Showing posts with label #Dhar. Show all posts
Showing posts with label #Dhar. Show all posts

क्या इस्लाम मूर्तियों के आगे नमाज पढ़ने की इजाजत देता है? मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने धार भोजशाला को वाग्देवी मंदिर माना


विश्व में भारत एक ऐसा अनोखा देश है जहाँ हिन्दुओं को अपने धार्मिक स्थलों को वापस लेने के लिए अदालतों के चक्कर काटने पड़ते हैं। कांग्रेस ने अपने कार्यकाल में मुस्लिम तुष्टिकरण करते हर हिन्दू धार्मिक स्थल को विवादित बना मुसलमानों को पागल बना वोट लेता रहा और मुसलमान हिन्दुओं को इस्लाम का दुश्मन समझता रहा।

कल(मई 15) को एक राष्ट्रीय चैनल पर चर्चा के दौरान एक इस्लामिक विद्वान ने कहा कि अगर मुसलमान एक दिन नमाज पढ़ ले तो गंगा-जमुनी तहजीब की एक अच्छी मिसाल होगी। चर्चा में भाग ले रहे एक सहयोगी ने कहा बहुत अच्छी बात है फिर तो हिन्दुओं को भी मस्जिद में हनुमान चालीसा पढ़ने की इजाजत होनी चाहिए। इतना ही नहीं, मुसलमानों को किस तरह पागल बनाया जाता है और वह भी गुलामों की तरह कट्टरपंथी मौलानाओं की बात मान हिन्दुओं को अपना दुश्मन समझने लगता है। जब इस्लाम में मूर्ति पूजा हराम है फिर भोजशाला में स्तम्भों और दीवारों पर बनी मूर्तियों के आगे नमाज कैसे पढ़ी जा सकती है? ठीक यही स्थिति रामजन्मभूमि मन्दिर की थी।     

     

राम अगर काल्पनिक थे फिर लीला स्थलों पर कांग्रेसी क्यों जाते थे?  

अयोध्या में रामजन्मभूमि मन्दिर मुद्दा इसलिए उलझा रहा कि कांग्रेस साक्ष्यों को छिपाती रही। और मुसलमानों के बीच हिन्दू स्वयंसेवी संस्थाओं को बदनाम करने का काम करती रही। रामसेतु और राम को काल्पनिक बताना, लेकिन हिन्दुओं को पागल बनाने दशहरे पर रामलीला मंचो पर माल बटोरने पहुंचना। अगर राम काल्पनिक थे फिर राम मंचन स्थलों पर क्यों जाते थे?  
भारत की महान सभ्यता केवल पुस्तकों में दर्ज कथाओं तक सीमित नहीं, बल्कि वह धरती की परतों में भी सांस लेती है। जब पुरातत्वविद जमीन की गहराइयों में उतरते हैं, तो वे केवल ईंट-पत्थर नहीं खोजते, बल्कि इतिहास की धड़कन को सुनते हैं। हाल के वर्षों में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और राज्य स्तरीय पुरातत्व विभागों द्वारा की गई खुदाइयों ने यह संकेत दिया है कि भारतीय सांस्कृतिक परंपराएं अत्यंत प्राचीन और सतत रही हैं। यह निरंतरता ही सनातन संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है। एएसआई की खोज और तथ्यों के आधार पर अब मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने धार की भोजशाला को वाग्देवी मंदिर माना है। शुक्रवार को दिए फैसले में हाईकोर्ट ने कहा, हमने पुरातात्विक और ऐतिहासिक तथ्यों, एएसआई की सर्वे रिपोर्ट पर विचार किया है। ASI एक्ट के प्रावधानों के साथ-साथ अयोध्या मामले को भी आधार माना है। ऐतिहासिक और संरक्षित जगह देवी सरस्वती का मंदिर है। केंद्र सरकार और ASI यह फैसला लें कि भोजशाला मंदिर का मैनेजमेंट कैसा रहेगा।

पुरातात्विक-ऐतिहासिक तथ्य और अयोध्या केस को भी आधार माना

न्यूज वेबसाइट बार एंड बेंच के मुताबिक, हाईकोर्ट ने कहा कि भोजशाला में सरस्वती मंदिर और संस्कृत शिक्षा केंद्र के साक्ष्य पाए गए हैं। कोर्ट ने पुरातात्विक और ऐतिहासिक तथ्यों, एएसआई सर्वे के साथ अयोध्या केस को भी आधार माना। कोर्ट ने कहा- हर सरकार की जिम्मेदारी है कि वह ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व वाले प्राचीन स्मारकों और मंदिरों की सुरक्षा निश्चित करे। साथ ही गर्भगृह और धार्मिक आस्था से जुड़ी देव प्रतिमाओं का भी संरक्षण करे। अदालत ने ASI का 2003 का वह आदेश भी रद्द कर दिया, जिसमें ASI ने भोजशाला में हिंदुओं को पूजा का अधिकार नहीं दिया था। उस आदेश को भी खारिज कर दिया, जिसमें मुस्लिमों को नमाज पढ़ने का अधिकार दिया गया था।

