Showing posts with label found. Show all posts
Showing posts with label found. Show all posts

बाँध में पानी घटते ही बाहर आया सदियों पुराना पांडवकालीन कांबरेश्वर मंदिर, रहस्यमई जलमग्न शिवलिंग है खास पहचान: जानें पुणे में क्यों उमड़े श्रद्धालु और क्या है इतिहास?

                                 सदियों पुराना पांडवकालीन कांबरेश्वर मंदिर (फोटो साभार: Eskal)
महाराष्ट्र के पुणे जिले के भोर तालुका में इन दिनों एक ऐसा दृश्य देखने को मिल रहा है, जिसने लोगों की उत्सुकता बढ़ा दी है। भाटघर बाँध का जलस्तर कम होते ही पानी के भीतर छिपा सदियों पुराना कांबरेश्वर मंदिर एक बार फिर दुनिया के सामने आ गया है। साल के अधिकांश महीनों तक पानी में डूबा रहने वाला यह मंदिर हर वर्ष कुछ समय के लिए ही दिखाई देता है।

यही वजह है कि इसे देखने के लिए श्रद्धालुओं, पर्यटकों, फोटोग्राफरों और इतिहास प्रेमियों की भीड़ उमड़ पड़ती है। यह मंदिर केवल धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं, बल्कि प्राचीन भारतीय स्थापत्य कला, इंजीनियरिंग और इतिहास का जीवंत उदाहरण भी माना जाता है।

पानी में वर्षों तक डूबे रहने के बावजूद इसका मजबूत ढाँचा आज भी लोगों को हैरान कर देता है। मंदिर की रहस्यमयी बनावट, पानी में स्थित शिवलिंग और इससे जुड़ी मान्यताएँ इसे और भी खास बना देती हैं।

कुछ महीने पहले News18 पर एंकर किशोर अजवाणी ने अपने शो आधी हकीकत आधा फ़साना में किसी राज्य में समुद्र में दो शिव मन्दिरों को दिखाया था जो 6 घंटे पानी से बाहर आते हैं और जब एक मन्दिर पानी से बाहर आता तो कुछ दूरी पर दूसरा मन्दिर समुद्र में जलमग्न हो जाता। जलमग्न होने पर मन्दिरों को किसी प्रकार की क्षति नहीं होती। सब भोलेनाथ का चमत्कार है।   

भाटघर बाँध का जलस्तर घटते ही सामने आया मंदिर

पुणे के भोर तालुका में स्थित ब्रिटिशकालीन भाटघर बाँध इन दिनों चर्चा का विषय बना हुआ है। बाँध में पानी का स्तर काफी नीचे पहुँच गया है, जिसके कारण इसके कैचमेंट एरिया में मौजूद कई हिस्से दिखाई देने लगे हैं। इन्हीं में सबसे प्रमुख है कांबरे गाँव का ऐतिहासिक कांबरेश्वर मंदिर।

वेलवंडी नदी पर बने इस मंदिर का अधिकांश हिस्सा हर साल मानसून के बाद पानी में डूब जाता है। जैसे-जैसे बारिश का पानी बढ़ता है, मंदिर पूरी तरह जलमग्न हो जाता है और कई महीनों तक दिखाई नहीं देता। गर्मियों के मौसम में जब बाँध का जलस्तर घटता है, तब धीरे-धीरे मंदिर का शिखर नजर आने लगता है और फिर पूरा मंदिर सामने आ जाता है।

                                                                                                                                 साभार: NDTV

स्थानीय लोगों के अनुसार, मई के आखिर और जून की शुरुआत में यह मंदिर सबसे स्पष्ट रूप से दिखाई देता है। यही समय होता है जब बड़ी संख्या में लोग यहाँ पहुँचते हैं। ग्रामीण हर साल मंदिर की सफाई करते हैं और वर्षों से चली आ रही परंपरा के अनुसार धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। इसके बाद श्रद्धालुओं के लिए मंदिर को खोला जाता है।

अंग्रेजों के बाँध निर्माण के बाद पानी में समा गया मंदिर

कांबरेश्वर मंदिर की कहानी केवल धार्मिक नहीं, बल्कि ऐतिहासिक भी है। बताया जाता है कि वर्ष 1928 में अंग्रेजों ने लॉयड डैम यानी आज के भाटघर बाँध का निर्माण कराया था। बाँध बनने के बाद आसपास का बड़ा क्षेत्र जलमग्न हो गया। कांबरे गाँव को दूसरी जगह बसाना पड़ा, लेकिन मंदिर को वहीं छोड़ दिया गया।

तब से हर वर्ष मानसून के दौरान यह मंदिर पानी में डूब जाता है और गर्मियों में फिर बाहर दिखाई देता है। दशकों से यही क्रम जारी है। समय के साथ यह मंदिर स्थानीय लोगों के लिए केवल पूजा का स्थान नहीं रहा, बल्कि उनकी सांस्कृतिक पहचान और विरासत का प्रतीक बन गया है।

इतिहासकारों का मानना है कि यह मंदिर बेहद प्राचीन है। स्थानीय लोग इसे पांडव काल से जोड़ते हैं और मानते हैं कि इसका निर्माण महाभारत काल में हुआ था। हालाँकि कई इतिहास विशेषज्ञ इसे हेमाडपंती शैली का मंदिर मानते हैं।

मंदिर की बनावट, पत्थरों की संरचना और निर्माण शैली इस बात की ओर इशारा करती है कि इसे मध्यकालीन भारतीय स्थापत्य शैली में तैयार किया गया होगा।

मंदिर की बनावट आज भी इंजीनियरों को करती है हैरान

कांबरेश्वर मंदिर की सबसे बड़ी खासियत इसकी मजबूती है। वर्षों तक पानी में डूबे रहने के बावजूद यह मंदिर आज भी मजबूती से खड़ा है। लगातार पानी की लहरों, गाद और मौसम के प्रभाव के बाद भी इसकी मुख्य संरचना सुरक्षित दिखाई देती है।

मंदिर की दीवारों को बड़े-बड़े तराशे हुए पत्थरों से बनाया गया है। पत्थरों को बिना आधुनिक तकनीक के इतनी मजबूती से जोड़ा गया कि सदियों बाद भी उनका संतुलन बना हुआ है। मंदिर के शिखर और ऊपरी हिस्से में चूना पत्थर, रेत और पकी हुई ईंटों का उपयोग किया गया है।

विशेषज्ञों का कहना है कि उस समय की निर्माण तकनीक बेहद उन्नत थी। यही कारण है कि लगातार पानी में रहने के बावजूद मंदिर पूरी तरह क्षतिग्रस्त नहीं हुआ। हालाँकि समय के साथ कुछ हिस्सों में टूट-फूट जरूर हुई है, लेकिन इसकी नींव और मुख्य ढाँचा अब भी मजबूत दिखाई देता है।

मंदिर को देखने के लिए हर साल आर्किटेक्चर के छात्र, इंजीनियर, शोधकर्ता और इतिहासकार यहाँ पहुँचते हैं। उनके लिए यह मंदिर केवल धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि प्राचीन भारतीय इंजीनियरिंग का मास्टरपीस है।

पानी से भरा गर्भगृह और रहस्यमयी शिवलिंग

कांबरेश्वर मंदिर का गर्भगृह इसे और भी रहस्यमयी बना देता है। मंदिर पूरी तरह बाहर आने के बाद भी इसके भीतर घुटनों तक पानी भरा रहता है। इसी पानी के बीच भगवान शिव का स्वयंभू शिवलिंग स्थापित है।

श्रद्धालु मंदिर के अंदर जाकर पानी में हाथ डालकर शिवलिंग को स्पर्श करते हैं और भगवान शिव का आशीर्वाद लेते हैं। भक्तों के लिए यह अनुभव बेहद भावुक और आध्यात्मिक माना जाता है। मंदिर में माता पार्वती और नंदी महाराज की प्रतिमाएँ भी मौजूद हैं।

                                                                                                                                 साभार: NDTV

पहले मंदिर तक पहुँचने के लिए पाँच सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती थीं, लेकिन हर साल जमा होने वाली मिट्टी और गाद के कारण अब वे सीढ़ियाँ दब चुकी हैं। गाँव वाले हर वर्ष मंदिर से गाद हटाने और सफाई करने का काम करते हैं ताकि श्रद्धालुओं को दर्शन में परेशानी न हो।

