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2000 साल पहले भी होता था भारत-मिस्र में व्यापार, कब्रों में खुदे मिले तमिल-संस्कृत लिपियों में व्यापारियों के नाम: विदेशी शोधकर्ता भी हैरान

                    कब्रों पर खुदे तमिल-संस्कृत लिपियों में नाम की खोज (साभार: Deccan Herald)
मिस्र के ‘वैली ऑफ किंग’ नाम की प्राचीन कब्रों से 30 शिलालेख मिले हैं, जो लगभग 2000 साल पुराने हैं। इन शिलालेखों में भारत और मिस्र के बीच व्यापार और संपर्क की जानकारियाँ हैं। इन शिलाओं पर लिखे शब्द तमिली (प्राचीन तमिल-ब्राह्मी) और प्राकृत एवं संस्कृत भाषा में हैं, जो यह साबित करते हैं कि उस समय भारतीय उपमहाद्वीप के लोग मिस्र आते-जाते थे।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ये शिलालेख 6 अलग-अलग रॉक-कट कब्रों में मिले हैं। इनमें से 20 शिलाएँ तमिली में और बाकी 10 शिलाएँ संस्कृत और प्राकृत में हैं। इसका मतलब यह है कि केवल दक्षिण भारत के ही नहीं बल्कि भारत के उत्तर-पश्चिम और पश्चिमी हिस्सों से भी लोग मिस्र जाते थे। विशेष रूप से प्राचीन राजधानी थेब्स के भीतर स्थित राजाओं की घाटी में, जहाँ पहले से तीसरी ईस्वी के बीच मसालों और अन्य वसतुओं का व्यापार होता था।

इस खोज की जानकारी स्विट्जरलैंड की लॉजेन यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ स्लाविक एंड साउथ एशियन स्टडीज (SLAS) के प्रोफेसर इंगो स्ट्राउच और फ्रांस के पेरिस स्थित EFEO की प्रोफेसर शार्लोट श्मिड ने दी है। उन्होंने बुधवार (11 फरवरी 2026) को तमिलनाडु राज्य पुरातत्व विभाग (TNSDA) द्वारा तमिल शिलालेखों पर आयोजित सम्मेलन में यह जानकारी दी। इस कार्यक्रम में दुनियाभर के विशेषज्ञ और शोधकर्ता शामिल हुए थे, जहाँ इस महत्वपूर्ण ऐतिहासिक खोज को पहली सार्वजनिक रूप से बताया गया।

तमिल व्यापारी से लेकर राजा के दूत ने की मिस्र यात्रा

शोधकर्ताओं को एक बहुत अहम जानकारी भी मिली है। सिकाई कोर्रान (Cikai Korran) नाम के एक व्यक्ति ने अपना नाम मिस्र की 6 में से लगभग 5 कब्रों में कुल 8 बार खुदवाया है। माना जा रहा है कि वह एक तमिल व्यापारी था, जो प्राचीन ‘तमिलगम’ क्षेत्र से जहाज के जरिए मिस्र पहुँचा था।

इतिहासकारों का मानना है कि ‘कोर्रान’ नाम ‘कोर्रवाई’ देवी से जुड़ा हो सकता है, जो चेरा राजवंश के समय पूजी जाती थीं। इन देवी का उल्लेख दूसरी सदी की प्रसिद्ध तमिल महाकाव्य रचना ‘शिलप्पदिकारम’ में भी मिलता है।

इसी के साथ एक शिलालेख में एक अन्य व्यक्ति का जिक्र संस्कृत में किया गया है, जिसे एक क्षहरात (Ksaharata) राजा का दूत बताया गया है। इससे यह संकेत मिलता है कि उत्तर-पश्चिम भारत के लोग भी मिस्र जाते थे, जिनमें केवल व्यापारी ही नहीं बल्कि शाही प्रतिनिधि के लोग भी शामिल थे।

मिस्र में मिले तमिली शिलालेखों ने शोधकर्ताओं को चौंकाया

प्रोफेसर इंगो स्ट्राउच ने कहा कि उन्हें यकीन नहीं हुआ जब मिस्र में तमिली भाषा के शिलालेख मिले। इन कब्रों को हर साल लाखों लोग देखते हैं, लेकिन पहले किसी ने इन्हें नोटिस नहीं किया। कब्र नंबर 14 में ‘सिकाई कोर्रान’ नाम करीब 6 मीटर ऊँची दीवार पर अकेला लिखा मिला। स्ट्राउच ने 2024 में पहला शिलालेख खोजा और बाद में प्रो. शार्लोट श्मिड के साथ मिलकर कुल 30 शिलालेख ढूँढे, जिनमें 20 तमिली में हैं, जबकि भारत में ऐसे करीब 100 ही मिले हैं।

प्रो. श्मिड ने इसे असाधारण खोज बताया। उन्होंने कहा कि इससे यह सवाल उठता है कि उस समय लिपि का उपयोग कितना होता था और भारत में ऐसे शिलालेख कम क्यों हैं। संभव है कि लिखने का माध्यम अलग रहा हो या व्यापारी समुदाय की अपनी परंपराएँ रही हों। दोनों शोधकर्ताओं का मानना है कि उस दौर के व्यापारी कई भाषाएँ जानते थे और ग्रीक भी पढ़ सकते थे, क्योंकि तमिलगम के व्यापारिक समझौते ग्रीक में लिखे जाते थे।

भारत-रोम व्यापार के नए सबूत

प्रोफेसर शार्लोट श्मिड ने यह भी कहा कि रोमन काल में ग्रीक भाषा जानना बहुत जरूरी था। उनका मानना है कि ग्रीक जानने वाले लोग भारतीय शिलालेख नहीं पढ़ते थे, लेकिन भारतीय व्यापारी ग्रीक जरूर पढ़ और समझ सकते थे। उस दौर में बिना ग्रीक पढ़े-लिखे काम चलाना मुश्किल था।

TNSDA के अकादमिक सलाहकार प्रोफेसर के राजन ने बताया कि भारत का समुद्री व्यापार सिंधु घाटी सभ्यता (IVC) से ही शुरू हो गया था और शुरुआती ऐतिहासिक काल में यह और तेज हुआ। उस समय ज्यादातर सामान भारत से पश्चिमी देशों की ओर जाता था। IVC के बाद गुजरात और तमिलगम (मुजिरि, केरल) से व्यापारी समूह उभरे, जो तमिल भाषा का इस्तेमाल करते थे।

रोमन लोग भारतीय वस्तुओं, खासकर काली मिर्च के दीवाने थे। नई खोज से भारत और रोमन साम्राज्य के बीच मजबूत व्यापारिक संबंध साबित होते हैं। यह खोज तमिल ब्राह्मी लिपि और सांस्कृतिक आदान-प्रदान पर नई चर्चा भी शुरू करती है। थेब्स में मिले शिलालेखों को लाल सागर के बंदरगाह बेरेनाइक से जोड़ा गया है, जहाँ 30 साल से खुदाई चल रही है और भारतीय भाषाओं, यहाँ तक कि तमिल में भी शिलालेख मिले हैं।

लेबनान, जॉर्डन और मिस्र के ‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ ग्रुप को अमेरिका ने विदेशी आतंकवादी दिया करार: अब ग्लोबल टेररिस्टों की लिस्ट में शामिल होगा तीनो का नाम


‘मुस्लिम ब्रदरहुड’ की इस्लामिक जिहादी गतिविधियों को खत्म करने की दिशा में US सरकार ने अहम कदम उठाया है। 13 जनवरी 2026 को मुस्लिम ब्रदरहुड के लेबनानी, मिस्र और जॉर्डन की आतंकी ग्रुप के खिलाफ कार्रवाई करते हुए उन्हें ‘विदेशी आतंकवादी संगठन’ घोषित कर दिया। इन संगठनों को लेकर अमेरिका ने कहा कि ये उसके हितों को नुकसान पहुँचा सकते हैं और ये देश के लिए खतरा हैं।

नवंबर 2025 में US प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप के एक खास दस्तावेज पर साइन किया था, जिसमें उनके एडमिनिस्ट्रेशन को मुस्लिम ब्रदरहुड के खास ग्रुप को FTOs और SDGTs के तौर पर नामित करने की प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए था।