 मुस्लिम पक्ष फैसले की समीक्षा के बाद सुप्रीम कोर्ट जाएगा

हाई कोर्ट ने भोजशाला को कमाल मौला मस्जिद बताने वाले मुस्लिम पक्ष को सरकार से मस्जिद के लिए अलग जमीन मांगने को कहा है। धार शहर काजी वकार सादिक ने कहा कि उन्हें हाईकोर्ट के फैसले का सम्मान है। उन्होंने कहा कि वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद और शोभा मेनन ने कोर्ट में अपना पक्ष रखा था। अब फैसले की समीक्षा की जाएगी, इसके बाद मुस्लिम पक्ष सुप्रीम कोर्ट जाएगा। वहीं जैन समाज की ओर से पैरवी कर रहीं एडवोकेट प्रीति जैन ने कहा कि सुनवाई के दौरान यह दावा किया गया था कि तीर्थंकरों की मूर्तियों के अवशेष आज भी ब्रिटिश म्यूजियम में मौजूद हैं और उन्हें उचित स्थान मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे को लेकर जैन समाज भी सुप्रीम कोर्ट जाएगा।
हिंदू पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दायर की, हमको भी सुनें
हाईकोर्ट के फैसले के बाद फिलहाल भोजशाला के मुख्य गेट पर बैरिकेड्स लगाकर परिसर को बंद कर दिया गया है। मौके पर बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात है। भोजशाला विवाद मामले में हिंदू पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दायर की है। याचिकाकर्ता जितेंद्र सिंह विशेन की ओर से अधिवक्ता बरुण कुमार सिन्हा ने कैविएट दाखिल की। इसमें कहा गया है कि हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर किसी भी अपील पर हिंदू पक्ष को सुने बिना कोई आदेश पारित न किया जाए।

भोजशाला: 2100 पन्नों की रिपोर्ट में 500 से अधिक तस्वीरें

इससे पहले भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की खुदाई में मध्यप्रदेश में ऐसे प्रमाण मिले हैं, जिनसे साबित होता है कि हमारी हिंदू संस्कृति कितनी सदियों पुरानी है। एएसआई को भोजशाला मस्जिद में हिंदू प्रतीक चिन्ह मिले हैं, जिनसे संकेत मिलता है कि हिंदू धार्मिक स्थल को तोड़कर मस्जिद का निर्माण हुआ है।  मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक भोजशाला को लेकर एएसआई की विस्तृत रिपोर्ट ने महत्वपूर्ण संकेत दिए हैं। एएसआई ने 2100 पन्नों की रिपोर्ट को 500 से अधिक तस्वीरों और वैज्ञानिक परीक्षणों के आधार पर तैयार किया है। रिपोर्ट में उल्लेख है कि भोजशाला का निर्माण 12वीं शताब्दी में हुआ, जबकि परिसर में स्थित मस्जिद का निर्माण 1265 ईस्वी के आसपास का बताया गया है। इस अंतर को यूं समझ सकते हैं कि 1265 ईस्वी एक विशिष्ट वर्ष है जो 13वीं शताब्दी (1201-1300) का हिस्सा है, जबकि 12वीं शताब्दी 1101-1200 ईस्वी के बीच की अवधि है। यानि 1265 से लगभग 65 से 165 साल पहले की अवधि है। 1265 ईस्वी में सुल्तान बलबन का शासन था, जबकि 12वीं सदी में दिल्ली सल्तनत से पहले राजपूत राजाओं का शासन था। यह तथ्य ऐतिहासिक क्रम को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इससे यह भी साफ संकेत मिलता था कि पहले भोजशाला बनी और उसके बाद मस्जिद का निर्माण हुआ।

मध्यप्रदेश के धार में भोजशाला की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भोजशाला मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित एक प्राचीन स्थल है, जिसे परमार शासक राजा भोज (11वीं शताब्दी) से जुड़ा है। ऐतिहासिक अभिलेखों और शिलालेखों के आधार पर यह साबित होता है कि यह एक प्राचीन शैक्षिक-धार्मिक केंद्र रहा है, जहां पर विद्यादायिना मां सरस्वती की उपासना और अध्ययन परंपरा रही है। भोजशाला स्थल पर संस्कृत शिलालेख, स्थापत्य अवशेष और विद्या-परंपरा से जुड़े संकेतों का प्रमाणित उल्लेख मिलता है। दरअसल, भोजशाला पर विवाद इसी परिसर में कमाल मौला मस्जिद के अस्तित्व के बाद सामने आया। हिंदुओं के कई अन्य धार्मिक स्थलों की तरह यहां भी तोड़ो और कब्जा करो की नीति अपनाई गई। इससे यह साफ हो गया कि यह स्थल मूलतः मां सरस्वती का मंदिर/विद्या-केंद्र था, जिस पर बाद में मस्जिद बनी। इसी दावे-प्रतिदावे के कारण पूजा और नमाज दोनों को लेकर विवाद खड़ा हुआ।

