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आरफा जी, बेवकूफ तो आपने उन सेकुलर हिंदुओं को बनाया है जिन्होंने आपको ‘पत्रकार’ समझा

               आरफा खानम की इस्लामी पत्रकारिता (फोटो साभार: आरम खानुम शेरवानी का यूट्यूब चैनल)
कुंठा और पूर्वाग्रह ऐसी चीजें हैं जो इंसान के दिमाग को खोखला कर देती हैं। जब यह बीमारी किसी के जेहन में घर कर जाए, तो उसे हर सकारात्मक चीज में भी सिर्फ नकारात्मकता ही नजर आती है। इस्लामी पत्रकारिता के लिए कुख्यात आरफा खानम शेरवानी इसी बीमारी से पीड़ित हैं।

आज जब पूरी दुनिया देख रही है कि वैश्विक महाशक्तियों के बीच भारत और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कद और लोकप्रियता किस स्तर पर बढ़ी है- उस समय आरफा खानम शेरवानी खोज-खोजकर सिर्फ अपने देश के प्रधानमंत्री की बुराई करने में जुटी हैं।

उनकी कुंठा देख साफ पता चलता है कि चाहे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सरेआम मीडिया के सामने मोदी की सराहना करें, फ्रांस के राष्ट्रपति खुद वीडियो संदेशों के जरिए अपना प्रेम जाहिर करें, या फिर इजरायल के प्रधानमंत्री गर्मजोशी से गले मिलकर भारत के साथ दोस्ती की गहराई को दिखाएँ, लेकिन आरफा को इन दृश्यों से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। वो अपने स्तर पर प्रधानमंत्री की छवि धूमिल करने के प्रयास जी-जान से करेंगी।

इस बार भी आरफा ने यही किया है। जी-7 समिट के दौरान सामने आई तस्वीरों को देख पूरा देश प्रधानमंत्री की तारीफ में जुटा था, लेकिन आरफा खानम ने एक पर्ची को देखकर पूरी वीडियो बना दी और ये समझाया कि अब तक कहा जाता था कि नरेंद्र मोदी बहुत अच्छे वक्ता हैं, मगर अब मान लिया जाना चाहिए कि वो पर्ची वाले PM हैं, उन्होंने देश के लोगों को बेवकूफ बनाया है।

अपने इंट्रो में आरफा ने कहा, “15 साल पहले जिस व्यक्ति ने भारत के लोगों को ये कहकर बेवकूफ बनाया कि वो देश के मान-सम्मान-सरहदों की रक्षा करेगा। भारत की जनता ने जिसे तीन बार प्रधानमंत्री बनाया… अब वो सबूत मिल रहे हैं जिसके आधार पर कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री मोदी भारत के इतिहास के सबसे कमजोर प्रधानमंत्री हैं।”

अपनी वीडियो में वो जर्नलिज्म के छात्रों को पीएम मोदी और ट्रंप की मुलाकात पर रिसर्च करने को कहती हैं कि वो पीएम मोदी के बैठने से लेकर हँसने तक को नोट करने को कहती हैं। इतना ही नहीं आरफा ये भी समझाने का प्रयास करती हैं कि प्रधानमंत्री मोदी ने देश को विदेशी नेता के आगे झुका दिया है।

आरफा की समस्या ये है कि आखिर राष्ट्रपति ट्रंप ने प्रधानमंत्री की तारीफ क्यों की, क्यों उन्हें सुंदर, अच्छा डील करने वाला बताया और क्यों ये बोला कि जब तक पीएम मोदी प्रधानमंत्री हैं अमेरिका हमेशा भारत का साथ देगा। ऑपरेशन सिंदूर के समय पर पाकिस्तान के साथ बैठकर सब सुलह करने की पैरवी करने वाली आरफा खानम यहाँ अपनी दोगलई दिखाते हुए ये भी कहती हैं कि क्या हमारे ऐसे दिन आ गए हैं कि दूसरे देश हमारे मामलों में हस्तक्षेप करेंगे!

आगे वीडियो में आरफा खानम को समस्या इस बात से होती है कि प्रधानमंत्री के हाथ में पर्ची कैसे दिख गई। वो इस चीज को अपनी वीडियो में ऐसे हाईलाइट कर रही हैं जैसे दुनिया के पत्रकार की नजर नहीं पड़ी थी और उन्होंने ही प्रधानमंत्री को एक्सपोज किया हो।

अब जरा खुद सोचिए क्या प्रधानमंत्री मोदी को ट्रंप के सामने बैठते हुए ये नहीं पता था कि कैमरे में वो दिख रहे हैं और उनके हाथ में रखा कागज भी… उन्हें भी मालूम है कि उनकी हरकतों पर विदेशी कैमरों से ज्यादा देश में बैठे गिद्धों की नजर है जो मौका मिलते ही झपट्टा मारेंगे। लेकिन फिर भी अगर उन्होंने अपने हाथ में कोई कागज रखा तो ये ऐसा मुद्दा नहीं है कि उनकी वाकशैली पर सवाल खड़े किए जाएँ। ये सिर्फ कुतर्क है।

अब इस कुतर्क की हकीकत को समझिए कि दुनिया का बड़े से बड़ा नेता, चाहे वह अमेरिकी राष्ट्रपति हो या कोई महान विचारक, जब किसी औपचारिक मंच पर देश या विदेश नीति, आँकड़ों और गंभीर विषयों पर बात करता है, तो वह पॉइंटर्स को अपने साथ रखता है।

यह एक जिम्मेदार नेतृत्व की पहचान है ताकि देश को लेकर कोई भी बिंदु गलती से भी गलत न पेश हो। इसे देश को मूर्ख बनाना कहना नहीं, बल्कि जिम्मेदारी समझना भी कहा जाता है। आरफा भी जब टीवी के सामने कैमरे के लिए कभी बोलती होंगी तो टेलीप्राम्पटर उनके सामने रहता होगा ताकि खबर का कोई पहलू न छूटे… है न?

जब बड़े-बड़े पत्रकार किसी मुद्दे पर अपने पाठकों को बिना टेलीप्रॉम्पटर पर देखे खबर पढ़कर नहीं सुना सकते, तो प्रधानमंत्री के हाथ में दिखी एक पर्ची से उनके वाककौशल पर सवाल नहीं उठाना चाहिए उठाइए… क्योंकि इससे मजाक उन्हीं पत्रकारों का बनेगा।

क्या है आरफा खानम की प्रासंगिकता?

 हास्यास्पद बात ये है कि प्रधानमंत्री की विश्वसनीयता पर सवाल करने का प्रयास आरफा जैसे वो लोग कर रहे हैं जिनकी खुद की प्रासंगिकता सिर्फ इस्लामी रिपोर्टिंग तक सीमित रह गई है। आज सरकार विवरण दे सकती है कि प्रधानमंत्री ने देश की जनता के लिए क्या किया। उनके पास अपने कामों को सिद्ध करने के लिए जमीन पर दिख रहा विकास और डेटा होगा। मगर, आरफा खानम के पास खुद को ‘निष्पक्ष’ साबित करने के लिए न लेख होगा, न निजी विचार होंगे, न सोशल मीडिया पोस्ट होगा और न ही कोई वीडियो होगी।

वो भले चिल्ला-चिल्लाकर खुद को न्यूट्रल कहें, हाशिए समाज पर बैठे लोगों की आवाज बनने का दावा करें किंतु उनके किए काम और उनकी टाइमलाइन साफ बताती है कि उनकी चिंताओं में देश के हिंदू के मुद्दे हैं ही नहीं। उनकी स्थिति यहाँ पहुँच चुकी है कि अगर आज वह अपने में परिवर्तन करके हिंदुओं की बात करना और मोदी सरकार के कार्यों की सराहना करना शुरू भी कर दें तो उनके अपने दर्शक ही उनको स्क्रीन से दफा कर देंगे।

असल में बेवकूफ बनाने की की जाए तो असली बेवकूफ तो आपने सेकुलर हिंदुओं का बनाया है, जिन्होंने विश्वास किया कि आप निष्पक्ष पत्रकार के तौर पर उन्हें सूचनाएँ देंगी, हिंदुओं के पीड़ित होने पर उनके मुद्दे को भी प्राथमकिता देंगी, लेकिन आपने मंच पाकर कभी अपनी कट्टरपंथी खाल को नहीं बदला। देश के पक्ष में उस समय तक बोला आपको लगा कि आपका फायदा है, मोदी सरकार आते ही आपके सुर बदले और आपकी इस्लामी खाल खाल से आपके सेकुलर हिंदू फॉलोवर्स भी परिचित हुए कि आप सिर्फ उन्हें ठगने के लिए बैठी हैं।

हम केवल बीते दिनों की ही बात करें तो देश-दुनिया में बहुत कुछ हुआ है, लेकिन आपने सूचनाओं को किस तरह प्रसारित किया इसका उदाहरण आपकी वीडियोज के थंबनेल देखकर ही पता चलता है। आइए आरफा खानम के कुछ थंबनेल में लिखे टेक्स्ट पर नजर डालें…

