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माफीवीर राहुल गाँधी : 8 साल पहले पनामा पेपर्स लीक से शिवराज चौहान के बेटे का कनेक्शन ढूँढने वाले ने कहा- हो गई थी ‘गलतफहमी’

भारत को दो ऐसे माफीवीर नेता अरविन्द केजरीवाल और राहुल गाँधी मिले हैं जो hit and run पॉलिसी अपनाकर अपनी ही पार्टी को नुकसान पहुंचा रहे हैं। लगता है दोनों में एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ लगी हुई है। अगर राहुल केजरीवाल पार्टी की हालत देख देश और पार्टी हित में काम नहीं करते Leader of Opposition पद छोड़ देना चाहिए। बार-बार माफ़ी मांगना LoP के लिए बहुत ही शर्म की बात है। शायद इसीलिए पब्लिक भी राहुल की बातों को एक कान से सुनकर दूसरे कान से उसी समय निकाल रही।   

लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी ने कोर्ट में मानहानि के मामले में माफी माँगी है। उन्होने केन्द्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान के बेटे कार्तिकेय सिंह का पनामा पेपर्स लीक मामले में नाम लिया था। इसके खिलाफ कार्तिकेय सिंह ने राहुल गाँधी के खिलाफ भोपाल की एमपी-एमएलए कोर्ट में मानहानि का केस दर्ज कराया था। इसमें उन्होंने कहा था कि उनकी प्रतिष्ठा धुमिल हुई है।

इस मामले की सुनवाई मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में हुई। इस दौरान राहुल गाँधी के वकील ने बुधवार (24 जून 2026) को कोर्ट में एक आवेदन दाखिल किया। इसमें उन्होंने अपने मानहानि वाले बयान पर खेद जताया है और कहा कि उनका बयान कार्तिकेय सिंह से जुड़ा नहीं था। अर्जी में हाईकोर्ट से राहुल गाँधी के खिलाफ चल रही मानहानि की कार्यवाही से राहत देने की माँग की गई है।

राहुल गाँधी के वकील ने कोर्ट में साफ किया कि यह बयान केन्द्रीय मंत्री शिवराज सिंह चौहान के परिवार के खिलाफ नहीं था, बल्कि यह एक गलतफहमी थी। राहुल गाँधी के इस लिखित सफाई पर कोर्ट ने कार्तिकेय सिंह से लिखित में प्रतिक्रिया देने के लिए कहा है।

क्या है मामला

करीब 8 साल पहले मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव 2018 के प्रचार के दौरान राहुल गाँधी ने झाबुआ में चुनावी रैली के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान पर निशाना साधते हुए कहा था कि चौहान के शासनकाल में राज्य में ‘बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार’ हुआ था। उन्होंने यह भी दावा किया था कि चौहान के बेटे कार्तिकेय चौहान का नाम पनामा पेपर्स में आया था, लेकिन उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की गई। इस पर कार्तिकेय शर्मा ने भोपाल के एमपी एमएलए कोर्ट में आपराधिक मानहानि की शिकायत की, जो सांसदों और विधायकों के मामलों की सुनवाई करती है।

राहुल गाँधी ने कहा था, “पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ का नाम पनामा पेपर्स में आया था। पाकिस्तान जैसे देश में उन्हें जेल हुई। यहाँ, एक मुख्यमंत्री के बेटे का नाम पनामा पेपर्स में आता है, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं होती।”

अब राहुल गाँधी अपने आरोपों पर सफाई देते हुए कहते हैं कि उन्हें ‘गलतफहमी’ हुई थी और उन्होंने पनामा पेपर्स लीक मामले में गलती से कार्तिकेय का नाम ले लिया था, जबकि असल में शिवराज सिंह चौहान ‘व्यापम और ई-टेंडर घोटालों में शामिल’ हैं।

शिकायत में आरोप लगाया गया था कि राहुल गाँधी ने कार्तिकेय को पनामा पेपर्स मामले से गलत तरीके से जोड़कर उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाया। शिकायत के बाद, ट्रायल कोर्ट ने राहुल गांधी को व्यक्तिगत रूप से पेश होने का समन जारी किया था।

