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‘द न्यूज मिनट’ की एडिटर धन्या राजेंद्रन को धर्मस्थल पर प्रोपेगेंडा फैलाने पर जॉर्ज सोरोस समर्थित अवॉर्ड के लिए किया गया नॉमिनेट: ‘रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर्स’ की भारत से घृणा की कहानी

                                 सोरोस से फंडिंग पाने वाली संस्था ने धन्या को किया अवॉर्ड के लिए नॉमिनेट
एक समय था जब पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा जाता था। जब हमने पत्रकारिता में कदम रखा तब फिल्म लेखन को Yellow Journalism कहा जाता था, लेकिन आज लगभग सारी पत्रकारिता ही 
Yellow Journalism हो गयी है। सारे खोजी पत्रकार नेताओं के साथ बैठ मालपुए खा रहे हैं। जिस कारण प्रिंट मीडिया से लेकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया तक सन्देह के घेरे में हैं। आज अगर सोशल मीडिया नहीं होता जनता सच्चाई के कोसों मील दूर रहकर इन पर विश्वास कर रही होती। 

मुग़ल जब भारत आये थे कोई फौज लेकर नहीं आये थे क्योकि उनकी मदद करने को यहाँ जयचन्द मौजूद थे। आज उसी जयचन्द के वंशज हिन्दू और भारत विरोधी विदेशियों के गुलाम बन अवार्ड ले रहे हैं। सरकार को तत्कालीन सेना प्रमुख बिपिन रावत की बात कि "भारत को एक बॉर्डर नहीं ढाई बॉर्डर पर लड़ाई लड़नी होगी" को याद रखते हुए विदेशी दलालों की भीख पर पलने वालों की जाँच करनी होगी। इस बात को सभी जानते है कि जॉर्ज सोरोस सरकारें गिराने में माहिर है। वह जानता है कि धन के लालच में किस देश में कौन बिक हंगामा कर या करवा सकता/सकती है। 

भारत ने CAA विरोध और तथाकथित किसान आन्दोलनजीवियों का आंदोलन देखा। क्या राजशाही आंदोलन थे। CAA विरोध में तो "गजवा-ए-हिन्द और तथाकथित किसान आन्दोलनजीवियों ने नारे लगाए "मोदी मर जा तू" इन आन्दोलनजीवियों को समर्थन देने वाले विपक्ष ने क्या ऐसे नारों का विरोध किया, नहीं। अगर विरोध करते आन्दोलनजीवियों से हंगामा करवाने के लिए फंडिंग बंद हो जाती। किसी भी विपक्षी नेता ने विरोध करने के लिए माँ का दूध नहीं पिया था।      

दुनिया में लोकतांत्रिक सरकारों के तख्तापलट में शामिल जॉर्ज सोरोस से फंडिंग पाने वाली संस्था ने धन्या राजेंद्रन को अवॉर्ड के लिए नॉमिनेट किया है। आपको कर्नाटक के धर्मस्थल मामले में ‘द न्यूज मिनट’ (टीएनएम) की रिपोर्टिंग तो याद ही होगी, किस तरह धर्मस्थल को बदनाम करने के लिए एक के बाद एक कहानियों को ‘द न्यूज मिनट’ ने हवा दी थी। टीएनएम ने इस मामले में तथ्यों को देखने के बजाय धर्मस्थल के बारे में जहर उगला और अब उसे शायद उसका ईनाम भी मिल गया है।

टीएनएम की सह-संस्थापक और प्रधान संपादक धन्या राजेंद्रन को भारत की ओर से रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (आरएसएफ) इम्पैक्ट प्राइज ऑफ द ईयर 2025 के लिए नामित किया गया है। RSF ने नॉमिनेशन में लिखा है, ‘‘धन्या राजेंद्रन प्रेस की स्वतंत्रता के लिए एक व्यापक लड़ाई में शामिल हो गई हैं, जिस पर भारत सरकार प्रतिबंध लगाने की कोशिश कर रही है।” RSF ने टीएनएम को ‘गुणवत्तापूर्ण पत्रकारिता का मानक’ बताया है।

वो कहते हैं ना कि ‘चोर-चोर मौसेरे भाई’। वही, हाल RSF और धन्या का है। RSF के नॉमिनेशन को पढ़कर लगता है कि दुनिया में दमन की सबसे बड़ी शिकार धन्या ही है। RSF ने लिखा, “उन्हें और उनकी टीम को उनके काम के कारण बार-बार मुकदमों का सामना करना पड़ा है और ऑनलाइन उत्पीड़न का सामना करना पड़ा है।” जिस संस्थान ने धन्या को अवॉर्ड के लिए नॉमिनेट किया है, वो खुद ‘दूध की धुली’ नहीं है। वो खुद जॉर्ज सोरोस से पैसा लेती है, वही सोरोस जो लोकतांत्रिक देशों की सरकारों में हस्तक्षेप करने के लिए कुख्यात है।

कर्नाटक धर्मस्थल को लेकर टीएनएम का प्रोपेगेंडा

जुलाई 2025 में कर्नाटक के धर्मस्थल मंदिर के पूर्व सफाई कर्मचारी सी.एन. चिन्नैया ने इस क्षेत्र में ‘सैकड़ों शवों’ को दफनाने का दावा किया था। सफाई कर्मचारी चिन्नैया ने घटना का वक्त 1995 से 2014 के बीच का बताया। बगैर सबूत के सिर्फ चिन्नैय की गवाही के आधार पर कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार ने जाँच के लिए एसआईटी का गठन कर दिया।

दो हफ्तों तक SIT के अधिकारी शवों की तलाश में जंगलों, नदी के किनारों और घाटों की खाक छानते रहे। लेकिन अंत में सब खाली हाथ रहे। कोर्ट में चिन्नैया ने माना कि उसने झूठ बोला था। चिन्नैया का ‘राज’ खुल गया और पता चला कि वो वास्तव में धर्मस्थल, उसके मंदिर ट्रस्ट और धर्माधिकारी वीरेंद्र हेगड़े को बदनाम करने की साजिश का एक मौहरा भर था।

टीएनएम जैसे प्रोपेगेंडा मीडिया ने इसे हाथों-हाथ लिया और इस विषय पर दर्जनों रिपोर्ट की गईं। टीएनएम ने बेबुनियाद आरोपों की खूब रिपोर्टिंग की और उनका विश्लेषण किया।

टीएनएम का हिंदू विरोधी प्रोपेगेंडा

धर्मस्थल मामले में तो टीएनएम की हिंदू विरोधी सोच उजागर हुई ही थी लेकिन यह कोई इकलौता या पहला मामला नहीं है। टीएनएम लंबे वक्त से हिंदुओं को निशाना बनाता रहा है। ये वही पोर्टल है जिसने सामूहिक दुष्कर्म के एक मामले में मुस्लिम आरोपित के नामों को हिंदू नामों से बदल दिया था। बाद में खुद टीएनएम को सच स्वीकार पड़ा तो उस पर खूब सवाल खड़े हुए। यह पोर्टल हमेशा उन खबरों को प्रमुखता से उठाता है जिनमें निशाना हिंदू संस्थान या समुदाय होते हैं।

टीएनएम की इस प्रवृत्ति की झलक ‘द केरल स्टोरी’ की कवरेज के दौरान भी देखने को मिली। फिल्म में उन महिलाओं की सच्ची गवाही दिखाई गई थी, जिन्हें प्रेम जाल में फँसाकर धर्मांतरण कराया गया और बाद में आईएसआईएस दुल्हनों के रूप में भेज दिया गया। लेकिन ‘द न्यूज मिनट’ ने इन दर्दनाक सच्चाइयों को नजरअंदाज कर फिल्म को ‘दुष्प्रचार’ बता दिया था। यानी जहाँ अपराधियों का संबंध इस्लाम से था वहाँ पीड़िताओं की आवाज को ही खारिज कर दिया गया।

