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अखलाख, हमास, फिलिस्तीन और गाज़ा पर मातम करने वाले ईद पर सूर्या की क़ुरबानी पर खामोश क्यों? पड़ोसी मुस्लिमों के मुँह से भी कट्टरपंथियों के लिए नहीं फूट रहा एक भी शब्द

गाजियाबाद के खोड़ा में सूर्या चौहान की हत्या के बाद एनकाउंटर में मुख्य आरोपित असद भी ढेर हो गया। गंगा-जमुना की तहजीब और सेकुलरिज्म का रोना वाले सूर्या की क़ुरबानी पर क्यों खामोश हैं? टीवी पर चर्चाओं में जब घिरने पर बेशर्म संविधान की दुहाई देने लगते हैं। वामपंथी लिबरल गैंग ने सूर्या की हत्या से ज्यादा एनकाउंटर में मारे गए असद की चिंता की। यहाँ तक कि कुर्बानी देखने के लिए बुलाए गए सूर्या की निर्मम हत्या को आपसी विवाद में हत्या करार दे दिया।

सूर्या की हत्या में शामिल नवाब, फरहान, आतिफ और शारिक को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। घटना के बाद से असद फरार था, जिस पर 50 हजार रुपए इनाम की घोषणा की गई थी। पुलिस ने सूचना मिलने पर उसे इंदिरापुरम में ढेर कर दिया। इससे पहले इलाके में तनाव को देखते हुए पुलिस लगातार सतर्क है। बकरीद के दिन सूर्या चौहान की घर से बुला कर हत्या कर दी गई। उसे ‘आओ कुर्बानी कैसे दी जाती है, तुम्हें दिखाते हैं…’ कह कर घर से बुलाकर सूर्या को ले जाने और उसकी चाकूओं से निर्मम हत्या करने पर लिबरल वामपंथी गैंग का मुँह नहीं खुला।

घटना की निंदा करना तो दूर प्रोपेगेंडाबाजों ने घटना की जानकारी देना भी जरूरी नहीं समझा। देता भी कैसे? इस खबर से उनकी पोल खुल जाती, जो हमेशा देश में मुस्लिमों पर तथाकथित ‘अत्याचार’ की दुहाई देते-देते नहीं थकते। ट्वीट करते हैं, रिट्वीट करते हैं, लंबी-लंबी पोस्ट लिखते हैं, सरकार की आलोचना करते हैं। लेकिन, 17 साल के हिन्दू युवक की इस तरह हत्या राजधानी दिल्ली से सटे गाजियाबाद के खोड़ा में हो जाती है, ये कुछ नहीं बोलते।

Republic Bharat पर अपने शो महाभारत पर एंकर राम मोहन शर्मा जब इस दुर्घटना की ग्राउंड रिपोर्टिंग कर रहे थे तब एक महिला ने कहा कि सरकार को इन लोगों को मिलने वाली हर सुविधा वापस ले लेनी चाहिए। यह सच भी है। जब तक सरकार ऐसे ठोस कदम नहीं उठाएगी इस तरह की हरकतों, दंगों और हिन्दू त्यौहारों पर होने वाली पत्थरबाज़ी बंद नहीं होगी। दूसरे, इन कट्टरपंथी और इनके समर्थकों को मालूम है कि मोदी सरकार सिर्फ पाकिस्तान के लिए सख्त हो सकती है, किसी और के लिए नहीं। बांग्लादेश में हिन्दुओं का नरसंहार होने के बावजूद मानवीय आधार पर आर्थिक मदद बंद नहीं की जबकि पाकिस्तान का पानी बंद कर दिया।      

प्रोपेगेंडाबाजों की पक्षपातपूर्ण रिपोर्टिंग

हत्या की हर हाल में आलोचना की जानी चाहिए। यहाँ नाबालिग युवक को बुला कर हत्या कर दी जाती है। चूँकि सभी आरोपित मुस्लिम हैं, इसलिए चुप रह जाओ। आरफा खानम को ही देख लो, मुख्यमंत्री योगी के आपत्तिजनक शब्द का इस्तेमाल करने की उसने आलोचना नहीं की, लेकिन ऐसा बोलने वाले मुस्लिम को जब पुलिस उठा कर ले गई, तो सामने आ गई अत्याचार की कहानी लेकर।

हिन्दू नाबालिग लड़के की बेरहम हत्या पर बात करना, तो वैसे भी उसके सिलेबस से बाहर का विषय है। द वायर, द क्विंट, द प्रिंट में तो खबर छापी, लेकिन हत्या को नाबालिगों द्वारा की गई वारदात कहा। द प्रिंट ने कहा, “सूर्या को पास के एक अस्पताल में भर्ती कराया गया था। शुक्रवार को चोटों के कारण उनकी मृत्यु हो गई, जिससे खोड़ा कॉलोनी में विरोध प्रदर्शन भड़क उठे। शनिवार को स्थानीय बाजार बंद रहा, जबकि पुलिस ने फ्लैग मार्च किया।”

वहीँ द क्विंट ने मुख्य आरोपित असद के पुलिस एनकाउंटर में मौत पर जोर देते हुए बताया कि 31 मई 2026 को, उत्तर प्रदेश के गाजियाबाद में बकरीद के दौरान 17 साल के एक हिंदू छात्र की हत्या के मुख्य आरोपी असद को पुलिस मुठभेड़ में मार गिराया गया। पीड़ित, सूर्य चौहान को बकरीद के दिन एक कहासुनी के दौरान चाकू मार दिया गया था, और 29 मई 2026 को इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई। पुलिस ने असद की तलाश शुरू कर दी थी, जो घटना के बाद से कथित तौर पर फरार था।

क्यों की गई सूर्या की हत्या

सूर्या और असद पड़ोसी हैं। खोड़ा की गली में दोनों का मकान है। बताया जाता है कि सात आठ महीने पहले एक छोटा सा विवाद हुआ था। दोनों के माता-पिता ने अपने-अपने बच्चे को समझाया और मामला शांत हो गया। लेकिन बातचीत दोनों परिवारों में लगभग नहीं होती थी। बकरीद के दिन सूर्यो चौहान का बाइक चलाने को लेकर असद और उसके दोस्तों से विवाद हुआ। इनलोगों ने उसे चाकूओं से गोद कर हत्या कर दी।

चश्मदीदों के मुताबिक, असद और उसके साथियों ने सूर्या से कहा, “क्या तुमने कभी बकरे की कुर्बानी देखी है?” जब सूर्या ने मना किया, तो उन्होंने कथित तौर पर कहा, “आज तुझे दिखाते हैं।” इसके बाद आरोपियों ने उस पर चाकू से ताबड़तोड़ वार कर दिए। हमले में सूर्या बुरी तरह घायल हो गया और अस्पताल ले जाते समय दम तोड़ दिया।

सूर्या का भाई मानसिक रूप से विक्षिप्त है। वह अपने माँ-बाप का एकमात्र सहारा था। इस मामले में असद, नवाब, फरहान, आतिफ और शारिक सहित कई लोगों के नाम सामने आए। सभी आरोपितों को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है। मुख्य आरोपित असद फरार चल रहा था, जिसे इंदिरापुरम में एक मुठभेड़ में पुलिस ने मार गिराया।

पड़ोसी घटना को लेकर जता रहे अनभिज्ञता

घर से कुछ दूर पर 17 साल के युवक सूर्या चौहान की हत्या हो जाती है। उसके आस पड़ोस में ज्यादातर मुस्लिम परिवार रहते हैं। ये लोग मुँह खोलने को तैयार नहीं हैं। ये ऐसे जता रहे हैं, जैसे कुछ हुआ ही नहीं। भीडभाड़ पूरी है, लेकिन कोई ये नहीं बता रहा कि उसे घटना की जानकारी है।

सोशल मीडिया पर ऐसे कई वीडियो आए हैं, जिससे पता चलता है कि हिन्दू युवक की बेरहमी से कत्ल किए जाने पर लोगों को कोई फर्क ही नहीं पड़ रहा। ये लोग कैमरा देख कर चुपचाप बचते नजर आ रहे हैं।

सूर्या की मौत के बाद पड़ोसी मुस्लिम घर के बाहर एक किलो से ज्यादा बकरे का मांस नीचे रखा मिला। जब कुछ लोगों ने बोला, तो बच्चों को भेजकर उसे नाली में डाल दिया गया। इससे भी हिन्दुओं में गुस्सा है।

सूर्या की माँ ने असद के एनकाउंटर पर संतोष जताया

मुख्य आरोपित असद की मुठभेड़ में मौत के बाद सूर्या की माँ का बयान सामने आया। सूर्या की माँ सरोज का कहना है कि उसने सिर्फ एक का एनकाउंटर देखा है। वह चाहती है कि असद की तस्वीर उसे दिखाई जाए। तस्वीर देखने के बाद ही उसे विश्वास होगा कि वह मारा जा चुका है। सरोज का कहना है कि बाकी आरोपितों को भी इसी तरह से मौत के घाट उतारा जाना चाहिए। इतना ही नहीं उनके घरों पर बुलडोजर भी चलना चाहिए।

इस मामले में 5 नामजद आरोपितों को पुलिस ने 30 मई 2026 को गिरफ्तार किया। असद के बारे में पुलिस को जानकारी मिली कि वह इंदिरापुरम में छिपा हुआ है। उसे पुलिस ने घेर लिया, उसने पुलिस पर फायरिंग की। इस दौरान असद को पुलिस ने बुरी तरह घायल कर दिया और अस्पताल ले जाते वक्त उसकी मौत हो गई। बाकी आरोपित भी पहले से ही पुलिस की गिरफ्त में हैं।

सच्चाई छिपाने पर दिल्ली हाई कोर्ट की The Wire के सिद्धार्थ वरदराजन को फटकार, वकील को भी नहीं बक्शा; वकील की मौखिक माफी को स्वीकार करने से इनकार

दिल्ली उच्च न्यायालय (Delhi High Court) ने प्रोपेगेडा पोर्टल ‘द वायर’ के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन (Siddharth Varadarajan) के खिलाफ कड़ा रुख अपनाते हुए उन्हें इलाहाबाद उच्च न्यायालय (Allahabad High Court) के एक पुराने आदेश को ‘छिपाने’ के लिए कड़ी फटकार लगाई है। जस्टिस पुरुषेंद्र कुमार कौरव (Justice Purushendra Kumar Kaurav) की पीठ ने गुरुवार (14 मई 2026) को स्पष्ट किया कि अदालती कार्यवाही में तथ्यों को दबाना एक बेहद गंभीर मामला है और इसके दूरगामी कानूनी परिणाम हो सकते हैं।
साभार :Bar and Bench 

