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कोयंबटूर बम ब्लास्ट : अहमद अली, अब्दुल्ला और शेख दाऊद समेत 4 गिरफ्तार, जिहादी विचारधारा के लिए कर रहे थे भर्ती: प्राचीन मंदिर के सामने उड़ाई थी गाड़ी, NIA ने बताया- अरबी कॉलेज वाला जमील बाशा भी था शामिल

                                   कोयंबटूर कार बम ब्लास्ट की तस्वीर (फोटो साभार : The Hindu)
राष्ट्रीय जाँच एजेंसी (NIA) ने कोयंबटूर कार बम ब्लास्ट में 4 और आरोपितों की गिरफ्तारी कर ली है। गिरफ्तार किए गए आरोपितों के नाम अहमद अली, जवाहर सातिक, राजा अब्दुल्ला उर्फ एमएसी राजा और शेख दाऊद के रूप में हुई है। इस मामले में अब तक कुल 8 गिरफ्तारियाँ हो चुकी हैं।

इन गिरफ्तारियों से एक बड़े आतंकी भर्ती नेटवर्क का पर्दाफाश हुआ है, जिसमें मद्रास अरबी कॉलेज के संस्थापक जमील बाशा का नाम भी शामिल है। NIA का दावा है कि आरोपितों ने तमिलनाडु के युवाओं को भड़काकर आतंकी गतिविधियों के लिए तैयार किया जा रहा था।

बाशा, जिसे पहले ही गिरफ्तार किया जा चुका है, अरबी भाषा की कक्षाओं की आड़ में सलाफी-जिहादी विचारधारा फैला रहा था। उसका मकसद ‘जिहाद के ज़रिए खिलाफत बनाना’ और भारत की लोकतांत्रिक सरकार को हटाकर इस्लामिक शासन लागू करना था।

कोयंबटूर धमाका: क्या है ISIS कनेक्शन?

अक्टूबर 2022 में कोयंबटूर में एक कार में धमाका हुआ था। इसमें जमीशा मुबीन नाम का शख्स मारा गया था। भारत की जाँच एजेंसी NIA का कहना है कि यह धमाका एक आतंकी ग्रुप की लोगों को कट्टरपंथी बनाने की कोशिशों का नतीजा था।

 शुरुआत में लगा था कि मुबीन एक पुराने मंदिर को उड़ाना चाहता था, लेकिन सूत्रों से पता चला है कि उसका असली मकसद शहर के बीच में जाकर ज़्यादा तबाही मचाना था। उसने पुलिस चौकी देखकर मंदिर के सामने गाड़ी रोकी, और फिर गैस लीक होने से धमाका हो गया।

मुबीन की लाश से 7 लोहे की पिन मिली थीं। उसके घर की तलाशी और उसके शरीर पर लिखी बातों से साफ हुआ कि वह इस्लामिक स्टेट (ISIS) नाम के आतंकी संगठन की सोच से जुड़ा था। वह लोगों को ‘मुस्लिम’ या ‘काफ़िर’ (गैर-मुस्लिम) में बाँटकर ‘जिहाद’ (धर्म युद्ध) की बात करता था।

जाँच और आगे की कार्रवाई

NIA (राष्ट्रीय जाँच एजेंसी) ने 30 अक्टूबर 2022 को इस धमाके की जाँच शुरू की थी। शुरुआत में इस मामले में पहले भी कुछ लोगों को गिरफ्तार किया गया था, जिनके नाम मुहम्मद तालका, मोहम्मद अजहरुद्दीन, मोहम्मद रियाज, फिरोज इस्माइल और मोहम्मद नवाज इस्माइल थे।

NIA का मानना है कि यह सब भारत के खिलाफ आतंकी सोच फैलाने की साजिश है और वे इसकी पूरी गहराई से जाँच कर रहे हैं। उनका मकसद है कि तमिलनाडु पुलिस और बाकी खुफिया एजेंसियों के साथ मिलकर इस आतंकी ग्रुप को पूरी तरह से खत्म किया जाए। NIA ने यह भी बताया है कि अभी और गिरफ्तारियाँ हो सकती हैं।

दक्षिण भारत में आतंकी गतिविधियाँ

पिछले कुछ सालों से भारत की जाँच एजेंसी NIA साउथ इंडिया के कई राज्यों में आतंकवाद से जुड़े मामलों की जाँच कर रही है।