देवभूमि उत्तराखंड में मस्जिदों और मदरसों द्वारा सरकारी जमीनों पर किए गए अवैध कब्जों के कई प्रमाण सामने आए। वन भूमि और यहाँ तक कि तीर्थ मार्गों पर भी मस्जिदें और मदरसे बन जाने के दस्तावेजी सबूत मिले तोड़फोड़ के दौरान राजनीतिक बहसें भी हुईं। लेकिन इन गंभीर खुलासों पर ‘द न्यूज मिनट’ पूरी तरह चुप रहा, न कोई खोजी रिपोर्ट, न कोई संपादकीय प्रतिक्रिया। वहीं, जब किसी हिंदू धार्मिक संस्था पर ऐसा आरोप लगता है, तो TNM तुरंत उसे ‘एक्सक्लूसिव रिपोर्ट’ बना देता है।

इसी तरह, लव जिहाद जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी TNM की चुप्पी साफ दिखाई देती है। जब यह पोर्टल कभी-कभार इन मामलों पर लिखता भी है, तो उसे ‘दक्षिणपंथी सोच’ या ‘कल्पित प्रचार’ बताकर खारिज कर देता है। यह रवैया उन हजारों महिलाओं के दर्द का अपमान है जो झूठे प्रेम के जाल में फँसकर धर्म परिवर्तन और शोषण की शिकार हुईं।

सोरोस के पैसे से होती हैं RSF की फंडिंग

रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स (रिपोर्टर्स सेंस फ्रंटियर्स या RSF) इससे पहले प्रोपेगैंडिस्ट यूट्यूबर रवीश कुमार को ‘इंडिपेनडेंस प्राइज’ दे चुका है और मोहम्मद जुबैर जैसे प्रोपगेंडा फैलाने वाले लोगों के समर्थन में खड़ा रहा है। RSF को जॉर्ज सोरोस, भारत विरोधी प्रोपेगेंडा फैलाने के लिए कुख्यात Ford Foundation सहित पश्चिमी सरकारों और निजी संस्थाओं द्वारा भारी मात्रा में फंड दिया जाता है। RSF खुद भी भारत विरोध के लिए कुख्यात है और इसके प्रेस फ्रीडम इंडेक्स को लेकर अक्सर सवाल उठते रहे हैं।

SRF को फंड देने वालों में यूरोपीय आयोग MFA, AIDS, Front Line, Oak Foundation, NHRF TAPIEI, MOF Danida Taiwan, NED, Ford Foundation, OSF Core Support (जॉर्ज सोरोस की ओपन सोसाइटी फाउंडेशन) प्रमुख हैं। NED एक अमेरिकी सरकारी संगठन है, जिसे अक्सर CIA की ‘सॉफ्ट ताकत’ या शांति से सत्ता बदलने वाले हथियार के रूप में जाना जाता है।

RSF (Reporters Without Borders) की भारत पर रिपोर्टिंग उसके राजनीतिक पक्षपात को उजागर करती है। इसके ‘इंडिया फैक्ट फाइल’ में मोदी समर्थकों को ‘भक्त’ कहा गया है, ‘गोदी मीडिया’ का मजाक उड़ाया गया है और प्रधानमंत्री पर ‘प्रेस स्वतंत्रता संकट’ का आरोप लगाया गया है।

RSF की रिपोर्ट्स में इसकी भारत से घृणा भी साफ नजर आती है। मई 2023 में RSF ने अपनी वार्षिक प्रेस स्वतंत्रता रिपोर्ट जारी की, जिसमें उसने भारत को 180 देशों में से 161वें स्थान पर रखा। RSF के अनुसार, 2022 से भारत 11 पायदान नीचे खिसक गया है। दिलचस्प बात यह है कि RSF के अनुसार, पाकिस्तान के प्रेस स्वतंत्रता सूचकांक में सुधार हुआ है। 2022 में 157वें स्थान से पाकिस्तान ने सूची में 150वां स्थान प्राप्त किया है।

RSF का नजरिया समझने के लिए जॉर्ज सोरोस की ओपन सोसाइटी फाउंडेशन (OSF) को देखना होगा, जो Alt News, The Wire, The Quint और Scroll जैसे पोर्टलों को फंड करती है। इसका मकसद स्वतंत्र पत्रकारिता नहीं बल्कि भारत पर वैचारिक नियंत्रण है। इसलिए यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है कि RSF, जो सोरोस की सोच को मानता है, अक्सर उन पत्रकारों को इनाम देता है जो ‘स्वतंत्रता की बोलने’ को देश-विरोधी काम और ‘प्रेस की स्वतंत्रता’ को सरकार की आलोचना से जोड़ते हैं।

लोगों ने भी उठाए सवाल

धन्या के नामांकन पर सोशल मीडिया पर भी सवाल उठाए गए हैं। व्यवसायी मोहनदास पई ने X पर एक पोस्ट कर सवाल उठाए हैं। पई ने X पर टीएनएम के एक पोस्ट पर लिखा, “बेहद शर्मनाक। (नामांकन) किसलिए? धर्मस्थल पर फर्जी कहानी गढ़ने के लिए? अति वामपंथी इकोसिस्टम काम कर रहा है!” उन्होंने लिखा, “पहले झूठी कहानी गढ़ो, फिर इकोसिस्टम ऐसे ‘पीत पत्रकारों’ को पुरस्कारों के लिए नामांकित करता है! अगर धन्या में जरा भी ईमानदारी और आत्मसम्मान है, तो धर्मस्थल से जुड़ी फर्जी कहानियों के लिए माफी माँगे।”

धर्मस्थल कांड ने जब दिखाया कि पत्रकारिता के नाम पर झूठ कितनी आसानी से फैलाया जा सकता है। RSF द्वारा धन्या राजेंद्रन का नामांकन इसका उदाहरण है। यह पत्रकारिता की ईमानदारी के लिए नहीं बल्कि विचारधारा के लिए काम करने का इनाम है।

कर्नाटक : हिन्दुओं जागो और सेकुलरिज्म के नशे को छोड़ो ; जिस पीड़ित हिंदुओं को ही जेल में ठूँसने वाला ‘काला कानून’ बिल को सोनिया ला रही थी , रोहित वेमुला एक्ट से हिंदुओं को खंड-खंड करना चाहता है बेटा: बदले नहीं हैं कांग्रेस के इरादे

कर्नाटक में कांग्रेस जिस तरह हिन्दुओं के विरुद्ध काम करने जा रही है, हिन्दुओं को कांग्रेस और उन सभी पार्टियों से दूरी बनानी चाहिए जो इस हिन्दुओं के विरुद्ध बिल लाकर देश में शरीयत लाने में साथ दे रही हैं। इन हिन्दू विरोधियों को नगर निगम से लेकर संसद तक हर मोर्चे से कोसों मील दूर रखो। अगर हिन्दू और जितनी भी हिन्दू स्वयंसेवी संस्थाएं अभी भी नहीं जागी बहुत देर हो जाएगी और आने वाली तुम्हारी पीडियां पानी पी-पीकर तुम्हे कोसेंगी। 
आज से लगभग 14 साल पहले देश में कांग्रेस की अगुवाई वाली UPA सरकार थी। UPA की यह सरकार ‘अल्पसंख्यकों का संसाधनों पर पहला हक़’ वाली नीति पर चलती थी। मुस्लिम तुष्टिकरण की पिच पर रोज चौके-छक्के लगाने की मंशा रखने वाली कांग्रेस ने इसी दौरान Anti-Communal Violence Bill से देश का परिचय करवाया था। यह बिल देश की बहुसंख्यक हिन्दू आबादी को दंगाई घोषित करने का दस्तावेज था। तब यह पास नहीं हो पाया था। लेकिन 14 साल बाद ऐसा ही एक बिल कांग्रेस ने दूसरी शकल में पेश किया है।

कर्नाटक में रोहित वेमुला बिल के नाम से यह नया शिगूफा छेड़ा है। इस बिल के प्रावधानों को लगातार कुछ वैसा ही बताया जा रहा है, जैसा 14 वर्ष पहले Anti-Communal Violence Bill के प्रावधानों को बताया गया था। जैसे बिना किसी सुनवाई के तब बहुसंख्यक आबादी को दंगाई बताने का प्रयास हो रहा था, वैसे ही अब नए बिल में एक बाद वर्ग के बच्चों को डिफ़ॉल्ट तौर पर शोषक बताने का प्रयास किया गया है। एक बिल माँ सोनिया गाँधी के दौर में आया था, दूसरा उनके बेटे राहुल गाँधी के कहने पर लाया गया है।