रिपोर्ट्स के मुताबिक, यह मामला तब सामने आया जब वरदराजन ने अपनी विदेश यात्रा की अनुमति के लिए दिल्ली हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। सुनवाई के दौरान, केंद्र सरकार की ओर से पेश अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल (ASG) चेतन शर्मा ने 2020 के इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक आदेश का हवाला दिया। उस आदेश में वरदराजन को स्पष्ट रूप से निर्देश दिया गया था कि वे अदालत की पूर्व अनुमति के बिना देश छोड़कर नहीं जा सकते।

अदालत ने पाया कि वरदराजन ने अपनी याचिका में इस महत्वपूर्ण शर्त का उल्लेख नहीं किया था। इस पर नाराजगी जताते हुए न्यायमूर्ति कौरव ने कहा, “यह बहुत गंभीर मुद्दा है और इसके बहुत गंभीर परिणाम हो सकते हैं। यह याचिकाकर्ता की (इलाहाबाद हाईकोर्ट के समक्ष) जमानत अर्जी से जुड़ा मामला है। जमानत आदेश में लगाई गई शर्तों को इस अदालत के संज्ञान में नहीं लाया गया।”

न्यायाधीश ने आगे तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा, “हमें आपकी रिट याचिका खारिज करनी होगी। कुछ सख्त कार्रवाई किए जाने की आवश्यकता है… मैं वरदराजन की वकील नित्या रामकृष्णन द्वारा माँगी गई माफी पर केवल कार्रवाई न करने की हद तक विचार कर सकता हूँ, लेकिन जानकारी छिपाने के कारण वह अदालत से किसी भी राहत के हकदार नहीं हैं।

वरदराजन की ओर से पेश वरिष्ठ वकील नित्या रामकृष्णन ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को रिकॉर्ड पर न रखने के लिए अदालत से बिना शर्त माफी माँगी। हालाँकि पीठ ने इस मौखिक माफी को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा कि इस तरह के संवेदनशील और कानूनी पेचीदगियों वाले मामले में केवल मौखिक दलीलें काफी नहीं हैं।

परिणामस्वरूप, दिल्ली हाईकोर्ट ने सिद्धार्थ वरदराजन को औपचारिक नोटिस जारी किया है और सात दिनों के भीतर हलफनामे के माध्यम से अपनी इस चूक पर स्पष्टीकरण देने का निर्देश दिया है। इसके साथ ही अदालत ने अपने उन सभी पिछले आदेशों को वापस ले लिया (Recall) है, जिनसे वरदराजन को राहत मिली थी।

सबसे महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए अदालत ने अप्रैल 2026 के उस आदेश को भी रद्द कर दिया, जिसके माध्यम से केंद्र सरकार द्वारा वरदराजन का ओसीआई (OCI) कार्ड रद्द करने के फैसले को क्वैश (निरस्त) किया गया था। इसका अर्थ है कि अब उनका ओसीआई कार्ड मामला फिर से कानूनी संकट में फंस गया है।

‘उम्माह’ के लिए कुछ भी करेगा ‘इस्लामी’ इकोसिस्टम, इनका दोहरापन; अरफा के लिए US-इजरायल की मार से तबाह हुआ ईरान ‘विश्वगुरु’, वो सुपरपॉवर भी

                अरफा खानम शेरवानी (फोटो साभार: arfakhanum/Instagram/@khanumarfa/X)
अरफा खानम शेरवानी जिन्हें हम सब ‘अरफा’ के नाम से जानते हैं, एक बार फिर अपने दोगले चेहरे का प्रदर्शन कर रही हैं। बुधवार (08 अप्रैल 2026) को ही उन्होंने दो पोस्ट किए। पहले पोस्ट में लिखा कि “ईरान उभर के सामने आया है” और दूसरे में सीधे घोषणा कर दी- “I have no hesitation in saying that after defeating America, Iran is now the ultimate ‘Vishwa Guru’ of the world”। फिर ईरान दूतावास की पोस्ट को कोट करते हुए लिख दिया, “Hello Superpower ”। वाह रे अरफा! विश्वगुरु? सचमुच?

याद दिला दें कि जब भारत के संदर्भ में ‘विश्वगुरु’ शब्द आता है तो इन कॉन्ग्रेसियों और इस्लामी इकोसिस्टम वालों को चिढ़ मच जाती है। जब पीएम मोदी ने जब भारत को विश्वगुरु बनाने की बात की तो इन्हें हँसी आ गई, ट्रोलिंग शुरू हो गई। लेकिन आज अस्थाई संघर्ष-विराम के मौके पर अचानक ईरान को ‘विश्वगुरु’ और ‘सुपरपावर‘ बताने लगी हैं। समझते भी हैं ये लोग कि विश्वगुरु होने का मतलब क्या होता है? या फिर बस उम्माह का झंडा लेकर घूमने का बहाना चाहिए?

अरफा, कल तक तुम अयातोल्ला की ख़िलाफ़त कर रही थीं। महिला अधिकार, मानवाधिकार, फ्रीडम ऑफ़ एक्सप्रेशन के नाम पर ईरान की तानाशाही को कोस रही थीं। फिर अचानक अमेरिका के खिलाफ़ ‘इस्लामी उम्माह’ का नारा लगाने लगीं।

और अब? अस्थाई सीजफायर होते ही ईरान को विश्वगुरु साबित करने में जुट गईं। क्यों?

क्योंकि तुम्हारा सहोदर पाकिस्तान वहाँ दलाली करने लगा था। बात अब उम्माह की हो गई है ना?

वर्ना उसी ईरान के मूल निवासियों (पारसियों) को भारत ने अपने घर में पनाह दी है। बिना किसी परेशानी के। वे यहाँ फल-फूल रहे हैं, व्यापार कर रहे हैं, पढ़ रहे हैं, परिवार चला रहे हैं। लेकिन अरफा को समस्या भारत से इस बात की है कि वो तमाम झंझावातों के बीच भी अपने सभी लोगों का ख्याल रख रहा है। उसी ईरान से लोगों को बाहर निकालकर ला रहा है, जिसमें अधिकतर इसके मुस्लिम भाई ही हैं। फिर भी इन नमकहरामों के मन में भारत के प्रति इतनी घृणा बैठी हुई है कि बर्बाद हो चुके ईरान में उन्हें विश्वगुरु दिखने लगा है।

इसे ही कहते हैं दोगलापन। ये खाएँगी भारत का, भारत की हवा-पानी, भारत की आजादी, भारत की मीडिया में छूट, भारत की सिक्योरिटी। लेकिन गाएँगी ईरान का, पाकिस्तान का, लेबनान का, गाजा का… या हर उस जगह का जहाँ इनके उम्माह वाले दिखेंगे। हाँ भाई, क्यों नहीं? क्योंकि ये तो ‘काफिरों’ का देश है ना। तो इनका प्रेम ‘अपने’ उम्माह भाइयों पर ही रहेगा। चाहे वहाँ लाखों मार दिए जाएँ (अयातोल्लाओं की ओर से) या इनके बंधु पूरी दुनिया को बम-धमाकों में उड़ाते रहें जन्नत के नाम पर।

अभी उसी ईरान से तस्वीरें सामने आई हैं, जिसमें अपने पुलों को बचाने के लिए ईरान महिलाओं और बच्चों की ह्यूमन चेन बना रहा है। महिलाएँ, बच्चे – जिनकी सुरक्षा के नाम पर अरफा पहले चिल्लाती थीं- आज उनको ढाल बनाकर पुल बचा रहे हैं। और अरफा? उन्हें ‘विश्वगुरु’ कह रही हैं। वाह रे दोगलों! कल तक महिला-वाद के नाम पर अयातोल्ला को कोसती थीं, आज वही महिलाएँ ह्यूमन शील्ड बन रही हैं तो मुँह बंद। क्योंकि अब उम्माह का मुद्दा आ गया।

अरफा तुम The Wire की सीनियर एडिटर हो, AMU की एलुम्ना हो। तुम्हारा पूरा इकोसिस्टम कॉन्ग्रेस और इस्लामी लॉबी का है। तुम्हें हमेशा ‘सेकुलरिज्म’ का ढोंग रचाना पड़ता है। लेकिन जब बात अपनी आती है तो असली चेहरा सामने आ जाता है। पाकिस्तान से प्यार, ईरान से प्यार, गाजा से प्यार – लेकिन भारत? भारत तो बस ‘फासीवादी’ है, ‘इस्लामोफोबिक’ है। भारत ने ईरानियों को शरण दी, उनको सुरक्षा दी, लेकिन तुम्हें ये सहन नहीं होता। क्योंकि तुम्हारा दिल कहीं और बसता है। तुम्हें भारत की तरक्की, भारत की मजबूती, भारत की विश्व पटल पर बढ़ती पहचान कभी रास नहीं आई।

देखो अरफा, विश्वगुरु बनने के लिए सिर्फ़ एक युद्ध में अमेरिका से टकराना काफी नहीं होता। विश्वगुरु वो होता है जो अपने नागरिकों की रक्षा करे, महिलाओं को आजादी दे, बच्चों को भविष्य दे, अर्थव्यवस्था को मजबूत करे। ईरान में आज महिलाएँ हिजाब के नाम पर कोड़े खा रही हैं, विरोध करने पर जेल जा रही हैं। लेकिन तुम्हें वो ‘सुपरपावर’ दिख रहा है। क्योंकि तुम्हारा एजेंडा हिंदुस्तान को नीचा दिखाना है। तुम चाहती हो कि भारत हमेशा ‘दूसरे’ देशों के मुकाबले छोटा दिखे।

ये दोगलापन सिर्फ़ तुम्हारा नहीं, पूरे उस इकोसिस्टम का है जिसमें तुम खड़ी हो। कल अमेरिका दुश्मन था, आज ईरान हीरो बन गया। कल पाकिस्तान ‘पीस’ का दूत था, आज ईरान ‘विश्वगुरु’। कल महिला अधिकार, आज उम्माह। कल सेकुलर, आज इस्लामी ब्रदरहुड। ये चरित्रहीनता है। ये नमकहरामी है।

अरफा, तुम भारत में बैठकर ईरान का गान गा सकती हो। लेकिन हकीकत ये है कि भारत ने तुम्हें वो आजादी दी है जो ईरान में कभी नहीं मिलेगी। तुम बिना हिजाब के घूम सकती हो, बिना डरे बोल सकती हो, बिना जेल गए आलोचना कर सकती हो। लेकिन तुम्हें ये आजादी भी भारत से ही मिली है। फिर भी तुम्हारा दिल ईरान और पाकिस्तान के लिए धड़कता है।

ये ही तो दुख की बात है। भारत तुम्हें खिला-पिला रहा है, लेकिन तुम्हारा प्रेम ‘अपने’ उम्माह भाइयों के लिए है। बर्बाद ईरान में विश्वगुरु ढूँढ रही हो, जबकि असली विश्वगुरु वो देश है जो तुम्हें शरण दे रहा है। लेकिन तुम्हारा? वाह रे दोगलों… वाह!