इसके जवाब में, राहुल गाँधी ने समन और मानहानि के मामले को रद्द कराने के लिए मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की जबलपुर बेंच का रुख किया। जस्टिस प्रमोद कुमार अग्रवाल इस याचिका पर सुनवाई कर रहे हैं। बुधवार को जब मामला सुनवाई के लिए आया, तो याचिकाकर्ता पक्ष ने पहले के निर्देशानुसार निचली अदालत के रिकॉर्ड पेश किए। शिकायतकर्ता कार्तिकेय सिंह की ओर से वकील संकल्प कोचर पेश हुए।

हाई कोर्ट में दायर नई अर्जी में राहुल गाँधी ने उस बयान पर खेद व्यक्त किया है और स्पष्ट किया है कि उनका इरादा कार्तिकेय सिंह का जिक्र करने का नहीं था।

क्या इस्लाम मूर्तियों के आगे नमाज पढ़ने की इजाजत देता है? मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने धार भोजशाला को वाग्देवी मंदिर माना


विश्व में भारत एक ऐसा अनोखा देश है जहाँ हिन्दुओं को अपने धार्मिक स्थलों को वापस लेने के लिए अदालतों के चक्कर काटने पड़ते हैं। कांग्रेस ने अपने कार्यकाल में मुस्लिम तुष्टिकरण करते हर हिन्दू धार्मिक स्थल को विवादित बना मुसलमानों को पागल बना वोट लेता रहा और मुसलमान हिन्दुओं को इस्लाम का दुश्मन समझता रहा।

कल(मई 15) को एक राष्ट्रीय चैनल पर चर्चा के दौरान एक इस्लामिक विद्वान ने कहा कि अगर मुसलमान एक दिन नमाज पढ़ ले तो गंगा-जमुनी तहजीब की एक अच्छी मिसाल होगी। चर्चा में भाग ले रहे एक सहयोगी ने कहा बहुत अच्छी बात है फिर तो हिन्दुओं को भी मस्जिद में हनुमान चालीसा पढ़ने की इजाजत होनी चाहिए। इतना ही नहीं, मुसलमानों को किस तरह पागल बनाया जाता है और वह भी गुलामों की तरह कट्टरपंथी मौलानाओं की बात मान हिन्दुओं को अपना दुश्मन समझने लगता है। जब इस्लाम में मूर्ति पूजा हराम है फिर भोजशाला में स्तम्भों और दीवारों पर बनी मूर्तियों के आगे नमाज कैसे पढ़ी जा सकती है? ठीक यही स्थिति रामजन्मभूमि मन्दिर की थी।     

     

राम अगर काल्पनिक थे फिर लीला स्थलों पर कांग्रेसी क्यों जाते थे?  

अयोध्या में रामजन्मभूमि मन्दिर मुद्दा इसलिए उलझा रहा कि कांग्रेस साक्ष्यों को छिपाती रही। और मुसलमानों के बीच हिन्दू स्वयंसेवी संस्थाओं को बदनाम करने का काम करती रही। रामसेतु और राम को काल्पनिक बताना, लेकिन हिन्दुओं को पागल बनाने दशहरे पर रामलीला मंचो पर माल बटोरने पहुंचना। अगर राम काल्पनिक थे फिर राम मंचन स्थलों पर क्यों जाते थे?  
भारत की महान सभ्यता केवल पुस्तकों में दर्ज कथाओं तक सीमित नहीं, बल्कि वह धरती की परतों में भी सांस लेती है। जब पुरातत्वविद जमीन की गहराइयों में उतरते हैं, तो वे केवल ईंट-पत्थर नहीं खोजते, बल्कि इतिहास की धड़कन को सुनते हैं। हाल के वर्षों में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और राज्य स्तरीय पुरातत्व विभागों द्वारा की गई खुदाइयों ने यह संकेत दिया है कि भारतीय सांस्कृतिक परंपराएं अत्यंत प्राचीन और सतत रही हैं। यह निरंतरता ही सनातन संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है। एएसआई की खोज और तथ्यों के आधार पर अब मध्यप्रदेश हाईकोर्ट ने धार की भोजशाला को वाग्देवी मंदिर माना है। शुक्रवार को दिए फैसले में हाईकोर्ट ने कहा, हमने पुरातात्विक और ऐतिहासिक तथ्यों, एएसआई की सर्वे रिपोर्ट पर विचार किया है। ASI एक्ट के प्रावधानों के साथ-साथ अयोध्या मामले को भी आधार माना है। ऐतिहासिक और संरक्षित जगह देवी सरस्वती का मंदिर है। केंद्र सरकार और ASI यह फैसला लें कि भोजशाला मंदिर का मैनेजमेंट कैसा रहेगा।