  • ट्रंप के सामने मोदी की बेबसी, दुनिया चौंकी
  • ईरान वसूलेगा अमेरिका से 400 बिलियन? PM Modi को Iran से क्या सीखना चाहिए?
  • आयुष की तरह जब आदित्य ने अपनाया इस्लाम, हिंदुत्ववादियों ने जीना कैसे हराम कर दिया?
  • सकते में Israel, Iran सबसे बड़ा Winner, Pakistan को ज़बरदस्त Diplomatic Success
  • PM Modi के गले मिलने से विदेश नीति नहीं चलती, क्या यही है सबूत?
  • अन्ना आंदोलन का समर्थन बड़ी भूल थी? मोदी सरकार में देश बदतर?
  • “तानाशाह को खटकते हैं मेरे जैसे पत्रकार” पंजाब की मिट्टी से Arfa Khanum Sherwani
  • Deal क़रीब, Shehbaz Sharif ने चौंकाया, गोदी मीडिया की Iran पर डबल बेशर्मी
                                फोटो साभार: आरफा खानम शेरवानी का यूट्यूब
आप इन थंबनेल और शीर्षक को देखिए। क्या आपको कहीं से भी लगता है कि एक पत्रकार द्वारा दी गई ये रिपोर्ट हो सकती हैं। शीर्षक ही अपने आप में ये बताने के लिए काफी हैं कि आरफा को पीएम मोदी बेबस दिखें तो उनके लिए अच्छा कंटेंट हैं, लेकिन अगर वो गले मिलें तो ये बताया जाएगा कि गले मिलने से विदेश नीति नहीं चलती।
इसके अलावा ईरान से जुड़ी अगर कोई खबर आए तो उसपर आरफा का कैसा रुख होगा और पाकिस्तान की छवि का निर्माण करना हो तो कैसे हेडलाइन में उसकी दलाली को डिप्लोमैटिक सक्सेस बताएँगे।
वहीं देश भर के हिंदुओं को आहत करने वाला आयुष मलिक का मुद्दा अगर चर्चा में आ जाए तो ये देख सकते हैं कि उनकी रिपोर्टिंग उस पर कैसे होगी। वो ऐसी घटना में इस्लामी कट्टरपंथ को उजागर करने की बजाय हिंदूवादियों को बर्बर दिखाने का प्रयास करेंगी।
                                                   आरफा खानम के सोशल मीडिया पोस्ट
इसी प्रकार से उनका सोशल मीडिया हैंडल पर पोस्ट भी हैं। मोदी सरकार को देश से उखाड़ने का सपना देखने वाली आरफा एक तरफ राहुल गाँधी की कोटा स्पीच को जरूरी बताती हैं और दूसरी ओर ट्रंप के साथ बैठे प्रधानमंत्री का मखौल उड़ाने से पीछे नहीं हटतीं। उन्हें ईरान की जीत का जश्न इसलिए मनाना है क्योंकि वहाँ एक मजहब के लोगों की बहुलता है, लेकिन भारत के आयुष मलिक को इसलिए दोषी दिखाना है क्योंकि उसके केस पर देश के हिंदुओं में नाराजगी है।
क्या आपको कहीं कोई पोस्ट या वीडियो थंबनेल देखकर ये लगा कि आरफा ने कभी हिंदुओं का मुद्दा उठाया है, लव जिहाद के लिए मारी गई किसी हिंदू लड़की के लिए अपना शोक व्यक्त किया है? वैश्विक संकट के बीच देश की प्रशंसा की है? नहीं, क्योंकि वास्तविकता यही है कि खुद को निष्पक्ष पत्रकार बताने वाली, सत्ता का कॉलर पकड़कर सवाल पूछने का सपना देखने वाली आरफा के लिए हिंदुओं के मुद्दे जरूरी हैं ही नहीं। उन्होंने अपने पत्रकार होने का अस्तित्व सिर्फ इस्लामी कट्टरपंथियों के मुद्दे उठाकर ही बचा रखा है। मोदी सरकार के रहने से उन्हें यही डर कि एक दिन ये अस्तित्व मिट जाएगा। उन्हें लोग पत्रकार की जगह इस्लामी प्रवक्ता कहने लगेंगे।(साभार) 

आतंकियों की छवि सुधारने में लगी वामपंथी मीडिया, Al Jazeera-Guardian-CNN ने भी साधी इस्लामी टेरर पर चुप्पी: ‘भगवा’ को बदनाम करने वालों ने क्यों बदला दिल्ली ब्लास्ट पर अपना चश्मा

                       दिल्ली ब्लास्ट पर विदेशी मीडिया और भारतीय मीडिया ने अपना-अपना नैरेटिव गढ़ा
दिल्ली के लाल किले के पास हुए आतंकी कार ब्लास्ट ने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया। वहीं दूसरी ओर इस निंदनीय आतंकी घटना पर वामपंथी मीडिया अपना नैरेटिव चला रही है। टाइम्स ऑफ इंडिया, द वायर जैसे मीडिया पोर्टल दिल्ली बम धमाके में संदिग्ध मुस्लिमों के प्रति सहानुभूति दिखाकर उनकी छवि सुधारने में लगी हुई है।

उधर, CNN, अल जजीरा(Al Jazeera), द गार्जियन( The Guardian), डॉन (Dawn) जैसे विदेशी मीडिया संस्थानों ने दिल्ली में हुए कार ब्लास्ट को ‘घातक’ नाम देने में बिल्कुल नहीं हिचकिचाए। लेकिन यही विदेशी मीडिया संस्थानों ने धड़ल्ले से रिपोर्ट्स छापी कि कैसे भारत की सरकार दिल्ली ब्लास्ट के पीछे ‘साजिश’ तलाश रही है। इन रिपोर्ट्स में तीन एजेंडे साफ नजर आए-

  1. भारत सरकार जबरन मुस्लिमों को दिल्ली ब्लास्ट का आरोपित साबित करने में लगी है।
  2. दिल्ली में हुए कार ब्लास्ट जैसे ‘घातक’ हमले से पूरा भारत ‘डर’ गया है, यहाँ मोदी सरकार की नाकामी को दर्शाया गया।
  3. सवाल उठाए गए कि क्या भारत अप्रैल में हुए पहलगाम हमले के बाद तय की गई दुश्मन को सीधा जवाब देने वाली नीति पर कायम रहेगा?
इन सवाल और आरोपों के माध्यम से विदेशी मीडिया ने भारत सरकार को जमकर घेरा। यह विदेशी मीडिया का आम तरीका है भारत में मुस्लिम-पीड़ित को साबित करने का और वही घिसा-पीटा मोदी सरकार को ‘भगवा राजनीतिवाद’ दिखाने को और यह दर्शाने का कि मोदी सरकार ने जिन्हें बम धमाके का संदिग्ध बनाया है, इसका कारण केवल उनकी मुस्लिम पहचान है।

वामपंथी मीडिया का आतंकियों की छवि सुधारने का प्रोपेगेंडा

देश की वामपंथी मीडिया ने दिल्ली में आतंकी ब्लास्ट के संदिग्ध डॉक्टर मोहम्मद उमर नबी की छवि को सुधारने के मिशन पर उतर गई। जैसे उमर नबी एक सीधा व्यक्ति है और उसने अनजाने में दिल्ली में इतना बड़ा ब्लास्ट कर दिया हो।
द वायर ने अपने लेख में पुलवामा में रहने वाले उमर नबी के परिवार की पीड़ा प्रस्तुत की। यह लेख इस तरह लिखा गया है कि पढ़ने पर यह एहसास होता है मानो लेखक आतंक के आरोपों में शामिल लोगों को ‘पीड़ित’ के रूप में प्रस्तुत करने की कोशिश कर रहा हो।
                                                              The Wire का लेख

उमर नबी के परिवार में उसके अब्बू के कथनों को प्रमुखता देकर यह दिखाया गया है कि वे अन्याय और दुख झेल रहे हैं, जबकि यह तथ्य नजरअंदाज कर दिया गया है कि इन्हीं का बेटा दिल्ली धमाके का संदिग्ध है।

टाइम्स ऑफ इंडिया के इस रिपोर्ट की लेखन शैली का अंदाज साफतौर पर दिखाता है कि दिल्ली धमाके का संदिग्ध डॉक्टर मुजम्मिल अहमद ‘पीड़ित’ है। रिपोर्ट में डॉ. मुजम्मिल की कॉलेज सीनियर डॉ. मोनिका लांघेह की प्रतिक्रिया दिखाई गई, वह मुजम्मिल के बारे में जानकर स्तब्ध हुईं हैं और कहती हैं, “एक श्रेष्ठ पद के व्यक्ति को गिरते देखा।” यह रिपोर्ट एक तरह से पाठक में मुजम्मिल के प्रति सहानुभूति जगाती है।

                                                        टाइम्स ऑफ इंडिया का लेख

उधर, भारत की मीडिया में दिल्ली ब्लास्ट में शामिल आतंकी उमर नबी की भाभी और आतंकी मुजम्मिल की अम्मी की ‘विक्टिम कार्ड’ वीडियो भी खूब प्रसारित की।

                                                               हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट

जहाँ उमर नबी की भाभी मुजमिल ने उमर नबी के बचपन और पढाई पर बात करते हुए उसे एक बेहतर बेटे और इंसान के रूप में पेश किया। यह माहौल बनाती है कि लोग सोच सकें- “ऐसा शांत-स्वभाव का व्यक्ति कैसे इतने बड़े आतंक जगत में शामिल हो गया?”

वहीं फरीदाबाद में 360 किलो विस्फोटक और हथियार के साथ पकड़े गए डॉ. मुजम्मिल, जो दिल्ली ब्लास्त का संदिग्ध भी है, उसकी अम्मी ने बेटे को बेगुनाह होने की बाते कहीं और आतंक के आरोपों को पूरी तरह नकारा। इस बयान के हवाले से Mint ने अपनी रिपोर्ट में आंतकी के परिवार को ‘बेबस’ और ‘अन्याय’ झेलने रूप में दर्शाया।

                                                               LiveMint की रिपोर्ट

आतंकी की अम्मी के दुख और भरोसे को, “मेरा बेटा ऐसा नहीं कर सकता, हमें तो किसी ने बताया कि उसे पकड़ लिया गया” जैसे बातें लिखकर पाठक के सामने आतंकी की छवि को साफ सुथरी प्रदर्शित करने की कोशिश की गई।

दिल्ली ब्लास्ट पर विदेशी मीडिया का प्रोपेगेंडा

दिल्ली ब्लास्ट पर विदेशी मीडिया ने भी अपने नैरेटिव को आगे बढ़ाया। तमाम तरीके के प्रोपेगेंडा चलाकर ब्लास्ट के दिल्ली धमाके को भारत की नाकामी दर्शाया गया। लेकिन मुस्लिम पहचान वाले संदिग्ध आरोपितों की बात तक नहीं की गई। यहाँ विदेशी मीडिया का इस्लामी कट्टरपंथी सोच सामने आती है। Dawn से लेकर अल जजीरा और द गार्जियन ने धड़ल्ले से दिल्ली ब्लास्ट को कवर करते हुए ऐसी रिपोर्ट्स छापी हैं।

