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सुप्रीम कोर्ट का ‘आंदोलनजीवी’ किसानों को झटका : ‘बंद ही रहेगा शंभू बॉर्डर, JCB लेकर नहीं कर सकते प्रदर्शन’: 15 अगस्त को दिल्ली कूच का किया था ऐलान

सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब और हरियाणा के बीच शंभू बॉर्डर को अभी बंद ही रखने का आदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान कहा कि किसान JCB लेकर प्रदर्शन करने नहीं आ सकते। कोर्ट ने कहा है कि वह अब एक कमेटी बनाएगा जो किसानों और सरकार, दोनों का पक्ष सुनेगी।

सुप्रीम कोर्ट को इन आन्दोलनजीवी किसानों और इनको समर्थन देने वाली पार्टियों से पूछना चाहिए कि जब भी देश में चुनाव होते हैं, कोई विदेशी भारत आता है तभी आंदोलन क्यों होता है? दूसरे, आंदोलन में JCB और टैंकनुमा JCB का क्या काम? खालिस्तान ज़िन्दाबाद, प्रधानमंत्री की मौत, और ऐशोआराम की हर सुविधा होना क्या आंदोलन होता है? लाल किला पर चढ़कर उपद्रव करना क्या आंदोलन कहलाता है? आंदोलन में आतंकवादियों की रिहाई की आवाज़ उठाना क्या किसान आंदोलन है?

24 जुलाई, 2024 को शंभू बॉर्डर से बैरिकेड को लेकर हुई सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कई महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ की। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वह कुछ प्रबुद्ध जनों की एक कमेटी बनाएगा जो इस मसले का हल निकालेगी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पंजाब और हरियाणा इस कमेटी के लिए नाम सुझा सकते हैं।

सुप्रीम कोर्ट ने तब तक शंभू बॉर्डर को बंद रखने का आदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि इसके बाद ही पंजाब और हरियाणा आपस में बातचीत करके बैरिकेड हटाने पर काम करेंगे और चरणबद्ध तरीके से उन्हें हटाएँगे। तब तक दोनों राज्य यथास्थिति बनाएँ रखें।

सुप्रीम कोर्ट में किसान और बैरिकेड के मामले की सुनवाई के दौरान प्रदर्शन के तरीके पर पर भी टिप्पणी की गई। सरकार की तरफ से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि किसान प्रदर्शन के नाम पर टैंक और बख्तरबंद गाड़ियाँ लेकर आना चाहते हैं।

इस पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि किसान ऐसे प्रदर्शन नहीं कर सकते। सुप्रीम कोर्ट ने सरकार और किसानों के बीच विश्वास की कमी की बात कही। सुप्रीम कोर्ट ने इस दौरान पंजाब का भी पक्ष सुना जिसने कहा कि शंभू बॉर्डर बंद होने के कारण उसे आर्थिक नुकसान हो रहा है।

पंजाब और हरियाणा के बीच पड़ने वाला शंभू बॉर्डर बीते फरवरी माह से ही बंद है। यहाँ किसानों ने डेरा जमाया हुआ है और वह दिल्ली आकर प्रदर्शन करना चाहते हैं। उन्होंने हाल ही में 15 अगस्त को दिल्ली आकर प्रदर्शन करने का ऐलान किया है। पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट ने हाल ही में इस मामले पर सुनवाई करते हुए हरियाणा को आदेश दिया था कि वह बैरिकेड हटा दे। इस निर्णय के विरुद्ध हरियाणा सरकार ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था जिसने हाई कोर्ट के फैसले से इतर बॉर्डर खोलने पर अभी के लिए रोक लगाई है।

एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट ने किसान आंदोलन - 2 में रायता फैला दिया - मीलॉर्ड, किसान ट्रैक्टर ट्रॉली और JCB के बगैर आएंगे, क्या आप गारंटी लेंगे ? पहले बताएं कि पहली किसान समिति की रिपोर्ट का क्या हुआ -

सुभाष चन्द्र

किसान आंदोलन 2 भी राजनीति का अखाड़ा बन गया लगता है, और जैसे पहले  सुप्रीम कोर्ट ने रायता फैलाया था, उसी तरह इस बार भी फ़ैलाने का कार्यक्रम बना दिया है जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने। बगैर जमीनी हकीकत को जाने आर्डर पर आर्डर दिए जाते हैं

किसान आंदोलन पार्ट-1 में भी सुप्रीम कोर्ट ने ऐसा ही किया था, किसी बॉर्डर को खाली कराने के लिए कोई पहल नहीं की जबकि कई बार लोगों ने याचिका लगाई लेकिन आज शम्भू बॉर्डर को खुलवाने के लिए उतावले हैं

लेखक 
चर्चित YouTuber 
यह शंभू बॉर्डर सुरक्षा को ध्यान में रख कर हरियाणा सरकार ने बंद किया हुआ है

10 जुलाई को पंजाब & हरियाणा हाई कोर्ट ने हरियाणा को आदेश दिया कि 7 दिन में शंभू बॉर्डर से barricades हटा दिए जाएं;

12 जुलाई को सुप्रीम कोर्ट पूछता है कि “कोई राज्य हाईवे कैसे बंद कर सकता है, Traffic Regulate करना राज्य का काम है हम कह रहे हैं कि बॉर्डर भी खोलिए और Control भी कीजिए” ये सभी टिप्पणियां अपनी आदत के अनुसार “मौखिक रूप” से की

आज मीलॉर्ड ने तुषार मेहता से पूछा कि अगर किसान बगैर ट्रैक्टर के दिल्ली आते हैं तो?

लेकिन मीलॉर्ड क्या आप गारंटी ले सकते हैं कि किसान बिना ट्रेक्टर आएंगे और वादा करके भी वे न आये और दंगा किया तो आप क्या जिम्मेदारी लेंगे? तुषार मेहता ने कहा कि “नेशनल हाईवे पर JCB और ट्रैक्टर ट्रॉली की इजाजत नहीं दे सकते बॉर्डर की दूसरी तरफ 500 ट्रैक्टर ट्राली बख्तरबंद के रूप में मौजूद हैं। उन्होंने एसी लगा रखा है गाड़ियों में हम उस बात से चिंतित हैं कि टैंक के रूप में उन्होंने जो गाड़ियों को बनाया है, वो चिंता का विषय है” 

मीलॉर्ड कहते हैं किसी ऐसे व्यक्ति को किसानों से बातचीत के लिए भेजा जाए जो किसानों का भरोसा जीत सके, तो मीलॉर्ड, एक बार आप ही जाकर देख लीजिए वो कितना सुनते हैं आपकी, और आप किसानों को दिल्ली क्यों लाना ही चाहते हैं?

किसान आंदोलन-1 में भी दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट से मांग की थी 26 जनवरी 2021 के किसानों के मार्च पर बैन लगा दीजिए लेकिन चीफ जस्टिस शरद बोबडे ने मना कर दिया ये कहते हुए कि कानून व्यवस्था संभालना आपका काम है फिर जो तांडव किसानों ने किया वह सब जानते है लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कोई जिम्मेदारी नहीं ली

आज फिर वही  दोहराना चाहते हैं मीलॉर्ड कि बॉर्डर खोल दो लेकिन कंट्रोल करो मतलब बॉर्डर की दूसरी तरफ जो 500 ट्रैक्टर ट्राली बख्तरबंद के रूप में मौजूद हैं उनसे मुकाबला करो जो कभी भी बेकाबू हो सकते हैं

आज हरियाणा सरकार की अपील पर यथास्थिति बनाए रखने के आदेश दिए मीलॉर्ड ने और एक विशेषज्ञों की समिति बनाने के आदेश दिए जिसकी रिपोर्ट आने तक यथास्थिति बनी रहेगी केंद्र और दोनों राज्यों से विशेषज्ञों के नाम सुझाने को कहा है

ऐसा रायता समिति बनाने का CJI बोबडे ने भी फैलाया था और समिति की रिपोर्ट पर 8 महीने तक कोई फैसला नहीं लिया गया, शायद किसी ने रिपोर्ट पढ़ी ही नहीं और अब एक बार फिर वही समिति का राग शुरू कर रायता फैलाने का काम किया है मीलॉर्ड ने

‘ये बैठेगी वहाँ पे, मेरी माँ वहाँ बैठी थी’: कंगना रनौत को थप्पड़ मारने वाली कुलविंदर का भाई है ‘किसान नेता’, CISF में पति भी तैनात

कुलविंदर कौर (दाएँ), के भाई शेर सिंह (बाएँ) ने कंगना रनौत (बीच में) को थप्पड़ मारने का समर्थन किया है (चित्र साभार: KanganaTeam, @iAnkurSingh & Gagan4344/X)
हिमाचल प्रदेश के मंडी से सांसद चुनी गई अभिनेत्री कंगना रनौत को चंडीगढ़ एयरपोर्ट पर थप्पड़ मारने वाली CISF सुरक्षाकर्मी कुलविंदर कौर के बारे में कई जानकारियाँ निकल कर सामने आई हैं। उसके खिलाफ CISF ने कार्रवाई भी चालू कर दी है।