‘द वायर’ में सूरज येंगडे का ‘दलित पोर्न’ वाला लेख, संस्थापक-संपादक ने बताया ‘फर्जी’: वायरल स्क्रीनशॉट से छिड़ा विवाद

                      वायरल स्क्रीनशॉट में सूरज येंगड़े के जिस लेख का जिक्र है वह कभी पब्लिश ही नहीं हुआ
इस्लामी-वामपंथी पोर्टल ‘द वायर’ के नाम से एक कथित लेख का स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इस वायरल स्क्रीनशॉट में दावा किया गया है कि ‘बहुजन’ कंटेंट क्रिएटर्स को पोर्न इंडस्ट्री पर ‘कब्जा’ करने की वकालत की गई है जिसे लेखक सूरज येंगड़े ने ‘आखिरी किला’ बताया है।

वायरल स्क्रीनशॉट के अनुसार, दलित अधिकार कार्यकर्ता ने तर्क दिया है कि अंबेडकरवादी विचारधारा को फैलाने के लिए पोर्नोग्राफी जैसे ‘फ्रंटियर’ में भी प्रवेश करना जरूरी है और इसके लिए ब्राह्मण महिलाओं को निशाना बनाया जाना चाहिए। हालाँकि, यह स्क्रीनशॉट भले ही येंगड़े और ‘द वायर’ के सवर्ण विरोधी रुख के कारण भरोसेमंद लगता हो लेकिन यह पूरी तरह से फर्जी और व्यंग्य के रूप में बनाया गया है।

इस वायरल स्क्रीनशॉट में जिस लेख का जिक्र है वह कभी पब्लिश ही नहीं हुआ है। इस कथित लेख की हेडलाइन “The Case for Dalit ‘Porn’ – Why Bahujan Content Creators Must Conquer this Last Frontier” लिखी गई है।

वहीं, इसकी समरी में लिखा है, “हर विचारधारा को विस्तार के लिए पॉप-कल्चर के साधनों की जरूरत होती है। जहाँ अंबेडकरवादी विचारधारा के पास ऑटो-ट्यून गाने और रील्स जैसे माध्यम मौजूद हैं लेकिन हम पोर्नोग्राफी के क्षेत्र में पीछे हैं जो सबसे ज्यादा देखे जाने वाला कंटेंट है। भले ही यह सुनने में आपत्तिजनक लगे लेकिन बहुजन कंटेंट क्रिएटर्स को इस दिशा में काम करना चाहिए जैसे कि एक ब्राह्मण या यादव हाउस वाइफ को शौचालय साफ करने आए एक सफाईकर्मी के साथ सेक्स करते दिखाना।

ऑपइंडिया ने द वायर की वेबसाइट और उसके सोशल मीडिया हैंडल्स की जाँच की जिससे यह पता लगाया जा सके कि वायरल स्क्रीनशॉट में दिखाया गया लेख कभी प्रकाशित हुआ था, उसमें कोई बदलाव किया गया था या उसे हटाया गया था। पता चला कि सुरज येंगड़े द्वारा ऐसा कोई एंटी-ब्राह्मण लेख न तो लिखा गया था और न ही द वायर ने उसे प्रकाशित किया था। हमारी रिसर्च के अनुसार, वायरल स्क्रीनशॉट के फर्जी होने की पूरी संभावना है।

द वायर के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन ने 27 मार्च को X (ट्विटर) पर एक पोस्ट कर इस मामले पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने ‘जातिवादी और हिंदुत्व से प्रभावित हिंदुओं’ को यह फर्जी स्क्रीनशॉट बनाने और फैलाने का जिम्मेदार बताया। उनका दावा है कि इन लोगों ने एक झूठी कहानी गढ़ी और उसे ‘सम्मानित स्कॉलर’ सुरज येंगड़े और द वायर से जोड़ने की कोशिश की।

फर्जी स्क्रीनशॉट लोगों को क्यों लगा असली?

भले ही सिद्धार्थ वरदराजन ने इस मामले में तुरंत ‘जातिवादी’ हिंदुओं और हिंदुत्व को जिम्मेदार ठहराया और सुरज येंगड़े को ‘सम्मानित स्कॉलर’ बताया लेकिन यह फर्जी स्क्रीनशॉट लोगों को इसलिए असली लगा क्योंकि यह येंगड़े की पहले से चली आ रही एंटी-ब्राह्मण बयानबाजी और द वायर की कथित एंटी-हिंदू लाइन के पैटर्न से मेल खाता हुआ दिखा।

येंगड़े ने पहले भी ‘ब्राह्मणिकल पैट्रियार्की’ जैसे विषयों पर कई लेख लिखे हैं जिनमें ब्राह्मण महिलाओं पर खास फोकस देखा गया है। उनके लेखों और सोशल मीडिया पोस्ट्स में अक्सर ऊँची जाति के हिंदुओं को इस बात के लिए निशाना बनाया जाता है कि वे ‘जाति शुद्धता’ के कारण अपनी बेटियों की शादी दलितों से नहीं करते। इसी तरह के पुराने बयानों और विचारों के कारण यह फर्जी स्क्रीनशॉट कई लोगों को पहली नजर में असली और भरोसेमंद लगा।

सुरज येंगड़े की एंटी-ब्राह्मण बयानबाजी केवल अकादमिक टिप्पणी तक सीमित नहीं है बल्कि यह कई बार खुले तौर पर महिलाओं के प्रति अपमानजनक और उन्हें वस्तु की तरह पेश करने वाली भाषा तक पहुँच जाती है जैसा कि उनके सोशल मीडिया पोस्ट्स में देखने को मिलता है। ऐसे ही एक पोस्ट में येंगड़े ने लिखा था, “ब्राह्मण लड़कियाँ दलित पुरुषों के लिए लालायित रहती हैं। मुझसे पूछो।”

 एक पोस्ट में सुरज येंगड़े ने एक ब्राह्मण की पोस्ट का जवाब देते हुए ब्राह्मण समुदाय से कहा कि वे अपनी बेटियों को दलितों को ‘दे दें’ जैसे वे कोई वस्तु हों। उन्होंने इसे इस तरह पेश किया मानो अपने ‘विशेषाधिकार’ (प्रिविलेज) को दलितों के साथ साझा करना चाहिए और इसके लिए महिलाओं को ऐसी चीज समझा जाए जिसे आपस में बाँटा जा सकता है।

येगड़े पर यह आरोप भी रहा है कि वो एंटी-ब्राह्मण बातों को आगे बढ़ाने के लिए हिंदू इतिहास और शास्त्रों को तोड़-मरोड़ कर पेश करता है।

ब्राह्मण महिलाओं को लेकर की गई आपत्तिजनक बातें और उन्हें वस्तु की तरह पेश करने के अलावा येंगड़े उनके प्रति साफ तौर पर नफरत भी दिखाता है। उसने उन्हें ‘ध्यान भटकाने का हथियार’ बताते हुए कहा कि उनके लिए उसे कोई सहानुभूति नहीं है।

इस तरह की जातीय बदले की सोच और अतिवादी कल्पनाओं के कारण पोर्न इंडस्ट्री को ‘आखिरी किला’ बताने जैसे दावे भी लोगों को सच लगने लगते हैं। कई मौकों पर कुछ दलित ‘सामाजिक न्याय’ कार्यकर्ताओं द्वारा ऊँची जाति की महिलाओं को मानो इतिहास का बदला लेने के प्रतीक या ट्रॉफी की तरह ‘हासिल’ करने की बात भी कही गई है।

भारत में कई ऐसे उदाहरण सामने आए हैं, जहाँ कुछ दलित कार्यकर्ताओं और एक्टिविस्ट ने खुले तौर पर सामान्य (जनरल) वर्ग की महिलाओं को वस्तु की तरह पेश किया है। सिर्फ राजनेता ही नहीं बल्कि कुछ IAS अधिकारियों तक के ऐसे बयान सामने आए हैं जिनमें यह कहा गया कि सामान्य वर्ग की महिलाएँ मानो कोई ट्रॉफी या वस्तु हैं जिन्हें ‘सामाजिक न्याय’ के एजेंडे को सफल बनाने के लिए दलितों के साथ शेयर किया जाना चाहिए।

साथ ही, पश्चिमी लिबरल विचारधारा के प्रभाव में जहाँ खाने, संगीत और साहित्य जैसी चीजों को भी गलत और सीमित श्रेणियों में बाँटने की प्रवृत्ति है, उसी तरह भारतीय लिबरल वर्ग के कुछ लोग भी इन विचारों को कॉपी-पेस्ट करके भारत में लागू करने की कोशिश कर रहे हैं। यह तरीका मूल रूप से गलत माना जाता है क्योंकि भारतीय सांस्कृतिक विविधता और उसके पहलू पश्चिमी समाज से अलग हैं और उसका विकास अलग परिस्थितियों में हुआ है। ऐसे में पश्चिमी ढाँचे में उन्हें फिट करने की कोशिश सही नहीं बैठती।

                                                    वाइस के एक आर्टिकल का स्क्रीनशॉट

दलित भोजन, दलित संगीत, दलित ‘देवता’, दलित परंपराएँ जैसे विषयों पर कई लेख और किताबें सामने आई हैं। इनमें कुछ भारतीय लेफ्ट-लिबरल समूह पश्चिम की ‘सोशल जस्टिस’ विचारधारा से प्रभावित होकर भारत के समाज और संस्कृति को दलित बनाम ऊँची जाति जैसे सीमित खाँचों में बाँटने की कोशिश करते हैं। कई बार ये चर्चाएँ अजीब तुलना और गलत दावों तक पहुँच जाती हैं।

                       पोर्न को ‘कलंक खत्म करने के हथियार’ के रूप में सही ठहराने वाले एक लेख का स्क्रीनशॉट

इन्हीं बहसों के धीरे-धीरे आम हो जाने की वजह से वह वायरल स्क्रीनशॉट भी लोगों को काफी हद तक सच जैसा लगा। व्यंग्य (सटायर) समाज में चल रही चीजों को हल्के-फुल्के अंदाज में दिखाने का एक तरीका होता है। यह तथ्य कि एक अलग ‘दलित पहचान’ की चीजों को वाम-उदारवादी ‘यौन स्वतंत्रता’ के सामान्य विचारों के साथ मिलाकर वह व्यंग्यात्मक स्क्रीनशॉट बनाया गया और वह कई लोगों को ‘सच’ लगा…यह अपने आप में भी एक तरह का व्यंग्य है।

मंदिर निर्माण पर हो रही थी बात, आरफा खानम ने रखी ‘मस्जिद’ की डिमांड: हिंदू महिलाओं ने लताड़ा तो RSS को देने लगीं गाली