मंदिर के सामने नंदी की प्रतिमा और एक खुला आँगन है। यहाँ वीरगळ यानी शहीद योद्धाओं की स्मृति में बनाई गई पत्थर की शिलाएँ भी मौजूद हैं, जो इस स्थल के ऐतिहासिक महत्व को और बढ़ाती हैं।

पर्यटन, आस्था और इतिहास का अनोखा संगम बना मंदिर

कांबरेश्वर मंदिर अब केवल स्थानीय लोगों तक सीमित नहीं रह गया है। हर साल जब यह पानी से बाहर आता है, तब दूर-दूर से लोग इसे देखने पहुँचते हैं। सुबह और शाम के समय मंदिर और वेलवंडी नदी का दृश्य बेहद आकर्षक दिखाई देता है। सूर्योदय और सूर्यास्त के दौरान यहाँ का नजारा पर्यटकों और फोटोग्राफरों के लिए खास आकर्षण बन जाता है।

स्थानीय प्रशासन और ग्राम पंचायत लोगों से मंदिर की पवित्रता बनाए रखने की अपील भी करते हैं। गाँव वालों का कहना है कि यह केवल घूमने की जगह नहीं, बल्कि उनकी आस्था और परंपरा का केंद्र है। इसलिए यहाँ आने वाले लोगों को धार्मिक मर्यादा और संस्कृति का सम्मान करना चाहिए।

ग्रामीणों ने श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए मंदिर तक पहुँचने वाले रास्ते को भी सुरक्षित बनाया है। हर साल मंदिर खुलने के बाद यहाँ पूजा-पाठ और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं। हजारों श्रद्धालु पानी में मौजूद शिवलिंग के दर्शन के लिए यहाँ पहुँचते हैं।

सदियों पुरानी विरासत की जीवित मिसाल है कांबरेश्वर मंदिर

कांबरेश्वर मंदिर आज भी इस बात का प्रमाण है कि भारतीय प्राचीन स्थापत्य कला कितनी उन्नत और टिकाऊ थी। पानी में वर्षों तक डूबे रहने के बावजूद इसका अस्तित्व बना रहना किसी चमत्कार से कम नहीं माना जाता। हर साल कुछ दिनों के लिए पानी से बाहर आने वाला यह मंदिर मानो समय के भीतर छिपी एक कहानी को फिर से जीवित कर देता है।

भोर तालुका का यह प्राचीन शिव मंदिर आज भी लोगों को अपनी ओर आकर्षित कर रहा है और यह साबित करता है कि भारत की ऐतिहासिक धरोहरें केवल पत्थरों की इमारतें नहीं, बल्कि सदियों पुरानी सभ्यता और संस्कृति की जीवित पहचान हैं।

नोएडा हिंसा : ‘X Storm’ से निकली चिंगारी, पुलिस को मिला फर्जी खबरें फैलाने वाला 274 लोगों का वॉट्सऐप ग्रुप

                                                                                                                    साभार: इंडियन एक्सप्रेस
राजधानी दिल्ली से सटे उत्तर प्रदेश के नोएडा में हुए हिंसक प्रदर्शनों की जाँच कर रही पुलिस ने दावा किया है कि सोशल मीडिया के जरिए एक संगठित नेटवर्क ने तनाव बढ़ाने और हिंसा भड़काने का काम किया।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ‘X Storm’ नाम का एक वॉट्सऐप ग्रुप सामने आया है जिसमें 274 लोग शामिल थे। पुलिस का कहना है कि यह ग्रुप खास तौर पर मजदूरों के आंदोलन के दौरान भड़काऊ वीडियो और गलत जानकारी फैलाने के लिए बनाया गया था। आदित्य आनंद को इस ग्रुप का एडमिन और बनाने वाला बताया जा रहा है।

इस वॉट्सऐप ग्रुप के बारे में पुलिस को तब पता चला जब वह 13 अप्रैल की हिंसा के मुख्य आरोपित आदित्य आनंद से पूछताछ कर रही थी। शुरुआत में यह प्रदर्शन मजदूरों की बेहतर वेतन की माँग को लेकर शांतिपूर्ण था, लेकिन बाद में यह तेजी से हिंसक हो गया। इस दौरान आगजनी, पत्थरबाजी और हमले की घटनाएँ हुईं जिसमें कई औद्योगिक इकाइयों और दफ्तरों पर हमला किया गया और वाहनों को आग के हवाले कर दिया गया।

पुलिस ने कहा है कि ‘X Storm’ वॉट्सऐप ग्रुप ने बिना पुष्टि वाले कंटेंट को फैलाने और सोशल मीडिया के जरिए लोगों को भड़काने में अहम भूमिका निभाई। अधिकारियों को शक है कि कई वॉट्सऐप ग्रुप मिलकर संगठित तरीके से भड़काऊ सामग्री फैलाने और बड़े स्तर पर अशांति फैलाने की कोशिश कर रहे थे। इस ग्रुप के अन्य सदस्यों की भी पहचान की जा रही है और डिजिटल सबूतों की जाँच की जा रही है, ताकि यह पता लगाया जा सके कि इस हिंसा की योजना और साजिश में कोई बाहरी तत्व शामिल थे या नहीं।

अवलोकन करें:-

फर्जी वीडियो शेयर करने से नोएडा हिंसा में RJD नेताओं का भी हाथ, प्रियंका भारती और कंचना यादव के खि
फर्जी वीडियो शेयर करने से नोएडा हिंसा में RJD नेताओं का भी हाथ, प्रियंका भारती और कंचना यादव के खि
 

नोएडा पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स ने शनिवार (18 अप्रैल 2026) को आदित्य आनंद को तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली रेलवे स्टेशन से गिरफ्तार किया था। यह गिरफ्तारी गौतम बुद्ध नगर पुलिस कमिश्नरेट और उत्तर प्रदेश स्पेशल टास्क फोर्स (STF) की संयुक्त टीम ने की थी।

सदियों पुरानी सनातन संस्कृति: ASI को भोजशाला में कई हिंदू प्रतीक चिन्ह मिले, राजस्थान में भी खुदाई में एक हजार साल पुराना मंदिर


भारत की प्राचीन और महान सभ्यता केवल पुस्तकों में दर्ज कथाओं तक सीमित नहीं है; वह धरती की परतों में भी सांस लेती है। जब पुरातत्वविद जमीन की गहराइयों में उतरते हैं, तो वे केवल ईंट-पत्थर नहीं खोजते, बल्कि इतिहास की धड़कन को सुनते हैं। हाल के वर्षों में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और राज्य स्तरीय पुरातत्व विभागों द्वारा की गई खुदाइयों ने यह संकेत दिया है कि भारतीय सांस्कृतिक परंपराएं अत्यंत प्राचीन और सतत रही हैं। यह निरंतरता ही सनातन संस्कृति की सबसे बड़ी विशेषता है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की खुदाई में राजस्थान से लेकर मध्यप्रदेश तक कई ऐसे प्रमाण मिले हैं, जिनसे साबित होता है कि हमारी हिंदू संस्कृति कितनी सदियों पुरानी है। एएसआई को भोजशाला मस्जिद में हिंदू प्रतीक चिन्ह मिले हैं, जिनसे संकेत मिलता है कि हिंदू धार्मिक स्थल को तोड़कर मस्जिद का निर्माण हुआ है। मामला कोर्ट में विचाराधीन है। दूसरी ओर राजस्थान के खेतड़ी (झुंझुनूं) में पुरातत्व एवं संग्रहालय विभाग को काफी पुरानी आबादी के अवशेष मिले हैं। ये खुदाई त्योंदा गांव में रीढ़ का टीला नामक जगह पर की जा रही है। इससे पता चलता है कि हिंदू संस्कृति एक हजार साल से पुरानी है। इससे पहले पिछले साल डीग में हुई खुदाई में भी विलुप्त हुई सरस्वती नदी होने के संकेत मिले थे।