पुरातात्विक-ऐतिहासिक तथ्य और अयोध्या केस को भी आधार माना

न्यूज वेबसाइट बार एंड बेंच के मुताबिक, हाईकोर्ट ने कहा कि भोजशाला में सरस्वती मंदिर और संस्कृत शिक्षा केंद्र के साक्ष्य पाए गए हैं। कोर्ट ने पुरातात्विक और ऐतिहासिक तथ्यों, एएसआई सर्वे के साथ अयोध्या केस को भी आधार माना। कोर्ट ने कहा- हर सरकार की जिम्मेदारी है कि वह ऐतिहासिक और पुरातात्विक महत्व वाले प्राचीन स्मारकों और मंदिरों की सुरक्षा निश्चित करे। साथ ही गर्भगृह और धार्मिक आस्था से जुड़ी देव प्रतिमाओं का भी संरक्षण करे। अदालत ने ASI का 2003 का वह आदेश भी रद्द कर दिया, जिसमें ASI ने भोजशाला में हिंदुओं को पूजा का अधिकार नहीं दिया था। उस आदेश को भी खारिज कर दिया, जिसमें मुस्लिमों को नमाज पढ़ने का अधिकार दिया गया था।

 मुस्लिम पक्ष फैसले की समीक्षा के बाद सुप्रीम कोर्ट जाएगा

हाई कोर्ट ने भोजशाला को कमाल मौला मस्जिद बताने वाले मुस्लिम पक्ष को सरकार से मस्जिद के लिए अलग जमीन मांगने को कहा है। धार शहर काजी वकार सादिक ने कहा कि उन्हें हाईकोर्ट के फैसले का सम्मान है। उन्होंने कहा कि वरिष्ठ अधिवक्ता सलमान खुर्शीद और शोभा मेनन ने कोर्ट में अपना पक्ष रखा था। अब फैसले की समीक्षा की जाएगी, इसके बाद मुस्लिम पक्ष सुप्रीम कोर्ट जाएगा। वहीं जैन समाज की ओर से पैरवी कर रहीं एडवोकेट प्रीति जैन ने कहा कि सुनवाई के दौरान यह दावा किया गया था कि तीर्थंकरों की मूर्तियों के अवशेष आज भी ब्रिटिश म्यूजियम में मौजूद हैं और उन्हें उचित स्थान मिलना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस मुद्दे को लेकर जैन समाज भी सुप्रीम कोर्ट जाएगा।
हिंदू पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दायर की, हमको भी सुनें
हाईकोर्ट के फैसले के बाद फिलहाल भोजशाला के मुख्य गेट पर बैरिकेड्स लगाकर परिसर को बंद कर दिया गया है। मौके पर बड़ी संख्या में पुलिस बल तैनात है। भोजशाला विवाद मामले में हिंदू पक्ष ने सुप्रीम कोर्ट में कैविएट दायर की है। याचिकाकर्ता जितेंद्र सिंह विशेन की ओर से अधिवक्ता बरुण कुमार सिन्हा ने कैविएट दाखिल की। इसमें कहा गया है कि हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर किसी भी अपील पर हिंदू पक्ष को सुने बिना कोई आदेश पारित न किया जाए।