यह सामने आया है कि वह पंजाब के सुल्तानपुर लोधी की रहने वाली है। उसकी आयु 35 वर्ष है। पता चला है कि कुलविंदर कौर का पति भी CISF में तैनात है। कुलविंदर का भाई शेर सिंह किसान मजदूर संघर्ष कमेटी का संगठन सचिव है। वह किसान आन्दोलन में सक्रिय रहा है। कुलविंदर कौर के भाई शेर सिंह ने इस घटना के बाद अपनी बहन का समर्थन किया है।

कुलविंदर कौर को चंडीगढ़ एयरपोर्ट पर दो वर्ष पहले तैनात किया गया था। घटना के बाद उसे हिरासत में ले लिया गया है। CISF ने उसके विरुद्ध निलम्बन की कार्रवाई की है। CISF ने इस घटना की जाँच के लिए एक पैनल का गठन किया है।

कुलविंदर कौर ने गुरुवार (6 जून, 2024) को चंडीगढ़ एयरपोर्ट पर दिल्ली जा रहीं सांसद कंगना रनौत को सुरक्षा जाँच के दौरान थप्पड़ मार दिया था। उसने इसके बाद एयरपोर्ट पर हंगामा भी मचाया था, इसकी कुछ वीडियो भी सामने आईं थी। इसमें वह कहते सुनी जा सकती है, ‘इसने ₹100-₹100 में महिलाओं बैठने को कहा था, ये बैठेगी वहाँ पर, मेरी माँ बैठी थी।”

कुलविंदर कौर का कहना था कि उसने कंगना रनौत को इसलिए थप्पड़ मारा क्योंकि उन्होंने किसान आंदोलन में बैठी महिलाओं को लेकर बयान दिया था। उसने बताया था कि इस किसान आंदोलन में उसकी माँ भी शामिल थी और उसे कंगना का बयान अखर रहा था।

कंगना रनौत ने इस मुद्दे के बाद एक वीडियो जारी किया था। उन्होंने बताया, “मैं बताना चाहती हूँ कि मैं पूरी तरीके से ठीक हूँ, सुरक्षित हूँ। आज जो चंडीगढ़ एयरपोर्ट पर जो हादसा सुरक्षा जाँच के दौरान हुआ। मैं सुरक्षा जाँच के बाद जैसे ही निकली, इसके बाद दूसरे केबिन में बैठी एक सुरक्षाकर्मी ने आकर मेरे मुँह पर मारा। वह गालियाँ देने लगी, उन्होंने पूछने पर बताया कि वह किसान आंदोलन का समर्थन करती हैं। मैं सुरक्षित हूँ लेकिन मैं पंजाब में उग्रवाद और आतंकवाद के बढ़ने को लेकर चिंतित हूँ।”

भारत पर उंगली उठाने वाला अमेरिका कालचक्र के लपेटे में, ब्रिटेन, जर्मनी भी भुगतेंगे और कनाडा अपने हाथ खुद जला रहा है; फिलिस्तीन के लिए प्रदर्शन हमास का समर्थन है

किसान आंदोलन या उपद्रवियों के जमावड़ा 
सुभाष चन्द्र

भारत में हुए प्रायोजित किसान आंदोलन के समय अमेरिका ब्रिटेन कनाडा और अन्य कई देशों ने लोकतंत्र के नाम पर आंदोलन का समर्थन किया जबकि हर कोई जानता था कि इन अनेक  देशो में पल रहे कई खालिस्तान समर्थक उस आंदोलन को आग देने का काम कर रहे थे भारत के ही राजनीतिक दलों को साथ लेकर जिसमें केजरीवाल और कांग्रेस प्रमुख थे। डेढ़ साल चले आंदोलन को चलने की पूरी छूट थी, किसी को न लाठी मारी गई और न गोली, लेकिन फिर ये देश भारत में लोकतंत्र ख़त्म होने का आरोप लगाते रहे।

ऐसे ऐसे लोग किसानों के लिए इन देशों से सामने आ गए जिन्होंने कभी रसोई में चाय भी नहीं बनाई होगी - Hollywood की Rihanna, अमेरिका की youtuber Amanda Cerny, कनाडा की youtuber Lilly Singh, Lebanese-American media personality and former Porn Actress Mia Khalifa और Swedish so called  environmental activist Greta Thunberg सब एक एक करके किसानों के नौटंकी करती नज़र आईं थी।

रिहाना

रिहाना के बाद स्वीडन की पर्यावरण एक्टिविस्ट ग्रेटा थनबर्ग, यूट्यूब स्टार लिली सिंह और हॉलीवुड एक्टर जॉन कुसेक ने भी भारतीय किसानों के संघर्ष को सपोर्ट किया है. इसके अलावा कुछ बॉलीवुड सेलेब्स मसलन अनुराग कश्यप, तापसी पन्नू, धर्मेंन्द्र, गुल पनाग, ऋचा चड्ढा, सोनम कपूर, प्रियंका चोपड़ा, दिलजीत दोसांझ और सोनू सूद जैसे सितारे भी किसानों को अपना समर्थन दे चुके हैं

आज जब अमेरिका की Universities में फिलिस्तीन के समर्थन में और इज़रायल के विरोध  मुस्लिम और वामपंथी छात्र प्रदर्शन कर रहे हैं तब ये किसान आंदोलन में कूदने फांदने वाली नज़ाक़तें खामोश बैठी हैं और अमेरिकी छात्रों का समर्थन नहीं कर रही क्योंकि इन्हे केवल भारत को अस्थिर करने के लिए “पगार” मिल रही थी अमेरिकी और कथित खालिस्तानी संस्थाओं से। अमेरिकी आंदोलन में कूदने से डर है कहीं गिरफ्तार न हो जाएं।

लेखक 
चर्चित यूटूबर 
भारत को लोकतंत्र का पाठ पढ़ाने की अमेरिका समेत कई देशो को आदत है। किसान आंदोलन में भारत का लोकतंत्र खतरे में दिखाई दिया इन्हे और केजरीवाल की गिरफ़्तारी में लोकतंत्र और न्याय व्यवस्था दोनों पर खतरा देखा इन लोगों ने। लेकिन ब्रिटेन, कनाडा और अब अमेरिका वैसे ही प्रदर्शन झेल रहा है। 

कनाडा ने ट्रक drivers के आंदोलन करने वालों पर गोली चला दी थी, ब्रिटेन ने भी कथित खालिस्तानियों को पेला था और अब अमेरिका भी फिलिस्तीन के समर्थन में और इज़रायल के विरोध में प्रदर्शन करने वाले छात्रों पर लाठी बरसा रहा है और गिरफ़्तारी भी कर रहा है और अब उसे समझ आ रहा होगा कि भारत के लिए समस्या खड़ी करने का ही यह परिणाम हो सकता है जो उसे ये सब झेलना पड़ रहा है।

अमेरिका, पाकिस्तान कनाडा और अन्य कई देश आज भी भारत को चुनावों में अस्थिर करने की कोशिश कर रहे हैं, कई देश, संगठन और कई सरकारें चाहती हैं मोदी चुनाव हार जाए। अमेरिका अपने देश में पिछले चुनाव में विदेशी (चीनी) हाथ को नहीं रोक सका था और अब ये आंदोलन में भी विदेशी हाथ होना स्वाभाविक है लेकिन अमेरिका के हाथ से आंदोलन निकल रहा है।

अमेरिका हमेशा धर्मनिरपेक्षता और मानवाधिकारों के नाम पर भारत पर मुस्लिमों के प्रति भेदभाव का आरोप लगा रहा है लेकिन एक दिन अब यही अमेरिका अपने ही देश में मुस्लिमों के हाथों फैलने वाली अस्थिरता को झेलेगा। उसे भी अपने देश में मुस्लिमों को छूट देना महंगा पड़ेगा जैसे ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस को पड़ रहा है।

अमेरिका समेत कई देशों में मुस्लिम फिलिस्तीन के समर्थन में और इज़रायल के विरोध में प्रदर्शन कर रहे हैं। फिलिस्तीन के समर्थन की आड़ में यह समर्थन परोक्ष रूप से “हमास” के लिए ही समर्थन है। जब अमेरिका में फिलिस्तीन/हमास के समर्थन में प्रदर्शन बर्दाश्त नहीं किया जा रहा जैसे वह गैर-कानूनी हैं तो भारत में कांग्रेस पार्टी का manifesto को हमास को समर्थन पूरी तरह सांप्रदायिक ही नहीं गैर कानूनी भी है। कांग्रेस यदि सत्ता में आ जाए तो वह पाकिस्तान के आतकियों के साथ “हमास” को भी भारत में हिंदुओं को कुचलने की खुली छूट दे देगी।