जिस कानून से आज इस कर्नाटक के नए कानून की तुलना कर रहा हूँ, इसका मसौदा राष्ट्रीय सलाहकार समिति (NAC) ने बनाया था। यह NAC असल में और कुछ नहीं बल्कि देश की चुनी सरकार के ऊपर की सरकार थी, जिसकी मुखिया सोनिया गाँधी थीं और सदस्यों में योगेन्द्र यादव और हर्ष मांदर जैसे लोग शामिल थे। अगर ये क़ानून बन गया होता तो बहुसंख्यक हिन्दू पीड़ित होकर भी अपराधी की श्रेणी में आते और कथित अल्पसंख्यक दंगे कर के भी पीड़ित कहे जाते। हिन्दुओं को बिना कुछ किए ही सज़ा मिलती।

इस कानून के पास होने के बाद जिस भी इलाके में दंगा हो, वहाँ बहुसंख्यक आबादी ही दोषी मानी जाती। अब इस देश में बहुसंख्यक हिन्दू हैं, तो सब जगह वही दोषी होते। यहाँ तक कि अगर कोई हिन्दू किसी समुदाय विशेष वाले को अपना मकान बेचने से मना कर दे, फिर भी घृणा जैसे आरोप लग जाते। जघन्य अपराध कर के भी दंगाई बच निकलते तो पत्थरबाजी, गोलीबारी और बमबारी करने वालों के लिए ये क़ानून कितने बड़े ढाल का काम करता।

हिन्दुओं के पीड़ित होने के बाद भी उन्हें दोषी माना जाता। पुलिस आपकी सुनवाई तक नहीं करती। अब ये सब ‘गुण’ ‘कर्नाटक के इस नए कानून में मौजूद हैं। कर्नाटक सरकार के इस नए शिगूफा बिल के अनुसार, सामान्य वर्ग के छात्रों को छोड़कर बाकी सभी के लिए, यानी SC, ST, OBC और अल्पसंख्यक समुदाय को ‘अन्याय से बचाने’ के लिए प्रावधान बनाए गए हैं। इसके प्रावधान कहते हैं कि कोई भी पीड़ित या फिर उसके परिवार का व्यक्ति सीधे पुलिस में शिकायत दर्ज कर सकता है और बिना किसी सबूत के आरोप लगाया जा सकता है।

इसके बाद तुरंत एक्शन का भी नए कानून में प्रावधान है। बिल में किसी भी तरह के भेदभाव को गैर-जमानती और संगीन अपराध माना गया है। यानी आरोप लगते ही किसी भी छात्र को दोषी मान लिया जाएगा। अब आपने जो कर्नाटक के नए कानून में पढ़ा और सांप्रदायिक हिंसा बिल के बारे में पढ़ा था, उसमे समानता नजर आई होगी। एक बिल मुस्लिमों के तुष्टिकरण के लिए हिन्दुओं को बिन सुनवाई दोषी बना रहा था, दूसरा छात्रों को बिन सुनवाई दोषी बनाता है।

यानी माँ सोनिया गाँधी जिस स्कीम को लागू करना चाहती थी उसे ही थोड़ा सा मोडिफाई करके अब बेटे राहुल गाँधी ने कर्नाटक में लागू करने का प्रयास किया है। दरअसल, बात यह है कि पहले कांग्रेस चाहती थी कि वह मुस्लिमों का तुष्टिकरण करके सत्ता हासिल करती रहे। 2014 के बाद देश की राजनीति ऐसी पलटी कि हिन्दू संगठित हो गए, वोटबैंक की राजनीति करने वालों को सर पकड़ना पड़ा। लगातार कई चुनाव हारने के बाद कांग्रेस को समझ आया कि उसकी राह का रोड़ा यह हिन्दू एकता है।

फिर चाहे जातिगत जनगणना की बात हो, या फिर आरक्षण को 50% से ऊपर ले जाना और अब ये रोहित वेमुला बिल, यह सभी उसकी इसी नीति का एक टूल हैं। कांग्रेस की प्लेबुक कभी भी बदलती नहीं है। कभी वह शाह बानो तो कभी सांप्रदायिक हिंसा बिल तो कभी रोहित वेमुला के नाम पर बनाए गए कानून के रूप में सामने आती है।

कांग्रेस का manifesto ही कांग्रेस का काल बनेगा; हर शांतिप्रिय चाहे वह हिन्दू, मुस्लिम, सिख एवं ईसाई हो कांग्रेस से दुरी बनाए

कल प्रधानमंत्री जी ने एक भाषण दिया था.. कांग्रेस की Wealth Distribution स्कीम के बारे में... इसमें यह भी कहा गया था कि हमारा पैसा छीन कर घुसपैठियों को दे दिया जाएगा। 

अब समाज के एक वर्ग ने इस पर हल्ला मचा दिया है.... लोग कह रहे हैं कि PM Communal हैं.... देश को तोड़ने की बात कर रहे हैं। लेकिन जो देश में communalism फैला रहा है, उस पर चुप्पी क्यों? अंग्रेज़ों के राज से देश को साम्प्रदायिकता की आग में झोंका जाता है। उसका मूल कारण है, समस्या की जड़ में जाओ, पागलों की तरह बीजेपी, आरएसएस और विश्व हिन्दू परिषद् को गाली मत दो, आने वाली पीडियां कोसेंगी तुम्हे। हर शांतिप्रिय चाहे वह हिन्दू, मुस्लिम, सिख या ईसाई ध्यान से कांग्रेस मैनिफेस्टो को देखिए। क्या कांग्रेस का मैनिफेस्टो देश को सही दिशा में लेकर जाने वाला है? और जो सोंच रहे हैं कि बीजेपी को हराकर कांग्रेस को लाना है, they are living in fools paradise. फ्रेंच ज्योतिष ने 1555 में अपनी भविष्यवाणी में स्पष्ट लिख दिया था कि 2014 के बाद भारत(हिन्द) कभी पीछे मुड़कर नहीं देखेगा। संकट आएंगे लेकिन बहादुरी के साथ हिंदुत्व का परचम लेकर बढ़ता जायेगा।  

कांग्रेस की स्थापना किसने की अंग्रेज़ ने। आज़ादी के बाद कांग्रेस की बागडोर किसके हाथ में है नेहरू-गाँधी परिवार के हाथ। ये परिवार क्या हिन्दू है? केवल हिन्दू धर्म में दाह संस्कार होता है। सच्चाई जानने के लिए पढ़िए नीचे दिए लिंक को :

The Story of Two Lals--Motilal & Jawaharlal
NIGAMRAJENDRA28.BLOGSPOT.COM
The Story of Two Lals--Motilal & Jawaharlal
Jawahar Lal Nehru Moti Lal Nehru SOMETIME back I used to receive a pamphlet titled “ SHAKTI SANDESH ” published from Calcutta a...

सोंचिये देश की सबसे पुरानी जिस पार्टी को छोटी-छोटी पार्टियों के साथ मिलकर अपनी साख बचाने के लिए चुनाव लड़ना पड़ रहा हो, इससे ज्यादा कांग्रेस की दुर्गति और क्या होगी। उन क्षेत्रीय पार्टियों को कांग्रेस मैनिफेस्टो देख अपने आपको अलग कर लेने में ही भलाई है, क्योकि सोनिया परिवार ने पार्टी को आत्महत्या करने की ओर धकेल किया है। अपना दामन बचा सकते हो तो बचा लो। 

राहुल तो कांग्रेस का आखिरी बहादुर शाह ज़फर बनने को आतुर है। ज़फर तो फिर बादशाह रहा, लेकिन राहुल तो मात्र एक सांसद। ज़फर अपनी शायरी और मदिरा में मस्त रहा लेकिन नहीं मालूम मीर ज़ाफ़र क्या गुल खिला रहा है। परिणाम अंग्रेजों ने हकूमत हथिया ली। और भारत अंग्रेजो का गुलाम बन गया। ठीक उसी दिशा में राहुल कांग्रेस को लेकर चल निकला है। और ये मैनिफेस्टो कांग्रेस को ले डूबेगा।   

जानिए सच क्या है?