सेक्रेटरी ऑफ स्टेट मार्को रुबियो ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा कि मुस्लिम ब्रदरहुड के मिस्री, जॉर्डनी और लेबनानी चैप्टर्स को FTOs और SDGTs के तौर पर नामित करना राष्ट्रपति ट्रंप के उस वादे का एक हिस्सा है, जिसके तहत वे मुस्लिम ब्रदरहुड के उन ग्रुप को खत्म करेंगे, जो यूनाइटेड स्टेट्स के लिए खतरा पैदा करते हैं।

रुबियो ने कहा, “हम लेबनानी मुस्लिम ब्रदरहुड को एक विदेशी आतंक संगठन और एक स्पेशली डेजिग्नेटेड ग्लोबल टेररिस्ट (SDGT) मानते हैं और ग्रुप का लीडर मुहम्मद फॉजी तक्कोश को एक जिहादी बताते हैं। साथ ही इस्लामिक संगठन हमास को मदद पहुँचाने के लिए मिश्र और जॉर्डन की मुस्लिम ब्रदरहुड की शाखा को SDGTs डेजिग्नेट कर रहे हैं।”

रुबियो ने कहा कि अमेरिका इन मुस्लिम ब्रदरहुड की शाखाओं को मिल रहे आर्थिक सहायता को बंद करने की कोशिश करेगा। राष्ट्रपति ट्रंप का मानना था कि लेबनानी गुट के एक हिस्से ने 7 अक्टूबर 2023 को हमास के हमले के बाद इजरायल पर रॉकेट दागे थे, जिसके कारण गाजा युद्ध शुरू हुआ। जॉर्डन के गुट ने हमास का समर्थन किया था।

1928 में मिस्र में हसन अल-बन्ना ने मुस्लिम ब्रदरहुड की स्थापना की थी। वह एक टीचर और इस्लामिक स्कॉलर था। इखवान अल-मुस्लिमिन की शुरुआत एक सुन्नी इस्लामी मूवमेंट के तौर पर की गई थी. जो बाद में हिंसक जिहादी संगठन बन गया। पिछले कुछ सालों में मुस्लिम ब्रदरहुड एक ट्रांसनेशनल इस्लामिक टेरर नेटवर्क बन गया है। इसका मकसद किसी भी तरीके से अलग-अलग देशों में शरिया कानून लागू करना है।

मुस्लिम ब्रदरहुड ने दुनिया भर में कई ग्रुप बनाए हैं, जो अहिंसक और सोशियो-पॉलिटिकल होने का दिखावा करते हैं और अंदरखाने इस्लामिक आतंकवाद का समर्थन करते हैं।

मुस्लिम ब्रदरहुड को आधिकारिक तौर पर टेरर ग्रुप बताना US सरकार के लिए हमेशा मुश्किल रहा है। इस संगठन की अलग-अलग शाखा कई देशों में काम करती हैं। इस वजह से अमेरिका में लीगल एक्सपर्ट्स और इंटेलिजेंस अधिकारियों को अक्सर पूरे मूवमेंट पर एक जैसा टेररिस्ट लेबल लगाना मुश्किल लगता है।

यही वजह है कि इस्लामिक आतंकवाद से लिंक साबित होने के बाद मुस्लिम ब्रदरहुड के खास चैप्टर को टारगेट किया जाता है और उन्हें टेरर ग्रुप बताया जाता है।

लेबनानी मुस्लिम ब्रदरहुड

हाल ही में, US सरकार ने लेबनानी मुस्लिम ब्रदरहुड, जिसे अल-जमा अल-इस्लामिया, इजिप्टियन मुस्लिम ब्रदरहुड और जॉर्डनियन मुस्लिम ब्रदरहुड के नाम से भी जाना जाता है, को FTOs और SDGTs घोषित किया है।

अल-जमा अल-इस्लामिया के नाम से मशहूर लेबनानी मुस्लिम ब्रदरहुड को एक खास मकसद से 1960 के दशक में इजिप्टियन मुस्लिम ब्रदरहुड की एक ब्रांच के तौर पर बनाया गया था। यह ज़्यादातर लेबनान की सुन्नी मुस्लिम आबादी के बीच काम करता है। यह संगठन लेबनान की राजनीति में शामिल रहा है और यहाँ तक ​​कि पार्लियामेंट्री सीटें भी हासिल की हैं। यह इस्लामी संगठन एजुकेशनल और हेल्थकेयर सर्विस भी चलाता था; हालाँकि, चैरिटी के दिखावे के अलावा, LMB हिंसक गतिविधियों में भी शामिल रहा है।

लेबनानी मुस्लिम ब्रदरहुड यानी lbm की एक मिलिट्री विंग है जिसे अल-फज्र फोर्सेज (डॉन फोर्सेज) के नाम से जाना जाता है। इसका दूसरा नाम कुव्वत-अल-फज्र भी है। LMB के फाति याकन और अब्दुल्ला तेराकी समेत कई नेता हिज्बुल्लाह के करीब थे। हालाँकि 2006 में इस्लामिक एक्शन फ्रंट बना लिया, जो एक सुन्नी जिहादी संगठन था और शिया संगठन के साथ जुड़ा हुआ था। ये ज्यादा दिन तक एक्टिव नहीं रहा।

हालाँकि 2023 में इजरायल-लेबनान बॉर्डर पर हुई झड़पों के दौरान, अल-फज्र ने खुद को फिर से एक्टिव कर लिया और उत्तरी इजरायल में रॉकेट दागे। अल-फज्र ने हिज़्बुल्लाह और हमास के साथ भी कोऑर्डिनेट किया।

मार्च 2024 में अल-फज्र ने इजरायल के खिलाफ आतंकी हमला करने की योजना बनाई थी, हालाँकि लेबनानी मुस्लिम ब्रदरहुड आतंकवादी हमला कर पाते, उससे पहले ही इजरायली डिफेंस फोर्स ने कार्रवाई शुरू कर दी।

LMB के सेक्रेटरी जनरल मुहम्मद फावजी तक्कोश ने हिज्बुलल्लाह-हमास गठजोड़ के साथ एक फॉर्मल अलायंस बनाकर काम करने लगा। रिपोर्ट्स कहती हैं कि अल-फ़ज्र के 1000 से ज्यादा जिहादी एक्टिव थे।

LMB के अंदर दो ग्रुप है। इसमें एक कतर और तुर्की का वफादार है, जबकि दूसरा ईरान-समर्थित हिज़्बुल्लाह के साथ है।

अक्टूबर 2023 में इजरायल-हमास युद्ध शुरू होने के बाद से, इजरायल ने हमास के समर्थक 15 से ज्यादा अल-फ़ज्र जिहादियों को मार डाला। असल में, अल-फ़ज्र हमास की लेबनानी मिलिट्री कमांड के तौर पर काम करता है।

मुस्लिम ब्रदरहुड खुद को हिंसा से दूर बताता है, फिर भी जिहादी एक्टिविटीज़ में शामिल है। US ट्रेजरी डिपार्टमेंट ने कहा, “हालाँकि हमास का समर्थन करने वाले मुस्लिम ब्रदरहुड हिंसा छोड़ने का दावा करते हैं, लेकिन ये आतंकवाद को बढ़ावा देना, भड़काना और उसकी तारीफ करना जारी रखे हुए हैं। ये यूनाइटेड स्टेट्स और उसके सहयोगियों के हितों के लिए खतरनाक है।”

जॉर्डन मुस्लिम ब्रदरहुड

जॉर्डन मुस्लिम ब्रदरहुड (JMB) की स्थापना 1945 में अब्देल लतीफ अबू कुरा ने की थी। शुरुआत में, युवा राजा हुसैन I के नेतृत्व वाली जॉर्डन की राजशाही ने कट्टरपंथ के बजाय धर्मार्थ कामों के जरिए असहमति को दबाने, सेक्युलर अरब राष्ट्रवादियों से मुकाबले करने के लिए JMB को मंजूरी दी। इसके बाद धीरे-धीरे जॉर्डन मुस्लिम ब्रदरहुड मजबूत होता गया और राजशाही का एक पिलर बन गया।

1989 में जॉर्डन में राजनीतिक उदारीकरण के बाद, JMB ने इस्लामिक एक्शन फ्रंट नाम से अपनी राजनीतिक पार्टी बनाई। 1992 में, इस्लामिक एक्शन फ्रंट ऑपचारिक तौर पर पार्टी बन गई। IAF और JMB ने अलग-अलग लीडरशिप स्ट्रक्चर बनाए रखे।