द गार्जियन की इस रिपोर्ट में दिल्ली ब्लास्ट को एक बेहद घातक और डरावना हमला बताया गया है, जिससे पूरे भारत में दहशत फैल गई। लेख की शुरुआत ही इस तरह की भाषा से होती है कि यह घटना भारत की राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करती है।

                                                              द गार्जियन की रिपोर्ट

अल जजीरा की इस रिपोर्ट में सवाल उठाए गए कि कैसे भारत की मोदी सरकार दिल्ली ब्लास्ट पर इतने आनन-फानन में आरोप लगाने में जुटी हुई है। रिपोर्ट में पीएम मोदी का पहलगाम हमले के बाद दिए गए बयान- आतंकी हमले को ‘युद्ध की कार्रवाई’ माना जाएगा का हवाला देते हुए सवाल किया कि भारत ने पाकिस्तान के साथ संघर्ष शुरू किए बिना कथित अपराधियों को दोषी ठहरा दिया है।

                                                                  अल जजीरा की रिपोर्ट

इस रिपोर्ट में दिल्ली ब्लास्ट को लेकर डर और असुरक्षा का माहौल उभारने की कोशिश की गई है। लेख में कहा गया, “दिल्ली धमाका ने पूरे देश को सतर्क कर दिया है।” यानी इस विस्पोट से पूरा देश सतर्क और डर गया है। इस तरह का वाक्य भारत को एक डर से घिरे देश के रूप में दिखाने की कोशिश है और भारत की सुरक्षा व्यवस्था को नाकाम बताने जैसा दावा है।

                                                                 अल जजीरा की रिपोर्ट

अमेरिकन मीडिया CNN ने अपनी इस रिपोर्ट में दिल्ली में आतंकी ब्लास्ट और अगले ही दिन पाकिस्तान के इस्लामाबाद में हुए ब्लास्ट को समान बताने की कोशिश की गई। जबकि असलियत यह है कि दिल्ली ब्लास्ट में गिरफ्तार संदिग्धों के सीधे संबंध पाकिस्तान के आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद से पाए गए हैं। इसके बावजूद भारत ने अब तक पाकिस्तान को बिना ठोस सबूत के दोषी नहीं ठहराया है।

                                                                CNN की रिपोर्ट

उधर, आतंक को पनाह देने वाले पाकिस्तान के इस्लामाबाद में जो ब्लास्ट हुआ वह एक सुसाइड बॉम्बिंग है। जिसके तार अब तक भारत से दूर-दूर तक जुड़ने के कोई सबूत नहीं है। तब भी पाकिस्तान ने बिना तथ्यों के सीधा भारत पर हमले के आरोप लगा डाले।

दिल्ली ब्लास्ट और फरीदाबाद आतंकी मॉड्यूल

फिर बात करें दिल्ली ब्लास्ट के तारों की और फरीदाबाद में सामने आए आतंकी मॉड्यूल की तो इस ब्लास्ट में इस्तेमाल हुई कार, विस्फोट और संदिग्ध गतिविधियों से जुड़ी जाँच में यह साफ हुआ है कि यह एक बड़ा आतंकी नेटवर्क था। जाँच एजेंसियों को फरीदाबाद, सहारनपुर, लखनऊ समेत कुछ जिलों से 2900 किलो विस्फोटक सामग्री बरामद हुई, जो सीधे दिल्ली ब्लास्ट से जुड़ रही है।

इसके अलावा जिस i20 कार से ब्लास्ट हुआ, उसमें बैठा डॉक्टर मोहम्मद उमर नबी के तार भी आतंकी मॉड्यूल से जुड़े। उसके दोस्त सज्जाद अहमद और परिवार वालों से पूछताछ की गई तो सामने आया कि वह संदिग्ध आतंकी गतिविधियों में शामिल था। जाँच एजेंसियों को यह भी शक है कि फरीदाबाद से गिरफ्तार आतंकी मुजम्मिल की गर्लफ्रेंड डॉ. शाहीना का भी दिल्ली ब्लास्ट में बड़ा रोल हो सकता है। डॉ. शाहीना पाकिस्तान के आतंकी संगठन जैश-ए-मोहम्मद (JeM) की महिला ट्रेनर थी, उसके पास से एके-47 और हथियार बरामद हुए।

यहाँ तक कि भारत सरकार ने दिल्ली ब्लास्ट की घटना को आतंकी हमला बताने में कोई संकोच नहीं किया। सरकार ने कहा कि यह हमला निंदनीय था और पीएम मोदी ने भूटान के मंच से चेतावनी दी कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।

दिल्ली ब्लास्ट पर सरकार की कार्रवाई और इस्लामी कट्टरपंथ सोच

दिल्ली ब्लास्ट पर भारत की मोदी सरकार की कार्यवाही जारी है। जाँच एजेंसिया अब तक दोषियों के काफी करीब पहुँच चुकी है। यहाँ तक कि दिल्ली ब्लास्ट के फिदायीन उमर नबी और उसके परिवार पर भी जाँच एजेंसियों ने शिकंजा कसा है। हमले की जाँच में रोजाना नई परते खुल रही हैं। लखनऊ के सहारनपुर से गिरफ्तार डॉ. शाहीन को लेकर भी जाँच एजेंसियाँ बड़ा शक जता रही हैं क्योंकि वह जैश-ए-मोहम्मद की महिला विंग की कमांडर है।

इन सब सबूतों और जाँच से साफ स्पष्ट होता है कि भारत सरकार आतंक के खिलाफ कार्रवाई को लेकर कितनी सक्रिय है। वहीं अब तक कि जाँच से यह भी साफ है कि संदिग्ध आरोपितों की कौम एक ही है। सभी पकड़े गए लोगों की पहचान मुस्लिम ही है। वैसे ये कोई चौंकने वाली बात नहीं है क्योंकि भारत में अब तक जो भी आतंकी हमले या ब्लास्ट हुए हैं उसके पीछे इस्लामी कट्टरपंथी की विचारधारा ही है। फर्क सिर्फ यह है कि इस बार हमला देश के भीतर बैठे इस्लामी कट्टरपंथों के जरिए किया गया है।

विदेशी मीडिया की इस्लामी कट्टरपंथ पर चुप्पी

अब वापस आते हैं विदेशी मीडिया की दिल्ली ब्लास्ट को लेकर छापी गई रिपोर्ट्स पर। यहाँ बड़े-बड़े विदेशी मीडिया संस्थानों ने दिल्ली ब्लास्ट को लेकर बेहतर तरीके से खबरें छापीं और पाठकों को हर मिनट अपडेट किया लेकिन यह सब अपना नैरेटिव ध्यान में रखते हुए किया गया। कहीं दिल्ली ब्लास्ट को ‘घातक’ हमला करार दिया गया तो कहीं भारत की मोदी सरकार पर सुरक्षा व्यवस्था को लेकर सवाल खड़े किए गए। लेकिन संदिग्धा आरोपितों पर कोई खबरें नहीं छापी गईं, क्योंकि उनकी पहचान ‘मुस्लिम’ थी।

ये बिल्कुल वैसा ही है, जैसे विदेशी मीडिया हमेशा से करती आई है। एक बार फिर विदेशी मीडिया की इस्लामी कट्टरपंथी विचारधारा उजागर हुई है। ये मीडिया CAA, NRC और आर्टिकल 370 को मुस्लिमों के खिलाफ कार्यवाही बताने में नहीं हिचकिचाती है। तब भारत में मोदी सरकार की ‘भगवा राजनीति’ पर बड़े-बड़े लेख लिखे जाते हैं। लेकिन अब जब भारत की राजधानी में आतंकी हमला हुआ और आरोपित मुस्लिम हैं तो वे चुप्पी साधे बैठे हैं।

आरोप लगाए गए कि मोदी सरकार पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद अपनी नई नीति को साबित करने के लिए पाकिस्तान पर आरोप लगाने में जल्दबाजी कर रहा है। बता दें जिस नीति की बात हुई वह भारत की आतंकी हमले पर ‘युद्ध की कार्रवाई’ के कड़े संदेश हैं। तो विदेशी मीडिया को जान लेना चाहिए कि भारत अब चुप नहीं बैठता है, यह बयान अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी दिया जा चुका है। आतंकवाद के खिलाफ लड़ने की बात आएगी तो भारत सबसे आगे रहेगा। इसका उदाहरण भारत की मोदी सरकार URI स्ट्राइक, ऑपरेशन सिंदूर और अन्य ऑपरेशन चलाकर दे चुकी है और आगे भी देती रहेगी।

भारत की वामपंथी मीडिया का दोहरा रवैया

यहाँ सिर्फ विदेशी मीडिया तक बात सीमित नहीं हो जाती है। बल्कि भारत के कुछ वामपंथी मीडिया संस्थान भी अपना नैरेटिव गढ़ने के लिए दिल्ली में हुए निंदनीय आतंकी धमाके पर प्रोपेगेंडा फैलाना शुरू कर देते हैं। इन मीडिया संस्थानों ने दिल्ली ब्लास्ट के संदिग्ध आरोपितों की छवि सुधारने को लेकर खबरें छापी। लोगों को इस भ्रम में डाला गया कि डॉ. मुजम्मिल और डॉ. उमर नबी जैसे आतंकी है तो आम इंसान ही लेकिन पता नहीं कैसे उन्होंने दिल्ली में ब्लास्ट कर दिया।

आतंकियों की छवि बदलने के लिए छापी गई खबरों का उद्देश्य साफतौर पर पारदर्शी था। वामपंथी मीडिया केवल यह साबित करने में लगी हुई थी कि इस्लामी कट्टरपंथी जैसा कुछ नहीं होता है और मुस्लिम को आतंकी बताना गलत है। इन मीडिया संस्थानों ने यहाँ जाँच एजेंसियों के उन पुख्ता सबूतों को नजरअंदाज किया, जिसमें साफ कहा गया है कि दिल्ली ब्लास्ट एक आतंकी महला था और इतना ही नहीं पकड़े गए आतंकियों ने भी कबूला कि वे इससे भी बड़ी साजिश रच रहे थे।

अब इतना तो साफ हो गया है कि चाहे भारत पर आतंकी हमला हो या युद्ध की स्थिति क्यों न आ जाए। देश का वामपंथी मीडिया अपना मुस्लिम पीड़ित वाला नैरेटिव गढ़ने के लिए आतंकियों को भी सफेद चोला पहनाने में नहीं कतराएगा। वहीं विदेशी मीडिया भी लगातार तथ्यों को जाँचे बिना भारत पर हमलावर रहेगा और इस्लामी कट्टरपंथी की विचारधारा को आगे बढ़ाता रहेगा।

Daman, Diu, Dadra & Nagar Haveli में मिली बीजेपी को मिली प्रचंड जीत से मीडिया में मातम; क्या छपरा में RJD का समर्थन करने से खेसारी लाल यादव की मार्केट हो गई खराब?