कांग्रेस सरकारों के समय इस विवाद को और हवा मिली
कांग्रेस सरकारों के समय इस विवाद को और हवा मिली। क्योंकि लंबे समय तक प्रशासन ने इस हिंदू स्थल पर भी दिन-विशेष की व्यवस्था लागू कर दी। कुछ दिनों में हिंदू पूजा और कुछ में तुष्टिकरण के लिए मुस्लिम नमाज की अनुमति प्रदान कर दी गई। यह व्यवस्था अस्थायी थी, पर मूल प्रश्न कि स्थल की ऐतिहासिक पहचान तो अनसुलझा रहा। इसके लिए मामला न्यायालयों तक पहुंचा। हाल के वर्षों में अदालतों ने पुरातात्त्विक सर्वेक्षण और साक्ष्यों के आधार पर तथ्य-जांच पर जोर दिया है। कुछ अवसरों पर विशेष तिथियों/समयों में पूजा की अनुमति संबंधी आदेश भी सामने आए हैं। अंतिम निर्णय अभी न्यायिक प्रक्रिया के अधीन है। अब सुप्रीम कोर्ट ने बसंत पंचमी के दिन धार में भोजशाला में सूर्योदय से सूर्यास्त तक हिंदुओं को प्रार्थना करने की अनुमति दी है। सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा, हम दोनों पक्षों से अपील करते हैं कि वे आपसी सम्मान और सहयोग बरकरार रखें। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य और जिला प्रशासन को कानून व्यवस्था बनाए रखने की हिदायत दी।

मंदिर स्थापत्य के संकेत, विज्ञान-तकनीक से इतिहास की पड़ताल
एएसआई के सर्वेक्षण में स्तंभों पर कमल आकृतियां, देवी-देवताओं की मूर्तियां, संस्कृत शिलालेख और मंदिर शैली की वास्तुकला के संकेत पाए गए। इन प्रतीकों को सनातन परंपरा से जोड़ा जाता है। वास्तुशिल्पीय विश्लेषण यह दर्शाता है कि संरचना में प्रयुक्त शैली उस कालखंड के मंदिर निर्माण की परंपराओं से मेल खाती है। हालांकि यह विषय न्यायालय में विचाराधीन है, लेकिन पुरातात्विक दृष्टि से यह अध्ययन सांस्कृतिक इतिहास को समझने में महत्वपूर्ण कड़ी बन गया है। एएसआई ने ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग कर भूमिगत संरचनाओं का परीक्षण किया। खुदाई के दौरान दीवारों की संरचना, स्तंभों और शिलालेखों का गहन अध्ययन किया गया। यह दर्शाता है कि इतिहास की खोज अब केवल अनुमान पर आधारित नहीं, बल्कि वैज्ञानिक पद्धति पर टिकी है। सनातन संस्कृति की प्राचीनता को समझने के लिए यह पद्धति निर्णायक सिद्ध हो रही है।

मंदिर के हिस्सों में बनाई मस्जिद, सनानत धर्म से जुड़े प्रतीक मिले
भोजशाला विवाद को लेकर रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पुराने मंदिर के हिस्सों का इस्तेमाल करके मस्जिद बनाई गई है। भोजशाला को हिंदू समुदाय वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इस स्मारक को कमाल मौला मस्जिद बताता है। यह परिसर एएसआई द्वारा संरक्षित है। सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, भोजशाला परिसर में सिक्कों, सनातन धर्म से जुड़े प्रतीक चिन्हों और देवी-देवताओं की मूर्तियों का विवरण दिया गया है। मंदिर शैली की वास्तुकला के संकेत मिले हैं। कई स्तंभों पर नक्काशी, कमल आकृतियां और शिल्प अवशेष पाए गए। संस्कृत भाषा के शिलालेख भी दर्ज किए गए हैं। यह 12वीं से 16वीं शताब्दी के बीच के बताए जा रहे हैं