किसानों को MSP की कानूनी गारंटी देने का राहुल गाँधी का वादा हो गया हवा-हवाई! वायर के इंटरव्यू में खुली पार्टी की पोल; MSP देने की दूर तक कोई योजना नहीं

                      कांग्रेस के ‘डाटा एनलिस्ट डिपार्टमेंट’ के हेड प्रवीण चक्रवर्ती के साथ राहुल गाँधी

मोदी-योगी विरोध में विपक्ष स्वयं अपने ही बुने जाल में फंसते देखा गया है। CAA विरोध में बने शाहीन बाग़ से लेकर तथाकथित किसान आंदोलन तक सभी में विपक्ष बेनकाब हुआ। किसी न किसी तरह जॉर्ज सोरोस के हाथों बने कठपुतली ड्रामा सामने आ गया। अभी हुए किसान आंदोलन में कांग्रेस समेत सारा विपक्ष रो रहा था, चीख रहा था कि किसानों पर जुर्म हो रहा है, उनको फसलों की MSP क्यों नहीं दे देती सरकार? हम सत्ता में आये तो सभी 23 फसलों पर MSP देंगे, स्वामीनाथन रिपोर्ट लागू करेंगे। लेकिन कांग्रेस घोषणा पत्र ने पार्टी की कलाई खोल दी।  

कांग्रेस पार्टी ने लोकसभा चुनाव 2024 के लिए अपने घोषणापत्र में कई अव्यावहारिक वादे किए हैं, हालाँकि उसका सबसे बड़ा वादा किसानों को एमएसपी की कानूनी गारंटी देना है, खासकर उन 23 फसकों पर एमएमसी की गारंटी, जिनकी माँग किसान आंदोलन के दौरान की जा रही थी। लेकिन कांग्रेस इन गारंटियों को लेकर कितनी गंभीर है और इन गारंटियों को लेकर उसने कितने गंभीर तरीके से काम किया है, इसकी पोल तब खुल गई, जब कांग्रेस के ‘डाटा एनलिस्ट डिपार्टमेंट’ के हेड प्रवीण चक्रवर्ती ‘द वायर’ के साथ एक इंटरव्यू में शामिल हुए। वो राहुल गाँधी द्वारा स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के हिसाब से 23 फसलों की एमएसपी की गारंटी की बात से पीछे हटते दिखे।

द वायर के ‘पत्रकार’ करन थापर के इंटरव्यू में पहुँचे प्रवीण चक्रवर्ती के पास प्रदर्शनकारी किसानों की माँगों को लेकर किए गए कांग्रेस की गारंटी के वादे पर कोई जवाब नहीं था। किसान सरकार से 23 फसलों पर एमएसपी पर कानूनी गारंटी माँग रहे हैं। वो भी स्वामीनाथन आयोग की सिफारियों (C2+50% फॉर्मूला) के आधार पर। प्रवीण चक्रवर्ती ने बड़ी बेशर्मी से कह दिया कि कांग्रेस पार्टी ने ऐसा कोई वादा अपने घोषणा पत्र में नहीं किया है। यही नहीं, वो ये भी नहीं बता पाए कि अगर कांग्रेस सत्ता में आती है, तो वो किन खास फसलों पर एमएसपी की कानूनी गारंटी देगी।

राहुल गाँधी द्वारा स्वामीनाथन आयोग (जो एमएसपी के फार्मूले के रूप में सी2+50% का हवाला देता है) को लागू करने की गारंटी लेने के बावजूद प्रवीण चक्रवर्ती ने किसानों की इनपुट लागत का 1.5 गुना न्यूनतम समर्थन मूल्य से पल्ला झाड़ लिया। उन्होंने कांग्रेस के घोषणापत्र (पेज 17) का हवाला देते हुए साफ कहा कि फसलों की एमएसपी पर कानूनी गारंटी के बारे में विस्तार से घोषणापत्र में जानकारी नहीं दी गई है। उन्होंने इतना लिखा है कि “कांग्रेस स्वामीनाथन आयोग की सिफारिश के अनुसार, हर साल सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) को कानूनी गारंटी देगी।”

इस दौरान जब करन थापन ने प्रवीण चक्रवर्ती से कहा कि अगर सरकार सभी 23 फसलों पर एमएसपी की कानूनी गारंटी देती है, तो इससे खाद्य महंगाई 25-30% बढ़ जाएगी। इस बात पर कांग्रेस के डाटा एनलिस्ट डिपार्टमेंट के हेड ने कहा, “आपका दावा काल्पनिक है, क्योंकि मेनिफेस्टों में 23 गिनती का कोई जिक्र नहीं है। न ही स्वामीनाथन आयोग या किसी फॉर्मूले का जिक्र है।”

इस दौरान जब करन थापर ने पूछा कि ”कांग्रेस कितनी फसलों पर एमएसपी की गारंटी देगी अगर सभी 23 पर नहीं देगी तो?” इस पर प्रवीण चक्रवर्ती ने कोई जवाब नहीं दिया। उन्होंने कहा कि ‘इस पर विस्तार से बहस की जरूरत है।’ थापर ने इस दौरान चक्रवर्ती को ‘प्रदर्शनकारी किसानों’ की माँग पर पार्टी के आश्वासन को याद दिलाया तो चक्रवर्ती उखड़ पड़े। उन्होंने कहा, “किसान एमएसपी पर कानूनी गारंटी चाहते थे, उन्हें कानूनी गारंटी दी गई है। कौन सी फसले होंगी, कौन सा फॉर्मूला होगा, कौन सी नई फसलों को उस लिस्ट में शामिल किया जाएगा और कौन सी मौजूदा फसलों को हटाया जाएगा, इस पर फैसला अभी लिया जाना बाकी है।”

थापर ने जोर देकर कहा, “एक घोषणापत्र विशिष्ट और सटीक होना चाहिए। आपने पहले तर्क दिया कि आप लागत निर्धारण नहीं कर सकते, हमने समझाया है कि लागत निर्धारण क्यों आवश्यक था। आपको जानकारियों का अभाव है। आप को ये नहीं पता है कि कितनी फसलों को एमएसपी में शामिल किया जाएगा, अब आप फॉर्मूले पर भी गोलमोल जवाब दे रहे हैं कि सी2+50% फॉर्मूला नहीं, कोई और फॉर्मूला हो सकता है।”

सवाल का जवाब देने के बजाय, प्रवीण चक्रवर्ती ने भाजपा पर अपने घोषणापत्र में विशिष्ट बातें नहीं होने का आरोप लगाया। उन्होंने कहा, “हमारे लोग (कांग्रेस) बजट नहीं बना रहे हैं। हमारे पास बहुत सारी जानकारी है ही नहीं।

करण थापर ने जोर देकर कहा, “मैं आपसे पूछ रहा हूँ कि क्या आप सभी 23 फसलों पर एमएसपी की गारंटी देंगे, आपका जवाब था कि हम ऐसा कर सकते हैं, फिर आप बोल रहे हैं कि शायद हम नहीं कर सकते। आपने ही कहा कि एमएमसपी का फॉर्मूला C2+50% नहीं हो सकता। आप एमएसपी पर गारंटी को लेकर दो तरह की बातें कर रहे हैं।”

राहुल गाँधी ने फरवरी में दी थी गारंटी

इस साल फरवरी में कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने एक ट्वीट में लिखा था, “किसान भाइयों आज ऐतिहासिक दिन है! कांग्रेस ने हर किसान को फसल पर स्वामीनाथन कमीशन के अनुसार MSP की कानूनी गारंटी देने का फैसला लिया है। यह कदम 15 करोड़ किसान परिवारों की समृद्धि सुनिश्चित कर उनका जीवन बदल देगा। न्याय के पथ पर यह कांग्रेस की पहली गारंटी है।”
कांग्रेस के ‘डेटा एनालिटिक्स डिपार्टमेंट’ के हेड द्वारा एमएसपी वादों पर कोई ठोस जवाब नहीं देने का फैसला दर्शाता है कि कांग्रेस अपने ही वादों और योजनाओं को वास्तविक रूप से लागू करने को लेकर कितनी गंभीर है। वो भी तब, जब उसके नेता राहुल गाँधी अपनी गारंटियों में स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों के आधार पर एमएसपी को कानूनी गारंटी देने की बात कह रहे हैं।

कथित किसान आंदोलन और समर्थक हो रहे बेनकाब : ‘इनके चुतड़ा पर कील गाड़नी चाहिए’: बोले हरियाणा के किसान- पंजाब के लोगों ने हमारे बच्चों को बनाया नशेड़ी