                                                               खेसारी लाल यादव

Daman, Diu, Dadra & Nagar Haveli में हुए चुनावों में बीजेपी को मिली प्रचंड जीत का बिहार पर असर डालेगा। हैरानी की बात है कि सारे मीडिया में बीजेपी की इस भयंकर जीत से मातम छा गया है। यहां 75% सीटें बीजेपी ने निर्विरोध जीती हैं। 

बिहार विधानसभा चुनाव जातिगत और बाहुबलियों की सियासत पर आधारित क्यों न हो, लेकिन कुछ तीसमार खां बने फिर रहे नेताओं के सियासत पर भी बहुत असर डालने वाला है। यह भी उम्मीद की जा रही है कि INDI गठबंधन में शामिल पार्टियां कांग्रेस को ही बाहर कर सकती है। अगर चुनाव में INDI गठबंधन को हार का सामना करना पड़ता है तो उसकी जिम्मेदार कांग्रेस होगी। जिस तरह भाई(राहुल) और बहन(प्रियंका) भड़काऊ बयानबाज़ी कर रहे हैं उसका जनता में गलत असर पड़ रहा है। जबकि तेजस्वी यादव अपने पिता लालू यादव के जंगल राज की छवि से बचते हुए मोदी पर हमला करते हुए  मतदाताओं से RJD के लिए वोट मांग रहे हैं। जबकि गाँधी परिवार भड़काऊ बयानबाज़ी कर गलत सन्देश दे रहा है।          

बिहार चुनाव की सरगर्मी में छपरा पहुँची ऑपइंडिया टीम ने पाया कि भोजपुरी सुपरस्टार खेसारी लाल यादव की चमक फीकी पड़ गई है। RJD ने उन्हें टिकट दिया, लेकिन लोग कहते हैं, “ये तो पैराशूट से उतरे हैं, छपरा को जानते तक नहीं।”

एक दुकानदार बोले, “जंगलराज को अच्छा बता रहे हैं, लालू के समय की लूट-मार भूल गए क्या?” खेसारी के पुराने फैन भी नाराज हैं। एक युवक ने कहा, “फिल्मों में हीरो थे, अब वोट माँगने आए तो जंगलराज का बचाव कर रहे। सेलिब्रिटी स्टेटस सिर्फ रीलों तक था, रियल में फेल रहेगा सब।”

इस दौरान महिलाओं ने कहा कि खेसारी की बातों से आम जनता की बातें गायब है, वो सिर्फ स्टारडम बेच रहे। अनुराग मिश्रा की ग्राउंड रिपोर्ट में साफ है – छपरा में खेसारी की मार्केट डाउन होने से RJD को नुकसान पहुँच रहा है।


BBC की Gen-Z को जगाने की चाह या दंगे भड़काने की बेताबी? भारत भी नेपाल की तरह जले, ऐसा क्यों चाहता है पश्चिमी मीडिया?

     बीबीसी भारत में भी नेपाल की तरह फैलाना चाहता है जेन-जी में हिंसा (फोटो साभार: India Today/AI Dall-E)
2014 में जब से भारत में मोदी सरकार आयी है भारत से लेकर विदेशों में बैठे भारत विरोधियों की रोटी-पानी हराम हो गयी है। मोदी सरकार के आने से मुस्लिम कट्टरपंथी और क्रिस्चियन मिशनरीज सत्ताधारियों की छत्रसाया में अपना खेल खेल रहे थे। उनके खिलाफ आवाज़ उठाने वालों को साम्प्रदायिक, फिरकापरस्त, शांति के दुश्मन और अंग्रेजों के दलाल आदि पता नहीं कितने नामों से बदनाम किया जाता था। लेकिन अब जनता खासतौर से हिन्दुओं में चेतना का संचार शुरू होने से भारत विरोधी गैंग बहुत बेचैन है। मुस्लिम कट्टरपंथी हिन्दुओं को डराने "सिर तन से जुदा" गैंग को सड़क पर निकाल देते हैं लेकिन भूल रहे हैं कि अब हिन्दुओं में ईंट का जवाब पत्थर देने के लिए तैयार हो रहा है। और जिस दिन हिन्दू सड़क पर आ गया कोई कट्टरपंथी तो क्या "सिर तन से जुदा" गैंग को पूरे भारत में कहीं छिपने की जगह नहीं मिलेगी। आखिर बर्दास्त की भी एक सीमा होती है। हिन्दू अदालतों के चक्कर में फंसने की बजाए कट्टरपंथियों की तरह सड़क पर ही ऐसा फैसला करेगा अदालतें तक देखती रहेंगी। क्योकि इसकी जिम्मेदार भी हमारी अदालतें होंगी। कन्हैया के कातिलों को क्या अब तक फांसी हुई? क्यों नहीं हुई?


 

खैर, जिस BBC इंडिया के समाचारों को मोदी सरकार के आने से पहले बड़ी प्रमाणिकता से सुना ही नहीं जाता था बल्कि विश्वास भी किया जाता था। अब उसी BBC इंडिया को बेनकाब कर रहा है OpIndia का प्रस्तुत लेख :-             

BBC इंडिया हर कुछ महीनों में कोई ऐसा लेख छापता है, जो पत्रकारिता और मनोवैज्ञानिक जंग के बीच की लकीर को धुंधला कर देता है। हाल ही में उसने एक लेख छापा, जिसका शीर्षक था “Gen Z उठ रहा है? भारत के नौजवान सड़कों पर क्यों नहीं उतर रहे?” ये लेख उसी पुरानी चाल का नया नमूना है, जिसमें छिपे-छिपे भारत को अस्थिर करने की कोशिश की जाती है।

पहली नजर में ये लेख एक साधारण सवाल उठाता है: भारत का Gen Z, जो इतना बड़ा, बेचैन और इंटरनेट से जुड़ा है, वो नेपाल या बांग्लादेश के नौजवानों की तरह क्रांति क्यों नहीं कर रहा? लेकिन जरा गौर से देखो, तो ये लेख विश्लेषण कम और उकसावा ज्यादा लगता है। ये भारतीय नौजवानों को खुलेआम बगावत करने और पड़ोस के देशों में हो रही अराजकता की नकल करने का न्योता देता है।

BBC की निष्पक्षता का दावा और दंगों की चाहत

खुद को निष्पक्ष बताने वाले BBC का हिंसक विद्रोहों को महिमामंडन करना हैरान करता है। लेख का लहजा ऐसा है, जैसे उसे दुख हो कि भारतीय छात्रों ने अभी तक आगजनी, तोड़फोड़ और सरकार बदलने की कोशिश नहीं की। ये सिर्फ औपनिवेशिक सोच का नतीजा नहीं, जो अपने पुराने गुलाम देश को बिखरते देखना चाहता है ताकि दूर बैठकर नैतिक उपदेश दे सके। ये कुछ ज्यादा सोचा-समझा, वैचारिक और गहरे राजनीतिक है।

उकसावे की कला में माहिर है बीबीसी

BBC का ये लेख प्रोपेगेंडा का उस्ताद है। ये शुरू होता है एशिया के ‘बेचैन’ Gen Z की तारीफ से, जो ’48 घंटों में सरकारें गिरा देते हैं’, जैसे कि संस्थानों का ढहना प्रगति का मेडल हो। फिर आता है भारत से तुलना – भारत के नौजवान ‘बिखरे हुए’, ‘डरे हुए’ और ‘अलग-थलग’ हैं। मतलब साफ है: वे अपने जेनरेशन के फर्ज को निभाने में नाकाम हैं, क्योंकि वे दंगे नहीं कर रहे।

                                                      बीबीसी के लेख का स्क्रीनशॉट

लहजा मनोवैज्ञानिक है, विश्लेषणात्मक नहीं। ‘राष्ट्र-विरोधी करार दिए जाने का डर’ और ‘सरकार का विरोध को बदनाम करना’ जैसे शब्द गहरे सोचने के लिए नहीं, बल्कि गिल्ट फील कराने के लिए डाले गए हैं। ये पत्रकारिता नहीं, जो भारतीय नौजवानों के शांत रहने की वजह समझना चाहे। ये विश्लेषण के भेष में उकसावा है, जो शांति को कायरता और संयम को दमन बताता है।