सनातन संस्कृति यानि अनादि और अनंत शक्ति की निरंतरता
इन खोजों का साझा सूत्र निरंतरता है। चाहे मंदिर स्थापत्य हो, शिलालेख हों, मूर्तियां हों या नगर नियोजन, सदियों से एक सांस्कृतिक धारा प्रवाहित होती दिखती है। सनातन शब्द का अर्थ ही है, जो अनादि और अनंत है। पुरातात्विक प्रमाण इस सांस्कृतिक निरंतरता को ठोस आधार प्रदान करते हैं। सनातन संस्कृति की महत्ता को समझने के लिए अब तथ्यपरकत खोज हो रही है। भारत की सनातन संस्कृति केवल इतिहास का विषय नहीं, बल्कि वर्तमान की जीवंत धरोहर है। राजस्थान से मध्य प्रदेश तक फैले पुरातात्विक प्रमाण यह संकेत देते हैं कि यह परंपरा सदियों से विकसित होती रही है। मंदिर स्थापत्य, नदी किनारे बसे नगर, शिलालेख और मूर्तियां, ये सब उस सांस्कृतिक यात्रा के साक्षी हैं जो आज भी जारी है। इन खोजों का महत्व केवल अतीत तक सीमित नहीं है। वे हमें यह स्मरण कराते हैं कि हमारी सांस्कृतिक जड़ें कितनी गहरी हैं। जब नई पीढ़ी इन साक्ष्यों को देखती है, तो उसे अपनी पहचान पर गर्व का अनुभव होता है। इतिहास की हर खुदाई हमें यही बताती है कि यह सभ्यता क्षणिक नहीं, बल्कि कालजयी है। सनातन संस्कृति की यही सबसे बड़ी शक्ति है कि वह समय के प्रवाह में भी अपनी पहचान बनाए रखती है, और हर युग में नए प्रमाणों के साथ स्वयं को पुनः स्थापित करती है।

अजमेर में मोइनुद्दीन चिश्ती दरगाह विवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
अजमेर स्थित ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के बारे में भी कहा जाता है कि इस स्थल पर पहले प्राचीन शिव मंदिर था। दावा करने वाले पक्ष स्थापत्य संकेतों, ऐतिहासिक उल्लेखों और स्थानीय परंपराओं के पुख्ता प्रमाण देते हैं। उनका कहना है कि स्थल की मूल धार्मिक पहचान की जांच होनी चाहिए। दूसरी ओर, दरगाह से जुड़े पक्ष दरगाह की ऐतिहासिक-धार्मिक निरंतरता पर जोर देते हैं। यह मामला भी अदालतों के समक्ष है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका स्वीकार किए जाने का अर्थ यह है कि शीर्ष अदालत ने तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर सुनवाई के लिए दरवाजा खोल दिया है। आगे की प्रक्रिया में दस्तावेज, ऐतिहासिक प्रमाण और विधिक तर्कों की जांच होगी। भोजशाला हो या अजमेर की दरगार दोनों विवादों में मूल प्रश्न स्थल की ऐतिहासिक पहचान और पूजा/आस्था के अधिकार से जुड़ा है। दोनों ही मामलों में अंतिम फैसला अदालतों को करना है। भोजशाला में प्रशासनिक स्तर पर लंबे समय से दिन-विशेष की व्यवस्था रही, वहीं अजमेर में विवाद अपेक्षाकृत न्यायिक सुनवाई के शुरुआती चरणों में है।

पहले जिनको विवादास्पद कह दबाया, वे अब खुलकर विमर्श में आए
दरअसल, भारत की सभ्यता केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि स्मृति की निरंतर धारा है। इस स्मृति में मंदिर हैं, तीर्थ हैं, शिलालेख हैं और वे कथाएं हैं, जिनमें आस्था, दर्शन और संस्कृति एक साथ बहती रही है। लेकिन इस सांस्कृतिक निरंतरता को इतिहास के कुछ दौरों में योजनाबद्ध रूप से तोड़ा गया। सनातन परंपरा के अनेक धार्मिक स्थलों पर हमले हुए, संरचनाएं ध्वस्त की गईं और पूजा स्थलों के ऊपर नई धार्मिक इमारतें खड़ी कर दी गईं। यह केवल स्थापत्य परिवर्तन नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक वर्चस्व का प्रयास था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनने के बाद हिंदू समाज के भीतर एक नया आत्मबोध उभरा। दशकों तक जिन विषयों को “विवादास्पद” कहकर दबाया गया, वे अब खुलकर विमर्श के केंद्र में आ गए हैं। अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण इस परिवर्तन का प्रतीक बन गया। 22 जनवरी को प्राण-प्रतिष्ठा के दो वर्ष पूरे होना केवल एक धार्मिक अवसर नहीं, बल्कि यह संकेत है कि भारत अब अपनी सांस्कृतिक स्मृति से मुंह नहीं मोड़ेगा।

98 दिन ASI ने किया सर्वे, 2000 पन्नों की रिपोर्ट हाई कोर्ट में पेश: भोजशाला में ब्रह्मा-गणेश-नरसिंह-भैरव सबकी प्रतिमाएँ मिलीं

                      भोजशाला को लेकर कोर्ट में मामला चल रहा है (चित्र साभार: India Tv News)
मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) की सर्वे रिपोर्ट को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में जमा कर दिया गया है। इस रिपोर्ट में सर्वे में मिली सभी संरचनाओं की जानकारी दी गई है। रिपोर्ट में सर्वे के दौरान मिली मूर्तियों, सिक्कों और चिन्हों के विषय में जानकारी दी गई है।