भोजशाला: 2100 पन्नों की रिपोर्ट में 500 से अधिक तस्वीरें

मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित ऐतिहासिक भोजशाला को लेकर एएसआई की विस्तृत रिपोर्ट ने महत्वपूर्ण संकेत दिए हैं। एएसआई ने 2100 पन्नों की रिपोर्ट को 500 से अधिक तस्वीरों और वैज्ञानिक परीक्षणों के आधार पर तैयार किया है। रिपोर्ट में उल्लेख है कि भोजशाला का निर्माण 12वीं शताब्दी में हुआ, जबकि परिसर में स्थित मस्जिद का निर्माण 1265 ईस्वी के आसपास का बताया गया है। इस अंतर को यूं समझ सकते हैं कि 1265 ईस्वी एक विशिष्ट वर्ष है जो 13वीं शताब्दी (1201-1300) का हिस्सा है, जबकि 12वीं शताब्दी 1101-1200 ईस्वी के बीच की अवधि है। यानि 1265 से लगभग 65 से 165 साल पहले की अवधि है। 1265 ईस्वी में सुल्तान बलबन का शासन था, जबकि 12वीं सदी में दिल्ली सल्तनत से पहले राजपूत राजाओं का शासन था। यह तथ्य ऐतिहासिक क्रम को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। इससे यह भी साफ संकेत मिलता था कि पहले भोजशाला बनी और उसके बाद मस्जिद का निर्माण हुआ।

मंदिर स्थापत्य के संकेत, विज्ञान-तकनीक से इतिहास की पड़ताल
एएसआई के सर्वेक्षण में स्तंभों पर कमल आकृतियां, देवी-देवताओं की मूर्तियां, संस्कृत शिलालेख और मंदिर शैली की वास्तुकला के संकेत पाए गए। इन प्रतीकों को सनातन परंपरा से जोड़ा जाता है। वास्तुशिल्पीय विश्लेषण यह दर्शाता है कि संरचना में प्रयुक्त शैली उस कालखंड के मंदिर निर्माण की परंपराओं से मेल खाती है। हालांकि यह विषय न्यायालय में विचाराधीन है, लेकिन पुरातात्विक दृष्टि से यह अध्ययन सांस्कृतिक इतिहास को समझने में महत्वपूर्ण कड़ी बन गया है। एएसआई ने ग्राउंड पेनिट्रेटिंग रडार जैसी आधुनिक तकनीकों का उपयोग कर भूमिगत संरचनाओं का परीक्षण किया। खुदाई के दौरान दीवारों की संरचना, स्तंभों और शिलालेखों का गहन अध्ययन किया गया। यह दर्शाता है कि इतिहास की खोज अब केवल अनुमान पर आधारित नहीं, बल्कि वैज्ञानिक पद्धति पर टिकी है। सनातन संस्कृति की प्राचीनता को समझने के लिए यह पद्धति निर्णायक सिद्ध हो रही है।

मंदिर के हिस्सों में बनाई मस्जिद, सनानत धर्म से जुड़े प्रतीक मिले
भोजशाला विवाद को लेकर रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पुराने मंदिर के हिस्सों का इस्तेमाल करके मस्जिद बनाई गई है। भोजशाला को हिंदू समुदाय वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इस स्मारक को कमाल मौला मस्जिद बताता है। यह परिसर एएसआई द्वारा संरक्षित है। सर्वे रिपोर्ट के अनुसार, भोजशाला परिसर में सिक्कों, सनातन धर्म से जुड़े प्रतीक चिन्हों और देवी-देवताओं की मूर्तियों का विवरण दिया गया है। मंदिर शैली की वास्तुकला के संकेत मिले हैं। कई स्तंभों पर नक्काशी, कमल आकृतियां और शिल्प अवशेष पाए गए। संस्कृत भाषा के शिलालेख भी दर्ज किए गए हैं। यह 12वीं से 16वीं शताब्दी के बीच के बताए जा रहे हैं

मध्यप्रदेश के धार में भोजशाला की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
भोजशाला मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित एक प्राचीन स्थल है, जिसे परमार शासक राजा भोज (11वीं शताब्दी) से जुड़ा है। ऐतिहासिक अभिलेखों और शिलालेखों के आधार पर यह साबित होता है कि यह एक प्राचीन शैक्षिक-धार्मिक केंद्र रहा है, जहां पर विद्यादायिना मां सरस्वती की उपासना और अध्ययन परंपरा रही है। भोजशाला स्थल पर संस्कृत शिलालेख, स्थापत्य अवशेष और विद्या-परंपरा से जुड़े संकेतों का प्रमाणित उल्लेख मिलता है। दरअसल, भोजशाला पर विवाद इसी परिसर में कमाल मौला मस्जिद के अस्तित्व के बाद सामने आया। हिंदुओं के कई अन्य धार्मिक स्थलों की तरह यहां भी तोड़ो और कब्जा करो की नीति अपनाई गई। इससे यह साफ हो गया कि यह स्थल मूलतः मां सरस्वती का मंदिर/विद्या-केंद्र था, जिस पर बाद में मस्जिद बनी। इसी दावे-प्रतिदावे के कारण पूजा और नमाज दोनों को लेकर विवाद खड़ा हुआ।

कांग्रेस सरकारों के समय इस विवाद को और हवा मिली
कांग्रेस सरकारों के समय इस विवाद को और हवा मिली। क्योंकि लंबे समय तक प्रशासन ने इस हिंदू स्थल पर भी दिन-विशेष की व्यवस्था लागू कर दी। कुछ दिनों में हिंदू पूजा और कुछ में तुष्टिकरण के लिए मुस्लिम नमाज की अनुमति प्रदान कर दी गई। यह व्यवस्था अस्थायी थी, पर मूल प्रश्न कि स्थल की ऐतिहासिक पहचान तो अनसुलझा रहा। इसके लिए मामला न्यायालयों तक पहुंचा। हाल के वर्षों में अदालतों ने पुरातात्त्विक सर्वेक्षण और साक्ष्यों के आधार पर तथ्य-जांच पर जोर दिया है। कुछ अवसरों पर विशेष तिथियों/समयों में पूजा की अनुमति संबंधी आदेश भी सामने आए हैं। अंतिम निर्णय अभी न्यायिक प्रक्रिया के अधीन है। अब सुप्रीम कोर्ट ने बसंत पंचमी के दिन धार में भोजशाला में सूर्योदय से सूर्यास्त तक हिंदुओं को प्रार्थना करने की अनुमति दी है। सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पक्ष को सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा, हम दोनों पक्षों से अपील करते हैं कि वे आपसी सम्मान और सहयोग बरकरार रखें। सुप्रीम कोर्ट ने राज्य और जिला प्रशासन को कानून व्यवस्था बनाए रखने की हिदायत दी।

राजस्थान के खेतड़ी में भगवान विष्णु, गणेश के मूर्तियों के अवशेष
दूसरी ओर राजस्थान के झुंझुनूं जिले की खेतड़ी तहसील में त्योंदा गांव स्थित ‘रीढ़ का टीला’ भी इतिहास के पन्ने खोल रहा है। यहां जनवरी से जारी खुदाई में लगभग एक हजार वर्ष पुराने अवशेष सामने आए हैं। सतह से ढाई से छह मीटर नीचे मंदिर संरचना, स्तंभों के आधार और भगवान विष्णु, गणेश तथा अन्य मूर्तियों के अवशेष मिले हैं। यह संकेत देता है कि यहां कभी एक समृद्ध धार्मिक और सांस्कृतिक केंद्र रहा होगा। विशेष उल्लेखनीय तथ्य यह है कि कई मूर्तियां ऐसे मिलीं जैसे उन्हें सुरक्षित दबाकर रखा गया हो। पत्थरों को जोड़ने के लिए लोहे की कीलों का प्रयोग उस काल के स्थापत्य कौशल को दर्शाता है। मिट्टी के बर्तन कुछ हाथ से बने, कुछ चाक पर स्थानीय जीवन शैली और सांस्कृतिक विविधता का प्रमाण देते हैं। इससे स्पष्ट होता है कि यह स्थल केवल धार्मिक केंद्र नहीं, बल्कि सामाजिक-सांस्कृतिक गतिविधियों का केंद्र भी रहा होगा।

एक हजार वर्ष पुराना प्राचीन ‘पाटन’ दोहान नदी के किनारे बसा
पुरातत्व अधिकारियों के अनुसार, यह प्राचीन नगर दोहान नदी के किनारे बसा था और संभवतः ‘पाटन’ नाम से जाना जाता था। भारतीय सभ्यता में नदियों के किनारे नगर बसाने की परंपरा अत्यंत प्राचीन रही है। नदी केवल जल स्रोत नहीं, बल्कि सांस्कृतिक जीवनरेखा भी होती थी। इससे सनातन परंपरा की वह विशेषता उजागर होती है जिसमें प्रकृति और संस्कृति का अद्भुत समन्वय दिखता है। खेतड़ी क्षेत्र में ही 80 के दशक में ताम्रयुगीन सुनारी सभ्यता के अवशेष मिले थे, जो लगभग तीन हजार वर्ष पुराने माने जाते हैं। रीढ़ के टीले से मिले अवशेष मध्यकालीन प्रतीत होते हैं, परंतु आगे की खुदाई संभवतः उन्हें और प्राचीन कालखंडों से जोड़ सकती है। यह निरंतरता दर्शाती है कि इस भूभाग में सांस्कृतिक जीवन हजारों वर्षों से गतिमान रहा है।