पहले तो आप राहुल गाँधी की speech सुन लीजिये। वह खुल कर बोल रहे हैं कि उनकी सरकार बनने के बाद एक Wealth Survey कराया जायेगा। जैसे जाति Census की बात हो रही है.. और उसके बाद आंकड़ों के हिसाब से Wealth को distribute कर दिया जायेगा।

आपको यह छोटी मोटी बात लग रही होगी... लेकिन आपको यह concept समझने के लिए Carl Marx की Wealth Distribution थ्योरी और Functional Income Distribution थ्योरी को पढ़ना पड़ेगा और फिर उसे भारत के Perspective में देखना पड़ेगा.... कुछ concep…

Dear salaried class, professionals and business owners 

Imagine returning home at 6pm after days of hard work, only to find a sarkari notice stating that your savings and assets are ten times over the poverty line. As a result, the govt will be confiscating two-thirds of your assets for redistribution to the poor under the Jawaharlal Nehru National Wealth Redistribution Scheme.

 

इतिहास ज्ञात होना चाहिए -: अधाधुंध कांग्रेस की आलोचना करते जाना ठीक नहीं है। कांग्रेस की उपलब्धियां भी जाननी चाहिए और देखिए।

कौन कहता है की कांग्रेस ने पिछले 65 सालों में कुछ काम नही किया ? बहुत किया, लेकिन मुसलमानों के लिए ?

• पाकिस्तान बनाया, मुसलमानों के लिए,

• बांग्लादेश बना, मुसलमानों के लिए,

• धारा 370 लागू हुई, मुसलमानों के लिए।

• अल्पसंख्यंक बिल आया, मुसलमानों के लिए।

• मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड बना, मुसलमानों के लिए।

• अल्पसंख्यंक मंत्रालय बना, मुसलमानों के लिए।

•वक़्फ़ बोर्ड बनाया, मुसलमानों के लिए।

•अल्पसंख्यंक विश्वविद्यालय बना, मुसलमानों के लिए।

• देश का बंटवारा धार्मिक आधार पर हुआ, मुसलमानों के लिए।

• Places of worship Act लाये, मुसलमानों के लिए।

• Anti communal violence bill दो बारी संसद में पेश किया परंतु BJP ने पास नहीं होने दिया, …

 "जिसकी जितनी आबादी उसका उतना हक़"

आइये इसका मतलब समझिए।

आप एक लाख कमा के 2 बच्चे करो, वो बीस हज़ार कमा के 10 बच्चे करेंगे।

कांग्रेस सरकार एक लाख बीस हज़ार रुपए को 12 बच्चों में बाट देगी।

आपको मिलेगा बीस हज़ार, उनको मिलेगा एक लाख।

क्योंकि, जिसकी जितनी आबादी उसका उतना हक़। यह मैं नहीं कांग्रेस का चुनाव घोषणा पत्र बोल रहा।।

कांग्रेस इस देश का संसाधन मुसलमानो को किस कदर देना चाहती थी की 2005 में मनमोहन सिंह ने मुसलमानो को यह देश सौपने  के लिए और हिंदुओं को बर्बाद करने के लिए सच्चर कमीशन बनाया 

सच्चर कमीशन ने करीब 350 पन्नों की रिपोर्ट सरकार को दिया था

सच्चर कमीशन की रिपोर्ट के अनुसार 

1-मुसलमानो को दलित और ST क्लास में आरक्षण दिया जाए

 2-मुसलमान बच्चों की पढ़ाई फ्री हो 

मुसलमान बच्चों को किताब कॉपी मुफ्त में दिया जाए 

3-एमबीबीएस इंजीनियरिंग और आईआईटी में मुसलमानो के लिए अलग से आरक्षण हो 

4-बैंक मुसलमान को बिना किसी गारंटी  के लोन दें और यदि मुसलमान लोन न चुका सके तो बैंक उसे पर कोई कार्रवाई न करें 

5-राज्य सरकार  बोर्ड निगम में ज्यादा से ज्यादा मुसलमान को लाने के लिए 30% सीट मुसलमान को दें 

6-केंद्र सरकार कानून बनाए जिससे सभी राज्य की विधानसभाओं में काम से कम 40% मुसलमानो को सीट रिजर्व किया जाए 

7-और केंद्र कानून बनाए जिससे संसद में दोनों सदनों में 30% मुस्लिम सांसद बनकर आए 

8-मुसलमानो को व्यापार करने के लिए हर शहरों में अलग इंडस्ट्रियल जोन बनाई जाए उनको मुफ्त में बिजली मिले और उन्हें 10 साल तक सभी टैक्स में माफ किया जाए ताकि वह अपना बिजनेस कर सकें 

9-मुसलमान लड़कियों की शादी में सरकार ₹500000 की मदद करें

10-मुसलमानो को विदेश पढ़ने के लिए हर साल सरकार कम से कम 10000 मुसलमान बच्चों को स्कॉलरशिप दे

11-मुस्लिम इलाकों में बैंक खोले जाए जो मुसलमान को मुफ्त में लोन दें मुसलमान के लिए अलग से ईट और पॉलिटेक्निक खोले जाएं जिसमें सिर्फ मुसलमान बच्चे पढ़ें

12-जिस भी निर्वाचन  क्षेत्र में मुस्लिम 20% से ऊपर हो उसे चुनाव क्षेत्र को दलित या आदिवासियों के लिए लोकसभा या विधानसभा के लिए रिजर्व ना किया जाए बल्कि उनको मुसलमान के लिए रिजर्व किया जाए

14-मदरसों की डिग्री को डिफेंस, सिविल और बैंकिंग एग्जाम के लिए मान्य करने की व्यवस्था करना।

15- हर एक मुसलमान को सरकार निजी कार बाइक या कमर्शियल वाहन खरीदने के लिए बिना ब्याज के लोन दें

 आप गूगल पर सच्चर समिति की सिफारिश से सर्च करके उसे पढ़िए आप चौंक जाएंगे की किस कदर कांग्रेस इसमें लगी थी कि भारत में हिंदुओं को दोयम दर्जे का नागरिक बनकर मुसलमान को भारत का उच्च क्लास का नागरिक बना दिया जाए

हिंदुओं को भीख मांगने पर मजबूर कर दिया जाए 

मालदीव की जनता भी दोषी है - भारत विरोधी मोहम्मद मुइज़्ज़ू को सत्ता जनता ने ही दी थी - लक्षद्वीप के लिए मालदीव वरदान साबित होगा

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सुभाष चंद्र 

आज जो हालात मालदीव में पैदा हुए हैं, उनके लिए काफी हद तक जिम्मेदार मालदीव की जनता भी है क्योंकि मोहम्मद मुइज़्ज़ू का रुख भारत के विरोध में और चीन के समर्थन में जानते हुए जनता ने उसे सत्ता सौंपी थी। जिसका परिणाम यह हुआ कि मोहम्मद मुइज़्ज़ू ने आते ही सबसे पहले सबसे बड़े मददगार देश भारत को मालदीव से बाहर कर दिया और इस पर प्रतिक्रिया तो होनी ही थी। उस समय जनता ने क्यों नहीं विरोध किया? लेकिन जैसे ही भारत की ओर आर्थिक चोट लगी, विलाप शुरू कर दिया, परन्तु भारत के प्रति इन लोगों में कितनी घृणा है, यह जहर बाहर आ चुका है। भारत से रिश्ते सुधारने से पहले मालदीव की जनता और नेताओं को अपने दिलों से भारत के प्रति घुसी घृणा को निकालना होगा। भारतीयों को भी तब तक मालदीव जाने के लिए सोंचना भी नहीं चाहिए। पाकिस्तान भी भारत से बातचीत की गुहार लगाता रहता है लेकिन भारत के प्रति खून में रमी घृणा को नहीं निकाल रहा।   