                                    हरियाणा के किसान (फोटो साभार : Youtube/NewsViews)
किसान आंदोलन 1.0 में लाल किले पर चढ़कर हंगामा करने से जनता को मालूम हो गया कि ये किसान नहीं गुंडे हैं, क्योकि कोई किसान ऐसी शर्मनाक गिरी हुई हरकत नहीं कर सकता। और अब चल रहे किसान आंदोलन के नाम पर देश में अराजकता फ़ैलाने की घिनौनी हरकत से ये सभी बेनकाब हो गए हैं, जो शांति के नाम अशांति फैला रहे हैं। इनकी मानसिकता के जगजाहिर होने पर आंदोलनकारी मझधार में फंस चुके हैं, लेकिन केजरीवाल सरकार इन्हे उकसाने से बाज नहीं आ रही। 

किसान आंदोलन 1.0 से लेकर वर्तमान में चल रहे उपद्रवी आंदोलन को समर्थन देने वाली पार्टियां देश को बताएं कि क्या विश्व में ऐसा उपद्रवी आंदोलन देखा है, जिसमे प्रधानमंत्री के मौत की  नारेबाजी हो? दूसरे शब्दों में कहा जाये कि विपक्ष अपनी विफलता का ढोल पीट रहा है। 


एक तरफ ये तथाकथित किसान कर्जा माफ़ करने को कह रहे हैं, फिर इस जमावड़े में लोगों को देने के लिए रूपए कहाँ से आ रहे और कौन दे रहा है? 

हकीकत यह है कि विपक्ष के पास मोदी के विरुद्ध कोई मुद्दा ही नहीं होने के कारण उपद्रवियों को मैदान में उतार दिया, जो आंदोलन के चलते इसी विपक्ष को कमजोर कर रहा है। वास्तव में केजरीवाल ने पंजाब में सरकार बनाने के लिए किसानों से 22 फसलों पर MSP देने के लिए 5 मिनट में कानून बनाने का झूठा वायदा कर सत्ता हथाई थी, जिसे पूरा करने अपना ठीकरा मोदी सरकार पर फोड़ने की असलियत सामने आ चुकी है। दूसरे, यह आंदोलन चंडीगढ़ तक सीमित रहना था, लेकिन अपने ही बुने जाल में फंसते देख पंजाब और दिल्ली के मुख्यमंत्रियों भगवंत सिंह मान और अरविन्द केजरीवाल ने अपनी खाल बचाने इसे दिल्ली की मोड़ दिया। और इसे कांग्रेस सहित अन्य दल भी समर्थन दे रहे हैं। जबकि फरवरी 21 को मल्लिकार्जुन खड़के ने भी कह दिया कि सभी फसलों पर MSP देना संभव नहीं।  

किसान आंदोलन 2.0 चर्चा में है। दरअसल, साल 2020 से साल 2021 के आखिर तक दिल्ली में देश भर के किसानों ने जोरदार प्रदर्शन किया था। करीब डेढ़ तक चले प्रदर्शनों के बाद केंद्र सरकार ने तीन कानूनों को वापस ले लिया था। इस दौरान पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश के किसानों ने दिल्ली को लगभग बंधक लिया था। अब उन प्रदर्शनों को दोहराने की कोशिश में पंजाब के किसान फिर से दिल्ली का रूख कर चुके हैं। हरियाणा के बॉर्डर पर पंजाब से आ रहे किसानों को शंभू प्वॉइंट पर रोक लिया गया है। इसके अलावा दिल्ली में उनके घुसने की कोशिशों को विफल किया जा रहा है। इस बीच, केंद्र सरकार पूरी तरह से सक्रिय है और किसानों से लगातार बातचीत कर रही है। वहीं, 20 फरवरी 2024 को एक यू-ट्यूब चैनल से हरियाणा के किसानों ने किसान आंदोलन 1.0 को लेकर गहरी नाराजगी जताई है।

यूट्यूब चैनल न्यूज व्यूज से बातचीत में हरियाणा के किसानों ने पंजाब के किसानों को लेकर गुस्सा जाहिर किया। उन्होंने कहा कि पंजाब से आए लोगों ने हरियाणा के युवाओं को उनकी राह से भटका दिया। उन्होंने उन्हें बहकाया और नशे का आदी बना दिया। किसानों ने बताया, “किसान आंदोलन 1.0 से पहले हरियाणा के युवाओं में ‘चित्ता’ का कोई नशा नहीं था। वो जानते भी नहीं थे कि ये आखिर है क्या चीज? हमारे बच्चे उन प्रदर्शनों के दौरान नसे के आदी बन गए। इसके लिए जिम्मेदार कौन है?” जिन्हें नहीं पता, उन्हें बता दें कि हेरोइन के नशे को ‘चित्ता’ कहते हैं, जो पंजाब में काफी गहरे तक जड़ें जमा चुका है।

हमें बेवकूफ बनाया

मीडिया से बातचीत करते हुए हरियाणा के किसाों ने कहा कि ये प्रदर्शन सिर्फ आने वाले लोकसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए किए जा रहे हैं। उन किसानों में से एक ने कहा, “उन्हें विदेशों से पैसे मिल रहे हैं। देश विरोधी गतिविधियाँ हो रही हैं। लेकिन हम वो सब फिर से नहीं (जो पिछली बार हुआ-नशे का फैलाव इत्यादि) होने देंगे। उन्होंने हमें बेवकूफ बनाया। ऐसे में इस बार हम उन्हें समर्थन नहीं दे रहे।” उन्होंने आगे कहा, “हमने पंजाब में अपने प्रधानमंत्री को खतरे में डाला, लेकिन ऐसा फिर से नहीं होगा।”
हरियाणा के किसानों ने प्रदर्शनकारियों के लगातार दिल्ली जाने की बात पर नाराजगी जताई। उन्होंने कहा, “सरकार जो कह (सरकार का ऑफर) रही, वो मान नहीं रहे। वो सिर्फ ‘दिल्ली’ ‘दिल्ली’ ‘दिल्ली’ की रट लगाए पड़े हैं।” उन्होंने अन्ना आंदोलन के समय को याद करते हुए आगे कहा, “उस समय जो भी प्रदर्शन वाली जगह जा रहे थे, उनकी जाँच हो रही थी। सबकुछ आराम से चल रहा था। मैं गारंटी लेकर कहता हूँ कि शराब और ड्रग्स की सल्पाई रोक दी जाए, फिर देखो 4 दिन में सारे गायब हो जाएँगे।”
इस दौरान जब पत्रकार ने उसके पूछा कि किसान सरकार से भिड़ने की प्लानिंग कर चुके हैं, वो उन्हें रोकने के लिए लगाए गए बैरिकेटिंग को उखाड़ने की तैयारी कर चुके हैं, इस पर किसान ने कहा, “अगर कोई देश में अव्यवस्था फैलाना चाहता है, तो सरकार भी कुछ सुरक्षा के कदम उठाती है। अगर उनके लिए रोड खोल दिए जाए, तो वो (प्रदर्शनकारी) उस रोड को जाम कर देंगे और अर्थव्यवस्था को ठप कर देंगे। इस क्षेत्र की हजारों कंपनियाँ ने इस इलाके को छोड़ (पहले किसान आंदोलन के समय) दिया। हजारों लोग बेरोजगार हो गए। उन (प्रदर्शनकारियों) ने पूरे इलाके को बर्बाद कर दिया। जो कंपनियाँ वापस नहीं आई, जो यहाँ से चली गई। हरियाणा के लोग एक बार फिर से इसके लिए (इन प्रदर्शनों के लिए, नुकसान के लिए) तैयार नहीं हैं।”
पत्रकार ने जब किसानों ने बातचीत के दौरान कहा कि प्रदर्शन कर रहे किसान ‘अन्नदाता’ हैं, तो हरियाणा के किसानों ने जवाब में कहा, ‘हर कोई दाता है। ड्राइवर भी दाता है। घर बनाने वाला मजदूर भी दाता है। अर्थव्यवस्था में सभी लोग अहम किरदार निभाते हैं। हर किसी का रोल अलग-अलग है।’ एक किसान ने इंडी गठबंधन की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘विपक्षी गठबंधन और कॉन्ग्रेस ने I.N.D.I.A. नाम रख लिया, इसका मतलब ये नहीं कि वो चुनाव जीत ही जाएँगे।’ किसान ने आगे कहा, “सोचिए, अगर झारखंड देश को कोयला देना बंद कर दे, तो ये तथाकथित ‘पंजाब के अन्नदाता’ अपना कोई काम नहीं कर पाएँगे।”
किसानों ने कहा कि सरकार ने चौथे दौर की वार्ता के बाद एक बेहतरीन प्लान (4 फसलों पर 5 साल के लिए गारंटी) बनाया, लेकिन प्रदर्शनकारियों ने उसे नकार दिया। उन्होंने कहा, “वो देश भर में अगले 15 दिनों में अव्यवस्था फैलान चाहते हैं। प्रदर्शन करने वाले लोग पीएम मोदी के खिलाफ माहौल बनाना चाहते हैं। वो सिर्फ वोट काटने आए हैं।” उन्होंने आगे कहा, “पंजाब में जो मजदूर किसानों के खेतों में काम करते हैं, क्या उनके लिए भी इन लोगों (प्रदर्शनकारियों) ने पेंशन की माँग की? ये मामला सिर्फ किसानी का नहीं है। पंजाब में सबसे ज्यादा बंधुआँ मजदूर मिले हैं, उनके लिए क्या माँग कर रहे हैं?”
प्रदर्शन के दौरान किसानों की मौत से जुड़े सवाल पर किसान ने कहा, “हमारे गाँव में भी 4 लोगों की मौत हुई। अगर उनकी जान शराब पीकर या हार्ट अटैक से गई है, तो उन्हें शहीद नहीं कर सकते। एक काम करिए, आप 2 लाख लोगों को इकट्ठा करिए, कम से कम 4 लोग प्राकृतिक तरीके से दम तोड़ देंगे, इसका मतलब ये नहीं है कि उन सभी को शहीद बोला जाए।”