  • जनवरी 2023: केरल के कोल्लम से PFI (एक प्रतिबंधित संगठन) का एक रिपोर्टर मोहम्मद सादिक पकड़ा गया। यह शख्स गैर-मुस्लिमों (जिन्हें वे ‘काफिर’ कहते हैं) की जानकारी इकट्ठा करता था।
  • दिसंबर 2022: केरल से PFI का वकील मोहम्मद मुबारक गिरफ्तार हुआ। यह चरमपंथियों को गला काटने जैसी खतरनाक ट्रेनिंग दे रहा था।
  • जुलाई 2019: तमिलनाडु में वाहदत-ए-इस्लामी हिंद नाम के एक कट्टरपंथी संगठन का पर्दाफाश हुआ और इसके 14 संदिग्धों को गिरफ्तार किया गया। इस संगठन का मकसद भारत को एक इस्लामिक देश बनाना था। ये सभी घटनाएँ बताती हैं कि दक्षिण भारत में कट्टरपंथी सोच को फैलाने और युवाओं को आतंकी कामों में शामिल करने की लगातार कोशिशें हो रही हैं।

क्या आतंकी मुस्लिम तुष्टिकरण करने वालों के सरपरस्त होते हैं? जिसने मार डाला 58 भारतीय लोगों को… उस आंतकी के जनाजे में शामिल मुस्लिम भीड़ के साथ कई विधायक-नेता-एक्टर: अनहोनी से बचने के लिए तैनात रहे 2000+ पुलिसकर्मी

                  आतंकी एस ए बाशा को अंतिम विदाई (फोटो साभार: X_MeghUpdates/newstaglive)
एस ए बाशा के जनाजे में हज़ारों मुस्लिमों के साथ-साथ नेताओं और एक्टरों के शामिल होने ने फिर साबित कर दिया कि आतंकवाद का मजहब होता है। लाख टीवी चौपालों में बैठ कट्टरपंथी कहे कि 'आतंकवाद का कोई मजहब नहीं होता', कोई एंकर यह पूछने की हिम्मत नहीं करता कि अगर आतंकवाद का कोई फिर किसी भी आतंकी के जनाजे में ये जमावड़ा करने वाले कौन? आखिर कब तक इस दोगलेपन से जनता को गुमराह किया जाता रहेगा? क्या कोई भी आतंकवादी मुस्लिम तुष्टिकरण करने वालों का आका होता हैं?        

साल 1998 में कोयंबटूर में सीरियल ब्लास्ट हुए थे। इन धमाकों में 58 लोगों की जान चली गई थी, तो 231 लोग घायल हो गए थे। इन धमाकों के पीछे अल-उम्मा नाम के कट्टरपंथी संगठन का नाम आया था, जिसे बैन कर दिया गया। इसी संगठन का मुखिया था एस ए बाशा, जो उन सीरियल ब्लास्ट के मुख्य कर्ता-धर्ताओं में से एक था। उसे उम्रकैद की सजा मिली थी। एसए बाशा दुर्दांत आतंकियों में था, जिसने 2003 में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को भी जान से मारने की धमकी थी। एसए बाशा की सोमनार (16 दिसंबर 2024) को अस्पताल में मौत हो गई थी, और अगले दिन (17 दिसंबर 2024) उसे दफनाया गया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, एस ए बाशा नाम के आतंकी को अंतिम विदाई देने के लिए हजारों लोग पहुँचे। उसे किसी ‘हीरो’ की तरह विदाई दी गई, जबकि उसने तमिलनाडु को कई बार आतंकी हमलों का दर्द दिया। उसकी आखिरी विदाई के लिए पूरे कोयंबटूर में 2000 पुलिसवालों और 200 आरएएफ जवानों की तैनाती की गई। इतनी भारी सुरक्षा में उसका विदाई जुलूस निकाला गया और किसी ‘शहीद’ जैसी विदाई दी गई।

आतंकी एसए बाशा की अंतिम यात्रा पर वरिष्ठ पत्रकार राहुल शिवशंकर ने ट्वीट किया। उन्होंने लिखा, “कोयंबटूर, तमिलनाडु में इस्लामी आतंकी एस.ए. बाशा की शवयात्रा निकाली जा रही है। ये वही आतंकी है जो 1998 कोयंबटूर धमाकों का मास्टरमाइंड था, जिसमें 58 भारतीयों की जान गई थी। ये पाकिस्तान या बांग्लादेश में नहीं, बल्कि भारत में हो रहा है। न कोई ‘शांतिप्रिय’ इसे लेकर आवाज उठा रहा है, न ‘धर्मनिरपेक्षता’ का झंडा लहराने वाले कुछ कह रहे हैं। ‘संवैधानिकता’ के ठेकेदार तो संविधान के नाम पर अपनी राजनीति में व्यस्त हैं!”