             मंदिर निर्माण की माँग को आरफा ने दिया सामप्रदायिक रंग (फोटो साभार : YT_@TheWireNews)
प्रोपेगेंडा पत्रकार आरफा खानम शेरवानी एक बार फिर अपने ही बुने हुए जाल में बुरी तरह फँस गई हैं। नोएडा की एक पॉश सोसाइटी में मंदिर निर्माण के सीधे-साधे मुद्दे को ‘सांप्रदायिक’ रंग देने और अपना पुराना ‘मुस्लिम विक्टिम कार्ड’ चमकाने पहुँची आरफा को वहाँ की जागरूक हिंदू महिलाओं ने ऐसा करारा जवाब दिया कि उन्हें वहाँ से उल्टे पाँव भागना पड़ा।

आरफा, जो हिंदू महिलाओं को ‘गैसलाइट’ करने और उन्हें अपराधी जैसा महसूस कराने गई थीं, खुद ट्रोल होकर लौटी हैं। इस पूरी घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि आरफा खानम की पत्रकारिता का मकसद जमीन की हकीकत दिखाना नहीं, बल्कि हर मुद्दे में बीजेपी, RSS और मुस्लिम एंगल घुसाकर समाज में दरार पैदा करना है।

वीडियो की हकीकत: आरफा के ‘मस्जिद कार्ड’ पर महिलाओं का जवाब

सोशल मीडिया पर आरफा खानम का एक वीडियो तेजी से वायरल हो रहा है, जिसमें वे नोएडा के सेक्टर 15ए की महिलाओं से बातचीत कर रही हैं। इस वीडियो में महिलाओं अपनी माँग को बताती है कि उन्हें मंदिर सोसाइटी में चाहिए, जिससे काफी दूर आना-जाना, ट्रैफिक में फँसना बंद हो जाएगा और बुजुर्गों के लिए सुविधा हो जाएगी। इस वीडियो में आप देख सकते हैं कि कोई भी महिला आरफा से ना तो बदतमीजी से बातचीत कर रही है, ना ही तेज आवाज में चिल्ला रही है और ना ही धक्का-मुक्की कर रही हैं।

आरफा ने जितने भी सवाल वहाँ खड़ी हिंदू महिलाओं से पूछे है उनके जवाब उन्हें बेहद शांतिपूर्ण तरीके से मिला है। अपना मुस्लिम और मस्जिद विक्टिम कार्ड घुसाने पर भी महिलाओं ने उन्हें ये ही कहाँ है कि आप अपना एजेंडा यहाँ मत लाओ। मंदिर की बात है, मंदिर तक रहने दो। वीडियो में आप सुन सकते हैं कि जब मंदिर की माँग ज्यादा कर रही लोगों की तादाद ज्यादा थी, तो प्रोपेगेंडाई पत्रकार आरफा ने मस्जिद बनवाने पर भी सवाल कर डाला। आरफा महिलाओं से कहने लगी कि फिर तो मस्जिद भी बनना चाहिए।

इस सवाल का जवाब महिलाओं ने बेहत लहजे से दिया कि जब सोसाइटी में 99.99 प्रतिशत हिंदू लोग है तो मस्जिद बनवाना या ना बनवाना कहाँ से आ जाता है। फिर आरफा ने महिलाओं की तादात को ‘मेजोरिटिज्म’ शब्द से नवाजा, जिसका जवाब भी हिंदू महिलाओं ने बेहद तरीके और करारा दिया। वहाँ खड़ी एक हिंदू महिला ने आरफा को कहा- “हमें ऐसा लग रहा है कि अपने ईश्वर का नाम लेने में क्रिमिनल करार दिया जा रहा है।”

महिला ने आरफा को सीधा मुँह यह भी जवाब दिया कि यह महीने आज से 40 साल पहले नोएडा के मास्टर प्लान में मंदिर के लिए डेजिग्नेटिड यानि नामित थी। 40 साल पहले इतना ट्रैफिक नहीं हुआ करता था और लोग आसानी से दूर मंदिर जा सकते हैं। लेकिन आज ट्रैफिक बढ़ रहा है, समय नहीं है, लोग बुजुर्ग है, कुछ दिव्याँग है, तो कुछ लोगों के पास गाड़ी चलाने के लिए ड्राइवर नहीं है कि वह उन्हें मंदिर तक ले जाए।

वहाँ खड़ी एक महिला ने तो साफ कहा कि इसमें सरकार का कोई रोल नहीं है, ये हम लोगों की माँग है। इसके अलावा भी आरफा को हिंदू महिलाओं ने उनके कट्टरपंथी एजेंडे पर काफी बढ़िया जवाब दिया है, जिसे आप वीडियो में सुन सकते हैं। महिलाओं ने आरफा को ये ही कहा कि आप अपने एजेंडा यहाँ मत थोपिए… महिलाओं ने साफ कहा कि हमें पता है आपका एजेंडा क्या होता है, आप एक Biased साइड के लिए रिपोर्टिंग करती है। सोशल मीडिया पर भी नेटिजन्स ने आरफा के इस वीडियो पर काफी हँसी उड़ाई। कुछ लोगों ने लिखा कि जनता अब नफरत भरे एजेंडे पर यकीन नहीं कर रही है। अब जनता झगड़े के बजाय फैक्ट्स पर यकीन कर रही है।

The Wire का खेल: एडिटिंग का मायाजाल और फर्जी हेडलाइन

जब ग्राउंड पर आरफा का एजेंडा बुरी तरह फेल हो गया, तो उनके संस्थान ‘The Wire’ ने डैमेज कंट्रोल के लिए अपने यूट्यूब चैनल पर एक वीडियो डाला। इस वीडियो का टाइटल दिया गया- ‘मंदिर का समर्थन पर ‘लोकतंत्र’ से समस्या, उग्र महिलाओं ने आरफ़ा के साथ की धक्का-मुक्की’।

इस टाइटल और वीडियो की एडिटिंग को गौर से देखें तो ‘The Wire’ का प्रोपेगेंडा बेनकाब हो जाता है। वीडियो की शुरुआत में ही आरफा इसे ‘अमीर लोगों की सोसाइटी’ और ‘BJP वोटर्स’ का गढ़ बताकर नफरत फैलाना शुरू कर देती हैं। वे कहती हैं कि उत्तर प्रदेश के चुनाव पास हैं और RSS पूरी हरकत में आ गई है, हमारे समाज का हिंदूकरण कम पड़ गया था जो अब घर तक मंदिर की बात आ गई है।”

आरफा ने जानबूझकर इसे ‘RSS का प्रोजेक्ट’ करार दिया और अपने दर्शकों से कहा कि ‘आप 100 साल के RSS को देख रहे हैं कि वे कैसे घुसपैठ कर रहे हैं।’ ‘The Wire’ ने वीडियो को इस तरह से काट-छाँट कर पेश किया है ताकि हिंदू महिलाएँ ‘उग्र’ दिखें, जबकि असल में आरफा खुद महिलाओं को उकसा रही थीं और उन्हें अपराधी साबित करने पर तुली हुई थीं। वीडियो में कहीं भी वह धक्का-मुक्की नहीं है जिसका दावा हेडलाइन में किया गया है। लेकिन आरफा अपनी आदत के मुताबिक ‘डोंट टच मी’ कहकर खुद को पीड़ित दिखाने का नाटक करती रहीं।

क्या है पूरा मामला? क्यों हो रही है मंदिर की माँग?

नोएडा के सेक्टर 15A का यह पूरा मामला कोई सांप्रदायिक विवाद नहीं, बल्कि वहाँ रहने वाले लोगों की बुनियादी सुविधा और उनके अधिकारों का मामला है। इस सोसाइटी में रहने वाले लगभग 99 प्रतिशत से ज्यादा हिंदू लोग चाहते हैं कि उनकी सोसाइटी के भीतर एक मंदिर बन जाए। इसके पीछे बहुत ही साधारण वजहें हैं।

पहली वजह यह है कि सोसाइटी के पास कोई मंदिर नहीं है, जिसके कारण बुजुर्गों को पूजा-पाठ के लिए काफी लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। दूसरी समस्या ट्रैफिक और जाम की है, मुख्य मंदिर दूर होने की वजह से लोगों को घंटों जाम में फँसना पड़ता है, जिससे समय और ऊर्जा दोनों की बर्बादी होती है। साथ ही, वहाँ की महिलाओं का कहना है कि 40 साल पहले जब इस इलाके का नक्शा बना था, तभी यह जमीन मंदिर के लिए ही तय की गई थी।

लेकिन इस सीधी-सादी माँग को पत्रकार आरफा खानम ने एक अलग ही रंग दे दिया। उन्हें इसमें ‘हिंदू राष्ट्र’ बनाने की साजिश और जमीन हड़पने जैसा गंभीर मामला नजर आने लगा। उन्होंने सोशल मीडिया पर इसे एक खतरे की घंटी (वेक-अप कॉल) बताया। जबकि हकीकत यह है कि वहां के निवासी सिर्फ अपनी ही जमीन पर अपनी आस्था और सुविधा के लिए मंदिर बनवाना चाहते हैं, जो उनका अधिकार है।

एजेंडा पत्रकारिता की हार

आरफा खानम की पूरी रिपोर्टिंग का मकसद यह था कि सेक्टर 15A को ‘RSS की प्रयोगशाला’ साबित किया जाए। उन्होंने जानबूझकर बातचीत में नरेंद्र मोदी और BJP को घुसाया ताकि वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ‘मैजोरिटी टेररिज्म’ का नैरेटिव सेट कर सकें। वे वहाँ रिपोर्टिंग करने नहीं, बल्कि महिलाओं को डराने और उन्हें ‘अलोकतांत्रिक’ साबित करने गई थीं।

आरफा खानम वही चेहरा हैं जिन्होंने शाहीन बाग के समय मुस्लिमों को सलाह दी थी कि ‘विचारधारा न बदलें, बस रणनीति बदलें।’ नोएडा में भी वे इसी ‘रणनीति’ के साथ आई थीं, पहले निष्पक्ष पत्रकार होने का ढोंग करना और फिर धीरे से ‘मस्जिद’ और ‘मुस्लिम अधिकार’ का रोना रोकर हिंदुओं को दबाना।

लेकिन नोएडा की इन महिलाओं ने उनकी इस चाल को भांप लिया और उन्हें साफ कह दिया ‘अपना एजेंडा यहाँ मत चलाइए।’ जब आरफा का ‘मुस्लिम विक्टिम कार्ड’ नहीं चला, तो वे आक्रामक हो गईं और बाद में सोशल मीडिया पर झूठ फैलाने लगीं।

‘मियाँ’ का मतलब ‘अवैध बांग्लादेशी’… मुस्लिम विरोधी एजेंडा बताकर ‘द वायर’ का हिमंता के खिलाफ प्रोपेगेंडा