जॉर्डन मुस्लिम ब्रदरहुड जॉर्डन में अपनी एक्टिविटी कम रखता है, लेकिन ‘फिलिस्तीनी मकसद’ के लिए यह एक्टिव रहता है। जॉर्डन सरकार पर अपने अरब साथियों की तरफ से JMB पर बैन लगाने का दबाव था। हालाँकि, उनकी एक्टिविटीज़ को शक की नज़र से देखने और उनकी एक्टिविटीज़ को कंट्रोल करने की इच्छा के बावजूद वह ऐसा करने से हिचकिचा रही थी।

हालाँकि, समय के साथ, जॉर्डन सरकार ने अपना रुख बदल लिया और 2015 में, सरकार ने ऐलान किया कि वह अब मुस्लिम ब्रदरहुड को एक लीगल ऑर्गनाइज़ेशन के तौर पर मान्यता नहीं देती है। उसने JMB का लाइसेंस रिन्यू करने से भी मना कर दिया। इसके बजाय उसने मुस्लिम ब्रदरहुड एसोसिएशन नाम के एक नए संगठन को मंजूरी दी, जिसे सरकार ज्यादा सुधारवादी, नरमपंथी और पूरी तरह से जॉर्डन पर फोकस करने वाला मानती थी।

2020 में, जॉर्डन की टॉप कोर्ट ने मुस्लिम ब्रदरहुड को खत्म करने का ऑर्डर दिया। हालाँकि, सरकार के जानबूझकर कुछ न करने की वजह से यह फैसला लागू नहीं हो सका। यह भी न भूलें कि JMB की पॉलिटिकल विंग, इस्लामिक एक्शन फ्रंट, देश में काफी मजबूत है। संगठन ने सितंबर 2024 के चुनावों में 138 में से 31 सीटें जीती थीं।

जॉर्डन ने ऑफिशियली ओरिजिनल मुस्लिम ब्रदरहुड (JMB) पर मई 2025 में बैन लगा दिया और उसकी संपत्ति जब्त कर ली। यह फैसला JMB मेंबर्स समेत 16 लोगों को एक तोड़फोड़ की साज़िश रचने को लेकर गिरफ्तारी के बाद किया गया। JMB को गैरकानूनी घोषित कर दिया गया था, लेकिन इस्लामिक एक्शन फ्रंट पर बैन नहीं लगाया गया था।

जॉर्डन मुस्लिम ब्रदरहुड पर अमेरिकी एक्शन की वजह यह है कि यह संगठन नए जिहादियों की भर्ती के अलावा रॉकेट, एक्सप्लोसिव और ड्रोन बनाने के लिए विदेशी आतंकी संस्थाओं के साथ मिलकर काम कर रही थी। US ट्रेजरी डिपार्टमेंट के ऑफिस ऑफ़ फॉरेन एसेट्स कंट्रोल (OFAC) का कहना है कि जॉर्डन और विदेशों में मुस्लिम ब्रदरहुड से जुड़े लोगों ने ‘गैर-कानूनी तरीकों से पैसे जुटाकर इस काम में मदद की है।’

US ट्रेजरी डिपार्टमेंट ने कहा, “इजिप्टियन मुस्लिम ब्रदरहुड और जॉर्डनियन मुस्लिम ब्रदरहुड को हमास को सामान या सर्विस देने, फाइनेंशियल, मटीरियल या टेक्नोलॉजिकल सपोर्ट देने या उसकी मदद करने के लिए डेजिग्नेट किया जा रहा है।”

इजिप्टियन मुस्लिम ब्रदरहुड

एक और जिहादी आतंकवादी संगठन जिसे फॉरेन टेररिस्ट ऑर्गनाइजेशन (FTO) और स्पेशली डेजिग्नेटेड ग्लोबल टेररिस्ट (SDGT) के तौर पर डेजिग्नेट किया गया है, वह है इजिप्टियन मुस्लिम ब्रदरहुड (EMB)। इसे दुनिया भर में सभी मुस्लिम ब्रदरहुड चैप्टर्स की पेरेंट बॉडी कहा जा सकता है।

मुस्लिम ब्रदरहुड या इखवान अल-मुस्लिमिन की स्थापना 1928 में मिस्र में हसन अल-बन्ना ने की थी, जो एक टीचर और इस्लामिक स्कॉलर थे। इस इस्लामी संगठन की नींव एंटी-वेस्टर्न कॉलोनियलिज्म और पोस्ट-ओटोमन दुनिया में इस्लामिक वैल्यूज के कथित नुकसान के आधार पर थी। अल-बन्ना ने मुस्लिम ब्रदरहुड को एक पैन-इस्लामिस्ट मूवमेंट के तौर पर शुरू किया, जो चैरिटी और इस्लामिस्ट एडवोकेसी पर फोकस करता था।

अपने शुरुआती सालों में, मुस्लिम ब्रदरहुड या इजिप्शियन मुस्लिम ब्रदरहुड ने मिस्र में गरीब और अनपढ़ लोगों के लिए स्कूल, हॉस्पिटल और मस्जिदें बनाकर मदद की, साथ ही सेक्युलरिज्म और इंपीरियलिज्म के खिलाफ इस्लाम और ‘तौहीद’ (अल्लाह की एकता और सबसे बड़ी ताकत) का प्रचार भी किया। मुस्लिम ब्रदरहुड का मोटो यह साफ करता है कि, भले ही शुरू में इसका संबंध हिंसा से न रहा हो, ‘जिहाद’ हमेशा से इसका तरीका रहा है।

ब्रदरहुड का स्लोगन है, “अल्लाह हमारा मकसद है; पैगंबर हमारे लीडर हैं; कुरान हमारा कानून है; जिहाद हमारा रास्ता है; अल्लाह की राह में मरना हमारी सबसे बड़ी उम्मीद है।”

1930 के दशक तक, इजिप्शियन मुस्लिम ब्रदरहुड के हजारों मेंबर बन गए थे और वह पॉलिटिक्स में भी आ गया था। लेकिन, इस इस्लामी संगठन का एक पैरामिलिट्री विंग था जिसे सीक्रेट अपैरेटस या अल-निजाम अल-खास कहा जाता था। इस विंग ने राजनीतिक हत्याएँ और जिहादी हिंसा की। 1948 में, सीक्रेट अपैरेटस के सदस्यों ने इस्लामी संगठन पर बैन लगाने पर प्राइम मिनिस्टर महमूद अल नोकराशी पाशा की हत्या कर दी। 1949 में, पाशा की हत्या का बदला लेने के लिए मिस्र की सीक्रेट पुलिस ने अल-बन्ना की हत्या कर दी।

मिस्र के मुस्लिम ब्रदरहुड के सीक्रेट अपैरेटस के सदस्य भारी फिजिकल और मिलिट्री ट्रेनिंग लेते थे। उन्हें हथियार चलाने और अंडरग्राउंड ऑपरेशन करने की ट्रेनिंग दी गई थी। धोखे और सीक्रेसी (तक़्क़िया) पर ज़ोर देते हुए, अपैरेटस से जुड़े जिहादी पॉलिटिकल पार्टियों, सेनाओं, इंटेलिजेंस, मीडिया, एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन और यहां तक ​​कि NGOs में भी घुसपैठ करते हैं और उन्हें तोड़-फोड़ते हैं।

हालांकि UK जैसे गैर-मुस्लिम देशों में, हिंसा मुस्लिम ब्रदरहुड का पसंदीदा तरीका नहीं हो सकता है। वे इस्लामिक जिहादी एजेंडा को आगे बढ़ाने के लिए मीडिया, राजनीति, एजुकेशनल इंस्टीट्यूशन और चैरिटी का इस्तेमाल करते हैं।

2012 में, EMB ने चुनाव जीता और मोहम्मद मुर्सी को प्रेसिडेंट चुना। हालांकि, 2013 में, उस समय के जनरल अब्देल फत्ताह अल-सिसी के नेतृत्व में एक मिलिट्री तख्तापलट ने मुर्सी को हटा दिया। इस इस्लामी संगठन पर बैन लगा दिया गया और मिस्र में इसे आतंकवादी संगठन घोषित कर दिया गया।

मिडिल ईस्ट और नॉर्थ अफ्रीका के कई देश की सरकारें मुस्लिम ब्रदरहुड को पॉलिटिकल स्टेबिलिटी के लिए खतरा मानती हैं। हाल ही में, टेक्सास के गवर्नर ग्रेग एबॉट ने घोषणा की कि काउंसिल ऑन अमेरिकन-इस्लामिक रिलेशंस समेत मुस्लिम ब्रदरहुड को ‘विदेशी आतंकवादी और ट्रांसनेशनल क्रिमिनल संगठन’ माना जाएगा।