सभी तबकों का ध्यान रखे सरकार

एमएसपी के सवाल पर किसान ने कहा, “सरकार ने फसलों पर एमएसपी दी, जिसकी उसे जरूरत लगी। सरकार को पूरे देश के बारे में सोचना पड़ता है। सरकार को समाज के हर तबके के लिए काम करना पड़ता है। हर सवात किसानों के लिए फायदा चाहता है, लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि समाज के अन्य वर्गों को अनदेखा कर दिया जाए।”

‘प्रधानमंत्री कोई तानाशाह नहीं’

इस दौरान पत्रकार ने जब पूछा कि कॉन्ग्रेस पार्टी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को तानाशाह कहती है, तो किसानों ने कहा, “अगर किसी तरह की तानाशाही होती, तो किसान साल भर से ज्यादा समय नहीं बैठ पाते। लोगों को चौटाला का राज याद है? 50 गोलियाँ और 100 पुलिस वाले किसी भी विरोध प्रदर्शन को खत्म कर देती हैं।” उन्होंने आगे कहा, “अगर पीएम मोदी तानाशाह होते, तो वो उन्हें पंजाब के एक फ्लाइओवर पर नहीं रोक पाते। क्या तुम्हें लगता है कि पीएम मोदी के पास ताकत नहीं है?” किसानों ने आरोप लगाया कि ये प्रदर्शन सिर्फ एक ही परिवार को फायदा पहुँचाने के लिए जुटे हुए हैं, ऐसे लोग भ्रष्टाचारी हैं और भ्रष्टाचार का समर्थन करते हैं।
किसानों ने कहा कि बीजेपी के शासनकाल में जो जिस लायक है, उसे उस तरह का काम मिल रहा है, चाहे वो किसी भी राजनीतिक विचारधारा का है। किसानों ने कहा, “कोई काबिल है, तो उसे काम मिल रहा है। ये सरकार ऐसी नहीं है, जिसमें सिर्फ घूसखोरों को नौकरी मिले।”

राष्ट्र विरोधी गतिविधियों को न मिले अनुमति

एक किसान ने कहा, “हम किसानों के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन जो लोग भारत विरोधी नारेबाजी कर रहे हैं, उनके खिलाफ कड़ा कदम उठाना चाहिए। हमारे सामने कोई खालिस्तानी नारे लगाएगा या हमारे प्रधानमंत्री के लिए अभद्र बातें करेगा, तो हम उसे छोड़ेगे नहीं। राष्ट्र ध्वज और लाल किला हमारे गर्व हैं। हम बिल्कुल नहीं चाहेंगे कि कोई लाल किले पर जाए और अपनी पसंद का झंडा फहरा आए।” उन किसानों में से एक ने कहा, “हरियाणा के किसान इस बात को समझ चुके हैं कि पंजाब सरकार हमारे साथ धोखा कर रही है। वो हमारा इस्तेमाल कर रही है। वो हमें सामने रखकर सबकुछ करना चाहती है, पता है क्यों? क्योंकि हम लोग इमोशनल हैं।”

किसान आंदोलन 1.0 के दौरान हरियाणा के युवा हुए बर्बाद

किसान ने आगे कहा, ‘मैंने एक लोकल नेता का इंटरव्यू सुना, उन्होंने कहा कि हमारे बच्चे नशेड़ी बन गए। पिछले प्रदर्शन से पहले कोई भी लड़का ‘चिट्टा’ का नशेड़ी नहीं था। उन्हें तो पता भी नहीं था कि ये होता क्या है? हमारे बच्चे इन प्रदर्शनों के दौरान नशे में डूब घए। इसके लिए कौन जिम्मेदार है? हम उन्हें इसलिए नहीं सपोर्ट कर रहे, क्योंकि हमें अपने बच्चों को नशे से बचाना है। ‘
उन्होंने कहा कि अगर इन प्रदर्शनों के दौरान हरियाणा के किसी युवा की जान जाती है, तो इसके लिए जिम्मेदार कौन होगा? “वो लोग तो उसे शहीद बता देंगे, लेकिन किसान घोषित कर देने भर से हम उसे वापस नहीं ला पाएँगे न?” उन्होंने आगे कहा, “प्रदर्शनकारी पेंशन चाहते हैं। वो लोन माफी चाहते हैं। ठीक है, हम ये बात समझते हैं। लेकिन आम नागरिकों पर इसके बदले में जो 14-20 लाख करोड़ का बोझ पड़ेगा, उसका क्या? हमें लिखित में दें कि टैक्स पेयर्स की पैसों से लोनमाफी नहीं दी जाएगी, फिर उन लोगों को एमएसपी दे दें।”
एक किसान ने कहा, “पिछली बार उन लोगों ने (पंजाब के किसानों ने) कहा था कि वो SYL मुद्दे पर भी बातचीत करेंगे, लेकिन उन्होंने नहीं किया। उन्होंने फिर से प्रदर्शन शुरू कर दिया। पहले वो पानी समझौते के मुद्दे पर बात करें, फिर हम प्रदर्शनों के बारे में बात करेंगे। “

केंद्र सरकार और किसानों के बीच पाँचवें दौर की वार्ता जल्द

किसानों के साथ चौथे दौर की वार्ता में केंद्र सरकार ने रविवार (18 फरवरी 2024) को नए प्रस्ताव दिए थे, जिसके बाद किसानों ने कहा था कि वो बातचीत करके सरकार को सूचित कर देंगे। सरकार ने अपनी तरफ से चौथे दौर की वार्ता के दौरान जो प्रस्ताव दिया था, उसमें एमएसपी पर फसल खरीदने के लिए 5 साल के कॉन्ट्रैक्ट की बात कही थी। जिसमें ये कॉन्ट्रैक्ट एनसीसीएफ, NAFED और CCI जैसी सहकारी समितियों के साथ होनी थी। इसमें खरीद की लिमिट भी नहीं रहेगी। सरकार ने इसमें उड़द दाल, मसूर दाल और मक्का-कपास को जोड़ने और खरीद के लिए पाँच साल की गारंटी की बात कही थी।
इस बैठक में किसानों के 14 प्रतिनिधि और केंद्र सरकार के किसान कल्याण मंत्री अर्जुन मुंडा, वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल और गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय शामिल हुए थे। इनके अलावा बैठक में पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान भी मौजूद थे। हालाँकि बाद में किसानों ने कहा था कि उन्हें एमएसपी से कम पर कुछ भी मंजूर नहीं है।

5 साल का कॉन्ट्रैक्ट, 4 फसलों पर MSP की गारंटी, बिना किसी लिमिट के खरीद: मोदी सरकार ने पेश किया फॉर्मूला, तथाकथित किसानों ने माँगा समय

                                         तथाकथित किसानों के सामने सरकार ने रखा प्रस्ताव (तस्वीर साभार: ANI)
केंद्र सरकार द्वारा न्यूनतम समर्थन मूल्य पर प्रस्ताव लाने के बाद किसान प्रदर्शनकारी थोड़े शांत हुए हैं। उन्होंने सरकार से चौथे दौर की बातचीत के बाद अपना प्रदर्शन कुछ समय रोकने का ऐलान किया। ये प्रस्ताव सरकार रविवार (18 फरवरी 2024) को लेकर आई।
आखिर ये तथाकथित किसान देश को किस दिशा की ओर मोड़ रहे हैं? विदेशी भारत विरोधियों की कठपुतली बने लोग देश हितैषी हो ही नहीं सकते? जिस काम का वायदा पंजाब विधान सभा चुनावों में आम आदमी पार्टी ने किया था, उसे केंद्र पर क्यों थोपा जा रहा है? क्या केंद्र सरकार पंजाब में आम आदमी पार्टी के मकड़जाल में फंस गयी है? जो किसान खालिस्तान की मांग करे वो किसान नहीं हो सकता? अगर सरकार इन उपद्रवी किसानों के आगे झुकती है तो किसानों से इनकी आय पर टैक्स वसूला जाये। दोनों हाथों में लड्डू आखिर कब तक? पूछा जाये जो ऋण लिया था, वह कहाँ खर्च हुआ और तुम्हारे पास ये बंगले और आलीशान कारें कहाँ से आयीं? 