डीग की खुदाई में ऋग्वेद में वर्णित सरस्वती नदी का संकेत
इससे पहले राजस्थान के डीग जिले के बहज गांव में एएसआई द्वारा की गई खुदाई में सूखी नदी के चैनल और बहुस्तरीय सभ्यताओं के प्रमाण मिले हैं। इतिहासकार इसे ऋग्वेद में वर्णित सरस्वती नदी के प्रवाह तंत्र से जोड़कर देखते हैं। 23 मीटर नीचे मिली सांस्कृतिक परतें, सड़कों और नालियों की सुव्यवस्थित व्यवस्था, मिट्टी के बर्तन और सिक्के उस समय की उन्नत सामाजिक संरचना को दर्शाते हैं। यह दर्शाता है कि भारतीय सभ्यता केवल धार्मिक आस्था तक सीमित नहीं थी, बल्कि सुव्यवस्थित नगरीय जीवन का भी परिचायक थी।

सूखी हुई नदी का चैनल और 5 सभ्यताओं के अवशेष मिले
डीग के बहज गांव में ASI की खुदाई साइट पर टीम को हजारों साल पुराने शहर के अवशेष मिले। इसके अलावा यहां सबसे निचले स्तर पर सूखी हुई नदी का चैनल और 5 सभ्यताओं के अवशेष मिले हैं। जिन्हें सरस्वती नदी से जोड़कर देखा जा रहा है। सड़कें, नालियां सहित अन्य शहरी अरेंजमेंट के सबूत भी यहां हैं। जो उस समय की मजबूत व्यवस्था को दिखाता है। इसके अलाव इस साइट पर 23 मीटर नीचे खुदाई के दौरान जो सांस्कृतिक जमाव (परत) मिला वह एक सूखी नदी का प्रवाह तंत्र है। इसे इतिहासकार ऋग्वेद में उल्लेखित सरस्वती नदी के चैनल से जोड़कर देख रहे हैं। इसके ऊपर की लेयर में प्राचीनतम गैरिक सभ्यता के अवशेष मिले हैं। इसके बाद चित्रित धूसर संस्कृति के अवशेष में कई तरह के टैरेकोटा (मिट्‌टी) के बर्तन, प्रिंडेट बर्तन, मूर्तियां और तांबे-चांदी के सिक्के मिले हैं।

सनातन संस्कृति यानि अनादि और अनंत शक्ति की निरंतरता
इन सभी खोजों का साझा सूत्र निरंतरता है। चाहे मंदिर स्थापत्य हो, शिलालेख हों, मूर्तियां हों या नगर नियोजन, सदियों से एक सांस्कृतिक धारा प्रवाहित होती दिखती है। सनातन शब्द का अर्थ ही है, जो अनादि और अनंत है। पुरातात्विक प्रमाण इस सांस्कृतिक निरंतरता को ठोस आधार प्रदान करते हैं। सनातन संस्कृति की महत्ता को समझने के लिए अब तथ्यपरकत खोज हो रही है। भारत की सनातन संस्कृति केवल इतिहास का विषय नहीं, बल्कि वर्तमान की जीवंत धरोहर है। राजस्थान से मध्य प्रदेश तक फैले पुरातात्विक प्रमाण यह संकेत देते हैं कि यह परंपरा सदियों से विकसित होती रही है। मंदिर स्थापत्य, नदी किनारे बसे नगर, शिलालेख और मूर्तियां, ये सब उस सांस्कृतिक यात्रा के साक्षी हैं जो आज भी जारी है। इन खोजों का महत्व केवल अतीत तक सीमित नहीं है। वे हमें यह स्मरण कराते हैं कि हमारी सांस्कृतिक जड़ें कितनी गहरी हैं। जब नई पीढ़ी इन साक्ष्यों को देखती है, तो उसे अपनी पहचान पर गर्व का अनुभव होता है। इतिहास की हर खुदाई हमें यही बताती है कि यह सभ्यता क्षणिक नहीं, बल्कि कालजयी है। सनातन संस्कृति की यही सबसे बड़ी शक्ति है कि वह समय के प्रवाह में भी अपनी पहचान बनाए रखती है, और हर युग में नए प्रमाणों के साथ स्वयं को पुनः स्थापित करती है।

पहले जिनको विवादास्पद कह दबाया, वे अब खुलकर विमर्श में आए


दरअसल, भारत की सभ्यता केवल भौगोलिक इकाई नहीं, बल्कि स्मृति की निरंतर धारा है। इस स्मृति में मंदिर हैं, तीर्थ हैं, शिलालेख हैं और वे कथाएं हैं, जिनमें आस्था, दर्शन और संस्कृति एक साथ बहती रही है। लेकिन इस सांस्कृतिक निरंतरता को इतिहास के कुछ दौरों में योजनाबद्ध रूप से तोड़ा गया। सनातन परंपरा के अनेक धार्मिक स्थलों पर हमले हुए, संरचनाएं ध्वस्त की गईं और पूजा स्थलों के ऊपर नई धार्मिक इमारतें खड़ी कर दी गईं। यह केवल स्थापत्य परिवर्तन नहीं था, बल्कि सांस्कृतिक वर्चस्व का प्रयास था। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में केंद्र में सरकार बनने के बाद हिंदू समाज के भीतर एक नया आत्मबोध उभरा। दशकों तक जिन विषयों को “विवादास्पद” कहकर दबाया गया, वे अब खुलकर विमर्श के केंद्र में आ गए हैं। अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण इस परिवर्तन का प्रतीक बन गया। 22 जनवरी को प्राण-प्रतिष्ठा के दो वर्ष पूरे होना केवल एक धार्मिक अवसर नहीं, बल्कि यह संकेत है कि भारत अब अपनी सांस्कृतिक स्मृति से मुंह नहीं मोड़ेगा।

सनातन स्थलों की पुनर्स्मृति: इतिहास, न्याय और आस्था की वापसी
महाराणा प्रताप सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजवर्धन सिंह परमार की ओर से अजमेर दरगाह में शिव मंदिर होने का दावा किया गया है। सुप्रीम कोर्ट के वकील डॉ.एपी सिंह के जरिए कोर्ट में याचिका लगाई गई। इसे सोमवार को सुनवाई करते हुए स्वीकार कर लिया। वकील डॉ एपी सिंह के अनुसार न्यायालय ने राजवर्धन सिंह परमार द्वारा 2022 में राष्ट्रपति को लगाई गई याचिका का जिक्र करते हुए परमार को प्रथम याचिका माना है। न्यायालय ने सभी पक्षकारों को नोटिस जारी करते हुए अगली सुनवाई 21 फरवरी रखी है। महाराणा प्रताप सेना के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजवर्धन सिंह परमार के मुताबिक न्यायालय ने हमारे द्वारा 2022 में राष्ट्रपति को लगाई गई याचिका का जिक्र करते हुए हमें मुख्य पक्षकार माना है। राजस्थान में महाराणा प्रताप सेना की ओर से यात्रा की गई थी। जिसमें लाखों लोगों के हस्ताक्षर से याचिका लगाने का अवसर मिला था। हमें पूर्ण विश्वास है कि अजमेर दरगाह के नीचे वर्षों से भगवान शिव का मंदिर बंद है, वह बहुत जल्द खुलेगा। वहां पूजा होगी और पुष्कर से जल भी लाकर चढ़ाया जाएगा। परमार ने कहा कि हमने याचिका में वहां के नक्शे, रेकी और शिवलिंग के चित्र सहित अन्य सबूत पेश किए हैं। इसके अलावा भी अगर न्यायालय कोई सबूत मांगेगा तो उन्हें पूरा करने का काम महाराणा प्रताप करेगी।