भोजशाला: 2100 पन्नों की रिपोर्ट में 500 से अधिक तस्वीरें

इससे पहले भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की खुदाई में मध्यप्रदेश में ऐसे प्रमाण मिले हैं, जिनसे साबित होता है कि हमारी हिंदू संस्कृति कितनी सदियों पुरानी है। एएसआई को भोजशाला मस्जिद में हिंदू प्रतीक चिन्ह मिले हैं, जिनसे संकेत मिलता है कि हिंदू धार्मिक स्थल को तोड़कर मस्जिद का निर्माण हुआ है।  मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक भोजशाला को लेकर एएसआई की विस्तृत रिपोर्ट ने महत्वपूर्ण संकेत दिए हैं। एएसआई ने 2100 पन्नों की रिपोर्ट को 500 से अधिक तस्वीरों और वैज्ञानिक परीक्षणों के आधार पर तैयार किया है। रिपोर्ट में उल्लेख है कि भोजशाला का निर्माण 12वीं शताब्दी में हुआ, जबकि परिसर में स्थित मस्जिद का निर्माण 1265 ईस्वी के आसपास का बताया गया है। इस अंतर को यूं समझ सकते हैं कि 1265 ईस्वी एक विशिष्ट वर्ष है जो 13वीं शताब्दी (1201-1300) का हिस्सा है, जबकि 12वीं शताब्दी 1101-1200 ईस्वी के बीच की अवधि है। यानि 1265 से लगभग 65 से 165 साल पहले की अवधि है। 1265 ईस्वी में सुल्तान बलबन का शासन था, जबकि 12वीं सदी में दिल्ली सल्तनत से पहले राजपूत राजाओं का शासन था। यह तथ्य ऐतिहासिक क्रम को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इससे यह भी साफ संकेत मिलता था कि पहले भोजशाला बनी और उसके बाद मस्जिद का निर्माण हुआ।

मध्यप्रदेश के धार में भोजशाला की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भोजशाला मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित एक प्राचीन स्थल है, जिसे परमार शासक राजा भोज (11वीं शताब्दी) से जुड़ा है। ऐतिहासिक अभिलेखों और शिलालेखों के आधार पर यह साबित होता है कि यह एक प्राचीन शैक्षिक-धार्मिक केंद्र रहा है, जहां पर विद्यादायिना मां सरस्वती की उपासना और अध्ययन परंपरा रही है। भोजशाला स्थल पर संस्कृत शिलालेख, स्थापत्य अवशेष और विद्या-परंपरा से जुड़े संकेतों का प्रमाणित उल्लेख मिलता है। दरअसल, भोजशाला पर विवाद इसी परिसर में कमाल मौला मस्जिद के अस्तित्व के बाद सामने आया। हिंदुओं के कई अन्य धार्मिक स्थलों की तरह यहां भी तोड़ो और कब्जा करो की नीति अपनाई गई। इससे यह साफ हो गया कि यह स्थल मूलतः मां सरस्वती का मंदिर/विद्या-केंद्र था, जिस पर बाद में मस्जिद बनी। इसी दावे-प्रतिदावे के कारण पूजा और नमाज दोनों को लेकर विवाद खड़ा हुआ।

कांग्रेस सरकारों के समय इस विवाद को और हवा मिली
कांग्रेस सरकारों के समय इस विवाद को और हवा मिली। क्योंकि लंबे समय तक प्रशासन ने इस हिंदू स्थल पर भी दिन-विशेष की व्यवस्था लागू कर दी। कुछ दिनों में हिंदू पूजा और कुछ में तुष्टिकरण के लिए मुस्लिम नमाज की अनुमति प्रदान कर दी गई। यह व्यवस्था अस्थायी थी, पर मूल प्रश्न कि स्थल की ऐतिहासिक पहचान तो अनसुलझा रहा। इसके लिए मामला न्यायालयों तक पहुंचा। हाल के वर्षों में अदालतों ने पुरातात्त्विक सर्वेक्षण और साक्ष्यों के आधार पर तथ्य-जांच पर जोर दिया है। कुछ अवसरों पर विशेष तिथियों/समयों में पूजा की अनुमति संबंधी आदेश भी सामने आए हैं। अंतिम निर्णय अभी न्यायिक प्रक्रिया के अधीन है। अब सुप्रीम कोर्ट ने बसंत पंचमी के दिन धार में भोजशाला में सूर्योदय से सूर्यास्त तक हिंदुओं को प्रार्थना करने की अनुमति दी है। सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा, हम दोनों पक्षों से अपील करते हैं कि वे आपसी सम्मान और सहयोग बरकरार रखें। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य और जिला प्रशासन को कानून व्यवस्था बनाए रखने की हिदायत दी।