इसमें कहा गया कि एमएसपी पर फसल खरीदने के लिए 5 साल का कॉन्ट्रैक्ट किया जाएगा। ये कॉन्ट्रैक्ट एनसीसीएफ, NAFED और CCI जैसी सहकारी समितियों के साथ होगा। इसमें खरीद की लिमिट नहीं होगी। जिन उपजों को लेकर यह प्रस्ताव दिया दया है उनमें उड़द दाल, मसूर दाल और मक्का-कपास आदि शामिल हैं।

 

केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने बातचीत को बताया सकारात्मक

केंद्र सरकार और किसानों के बीच रविवार को बातचीत हुई थी। केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल ने इस बैठक को सकारात्मक बताया। उन्होंने कहा कि नए विचारों और सुझावों के साथ हमने भारतीय किसान मजदूर संघ और अन्य किसान नेताओं के साथ सकारात्मक चर्चा की। उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार ने किसानों के सामने फसलों के विविधीकरण का प्रस्ताव रखा जिसके तहत अलग-अलग फसलें उगाने पर बिन किसी लिमिट के उन्हें एमएसपी पर खरीदा जाएगा।
वह बोले– “नेशनल कोऑपरेटिव कंज़्यूमर्स फ़ेडरेशन (एनसीसीएफ़) और नेशनल एग्रीकल्चरल कोऑपरेटिव मार्केटिंग फे़डरेशन ऑफ़ इंडिया (नेफ़ेड) जैसी कोऑपरेटिव सोसाइटियाँ उन किसानों के साथ समझौता करेंगी, जो तूर, उड़द, मसूर दाल या मक्का उगाएँगे और फिर उनसे अगले पाँच साल तक एमएसपी पर फसलें खरीदी जाएँगी। वहीं कॉटन कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया के माध्यम से किसानों से 5 साल तक एमएसपी पर कपास की खरीद की जाएगी। इन खरीद की कोई सीमा नहीं होगी और इन सबके लिए एक पोर्टल तैयार किया जाएगा।”
केंद्रीय मंत्री ने कहा कि सरकार के इस प्रस्वताव से भूमिगत जलस्तर में सुधार होगा और पहले से खराब हो रही जमीन को बंजर होने से रोका जा सकेगा।

किसान नेताओं ने बैठक के बाद लिया सोचने का फैसला

इस बैठक में किसानों के 14 प्रतिनिधि और केंद्र सरकार के किसान कल्याण मंत्री अर्जुन मुंडा, वाणिज्य मंत्री पियूष गोयल और गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय शामिल हुए थे। इनके अलावा इस बैठक पंजाब के मुख्य मंत्री भगवंत मान भी मौजूद थे। किसान नेताओं ने सरकार के इस प्रस्वात के ऊपर कहा कि वह इस प्रस्ताव पर विचार करेंगे। उनका यह भी कहना है कि अभी सिर्फ एमएसपी के मुद्दे पर चर्चा हुई है। बाकी माँगे नहीं मानी गई हई हैं।
किसान नेताओं का कहना है कि वो अपने मंचों पर सरकार के प्रस्ताव पर अगले दो दिन तक चर्चा करेंगे और उसके बाद भविष्य की रणनीति तय होगी। किसान नेता सरवन सिंह पंढेर ने कहा, “हम 19-20 फ़रवरी तक इस मामले पर अलग-अलग मंचों पर चर्चा करेंगे और विशेषज्ञों की राय लेंगे। उसके बाद ही इस मामले पर कोई फैसला लिया जाएगा।” किसानों का कहना है कि अगर इन दो दिनों में प्रस्ताव पर सहमति नहीं बनी तो 21 फरवरी दिल्ली कूच करेंगे।

पंजाब सीएम भी थे बैठक में शामिल

इस बैठक में पंजाब सीएम भगवंत सिंह मान ने भी किसानों के हितों की रक्षा के लिए फसलों के लिए एमएसपी को कानूनी रूप देने की वकालत की। उन्होंने बैठक के दौरान मोजाम्बिक और कोलंबिया से दालों के आयात का मुद्दा उठाया। उन्होंने कहा यह आयात 2 अरब डॉलर से अधिक है, मान ने कहा कि अगर इस फसल के लिए एमएसपी दिया जाता है तो पंजाब दालों के उत्पादन में देश का नेतृत्व कर सकता है और यह दूसरी हरित क्रांति होगी।
किसानों के इस आंदोलन में स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू करवाने की माँग, किसानों को पेंशन सुनिश्चित करने की माँग और उनकी कर्जमाफी और पिछले किसान आंदोलन के समय जो हिंसा में केस किसानों पर दर्ज हुए थे उन सबको रद्द करने की माँग थी। किसान नेताओं का कहना है कि सरकार अभी सिर्फ एमएसपी पर ही प्रस्ताव लाई है। वो विचार करके बताएँगे अब आगे क्या होगा।


किसान हैं ही नहीं, कांग्रेस और “आप” के गुंडे हैं ; देश के खिलाफ युद्ध का ऐलान है; सरकार कुचल दे ऐसे लोगों को

सुभाष चन्द्र 

चुनाव आते ही सरकार को अस्थिर करने वाले लोग सक्रिय हो जाते हैं। यह अस्थिरता कई वजहों से फैलाने की कोशिश की जाती है। अपनी ताकत दिखाकर राजनीतिक पर दबाव बनाने की कोशिश भी इनमें एक शामिल है। इस बार भी विधानसभा चुनाव से बस कुछ दिन पहले ही किसान आंदोलन के नाम पर यह प्रक्रिया शुरू कर दी गई। साल 2021 में भी ऐसा ही आंदोलन शुरू किया गया। तब उत्तर प्रदेश में चुनाव होने वाले थे। इन आंदोलनों के कारण दिल्ली-एनसीआर के लाखों लोगों को समस्याएँ झेलनी पड़ी थी और लोगों ने सुप्रीम कोर्ट का रूख किया था।

लेखक 
किसान आंदोलन की आड़ में देश के खिलाफ युद्ध छेड़ने का काम करा रही है कांग्रेस और अमेरिका में  बैठा गुरपतवंत सिंह पन्नू भड़का रहा है सिखों को प्रधानमंत्री मोदी के घर पर खालिस्तान का झंडा लगाने के लिए कांग्रेस के जयराम रमेश ने खुल कर कहा है कि आज राहुल गांधी अंबिकापुर में किसान संगठनों से मुलाकात कर रहे हैं और “आज ही के दिन पंजाब, हरियाणा, यूपी और अलग अलग देशों के किसान दिल्ली आ रहे हैं”, यानी कांग्रेस देश को राज्यों को अलग अलग देश बता रही है

आज के कथित किसान कांग्रेस, “आप”  और George Soros के पैसे से खरीदे हुए गुंडे हैं और राहुल “कालनेमि” की मोहब्बत की दुकान के Salesmen हैं केजरीवाल को समझ लेना चाहिए कि चाहे वो रामलला के दर्शन कर आया या कथित किसानों को भड़का ले, ED में उसका “सुंदर कांड” होकर रहेगा

उधर आंदोलन में शामिल लोग कह रह रहे हैं “हमको छोड़ दो, खालिस्तान बनाने दो …. हम पाकिस्तान के साथ जुड़ जाएंगे” आंदोलन करने वालों ने ट्रैक्टर इस तरह modify किए जिससे वह पुलिस के  बेरिकेड तोड़ सके, आग का सामना कर सके और आंसू गैस का भी इन पर असर न हो भला कौन किसान एक आंदोलन के लिए इतना खर्च कर सकता है इनका मकसद पन्नू की कॉल पर प्रधानमंत्री मोदी के आवास को घेरने का है एक खबर के अनुसार आजतक के रिपोर्टर को कथित किसानों ने गोली भी मार दी है