इतिहास की सत्यता और आस्था के अधिकार की पुनर्स्थापना
राम मंदिर के बाद यह स्पष्ट हो गया कि सनातन स्थलों की पुनर्प्राप्ति का मार्ग सड़क नहीं, बल्कि संविधान और अदालतें हैं। यही कारण है कि आज भोजशाला और अजमेर जैसे स्थल न्यायिक विमर्श के केंद्र में हैं। यह संघर्ष किसी समुदाय के विरुद्ध नहीं, बल्कि इतिहास की सत्यता और आस्था के अधिकार की पुनर्स्थापना के लिए है। मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित भोजशाला को ऐतिहासिक रूप से परमार शासक राजा भोज से जोड़ा जाता है। यह स्थल विद्या की देवी मां सरस्वती को समर्पित माना जाता रहा है। यहां प्राप्त शिलालेख, स्थापत्य शैली और ऐतिहासिक संदर्भ इसे एक शिक्षण एवं साधना केंद्र के रूप में स्थापित करते हैं। बाद के कालखंड में यहाँ कमाल मौला मस्जिद का अस्तित्व सामने आता है, जिससे यह स्थल विवाद का केंद्र बन गया। वर्षों तक प्रशासनिक आदेशों के तहत पूजा और नमाज के लिए अलग-अलग दिन निर्धारित किए जाते रहे। हालिया न्यायिक हस्तक्षेप के बाद पूजा के अधिकार को लेकर हिंदू पक्ष को महत्वपूर्ण राहत मिली है। न्यायालय ने यह स्पष्ट संकेत दिया है कि आस्था और इतिहास की जांच तथ्यों के आधार पर होनी चाहिए, न कि राजनीतिक दबाव में। मध्य प्रदेश सरकार का सहयोग और विधिक प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका इस दिशा में निर्णायक मानी जा रही है।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका स्वीकार किया जाना अपने आप में महत्वपूर्ण
दूसरी ओर राजस्थान के अजमेर स्थित दरगाह शरीफ को लेकर भी ऐतिहासिक विमर्श नया नहीं है। हिंदू संगठनों और याचिकाकर्ताओं का दावा है कि यह स्थल मूलतः एक प्राचीन शिव मंदिर था। स्थापत्य संकेत, प्राचीन ग्रंथों के उल्लेख और स्थानीय परंपराएँ इस दावे का आधार प्रस्तुत करती हैं। लंबे समय तक इस विषय पर सार्वजनिक चर्चा को दबाया गया, लेकिन अब मामला न्यायिक दायरे में प्रवेश कर चुका है। अजमेर दरगाह से जुड़े शिव मंदिर के दावे पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका स्वीकार किया जाना अपने आप में महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ यह है कि देश की सर्वोच्च अदालत अब तथ्यों, साक्ष्यों और ऐतिहासिक दस्तावेज़ों की सुनवाई के लिए तैयार है। यह सनातन समाज के लिए उम्मीद का संकेत है कि उसकी आस्था को अब “अस्वीकार्य” नहीं कहा जा सकता।

अब आस्था बनाम राजनीति नहीं, आस्था और न्याय साथ-साथ
राजस्थान और मध्य प्रदेश की भाजपा सरकारों ने इन मामलों में स्पष्ट किया है कि वे किसी भी समुदाय के अधिकारों का हनन नहीं चाहतीं, लेकिन ऐतिहासिक सत्य और न्यायिक प्रक्रिया में बाधा भी नहीं बनेंगी। यह संतुलन ही संवैधानिक शासन की पहचान है। तुष्टिकरण की राजनीति से अलग हटकर कानून के दायरे में निर्णय लेने का यह दृष्टिकोण भविष्य की राजनीति को दिशा देता है। इन दोनों मामलों को केवल धार्मिक चश्मे से देखना भूल होगी। यह संघर्ष उस मानसिकता के खिलाफ है, जिसने दशकों तक हिंदू समाज को अपनी ही विरासत पर प्रश्नचिह्न लगाने के लिए मजबूर किया। यह किसी मस्जिद या दरगाह को गिराने की मांग नहीं, बल्कि यह जानने की मांग है कि इतिहास क्या कहता है और आस्था का अधिकार किसे मिलना चाहिए? किसने और कब हिंदू स्थलों को ध्वस्त करने धृष्ट कार्य किया?

यह अपने इतिहास, आस्था और अपनी पहचान की ओर लौटने की यात्रा
यदि न्यायालयों में ऐतिहासिक साक्ष्य यह सिद्ध करते हैं कि भोजशाला और अजमेर जैसे स्थल मूलतः सनातन परंपरा से जुड़े रहे हैं, तो पूजा का अधिकार मिलना न केवल स्वाभाविक होगा, बल्कि संवैधानिक भी। भारत का संविधान आस्था को नकारता नहीं, बल्कि सभी को समान धार्मिक स्वतंत्रता देता है। राम मंदिर ने यह दिखा दिया कि धैर्य, संविधान और सत्य के साथ लड़ी गई लड़ाई अंततः परिणाम देती है। भोजशाला और अजमेर समेत देश के कई अन्य हिंदू धार्मिक स्थल उसी यात्रा के अगले पड़ाव हैं। यह यात्रा किसी के खिलाफ नहीं, बल्कि अपने इतिहास, अपनी आस्था और अपनी पहचान की ओर लौटने की है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में बदला हुआ भारत अब अपने अतीत से डरता नहीं, बल्कि उसे समझकर भविष्य की नींव रख रहा है।

अजमेर में मोइनुद्दीन चिश्ती दरगाह विवाद की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
अजमेर स्थित ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के बारे में भी कहा जाता है कि इस स्थल पर पहले प्राचीन शिव मंदिर था। दावा करने वाले पक्ष स्थापत्य संकेतों, ऐतिहासिक उल्लेखों और स्थानीय परंपराओं के पुख्ता प्रमाण देते हैं। उनका कहना है कि स्थल की मूल धार्मिक पहचान की जांच होनी चाहिए। दूसरी ओर, दरगाह से जुड़े पक्ष दरगाह की ऐतिहासिक-धार्मिक निरंतरता पर जोर देते हैं। यह मामला भी अदालतों के समक्ष है। सुप्रीम कोर्ट द्वारा याचिका स्वीकार किए जाने का अर्थ यह है कि शीर्ष अदालत ने तथ्यों और साक्ष्यों के आधार पर सुनवाई के लिए दरवाजा खोल दिया है। आगे की प्रक्रिया में दस्तावेज, ऐतिहासिक प्रमाण और विधिक तर्कों की जांच होगी। भोजशाला हो या अजमेर की दरगार दोनों विवादों में मूल प्रश्न स्थल की ऐतिहासिक पहचान और पूजा/आस्था के अधिकार से जुड़ा है। दोनों ही मामलों में अंतिम फैसला अदालतों को करना है। भोजशाला में प्रशासनिक स्तर पर लंबे समय से दिन-विशेष की व्यवस्था रही, वहीं अजमेर में विवाद अपेक्षाकृत न्यायिक सुनवाई के शुरुआती चरणों में है।

ISI से लिंक, सेना मुख्यालय से लेकर सरकारी दफ्तरों में आना-जाना: मेरठ में अम्मी-बेटी निकली PAK की नागरिक, 30 सालों से फर्जी आधार कार्ड-पासपोर्ट के जरिए भारत में रह रहीं

पाकिस्तानी नागरिक अम्मी-बेटी के खिलाफ जाली भारतीय दस्तावेज और अवैध निवास के आरोप में FIR दर्ज (साभार: Dall-E/X)
उत्तर प्रदेश की मेरठ पुलिस ने 14 फरवरी 2026 को एक अम्मी और उसकी बेटी के खिलाफ केस दर्ज किया। आरोप है कि ये दोनों करीब 30 साल से भारत में रह रही थीं, जबकि वे पाकिस्तानी नागरिक हैं। इस मामले की शिकायत सामाजिक कार्यकर्ता रुखसाना ने की है। उन्होंने आरोप लगाया कि अम्मी-बेटी ने धोखे से भारतीय पहचान पत्र बनवा लिए। रुखसाना ने शिकायत में बताया कि पाकिस्तानी नागरिक होने के बावजूद दोनों ने फर्जी तरीके से आधार कार्ड, वोटर आईडी और भारतीय पासपोर्ट तक हासिल कर लिया।

मीडिया से बात करते हुए SSP अविनाश पांडेय ने बताया कि उन्हें फरहत मसूद नाम के एक व्यक्ति के बारे में जानकारी मिली। वह दिल्ली गेट इलाके में रहता है। बताया जा रहा है कि फरहत मसूद पाकिस्तान गया था, जहाँ उसने सबा नाम की औरत से निकाह किया। वहीं पाकिस्तान में उनकी एक बेटी पैदा हुई। सबा और उसकी बेटी दोनों ही पाकिस्तानी नागरिक हैं।