लेखक 
वर्ष 2018 के चुनाव में प्रोग्रेसिव पार्टी ऑफ़ मालदीव के अब्दुल्ला यामीन को हरा कर भारत का समर्थन करने वाले इब्राहिम मोहम्मद सोलिह (मालदिवियन डेमोक्रेटिक पार्टी) राष्ट्रपति बने सोलिह की पार्टी को 58.38% वोट मिला था जबकि अब्दुल्ला यामीन की पार्टी को मात्र 41.62% वोट मिले थे

वर्ष 2019 में प्रोग्रेसिव पार्टी ऑफ़ मालदीव को तोड़ कर 31 जनवरी को यामीन अब्दुल गयूम ने Peoples National Congress (PNC) का गठन किया और इसके नेता मोहम्मद मुइज़्ज़ू ने भारत विरोधी प्रोपैगैंडा पर चुनाव लड़ा जिसमे वह पूरी तरह चीन के साथ खड़ा नज़र आया जनता ने PNC नेता मोहम्मद मुइज़्ज़ू को 54.06% वोट देकर सत्ता की बागडोर उसके हाथ में दे दी जबकि पिछले चुनाव (2018 के) में 58.38% वोट पाने वाले इब्राहिम मोहम्मद सोलिह की पार्टी को केवल 45.96% वोट मिले, यानी पिछली बार से करीब 13% कम और यह बहुत बड़ी संख्या होती है किसी भी चुनाव में

शत प्रतिशत सुन्नी मुस्लिम देश मालदीव की जनता ने इस बार भारत विरोधी को सत्ता दी है - अब्दुल्ला यामीन मुइज़्ज़ू का mentor है लेकिन अभी भ्रष्टाचार के आरोपों में 11 साल की सजा भुगत रहा है जिसे  मुइज़्ज़ू  माफ़ करने के मूड में है - चीन की लंबी यात्रा पर निकला मुइज़्ज़ू कितना बटोर कर लाएगा, यह समय ही बताएगा लेकिन चीन मालदीव को अपने कब्जे में रखने की ही कोशिश करेगा जैसे पाकिस्तान और अन्य देशों के साथ कियावह बात अलग है पाकिस्तान आज मालदीव के लिए तड़प रहा है शायद इसलिए कि 100% सुन्नी मुस्लिम देश है मालदीव

मालदीव के विपक्ष ने मोहम्मद मुइज़्ज़ू सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने का फैसला किया है उसका अंजाम क्या होगा, ये वहां की राजनीति पर निर्भर करता है परंतु मालदीव के लिए आने वाला समय कठिन होगा

जो भी मालदीव की जनता ने किया, वह उसके लिए जिम्मेदार होगी लेकिन मालदीव भारत के लक्षद्वीप के लिए वरदान बन जाएगा प्रधानमंत्री मोदी पहले ही 1200 करोड़ के प्रोजेक्ट शुरू कर आये हैं और कल टाटा ग्रुप ने लक्षद्वीप में 2 Taj Branded Resorts बनाने की घोषणा कर दी - दोनों में 110 - 110 कमरे होंगे ( एक में 60 villas, 50 water villas) और दूसरे में (75 beach villas, 35 water villas) 

अब चाहे तो विपक्ष कह सकता है मोदी ने लक्षद्वीप टाटा को बेच दिया लेकिन टाटा के अलावा भी  सकता है अन्य और ग्रुप भी होटल खोलें जिससे लक्षद्वीप के लोगों को भरपूर रोजगार मिलेगा कोई नौकरी चाहे तो राहुल “कालनेमि” को भी मिल सकती है। मालदीव यदि भारत विरोध में खड़ा न होता तो शायद लक्षद्वीप में इतना विकास न होता जो अब होगा

श्री राम मंदिर एक ही बार बनेगा, वो बन कर रहेगा, फिर इतने “नाराज़ फूफा” क्यों हैं?

                                                                                                  साभार 
सुभाष चन्द्र

चाहे राम भक्त हों या राम मंदिर से विमुख बैठे “नाराज़ फूफा” हों, सबके लिए श्री राम मंदिर केवल एक बार ही बनेगा और वह तो बन कर रहेगा जिसमें भगवान राम की प्राण प्रतिष्ठा भी होकर रहेगी, फिर रंग में भंग डालने का क्या औचित्य है, यज्ञ में आहुति डालने की जगह यज्ञ विध्वंस करने का काम तो राक्षस प्रवत्ति के लोगों का होता है। जिस कारण भगवान विष्णु को राम रूप में धरती पर आना पड़ा। संभव है कि कलयुगी रक्षक इतने वर्षों से अयोध्या में रामजन्मभूमि मन्दिर का विरोध करते आ रहे हैं। श्रीराम विरोधियों को नहीं मालूम की रावण को भी अंतिम समय "श्रीराम" कहना पड़ा था। 

लेखक 

राम रावण युद्ध में अनेक प्रसंग हैं जिनमे देखा गया था जब रावण की सेना और लंकावासियों ने भगवान राम की सराहना की थी जब मेघनाथ का पार्थिव शरीर लंका भेजा गया था तो उसे भगवान राम ने अपने वस्त्र से ढक कर भेजा था और तब लंकावासियों ने कहा था राम कितने भले इंसान हैं उन्होंने युवराज के शव का भी आदर किया है, लेकिन आज की “लंकिनी” की सेना में एक भी ऐसा नहीं है जिसे श्री मंदिर निर्माण और प्राण प्रतिष्ठा में कुछ भी अच्छा नज़र आ रहा हो, हर कोई यज्ञ में हड्डियां डालने को आतुर है

राजनीतिक दलों के लोगों की मति भी लगता है भगवान राम ने भ्रष्ट कर दी है उन्हें कुछ नहीं सूझ रहा, जिसके मुंह में जो आ रहा है वह बोल रहा है उसके अलावा सबसे ज्यादा दुःख की बात है कि सभी शंकराचार्यों ने प्राण प्रतिष्ठा समारोह में न जाने का फैसला किया है द्वारका के शंकराचार्य अविमुक्त आनन्द में स्वरूपानंद की आत्मा वास करती है लेकिन पुरी के शंकराचार्य निश्चलानंद सरस्वती कह रहे हैं कि मोदी पूजा करेगा तो वह कैसे ताली बजाएंगे, यह मंदिर विनाश लाएगा  

कोई इन शंकराचार्यों से पूछे कि श्री राम मंदिर बनाने के लिए आपने क्या योगदान किया है और आज तक हिन्दू समाज के लिए आपने क्या क्या पुण्य कार्य किये हैं जबकि आपके मठों में पैसे की कमी नहीं है कोई शंकराचार्य, कोई गुरु, कोई जाति, कोई नेता या कोई भी समाज भगवान राम से बड़ा नहीं हो सकता लेकिन आज समाज के ऐसे प्रबुद्ध लोग रामकाज में अड़ंगे डालने का प्रयास कर रहे हैं राजनेताओं का तो समझ आता है कि वह अपनी दुकान चलाए रखने की राजनीति के लिए विरोध कर रहे हैं लेकिन धर्माचार्यों का ऐसा आचरण समझ से परे है

चाहे नेता हो या धर्माचार्य, सबका मकसद बस मोदी विरोध है, बस मोदी को श्री राम मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा नहीं करनी चाहिए एक ढकोसला शुरू किया हुआ है कि राम तो सबके हैं, भाजपा अपना कार्यक्रम कैसे बना सकती है ठीक है भाई, राम सबके हैं, तो फिर विपक्ष बताए उसने मंदिर निर्माण के लिए क्या किया था और क्या भगवान राम को काल्पनिक नहीं कहा था आज वह काल्पनिक राम आपका हो सकता है, हमारे लिए तो सत्य सनातन श्री राम हमारे हैं

जो नेता भगवान राम का अपमान कर रहे हैं, सबसे पहले उनकी सुरक्षा हटा देनी चाहिए, उनकी सुरक्षा पर जनता का पैसा खर्च नहीं होना चाहिए वो लोग जब जन-जन के स्वामी भगवान राम का अपमान कर सकते हैं तो उन्हें भक्तो के बीच में खुला छोड़ देना चाहिए आप संयम नहीं रख सकते बोलते हुए तो भक्तों को भी संयम रखने के लिए बाध्य नहीं होना चाहिए