इस आंदोलन में छिपे किसानों पर पिछले अक्टूबर-नवंबर, 2023 में पंजाब की भगवंत मान सरकार ने लाठियां बरसाई थी और उनका आंदोलन कुचलने के प्रयास किए थे आज उसी “आप” का मंत्री गोपाल राय इन कथित किसानों के हक़ में खड़ा हुआ कह रहा है, “ ब्रिटिश हुकूमत की तरह केंद्र की भाजपा सरकार ने सड़कों पर कीलें बिछा दी हैं, दीवारें खड़ी कर दी हैं जिससे किसान दिल्ली में न आ सकें भाजपा गुलामी का कालखंड याद करा रही है” यानी गोपाल राय चाहता है कथित किसान दिल्ली सरकार के खिलाफ बगावत करने में सफल हो जाएं और उन्हें रोका न जाए

इन कथित किसानों की अबकी बार की मांग लगता है केवल दिखावा है जिसका मकसद केवल अराजकता फैलाना है ये लोग मांग रहे हैं:-

-58 साल की उम्र से ज्यादा के किसानों के लिए 10 हजार रुपए महीने की पेंशन दी जाए;

-किसानों को फसल बीमा दिया जाए;

-भारत WTO से बाहर आ जाए; और 

-मनरेगा में 200 Employment Days सुनिश्चित किए जाएं

इस तरह की मांगे, या तो कोई विदेशी ताकतें बना सकती है या कांग्रेस बना सकती है किसान तो कभी नहीं बना सकते अगर वे किसान हैं

चुनाव से ठीक पहले माहौल बिगाड़ने के लिए विपक्ष ने कुछ दिन पूर्व हल्द्वानी में शाहीन बाग़ खड़ा करने की कोशिश की और अब फर्जी किसान आंदोलन खड़ा करने की कोशिश की गई है लेकिन जैसे हल्द्वानी में सख्ती से काम लिया गया, दिल्ली में इन कथित किसानों को भी पूरी ताकत से कुचल देना चाहिए

बार एसोसिएशन ने कथित किसानों के आंदोलन पर स्वत: संज्ञान लेने का भी आग्रह किया। हालाँकि, स्वत: संज्ञान वाले मामले पर सीजेआई ने क्या कहा, इसके बारे में कोई बात सामने नहीं आई है, लेकिन किसानों के पिछले आंदोलन और साल 2019 में शुरू हुए शाहीन बाग प्रदर्शन पर गौर करें तो ऐसा नहीं लगता कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले संज्ञान लेगा।

यह याद रखना चाहिए कि पिछले किसान आंदोलनकारी नेताओं के साथ किसी तरह का जनमत नहीं था क्योंकि वे सभी लोग किसी चुनाव में अपनी जमानत भी नहीं बचा पाए थे - इसलिए बिना किसी हिचक, सरकार को इस बार कथित किसानों के आंदोलन को कुचल देना चाहिए, जो उनके पीछे खड़े हैं, उन्हें अंदर कर देना चाहिए - शांति बनाए रखने के लिए यदि पुलिस को गोली भी चलानी पड़े, तो उसमे भी पीछे नहीं रहना चाहिए -

दरअसल, नागरिकता संशोधन बिल (CAA) और नागरिक पंजीकरण रजिस्टर (NRC) के विरोध में दिल्ली के शाहीन बाग में लंबा प्रदर्शन किया गया था। उस समय भी इलाके को जाम कर दिया गया था, जिसके कारण महीनों तक लोगों की समस्याओं का सामना करना पड़ा था। तब फरवरी 2020 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि फिलहाल इस मामले में वह हस्तक्षेप नहीं करेगा। हालाँकि, कोर्ट ने दोहराया था कि सार्वजनिक जगहों पर प्रदर्शन करना वाजिब नहीं है और जगह खाली कराने के लिए अधिकारियों को आगे आने के लिए कहा था।

इसी मामले पर अक्टूबर 2020 में जब सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की तो कहा था कि सार्वजनिक स्थानों पर अनिश्चितकाल के लिए कब्जा नहीं किया जा सकता है। अदालत ने कहा था कि धरना-प्रदर्शन का अधिकार अपनी जगह है, लेकिन अंग्रेजों के राज वाली हरकत अभी करना सही नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सार्वजनिक जगहों पर प्रदर्शन लोगों के अधिकारों का हनन है। कानून में इसकी इजाजत नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि संविधान विरोध करने का अधिकार देता है, लेकिन इसे समान कर्तव्यों के साथ जोड़ा जाना चाहिए।

इस तरह की गोलमोल टिप्पणी साल 2021 के किसान आंदोलनों के दौरान भी सुप्रीम कोर्ट ने दिया था। उस दौरान केंद्र की मोदी सरकार ने किसानों की भलाई के लिए तीन कृषि कानून लागू किए थे। इन कृषि कानूनों को किसान विरोधी बताकर हरियाणा-पंजाब के कथित किसान सड़कों पर आ गए थे। उन्होंने इस दौरान कई हिंसा की वारदातों को भी अंजाम दिया था। प्रदर्शन स्थल पर एक व्यक्ति की मौत भी हो गई थी। तब भी सुप्रीम कोर्ट ने इसका स्वत: संज्ञान नहीं लिया था।

तीन कृषि कानूनों के खिलाफ दायर की गई याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए तत्कालीन CJI एसए बोबडे की अध्यक्षता वाली पीठ ने केंद्र से कहा था कि न कृषि कानूनों पर रोक क्यों नहीं लगा रहे? उन्होंने कहा कि अगर केंद्र सरकार जिम्मेदारी दिखाते हुए इसे रोकने का आश्वासन देती है तो सुप्रीम कोर्ट एक समिति बना कर इसे देखने को कहेगा। तब तक इसे रोक कर रखा जाए। उन्होंने पूछा कि आखिर इसे क्यों जारी रखा जा रहा है? इस दौरान CJI ने बार-बार दोहराया कि वो इन कानूनों के कार्यान्वयन को रोक देंगे। हालाँकि, बाद में नंवबर 2021 में केंद्र सरकार ने इन कानूनों को रद्द कर दिया था।

सुप्रीम कोर्ट ने किसानों के हिंसक आंदोलन को लेकर कोई संज्ञान तो नहीं लिया, लेकिन 12 जनवरी 2021 को किसान आंदोलन को लेकर एक कमिटी का गठन किया था। इस कमिटी में कृषि विशेषज्ञ अशोक गुलाटी, डॉ. प्रमोद कुमार जोशी और अनिल घनवटे शामिल थे। सुप्रीम कोर्ट ने 4 सदस्यीय टीम बनाई थी, लेकिन किसान नेता भूपिंदर सिंह मान ने इससे खुद को अलग कर लिया था। इस कमिटी ने अपनी रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट में दे दी, लेकिन रिपोर्ट केंद्र सरकार द्वारा कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा के पाँच महीने बाद आई।

इस रिपोर्ट में दावा किया गया था कि देश भर के 86 फीसदी किसान संगठन सरकार के तीनों कृषि कानूनों से खुश थे। ये किसान संगठन करीब 3 करोड़ किसानों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। इन सबके बावजूद केंद्र सरकार को इन कानूनों को वापस लेना पड़ा। घनवटे के मुताबिक, सीलबंद रिपोर्ट में भी कृषि कानूनों को रद्द न करने की सलाह दी थी। घनवट ने कहा था कि इन कृषि कानूनों को रद्द करना या लंबे समय तक लागू न करना उन लोगों की भावनाओं के खिलाफ है, जो इसका मौन समर्थन करते हैं। 

बैरिकेड तोड़े, पुलिस पर पथराव… शंभू बाॅर्डर पर बवाल: किसानों के विरोध में कारोबारी भी


दिल्ली और उसके आसपास के कथित किसान अपनी माँगों को लेकर ट्रैक्टर एवं अन्य वाहनों के साथ राजधानी दिल्ली पहुँच रहे हैं। इसको देखते हुए दिल्ली बॉर्डर पर सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम किए गए है। पूरे बॉर्डर को सील कर दिया गया है। वहीं, दिल्ली के लाल किला को पर्यटकों के लिए बंद कर दिया गया है। वहीं, दिल्ली के कई मेट्रो स्टेशनों के गेट को भी बंद कर दिया गया है।

दिल्ली के गाजीपुर, सिंघु और टीकरी बॉर्डर पर लोहे और कंक्रीट के बॉर्डर लगाए गए हैं। इसके अलावा कंटीले तार, लोहे की कीलें, कंटेनर और डंपर लगाकर भी रास्ते बंद कर दिए गए हैं। सिंघु बॉर्डर पर हरियाणा से दिल्ली आने वाला ट्रैफिक पूरी तरह से रोका गया है। वहीं दिल्ली-नोएडा सड़क और NH24 पर लंबा जाम लग गया है। दिल्ली-नोएडा को जोड़ने वाले कालिंदी कुंज के रास्ते पर भी लंबा जाम लगा हुआ है।