मंदिर स्थापत्य के संकेत, विज्ञान-तकनीक से इतिहास की पड़ताल
एएसआई के सर्वेक्षण में स्तंभों पर कमल आकृतियां, देवी-देवताओं की मूर्तियां, संस्कृत शिलालेख और मंदिर शैली की वास्तुकला के संकेत पाए गए। इन प्रतीकों को सनातन परंपरा से जोड़ा जाता है। वास्तुशिल्पीय विश्लेषण यह दर्शाता है कि संरचना में प्रयुक्त शैली उस कालखंड के मंदिर निर्माण की परंपराओं से मेल खाती है। हालांकि यह विषय न्यायालय में विचाराधीन है, लेकिन पुरातात्विक दृष्टि से यह अध्ययन सांस्कृतिक इतिहास को समझने में महत्वपूर्ण कड़ी बन गया है। एएसआई ने ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग कर भूमिगत संरचनाओं का परीक्षण किया। खुदाई के दौरान दीवारों की संरचना, स्तंभों और शिलालेखों का गहन अध्ययन किया गया। यह दर्शाता है कि इतिहास की खोज अब केवल अनुमान पर आधारित नहीं, बल्कि वैज्ञानिक पद्धति पर टिकी है। सनातन संस्कृति की प्राचीनता को समझने के लिए यह पद्धति निर्णायक सिद्ध हो रही है।

मंदिर के हिस्सों में बनाई मस्जिद, सनानत धर्म से जुड़े प्रतीक मिले
भोजशाला विवाद को लेकर रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पुराने मंदिर के हिस्सों का इस्तेमाल करके मस्जिद बनाई गई है। भोजशाला को हिंदू समुदाय वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इस स्मारक को कमाल मौला मस्जिद बताता है। यह परिसर एएसआई द्वारा संरक्षित है। सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, भोजशाला परिसर में सिक्कों, सनातन धर्म से जुड़े प्रतीक चिन्हों और देवी-देवताओं की मूर्तियों का विवरण दिया गया है। मंदिर शैली की वास्तुकला के संकेत मिले हैं। कई स्तंभों पर नक्काशी, कमल आकृतियां और शिल्प अवशेष पाए गए। संस्कृत भाषा के शिलालेख भी दर्ज किए गए हैं। यह 12वीं से 16वीं शताब्दी के बीच के बताए जा रहे हैं

सनातन संस्कृति यानि अनादि और अनंत शक्ति की निरंतरता
इन खोजों का साझा सूत्र निरंतरता है। चाहे मंदिर स्थापत्य हो, शिलालेख हों, मूर्तियां हों या नगर नियोजन, सदियों से एक सांस्कृतिक धारा प्रवाहित होती दिखती है। सनातन शब्द का अर्थ ही है, जो अनादि और अनंत है। पुरातात्विक प्रमाण इस सांस्कृतिक निरंतरता को ठोस आधार प्रदान करते हैं। सनातन संस्कृति की महत्ता को समझने के लिए अब तथ्यपरकत खोज हो रही है। भारत की सनातन संस्कृति केवल इतिहास का विषय नहीं, बल्कि वर्तमान की जीवंत धरोहर है। राजस्थान से मध्य प्रदेश तक फैले पुरातात्विक प्रमाण यह संकेत देते हैं कि यह परंपरा सदियों से विकसित होती रही है। मंदिर स्थापत्य, नदी किनारे बसे नगर, शिलालेख और मूर्तियां, ये सब उस सांस्कृतिक यात्रा के साक्षी हैं जो आज भी जारी है। इन खोजों का महत्व केवल अतीत तक सीमित नहीं है। वे हमें यह स्मरण कराते हैं कि हमारी सांस्कृतिक जड़ें कितनी गहरी हैं। जब नई पीढ़ी इन साक्ष्यों को देखती है, तो उसे अपनी पहचान पर गर्व का अनुभव होता है। इतिहास की हर खुदाई हमें यही बताती है कि यह सभ्यता क्षणिक नहीं, बल्कि कालजयी है। सनातन संस्कृति की यही सबसे बड़ी शक्ति है कि वह समय के प्रवाह में भी अपनी पहचान बनाए रखती है, और हर युग में नए प्रमाणों के साथ स्वयं को पुनः स्थापित करती है।