अभी तो श्री राम लला की प्राण प्रतिष्ठा हुई नहीं है लेकिन अभी से अयोध्या जी में श्रद्धालुओं का सैलाब दिखाई दे रहा है जिसमें विपक्ष की फैलाया हुआ जात पात का जहर दिखाई नहीं दे रहा।अपनी दुकान चलाने के लिए जात-पात इन्ही पाखंडियों द्वारा फैला हुआ है। मंदिर उद्घाटन के बाद जो प्रचंड सैलाब उमड़ेगा तब क्या होगा, विपक्ष को चिंता यह है क्योंकि वह मोदी को 400 पहुंचाने में मदद करेगा 

शंकराचार्यों को पुनर्विचार करना चाहिए वरना फिर हिन्दू समाज उन पर पुनर्विचार करने के लिए बाध्य होगा शंकराचार्य समाज से से हैं, समाज उनसे नहीं है। यदि समय रहते शंकराचार्य नहीं चेते निश्चित रूप से वह दिन भी अधिक दुर नहीं होगा, जब सनातनी प्रेमियों द्वारा उनका उपहास होना उन्हें शून्य में ले आएगा। राजनेता तो किसी न किसी बहाने अपनी दुकान को चलाने के लिए कोई तिकड़म कर लेंगे, जिसका समस्त बीजेपी विरोधियों द्वारा I.N.D.I.गठबंधन एक उदाहरण है। इनको मालूँम है राममंदिर पालिका से लेकर लोक सभा चुनावों तक उनकी दुकान को भारी नुकसान होने वाला है।  

लोकनायक' होने के भ्रम से जूझते विपक्षी नेता

 

डॉ राकेश कुमार आर्य, मुख्य संपादक, उगता भारत, गाज़ियाबाद 

अभी हाल ही में संपन्न हुए पांच राज्यों की विधानसभा के चुनावों में जिस प्रकार वहां के मतदाताओं ने देश के विपक्ष का सफाया किया है उससे सारा विपक्ष इस समय सदमे की अवस्था में है। विपक्ष के सभी बड़े नेताओं को चुनाव परिणाम के पश्चात सांप सूंघ गया था। उन्हें समझ नहीं आ रहा था कि जनता से संवाद करने के लिए किस प्रकार आगे बढ़ा जाए? तीन दिन पश्चात जाकर नेताओं ने जनता से मुंह छुपाने के स्थान पर स्वयं को पुनः स्थापित करने के दृष्टिकोण से प्रेरित होकर जनता को फिर भ्रमित करने का प्रयास करते हुए उससे संवाद स्थापित करने का बहाना ईवीएम को गाली देते हुए खोजा।

ज्ञात हो, देश में ईवीएम से चुनाव प्रक्रिया को लागू करते समय इसी कांग्रेस और इसके समर्थक दलों ने देश को विकासशील होने की संज्ञा दी थी, और आज यही पार्टियां ईवीएम पर प्रश्नचिन्ह लगाए जाने से स्वयं अपने आपको दोगला या कहें कि गिरगिट की तरह रंग बदलू सिद्ध कर रहे हैं। यानि जब तक ये लोग सत्ता में थे, यही ईवीएम अच्छी ही नहीं विश्वनीय थी, लेकिन जब इसी ईवीएम ने 2014 में इन्हे सत्ता से बाहर कर दिया, ख़राब हो गयी। 

विपक्ष अपनी विश्वनीयता खोने का खुद जिम्मेदार है, पूछिए क्यों? क्योकि चुनाव से पूर्व सनातन धर्म को अपमानित करते हैं, फिर चुनावी दिनों में मंदिर जाने का ढोंग रचते हैं। इतिहास साक्षी है, सनातन विरोधियों का विश्व में आज तक कोई नामलेवा नहीं।  

वास्तव में भारत के लोकतंत्र की सबसे बड़ी त्रासदी ही यह है कि यहां नेता सामने दीवार पर लिखी इबारत को न पढ़कर जनता को भ्रमित करने में लगे रहते हैं। इनके भीतर संघर्ष करने और जनता के हितों के लिए जूझने की प्रवृत्ति समाप्त हो गई है। देश के विपक्ष के पास इस समय राजनेताओं का अभाव है, यद्यपि उसके पास राजनीतिज्ञों की भरमार है। ये नेता जानते हैं कि इस समय देश के भीतर इतनी अधिक जनसमस्याएं हैं कि कोई भी पार्टी सत्ता में अधिक देर तक रह नहीं सकती। क्योंकि 5 वर्ष में ही सत्तासीन पार्टी से लोगों का मोह भंग हो जाता है और वे अपनी समस्याओं को निपटवाने या सुलझवाने के दृष्टिकोण से प्रेरित होकर फिर किसी दूसरे राजनीतिक दल को अवसर दे ही देते हैं। भारतीय लोकतंत्र की इस विडंबना को ही कुछ राजनीतिक दलों ने अपने लिए सौभाग्य में परिवर्तित करके देखना आरंभ कर दिया है। जिससे उनके भीतर निष्क्रियता का भाव पैदा हुआ है।

यदि इस समय के विपक्ष की बात करें तो वह निष्क्रियता के साथ-साथ 'विचारहीनता' की स्थिति में भी डूबा हुआ है और इस स्थिति में ही सत्ता में लौटने के सब्जबाग देख रहा है। राजनीति में विचारहीनता तब आती है जब राजनीतिक दलों और उनके नेताओं को कोई ठोस मुद्दा नहीं मिलता है और वे मुद्दों के लिए इधर-उधर भटकते हुए दिखाई देते हैं। अपनी इस भटकन के वशीभूत होकर अधिकांश नेता जब जनता को बरगलाने और बहकाने की बात करते हुए दिखाई दें तब समझना चाहिए कि उनके पास इस समय कोई ठोस विचार नहीं है। वे विचारहीनता के उस भंवर जाल में फंस चुके हैं , जिससे निकलना अब उनके लिए संभव नहीं रहा है।

इस समय भी कई नेता ऐसे हैं जो या तो किसी जयप्रकाश नारायण को ढूंढ रहे हैं या स्वयं को ही जयप्रकाश नारायण का अवतार दिखाने का कार्य कर रहे हैं। इस दिशा में बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का नाम सर्वोपरि है। उन्होंने अपने बारे में  अपने आप ही यह भ्रम पाल लिया है कि वह लोकनायक जयप्रकाश नारायण के अवतार के रूप में इस समय अवतरित हो चुके हैं। अपने इस भ्रम को वह 'लोकभ्रम' के रूप में परिवर्तित करने को आतुर दिखाई देते हैं। उनकी जिद है कि जिस भ्रम में वह जी रहे हैं उसी में देश का मतदाता जीने के लिए बाध्य हो जाए और उन्हें लोकनायक मान ले। इस सब के उपरांत भी उनका सबसे बड़ा दुर्भाग्य यह  है कि उन्हें अपनी पार्टी और अपने गठबंधन के लोगों ने भी इस रूप में स्वीकार नहीं किया है। यही कारण रहा कि उन्होंने 'इंडिया गठबंधन' को जन्म देकर भी उससे किनारा कर लिया। वह इस घमंड में आ गए कि यदि मैं नहीं तो बकौल प्रधानमंत्री मोदी के 'घमंडिया गठबंधन' भी नहीं। 

यदि कांग्रेस के नेता राहुल गांधी की बात करें तो वह भी नीतीश कुमार से कम नहीं हैं। उन्होंने इस भ्रम को पाल लिया था कि वर्तमान परिस्थितियों में मध्य प्रदेश उन्हें इसलिए मिल जाएगा कि वहां पर सत्ता विरोधी लहर चलेगी और शिवराज सिंह चौहान को जनता उखाड़कर राज कमलनाथ के हाथों में दे देगी। पर ऐसा हुआ नहीं। राजस्थान के बारे में भी संभवत: उनको यह भ्रम हो गया था कि वहां इस बार रिवाज बदलेगा, राज नहीं।