SSP ने बताया कि शुरुआती जाँच में यह साफ हो गया है कि आरोपित बिना वैध भारतीय नागरिकता के यहाँ रह रहे थे। उन्होंने कहा कि इससे पहले SP सिटी द्वारा की गई जाँच में भी आरोपों में सच्चाई पाई गई थी। जाँच में तथ्य सामने आने के बाद अब इस मामले में औपचारिक रूप से FIR दर्ज कर ली गई है। पुलिस ने बताया कि आगे की कानूनी कार्रवाई शुरू कर दी गई है और पूरे मामले की गहराई से जाँच के आदेश दे दिए गए हैं।

मामले में FIR की पूरी जानकारी

ऑपइंडिया ने इस मामले में दर्ज की गई FIR की कॉपी देखी है। इस FIR में सबा मसूद उर्फ नाजी उर्फ नाजिया और उशकी बेटी ऐमन फरहत को मुख्य आरोपित बताया गया है। इन दोनों के खिलाफ भारतीय न्याय संहिता (BNS)2023 की कई धाराएँ लगाई गई हैं।

इनमें धारा 318(4), 336(3), 338, 340(2), 351(2) और 352 शामिल हैं। ये धाराएँ धोखाधड़ी, जालसाजी, फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल करने और आपराधिक धमकी देने जैसे आरोपों से जुड़ी हुई हैं।

                                                                       साभार: UP पुलिस

शिकायतकर्ता ने बताया कि सबा ने पाकिस्तान में फरहत मसूद से निकाह किया था और उनके बेटी ऐमन का जन्म वहीं 25 मई 1993 को हुआ था। उन्होंने आगे कहा कि जब सबा भारत आई, तो ऐमन भी उसके साथ ही आई थी। ऐमन ने भारत में एंट्री सबा के पाकिस्तानी पासपोर्ट के जरिए की थी। उस पासपोर्ट में ऐमन का नाम और उसकी जन्मतिथि साफ-साफ दर्ज थी।

शिकायतकर्ता रुखसाना ने आगे बताया कि अम्मी और बेटी, दोनों ही पाकिस्तानी नागरिक होने के बावजूद मेरठ में रह रही थीं। उन्होंने कभी भी कानूनी तरीके से भारतीय नागरिकता लेने की प्रक्रिया पूरी नहीं की। रुखसाना ने यह भी कहा कि ऐमन ने मेरठ में ही पढ़ाई की, जबकि वह पाकिस्तानी नागरिक थी।

                                                              साभार: UP पुलिस

उन्होंने आगे बताया कि ऐमन के लिए भारतीय पासपोर्ट बनवाने के लिए फर्जी और बनावटी दस्तावेज तैयार किए गए। रुखसाना के मुताबिक, सबा ने भी दो अलग-अलग नामों से वोटर कार्ड बनवा लिए थे। इनमें एक सबा मसूद के नाम से और दूसरा नाजिया मसूद के नाम से था। शिकायत में कहा गया है कि ये सब जानबूझकर अपनी असली पहचान छिपाने और भारतीय अधिकारियों को धोखा देने के लिए किया गया।

रुखसाना ने अपनी शिकायत में सुरक्षा को लेकर भी चिंता जताई। उनका कहना है कि आरोपित फर्जी पासपोर्ट और दस्तावेजों के आधार पर कई बार पाकिस्तान और दूसरे देशों की यात्रा कर चुके हैं। उन्होंने पुलिस को यह भी बताया कि सबा के अब्बा हनीफ अहमद कथित तौर पर पाकिस्तान नागरिक थे और उनका संबंध ISI से बताया जाता है। रुखसाना के अनुसार, इसी वजह से यह मामला राष्ट्रीय सुरक्षा के लिहाज से भी गंभीर हो जाता है।

शिकायत में यह भी कहा गया है कि आरोपित अपनी असली पहचान छिपाकर दिल्ली में सेना मुख्यालय और दूसरे सरकारी दफ्तरों में भी अकसर आते-जाते रहे हैं।
FIR में यह भी दर्ज है कि शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि जब उन्होंने पहले इस मामले पर आपत्ति जताई थी तब उन्हें धमकाया और डराया गया था। रुखसाना का कहना है कि आरोपितों ने उन्हें यह कहकर दबाव बनाने की कोशिश की कि उनकी राजनीतिक पहुँच है और पुलिस प्रशासन में भी उनके संबंध हैं।

2000 साल पहले भी होता था भारत-मिस्र में व्यापार, कब्रों में खुदे मिले तमिल-संस्कृत लिपियों में व्यापारियों के नाम: विदेशी शोधकर्ता भी हैरान

                    कब्रों पर खुदे तमिल-संस्कृत लिपियों में नाम की खोज (साभार: Deccan Herald)
मिस्र के ‘वैली ऑफ किंग’ नाम की प्राचीन कब्रों से 30 शिलालेख मिले हैं, जो लगभग 2000 साल पुराने हैं। इन शिलालेखों में भारत और मिस्र के बीच व्यापार और संपर्क की जानकारियाँ हैं। इन शिलाओं पर लिखे शब्द तमिली (प्राचीन तमिल-ब्राह्मी) और प्राकृत एवं संस्कृत भाषा में हैं, जो यह साबित करते हैं कि उस समय भारतीय उपमहाद्वीप के लोग मिस्र आते-जाते थे।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, ये शिलालेख 6 अलग-अलग रॉक-कट कब्रों में मिले हैं। इनमें से 20 शिलाएँ तमिली में और बाकी 10 शिलाएँ संस्कृत और प्राकृत में हैं। इसका मतलब यह है कि केवल दक्षिण भारत के ही नहीं बल्कि भारत के उत्तर-पश्चिम और पश्चिमी हिस्सों से भी लोग मिस्र जाते थे। विशेष रूप से प्राचीन राजधानी थेब्स के भीतर स्थित राजाओं की घाटी में, जहाँ पहले से तीसरी ईस्वी के बीच मसालों और अन्य वसतुओं का व्यापार होता था।

इस खोज की जानकारी स्विट्जरलैंड की लॉजेन यूनिवर्सिटी के डिपार्टमेंट ऑफ स्लाविक एंड साउथ एशियन स्टडीज (SLAS) के प्रोफेसर इंगो स्ट्राउच और फ्रांस के पेरिस स्थित EFEO की प्रोफेसर शार्लोट श्मिड ने दी है। उन्होंने बुधवार (11 फरवरी 2026) को तमिलनाडु राज्य पुरातत्व विभाग (TNSDA) द्वारा तमिल शिलालेखों पर आयोजित सम्मेलन में यह जानकारी दी। इस कार्यक्रम में दुनियाभर के विशेषज्ञ और शोधकर्ता शामिल हुए थे, जहाँ इस महत्वपूर्ण ऐतिहासिक खोज को पहली सार्वजनिक रूप से बताया गया।

तमिल व्यापारी से लेकर राजा के दूत ने की मिस्र यात्रा

शोधकर्ताओं को एक बहुत अहम जानकारी भी मिली है। सिकाई कोर्रान (Cikai Korran) नाम के एक व्यक्ति ने अपना नाम मिस्र की 6 में से लगभग 5 कब्रों में कुल 8 बार खुदवाया है। माना जा रहा है कि वह एक तमिल व्यापारी था, जो प्राचीन ‘तमिलगम’ क्षेत्र से जहाज के जरिए मिस्र पहुँचा था।

इतिहासकारों का मानना है कि ‘कोर्रान’ नाम ‘कोर्रवाई’ देवी से जुड़ा हो सकता है, जो चेरा राजवंश के समय पूजी जाती थीं। इन देवी का उल्लेख दूसरी सदी की प्रसिद्ध तमिल महाकाव्य रचना ‘शिलप्पदिकारम’ में भी मिलता है।

इसी के साथ एक शिलालेख में एक अन्य व्यक्ति का जिक्र संस्कृत में किया गया है, जिसे एक क्षहरात (Ksaharata) राजा का दूत बताया गया है। इससे यह संकेत मिलता है कि उत्तर-पश्चिम भारत के लोग भी मिस्र जाते थे, जिनमें केवल व्यापारी ही नहीं बल्कि शाही प्रतिनिधि के लोग भी शामिल थे।