                    द वायर और असम के सीएम हिमंता बिस्वा सरमा (साभार : The Wire & thecrossbill)
असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा के हाल के बयानों को लेकर मुख्यधारा के वामपंथी मीडिया और ‘द वायर’ जैसे पोर्टल्स ने एक सुनियोजित अभियान छेड़ दिया है। मतदाता सूची के पुनरीक्षण और ‘मियाँ’ शब्द के इस्तेमाल को लेकर मुख्यमंत्री को ‘मुस्लिम विरोधी’ सिद्ध करने की कोशिश की जा रही है। लेकिन वास्तविकता इसके उलट है। हिमंता बिस्वा सरमा का संघर्ष किसी धर्म के खिलाफ नहीं, बल्कि उन ‘अवैध बांग्लादेशी’ के खिलाफ है जो असम की स्वदेशी संस्कृति, भूमि और लोकतांत्रिक अधिकारों को निगल रहे हैं।

द वायर का नैरेटिव: बयानों को तोड़-मरोड़कर पेश करने की साजिश

‘द वायर‘ ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है कि हिमंता बिस्वा सरमा जानबूझकर एक खास समुदाय (मियाँ) को डराने और उन्हें ‘परेशान’ करने की राजनीति कर रहे हैं। लेख में दावा किया गया है कि मुख्यमंत्री ने 4 से 5 लाख मियाँ मतदाताओं के नाम हटाने की बात कहकर लोकतंत्र का अपमान किया है। ‘द वायर’ ने मुख्यमंत्री के उस बयान को भी हाइलाइट किया जिसमें उन्होंने लोगों से मियाँ समुदाय के लिए ‘मुश्किलें’ पैदा करने को कहा, ताकि वे असम छोड़ दें।

वामपंथियों को हिमंता ने दिया जवाब

 हिमंता बिस्वा सरमा ने वायर और उस जैसी वामपंथी खेमों के स्वघोषित मुस्लिम मसीहों को तीखा जवाब दिया है। उन्होंने X पर एक लंबे पोस्ट में लिखा, “जो लोग ‘मियाँ’ शब्द (यह असम में बांग्लादेशी मुस्लिमों की घुसपैठ के लिए इस्तेमाल होता है) पर मेरी टिप्पणी को लेकर मुझ पर हमला कर रहे हैं, उन्हें पहले यह पढ़ लेना चाहिए कि असम के बारे में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने खुद क्या कहा है। यह मेरी भाषा नहीं है, न मेरी कल्पना, और न ही कोई राजनीतिक बढ़ा-चढ़ाकर कही गई बात है।”

उन्होंने आगे लिखा, “ये शब्द खुद अदालत के हैं, ‘असम में चुपचाप और खतरनाक तरीके से जनसंख्या में बदलाव हो रहा है, जिससे लोअर असम के रणनीतिक रूप से बहुत महत्वपूर्ण जिलों के हाथ से निकल जाने का खतरा पैदा हो सकता है। अवैध प्रवासियों की वजह से ये इलाके धीरे-धीरे मुस्लिम बहुल क्षेत्र बनते जा रहे हैं। इसके बाद यह केवल समय की बात होगी कि इन इलाकों को बांग्लादेश में मिलाने की माँग उठाई जाए। अगर लोअर असम हाथ से निकल गया, तो पूरा पूर्वोत्तर भारत देश के बाकी हिस्सों से कट जाएगा और उस क्षेत्र के समृद्ध प्राकृतिक संसाधन भी देश के हाथ से निकल सकते हैं’।”

हिमंता ने आगे लिखा, “जब देश की सर्वोच्च संवैधानिक अदालत ‘जनसंख्या पर आक्रमण’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल करती है और देश की एकता और क्षेत्रीय सुरक्षा को लेकर चेतावनी देती है, तो उस सच्चाई को स्वीकार करना न तो नफरत है, न सांप्रदायिकता, और न ही किसी समुदाय पर हमला। यह एक गंभीर और पुरानी समस्या को समझना है, जिसे असम दशकों से झेल रहा है।

उन्होंने लिखा, “हमारा प्रयास किसी मजहब या किसी भारतीय नागरिक के खिलाफ नहीं है। हमारा प्रयास असम की पहचान, सुरक्षा और भविष्य की रक्षा करना है, ठीक वैसे ही जैसे सुप्रीम कोर्ट ने देश को चेतावनी दी थी। उस चेतावनी को नजरअंदाज करना ही असम और भारत के साथ सबसे बड़ा अन्याय होगा।”

वामपंथियों की आँखों में क्यो खटकते हैं हिमंता?

वामपंथी खेमे की राजनीति अक्सर इस सोच पर टिकी रही है कि धार्मिक पहचान को दबाकर रखा जाए और खास समुदायों को खुश करने की नीति अपनाई जाए। उन्हें ऐसे नेता पसंद आते हैं जो हर मुद्दे पर संतुलन के नाम पर चुप्पी साध लें या फिर वोट बैंक के दबाव में फैसले लें। जब कोई नेता खुलकर अपनी पहचान की बात करता है तुष्टीकरण की राजनीति को चुनौती देता है और स्पष्ट शब्दों में सच बोलता है, तो वही वामपंथियों के लिए सबसे बड़ी समस्या बन जाता है।

हिमंता बिस्वा सरमा इसी वजह से वामपंथियों की आँखों की किरकिरी बने हुए हैं। वह बार-बार यह सवाल उठाते हैं कि आखिर हिंदू अपनी पहचान पर गर्व क्यों न करे। वामपंथी विचारधारा को यह बात स्वीकार नहीं होती क्योंकि उनकी राजनीति में हिंदू पहचान को अक्सर संदेह की नजर से देखा जाता है। उन्हें लगता है कि अगर कोई नेता हिंदुत्व की बात करेगा, तो उनकी वैचारिक जमीन कमजोर पड़ जाएगी। इसलिए वामपंथी गुट ऐसे नेताओं को कट्टर, विभाजनकारी या असहिष्णु साबित करने की कोशिश करते हैं।

वामपंथियों को यह भी खलता है कि हिमंता सरमा मुस्लिम समाज को केवल वोट बैंक की तरह देखने के बजाय उन्हें शिक्षा और विकास की मुख्यधारा में लाने की बात करते हैं। जब वह घुसपैठ या अतिक्रमण जैसे मुद्दों पर सख्त रुख अपनाते हैं तो वामपंथी इसे मानवाधिकार या अल्पसंख्यक विरोध के रूप में पेश करने लगते हैं। असल में समस्या यह है कि वामपंथी हर मुद्दे को राजनीतिक चश्मे से देखते हैं और कानून, सुरक्षा या सामाजिक संतुलन जैसी बातों को स्वीकार करने को तैयार नहीं होते।

हिमंता सरमा का अपराध वामपंथियों की नजर में यही है कि वह डरकर नहीं बोलते। वह न तो किसी समुदाय के दबाव में आते हैं और न ही वैचारिक आलोचना से घबराते हैं। वह साफ कहते हैं कि देश और समाज का हित सबसे ऊपर है, चाहे इसके लिए कड़वी बात ही क्यों न कहनी पड़े। यही स्पष्टता वामपंथियों को असहज करती है।

कुल मिलाकर हिमंता बिस्वा सरमा की राजनीति उस सोच से अलग है जिसमें नेताओं को हर मुद्दे पर संतुलित या अस्पष्ट भाषा में बोलते देखा जाता है। वह अपनी बात सीधे और स्पष्ट शब्दों में रखते हैं, चाहे वह उनकी पहचान का सवाल हो, विकास का मुद्दा हो या घुसपैठ और कानून-व्यवस्था का मामला। यही वजह है कि एक वर्ग उन्हें मजबूती और स्पष्टता का प्रतीक मानता है, जबकि वामपंथी उन्हें अपने लिए चुनौती और असहजता का कारण समझता है।

न गीता का श्लोक सुन पा रही, न भक्ति भजन… आरफा खानम आपका ये दर्द कैसे होगा कम? खतना पर खामोश लेकिन मुस्लिम-मुस्लिम करो पर राम मंदिर, भगवा और हिंदुओं से चिढ़ क्यों


अपनी इस्लामी पत्रकारिता के लिए कु्ख्यात आरफा खानम शेरवानी एक बार फिर सोशल मीडिया पर रोना-धोना मचाए हुए हैं। आरफा खानम का दुख ये है कि आखिर ये जो टीवी पर दिखने वाले पत्रकार हैं इनका चेहरा क्यों बदल रहा है? क्यों ये लोग हिंदू त्योहारों पर भारतीय परिधान पहन पहनकर टीवी कार्यक्रम करने लगे हैं? क्यों इनके माथे पर तिलक, हाथ में कलावा दिखाई देता है…? आदि आदि 
देखिए(फोटो में) पाखंडी भड़काऊ अरफ़ा खानम को। ये अरफ़ा खानम वही मुस्लिम महिला है जो मुस्लिम महिलाओं को बुर्का और हिजाब पर भड़काने का कोई मौका नहीं चुकती लेकिन खुद बिना हिजाब और बुर्के के मस्त होकर घूमती है। औरों को नसीहत अपने आपको फजीयत। अब इसको भड़काऊ नहीं कहा जाए तो क्या कहा जाए?   

आरफा ने अपने दुख के बारे में अब तक कई लोगों के साथ साझा कर दिया है। वो खुलकर बता रही हैं कि पत्रकारों का ‘हिंदू’ रूप देखकर उन्हें कितनी पीड़ा है। कभी वो संविधान की तस्वीर साझा करके अपने जख्म पर मलहम लगा रही हैं। कभी वामपंथी ‘बुद्धिजीवियों’ से चर्चा करके।

दिलचस्प बात ये है कि आरफा खानम जिन्हें समस्या इस बात से है कि अन्य पत्रकार आखिर क्यों हिंदुत्व की ओर झुकाव दिखाने लगे हैं, उन आरफा को ये एहसास ही नहीं है कि उनकी पत्रकारिता कितनी एकतरफा है। पिछले कुछ सालों में अगर आरफा खानम द्वारा उठाए मुद्दों का विश्लेषण किया जाए तो समझ आएगा कि आरफा खानम सोते-जागते सिर्फ इस्लाम और मुसलमान करती हैं। और ऐसा करता देख जो लोग उनपर सवाल उठाते हैं उन्हें वो कम्युनल मानती है, उनके सेकुलर होने पर सवाल उठाती हैं।

आप आरफा का एक्स हैंडल देखेंगे तो पता चलेगा कि इस बार वह राम मंदिर के ध्वजारोहण कार्यक्रम की कवरेज देखकर बिलबिलाई हैं। उनकी प्रतिक्रिया देखकर समझ ये नहीं आ रहा कि उनकी समस्या मुसलमानों का दुख है या हिंदुओं के प्रति घृणा।

देख सकते हैं कि शुभांकर मिश्रा के एक पोस्ट जिसमें उन्होंने बताया था कि अयोध्या में 500 वर्ष बाद राम मंदिर पर केसरिया फहरा है। उन्होंने खुशी जताई थी कि वो उस युग में जन्मे हैं जब रामललाल को टेंट से निकलकर सिंहासन पर बैठते देखा गया। इस ट्वीट ने आरफा को ऐसा जख्म दिया कि उन्होंने शुभांकर के लिए लानत भेज दी। उन्होने लिखा “और देखते-ही-देखते हिंदी पत्रकारिता, ‘हिंदू पत्रकारिता’ में बदल गई। पत्रकार, क़लम के सिपाहियों से धर्म के सैनिक बन बैठे। और देखते-ही-देखते… लानत है!”