खास तौर पर, UAE, सऊदी अरब, मिस्र, बहरीन और रूस पहले ही ब्रदरहुड को आतंकवादी संगठन घोषित कर चुके हैं। जॉर्डन ने अप्रैल 2025 में इस ग्रुप पर बैन लगा दिया था, जब उन्होंने इस मूवमेंट से जुड़े लोगों को गिरफ्तार किया था, जिन पर रॉकेट और ड्रोन का इस्तेमाल करके हमलों की साज़िश रचने का आरोप था। जनवरी 2026 में, UAE ने यूनाइटेड किंगडम (UK) में पढ़ाई करने में दिलचस्पी रखने वाले अपने नागरिकों के लिए फंडिंग बंद कर दी, क्योंकि UK ने इस इस्लामिक आतंकवादी संगठन पर बैन लगाने से इनकार कर दिया था।

मिस्र के मुस्लिम ब्रदरहुड ने 1940 के दशक में मौलाना अबुल अला मौदूदी की जमात-ए-इस्लामी को भी प्रेरित किया था। स्टूडेंट इस्लामिक मूवमेंट ऑफ़ इंडिया (SIMI) और पॉपुलर फ्रंट ऑफ़ इंडिया (PFI) जैसे बैन इस्लामिक आतंकी संगठन, जो हिंदुओं के खिलाफ जिहादी हमलों में शामिल रहे हैं और भारत को इस्लामिक देश बनाने की योजना पर काम कर रहे हैं, मुस्लिम ब्रदरहुड की टैक्टिक्स से प्रेरणा लेते हैं।

इजिप्शियन मुस्लिम ब्रदरहुड पर कार्रवाई करने से पहले, US ने EMB के कई हिंसक ग्रुप को FTOs और SDGTs के तौर पर डिफाइन किया था, जिसमें हमास भी शामिल है।

US ने पहले भी मुस्लिम ब्रदरहुड के साथ उनके लिंक्स के लिए कई इस्लामिक संगठनों को रडार पर लिया है। इनमें इजिप्शियन इस्लामिक जिहाद (EIJ), गामा अल-इस्लामिया (IG), फ़िलिस्तीनी इस्लामिक जिहाद (PIJ), हमास, हरकत सवाद मिस्र (HASM), और लिवा अल-थौरा शामिल हैं। मुस्लिम ब्रदरहुड के ये सभी हिंसक जिहादी ग्रुप 1970 और 1980 के दशक में बने थे।

इजिप्शियन इस्लामिक जिहाद ने इजिप्शियन सरकार के बड़े अधिकारियों पर हिंसक हमले किए और 1981 में इजिप्शियन प्रेसिडेंट अनवर सादात की हत्या के लिए जिम्मेदार था। जून 2001 में अल-कायदा में पूरी तरह से मिलने से पहले अयमान अल-ज़वाहिरी इस संगठन को लीड करता था। US ने 1997 में EIJ को FTO और 2001 में SDGT नाम दिया था।

गामा अल-इस्लामिया (IG) के प्रमुख उमर अब्द अल रहमान को वर्ल्ड ट्रेड सेंटर पर बम धमाके में उनकी भूमिका के लिए अमेरिका में उम्रकैद की सजा हुई। ये संगठन मिस्र को एक इस्लामिक देश बनाना चाहता था।

फिलिस्तीनी इस्लामिक जिहाद (PIJ) इजरायल को खत्म करने के लिए काम करता है और इजरायल पर कई हमलों में शामिल रहा है, जिसमें 7 अक्टूबर 2023 को हमास के नेतृत्व में इजरायली लोगों का नरसंहार भी शामिल है। इस मुस्लिम ब्रदरहुड प्रॉक्सी को US ने 1997 में FTO और 2001 में SDGT नाम दिया था।

फिलिस्तीनी इस्लामिक टेरर ग्रुप हमास के भी मुस्लिम ब्रदरहुड से संबंध हैं, और इसे 1997 में FTO और 2001 में SDGT नाम दिया गया था। 1988 में अपनी स्थापना के बाद से इजरायल पर अनगिनत हमले किए। हमास ने इजरायल में 7 अक्टूबर का नरसंहार किया, जिसमें 1200 से ज़्यादा लोगों की बेरहमी से हत्या कर दी गई और 240 से ज़्यादा लोगों को किडनैप कर लिया गया।

OpIndia ने पहले फ़िलिस्तीनी इस्लामिक टेरर ग्रुप हमास के बारे में रिपोर्ट किया था, जिसने अपने 1988 के कवनेंट या चार्टर में इजरायल को ‘वक्फ’ प्रॉपर्टी बताया था और यहूदियों के खिलाफ तब तक जिहाद जारी रखने की कसम खाई थी, जब तक आखिरी यहूदी भी मारा नहीं जाता। हमास को मुस्लिम ब्रदरहुड का सपोर्ट है और 7 अक्टूबर, 2023 के नरसंहार के बाद वह भी इजरायली नागरिकों और सेना के खिलाफ एयरस्ट्राइक करने में फिलिस्तीनी आतंकी ग्रुप के साथ शामिल हो गया।

हमास ने 2017 में मिस्र के साथ अपने रिश्ते सुधारने के लिए मुस्लिम ब्रदरहुड से दूरी बनाने की कोशिश की। हमास ने ज़ायोनिस्ट और यहूदियों में फ़र्क करते हुए यहूदियों से लड़ने के अपने रुख में नरमी बरती। लेकिन 7 अक्टूबर 2023 को यहूदियों की अंधाधुंध हत्या ने हमास के दोगलेपन और यहूदियों के लिए नफ़रत को सामने ला दिया।

2015 में बना, हरकत सवाद मिस्र (HASM) मुस्लिम ब्रदरहुड का एक और मिस्र का हिस्सा है, जो मिस्र की सरकार को उखाड़ फेंकना चाहता है। 2016 में, HASM ने मिस्र के मुफ़्ती अली गोमा की हत्या की कोशिश की। इसके अगले साल HASM ने मिस्र की नेशनल सिक्योरिटी एजेंसी के ऑफिसर इब्राहिम अजाजी की हत्या की कोशिश की। 2019 में, HASM जिहादियों ने काहिरा के एक हॉस्पिटल के पास एक कार-बम धमाका किया, जिसमें 20 लोग मारे गए। US ने 2018 में HASM को SDGT और 2021 में FTO घोषित किया।

2018 में SDGT घोषित लिवा अल-थौरा EMB की एक और बड़ी शाखा है। इस संगठन ने अक्टूबर 2016 में मिस्र की सेना के नौवें आर्मर्ड डिवीज़न के कमांडर ब्रिगेडियर जनरल अदेल रागाई की काहिरा में उनके घर के बाहर हत्या कर दी थी। 2017 में, लिवा अल-थौरा ने मिस्र के शहर तांता में एक पुलिस ट्रेनिंग सेंटर पर बमबारी की थी।

मुस्लिम ब्रदरहुड के मिस्र, जॉर्डन और लेबनानी चैप्टर को FTO और SDGT घोषित किए जाने के नतीजे

US द्वारा मुस्लिम ब्रदरहुड के जॉर्डन, मिस्र और लेबनानी चैप्टर को FTO और SDGT घोषित किए जाने की वजह से अब US में या US के कब्ज़े वाली जगहों पर इन संगठनों की सभी प्रॉपर्टी और प्रॉपर्टी में हिस्सेदारी ब्लॉक कर दी जाएगी। इसके लोग हिरासत में लिए जाएँगे।

इसके अलावा, ऐसी कोई भी संपत्ति,जिसका मालिकाना हक, सीधे या अप्रत्यक्ष रूप से, अकेले या कुल मिलाकर, एक या ज़्यादा ब्लॉक किए गए लोगों के पास 50 परसेंट या उससे ज़्यादा है, उसे भी ब्लॉक कर दिया जाएगा।

        (13 जनवरी 2026 को US ट्रेजरी डिपार्टमेंट की वेबसाइट पर पब्लिश हुई प्रेस रिलीज़ से लिए गए ज़रूरी हिस्से।)

ब्लॉक किए गए इस्लामिक संगठनों से किसी तरह का आर्थिक फायदा पहुँचाने वाले लोगों या संगठनों पर भी कार्रवाई की जाएगी।