नेपाल का उदाहरण बना BBC का नया जुनून

लेख को प्रेरणा नेपाल से मिली है, जहाँ सितंबर 2025 में तथाकथित ‘Gen Z क्रांति’ ने केपी ओली की सरकार गिरा दी। BBC इसे फिल्मी अंदाज में बयान करता है, जैसे कोई ऐतिहासिक नौजवानी वीरता का पल हो।
लेकिन इस चमक के पीछे भयानक सच है। नेपाल के विद्रोह में करीब 20 लोग मरे, पूर्व प्रधानमंत्रियों के घर जला दिए गए, मंत्रियों पर हमले हुए और सिंह दरबार जैसे ऐतिहासिक स्थलों में तोड़फोड़ हुई। सेना को कर्फ्यू लगाना पड़ा और देश अब सैन्य शासन की कगार पर है।
लेकिन BBC इस अराजकता को ‘सफलता’ बताता है, एक ऐसा ‘उदाहरण’ जिसे भारत के नौजवानों को नकल करना चाहिए। लेख ये नहीं बताता कि नेपाल के प्रदर्शनकारी खुद हिंसा से अलग हो गए थे, कहते हुए कि उनके आंदोलन को बाहरी तत्वों ने हाईजैक कर लिया। लेकिन BBC ये क्यों बताएगा? क्योंकि उसका मकसद जानकारी देना नहीं, बल्कि ये विचार बोना है कि भारत का ‘बेचैन’ Gen Z नेपाल के दंगाइयों के ‘वीरतापूर्ण’ नक्शेकदम पर चले।

सेलेक्टिव तरीके से पुरानी बातों को नजरअंदाज करता है बीबीसी

BBC भारत के पुराने सड़क आंदोलनों को जैसे अन्ना हजारे आंदोलन से लेकर CAA विरोध तक, बड़े प्यार से याद करता है, जैसे कि वो असहमति का स्वर्ण युग हो। लेकिन इन विरोधों से हुई खून-खराबा, तबाही और सामुदायिक टकराव पर BBC चुप्पी साध लेता है।

CAA विरोध में भीड़ ने सार्वजनिक संपत्ति जलाई, सड़कें रोकीं, और दिल्ली में सांप्रदायिक हिंसा भड़की, जिसमें 50 से ज्यादा लोग मरे। BBC जिन ‘छात्र नेताओं’ को अब रोमांटिक बनाता है, वे गाँधीवादी सत्याग्रही नहीं, बल्कि दंगे भड़काने के आरोपित कट्टरपंथी थे।

ऐसे आंदोलनों को ‘नोबल’ बताकर और आज के समय में ऐसे विद्रोहों की कमी पर अफसोस जताकर, BBC असल में अराजकता की कमी को मिस कर रहा है। उसे वो दौर याद आता है, जब भारत को ‘अस्थिर’ और ‘दमनकारी’ दिखाया जा सकता था- ऐसी हेडलाइंस जो लंदन के न्यूज़रूम में ज्यादा बिकती हैं, बनिस्पत ‘भारत 8% की दर से बढ़ रहा है।’

‘राष्ट्र-विरोधी’ का झाँसा

लेख में ‘राष्ट्र-विरोधी’ शब्द एक चालाक हथियार है। BBC के फ्रेम में, इस डर ने भारतीय नौजवानों को सड़कों पर उतरने से रोक रखा है। ये चतुराई है, जो राष्ट्रवाद को तानाशाही और असहमति को वीरता से जोड़ देती है।

लेकिन सच ये है कि भारतीय नौजवान समझदार हो गए हैं। उन्होंने देखा है कि ‘एक्टिविज्म’ को कैसे स्वार्थी ताकतें हथियार बना लेती हैं। शाहीन बाग की सुनियोजित नाकेबंदी से लेकर विदेशी फंडिंग वाले NGOs, जो छात्र आंदोलनों के भेष में काम करते हैं, Gen Z खामोश नहीं है क्योंकि वो डर गया है। वो खामोश है क्योंकि वो समझदार हो गया है।

उन्हें पता है कि बसें जलाने से नौकरियाँ नहीं मिलतीं, पत्थर फेंकने से भ्रष्टाचार नहीं रुकता, और सरकार गिराने से बेहतर कल की गारंटी नहीं मिलती। भारत का Gen Z स्टार्टअप बना रहा है, कोड लिख रहा है, फिल्में बना रहा है, दुनिया घूम रहा है, न कि बाहरी कठपुतलियों के इशारे पर सियासी ड्रामे में अपनी ताकत बर्बाद कर रहा है।

लोगों का सड़कों पर उतरना बीबीसी को पसंद

जब BBC उमर खालिद की जेल या जामिया टकराव का जिक्र करता है, तो ये कोई शैक्षिक संदर्भ नहीं, बल्कि भावनात्मक ट्रिगर है। वो ‘क्रूर सरकारी दमन’ की याद को फिर से जगाना चाहता है और 2019 को अधूरी कहानी के रूप में पेश करना चाहता है।

लेख का छिपा संदेश साफ है: “तुमने अपने सीनियर्स के साथ क्या हुआ देखा। क्या तुम वापस नहीं लड़ना चाहते?” ये पत्रकारिता नहीं, भावनात्मक छेड़छाड़ है।

BBC यूनिवर्सिटी प्रोटेस्ट कल्चर के ‘खोने’ का मातम मनाता है, लेकिन असल में वो इस बात का दुख मना रहा है कि मोदी सरकार ने कैंपस अनुशासन बहाल कर दिया और शिक्षण संस्थानों को सियासी संगठनों के हवाले होने से रोक दिया।

भारत के कैंपस वैचारिक भटकाव के मैदान से बदलकर इनोवेशन के हब बन गए हैं। ये बदलाव, जाहिर है, BBC को बर्दाश्त नहीं, जो अपने भारतीय नौजवानों को गुस्सैल, बेकार और सिस्टम-विरोधी देखना पसंद करता है।

Gen Z बिखरा हुआ या आजाद? BBC का दोहरा रवैया

लेख में BBC भारत की विविधता को कमजोरी बताता है, कहता है कि नौजवान जाति, भाषा और क्षेत्र में बंटे होने की वजह से एकजुट नहीं हो पाते। लेकिन यही विविधता जब काम आए, तो इसे ‘जीवंत बहुसंस्कृतिवाद’ कहा जाता है।

नेपाल या बांग्लादेश में एकरूपता की वजह से बड़े पैमाने पर मूवमेंट आसान है। लेकिन भारत में विकेंद्रीकरण लोकतंत्र की आत्मा है। BBC इसे ‘बिखराव’ कहता है। भारतीय इसे संघवाद कहते हैं।

BBC का ‘राष्ट्रीय युवा विद्रोह’ की चाहत उसकी औपनिवेशिक सोच को दर्शाती है, जो एकरूपता, एकजुटता और अराजकता को संकट के रूप में दिखाना चाहती है।

भारत की स्थिरता है पश्चिम की समस्या

BBC का असली दुख भारत के नौजवानों से नहीं, भारत की स्थिरता से है। नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका पश्चिमी मीडिया के लिए इसलिए काम के हैं, क्योंकि वे अस्थिर हैं और ‘विदेशी लोकतंत्रों’ के रूप में पढ़े जा सकते हैं। लेकिन 37 करोड़ Gen Z वालों वाला भारत, जो बिना टूटे संवैधानिक व्यवस्था के साथ चल रहा है, उनकी कहानी को बिगाड़ देता है।

2024 समेत हर चुनाव दिखाता है कि भारतीय नौजवान निराश नहीं, बल्कि समझदार हैं। बीजेपी को युवाओं का मजबूत समर्थन मिलता है, न कि डर की वजह से, बल्कि कामकाज, इंफ्रास्ट्रक्चर, कल्याण, राष्ट्रवाद और डिजिटल सशक्तिकरण की वजह से। इसलिए BBC का ये दावा कि नौजवान ‘राजनीति से बचते हैं’ ये खोखला लगता है।

भारतीय नौजवान सड़क के आंदोलनों से डिजिटल और चुनावी एक्टिविज्म की ओर बढ़ गए हैं, जहाँ उनकी आवाज ज्यादा मायने रखती है और उनके विरोध को पेशेवर अराजकतावादी हाईजैक नहीं कर सकते।

मोदी फैक्टर है BBC के असली दुख की वजह

BBC के मातम का असली केंद्र समाजशास्त्र नहीं, बल्कि राजनीति है। BBC, The Guardian और The New York Times जैसे पश्चिमी संस्थान नरेंद्र मोदी को दो चीजों के लिए कभी माफ नहीं कर पाए: पहला, भारत की हिंदू सभ्यता की पहचान को बिना शर्मिंदगी के सामने लाने के लिए… और दूसरा- इसे लोकतांत्रिक तरीके से, वोट के जरिए करने के लिए।

जब मोदी ने अयोध्या में राम मंदिर का उद्घाटन किया, तो ये सिर्फ धार्मिक समारोह नहीं था; ये सभ्यता का सुधार था। इसने दुनिया को बताया कि भारत अब अपनी आस्था के लिए माफी नहीं माँगेगा, न ही धर्मनिरपेक्षता को हिंदू पहचान की अनुपस्थिति के रूप में परिभाषित करेगा। BBC की नजर में ये पाप था।

उनका वैश्विक दृष्टिकोण बाइनरी पर चलता है: बहुसंख्यक यानी दमनकारी, राष्ट्रवाद यानी फासीवाद, स्थिरता यानी तानाशाही। तो जब भारत के नौजवान इन बाइनरी को ठुकराकर प्रगति को चुनते हैं, तो BBC का वैचारिक तंत्र घबरा जाता है।

पश्चिमी मीडिया का बगावतों से मोह

पश्चिमी मीडिया का ग्लोबल साउथ के विद्रोहों को कवर करने का तरीका कुछ परेशान करने वाला है। वे दूर से क्रांतियों की तारीफ करते हैं और जब धूल जम जाती है तो गायब हो जाते हैं।

अरब स्प्रिंग से लेकर श्रीलंका के विरोधों तक, पश्चिमी मीडिया ने ‘युवा-नेतृत्व वाले विद्रोहों’ को शेर की तरह पेश किया और जब ये देश अस्थिरता, महँगाई या गृहयुद्ध में फंस गए, तो वे खुद खिसक गए।

अब वे नया खेल का मैदान ढूँढ रहे हैं और अपनी विशाल युवा आबादी के साथ भारत उनके लिए सबसे बड़ा ईनाम है।

इसलिए BBC का लेख पत्रकारिता कम और भर्ती का पोस्टर ज्यादा लगता है- “अपने पड़ोसियों को देखो। क्या तुम उनके जैसे नहीं बनना चाहते?”