इसके साथ ही वह छत्तीसगढ़ को अपना मानकर चल रहे थे और तेलंगाना को भी अपनी झोली में आता हुआ देख रहे थे। खैर, तेलंगाना तो कांग्रेस के पक्ष में आ गया, लेकिन इसकी जिम्मेदार बीजेपी शीर्ष नेतृत्व है। अगर टी राजा सिंह को पार्टी से निष्कासित करने की बजाए सिंह के समर्थन में खड़ी होती, उस स्थिति में भाजपा को कम से कम 20 सीटें अधिक होती। 

उनकी सोच थी कि जब चार राज्यों में उनकी सरकार बन जाएगी तो सारा 'इंडिया गठबंधन' उनके पीछे लगने के लिए मजबूर हो जाएगा और वह विपक्ष का नेतृत्व करते हुए लोकनायक जयप्रकाश नारायण के रूप में उभर कर सामने आएंगे। अब उनका भी वही हश्र हो गया है जो वर्तमान के बिहारी बाबू अर्थात नीतीश कुमार का हुआ है। बिहारी बाबू की दुनिया उजड़ चुकी है । उनके सपनों पर पानी फिर गया है। उन्होंने समझ लिया है कि दिल्ली दूर ही नहीं , दिल्ली असंभव है। राहुल गांधी को समझ आ गया है कि दिल्ली अभी दूर है। इसी समय सपा के अखिलेश यादव सहित उन जैसे कई नेताओं को भी समझ में आ गया है कि संभल कर नहीं चले तो केंद्र के साथ-साथ प्रदेश भी हाथों से चले जाएंगे। 

2024 के चुनावों के बारे में विपक्ष को समझ लेना चाहिए कि लोग अब यह भी देख रहे हैं कि किस पार्टी के सत्ता में आने पर समाज में अराजकता फैलती है या अराजक तत्वों को बढ़ावा मिलता है ? विपक्ष को ईमानदारी से इन्हीं चीजों पर आत्मावलोकन करना चाहिए। उन्हें यह समीक्षा करनी चाहिए कि उनके शासन में किसी वर्ग विशेष को बढ़ावा मिलता है या नही? हकीकत यह है कि गठबंधन में शामिल सभी दलों के बीच 36 का आंकड़ा बना हुआ है।  अस्तित्व को कोई घटक खोने को तैयार नहीं। 

जब शासन में बैठे लोग पक्षपाती हो जाते हैं तो जनता का भला नहीं हो पाता है।  बात उत्तर प्रदेश की करें तो यहां पर सपा के शासनकाल में एक वर्ग विशेष को आतंक फैलाने की छूट मिलती है जिसे लोग भली प्रकार समझ चुके हैं। पार्टी के कार्यकर्ता जिस प्रकार लोगों के साथ बदतमीजी करते हैं उसे भी इस पार्टी के खिलाफ माहौल बनाने में प्रयोग किया जाता है। यही स्थिति बंगाल में टीएमसी की है। वहां की नेता ममता बनर्जी जिस प्रकार हिंदुओं पर खुला अत्याचार करती हैं , वह किसी से छुपा नहीं है। ममता बनर्जी चाहे कितना ही इंडिया गठबंधन को मजबूत करने की बात करती हों पर जब उनकी कार्य शैली को देश के अन्य प्रांतों का हिंदू देखता है तो वह न केवल ममता बनर्जी से दूरी बनाता है अपितु उस मंच से भी दूरी बनाने की सोच लेता है जिस पर वह दिखाई देती हैं। यही कारण है कि ममता बनर्जी को भी देश का जनमानस लोकनायक जयप्रकाश नारायण के अवतार के रूप में नकार चुका है। 

ऐसी परिस्थितियों में यह स्पष्ट रूप से कहा जा सकता है कि देश के विपक्ष के पास इस समय नेतृत्व का अभाव है । सर्वमान्य छवि का कोई भी नेता विपक्ष के पास नहीं है। अपनी इस कमजोरी को सारा विपक्ष जानता है। पर दुख की बात यह है कि जानकर भी वह अपने सत्ता स्वार्थ में इतना डूबा हुआ है कि एक दूसरे की टांग खींचने से उस समय भी बाज नहीं आ रहा है जब वह अपने आप को प्रधानमंत्री मोदी का विकल्प बताकर लोगों के बीच प्रस्तुत कर रहा है। इससे पहले कि विपक्ष 2024 के चुनाव परिणाम आने के बाद फिर ईवीएम पर दोषारोपण करे वह समय रहते सावधान होकर अपने गिरेबां में झांके और अपने तरकश को कारगर तीरों से भरकर अपने सामने खड़ी चुनौती को ढाने का प्रयास करे। 

(लेखक सुप्रसिद्ध इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं।)

मुग़लों और अंग्रेजों से खतरनाक था कांग्रेस का शासन, हिंदुओं के खिलाफ लाए थे 6 काले कानून! सेकुलरिज्म के नाम पर हिन्दुओं के साथ धोखा

                                                                                                                                        साभार 
आजादी के बाद कांग्रेस ने हिंदुओं को हीनभावना से ग्रसित करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। उसने हिंदुओं के मन में एक सोच भरने की साजिश रची कि अगर कोई मुस्लिम किसी हिंदू को थप्पड़ मारता है तो हिंदू को उसे सहज स्वीकार कर लेना चाहिए क्योंकि वो अल्पसंख्यक हैं। लेकिन अगर कोई हिंदू बदले में मुस्लिम को थप्पड़ मारता है तो यह बहुत बड़ा अपराध है। 80 के दशक तक हिंदुओं के मन में यही भरा जा रहा था लेकिन उसके बाद आरएसएस और बीजेपी राष्ट्रीय फलक पर आए और उन्होंने हिंदुओं के सामने कांग्रेस के गंदे खेल का पर्दाफाश किया और हिंदुओं को पलटवार करना सिखाया। हिंदू स्वभाव से क्षमा करने वाले हैं लेकिन कांग्रेस साजिश के तहत हिंदुओं को क्षमाप्रार्थी बनाना चाहती है, भाजपा उन्हें क्षमा नहीं मांगने वाला, निर्भीक और निडर बनाना चाहती है। हिंदुओं को बांटने की यह लड़ाई अभी भी जारी है। कांग्रेस ओबीसी मुद्दा उठाकर हिंदुओं को बांटना चाहती है जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा सनातन संस्कृति की रक्षा कर हिंदुओं को एकजुट करना चाहती है।

हिंदू कोड बिल 1956

हिंदू कोड बिल को लेकर राजेंद्र प्रसाद ने किया था नेहरू का विरोध
आजादी के बाद प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू की सरकार ने पहली लोकसभा में 1955-56 में हिंदू कोड बिल्स पास किए। नेहरू कैबिनेट ने बिल को चार भागों में बांटकर पारित किया। वे बिल थे – हिंदू मैरिज एक्ट 1955, हिंदू सक्सेशन एक्ट 1956, हिंदू अडॉप्शन एंड मेंटेनेंस एक्ट 1956 और हिंदू माइनोरिटी एंड गार्डियनशिप एक्ट 1956। इस बिल को लेकर डॉ. राजेंद्र प्रसाद और पंडित जवाहर लाल नेहरू के बीच राजनीतिक मतभेद उत्पन्न हो गया था। इसकी एक बड़ी वजह दोनों का धर्म को लेकर रवैया था। अक्टूबर 1947 में संविधान सभा में अंबेडकर ने इसका मसौदा पेश किया। नेहरू ने उसका समर्थन किया। इसके तहत सभी हिंदुओं के लिए एक नियम संहिता बनाई जानी थी। इसी के तहत विवाह, विरासत जैसे विवादों पर फैसला होना था। इसके तहत हिंदुओं के लिए एक विवाह की व्यवस्था की जानी थी, और भी कई नियम थे। डॉ. राजेंद्र प्रसाद ने बतौर संविधान सभा का अध्यक्ष इसमें दखल दिया। उनका कहना था कि इस तरह के नियमों पर पूरे देश में जनमत तैयार किया जाना चाहिए। उसके बाद ही कानून बनाया जाना चाहिए। उनका तर्क था कि परंपराएं कई रूप में प्रचलित हैं और इससे संबंधित सभी वर्गों को साथ में लिए बिना नियम सफल नहीं होगा।