मिस्र में मिले तमिली शिलालेखों ने शोधकर्ताओं को चौंकाया

प्रोफेसर इंगो स्ट्राउच ने कहा कि उन्हें यकीन नहीं हुआ जब मिस्र में तमिली भाषा के शिलालेख मिले। इन कब्रों को हर साल लाखों लोग देखते हैं, लेकिन पहले किसी ने इन्हें नोटिस नहीं किया। कब्र नंबर 14 में ‘सिकाई कोर्रान’ नाम करीब 6 मीटर ऊँची दीवार पर अकेला लिखा मिला। स्ट्राउच ने 2024 में पहला शिलालेख खोजा और बाद में प्रो. शार्लोट श्मिड के साथ मिलकर कुल 30 शिलालेख ढूँढे, जिनमें 20 तमिली में हैं, जबकि भारत में ऐसे करीब 100 ही मिले हैं।

प्रो. श्मिड ने इसे असाधारण खोज बताया। उन्होंने कहा कि इससे यह सवाल उठता है कि उस समय लिपि का उपयोग कितना होता था और भारत में ऐसे शिलालेख कम क्यों हैं। संभव है कि लिखने का माध्यम अलग रहा हो या व्यापारी समुदाय की अपनी परंपराएँ रही हों। दोनों शोधकर्ताओं का मानना है कि उस दौर के व्यापारी कई भाषाएँ जानते थे और ग्रीक भी पढ़ सकते थे, क्योंकि तमिलगम के व्यापारिक समझौते ग्रीक में लिखे जाते थे।

भारत-रोम व्यापार के नए सबूत

प्रोफेसर शार्लोट श्मिड ने यह भी कहा कि रोमन काल में ग्रीक भाषा जानना बहुत जरूरी था। उनका मानना है कि ग्रीक जानने वाले लोग भारतीय शिलालेख नहीं पढ़ते थे, लेकिन भारतीय व्यापारी ग्रीक जरूर पढ़ और समझ सकते थे। उस दौर में बिना ग्रीक पढ़े-लिखे काम चलाना मुश्किल था।

TNSDA के अकादमिक सलाहकार प्रोफेसर के राजन ने बताया कि भारत का समुद्री व्यापार सिंधु घाटी सभ्यता (IVC) से ही शुरू हो गया था और शुरुआती ऐतिहासिक काल में यह और तेज हुआ। उस समय ज्यादातर सामान भारत से पश्चिमी देशों की ओर जाता था। IVC के बाद गुजरात और तमिलगम (मुजिरि, केरल) से व्यापारी समूह उभरे, जो तमिल भाषा का इस्तेमाल करते थे।

रोमन लोग भारतीय वस्तुओं, खासकर काली मिर्च के दीवाने थे। नई खोज से भारत और रोमन साम्राज्य के बीच मजबूत व्यापारिक संबंध साबित होते हैं। यह खोज तमिल ब्राह्मी लिपि और सांस्कृतिक आदान-प्रदान पर नई चर्चा भी शुरू करती है। थेब्स में मिले शिलालेखों को लाल सागर के बंदरगाह बेरेनाइक से जोड़ा गया है, जहाँ 30 साल से खुदाई चल रही है और भारतीय भाषाओं, यहाँ तक कि तमिल में भी शिलालेख मिले हैं।

आज हुए चुनाव तो NDA को 352 सीटों का अनुमान, बीजेपी अपने दम पर 287 सीटें जीत सकती है


भारत की राजनीति में एक बार फिर ‘मोदी फैक्टर’ और NDA की मजबूती को लेकर चर्चा तेज हो गई है। इंडिया टुडे–सी वोटर के ताजा ‘मूड ऑफ द नेशन’(MOTN) सर्वे के अनुसार, यदि जनवरी 2026 में आज लोकसभा चुनाव कराए जाएँ तो भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन(NDA) बड़े बहुमत के साथ सत्ता में लौट सकता है।

सर्वे में अनुमान जताया गया है कि NDA को 350 से अधिक सीटें मिल सकती हैं, जबकि कांग्रेस  के नेतृत्व वाला INDIA गठबंधन पिछड़ता नजर आ रहा है। यह सर्वे 8 दिसंबर 2025 से 21 जनवरी 2026 के बीच किया गया, जिसमें देशभर के 36,265 लोगों को शामिल किया गया।

इसमें हर आयु वर्ग, जाति, धर्म और लिंग के लोगों की राय ली गई और सर्वे में लगभग 5% तक मार्जिन ऑफ एरर की संभावना भी बताई गई है।

NDA को 352 सीटों का अनुमान, बीजेपी अपने दम पर बहुमत के करीब

MOTN सर्वे के मुताबिक, अगर आज लोकसभा चुनाव हों तो NDA को कुल 352 सीटें मिलने का अनुमान है। यह आँकड़ा 2024 के लोकसभा चुनाव में NDA को मिली 293 सीटों से काफी अधिक है। सर्वे बताता है कि भारतीय जनता पार्टी अकेले 287 सीटें जीत सकती है, यानी पार्टी अपने दम पर बहुमत का आँकड़ा पार कर सकती है।

अगस्त 2025 के सर्वे में बीजेपी को 260 सीटें मिलने का अनुमान था, जो अब बढ़कर 287 हो गया है। वहीं कांग्रेस को इस सर्वे में केवल 80 सीटें मिलने की संभावना जताई गई है, जो 2024 में मिली 99 सीटों से कम है। इसके अलावा अन्य दलों के खाते में 176 सीटें जाने का अनुमान लगाया गया है।

इतना ही नहीं अगर विपक्ष ने वोट चोरी और संवैधानिक संस्थाओं को आरोपित करना नहीं छोड़ा उनकी सीटें और भी कम होने की संभावना है। अगर NDA के शासन में हो रहे भ्रष्टाचार पर FIR कर उजागर करने, दूसरे, घुसपैठियों को निकालने में सरकार का सहयोग पर ही INDI गठबंधन राहत पा सकता है। 

वोट शेयर में भी NDA आगे, INDI गठबंधन को नुकसान

सर्वे में गठबंधन स्तर पर वोट प्रतिशत का भी अनुमान लगाया गया है। इसके अनुसार, यदि आज चुनाव हों तो NDA को करीब 47% वोट शेयर मिल सकता है, जबकि INDI गठबंधन को 39% वोट मिलने की संभावना है। वहीं अन्य दलों के हिस्से में 14% वोट जा सकते हैं।

2024 के लोकसभा चुनाव में NDA को लगभग 43–44% वोट शेयर मिला था, जबकि INDIA गठबंधन को करीब 40% वोट मिले थे। अगस्त 2025 के सर्वे में NDA को 47% और INDIA गठबंधन को 41% वोट शेयर मिलने का अनुमान था। इस बार INDIA गठबंधन के वोट शेयर में गिरावट देखी जा रही है।

मोदी सबसे पसंदीदा चेहरा, लोकप्रियता कायम

सर्वे में प्रधानमंत्री पद के लिए सबसे बेहतर चेहरे को लेकर भी सवाल किया गया। इसमें 55% लोगों ने नरेंद्र मोदी को अगला प्रधानमंत्री बनने के लिए सबसे उपयुक्त बताया। अगस्त 2025 में यह आँकड़ा मोदी के लिए 52% था, यानी मोदी की लोकप्रियता में हल्का इजाफा हुआ है। पीएम मोदी की अप्रूवल रेटिंग 57% दर्ज की गई है, जो अगस्त 2025 में 58% थी।

इसके अलावा सर्वे में लोगों से यह भी पूछा गया कि देश का अब तक का सबसे बेहतर प्रधानमंत्री कौन रहा है। इस पर 50% लोगों ने नरेंद्र मोदी का नाम लिया, जबकि 12% लोगों ने इंदिरा गाँधी और 12% लोगों ने अटल बिहारी वाजपेयी को सर्वश्रेष्ठ प्रधानमंत्री बताया।

कर्नाटक के मस्की में मिले 4000 साल पुरानी मानव बस्ती के प्रमाण, मिट्टी के बर्तन से लेकर प्राचीन शिलालेख तक… 271 पौराणिक स्थलों की हुई पहचान

                                           रायचूर जिले में मस्की (फोटो साभार - डेक्कन हेराल्ड)
कर्नाटक के रायचूर जिले के मस्की कस्बे में एक बड़ी पुरातात्विक खोज हुई। वहाँ से लगभग 4,000 साल पहले इंसानों के रहने के प्रमाण मिले हैं। भारत, अमेरिका और कनाडा के वैज्ञानिकों की एक अंतरराष्ट्रीय टीम ने इस क्षेत्र में खुदाई की है। इस दौरान वहाँ कई प्राचीन वस्तुएँ खोजी हैं, जो यहाँ पुरानी मानव बस्ती के सबूत देती है।