लेकिन भारतीय अब आसानी से बेवकूफ नहीं बनते। उन्होंने देखा है कि ये ‘नेताविहीन’ आंदोलन लोकतंत्र में नहीं, बल्कि अव्यवस्था में खत्म होते हैं।

असली Gen Z क्रांति: खामोश, डिजिटल और निर्णायक

भारत का Gen Z सड़कों पर उतरकर इतिहास रचने की जरूरत नहीं समझता। उनकी क्रांति शांत लेकिन गहरी है- स्टार्टअप्स में, सिविक टेक में, डिजिटल गवर्नेंस में और अपनी पहचान पर नए गर्व में। वे दिल्ली की सड़कों पर नारे लगाने की बजाय अगला आधार कोड कर रहे हैं। वे हाईवे पर टायर जलाने की बजाय टियर-3 शहरों से डॉलर कमा रहे हैं।

ये भारतीय असहमति का नया चेहरा है-रचनात्मक, जो विनाशकारी नहीं है। और यही वो चीज है, जो BBC को परेशान करती है- एक ऐसी पीढ़ी, जिसे कट्टरपंथी बनाया नहीं जा सकता, सिर्फ प्रेरित किया जा सकता है।

BBC क्यों चाहता है कि भारत में खून बहे

जब BBC लिखता है कि भारत का Gen Z ‘सतर्क लेकिन बगावती नहीं’ है, तो ये तारीफ नहीं, बल्कि शिकायत है। वो चाहता है टूटे शीशों, आँसू गैस और तिरंगे से रंगे अशांति के फुटेज, जो भारत को फिर से अस्थिरता का देश दिखा सकें।

क्योंकि BBC के लिए मोदी के नेतृत्व में शांत, आत्मविश्वास से भरा और आत्मनिर्भर भारत सबसे बड़ा दुःस्वप्न है। वो एक हिंदू-बहुसंख्यक लोकतंत्र को समझ नहीं पाता, जो अपनी आस्था के लिए माफी माँगे बिना फलता-फूलता है, सड़कों के वीटो को तोड़ता है और पश्चिमी नैतिक उपदेशों के सामने झुकने से इनकार करता है।

वही BBC जो काठमांडू में आगजनी की तारीफ करता है, उसे दिल्ली में ‘लोकतांत्रिक अभिव्यक्ति’ कहेगा, जब तक कि आग उनके अपने दूतावासों के करीब न पहुँच जाए।

राहुल गाँधी और BBC का कनेक्शन

दिलचस्प बात ये है कि BBC का उकसावा अकेले नहीं गूँजा। नेपाल में केपी ओली की सरकार गिरने के कुछ ही दिनों बाद, राहुल गाँधी ने अचानक भारत के Gen Z के लिए नया प्यार जाहिर किया, जिसे सिर्फ सियासी मौकापरस्ती ही कहा जा सकता है।

X पर गाँधी ने ऐलान किया कि ‘Gen Z संविधान बचाएगा और वोटर फ्रॉड रोकेगा,’ और फिर उनकी पार्टी ने एक अजीब ‘Gen Z गान’ लॉन्च किया– एक रैप सॉन्ग, जो गुस्से और बगावत को रोमांटिक बनाता है और इसे “युवा भारत की आवाज” बताता है।

BBC की शिकायत और कॉन्ग्रेस की इस नई चाल के बीच सटीक तालमेल देखना मुश्किल नहीं। BBC भारतीय नौजवानों को डरे हुए पीड़ितों के रूप में दिखाता है; राहुल गाँधी उन्हें नारों, गानों और बनावटी गुस्से से ‘जगाने’ की कोशिश करते हैं। एक वैचारिक जमीन तैयार करता है, दूसरा सियासी स्क्रिप्ट देता है।

ये तालमेल इत्तेफाक नहीं बल्कि एक इकोसिस्टम का हिस्सा है। दोनों का मकसद एक है: भारत के नौजवानों को सुधार की बजाय विद्रोह करने, बहस की बजाय तोड़ने के लिए उकसाना। BBC कहानी लिखता है; कॉन्ग्रेस उसे बढ़ावा देती है, इस उम्मीद में कि सोशल मीडिया की चिंगारी सड़कों पर आग बन जाए।

भारत की शांति, उसके मौजूदा नेतृत्व में भरोसा

लेकिन अब तक भारतीय नौजवानों ने लोकतंत्र और मौजूदा नेतृत्व में भरोसा दिखाया है। ये सिर्फ भरोसा नहीं, उससे कहीं ज्यादा है।
भारत के लोकतंत्र की खूबी उसकी आवाज में नहीं, बल्कि उसके संयम में है। एक अरब लोगों का एक साथ रहना, बहस करना और अपनी राजधानी को जलाए बिना वोट करना कमजोरी नहीं, सभ्यता है।
BBC को शाहीन बाग जैसा कुछ और चाहिए, लेकिन भारत आगे बढ़ चुका है। मोदी सरकार ने भागीदारी के विचार को सड़क विद्रोहों से डिजिटल सशक्तिकरण और नीतिगत जुड़ाव तक बदल दिया है। और भारत का नौजवान ‘दबाया’ हुआ नहीं है, बल्कि उस देश को बनाने में व्यस्त है, जिस पर BBC को शक करना पसंद है।
तो… बीबीसी जी, ऐसा बिल्कुल नहीं है कि Gen Z अपनी नियति हासिल करने में ‘नाकाम’ हो रहा। बाल्कि वो अपने लक्ष्यों की ओर खामोशी से बढ़ रहा है। यही खामोशी बीबीसी को हजम नहीं हो रही।
यह रिपोर्ट मूल रूप से अंग्रेजी में जिनित जैन ने लिखी है। मूल रिपोर्ट पढ़ने के लिए यहाँ क्लिक करें।(साभार) 

पहलगाम हमले के बाद सरकार सख्त, सैन्य अभियान की लाइव कवरेज पर लगाई रोक: कारगिल युद्ध और मुंबई हमले के दौरान बरखा दत्त की कवरेज का आतंकियों ने उठाया था फायदा

                                                                                   प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: brecorder)
पाकिस्तान से लड़ाई में वर्तमान मोदी सरकार पिछली सरकारों की गलतियों से बचते हुए कदम उठा रही है। मीडिया को लाइव कवरेज पर रोक लगा कर उस मीडिया गैंग को भी बहुत बड़ा झटका दिया है। ये मीडिया गैंग लाइव कवरेज के जरिये गुप्त रुप से पाकिस्तान की मदद करते रहे हैं। सरकार के इस सख्त कदम से शोभा यात्राओं पर पेट्रोल बम और पत्थरबाज़ी करने और उनको समर्थन करने वालों को भी चेतावनी दे दी गयी है। 
पहलगाम में हुए भीषण आतंकी हमले के चार दिन बाद शनिवार (26 अप्रैल 2025) को भारत सरकार के सूचना एवँ प्रसारण मंत्रालय ने एक सख्त चेतावनी जारी की है। मंत्रालय ने सभी मीडिया चैनलों को साफ निर्देश दिए हैं कि वे किसी भी सैन्य अभियान या सुरक्षा बलों की गतिविधियों की लाइव कवरेज न करें। इस चेतावनी का मकसद देश की सुरक्षा को सुनिश्चित करना और शत्रुओं को किसी भी तरह का फायदा न पहुँचने देना है। मंत्रालय ने साफ कहा कि रक्षा और सुरक्षा से जुड़े अभियानों की रिपोर्टिंग में मौजूदा कानूनों और नियमों का सख्ती से पालन करना होगा।

मंत्रालय ने अपने पत्र में कहा कि रियल-टाइम कवरेज, विजुअल्स का प्रसारण या सूत्रों के हवाले से खबरें चलाना पूरी तरह बंद करना होगा। ऐसा करना शत्रुओं की मदद कर सकता है और सैन्य अभियानों को नुकसान पहुँचा सकता है।

कारगिल युद्ध, 26/11 मुंबई हमले और कंधार हाईजैकिंग जैसी घटनाओं के दौरान मीडिया की लाइव कवरेज ने देश को भारी नुकसान पहुँचाया था। इन घटनाओं से सबक लेते हुए सरकार ने यह कदम उठाया है। मंत्रालय ने यह भी साफ किया कि किसी भी आतंक-विरोधी अभियान की लाइव कवरेज नहीं होनी चाहिए। खबरों को सिर्फ सरकारी प्रेस ब्रीफिंग तक सीमित रखने का निर्देश दिया गया है। ऐसा न करने पर सख्त कार्रवाई की चेतावनी भी दी गई है।

मंत्रालय ने कहा कि मीडिया एक जिम्मेदार भूमिका निभाए, क्योंकि यह राष्ट्रीय सुरक्षा का सवाल है। संवेदनशील जानकारियों को सार्वजनिक करना सैनिकों की जान को खतरे में डाल सकता है। मंत्रालय ने केबल टेलीविजन नेटवर्क्स (संशोधन) नियम, 2021 का हवाला देते हुए कहा कि सभी टीवी चैनलों को इन नियमों का पालन करना होगा। इसमें साफ लिखा है कि आतंक-विरोधी अभियानों की लाइव कवरेज नहीं होनी चाहिए और खबरें सिर्फ सरकारी ब्रीफिंग तक सीमित रहें। मंत्रालय ने सभी हितधारकों से सतर्कता और संवेदनशीलता बरतने की अपील की है।

याद ही होगा कि 26/11 मुंबई हमले के लाइव कवरेज ने आतंकियों को मदद पहुंचाई थी। 26 नवंबर 2008 को मुंबई में हुए आतंकी हमले ने पूरे देश को हिलाकर रख दिया था। पाकिस्तानी आतंकी संगठन लश्कर-ए-तैयबा के 10 आतंकियों ने मुंबई को चार दिनों तक बंधक बनाए रखा। इस हमले में 166 लोग मारे गए, जिनमें कई विदेशी नागरिक भी शामिल थे। नौ आतंकी मारे गए, जबकि अजमल कसाब को जिंदा पकड़ा गया। इस हमले की साजिश हाफिज सईद और जकीउर्रहमान लखवी ने रची थी, जो आज भी पाकिस्तान में खुलेआम घूम रहे हैं। उस वक्त की मनमोहन सिंह सरकार ने पाकिस्तान को कई डोजियर सौंपे, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।