इसके बाद द वायर का एक वीडियो देखिए। आरफा रोने वाले अंदाज में भारतीय नागरिकों को बता रही हैं कि देखिए अयोध्या में ध्वाजारोहण हो रहा है लेकिन हमेशा इस बात को याद रखा जाए कि भारत का झंडा केसरिया नहीं बल्कि तिरंगा है। और संविधान की प्रस्तावना वो कसम है जो हम लोगों ने खाई थी जब देश आजाद हुआ था।

एक अन्य वायरल होती क्लिप में आरफा हिंदी मीडिया को टारगेट करती इसलिए नजर आ रही हैं क्योंकि वो राममंदिर की कवरेज करता है। वह सिद्धार्थ वरदराजन और सीमा चिश्ती से बात करते हुए अपनी पीड़ा जाहिर करती हैं। उनका कहना कि जो महिला पत्रकार स्टूडियो में कोट पेंट पहनकर आती थीं वो भगवा पहनकर और तिलक लगाकर क्यों आ रही हैं। वो गीता के श्लोक और भक्ति के भजन पढ़ रही हैं।

वह इस वीडियो में साफ बोल रही हैं कि जो कुछ हो रहा है उनसे वो देखा नहीं जा रहा। उनसे भजन श्लोक नहीं सुने जा रहे। उन्हें पता नहीं चल रहा कि वो कैसे इस वक्त को काटें। आरफा के ये चेहरे के भाव हो सकता है उन लोगों को भावुक कर रहे हों जिनके लिए असल में वह पत्रकारिता करती हैं, मगर बाकियों के लिए ये सब सिर्फ हास्यासपद है। कारण- आरफा की पत्रकारिता ही है।

आज आपको संविधान की प्रस्तावना पढ़कर सुनाने वाली आरफा खानम के बारे में कोई सेकुलर राय बनाने से पहले याद रखिएगा कि आरफा सालों से इस्लामी की कुरीतियों को मजहबी अधिकार दिखाकर उन्हें सपोर्ट करती रही हैं। उनके लिए पत्रकारिता निष्पक्ष सिर्फ तब तक है जब वो इस्लामी पक्ष रखे, अगर देश की हिंदू आबादी की कोई चर्चा होगी तो उससे हिंदी पत्रकारिता के हिंदू पत्रकारिता में तब्दील हो जाने का डर रहेगा।

उनके लिए हलाला, पॉलीगेमी और तीन तलाक जैसे मुद्दे कभी भी चर्चा लायक नहीं लगे। उन्हें दिक्कत हुई तो सिर्फ अयोध्या में राम मंदिर से, वहाँ फहराते केसरिया झंडे से और भगवा कपड़ों में वहाँ पहुँचे भक्तों। अजीब बात ये है कि अपने आपको निष्पक्ष प याद करिए यही वो आरफा खानम हैं जिन्होने कर्नाटक में जब स्कूलों में हिजाब पहनने का मुद्दा गरमाया था उस समय स्कूल के यूनिफॉर्म कोड की जगह हिजाब पहनने वाली लड़कियों का समर्थन किया था। जो जायरा वसीम के एक्टिंग छोड़ने के फैसले पर सवाल उठाने वालों पर भड़की थीं।

क्या उस समय पर उन्हें याद नहीं आया कि देश का शैक्षणिक संस्थान अपने नियम मानने को अगर कह भी रहा है तो उसमें समस्या क्या है। तब क्यों नहीं आरफा ने ये रोना रोया मुस्लिम छात्राएँ क्यों हिजाब पहन-पहनकर स्कूल-कॉलेज को मदरसा जैसा बनाने का प्रयास कर रही हैं।

इसी तरह राम मंदिर पर जो आरफा रह रहकर अपना दुख बयान करती हैं क्या आप जानते हैं कि यही आरफा बामियान बुद्ध के विनाश को जस्टिफाई कर चुकी हैं। साल 2021 में आरफा ने ये बताना चाहा था कि तालिबान ने ‘हिन्दुत्व के गुंडों’ से प्रेरित होकर बामियान बुद्ध की विशाल मूर्ति को विस्फोटक से उड़ा दिया था। शेरवानी ने ट्वीट में लिखा कि बाबरी मस्जिद के विध्वंस ने ही अफगानिस्तान में बौद्ध स्मारक के तालिबान द्वारा विनाश को प्रेरित किया था।

सोचकर देखिए कि जिन आरफा को बामिया बुद्ध की मूर्ति उड़ाने वालों के कृत्य का बचाव करने के लिए तक तर्क मिल रहा है। उन्हें कभी ये समझ क्यों नहीं आया कि राम मंदिर हिंदू के लिए क्या था? उनके लिए बाबरी का वह ढाँचा देश में सेकुलरिज्म,लोकतंत्र और संविधान के होने का प्रतीक था जिसे करोड़ों सनातनियों की भावना रौंदते हुए खड़ा किया गया था। हैरानी नहीं है कि आज जब उसी जगह, एक लंबी कानूनी लड़ाई जीतकर हिंदुओं ने अपने रामलला का मंदिर बना लिया है तो आरफा को क्यों सेकुलरिज्म,लोकतंत्र और संविधान खतरे में लगते हैं।

अमेरिका में भारत-विरोधी नस्लवाद पर CNN का प्रोपेगेंडा लेख, भारत-हिंदू विरोधी कट्टरपंथियों को बनाया ‘विशेषज्ञ’

                                   रकीब नाइक, रोहित चोपड़ा, सिद्धार्थ वेंकटरामकृष्णन और सीएनएन

सीएनएन ने रविवार (16 नवंबर2025 ) को संयुक्त राज्य अमेरिका में बढ़ते भारत-विरोधी नस्लवाद पर रिपोर्ट दी। ये रिपोर्ट इस्लाम समर्थकों और भारत-विरोधी कट्टरपंथियों का हवाला देकर प्रकाशित की गई है।

अमेरिकी समाचार मीडिया कंपनी सीएनएन ने भारत-विरोधी प्रचार का इतिहास रहा है। उसने एक आर्टिकल प्रकाशित किया है ‘नस्लवादी अब खुलेआम भारतीय-अमेरिकियों को निशाना बना रहे हैं।’

सीएनएन ने जानकारी दी है कि कैसे भारतीय मूल के एफबीआई निदेशक काश पटेल, निक्की हेली और विवेक रामास्वामी को दिवाली की शुभकामनाएँ देने पर श्वेत ईसाई राष्ट्रवादियों को दुर्व्यवहार का सामना करना पड़ा।

लेख में कहा गया है, “कुछ भारतीय-अमेरिकी रूढ़िवादी इस बात से हैरान हैं कि राजनीतिक दक्षिणपंथी धड़ा अब उन पर निशाना साध रहे हैं।”

सीएनएन ने बढ़ते भारत-विरोधी नस्लवाद के लिए ‘राजनीतिक दक्षिणपंथ’, हाशिए पर चले गए स्थानीय लोग और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के वीजा नियमों में की गई सख्ती को जिम्मेदार ठहराया है। लेख में आगे कहा गया है, “MAGA गठबंधन के कुछ सदस्य खुलेआम कह रहे हैं कि केवल श्वेत ईसाई ही अमेरिका में रहने के हकदार हैं।”

यह साफ था कि अमेरिकी समाचार चैनल ने रिपब्लिकनों की आलोचना करने और नस्लवाद-विरोधी मुहिम को मजबूत करने के लिए यह लेख प्रकाशित किया था, लेकिन सीएनएन ने भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी बयानबाजी के लिए मशहूर लोगों के विचार भी इसमें शामिल किया।

रकीब नाइक

सीएनएन ने जिन विशेषज्ञों को शामिल किया है उनमें रकीब नाइक भी एक थे। उन्हें ‘ ऑर्गनाइज हेट स्टडी सेंटर’ का संस्थापक और कार्यकारी निदेशक बताया गया।

अमेरिकी समाचार एजेंसी ने दावा किया है कि रकीब नाइक ने कहा कि उनकी टीम ने अकेले अक्टूबर में भारतीयों और अमेरिकी भारतीयों के खिलाफ नस्लवाद और द्वेष फैलाने वाले लगभग 2,700 पोस्ट रिकॉर्ड किए।

 दरअसल नाइक एक इस्लामवादी और एक शातिर फर्जी खबर फैलाने वाला है। वह हिंदू-विरोधी दुष्प्रचार संगठन ‘हिंदुत्व वॉच’ का संस्थापक है, जिसका ट्विटर अकाउंट भारत में जनवरी 2024 में बंद कर दिया गया था।

                                                 रोहित चोपड़ा का ट्विटर पोल

यह भारत-विरोधी कट्टरपंथी है। इसने 1990 के दशक में कश्मीर घाटी में हिंदू नरसंहार को नकारने की कोशिश की। इस्लामी कट्टरपंथियों ने हिन्दुओं को रातोंरात पलायन के लिए मजबूर किया और जमकर रक्तपात मचाया। नाइक ने काशी की ज्ञानवापी मस्जिद में मिले ‘शिवलिंग’ का मज़ाक भी उड़ाया था। इसके बावजूद, सीएनएन ने नाइक को सोशल मीडिया पर ‘भारत-विरोधी कट्टरता’ पर एक विशेषज्ञ के तौर पर पेश किया।

रोहित चोपड़ा

अमेरिकी समाचार मीडिया कंपनी ने रोहित चोपड़ा नाम के एक व्यक्ति का भी हवाला दिया। अमेरिका के सांता क्लारा विश्वविद्यालय में प्रोफेसर के तौर पर उनका विचार छापा गया है।