आजतक की एक रिपोर्ट के अनुसार, इस सर्वे के दौरान चाँदी, तांबे, एल्युमिनियम और स्टील के 31 सिक्के पाए गए हैं। यह सिक्के अलग-अलग ऐतिहासिक समय के हैं। इसमें दिल्ली के सल्तनत काल, मुग़ल काल और अलग-अलग समय के हैं। सिक्कों के अलावा 94 वास्तुशिल्प मिले हैं। इनमें मूर्तियाँ, मूर्तियों के खंडित हिस्से और पत्थरों पर उकेरी प्रतिमाएँ शामिल हैं।

इस सर्वे में यह भी पाया गया है कि यहाँ के स्तम्भों पर मूर्तियाँ उकेरी गई थी। इन पर बने हुए देवता सशस्त्र थे। बताया गया कि इन छवियों में ब्रम्हा, गणेश, नरसिंह और भैरव के साथ ही पशुओं की आकृतियाँ भी हैं। इनमें कुछ मानव आकृतियाँ भी हैं।

इसके अलावा इस परिसर के एक हिस्से में भित्तिचित्रों में मानव औए सिंह समेत कई पशुओं के मुख वाली आकृतियाँ भी हैं। एक हिस्से में यह विकृत की गई थीं जबकि कुछ जगह यह सुरक्षित थीं। यहाँ कई शिलालेख भी मिले हैं। इनमें कई रचनाएँ लिखी हुई हैं। इन रचनाओं से भोजशाला के रूप में जानकारी मिलती है।

सर्वे में मिले एक शिलालेख में यहाँ परमार वंश के राजा नरवर्मन का शासन था। इससे इंगित होता है कि यहाँ मुस्लिमों के शान करने से पहले हिन्दू शासक शासन कर रहे थे। रिपोर्ट में यहाँ से मिले अन्य कई शिलालेख और चिन्ह को रिपोर्ट में जगह दी गई है। यह रिपोर्ट 2000 पेज की है।

इस मामले में हिन्दू पक्ष के याचिकाकर्ता आशीष गोयल ने ऑपइंडिया को बताया, “हिन्दू पक्ष की याचिका पर हाई कोर्ट ने यहाँ सर्वे का आदेश ASI को दिया था। यहाँ 98 दिन तक सर्वे चला। इस सर्वे में 1700 से अधिक अवशेष मिले हैं। इनमें 39 से अधिक मूर्तियाँ और प्रतिमाएँ हैं। इनमें गदा, पद्म, कमल और स्तम्भ के टुकड़े हैं। अब इस विषय में 22 जुलाई, 2024 को कोर्ट में सुनवाई है। हम इस मामले में कोर्ट से रिपोर्ट सार्वजनिक करने की अपील करेंगे।”

इस संबंध में हिंदू पक्ष ने याचिका डाली हुई है कि भोजशाला उनकी माँ वाग्देवी का मंदिर है। वहीं मुस्लिम पक्ष इसे अपना मजहबी स्थल बताकर सर्वे के खिलाफ बोल रहे हैं। इस मामले में 11 मार्च को इंदौर हाईकोर्ट ने सुनवाई के बाद सर्वे की अनमुति दी थी। 22 मार्च से सर्वे शुरू हुआ, 1 अप्रैल को मुस्लिम पक्ष इसे रोकने सुप्रीम कोर्ट पहुँचा, 29 अप्रैल को एएसआई के आवेदन पर सर्वे की समयसीमा और बढ़ाई गई, अब इस मामले में ASI ने अपनी रिपोर्ट कोर्ट को सौंप दी है।

वाग्देवी मंदिर कैसे बना कमालुद्दीन मस्जिद

गौरतलब है कि भोजशाला विवाद बहुत पुराना विवाद है। हिंदू पक्ष का मत है कि ये माता सरस्वती का मंदिर है जिसकी स्थापना राजा भोज ने सन् 1000-1055 के मध्य कराई थी। सदियों पहले मुसलमान आक्रांताओं ने इसकी पवित्रता भंग करते हुए यहाँ मौलाना कमालुद्दीन (जिस पर तमाम हिंदुओं को छल-कपट से मुस्लिम बनाने के आरोप हैं) की मजार बना दी थी जिसके बाद यहाँ मुस्लिमों का आना जाना शुरू हो गया और अब इसे नमाज के लिए प्रयोग में लाया जाता है। हालाँकि हिंदू पक्ष का कहना है कि ये उनका मंदिर ही है क्योंकि आज भी इसके खंभों पर देवी-देवताओं के चित्र और संस्कृत में श्लोक लिखे साफ दिखते हैं। इसके अलावा दीवारों पर ऐसी नक्काशी है जिसमें भगवान विष्णु के कूर्मावतार के बारे में दो श्लोक हैं।

मध्य प्रदेश : भोजशाला में ASI सर्वे में मिला पाषाण अवशेष, भगवान सूर्य के आठों पहर के बने हैं चिन्ह; माँ सरस्वती का है मंदिर : मजार बना मुस्लिम पढ़ने लगे थे नमाज