US ट्रेजरी डिपार्टमेंट ने कहा, “किसी डेज़िग्नेटेड या ब्लॉक किए गए व्यक्ति द्वारा, उसे, या उसके फ़ायदे के लिए कोई भी कंट्रीब्यूशन या फ़ंड, सामान, या सर्विस देना, या ऐसे किसी भी व्यक्ति से कोई कंट्रीब्यूशन या फ़ंड, सामान, या सर्विस लेना अपराध है।” उन्होंने कहा कि डेज़िग्नेटेड लोगों और ग्रुप के साथ जुड़ने पर हिस्सा लेने वाले विदेशी फाइनेंशियल इंस्टीट्यूशन्स को भी सेकेंडरी सजा मिल सकती है।

दोहा में सभी इस्लामी देशों की मीटिंग में इजराइल के खिलाफ NATO की तर्ज पर Islamic NATO नहीं बन पाया; अध्यक्ष बनने के नाम पर सभी पीछे हटे


भारत में मुस्लिम कट्टरपंथी मुसलमानों को इजराइल के खिलाफ भड़काते रहते हैं। कोई फिलिस्तीन का थैला लेकर, कोई हमास और गाज़ा के लिए घालियाली आंसू बहा गुमराह करते रहते हैं। भारत का मुसलमान इतना ज्यादा डरा हुआ है कि किसी में इनसे यह पूछने की हिम्मत नहीं कि इतने मुस्लिम मुल्क हैं कोई फिलिस्तीनियों को अपने-अपने मुल्क में क्यों रख लेते? बस कट्टरपंथियों की तरह victim card खेल खुद भी पागल बनने के साथ दूसरों को भी पागल बनाने की कोशिश में लगे हुए हैं। आखिर आतंकियों को कोई अपने मुल्क में रख क्यों अपने मुल्क का माहौल ख़राब करना चाहेगा? ध्यान हो, जिया-उल-हक़ के समय पाकिस्तान ने 30,000 फिलिस्तीनियों को रख तो लिया लेकिन फिलिस्तीन का माहौल शांत होने पर जब उन्हें वापस अपने मुल्क जाने को कहा कोई तैयार नहीं हुआ, फिर जिया ने जिस तरह उनको बन्दूक की नोक पर धक्का दिया किसी से नहीं छुपा। 

इजराइल पर कीजड़ फेंकना आसान है। आतंकवाद के खिलाफ कोई बोलने को तैयार नहीं, क्यों? शायद जिया द्वारा फिलिस्तीनियों को पनाह देने से पाकिस्तान में आतंकवाद के बीज फ़ैल गए थे। आखिर हमास कौन है? सभी मुस्लिम अच्छी तरह जानते हैं।

            

कतर की राजधानी दोहा में सोमवार (15 सितंबर 2025) को 60 मुस्लिम देशों की इमरजेंसी मीटिंग हुई है बैठक में ऑर्गेनाजेशन ऑफ इस्लामिक कर्पोरेशन (OIC) के सदस्य देश और अरब मुल्क शामिल हुए थे ओआईसी की यह इमरजेंसी बैठक कतर में इजरायली हमले को लेकर की गई है, जिसमें सभी देशों से अपील की गई कि इजरायल के खिलाफ कानूनी और प्रभावी कदम उठाए जाएं साथ ही इजरायल के साथ अपने रिश्तों पर भी एक बार फिर से गौर करें

पाकिस्तानी अखबार द डॉन की रिपोर्ट के अनुसार पिछले हफ्ते इजरायल ने कतर में हमास के नेताओ को निशाना बनाकर स्ट्राइक की थी बैठक में कहा गया कि ये अधिकारी गाजा सीजफायर प्रस्ताव पर चर्चा कर रहे थे, लेकिन इजरायल ने यह हमला करके सभी प्रयासों को विफल कर दिया है इसलिए उसके खिलाफ सख्त कदम उठाया जाना चाहिए हमास का कहना है कि इजरायल के हमले में छह लोग मारे गए हैं हालांकि, हमास के टॉप अधिकारी बच गए हैं

इजरायल के खिलाफ OIC का जॉइंट स्टेटमेंट
ओआईसी देशों ने जॉइंट स्टेटमेंट में अपील की है कि सभी को इजरायल के खिलाफ कानूनी और सख्त कदम उठाने की जरूरत है, साथ ही सभी मुल्कों को उसके साथ अपने डिप्लोमेटिक और आर्थिक रिश्तों पर भी गौर करना चाहिए क्योंकि वह करीब दो साल से फिलिस्तीनी लोगों पर हमले कर रहा है
 संयुक्त राष्ट्र में इजरायल की सदस्यता खत्म करवाने के लिए प्रयास करने की भी इन देशों ने अपील की है बैठक का मकसद इजरायल पर दबाव बनाना था ताकि गाजा में जारी उसके हमलों पर लगाम लगाई जा सके

बैठक में 60 देशों के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति शामिल हुए, लेकिन संयुक्त अरब अमीरातबहरीन और मोरक्को ने अपने प्रतिनिधियों को बैठक के लिए भेजा था इन तीनों देशों ने पांच साल पहले अब्राहम समझौते के तहत इजरायल क मान्यता दी थी इनके अलावा, उसे मान्यता देने वाले देशों में कतर, मिस्त्र और जॉर्डन भी शामिल हैं

मुस्लिम देशों ने की इजरायल की यूएन सदस्यता खत्म करने की अपील
कतर के अमीर शेख तमीम बिन हमाद अल थानी ने कहा कि सीजफायर पर बात कर रहे हमास के वार्ताकरों पर हमला करके इजरायल ने साबित कर दिया कि उसका इरादा सीजफायर का नहीं है
 अमीर ने अरब देशों को आगाह करते हुए यह भी कहा कि इजरायल ने कतर में हमास अधिकारियों पर हमला करके गाजा पर बातचीत को पटरी से उतारने की कोशिश की है और इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू अरब को इजरायली क्षेत्र में बदलने का सपना देख रहे हैं, जो एक खतरनाक बात है

बैठक में 60 देशों के प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति शामिल हुए, लेकिन संयुक्त अरब अमीरातबहरीन और मोरक्को ने अपने प्रतिनिधियों को बैठक के लिए भेजा था इन तीनों देशों ने पांच साल पहले अब्राहम समझौते के तहत इजरायल क मान्यता दी थी इनके अलावा, उसे मान्यता देने वाले देशों में कतर, मिस्त्र और जॉर्डन भी शामिल हैं

मुस्लिम देशों ने की इजरायल की यूएन सदस्यता खत्म करने की अपील
कतर के अमीर शेख तमीम बिन हमाद अल थानी ने कहा कि सीजफायर पर बात कर रहे हमास के वार्ताकरों पर हमला करके इजरायल ने साबित कर दिया कि उसका इरादा सीजफायर का नहीं है
 अमीर ने अरब देशों को आगाह करते हुए यह भी कहा कि इजरायल ने कतर में हमास अधिकारियों पर हमला करके गाजा पर बातचीत को पटरी से उतारने की कोशिश की है और इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू अरब को इजरायली क्षेत्र में बदलने का सपना देख रहे हैं, जो एक खतरनाक बात है

बाद में शेख तमीम बिन हमाद अल थानी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर भी पोस्ट किया और कहा, 'दोहा में आज हुई इमरजेंसी अरब-इस्लामिक समिट हमारे क्षेत्र में इजरायल के आतंकवाद के खिलाफ कठोर संदेश है और इसके परिणाम हमारे सामूहिक प्रयासों को तीव्र करने, हमारे देशों की स्थिति में समन्वय स्थापित करने और हमारे रुख और आवाज को एकजुट करने में प्रभावी रूप से योगदान देंगे'

बैठक में कौन-कौन हुए शामिल?
अरब-इस्लामिक समिट में सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान, पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ, ईरान के राष्ट्रपति मौसाद पेजेशकियान, इराकी पीएम मोहम्मद सिया अल-सुदानीतुर्किए के राष्ट्रपति रेसेप तैय्यप एर्दोगन और फिलिस्तीन के राष्ट्रपति मोहम्मद अब्बास भी शामिल हुए थे

ईरानी राष्ट्रपति बोले- कल को किसी और मुस्लिम देश के साथ भी ऐसा कर सकता है इजरायल
ईरानी राष्ट्रपति मौसाद पेजेशकियान ने कहा कि ऐसी स्थिति कल अरब या किसी और इस्लामिक देश के सामने भी आ सकती है, जैसा जुलाई महीने में ईरान के साथ हुआ. जब इजरायल के साथ करीब 12 दिनों तक उसकी जंग चली थी
 ईरान पहले भी मुस्लिम देशों से इजरायल के साथ सभी रिश्ते खत्म करने की अपील कर चुका है

