी किया था। 
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भीमा कोरेगांव मामले में नजरबंद की गई वामपंथी कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज को पुणे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। इसके ....

हालांकि पुलिस के मुताबिक नंबर वेरिफिकेशन के अलावा भी अभी जांच में बहुत कुछ होना बाकी है. अगर ये आगे बढ़ रही इंवेस्टिगेशन में दिग्विजय सिंह का रोल क्लियर हो जाएगा तो फिर जल्द ही पुणे पुलिस इस मामले में दिग्विजय सिंह से भी पूछताछ ज़रूर करेगी.

भीमा कोरेगांव केस : सुधा भारद्वाज गिरफ्तार

भीमा कोरेगांव मामले में नजरबंद की गई वामपंथी कार्यकर्ता सुधा भारद्वाज को पुणे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। इसके बाद सुधा का मेडिकल करवाया गया और अब पुलिस उन्हें पुणे ले जा रही है। हालांकि, सुधा की गिरफ्तारी का विरोध भी हुआ लेकिन जैसे ही इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में रिव्यू पिटिशन का फैसला आया, तभी पुणे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।
गिरफ्तारी के दौरान उनके घर के बाहर समर्थक भी आए थे, उनका कहना है कि सुधा एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं और उनका इससे यानी भीमा कोरेगांव से कोई लेना-देना नहीं है।
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गौरतलब है कि पुणे की एक विशेष अदालत ने माओवादी कार्यकर्ताओं सुधा भारद्वाज, अरुण फरेरा और वर्नन गोंजाल्विस की जमानत अर्जी ठुकरा दी थी। इसके तुरंत बाद अरुण फरेरा एवं वर्नन गोंजाल्विस को गिरफ्तार कर लिया गया थी। कहा भी जा रहा था कि सुधा भारद्वाज की गिरफ्तारी शनिवार को हो सकती हैं।
पुणे के एलगार परिषद मामले में तीनों नजरबंद थे। पुणे पुलिस ने 28 अगस्त को सुधा, फरेरा और गोंजाल्विस के साथ हैदराबाद से वरवर राव एवं दिल्ली से गौतम नवलखा को गिरफ्तार किया था। बाद में सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर इन्हें उनके घरों में नजरबंद कर दिया गया था।
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सुधा, अरुण और वर्नन की नजरबंदी 26 अक्टूबर को खत्म हो रही है, इसलिए इन्होंने जमानत याचिका दायर की थी। कोर्ट द्वारा तीनों की जमानत याचिका खारिज करने के बाद बचाव पक्ष के वकीलों ने फैसले को हाई कोर्ट में चुनौती देने के लिए एक हफ्ते का समय मांगा। लेकिन जज के समय देने से इन्कार के बाद तीन में से दो माओवादियों को गिरफ्तार कर लिया गया।
पुणे की जिला एवं सत्र अदालत में विशेष जज केडी वदने ने कहा कि सुधा भारद्वाज नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर हैं। फरेरा वकील व काटरूनिस्ट हैं जबकि वर्नन गोंजाल्विस मानवाधिकार कार्यकर्ता हैं। तीनों मानवाधिकारों के लिए काम भी करते हैं। लेकिन समाजसेवा एवं मानवाधिकारों के लिए संघर्ष की आड़ में तीनों प्रतिबंधित संगठन (भाकपा-माओवादी) के लिए भी काम करते रहे हैं। उनकी ये गतिविधियां भारत की एकता, अखंडता और सुरक्षा के लिए खतरा बन रही हैं।
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जांच अधिकारी के इकट्ठा किए गए सबूतों के आधार पर प्रथमदृष्टया यह साबित भी होता है। जज के अनुसार इनकी गतिविधियां, न सिर्फ कानून-व्यवस्था को बिगाड़ सकती हैं, बल्कि देश की एकता-संप्रभुता एवं इसकी लोकतांत्रिक नीतियों के लिए भी खतरा बन सकती हैं।