                भोजशाला में ASI मार्च, 2024 से सर्वे कर रहा है (चित्र साभार: Bhaskar)
मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला में चल रहे भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) सर्वे में पाषाण अवशेष मिले हैं। ASI सर्वे के 65वें दिन यह अवशेष टीम को मिले हैं। भोजशाला में चल रहे इस सर्वे के बीच मुस्लिमों ने एक बार फिर हाई कोर्ट के निर्णय के बाद भी विरोध किया है।

मीडिया रिपोर्ट्स में बताया गया है कि भोजशाला में चल रहे सर्वे में एक पाषाण अवशेष मिला है, जिसमें सूर्य के आठों पहर के चिन्ह बने होने की बात कही गई है। यह 1×3.5 वर्ग फीट आकार का है। हिन्दू पक्ष का कहना है कि इस अवशेष पर मिले चिन्ह भोजशाला के खम्भों पर मिले चिन्हों से मिलते हैं। इससे पहले यहाँ सर्वे में स्तम्भ भी मिला था।

भोजशाला में सर्वे के लिए अब जमीन के नीचे क्या है, इसका पता लगाने के लिए ग्राउंड पेनेट्रेटिंग राडार का इस्तेमाल किया जा रहा है। इसे हैदराबाद से लाया गया है। इसके जरिए मंदिर को अलग अलग ब्लॉक्स में बाँट कर सर्वे किया जा रहा है।

जहाँ एक ओर सर्वे आगे बढ़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ मुस्लिम समाज हाई कोर्ट के आदेश के बावजूद इसका विरोध कर रहा है। मुस्लिमों ने ASI सर्वे का विरोध काली पट्टी बाँध कर किया। उन्होंने नमाज पढ़ने के दौरान काली पट्टी बाँधी। उन्होंने आरोप लगाया कि ASI यहाँ खुदाई कर रही है, जिसकी अनुमति नहीं है।

वहीं हिन्दू पक्ष का कहना है कि कोर्ट के आदेश में केवल यह कहा गया है कि संरचना में कोई बदलाव ना हो, ऐसे सर्वे किया जाए। ASI सर्वे के लिए कोई भी तरीका अपना सकती है। हिन्दू पक्ष ने मुस्लिमों पर कोर्ट के निर्णय की गलत व्याख्या करने का आरोप लगाया है।

मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित विवादित भोजशाला में ASI सर्वे को लेकर 11 मार्च, 2024 को मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने आदेश दिया था। हाई कोर्ट ने इस संबंध में रिपोर्ट 6 हफ़्तों में दाखिल करने की बात कही थी। कोर्ट ने आधुनिक तकनीक से यहाँ सच्चाई पता लगाने को कहा था।

भोजशाला विवाद बहुत पुराना विवाद है। हिंदू पक्ष का मत है कि ये माता सरस्वती का मंदिर है जहाँ देवी-देवताओं के चित्र और संस्कृत में श्लोक आज भी लिखे हुए हैं। सदियों पहले मुसलमानों ने इसकी पवित्रता भंग करते हुए यहाँ मौलाना कमालुद्दीन की मजार बना दी थी जिसके बाद यहाँ मुस्लिमों का आना जाना शुरू हो गया और अब इसे नमाज के लिए प्रयोग में लाया जाता है।

भोजशाला के बाहर लगे बोर्ड में सूचना के तौर पर साफ लिखा है कि मंगलवार सूर्योदय से सूर्यास्त तक हिंदुओं को वहाँ प्रवेश मिलेगा। वहीं शुक्रवार दोपहर 2 बजे से लेकर तक 3 बजे तक नमाजियों के लिए प्रवेश होगा। बाकी बचे दिन कोई भी जगह को देखने के लिहाज से जा सकता है।

मोदी पागलों की तरह 400+ सीट क्यों चीख रहा है? हिन्दुओं और देश-शांतिप्रिय मुसलमानों इस चीख के दर्द को कब समझोगे? नींद से जागो कहीं बहुत देर न हो जाए !

 

इतिहास साक्षी है कि कुछ हिन्दू जयचन्दों के कारण इस्लामिक जेहादी, जिन्हे मुग़ल बादशाह कहा जाता है, इंद्रप्रस्थ वर्तमान हिन्दुस्तान पर कब्ज़ा कर सके। अगर इन जयचन्दों ने गद्दारी नहीं की होती किसी माई के लाल में इंद्रप्रस्थ पर कब्ज़ा करने की हिम्मत नहीं थी। जो इतिहासकार कहते हैं कि "दुनिया को फ़तेह करने वाला सिकंदर जब दुनिया से गया, खाली हाथ गया", उन गद्दार इतिहासकारों  से पूछो कि विराट हिन्दू सम्राट पोरस ने जिस सिकंदर को हिन्दुस्तान की धरती पर कदम रखते ही इतना मारा था, कि अपनी जिन्दगी में मुड़कर कभी भारत की तरफ देखा नहीं, क्या वह कोई और सिकंदर था? हिन्दुओं यह वास्तविक इतिहास की मात्र एक झलक है। पूरी फिल्म तो 2024 में नरेंद्र मोदी को 400+ सामने आएगी।    