अजमेर में मोइनुद्दीन चिश्ती दरगाह विवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
अजमेर स्थित ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के बारे में भी कहा जाता है कि इस स्थल पर पहले प्राचीन शिव मंदिर था। दावा करने वाले पक्ष स्थापत्य संकेतों, ऐतिहासिक उल्लेखों और स्थानीय परंपराओं के पुख्ता प्रमाण देते हैं। उनका कहना है कि स्थल की मूल धार्मिक पहचान की जांच होनी चाहिए। दूसरी ओर, दरगाह से जुड़े पक्ष दरगाह की ऐतिहासिक-धार्मिक निरंतरता पर जोर देते हैं। यह मामला भी अदालतों के समक्ष है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका स्वीकार किए जाने का अर्थ यह है कि शीर्ष अदालत ने तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर सुनवाई के लिए दरवाजा खोल दिया है। आगे की प्रक्रिया में दस्तावेज, ऐतिहासिक प्रमाण और विधिक तर्कों की जांच होगी। भोजशाला हो या अजमेर की दरगार दोनों विवादों में मूल प्रश्न स्थल की ऐतिहासिक पहचान और पूजा/आस्था के अधिकार से जुड़ा है। दोनों ही मामलों में अंतिम फैसला अदालतों को करना है। भोजशाला में प्रशासनिक स्तर पर लंबे समय से दिन-विशेष की व्यवस्था रही, वहीं अजमेर में विवाद अपेक्षाकृत न्यायिक सुनवाई के शुरुआती चरणों में है।

पहले जिनको विवादास्पद कह दबाया, वे अब खुलकर विमर्श में आए
दरअसल, भारत की सभ्यता केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि स्मृति की निरंतर धारा है। इस स्मृति में मंदिर हैं, तीर्थ हैं, शिलालेख हैं और वे कथाएं हैं, जिनमें आस्था, दर्शन और संस्कृति एक साथ बहती रही है। लेकिन इस सांस्कृतिक निरंतरता को इतिहास के कुछ दौरों में योजनाबद्ध रूप से तोड़ा गया। सनातन परंपरा के अनेक धार्मिक स्थलों पर हमले हुए, संरचनाएं ध्वस्त की गईं और पूजा स्थलों के ऊपर नई धार्मिक इमारतें खड़ी कर दी गईं। यह केवल स्थापत्य परिवर्तन नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक वर्चस्व का प्रयास था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनने के बाद हिंदू समाज के भीतर एक नया आत्मबोध उभरा। दशकों तक जिन विषयों को “विवादास्पद” कहकर दबाया गया, वे अब खुलकर विमर्श के केंद्र में आ गए हैं। अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण इस परिवर्तन का प्रतीक बन गया। 22 जनवरी को प्राण-प्रतिष्ठा के दो वर्ष पूरे होना केवल एक धार्मिक अवसर नहीं, बल्कि यह संकेत है कि भारत अब अपनी सांस्कृतिक स्मृति से मुंह नहीं मोड़ेगा।

मजहबी आतंक खतरनाक… MP हाई कोर्ट ने ISIS आतंकी मोहम्मद शाहिद को जमानत देने से किया इनकार: जिहाद से भारत में शरीयत लागू करने का सपना, हिन्दू देवी-देवताओं का करता था अपमान

2024 लोकसभा चुनावों में मोदी विरोधियों ने जहर परोसा कि 'मोदी सरकार संविधान बदल देगी' जिसे महामूर्ख जनता ने सच्चाई को जाने बिना सच मान लिया। हकीकत यही है कि संविधान बदलने का समय आ गया है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने आतंकी को जमानत से इंकार करने पर जो कहा उसे हर हिन्दू को अपना दिल और दिमाग खोलकर कटु सच्चाई को समझ अपनी वोट की ताकत से मुस्लिम तुष्टिकरण करने वालों को धूल चटानी होगी। 

संविधान क्यों बदलने की जरूरत है? क्योकि आज जिस संविधान को विपक्ष लिए घूम रहा है वह संविधान निर्माताओं द्वारा लिखित संविधान नहीं है। मुस्लिम वोट बैंक पर अपनी तिजोरियां भरने और कुर्सी की खातिर शरीयत को बढ़ावा देने संशोधन कर हिन्दुओं को मूर्ख बनाया गया। 