हैरानी की बात नहीं है कि इस्लामिक कट्टरपंथी धड़ों, राजनीतिक पार्टियों के नेता उसकी अंतिम यात्रा में पहुँचे। यही नहीं, खुद को तमिलियन नेशनल कहने वाली पार्टी के सबसे बड़े नेता सीमान ने तो यहाँ तक कह दिया कि डीएमके सरकार को एसए बाशा को पहले ही रिहा कर देना था, जोकि डीएमके सरकार के हाथ में था। ऐसा न करने के लिए डीएमके सरकार की आलोचना भी की गई।

हालाँकि बाशा को पैरोल देकर अस्पताल में रखने वाले इन्हीं मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के पिता करुणानिधि जब मुख्यमंत्री थे, तब बाशा के साथी आतंकवादी को जेल में मालिक तक की सुविधा दी जाती थी। आईए, अब बताते हैं कि कौन से बड़े नेता इस आतंकवादी की आखिरी यात्रा में पहुँचे, जो उसके दक्षिण उक्कड़म स्थित रोज गार्डन वाले घर से शुरू होकर फ्लावर मार्केट स्थित हैदर अली टीपू सुल्तान सुन्नथ जमात मस्जिद तक गई।

1- एनटीके नेता सीमान- सीमान तमिल एक्टर हैं और नाम तमिलार काची नाम की राजनीतिक पार्टी चलाते हैं। वो तमिल पहचान, भाषा, स्वायत्तता की बात करते हैं। तमिल ईलम जैसे बैन आउटफिट के समर्थक भी हैं। उन्होंने डीएमके सरकार को ये कहते हुए बयान दिया है कि आतंकवादी एसए बाशा को पहले ही डीएमके सरकार जेल से निकाल सकती थी।

2- कोंगु इलैगनार पेरावई पार्टी के अध्यक्ष यू थानियारसु। इनकी पार्टी तमिलनाडु के अंदर भी क्षेत्रीय पार्टी है और AIADMK-DMK के बीच झूलती रहती है। थानियारसु AIADMK के टिकट पर 2 बार विधायक भी रहे हैं।

3- वीसीके के उप महासचिव वन्नी अरासु: VCK यानी विदुथलाई चिरुथैगल काची, इस पार्टी को दलित पैंथर्स पार्टी या दलित पैंथर्स इयक्कम यानी आंदोलन भी कहा जाता है। कहने को ये पार्टी दलित और तमिल राष्ट्रवाद की बात कहती है, लेकिन पार्टी के उप महासचिव वन्नी अरासु आतंकवादी को अंतिम विदाई देने पहुँचे।

4- मणिथानेया मक्कल काची के महासचिव और मन्नापरई विधायक पी अब्दुल समद: स्थानीय विधायक पी अब्दुल समद, एसए बाशा का करीबी रहा है। अल-उम्मा के बैन होने के बाद इसके जुड़े सदस्यों ने कट्टरपंथी संगठन की जगह एमकेके नाम से इस्लामी पार्टी बनाई। ये पार्टी AIADMK के बाद DMK के साथ गठबंधन में है और इस पार्टी के 2 विधायक हैं।

इस पार्टी का अध्यक्ष एम एच जवाहिरुद्दीन है। जवाहरुद्दीन सिमी का सदस्य भी रहा है और एसए बाशा का बेहद करीबी भी। वो राज्य में 25 से ज्यादा इस्लामिक ट्रस्ट, सोसायटी चलाता है और मजहबी दान के नाम पर एंबुलेस सेवा भी देता है।

अवलोकन करें:-

जिस आतंकी ने कहा था ‘मोदी को मार देंगे’, मर गया अस्पताल के बेड पर : कोयंबटूर सीरियल ब्लास्ट का दोष
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इन नेताओं के अलावा कई छोटे-बड़े छुटभैय्ये नेता भी एसए बाशा जैसे दोषी पाए गए और उम्रकैद की सजा काट रहे आतंकवादी को आखिरी विदाई देने पहुँचे। खास बात ये है कि तमिलनाडु में इस्लामिक आतंकवाद को बढ़ाने वालों में से एक रहे बाशा की आखिरी यात्रा निकालने की योजना का बीजेपी ने विरोध किया था, लेकिन डीएमके सरकार ने आतंकवादी की न सिर्फ शान से विदाई यात्रा निकाली, बल्कि ‘हीरो’ की तरह विदाई देने जनाजे में उमड़ी भीड़ को मैनेज करने के लिए 2000-2200 जवानों की सेवाएँ भी उपलब्ध कराई।