महामाया फ्लाईओवर से ही वाहनों की कतारें लगी हुई है। दिल्ली के केंद्रीय सचिवालय मेट्रो स्टेशन का गेट 2 शाम तक बंद रहेगा। किसान आंदोलन को लेकर दिल्ली में धारा 144 लगा दी गई है। वहीं, हरियाणा में धारा 144 लागू है। चंडीगढ़ में स्कूलों को बंद कर दिया गया है। इंदिरा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डे ने एक एडवाइजरी जारी कर यात्रियों से ट्रैफिक जाम को ध्यान में रखते हुए अपनी यात्रा की योजना बनाने का आग्रह किया है।

खबर है कि शंभू बॉर्डर पर कथित किसानों ने पुलिस बैरिकेडिंग को तोड़ दिया। यहाँ किसानों और पुलिस के बीच भिड़ंत हो गई है। उन्होंने फ्लाईओवर की रेलिंग को तोड़ दिया। इसके साथ पुलिस पर पथराव भी किया। इसके बाद पुलिस ने एक्शन लिया और आँसू गैस के गोले छोड़े। वहाँ के हालात को देखकर अन्य जगहों पर भी पुलिस ने कमर कस लिया है। खनौरी-जींद बॉर्डर पर पुलिस सतर्क है।

इस बीच किसान नेता राकेश टिकैत ने कहा, “देश में बड़ी पूँजीवादी कंपनियाँ हैं। उन्होंने एक राजनीतिक पार्टी बना ली है और इस देश पर कब्जा कर लिया है। ऐसे में दिक्कतें आएँगी ही। अगर दिल्ली मार्च कर रहे किसानों के साथ कोई अन्याय हुआ या सरकार ने उनके लिए कोई दिक्कत पैदा की तो ना वो किसान हमसे ज्यादा दूर हैं और ना दिल्ली हमसे ज्यादा दूर है।”

इन किसानों के उत्पाद के कारण दिल्ली-एनसीआर के अपने काम-धंधों पर जाने वाले लाखों लोग प्रभावित हो रहे हैं। वहीं, व्यवसायी वर्ग भी खासा प्रभावित है। कन्फेडरेशन ऑफ बहादुरगढ़ इंडस्ट्रीज की झज्जर जिला ईकाई के सदस्यों ने किसानों से आग्रह किया कि वे अपने व्यवसाय पर न्यूनतम प्रभाव सुनिश्चित करने के लिए औद्योगिक केंद्र बहादुरगढ़ में अपना विरोध प्रदर्शन न करें।

कन्फेडरेशन ऑफ बहादुरगढ़ इंडस्ट्रीज, हरियाणा के अध्यक्ष प्रवीण गर्ग ने कहा, “हम किसानों के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन उन्हें हमारे व्यापार उद्योगों के लिए समस्या नहीं पैदा करनी चाहिए। पिछले दो दिनों से इंटरनेट बंद है, जिसके कारण अनिवार्य ई-चालान/ईवे बिलिंग संभव नहीं हो पा रही है। दूसरे राज्यों में सामग्रियों का परिवहन नहीं हो पा रहा है। यहाँ के लोगों में दहशत है। केवल हमारे जिले में सालाना लगभग 50,000 करोड़ रुपए के राजस्व वाले विनिर्माण होता है। इससे उद्योगों को सीधा नुकसान है।”

करीब दो साल बाद एक बार फिर कथित किसान दिल्ली की ओर कूच कर रहे हैं। साल 2020-21 में संयुक्त किसान मोर्चा यानी SKM के तहत 32 किसान संगठन एक बैनर के तले आई आए थे। अब ये टूटकर एसकेएम (पंजाब), एसकेएम (गैर राजनीतिक) और किसान मजदूर मोर्चा (KMM) बन गई हैं। इस बार के आंदोलन को पिछली बार की तरह सभी किसान संगठनों का समर्थन प्राप्त नहीं है।

इस बार जगजीत सिंह दल्लेवाल का संयुक्त किसान मोर्चा (अराजनैतिक) और किसान मजदूर मोर्चा इस आंदोलन की अगुवाई कर रहे हैं। ये दोनों संगठन पूर्व में SKM का हिस्‍सा रहे हैं। किसान मजदूर मोर्चा 18 किसानों का समूह है, जिसके संयोजक सरवन सिंह पंढेर हैं। दोनों ही समूहों में राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, मध्य प्रदेश और यूपी के किसान शामिल हैं।

वहीं, साल 2020 के किसान आंदोलन का प्रमुख चेहरा रहे किसान नेता गुरनाम सिंह चढूनी ने इस बार आंदोलन से दूर हैं। चढूनी ने इस बार के किसान को लेकर सवाल खड़े किए हैं और कहा है कि इस आंदोलन से उन नेताओं को अलग रखा गया है, जो पिछले आंदोलन में शामिल थे।

ऑल इंडिया किसान सभा के वाइस प्रेसिडेंट और संयुक्त किसान मोर्चा नेता हनन मोल्ला ने कहा है कि ऑल इंडिया किसान सभा संयुक्त किसान मोर्चा का सबसे बड़ा दल है और वे इस प्रदर्शन में शामिल नहीं है। उन्होंने कहा कि किसान आंदोलन के बाद संयुक्त किसान मोर्चा से कुछ दल अलग हो गए थे और यह प्रोटेस्ट उन्होंने ही बुलाया है।

सत्ता से वंचित हताश राहुल गांधी सदैव दोगली राजनीति करता हैं ?

स्वामीनाथन कमीशन की रिपोर्ट साल 2006 में आई थी और उसके बाद 2014 तक कांग्रेस की सरकार थी तब भी यह रिपोर्ट 8 साल में कांग्रेस UPA की एंटोनियो माईनो सरकार ने लागू नहीं करी और अब राहुल गांधी कह रहा है कि इंडि ठगबंधन की सरकार आते ही वह यह लागू कर देगा, कितनी नीच और घृणित राजनीति है, इस चरित्रहीन राहुल गांधी में तो लगता है कि रीढ़ की हड्डी ही नही है, भारत का विपक्ष आज सिर्फ एक राजनीति का दलाल बनकर रह गया है, चुनाव आने वाले हैं तो किसानों को बलि का बकरा बनाकर अब यह राजनैतिक गिद्ध मंडराने लगे हैं।

किसान आंदोलन में आतंकी भिंडरावाले का झंडा: ट्रैक्टर से दिल्ली आने वाले वालों का मकसद क्या?

किसान आंदोलन में खालिस्तानी आतंकी भिंडरावाले का पोस्टर अभी से दिखने लगा है। वीडियो सामने आई है जिसमें अंबाला के शंभू बॉर्डर के पास किसान अपने ट्रैक्टर लेकर फतेहगढ़ साहिब से आ रहे हैं। ये सारे ट्रैक्टर दिल्ली सीमाओं पर इकट्ठा होंगे। इन्हीं में देख सकते है कि खुलेआम बड़ा का झंडा लगाकर इसे दिल्ली लाने की तैयारी हो रही है।

वीडियो में दिख रहा है कि एक साथ कई ट्रैक्टर आगे बॉर्डर की ओर आगे बढ़ रहे हैं। इसमें दूसरे नंबर पर जो ट्रक आ रहा है उसमें बड़ा सा झंडा लगा है जिसमें खालिस्तानी आतंकी भिंडारावाले का झंडा लगा है। इसे देखने के बाद लोग याद कर रहे हैं दिल्ली में जब इससे पहले किसान आंदोलन हुआ था तो किस तरह की घटनाओं को अंजाम दिया गया।

याद दिला दें कि इससे पहले भी जब किसानों ने दिल्ली सीमाओं पर धरना देना शुरू किया था, उस समय भी प्रदर्शनकारियों के पास भिंडरावाले के पोस्टर देखे गए थे और फिर खुलेआम नारे सुनाई पड़े थे- “भिंडरावाले तेरी सोच पर राज करेगा…।” इसके अलावा ये बात भी गौर करनी वाली है कि जब-जब भिंडरावाले के पोस्टर या झंडे देखे जाते रहे हैं तब तब कट्टरपंथी खालिस्तानी भीड़ का उग्र चेहरा सामने आया है।

अवलोकन करें:-

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2020-2021 के किसान आंदोलन को ही यदि याद करें तो भीड़ ने नारेबाजी के साथ तिरंगा का अपमान किया था। इसके अलावा कुछ दिन पहले की ही बात है कि आतंकी भिंडरावाले का पोस्टर गुरुद्वारे में लगाने से जब रिटायर कर्नल ने मना किया था तो कैसे खालिस्तानी उन पर टूट पड़े थे और उनकी गाड़ी को तोड़ दिया गया था। इन सब घटनाओं को देखते हुए ये सोचना अहम है कि आखिर इन बड़े-बड़े ट्रैक्टरों में बैठकर कौन से किसान दिल्ली आ रहे हैं जिनके लिए ऐसे झंडे लगाने जरूरी हैं।