सभी इस्लामिक देश अपनी पीठ और कपड़े झाड़ते हुए कहे कि देखो इस बार तो हमने इजरायल की पिटाई बर्दाश्त कर लिया लेकिन अगली बार हम इजरायल की पिटाई बर्दाश्त नहीं करेंगे

NATO की तर्ज पर Islamic NATO नहीं बन पाया
चर्चा है, हालाँकि इस समाचार की पुष्टि नहीं हुई है, कि इस बैठक में इजिप्ट ने प्रस्ताव रखा कि हम नाटो की तर्ज पर एक इस्लामी नाटो बनाएं और बारी-बारी से सभी मुस्लिम देश उसके अध्यक्षता करें
फिर सऊदी अरब ने इजिप्ट के राष्ट्रपति से कहा कि ठीक है आप इसके पहले अध्यक्ष बन जाइए
तब इजिप्ट के राष्ट्रपति ने कहा कि इस्लामी नाटो का पहला अध्यक्ष बनने का तो आपको मौका मिलना चाहिए क्योंकि हमारे पवित्र मक्का और मदीना आपके देश में है
फिर सऊदी अरब ने कहा नहीं भाई पहला मौका इराक को मिलना चाहिए क्योंकि शिया संप्रदाय का सबसे पवित्र करबला इराक में है
इराक ने कहा नहीं भाई पहला मौका तो पाकिस्तान को मिलना चाहिए क्योंकि सभी इस्लामी देशों में एकमात्र न्यूक्लियर हथियार पाकिस्तान के पास है
फिर पाकिस्तान ने कहा नहीं भाई पहला मौका तो तुर्की को मिलना चाहिए क्योंकि कभी पूरे इस्लामी उम्मत का नेतृत्व तुर्की के खलीफा ने किया था
तुर्की ने कहा नहीं भाई मैं इसका पहला अध्यक्ष नहीं बनूंगा क्योंकि मैं पहले से अमेरिका के नेतृत्व के नाटो का मेंबर हूं
लेकिन नाटो का पहला अध्यक्ष जॉर्डन को बनना चाहिए
फिर जॉर्डन ने कहा नहीं भाई मेरी सीमाएं इजराइल से लगते हैं और 1976 में मैं अपने देश की 10% जमीन पहले ही इजरायल के हाथों गंवा चुका हूं तब किसी भी इस्लामिक देश ने मेरी मदद नहीं की
यानी कि इजरायल की खौफ और दहशत देखिए इनको मालूम है कि इस वक्त इजरायल के सर पर खून सवार है और जो कोई देश मुस्लिम नाटो का पहला अध्यक्ष बनेगा सबसे पहले इसराइल उसको फोड़ेगा
तो इसीलिए कोई अध्यक्ष बनने को तैयार नहीं हुआ
आप लोगों को बचपन की कहानी याद होगी जब किसी लड़के की खूब पिटाई होती थी बाद में वह कहता था अच्छा इस बार तो मैं बर्दाश्त कर ले रहा हूं लेकिन अगली बार मारोगे तो मैं बर्दाश्त नहीं करूंगा
अगली बार फिर कुटाई होती थी अपने कपड़े झाड़ कर कहता था अच्छा इस बार तो बर्दाश्त कर लेता हूं अगली बार कुटोगे तो बर्दाश्त नहीं करूंगा
यही हाल 57 मुस्लिम देशों का है इजराइल 1948 से लगातार इनको कुटता है हर बार यह उठते हैं अपने कपड़ों पर लगी धूल मिट्टी साफ करते हैं और कहते हैं अच्छा इस बार कूट दिए कोई बात नहीं अगली बार अगर कुटोगे तो बर्दाश्त नहीं करेंगे

संविधान, मुकुट, साड़ी… न्याय की देवी का नूतन अवतार: जानिए आँखों पर पट्टी वाली ‘लेडी ऑफ जस्टिस’ कहाँ से आई, CJI चंद्रचूड़ ने क्यों बदलवाई तलवार वाली मूर्ति

                                      सुप्रीम कोर्ट में न्याय की देवी का बदला रूप (साभार: ऑपइंडिया)
भारत में ‘न्याय की देवी’ (Lady of Justice) आँखों पर बँधी पट्टी हटा दी गई है। उनके हाथ में तलवार की जगह संविधान की प्रति दे दी गई है। गाउन को हटाकर साड़़ी पहना दिया गया है। सिर पर मुकुट और गले में हार आदि से अलंकृत कर दिया गया है। इस प्रतिमा को न्याय की यूनानी देवी से न्याय की भारतीय देवी का अवतार कहा जा सकता है।

भारत के मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने न्याय की देवी की एक नई प्रतिमा का अनावरण किया है। आँखों पर पट्टी होने का अर्थ कानून का अंधा होने का संकेत देता था। वहीं, तलवार सजा को प्रदर्शित करता था। अब परिवर्तनकारी प्रतीक संवैधानिक मूल्यों और कानून के समक्ष समानता के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

सुप्रीम कोर्ट के जजों की लाइब्रेरी में लगाई गई नई मूर्ति को CJI डीवाई चंद्रचूड़ ने ऑर्डर देकर बनवाया है। इसका उद्देश्य यह संदेश देना है कि देश में कानून अँधा नहीं है और यह सजा का प्रतीक नहीं है। मूर्ति के दाएँ हाथ में तराजू को बनाए रखा है, जो दोनों पक्षों के तथ्यों और तर्कों को देखने और सुनने के बाद न्याय करने का प्रतीक है।

यह बदलाव उपनिवेश के निशानियों से आगे बढ़ने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। हाल ही में भारत सरकार ने ब्रिटिश कानून इंडियन पीनल कोड (IPC) की जगह भारतीय न्याय संहिता (BNS) कानून लागू किया था। लेडी ऑफ जस्टिस की मूर्ति में यह बदलाव भी इसी कड़ी के तहत उठाया कदम माना जा रहा है।

                                   मिस्र की न्याय की देवी मात (साभार: egyptianmuseum/britannica)

एक न्यायिक अधिकारी ने बताया, “न्याय की देवी का रूप हमारे संवैधानिक प्रतिबद्धताओं को प्रतिबिंबित करने के लिए बदलना आवश्यक था। तलवार के बजाय संविधान थामने से यह संदेश जाता है कि न्याय लोकतांत्रिक मूल्यों और मौलिक अधिकारों के अनुरूप होना चाहिए।”

कई सभ्यताओं से जुड़ी है लेडी ऑफ जस्टिस की कहानी

न्याय की देवी का इतिहास बहुत पुराना है। इसकी सबसे शुरुआती मूर्ति प्राचीन मिस्र में पाई जाती है। कहा जाता है कि यह देवी मात (Ma’at) की थी। मात सत्य, व्यवस्था और संतुलन का प्रतीक थीं। उन्हें अक्सर एक पंख पकड़े हुए दिखाया जाता था, जिसका उपयोग मृत्यु के बाद आत्मा के न्याय के लिए किया जाता था।
                                        ग्रीक न्याय की देवी थेमिस (साभार: ब्रिटानिका)
बाद में यूनानी और रोमन सभ्यताओं ने अपनी न्याय की देवी की मूर्ति बनाई। ग्रीक देवी थेमिस कानून और व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करती थीं। उनकी बेटी डाइक, जिन्हें एस्ट्राया के नाम से भी जाना जाता है, न्याय और नैतिक व्यवस्था का प्रतीक थीं। थेमिस को तराजू पकड़े हुए दिखाया गया था। इन्हें ही न्याय की देवी का शुरुआती रूप माना जाता है।
रोमन की पौराणिक कथाओं में थेमिस को जस्टिशिया के साथ जोड़ा गया था, जो रोमन साम्राज्य में न्याय की देवी थीं। जस्टिशिया की छवि आज की न्याय व्यवस्था को दिखाने के लिए इस्तेमाल की जाती है। रोमन सम्राट टिबेरियस ने रोम में जस्टीशिया का एक मंदिर बनवाया था। जस्टीशिया न्याय के उस गुण का प्रतीक बन गईं। इनके साथ हर सम्राट खुद को जोड़ता था।
                         रोमन साम्राज्य में न्याय की देवी जस्टिशिया (साभार: ThoughtCo)
आगे चलकर रोमन सम्राट वेस्पाशियन ने जस्टिशिया की छवि के साथ सिक्के बनाए। इन सिक्कों में वह एक सिंहासन पर बैठी हैं, जिसे ‘जस्टीशिया ऑगस्टा’ कहा जाता था। उनके बाद कई सम्राटों ने खुद को न्याय का संरक्षक घोषित करने के लिए इस देवी की छवि का उपयोग किया। दुनिया के कई देशों में न्याय की देवी की यह मूर्ति देखी जा सकती है।
यूनानी सभ्यता से न्याय की देवी यूरोप और अमेरिका पहुँची। औपनिवेशिक काल में ब्रिटेन के एक अंग्रेज न्यायिक अधिकारी 17वीं सदी में इन्हें भारत लेकर आया था। ब्रिटिश काल में 18वीं शताब्दी के दौरान न्याय की देवी की मूर्ति का सार्वजनिक इस्तेमाल किया जाने लगा। भारत की आजादी के बाद न्याय की देवी को उसके प्रतीकों के साथ भारतीय लोकतंत्र में स्वीकार किया गया।