नरेंद्र मोदी जो पागलों की चीख-चीखकर 400+ सीटों के लिए क्यों भीख मांग रहा है। जिसे फिरकापरस्त समझ रहे हैं, लेकिन मासूम शांतिप्रिय जनमानस नहीं। अगर 380 भी सीटें इस मोदी की झोली में आ गयीं, दोस्तों हिन्दू मुसलमानों के नाम पर दंगा करवाकर उनकी लाशों पर बैठ मालपुए खाने वाले जितने भी हैं कट्टरपंथी-हिन्दू या मुसलमान- अपनी मौत मरने लगेंगे। वैसे तो देश के सामने धीरे-धीरे देश का गौरवशाली इतिहास आना शुरू हो चुका है, बस उसमें और गति आ जाएगी। उस समय हर शांतिप्रिय मुसलमान भी इन कट्टरपंथियों के विरुद्ध लड़ाई में मोदी सरकार के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर खड़ा होगा। 

जो मुसलमान गुजरात 2002 दंगों को लेकर नरेंद्र मोदी का विरोध करते हैं, उन्हें सच्चाई जाननी चाहिए। इन कट्टरपंथियों के चुंगल से बाहर निकलो। गुजरात दंगों का इतिहास देखो। मोदी ने किसी दंगाई को नहीं बक्शा। किसी भी बेगुनाह को नहीं पकड़ा। आज गुजरात शांत है। सेवानिर्वित होने के बाद एक हिंदी पाक्षिक को सम्पादित करते लिखा था शीर्षक "अगर मोदी साम्प्रदायिक है फिर इन दंगों का दोषी कौन?

कहते हैं भगौने में पक रहे चावलों में से एक चावल को ही देखा जाता है कि चावल पका या नहीं। यानि राहुल गाँधी के छिपे मनसूबे के बाहर आने से अगर कोई होश में नहीं आता तो उससे बड़ा अंधा दुनिया में कहीं नहीं मिलेगा। जो राहुल और कांग्रेस पार्टी राममंदिर पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को राजीव गाँधी की तरह शाहबानो की तर्ज पर बदलने का ख्वाब देख रहा है, यानि देश को फिर हिन्दू-मुस्लिम दंगों की आग में झोंकने पर काम कर रहा है। जिससे प्रभावित होकर दुबई में बैठे कुछ कट्टरपंथी मुस्लिम संगठन कांग्रेस को वोट करने की अपील कर रहे हैं। विदेशों में बैठे इन सभी उपद्रवियों को कुचलने में सक्षम तभी होंगे, जब केंद्र में मजबूत सरकार होगी।  नींद से जागो कहीं बहुत देर न हो जाए।   

“मोदी 400 सीटें क्यों माँग रहा है, यह देश को जानना जरूरी है। मोदी को 400 सीटें चाहिए ताकि मैं INDI गठबंधन की हर साजिश को रोक सकूँ। मोदी को 400 सीट चाहिए ताकि कॉन्ग्रेस अयोध्या में राम मंदिर पर बाबरी ताला ना लगा दे।”

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने मंगलवार (7 मई, 2024) मध्य प्रदेश के धार में एक जनसभा को संबोधित कर रहे थे। इस जनसभा में पीएम मोदी ने राम मंदिर को लेकर बात करते हुए बताया कि उन्हें 400 सीट क्यों चाहिए। पीएम मोदी ने कहा है कि उनकी सरकार को 400 सीट इसलिए चाहिए ताकि कांग्रेस अयोध्या में राम मंदिर पर बाबरी ताला ना लगा दे।

मोदी के इस बयान से ठीक एक दिन पहले आचार्य प्रमोद कृष्णम ने भी इसी तरह की साजिशों का दावा किया था। तीन दशक तक कांग्रेस नेता रहे आचार्य प्रमोद कृष्णम ने बताया था राहुल गाँधी कांग्रेस सरकार बनने पर राम मंदिर को लेकर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को पलटने की योजना बना चुके थे। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट का राम मंदिर को लेकर फैसला पलटने की बात राहुल गाँधी ने एक मीटिंग में की थी।

मोदी और आचार्य प्रमोद कृष्णम कांग्रेस की राम मंदिर की मंशा को लेकर जो आशंका व्यक्त कर रहे हैं, वह हवा-हवाई नहीं है। कांग्रेस का राम मंदिर को लेकर जो दृष्टिकोण रहा है और अतीत में उसने जो किया है, उससे लगता है कि यदि कांग्रेस सरकार में आती है तो तुष्टिकरण के एजेंडे को धार देने के लिए वह फिर से कोई तिकड़मी रास्ता अपना सकती है।