रिपोर्ट्स के अनुसार यह खोज मस्की कस्बे के पास मल्लिकार्जुन मंदिर और अंजनेय स्वामी मंदिर के पास स्थित मल्लिकार्जुन पहाड़ी पर की गई। खुदाई में वैज्ञानिकों को मिट्टी के बर्तन, खाना पकाने संबंधी उपकरण और अन्य कई चीजें मिलीं हैं। ये इस बात का संकेत देती हैं कि यहाँ एक समृद्ध और जीवंत बस्ती थी।

यह टीम पिछले तीन महीनों से मस्की में काम कर रही है। शोधकर्ताओं को यह भी पता चला कि इस इलाके में 11वीं से 14वीं शताब्दी ईसा पूर्व तक लोग निवास करते थे। इसका मतलब है कि मस्की में 4,000 साल पुरानी सभ्यता के निशान मिले हैं।

इस खोज में शामिल वैज्ञानिकों में स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी (अमेरिका) के डॉ एंड्रयू एम बाउर, मैकगिल यूनिवर्सिटी (कनाडा) के डॉ पीटर जी जोहान्सन और भारत के शिव नादर यूनिवर्सिटी के हेमंत कदंबी प्रमुख हैं।

उन्होंने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) से अनुमति लेने के बाद मस्की क्षेत्र की खोज शुरू की और अब तक यहाँ 271 संभावित प्राचीन स्थलों की पहचान की है। यह खोज भारत के इतिहास और प्राचीन सभ्यताओं को समझने की दिशा में एक अहम कदम मानी जा रही है।

मस्की शिलालेख

ब्रिटिश स्वर्ण खदान इंजीनियर सी बीडन  ने 1915 में कर्नाटक के मस्की में एक महत्वपूर्ण शिलालेख मिला, जिसने इस क्षेत्र को पुरातात्विक मानचित्र पर ला खड़ा किया। यह शिलालेख मौर्य सम्राट अशोक के काल का है और एक गुफा के भीतर चट्टान पर उकेरा गया था।

यह मौर्य काल के सबसे पुराने शिलालेखों में से एक माना जाता है। इसमें सम्राट अशोक का नाम और उनकी प्रसिद्ध उपाधि ‘देवानामप्रिय’ (अर्थात देवताओं का प्रिय) स्पष्ट रूप से अंकित है।

इस खोज से यह लंबे समय से चली आ रही बहस समाप्त हो गई कि क्या अशोक को वास्तव में इस उपाधि से पहचाना जाता था। यह शिलालेख ब्राह्मी लिपि और प्राकृत भाषा में लिखा गया है और यह अशोक के अहिंसा और नैतिक मूल्यों के प्रति समर्पण को दर्शाता है।

इस खोज ने न केवल मस्की की ऐतिहासिक महत्ता को उजागर किया, बल्कि मौर्य साम्राज्य के शिलालेखों की समझ में भी एक महत्वपूर्ण योगदान दिया।

उत्तर प्रदेश : घनी आबादी के बीच सलाउद्दीन उर्फ लाला चला रहा था अवैध हथियारों की फैक्ट्री, 300 असलहे, 50,000 कारतूस बरामद: लखनऊ से कई शहरों में होती थी सप्लाई, जानवरों के सींग-खाल भी मिले

                                                               सलाउद्दीन उर्फ लाला
राजधानी लखनऊ के मलिहाबाद थाना क्षेत्र के मिर्जागंज में पुलिस ने एक बड़ी कार्रवाई करते हुए अवैध असलहा फैक्ट्री का भंडाफोड़ किया है
 मलिहाबाद और रहीमाबाद थाना पुलिस की संयुक्त टीम ने गुरुवार देर रात मिर्जागंज में सलाउद्दीन उर्फ लाला(72) के घर पर छापेमारी की, जहां से भारी मात्रा में अवैध हथियार, सैकड़ों कारतूस और असलहा बनाने के उपकरण बरामद किए गए हैं पुलिस ने सलाउद्दीन को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू कर दी है

लखनऊ के मलिहाबाद में हथियारों की अवैध फैक्ट्री का पर्दाफाश हुआ है। ये फैक्ट्री हकीम उर्फ सलाउद्दीन अपने घर पर चला रहा था। पुलिस ने हकीम के घर पर छापेमारी में 300 असलहे, 50000 कारतूस बरामद किए हैं।

इस दौरान हथियार बनाने वाले उपकरण भी बरामद हुए। भारी सुरक्षा के बीच पुलिस ने सलाउद्दीन के घर पर छापेमारी की। घर के 20 मीटर के दायरे को पूरी तरह घेर लिया गया। घर के आस-पास लोग जमा होने लगे थे, इसको देखते हुए घर पर मौजूद सभी लोगों को निकाल कर पूछताछ के लिए ले गई।

ADCP नार्थ जितेंद्र दुबे ने बताया कि छापेमारी के दौरान सलाउद्दीन के घर से 300 से ज्यादा 12 बोर और 315 बोर के कारतूस, बने और अधबने असलहे, बारूद, और हथियार बनाने के उपकरण बरामद किए गए हैं इसके अलावा, कुछ अत्याधुनिक और घातक हथियार भी मिले हैं, जिनकी जांच की जा रही है यह फैक्ट्री मलिहाबाद थाने से महज 500 मीटर की दूरी पर संचालित हो रही थी

दवा की दुकान चलाता था सलाउद्दीन उर्फ लाला

हिरासत में लिए गए सलाउद्दीन उर्फ लाला मलिहाबाद के मिर्जागंज क्षेत्र के निवासी हैं उनके परिवार में पत्नी के अलावा दो बेटियां हैं, जिनमें से एक नॉर्वे में रहती है और दूसरी लखनऊ की इंटीग्रल यूनिवर्सिटी में पढ़ाई कर रही है कुछ साल पहले तक सलाउद्दीन डाकघर के पास एक दवा की दुकान चलाते थे पुलिस को संदेह है कि सलाउद्दीन लंबे समय से अवैध हथियारों के कारोबार में शामिल था और उनके हथियार आसपास के क्षेत्रों में सप्लाई किए जा रहे थे

पुलिस की कार्रवाई और जांच

मलिहाबाद थाना प्रभारी और रहीमाबाद पुलिस ने मुखबिर की सूचना के आधार पर यह छापेमारी की ऑपरेशन में वरिष्ठ पुलिस अधिकारी भी मौके पर मौजूद थे और स्थिति का जायजा ले रहे थे. पुलिस ने सलाउद्दीन के घर को सील कर दिया है और बरामद सामग्री की फॉरेंसिक जांच शुरू कर दी है पुलिस अधीक्षक (लखनऊ) ने बताया कि सलाउद्दीन से पूछताछ में उनके सहयोगियों और हथियारों की सप्लाई चेन के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिलने की उम्मीद है

पुलिस ने घर पर मौजूद सलाउद्दीन और उसकी पत्नी, बेटी और एक लड़के से इस बारे में पूछताछ की। सलाउद्दीन को गिरफ्तार कर लिया गया है। पुलिस को आशंका है कि घनी आबादी वाली इस बस्ती में लोगों का आना-जाना आसान है। इसलिए बड़ी संख्या में अजनबी इसके घर पर आते-जाते थे।

सलाउद्दीन घर में ही हथियार और कारतूस बनाकर राज्य के दूसरे हिस्सों में सप्लाई कर रहा था। मोहर्रम नजदीक है इसलिए पुलिस चौकन्नी हो गई है। सलाउद्दीन के घर से हथियारों के साथ प्रतिबंधित जानवरों के सिंह और खाल भी मिले हैं। पुलिस को वन्यजीव तस्करी से भी सलाउद्दीन का संबंध दिख रहा है।

आतंकी कनेक्शन की आशंका

पुलिस और एसटीएफ की प्रारंभिक जांच में इस बात की आशंका जताई जा रही है कि सलाउद्दीन का अवैध हथियारों का कारोबार किसी बड़े नेटवर्क या आतंकी संगठन से जुड़ा हो सकता है छापेमारी के दौरान बरामद हथियारों की प्रकृति और उनकी भारी मात्रा ने जांच एजेंसियों को सतर्क कर दिया है पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि ये हथियार कहां सप्लाई किए जा रहे थे और इस नेटवर्क में और कौन-कौन शामिल हैं