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने कहा है कि मजहबी आतंक खतरनाक और त्रासद है। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने यह टिप्पणियाँ एक ISIS आतंकी को जमानत देने से इनकार करते हुए की हैं। आतंकी अपने साथियों के साथ भारत समेत पूरी दुनिया में शरिया का राज लाना चाहता था। वह हिन्दुओं को मुसलमान बनाने के मिशन में जुट गया था। वह इस्लामी आतंकी संगठन ISIS और जाकिर नाइक से प्रभावित था। वह जबलपुर की हथियार फैक्ट्री पर हमला करके देश में इस्लामी कानून लागू करना चाहता था। उसने हिन्दू देवी-देवताओं का भी अपमान किया।

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में जस्टिस अनुराधा शुक्ला की बेंच ने इस मामले की सुनवाई करते हुए कहा, “मजहबी आतंकवाद एक त्रासद और खतरनाक सोच है जो मजहब की सच्ची शिक्षाओं को विकृत करती है और लोगों तथा समाज को भारी नुकसान पहुँचाती है। मजहबी आतंकवाद की जड़ें गहरी और जटिल हैं, लेकिन यह समझना महत्वपूर्ण है कि कोई भी धर्म असल रूप में हिंसा या आतंक का समर्थन नहीं करता।” हाई कोर्ट ने कहा कि हम उस आदमी के प्रति कोई दया नहीं दिखा सकते जिस पर आतंक के गंभीर आरोप हैं।

जमानत ना पाने वाले इस ISIS आतंकी का नाम मोहम्मद शाहिद खान है। उसे NIA ने मई, 2023 में पकड़ा था। मोहम्मद शाहिद खान ने NIA की गिरफ़्तारी से जमानत के लिए कोर्ट का रास्ता अख्तियार किया था। लेकिन यहाँ से उसकी जमानत याचिका खारिज हो गई थी। इसके बाद वह मध्य प्रदेश हाई कोर्ट पहुँचा था। यहाँ पर उसने दलील दी कि उसे इस केस में फंसाया गया है और उन लोगों ने कोई अपराध नहीं किया है। हालाँकि, NIA ने उसका सारा कच्चा चिट्ठा कोर्ट के सामने रख दिया।

NIA ने उसके साथ 2 और आतंकी आदिल खान और सैयद मामूर अली पकड़े थे। बाद में अगस्त, 2023 में उनका एक और साथी मोहम्मद काशिफ खान पकड़ा गया था। NIA ने अपनी जाँच में पाया कि यह सभी 2020 के कोविड लॉकडाउन के दौरान जाकिर नाइक को देखते थे। इसके बाद इन्होने जिहाद और ISIS के आतंक के बाद बारे में पढ़ना चालू किया। इन चारों ने यह ठान लिया कि भारत में दुनिया में शरीयत का राज और इस्लामी कानून लाना है। इन लोगों ने हिन्दुओं को इस्लाम में धर्मांतरित होने के लिए भी उकसाया।

इसके अलावा यह चारों अपनी ISIS वाली विचारधारा के प्रसार के लिए एक मस्जिद के बाहर पर्चे भी बाँटते रहे। उन्होंने ISIS और अल कायदा के झंडे वाले पर्चे भी बाँटे। इसके अलावा इन्होने एक व्हाट्सएप ग्रुप भी बनाया जिसमें हिन्दू देवी-देवताओं का अपमान किया जाता था। इसमें ISIS से सम्बन्धित सामग्री शेयर होती थी। पूरी तरह से आतंकी सोच में पड़ने के बाद इन चारों ने आतंक के जरिए भारत में इस्लामी राज कायम करने का प्लान बनाया। इस काम के लिए हथियार जुटाने को उन्होंने जबलपुर हथियार फैक्ट्री पर हमले की योजना बनाई थी।

इन चारों का प्लान था कि यह जबलपुर फैक्ट्री में ब्लास्ट करेंगे और वहाँ से बड़ी मात्रा में हथियार लूटेंगे। इसके लिए उन्होंने विस्फोटक भी जुटाने चालू कर दिए थे। इस मामले में NIA ने घटना से पहले ही इन्हें गिरफ्तार कर लिया था और इनके मॉड्यूल का भंडाफोड़ कर दिया।