जब 6 दिन में इजरायल ने बदल कर रख दिया था पूरे मिडिल-ईस्ट का नक्शा: एक साथ इजिप्ट, सीरिया और जॉर्डन को चटाई थी धूल, 20000 मौतों से सन्न रह गया था अरब जगत

6 दिन के युद्ध में इजरायल ने इजिप्ट, सीरिया और जॉर्डन - तीनों के इलाकों पर स्थापित किया नियंत्रण
इजरायल आज चौतरफा हमला झेल रहा है। जहाँ एक तरफ फिलिस्तीन के हमास आतंकियों ने जल, थल और नभ से यहूदी देश में घुसपैठ कर नरसंहार शुरू कर दिया, वहीं लेबनान से आतंकी संगठन हिज़्बुल्ला ने रॉक्स दागे। हमास ने 5000 रॉकेट दाग कर इस युद्ध की शुरुआत की, जिसके बाद इजरायल ने अपने नागरिकों की रक्षा के लिए कुछ भी करने की बात कहते हुए तगड़ी जवाबी कार्रवाई की। इजरायल एक छोटा सा देश है, यहूदी भी अल्पसंख्यक हैं, ऐसे में सवाल उठता है कि इस्लामी मुल्कों को ये इतना क्यों खटकता है?

इस सवाल का जवाब तलाशने के लिए हमें थोड़ा इतिहास में जाना होगा। इस्लामी मुल्कों से घिरे इस देश ने न सिर्फ तकनीक के मामले में खुद को दुनिया के सबसे उन्नत देशों में शुमार किया है, बल्कि सामरिक सुरक्षा के मामले में भी खुद को काफी सुदृढ़ किया है। इसकी एंटी-मिसाइल तकनीक ‘आयरन डोम’ की भी काफी चर्चा होती है, जो कई रॉकेट हमलों को एक साथ नेस्तनाबूत करने की क्षमता रखता है। हालाँकि, इस बार इजरायल के लिए कड़ी परीक्षा की घड़ी है क्योंकि इसके 300 से अधिक नागरिक मारे जा चुके हैं।

इजरायल ने इजिप्ट, सीरिया और जॉर्डन को हराया

आज जो इजरायल की सीमाएँ हैं, उसका इतिहास बहुत हद तक 1967 में हुए अरब-इजरायल युद्ध तक जाता है। तब इजरायल ने एक साथ सीरिया, मिस्र और जॉर्डन को हरा कर खुद को स्थापित किया था। अरब ने इस नए देश को उजाड़ने की पूरी कोशिश की, लेकिन वो नाकाम रहा। इस युद्ध को ‘6 Day War’ के नाम से जाना जाता है, क्योंकि ये 6 दिनों तक चला था। ये 5 से 10 जून, 1967 तक चला था। इससे पहले 1948 में उनके बीच युद्ध हुआ था, जो अगले ही साल युद्धविराम समझौतों के बाद खत्म हो गया था।
लेकिन, तनाव बरकरार रहा था। इसके बाद आता है 1956 का समय, जब सीनाई प्रयद्वीप और अरब के अकाबा की खाड़ी को जोड़ने वाले समुद्री रास्ते (Straights Of Tiran) को लेकर जंग छिड़ गई। भूमध्य सागर और लाल सागर के बीच स्थित इस संकरे समुद्री रास्ते में इजिप्ट ने इजरायली जहाजों को रोक दिया था, जिसके बाद ये युद्ध हुआ। इसके बाद इजरायली जहाजों को फिर से अनुमति मिली, साथ ही UN इमरजेंसी फ़ोर्स की स्थापना हुई। इस तरह से अरब और इजरायल का तनाव नया नहीं है।
1967 के युद्ध में इजरायल ने सबसे अपने अपनी वायुसेना के माध्यम से इजिप्ट पर एयर स्ट्राइक किया, उसके बाद थल सेना के माध्यम से आक्रमण किया। इजरायल ने न सिर्फ सीनाई प्रयद्वीप पर अपना नियंत्रण स्थापित किया, बल्कि गाजा पट्टी को भी अपने कब्जे में ले लिया। पहले इन दोनों पर इजिप्ट का कब्ज़ा था। इतना ही नहीं, इजरायल ने जॉर्डन से वेस्ट बैंक और ईस्ट जेरुसलम भी ले लिया। साथ ही सीरिया से पहाड़ी क्षेत्र गोलन हाइट्स का नियंत्रण भी इजरायल की सेना के पास चला गया।
इस तरह इस युद्ध में इन तीनों इस्लामी मुल्कों को बड़ी भौगोलिक क्षति पहुँचा कर इजरायल ने एक तरह से पूरे मिडिल-ईस्ट का नक्शा बदल दिया। जब तक UN ने समझौता कराया, इजरायल का काम हो चुका था। 1948 में पहले अरब-इजरायल युद्ध के दौरान इस छोटे से यहूदी देश को मिटाने की जो कोशिश शुरू हुई थी, वो आज भी जारी है। वहीं 1956 वाले युद्ध को ‘Suez Crisis’ के नाम से जाना जाता है। तब स्वेज़ नहर को मिस्र के तत्कालीन राष्ट्रपति जमाल अब्देल नसर ने इस नहर का संचालन करने वाली ब्रिटिश-फ्रेंच स्वामित्व वाली कंपनी का राष्ट्रीयकरण कर दिया था।
उसके बाद इजरायल ने गाजा पट्टी के माध्यम से हमला बोला, पीछे से UK और फ्रांस भी पहुँचे। इजरायल के जहाज ‘स्ट्रेट्स ऑफ़ तिरान’ के माध्यम से आने-जाने लगे, जिसे इजिप्ट ने पहले रोक रखा था। इजरायल को तभी से एहसास है कि उसके अस्तित्व पर बहुत बड़ा खतरा मँडरा रहा है। जहाँ तक 6 दिन वाले युद्ध का सवाल है, उसके पीछे भी कई कारण हैं। इनमें मुख्य है – फिलिस्तीन के आतंकियों को सीरिया ने संरक्षण देना शुरू कर दिया था और उसके माध्यम से इजरायल में गुरिल्ला युद्ध को अंजाम देता था।
अप्रैल 1967 में इजरायल और सीरिया सीधे आमने-सामने आ गए, जिसमें सीरिया के 6 फाइटर जेट्स तबाह हो गए। इसके बाद सोवियत यूनियन ने इजिप्ट को ख़ुफ़िया सूचना दी कि इजरायल उसकी उत्तरी सीमाओं की तरफ सेना को पूरी तैयारी के साथ भेज रहा है। ये सूचना पुष्ट नहीं थी, लेकिन इजिप्ट एक्शन में आ गया। उसने अपनी फ़ौज को सीनाई पेनिनसुला की तरफ मार्च करने का आदेश दिया। वहाँ से UN की पीसकीपिंग फ़ोर्स को हटा दिया गया।
मई 1967 में एक बार फिर से मिस्र के राष्ट्रपति जमाल अब्देल नसर ने इजरायली जहाजों के लिए तिरान जलडमरूमध्य में आवागमन को रोक दिया। इसी महीने में उन्होंने जॉर्डन की किंग हुसैन के साथ एक रक्षा समझौते पर भी हस्ताक्षर किया। उस समय डेमोक्रेटिक पार्टी के लिंडन बी जॉनसन अमेरिका के राष्ट्रपति हुआ करते थे। उनके नेतृत्व में अमेरिका ने भी तिरान के समुद्री रास्ते को कब्ज़ा मुक्त कराने का अभियान चलाया। ये योजना सफल नहीं हुई और जून 1967 में इजरायल के नेताओं ने स्ट्राइक करने के लिए वोटिंग की।
इसके साथ ही 5 जून को ऑपरेशन भी शुरू हो गया और इजरायली वायुसेना हरकत में आ गई। इजिप्ट के खिलाफ हवाई हमले किए गए, जिसे ‘ऑपरेशन फोकस’ कहा गया। इसके लिए करीब 200 फाइटर जेट्स का इस्तेमाल किया गया जिन्होंने भूमध्य सागर से होकर इजिप्ट पर हमला बोला। जमीन पर ही इजिप्ट की 90% वायुसेना को तबाह कर दिया गया। उसके 18 एयरफील्ड्स बर्बाद कर दिए गए। दिन खत्म होने-होने तक पूरे मिडिल-ईस्ट के आसमान पर इजरायल ही मँडरा रहा था और एक तरह से उसका एकाधिकार आ गया था।
हवाई हमलों के फायदा उठाने हुए उसी दिन गाजा पट्टी और सीनाई प्रायद्वीप में भी इजरायल की जमीनी सेना घुसी। इजिप्ट की सेना बिखर गई और उन्हें भारी क्षति पहुँची। उधर जॉर्डन के पास गलत खबर पहुँच गई कि इजिप्ट जीत रहा है और उसने इजरायल पर बमबारी शुरू कर दी। इसके बाद ईस्ट जेरुसलम और वेस्ट बैंक में घुस कर इजरायली सेना ने तगड़ा पलटवार किया। आखिरकार 7 जून को जेरुसलम पर इजरायल का कब्ज़ा हुआ और वेस्टर्न वॉल (2000 वर्ष प्राचीन यहूदियों के ‘सेकेण्ड टेम्पल’ का अंश) में यहूदी प्रार्थना सभा आयोजित की गई, साथ ही जीत का जश्न भी मनाया गया।
युद्ध का अंतिम चरण इजरायल की उत्तर-पूर्वी सीमा पर लड़ा गया। 9 जून को इजरायल भारी गोलीबारी के बाद सीरिया के गोलन हाइट्स में घुसा। अगले दिन वहाँ उसका नियंत्रण स्थापित हो गया। उसी दिन संयुक्त राष्ट्र ने समझौता करा कर युद्ध विराम करवाया। हालाँकि, तब तक 132 घंटे चले इस युद्ध में 20,000 अरब और 800 इजरायली मारे जा चुके थे। मिस्र के राष्ट्रपति को अपमानजनक तरीके से इस्तीफा देना पड़ा। हालाँकि, समर्थन में हुई रैलियों के बाद वो फिर वापस आ गए थे।
इस हार ने पूरे अरब जगत को सन्न कर दिया था। इससे इजरायल के भीतर एक आत्मविश्वास और वहाँ की जनता में गौरव का संचार हुआ। अगस्त 1967 में सूडान के खार्तूम में अरब नेताओं की मुलाकात हुई। उन्होंने आपस में समझौता किया कि इजरायल को कभी मान्यता नहीं दी जाएगी। इजरायल में गाजा पट्टी के साथ-साथ करीब 10 लाख फिलिस्तीनी भी आ गए थे, जिनमें से कई भाग खड़े हुए। इजरायल ने 1982 में सीनाई प्रायद्वीप और 2005 में गाजा पट्टी शांति समझौते के तहत लौटा दी, लेकिन गोलन हाइट्स पर उसका नियंत्रण बना रहा।