कांग्रेस आजादी के बाद से ही राम मंदिर को लेकर किए गए प्रयासों में रोड़ा अटकाते आई है और इसके लिए प्रयास करने वालों को दण्डित तक किया है। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू तक राम मंदिर में मूर्तियाँ हटाने को लेकर पत्र लिख रहे थे।

कांग्रेस के इन प्रयासों का बड़ा उदाहरण ICS अधिकारी केके नायर को लेकर की गई कार्रवाई है। नायर को 1 जून, 1949 को  अयोध्या (फैजाबाद) के उपायुक्त सह जिला मजिस्ट्रेट के रूप में नियुक्त किया गया था। अयोध्या का वह दौर उनकी जिंदगी का अहम हिस्सा बन गया था। नायर को राम जन्मभूमि मुद्दे पर एक रिपोर्ट करने के लिए उत्तर प्रदेश की कांग्रेस सरकार की तरफ से एक पत्र मिला था।

इस मुद्दे पर रिपोर्ट को प्रस्तुत करने के लिए उन्होंने अपने सहायक गुरु दत्त सिंह को भेजा। जिसके बाद 10 अक्टूबर, 1949 को सिंह ने अपनी रिपोर्ट में, उस स्थान पर एक भव्य राम मंदिर के निर्माण की सिफारिश की। सिंह ने स्थल का दौरा कर यह देखा कि उस स्थल के लिए हिंदू और मुस्लिम आपस में लड़ रहे थे।

उन्होंने लिखा, ”हिंदू समुदाय ने इस आवेदन में एक छोटे मंदिर के बजाय एक विशाल मंदिर के निर्माण का सपना देखा है। इसमें किसी तरह की परेशानी नहीं है। उन्हें अनुमति दी जा सकती है। हिंदू समुदाय उस स्थान पर एक अच्छा मंदिर बनाने के लिए उत्सुक है, जहाँ भगवान रामचंद्र जी का जन्म हुआ था। जिस भूमि पर मंदिर बनाया जाना है, वह नजूल (सरकारी भूमि) है।” हालाँकि, हिन्दुओं को तब की कॉन्ग्रेस सरकार ने मंदिर बनाने की अनुमति नहीं दी। इसके उलट रामलला विराजमान की मूर्तियों को हटाने का आदेश जरूर दिया गया।

नेहरू का निर्देश, फिर भी नहीं झुके केके नायर

प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के निर्देश पर, उत्तर प्रदेश के कांग्रेस मुख्यमंत्री गोविंद वल्लभ पंत ने राम मंदिर से हिंदुओं को बेदखल करने की कोशिश की। हालाँकि, केके नायर ने हिन्दुओं को राम मंदिर से हटाने का निर्णय मानने से इनकार कर दिया। उन्होंने प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री का आदेश नहीं माना। उन्होंने इस बात पर प्रकाश डाला कि हिंदू उस स्थल पर पहले से पूजा कर रहे हैं। नायर ने राम मंदिर से मूर्तियों को हटाने से भी इनकार कर दिया। कॉन्ग्रेस सरकार ने नायर को इसकी सजा दी और उन्हें जिला मैजिस्ट्रेट के पद से भी निलंबित कर दिया।
यानी जिस अधिकारी ने देश की बहुसंख्यक आबादी की आस्था को चोट पहुँचाने से इनकार कर दिया, उसे कांग्रेस ने निलम्बित करके अपना बदला लिया। हालाँकि,नायर ने कांग्रेस सरकार के खिलाफ मुकदमा लड़ा था और उन्हें अपना ICS का पद वापस मिल गया था। राम मंदिर के लिए प्रयास करने वाले नायर बाद में सांसद बने थे। उनकी पत्नी भी सांसद बनी थीं। हिन्दुओं के पूजा अधिकार को ना छीनना कांग्रेस को लम्बे समय तक चुभता रहा और इंदिरा गाँधी ने नायर और उनकी पत्नी को आपातकाल के दिनों में गिरफ्तार भी करवाया था।
लेकिन इन घटनाओं से समझा जा सकता है कि कांग्रेस यदि सत्ता में होती है तो वह राम मंदिर को लेकर कैसा रुख अपनाती है। इसका एक और उदाहरण 1992 में लाया गाया प्लेसेस ऑफ़ वरशिप एक्ट है, जो कि हिन्दुओं को उनसे छीने गए पूजास्थलों पर दावा करने से रोकता है।
ऐसे में पहले आचार्य प्रमोद कृष्णम का कांग्रेस की राम मंदिर को लेकर योजना बताना और फिर पीएम मोदी का इस शंका को लेकर चेताना, सामान्य बात नहीं है। पुराने उदाहरणों ने यह सिद्ध किया है कि कांग्रेस सत्ता में रहते हुए राम मंदिर के विरुद्ध काम करते आई है।