इसमें कहा गया है, ” रोहित चोपड़ा अति-दक्षिणपंथी समुदायों का ऑनलाइन अध्ययन करते हैं और नाइक के साथ ‘सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ ऑर्गनाइज्ड हेट’ के सह-लेखक हैं।”
चोपड़ा ‘इंडियाएक्सप्लेन्ड’ नाम से एक हिंदूफोबिक एक्स हैंडल चलाते हैं, जिसे पहले भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की हत्या का आह्वान करने के कारण निलंबित कर दिया गया था।
चोपड़ा ने एक सर्वे में शामिल होने के लिए लोगों को आगे आने को कहा। इस सर्वे में पूछा गया था कि क्या भारतीय प्रधानमंत्री की हत्या उनके अपने गृह मंत्री अमित शाह द्वारा की जाएगी।
                                                             रोहित चोपड़ा का ट्वीट
एक ट्वीट में, इस घटिया प्रोफेसर ने नरेंद्र मोदी की एक तस्वीर साझा की और दावा किया, “ऐसे कपड़े पहने हुए हैं जैसे वह किसी भक्त का बलात्कार करने, पत्नी की हत्या करने या दंगा भड़काने जा रहे हों।”
उनके ट्वीट वायरल होने के बाद, प्रमुख वैश्विक थिंक टैंक ऑब्ज़र्वर रिसर्च फ़ाउंडेशन (ORF) ने उन्हें अपने प्लेटफॉर्म से हटा दिया। एनडीटीवी के पत्रकार शिव अरूर के अनुसार, इसी ‘प्रोफ़ेसर’ की कई साल पहले बाल पोर्नोग्राफ़ी के आरोप लगे थे और जाँच चल रही थी। भारत ने उनके ट्वीट पर बैन लगा दिया गया।
यही कारण है कि उन्होंने ‘वैश्विक हिंदुत्व को ख़त्म करने’ वाले सम्मेलन का बचाव करने और इस आयोजन के खिलाफ हिन्दुओं के विरोध को कम करके आंका। इसके बावजूद सीएनएन ने उन्हें अमेरिका में भारत-विरोधी नस्लवाद के ‘विशेषज्ञ’ के रूप में पेश करने में कोई हिचकिचाहट नहीं दिखाई
भारत-विरोधी और हिंदू-विरोधी बयानबाज़ी के लिए मशहूर चोपड़ा ने अमेरिकी समाचार चैनल से कहा, “यह एक तरह की चेतावनी होनी चाहिए कि अल्पसंख्यकों के प्रति नस्लवाद से आप भी अछूते नहीं हैं।”

सिद्धार्थ वेंकटरामकृष्णन

सीएनएन ने एक और विवादास्पद ‘विशेषज्ञ’ सिद्धार्थ वेंकटरामकृष्णन का मत लिया है। वह इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक डायलॉग (आईएसडी) में विश्लेषक के रूप में काम करते हैं।

उन्होंने पहले भी ‘लव जिहाद‘ को एक साजिश बता कर इसके असर को कम आंकने की कोशिश की थी, जबकि इसके हज़ारों मामले दर्ज हैं। ‘लव जिहाद’ गैर-मुस्लिम महिलाओं को इस्लाम में धर्मांतरित करने की एक चाल है।
सिद्धार्थ ने WIRE को दिए इंटरव्यू में ऑपइंडिया के ‘लव जिहाद’ को लेकर लिखे लेखों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि इन लेखों में दिए गए कंटेंट को एक्स और टेलीग्राम जैसे दूसरे प्लेटफॉर्म पर फैलाया जाता है। उनका कहना है कि “इन लेखों की वजह से कुछ जगहों पर मुसलमानों के खिलाफ हिंसा या मुसलमानों को भगाने के आह्वान किए जाते हैं।”
उनका कहना है कि ऐसे लेख हिंदुत्व या हिंदू राष्ट्रवाद के अंतर्गत आते हैं। यह एक राजनीतिक विचारधारा है, जो दावा करती है कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है जिसे इस्लाम और ईसाई धर्म जैसे बाहरी प्रभावों से खतरा है। ISD ने अपने लेख में इन बातों को छापा है।
इंस्टीट्यूट फॉर स्ट्रैटेजिक डायलॉग ने न केवल हिंदुत्व के बारे में झूठ फैलाया है, बल्कि 2022 के लीसेस्टर दंगों के लिए ‘हिंदू राष्ट्रवाद’ (बिना किसी सबूत के) को दोषी ठहराने की कोशिश की है। इस इंस्टीट्यूट में सिद्धार्थ वेंकट रामकृष्णन एक विश्लेषक के रूप में काम करते हैं।

आतंकियों की छवि सुधारने में लगी वामपंथी मीडिया, Al Jazeera-Guardian-CNN ने भी साधी इस्लामी टेरर पर चुप्पी: ‘भगवा’ को बदनाम करने वालों ने क्यों बदला दिल्ली ब्लास्ट पर अपना चश्मा

                       दिल्ली ब्लास्ट पर विदेशी मीडिया और भारतीय मीडिया ने अपना-अपना नैरेटिव गढ़ा
दिल्ली के लाल किले के पास हुए आतंकी कार ब्लास्ट ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। वहीं दूसरी ओर इस निंदनीय आतंकी घटना पर वामपंथी मीडिया अपना नैरेटिव चला रही है। टाइम्स ऑफ इंडिया, द वायर जैसे मीडिया पोर्टल दिल्ली बम धमाके में संदिग्ध मुस्लिमों के प्रति सहानुभूति दिखाकर उनकी छवि सुधारने में लगी हुई है।

उधर, CNN, अल जजीरा(Al Jazeera), द गार्जियन( The Guardian), डॉन (Dawn) जैसे विदेशी मीडिया संस्थानों ने दिल्ली में हुए कार ब्लास्ट को ‘घातक’ नाम देने में बिल्कुल नहीं हिचकिचाए। लेकिन यही विदेशी मीडिया संस्थानों ने धड़ल्ले से रिपोर्ट्स छापी कि कैसे भारत की सरकार दिल्ली ब्लास्ट के पीछे ‘साजिश’ तलाश रही है। इन रिपोर्ट्स में तीन एजेंडे साफ नजर आए-

  1. भारत सरकार जबरन मुस्लिमों को दिल्ली ब्लास्ट का आरोपित साबित करने में लगी है।
  2. दिल्ली में हुए कार ब्लास्ट जैसे ‘घातक’ हमले से पूरा भारत ‘डर’ गया है, यहाँ मोदी सरकार की नाकामी को दर्शाया गया।
  3. सवाल उठाए गए कि क्या भारत अप्रैल में हुए पहलगाम हमले के बाद तय की गई दुश्मन को सीधा जवाब देने वाली नीति पर कायम रहेगा?
इन सवाल और आरोपों के माध्यम से विदेशी मीडिया ने भारत सरकार को जमकर घेरा। यह विदेशी मीडिया का आम तरीका है भारत में मुस्लिम-पीड़ित को साबित करने का और वही घिसा-पीटा मोदी सरकार को ‘भगवा राजनीतिवाद’ दिखाने को और यह दर्शाने का कि मोदी सरकार ने जिन्हें बम धमाके का संदिग्ध बनाया है, इसका कारण केवल उनकी मुस्लिम पहचान है।

वामपंथी मीडिया का आतंकियों की छवि सुधारने का प्रोपेगेंडा

देश की वामपंथी मीडिया ने दिल्ली में आतंकी ब्लास्ट के संदिग्ध डॉक्टर मोहम्मद उमर नबी की छवि को सुधारने के मिशन पर उतर गई। जैसे उमर नबी एक सीधा व्यक्ति है और उसने अनजाने में दिल्ली में इतना बड़ा ब्लास्ट कर दिया हो।
द वायर ने अपने लेख में पुलवामा में रहने वाले उमर नबी के परिवार की पीड़ा प्रस्तुत की। यह लेख इस तरह लिखा गया है कि पढ़ने पर यह एहसास होता है मानो लेखक आतंक के आरोपों में शामिल लोगों को ‘पीड़ित’ के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहा हो।
                                                              The Wire का लेख

उमर नबी के परिवार में उसके अब्बू के कथनों को प्रमुखता देकर यह दिखाया गया है कि वे अन्याय और दुख झेल रहे हैं, जबकि यह तथ्य नजरअंदाज कर दिया गया है कि इन्हीं का बेटा दिल्ली धमाके का संदिग्ध है।

टाइम्स ऑफ इंडिया के इस रिपोर्ट की लेखन शैली का अंदाज साफतौर पर दिखाता है कि दिल्ली धमाके का संदिग्ध डॉक्टर मुजम्मिल अहमद ‘पीड़ित’ है। रिपोर्ट में डॉ. मुजम्मिल की कॉलेज सीनियर डॉ. मोनिका लांघेह की प्रतिक्रिया दिखाई गई, वह मुजम्मिल के बारे में जानकर स्तब्ध हुईं हैं और कहती हैं, “एक श्रेष्ठ पद के व्यक्ति को गिरते देखा।” यह रिपोर्ट एक तरह से पाठक में मुजम्मिल के प्रति सहानुभूति जगाती है।

                                                        टाइम्स ऑफ इंडिया का लेख

उधर, भारत की मीडिया में दिल्ली ब्लास्ट में शामिल आतंकी उमर नबी की भाभी और आतंकी मुजम्मिल की अम्मी की ‘विक्टिम कार्ड’ वीडियो भी खूब प्रसारित की।

                                                               हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट

जहाँ उमर नबी की भाभी मुजमिल ने उमर नबी के बचपन और पढाई पर बात करते हुए उसे एक बेहतर बेटे और इंसान के रूप में पेश किया। यह माहौल बनाती है कि लोग सोच सकें- “ऐसा शांत-स्वभाव का व्यक्ति कैसे इतने बड़े आतंक जगत में शामिल हो गया?”