इस हमले के दौरान मीडिया की भूमिका पर सवाल उठे थे। खासतौर पर पत्रकार बरखा दत्त की रिपोर्टिंग को लेकर काफी विवाद हुआ। उस समय बरखा एनडीटीवी के लिए काम करती थीं और उनकी लाइव कवरेज पर गंभीर सवाल खड़े हुए। 2012 में न्यूजलॉन्ड्री को दिए एक इंटरव्यू में बरखा ने खुद स्वीकार किया कि उनकी और अन्य पत्रकारों की रिपोर्टिंग की वजह से सैकड़ों लोगों की जान खतरे में पड़ गई थी। उन्होंने यह भी माना कि उनकी कवरेज से सुरक्षा बलों को भी नुकसान हुआ। न्यूजलॉन्ड्री की मधु त्रेहान ने इंटरव्यू में बरखा से इस बारे में सवाल किए थे।

मुंबई हमले के दौरान बरखा पर आरोप लगा कि उन्होंने एक फंसे हुए व्यक्ति के रिश्तेदार को फोन करके उसकी लोकेशन लाइव टीवी पर उजागर कर दी। इससे आतंकियों को उसकी जगह का पता चल गया और उसकी जान चली गई। ब्लॉगर चैतन्य कुंते ने बरखा से पत्रकारिता की नैतिकता पर सवाल उठाए, जिसके जवाब में बरखा ने उन्हें लीगल नोटिस भेज दिया। चैतन्य ने यह भी आरोप लगाया कि बरखा की वजह से हेमंत करकरे की मौत हुई, हालांकि बरखा ने इससे इनकार किया और कहा कि उस वक्त वे दिल्ली में थीं।

बरखा ने इंटरव्यू में यह भी बताया कि उन्हें और अन्य पत्रकारों को अपनी गलती का एहसास हुआ, जिसके बाद उन्होंने दूसरे दिन से लाइव विजुअल्स को 15 मिनट की देरी से दिखाना शुरू किया। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें नहीं पता था कि आतंकी भी टीवी देख रहे हैं। एक अन्य घटना में बरखा पर आरोप लगा कि उन्होंने ओबेरॉय होटल के मैनेजर को कॉल किया, जिससे आतंकियों को पता चल गया कि वहाँ कई लोग बंधक हैं। इन सभी घटनाओं ने मीडिया की लाइव कवरेज के खतरों को उजागर किया।

इसी तरह, कारगिल युद्ध के दौरान भी मीडिया की लाइव रिपोर्टिंग ने सेना की रणनीति को प्रभावित किया था। 1999 में हुए इस युद्ध में पाकिस्तानी घुसपैठियों ने कारगिल की चोटियों पर कब्जा कर लिया था। भारतीय सेना ने ऑपरेशन विजय चलाकर उन्हें खदेड़ा, लेकिन इस दौरान मीडिया की पल-पल की कवरेज ने सेना की मुश्किलें बढ़ा दी थीं। कंधार हाईजैकिंग की घटना में भी यही हुआ। 1999 में इंडियन एयरलाइंस की फ्लाइट IC-814 को हाईजैक कर लिया गया था। इस दौरान मीडिया की कवरेज ने हाईजैकर्स को यात्रियों की स्थिति और सरकारी रणनीति की जानकारी दी, जिससे बातचीत और ऑपरेशन में दिक्कत हुई।

इन सभी घटनाओं से सबक लेते हुए सरकार ने अब सख्त रुख अपनाया है। मंत्रालय ने कहा कि मीडिया को अपनी जिम्मेदारी समझनी होगी और राष्ट्रीय हित को सर्वोपरि रखना होगा। यह कदम भविष्य में होने वाले किसी भी नुकसान को रोकने के लिए उठाया गया है।

पहलगाम के इस्लामी आतंकियों को ‘मिलिटेंट्स’ बता रहा था New York Times, अमेरिकी संसद की कमेटी ने रगड़ा: ‘बंदूकधारी-चरमपंथी’ की खाल में पहचान छिपा रहा विदेशी मीडिया

      पहलगाम हमला पर NYT रिपोर्ट को अमेरिकी संसद की कमेटी ने ही रगड़ दिया (फोटो साभार: AI Grok/NYT)
जम्मू कश्मीर के पहलगाम में हिंदुओं को निशाना बनाकर किए गए आतंकी हमले पर वैश्विक मीडिया की कवरेज ने एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस बीच, अमेरिकी संसद की हाउस फॉरेन अफेयर्स कमेटी के बहुमत पक्ष (House Foreign Affairs Committee Majority) ने New York Times को आड़े हाथों लिया है। कमेटी ने ट्वीट करके कहा कि न्यूयॉर्क टाइम्स ने पहलगाम में हुए हमले को आतंकी हमला कहने के बजाय ‘मिलिटेंट्स’ यानी उग्रवादियों द्वारा हमला बताया, जो पूरी तरह गलत है।

House Foreign Affairs Committee Majority ने साफ कहा कि चाहे भारत हो या इजरायल, आतंकवाद को लेकर New York Times हकीकत से कोसों दूर है। कमेटी ने New York Times की हेडलाइन को ठीक करते हुए लिखा, “यह साफ-साफ आतंकी हमला था।”

पहलगाम में आतंकियों ने 28 निर्दोष लोगों की हत्या कर दी, जिसमें से अधिकतर पर्यटक थे। पीड़ितों ने बताया कि हमलावरों ने पुरुषों की पैंट खोलकर यह चेक किया कि उनका खतना हुआ है या नहीं। जिनका खतना नहीं हुआ, उन्हें हिंदू समझकर गोली मार दी गई। आईडी कार्ड चेक किए गए और पूछा गया कि ‘मुस्लिम हो?’

इस हमले में 28 लोग मारे गए, जबकि न्यूयॉर्क टाइम्स ने अपनी रिपोर्ट में 24 लोगों के मारे जाने की बात कही। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस हमले को क्षेत्र में नागरिकों पर सालों में सबसे खराब हमला बताते हुए इसे ‘आतंकी हमला’ करार दिया और दोषियों को सजा दिलाने का वादा किया।

लेकिन इस घटना को वैश्विक मीडिया ने जिस तरह से पेश किया, उसने कई सवाल खड़े कर दिए। ऑपइंडिया पहले ही अपनी रिपोर्ट में बता चुका है कि किस तरह से अल जजीरा, बीबीसी, न्यूयॉर्क टाइम्स, वाशिंगटन पोस्ट और पाकिस्तानी मीडिया डॉन जैसे बड़े संस्थानों ने आतंकियों को आतंकी कहने से परहेज किया। अल जजीरा ने आतंकियों को ‘सशस्त्र व्यक्ति’ और ‘बंदूकधारी’ कहा। उसने “आतंकी हमला” शब्द को डबल कोट में लिखा, जैसे कि उसे इस शब्द पर भरोसा ही न हो।

पाकिस्तानी मीडिया डॉन ने भी आतंकियों को ‘बंदूकधारी’ लिखा और जम्मू कश्मीर को ‘भारत अधिकृत कश्मीर’ कहकर भारत का हिस्सा मानने से इनकार किया। डॉन ने पहलगाम को ‘मुस्लिम बहुसंख्यक क्षेत्र’ करार दिया और हमले की जिम्मेदारी लेने वाले आतंकी संगठन ‘कश्मीर रेजिस्टेंस’ को ‘लिटिल नोन ग्रुप’ कहकर छोटा दिखाने की कोशिश की।

वाशिंगटन पोस्ट ने भी आतंकियों को ‘बंदूकधारी’ कहा और लिखा कि हमला ‘बिना किसी भेदभाव’ के किया गया, जबकि पीड़ितों ने साफ बताया कि हमला धर्म के आधार पर किया गया। वाशिंगटन पोस्ट ने यह भी लिखा कि भारत सरकार ने मुस्लिम बहुल इलाकों में असहमति को दबाने के लिए सख्त कार्रवाई की, जो इस हमले से ध्यान हटाने की कोशिश लगती है।

 बीबीसी ने भी जम्मू कश्मीर को ‘भारत प्रशासित कश्मीर’ लिखा और आतंकवाद को ‘अलगाववादी विद्रोह’ कहकर हल्का करने की कोशिश की। बीबीसी ने यह भी दावा किया कि जम्मू कश्मीर में 5 लाख भारतीय सैनिक तैनात हैं, जो अतिशयोक्ति लगता है। बीबीसी ने आतंकियों को ‘चरमपंथी’ और ‘बंदूकधारी’ कहकर संबोधित किया। जर्मन मीडिया डीडब्ल्यू ने भी ‘भारत प्रशासित कश्मीर’ और ‘बंदूकधारी’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया।

यह पहली बार नहीं है जब वैश्विक मीडिया ने आतंकवाद को हल्का दिखाने की कोशिश की हो। भारत में आतंकवाद को लेकर पहले भी कई बार ऐसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया है, जो आतंकियों का बचाव करते नजर आते हैं। इस घटना ने एक बार फिर साबित कर दिया कि कुछ अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थान आतंकवाद को सही तरीके से पेश करने से पीछे हटते हैं और सिर्फ अपने हितों को ध्यान में रखकर काम करते हैं।

ब्रिटेन को पहला हिन्दू प्रधानमंत्री ऋषि सुनक मिलने पर 'द गार्जियन' ने उगला ज़हर ; गोमांस न खाने और शराब से दूर रहने को बताया ‘सवर्णों वाली सोच’