1967 का इजरायल-अरब युद्ध और उसके पीछे की कहानी

यहूदी वो समाज है जिसके 60 लाख लोगों को द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान नाज़ी जर्मनी के हिटलर ने मरवा दिया था, उसके बाद भी ये समाज उठ खड़ा हुआ। इसे खत्म करने की कोशिशें आज भी जारी हैं। 1948 के युद्ध में जमाल अब्देल नसर की उम्र 30 साल थी और वो तब मेजर हुआ करते थे। इजरायल की जीत के बावजूद फल्लुजा पॉकेट (गाजा से 30 किलोमीटर दूर स्थित एक गाँव) में इजिप्ट की फ़ोर्स ने सरेंडर करने से इनकार कर दिया था।
पहले अरब-इजरायल युद्ध के नायक थे इजरायल के दक्षिणी फ्रंट पर ऑपरेशन को अंजाम दे रहे इटझाक राबिन। 1948 के युद्ध को आज भी ‘अल-नकबा’ यानी बड़ी तबाही के रूप में जाना जाता है, क्योंकि तब भी साढ़े 7 लाख फिलिस्तीनियों को इजरायल के नियंत्रण से भागना पड़ा था। यही वो युद्ध था जिसके कारण सेना ने सत्ताओं पर कब्ज़ा करना शुरू कर दिया। सीरिया में भी कई बार मिलिट्री ने सत्ता पर कब्ज़ा किया। 1948 के युद्ध के 4 साल बाद इजिप्ट में भी नसर ने किंग को तख़्त से उतार कर सत्ता कब्ज़ा ली।
वहीं इजरायल में राबिन 1967 में सेनाध्यक्ष बने। दोनों तभी से सुलग रहे थे। ये वो समय था, जब सोवियत यूनियन इजिप्ट की मदद किया करता था, उसकी वायुसेना को आधुनिक बनाने के लिए तकनीक और हथियार दिए गए। वहीं इजरायल के उस समय भी अमेरिका के साथ संबंध अच्छे तो थे, लेकिन वो फ़्रांस से लड़ाकू विमान और ब्रिटेन से तोप खरीदा करता था। 1967 तक इजरायल ने दुनिया की सबसे ताकतवर सेनाओं में से एक तैयार कर लिया था और परमाणु बम बनाने की ओर अग्रसर था।
भले ही उस समय अरब एकता की बातें चलती थीं, लेकिन जॉर्डन और सऊदी अरब के शासकों में एक असुरक्षा की भावना थी कि जिस तरह इजिप्ट और सीरिया में राजाओं को हटा कर सेना ने सत्ता कब्ज़ा ली है, वैसी क्रांतियाँ वहाँ न होने लगें। जॉर्डन के राजा थे किंग हुसैन, जिनके दादा अब्दुल्ला को जेसुसालमन में अल-अक्सा मस्जिद के बाहर एक कट्टर फिलिस्तीनी ने ही मार डाला था। 1948 में ब्रिटेन से उस क्षेत्र से वापस जाने के दौरान अब्दुल्ला और यहूदी संस्था ‘ज्यूइश एजेंसी’ में जमीन के बँटवारे को लेकर काफी बातचीत हुई थी, बाद में जॉर्डन और इजरायल थोड़े करीब भी आए थे।
1967 के युद्ध के बाद इन अरब देशों में भी उथल-पुथल मची थी। इजिप्ट में हमने देखा कि कैसे राष्ट्रपति का इस्तीफा हुआ, फिर प्रदर्शनों के बाद वो वापस आए। सीरिया में 1970 में वायुसेना कमांडर हाफिज उल असद ने सत्ता कब्ज़ा लिया और राष्ट्रपति बने। उनकी मौत के बाद 2000 में उनके बेटे बशर राष्ट्रपति बने। ये युद्ध इजरायल की रणनीतिक तैयारियों के लिए जाना गया, जहाँ उसने 48 घंटों में ढाई लाख प्रशिक्षित सैनिकों को काम पर लगा दिया।
2 दिनों के भीतर अधिकतर इजरायली सैन्य यूनिफॉर्म में थे। उस दौरान लेवी एशकोल इजरायल के प्रधानमंत्री हुआ करते थे। हालाँकि, उन्हें रक्षा मंत्रालय युद्ध के नायकों में से एक मोशे डायन को सौंपना पड़ा था। 1969 में हार्ट अटैक से उनकी मौत की वजह भी यही चीजें मानी गईं। एक आँख वाले डायन ही थे, जिन्होंने कहा कि पहले युद्ध होगा, राजनीति बाद में देखी जाएगी। 1956 के संघर्ष में अमेरिका ने इजरायल को कब्ज़ाए हुए इलाके लौटाने को कहा था, इसी तरह 1967 में पहली गोली न चलाने की सलाह दी थी। आज अमेरिका उस दौर से ज़्यादा इजरायल के करीब है और खुल कर उसके साथ है। (साभार : अनुपम कुमार सिंह : http://anupamkrsin.wordpress.com)