वहीं फरीदाबाद में 360 किलो विस्फोटक और हथियार के साथ पकड़े गए डॉ. मुजम्मिल, जो दिल्ली ब्लास्त का संदिग्ध भी है, उसकी अम्मी ने बेटे को बेगुनाह होने की बाते कहीं और आतंक के आरोपों को पूरी तरह नकारा। इस बयान के हवाले से Mint ने अपनी रिपोर्ट में आंतकी के परिवार को ‘बेबस’ और ‘अन्याय’ झेलने रूप में दर्शाया।

                                                               LiveMint की रिपोर्ट

आतंकी की अम्मी के दुख और भरोसे को, “मेरा बेटा ऐसा नहीं कर सकता, हमें तो किसी ने बताया कि उसे पकड़ लिया गया” जैसे बातें लिखकर पाठक के सामने आतंकी की छवि को साफ सुथरी प्रदर्शित करने की कोशिश की गई।

दिल्ली ब्लास्ट पर विदेशी मीडिया का प्रोपेगेंडा

दिल्ली ब्लास्ट पर विदेशी मीडिया ने भी अपने नैरेटिव को आगे बढ़ाया। तमाम तरीके के प्रोपेगेंडा चलाकर ब्लास्ट के दिल्ली धमाके को भारत की नाकामी दर्शाया गया। लेकिन मुस्लिम पहचान वाले संदिग्ध आरोपितों की बात तक नहीं की गई। यहाँ विदेशी मीडिया का इस्लामी कट्टरपंथी सोच सामने आती है। Dawn से लेकर अल जजीरा और द गार्जियन ने धड़ल्ले से दिल्ली ब्लास्ट को कवर करते हुए ऐसी रिपोर्ट्स छापी हैं।

द गार्जियन की इस रिपोर्ट में दिल्ली ब्लास्ट को एक बेहद घातक और डरावना हमला बताया गया है, जिससे पूरे भारत में दहशत फैल गई। लेख की शुरुआत ही इस तरह की भाषा से होती है कि यह घटना भारत की राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

                                                              द गार्जियन की रिपोर्ट

अल जजीरा की इस रिपोर्ट में सवाल उठाए गए कि कैसे भारत की मोदी सरकार दिल्ली ब्लास्ट पर इतने आनन-फानन में आरोप लगाने में जुटी हुई है। रिपोर्ट में पीएम मोदी का पहलगाम हमले के बाद दिए गए बयान- आतंकी हमले को ‘युद्ध की कार्रवाई’ माना जाएगा का हवाला देते हुए सवाल किया कि भारत ने पाकिस्तान के साथ संघर्ष शुरू किए बिना कथित अपराधियों को दोषी ठहरा दिया है।

                                                                  अल जजीरा की रिपोर्ट

इस रिपोर्ट में दिल्ली ब्लास्ट को लेकर डर और असुरक्षा का माहौल उभारने की कोशिश की गई है। लेख में कहा गया, “दिल्ली धमाका ने पूरे देश को सतर्क कर दिया है।” यानी इस विस्पोट से पूरा देश सतर्क और डर गया है। इस तरह का वाक्य भारत को एक डर से घिरे देश के रूप में दिखाने की कोशिश है और भारत की सुरक्षा व्यवस्था को नाकाम बताने जैसा दावा है।

                                                                 अल जजीरा की रिपोर्ट

अमेरिकन मीडिया CNN ने अपनी इस रिपोर्ट में दिल्ली में आतंकी ब्लास्ट और अगले ही दिन पाकिस्तान के इस्लामाबाद में हुए ब्लास्ट को समान बताने की कोशिश की गई। जबकि असलियत यह है कि दिल्ली ब्लास्ट में गिरफ्तार संदिग्धों के सीधे संबंध पाकिस्तान के आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद से पाए गए हैं। इसके बावजूद भारत ने अब तक पाकिस्तान को बिना ठोस सबूत के दोषी नहीं ठहराया है।

                                                                CNN की रिपोर्ट

उधर, आतंक को पनाह देने वाले पाकिस्तान के इस्लामाबाद में जो ब्लास्ट हुआ वह एक सुसाइड बॉम्बिंग है। जिसके तार अब तक भारत से दूर-दूर तक जुड़ने के कोई सबूत नहीं है। तब भी पाकिस्तान ने बिना तथ्यों के सीधा भारत पर हमले के आरोप लगा डाले।

दिल्ली ब्लास्ट और फरीदाबाद आतंकी मॉड्यूल

फिर बात करें दिल्ली ब्लास्ट के तारों की और फरीदाबाद में सामने आए आतंकी मॉड्यूल की तो इस ब्लास्ट में इस्तेमाल हुई कार, विस्फोट और संदिग्ध गतिविधियों से जुड़ी जाँच में यह साफ हुआ है कि यह एक बड़ा आतंकी नेटवर्क था। जाँच एजेंसियों को फरीदाबाद, सहारनपुर, लखनऊ समेत कुछ जिलों से 2900 किलो विस्फोटक सामग्री बरामद हुई, जो सीधे दिल्ली ब्लास्ट से जुड़ रही है।

इसके अलावा जिस i20 कार से ब्लास्ट हुआ, उसमें बैठा डॉक्टर मोहम्मद उमर नबी के तार भी आतंकी मॉड्यूल से जुड़े। उसके दोस्त सज्जाद अहमद और परिवार वालों से पूछताछ की गई तो सामने आया कि वह संदिग्ध आतंकी गतिविधियों में शामिल था। जाँच एजेंसियों को यह भी शक है कि फरीदाबाद से गिरफ्तार आतंकी मुजम्मिल की गर्लफ्रेंड डॉ. शाहीना का भी दिल्ली ब्लास्ट में बड़ा रोल हो सकता है। डॉ. शाहीना पाकिस्तान के आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद (JeM) की महिला ट्रेनर थी, उसके पास से एके-47 और हथियार बरामद हुए।

यहाँ तक कि भारत सरकार ने दिल्ली ब्लास्ट की घटना को आतंकी हमला बताने में कोई संकोच नहीं किया। सरकार ने कहा कि यह हमला निंदनीय था और पीएम मोदी ने भूटान के मंच से चेतावनी दी कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।

दिल्ली ब्लास्ट पर सरकार की कार्रवाई और इस्लामी कट्टरपंथ सोच

दिल्ली ब्लास्ट पर भारत की मोदी सरकार की कार्यवाही जारी है। जाँच एजेंसिया अब तक दोषियों के काफी करीब पहुँच चुकी है। यहाँ तक कि दिल्ली ब्लास्ट के फिदायीन उमर नबी और उसके परिवार पर भी जाँच एजेंसियों ने शिकंजा कसा है। हमले की जाँच में रोजाना नई परते खुल रही हैं। लखनऊ के सहारनपुर से गिरफ्तार डॉ. शाहीन को लेकर भी जाँच एजेंसियाँ बड़ा शक जता रही हैं क्योंकि वह जैश-ए-मोहम्मद की महिला विंग की कमांडर है।

इन सब सबूतों और जाँच से साफ स्पष्ट होता है कि भारत सरकार आतंक के खिलाफ कार्रवाई को लेकर कितनी सक्रिय है। वहीं अब तक कि जाँच से यह भी साफ है कि संदिग्ध आरोपितों की कौम एक ही है। सभी पकड़े गए लोगों की पहचान मुस्लिम ही है। वैसे ये कोई चौंकने वाली बात नहीं है क्योंकि भारत में अब तक जो भी आतंकी हमले या ब्लास्ट हुए हैं उसके पीछे इस्लामी कट्टरपंथी की विचारधारा ही है। फर्क सिर्फ यह है कि इस बार हमला देश के भीतर बैठे इस्लामी कट्टरपंथों के जरिए किया गया है।

विदेशी मीडिया की इस्लामी कट्टरपंथ पर चुप्पी

अब वापस आते हैं विदेशी मीडिया की दिल्ली ब्लास्ट को लेकर छापी गई रिपोर्ट्स पर। यहाँ बड़े-बड़े विदेशी मीडिया संस्थानों ने दिल्ली ब्लास्ट को लेकर बेहतर तरीके से खबरें छापीं और पाठकों को हर मिनट अपडेट किया लेकिन यह सब अपना नैरेटिव ध्यान में रखते हुए किया गया। कहीं दिल्ली ब्लास्ट को ‘घातक’ हमला करार दिया गया तो कहीं भारत की मोदी सरकार पर सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े किए गए। लेकिन संदिग्धा आरोपितों पर कोई खबरें नहीं छापी गईं, क्योंकि उनकी पहचान ‘मुस्लिम’ थी।

ये बिल्कुल वैसा ही है, जैसे विदेशी मीडिया हमेशा से करती आई है। एक बार फिर विदेशी मीडिया की इस्लामी कट्टरपंथी विचारधारा उजागर हुई है। ये मीडिया CAA, NRC और आर्टिकल 370 को मुस्लिमों के खिलाफ कार्यवाही बताने में नहीं हिचकिचाती है। तब भारत में मोदी सरकार की ‘भगवा राजनीति’ पर बड़े-बड़े लेख लिखे जाते हैं। लेकिन अब जब भारत की राजधानी में आतंकी हमला हुआ और आरोपित मुस्लिम हैं तो वे चुप्पी साधे बैठे हैं।

आरोप लगाए गए कि मोदी सरकार पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद अपनी नई नीति को साबित करने के लिए पाकिस्तान पर आरोप लगाने में जल्दबाजी कर रहा है। बता दें जिस नीति की बात हुई वह भारत की आतंकी हमले पर ‘युद्ध की कार्रवाई’ के कड़े संदेश हैं। तो विदेशी मीडिया को जान लेना चाहिए कि भारत अब चुप नहीं बैठता है, यह बयान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी दिया जा चुका है। आतंकवाद के खिलाफ लड़ने की बात आएगी तो भारत सबसे आगे रहेगा। इसका उदाहरण भारत की मोदी सरकार URI स्ट्राइक, ऑपरेशन सिंदूर और अन्य ऑपरेशन चलाकर दे चुकी है और आगे भी देती रहेगी।

भारत की वामपंथी मीडिया का दोहरा रवैया

यहाँ सिर्फ विदेशी मीडिया तक बात सीमित नहीं हो जाती है। बल्कि भारत के कुछ वामपंथी मीडिया संस्थान भी अपना नैरेटिव गढ़ने के लिए दिल्ली में हुए निंदनीय आतंकी धमाके पर प्रोपेगेंडा फैलाना शुरू कर देते हैं। इन मीडिया संस्थानों ने दिल्ली ब्लास्ट के संदिग्ध आरोपितों की छवि सुधारने को लेकर खबरें छापी। लोगों को इस भ्रम में डाला गया कि डॉ. मुजम्मिल और डॉ. उमर नबी जैसे आतंकी है तो आम इंसान ही लेकिन पता नहीं कैसे उन्होंने दिल्ली में ब्लास्ट कर दिया।

आतंकियों की छवि बदलने के लिए छापी गई खबरों का उद्देश्य साफतौर पर पारदर्शी था। वामपंथी मीडिया केवल यह साबित करने में लगी हुई थी कि इस्लामी कट्टरपंथी जैसा कुछ नहीं होता है और मुस्लिम को आतंकी बताना गलत है। इन मीडिया संस्थानों ने यहाँ जाँच एजेंसियों के उन पुख्ता सबूतों को नजरअंदाज किया, जिसमें साफ कहा गया है कि दिल्ली ब्लास्ट एक आतंकी महला था और इतना ही नहीं पकड़े गए आतंकियों ने भी कबूला कि वे इससे भी बड़ी साजिश रच रहे थे।

अब इतना तो साफ हो गया है कि चाहे भारत पर आतंकी हमला हो या युद्ध की स्थिति क्यों न आ जाए। देश का वामपंथी मीडिया अपना मुस्लिम पीड़ित वाला नैरेटिव गढ़ने के लिए आतंकियों को भी सफेद चोला पहनाने में नहीं कतराएगा। वहीं विदेशी मीडिया भी लगातार तथ्यों को जाँचे बिना भारत पर हमलावर रहेगा और इस्लामी कट्टरपंथी की विचारधारा को आगे बढ़ाता रहेगा।