क्या हिन्दू होना अपराध है? क्यों बात-बात में हिन्दू को ही निशाना बनाया जाता है? हिन्दुओं को भिन्न-भिन्न जातियों में बांट कर विभाजित तो किया जाता है, लेकिन ईसाई और मुस्लिम समाज इतनी अधिक जातियों में विभाजित है, उस पर कोई नहीं बोलता, क्यों? हिन्दुओं में इतनी जातियां होने के बावजूद सब एक मंदिर में जाते हैं, मृतक को एक ही शमशान पर जलाया जाता है, जबकि ईसाई और मुस्लिम समाज में स्थिति एकदम विपरीत, क्यों नहीं उसे उजागर किया जाता? इस ज्वलंत प्रश्न का हर हिन्दू विरोधी को उत्तर देना होगा। स्वामी विवेकानंद की हिन्दू विरोधी भी प्रशंसा करते हैं, लेकिन हिन्दुत्व पर शिकागो में दिए उनके भाषण को क्यों भूल जाते हैं? लेकिन दुर्भाग्य यह है कि सेकुलरिज्म का चोला ओढे पाखंडी सेक्युलरिस्टों ने तुष्टिकरण करते अपने ही गौरवशाली इतिहास को धूमिल करना कौन-सा राष्ट्रधर्म है। जितना गौरवशाली इतिहास हिन्दुओं उतना विश्व में किसी संस्कृति का नहीं।  
हिन्दुओं को जातियों में विभाजित करने वालों जवाब दो। यह सिर्फ एक उदाहरण है,  
कभी किसी को इस भेदभाव पर बोलते देखा 
यूनाइटेड किंगडम (UK) को ऋषि सुनक के रूप में नया प्रधानमंत्री मिला है। वहाँ के मीडिया संस्थान ‘द गार्जियन’ उन्हें सिर्फ इसीलिए निशाना बना रहा है, क्योंकि वो हिन्दू हैं और भारतीय मूल के हैं। यही अंतरराष्ट्रीय मीडिया संस्थान भारत में अल्पसंख्यकों (मुस्लिमों, जिनकी जनसंख्या ब्रिटेन की कुल जनसंख्या का 3 गुना है) की तथाकथित प्रताड़ना का रोना रोते हैं, अपने ही देश में एक ऐसे अल्पसंख्यक समुदाय के नेता पर निशाना साध रहे हैं जिनकी जनसंख्या 2% से भी कम है।

खास बात यह है कि इस लेख को पंकज मिश्रा नामक उपन्यासकार ने लिखा है। उनका दावा है कि ऋषि सुनक ‘कंजर्वेटिव पार्टी’ की विविधता वाली दृष्टि को ध्वस्त कर रहे हैं। लेखक का ये नहीं मानना है कि यूके को एक अल्पसंख्यक प्रधानमंत्री मिलना ऐतिहासिक क्षण है, बल्कि उनका कहना है कि भारत से लेकर ब्रिटेन तक हुए हो-हंगामे के कारण ऐसा दिखाया जा रहा है। पंकज मिश्रा ने ‘हिन्दू सुप्रेमासिस्ट्स’ (राष्ट्रवादी और भाजपा समर्थकों के लिए वामपंथियों/इस्लामवादियों द्वारा प्रयोग किया जाने वाला शब्द) का जिक्र करते हुए कहा कि उनके लिए ऋषि सुनक ‘देशी ब्रो’ हैं।

‘द गार्जियन’ में प्रकाशित इस लेख में कहा गया है कि ये हिन्दू ऐसा सोचते हैं कि ऋषि सुनक भारत के गुप्त एजेंट हैं, जो दुनिया भर भारत के कब्जे का एक हिस्सा हैं। ऋषि सुनक गोमांस और शराब से दूर रहते हैं, जिसे पंकज मिश्रा ने अपर कास्ट टैबू’ बताया है। ध्यान दीजिए, यहाँ हिन्दू न कह कर सवर्णों को गाली दी गई है। साथ ही ऋषि सुनक भगवान गणेश की मूर्ति अपने साथ रखते हैं, इसे लेकर भी उनकी आलोचना की गई है।

इसमें ऋषि सुनक के पहनावे पर भी निशाना साधा गया है और कहा गया है कि उन्होंने काफी सावधानी से अपनी छवि बनाई है। ‘द गार्जियन’ लिखता है कि ऋषि सुनक सूट-बूट में रहते हैं, इसीलिए वो एक धार्मिक हिन्दू नहीं लगते, जैसा कि महात्मा गाँधी अपने पहनावे से लगते थे। ये भी इशारा किया गया है कि कैसे वो अपने अरबपति ससुर नारायणमूर्ति (इंफोसिस के संस्थापक) की एक निवेश कंपनी में निदेशक रह चुके हैं।

इसमें ये बिलकुल नहीं माना गया है कि ऋषि सुनक का प्रधानमंत्री बनना अल्पसंख्यकों की विजय है। उन्होंने आरोप लगाया कि नया भारत गाँधीवादी मूल्यों को नीचा दिखाते हुए सत्ता और धन की तरफ भाग रहा है। जानबूझ कर ये लेख लिखवाने के लिए एक भारतीय को चुना गया, ताकि विवाद न हो। द गार्जियन’ लेस्टर और बर्मिंघम में हुए हिन्दू विरोधी दंगों में भी मुस्लिम आरोपितों को बचाते हुए हिन्दुओं को बदनाम कर चुका है। कई देशों में हिन्दू अहम मुकाम हासिल कर सत्ता में हस्तक्षेप करने की ताकत रखते हैं, इससे भी लेखक को दिक्कत है।

लखीमपुर खीरी : जाति पर खेलना चाहती थीं सबा नकवी, जुनैद-सोहैल का मजहब देख चुप हो गईं: नेटीजन्स ने पूछा- ‘अब कहाँ गायब हो’


लखीमपुर खीरी में दो दलित नाबालिग बहनों की रेप के बाद हुई हत्या की घटना के बाद एक ओर आरोपितों के लिए सख्त से सख्त सजा की माँग की जा रही है। वहीं दूसरी ओर मीडिया गिरोह के लोग इस पर कुछ भी बोलने से बच रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि ये चुप्पी आरोपितों का नाम सामने आने के बाद साधी गई है वरना गिरफ्तारी से पहले इस घटना को जाति का एंगल देने की कोशिश शुरू हो गई थी।

लखीमपुर खीरी की घटना के बाद आप सबा नकवी का यह ट्वीट देखिए। उन्होंने एनडीटीवी की खबर को शेयर करके ये ज्ञान दिया कि खबर में कम से कम ‘जाति’ का उल्लेख तो करना चाहिए था। उन्होंने लिखा, “रिपोर्ट में जाति का जिक्र नहीं है जबकि ये बेहद जरूरी है। 2 नाबालिग लड़कियाँ, बहनें यूपी के लखीमपुर में पेड़ से लटकी मिली हैं।”

नकवी का यह ट्वीट बुधवार को 11:38 पर किया गया था और गुरुवार को यूपी पुलिस ने इस केस में कार्रवाई करते हुए 6 आरोपितों को धर दबोचा। आरोपितों की पहचान जुनैद, सोहैल, आरिफ, हाफिज, छोटे और करीमुद्दीन के तौर पर हुई।

पुलिस ने बताया कि ये लोग दोनों बहनों को बहला कर खेत में ले गए और उसके बाद वहाँ इन्होंने पहले रेप किया और उसके बाद उनकी हत्या करके उन्हें पेड़ पर लटका दिया। पोस्टमार्टम रिपोर्ट से भी यही बात सामने आई है।

नकवी को नेटीजन्स ने लताड़ा

अब सोशल मीडिया यूजर्स ने नकवी के पोस्ट पर उन्हें बताना शुरू किया कि कल तक उन्हें रिपोर्ट में जाति का जिक्र चाहिए था। अब तो आरोपितों का मजहब भी पता चला गया, फिर आखिर वे क्यों चुप हैं।
अंशुल सक्सेना ने इस पोस्ट का स्क्रीनशॉट शेयर करके कहा, “दो नाबालिग लड़कियाँ लखीमपुर खीरी में पेड़ से लटकी मिलीं। कल पत्रकार सबा नकवी कह रही थी कि जाति लिखना जरूरी है। आज 6 लोग पकड़े गए हैं। लेकिन अब वह कुछ भी नहीं कह रहीं कि आरोपितों का जाति या मजहब लिखना चाहिए क्योंकि शायद ये उनके एजेंडे को सूट नहीं करता।”
रश्मि लिखती हैं, “कल तक तो सबा नकवी जैसे लोगों को आरोपितों की जाति भी पता करनी थी। आज रेपिस्टों का कोई धर्म नहीं होता।”
एक यूजर ने लिखा, “सबा नकवी हिंदू जाति को दोषी दिखाने के लिए एक जघन्य अपराध को हथियार की तरह इस्तेमाल कर रही थीं। लेकिन दुर्भाग्य से उनके आरोपितों का नाम छोटू, जुनैद, सोहैल, करीमुद्दीन और आरिफ जुनैद है।”
शशांक शेखर झा ने उन्हें कहा, “तुम्हारे तर्क के मुताबिक तो अब आरोपितों का जाति और मजहब बताओ।”
एक यूजर ने सबा से पूछा कि आप तो रेप क्राइम में जाति ढूँढ रही थीं लेकिन रिपोर्ट के बाद चुप क्यों हो गई हों, क्योंकि इसमें मजहब आ गया। वहीं कई यूजर्स ने सबा नकवी से पूछा कि जैसे उन्होंने जाति जानने के लिए उत्सुकता दिखाई। लेकिन मजहब जानकर वो कहाँ गायब हो गई हैं।
सबा नकवी के ट्वीट पर नेटीजन्स द्वारा आई प्रतिक्रिया के बीच ऐसा नहीं है कि उन्होंने घटना संबंधी कोई जानकारी साझा नहीं की। उनके अकॉउंट पर ऐसे रीट्वीट हैं जिसमें आरोपितों के नाम हैं, लेकिन इस रीट्वीट के साथ उनका कोई कमेंट तक नहीं है। यही हिपोक्रेसी देख लोगों में गुस्सा है और उनका पूछना है कि जब सबा रेप जैसे घृणित अपराध को जाति ढूँढ सकती हैं तो मजहब पर क्यों चुप हैं।