सरदार पटेल, श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने किया था पुरजोर विरोध
गृह मंत्री सरदार पटेल, श्यामा प्रसाद मुखर्जी जो हिंदू महासभा से संबंधित थे, कांग्रेसी नेता पंडित मदन मोहन मालवीय ने हिंदू कोड बिल का पुरज़ोर तरीके से विरोध किया था। कांग्रेस अध्यक्ष पट्टाभि सीतारमैया ने बिल का बहिष्कार यह कहते हुए किया कि आनेवाले चुनावों में इस बिल का नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने इस बिल का बहिष्कार यह कहते हुए किया था कि यह बिल हिंदू संस्कृति को टुकड़ों में बांट देगा। यहां तक कि जो महिलाएं हिंदू महासभा से जुड़ी हुई थीं उन तक ने इस बिल का बहिष्कार किया था। ऑल इंडिया हिंदू वीमेन कांफ्रेंस की अध्यक्ष जानकी बाई जोशी ने राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद को पत्र लिखते हुए कहा था कि प्रस्तावित विधेयक संस्कार विवाह को संविदात्मक बनाकर हिंदुओं की परिवार व्यवस्था को ही नष्ट कर रहा है। वहीं, खुद राजेंद्र प्रसाद का ये मानना था कि हिंदू कोड बिल हिंदुओं के व्यक्तिगत कानूनों में दखल दे रहा है जिससे चुनिंदा ‘प्रगतिशील’ लोगों को ही फायदा होगा।

हिंदू दर्शन, कला और संस्कृति को सीखने का केंद्र थे मंदिर
मंदिर हमेशा से ही हिंदू सभ्यता और संस्कृति के केंद्र रहे थे। हमारी सभ्यता इन्हीं मंदिरों की वजह से फलती-फूलती रही। मंदिर केवल पूजा का स्थान नहीं थे। बल्कि, हिंदू दर्शन, कला और संस्कृति को सीखने का केंद्र थे। सभी राजाओं ने अपने समय में मंदिरों का निर्माण किया। और, ये मंदिर ही मुगल और अंग्रेजों के समय विरोध का भी केंद्र बने। मुगलों ने मंदिरों को तोड़ने की कोशिशें की, लेकिन उस पर नियंत्रण नहीं कर सके। समय-समय पर ईस्ट इंडिया कंपनी और अंग्रेजों ने भी ऐसा ही करना चाहा। लेकिन, वो नाकाम रहे। 1863 में अंग्रेजों ने एक एक्ट लाकर हिंदू मंदिरों को स्वतंत्र कर दिया। जिसके चलते मंदिर स्वतंत्रता सेनानियों की बैठकों की जगह बन गए।

भारत के अधिकांश मंदिरों पर सरकारों का नियंत्रण
भारत के अधिकांश मंदिरों पर सरकारों का नियंत्रण है। लेकिन, इसी देश में वक्फ एक्ट के तहत वक्फ बोर्ड को इतनी असीमित ताकतें दी गई हैं कि वो तमिलनाडु के तिरुचेंथुरई में स्थित एक 1500 साल पुराने मंदिर समेत पूरे गांव पर ही दावा ठोक सकता है। इस मामले के सामने आने के बाद से ही वक्फ एक्ट लगातार चर्चा में बना हुआ है। दरअसल, वक्फ बोर्ड एक अलग निकाय है, जिसकी संपत्तियों पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं है। इसके बाद आंध्र प्रदेश, राजस्थान और कई अन्य राज्यों ने भी ऐसे ही एक्ट लाकर राज्य के मंदिरों और उसकी वित्तीय चीजों पर अधिकार कर लिया। आज 15 राज्यों ने भारत के 4 लाख मंदिरों पर अपना नियंत्रण कर लिया है। भारत में करीब 9 लाख मंदिर हैं।

पूजा स्थल कानून 1991

राम मंदिर आंदोलन की तरह अन्य आंदोलन न हो इसलिए लाया गया पूजा स्थल कानून
1991 में लागू किया गया यह प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट कहता है कि 15 अगस्त 1947 से पहले अस्तित्व में आए किसी भी धर्म के पूजा स्थल को किसी दूसरे धर्म के पूजा स्थल में नहीं बदला जा सकता। यदि कोई इस एक्ट का उल्लंघन करने का प्रयास करता है तो उसे जुर्माना और तीन साल तक की जेल भी हो सकती है। यह कानून तत्कालीन कांग्रेस प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव सरकार 1991 में लेकर आई थी। यह कानून तब लाया गया जब राम मंदिर आंदोलन अपने चरम सीमा पर भी पहुंचा था। इस आंदोलन का प्रभाव देश के अन्य मंदिरों और मस्जिदों पर भी पड़ा। उस वक्त अयोध्या के अलावा भी कई विवाद सामने आने लगे। बस फिर क्या था इस पर विराम लगाने के लिए ही उस वक्त की कांग्रेस की नरसिम्हा राव सरकार ये कानून लेकर आई थी।

प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट धारा- 2
यह धारा कहती है कि 15 अगस्त 1947 में मौजूद किसी धार्मिक स्थल में बदलाव के विषय में यदि कोई याचिका कोर्ट में पेंडिंग है तो उसे बंद कर दिया जाएगा।

प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट की धारा- 3
इस धारा के अनुसार किसी भी धार्मिक स्थल को पूरी तरह या आंशिक रूप से किसी दूसरे धर्म में बदलने की अनुमति नहीं है। इसके साथ ही यह धारा यह सुनिश्चित करती है कि एक धर्म के पूजा स्थल को दूसरे धर्म के रूप में ना बदला जाए या फिर एक ही धर्म के अलग खंड में भी ना बदला जाए।

प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट की धारा- 4 (1)
इस कानून की धारा 4(1) कहती है कि 15 अगस्त 1947 को एक पूजा स्थल का चरित्र जैसा था उसे वैसा ही बरकरार रखा जाएगा।

प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट की धारा- 4 (2)
धारा- 4 (2) के अनुसार यह उन मुकदमों और कानूनी कार्यवाहियों को रोकने की बात करता है जो प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट के लागू होने की तारीख पर पेंडिंग थे।

प्लेस ऑफ वर्शिप एक्ट की धारा- 5
धारा- 5 में प्रावधान है कि यह एक्ट रामजन्मभूमि-बाबरी मस्जिद मामले और इससे संबंधित किसी भी मुकदमे, अपील या कार्यवाही पर लागू नहीं करेगा।

आर्टिकल 25- धर्म परिवर्तन को मान्यता
वर्ष 1950 में संविधान में आर्टिकल 25 शामिल किया गया। इसमें धर्म परिवर्तन को मान्यता दी गई। इससे सबसे ज्यादा नुकसान हिंदुओं को हुआ क्योंकि हिंदु धर्म के लोगों का ही सबसे अधिक धर्म परिवर्तन कराया गया। भारत के संविधान में धर्मांतरण को लेकर कोई स्पष्ट अनुच्छेद नहीं है। अनुच्छेद 25 से लेकर 28 के बीच धार्मिक स्वतंत्रता का जिक्र किया गया है। इसमें बताया गया है कि अपनी स्वेच्छा से भारत के हर व्यक्ति को किसी भी धर्म को मानने, पालन करने और प्रचार-प्रसार करने की आजादी है।

आर्टिकल 28 – हिंदुओं से धार्मिक शिक्षा का हक छीना
जवाहरलाल नेहरू ने अंग्रेजों की ही तरह आजादी के बाद भी दबाना जारी रखा। आर्टिकल 28 के जरिये हिंदुओं की धार्मिक शिक्षा का अधिकार ही छीन लिया गया। एक तरफ हिंदूओं से धार्मिक शिक्षा का अधिकार छीना गया वहीं दूसरी तरफ आर्टिकल 30 के तहत मुसलमान और अल्पसंख्यक धार्मिक शिक्षा ले सकते हैं।

वक्फ बोर्ड कानून-1995
वक्फ बोर्ड कानून से बढ़ा देशभर में लैंड जिहाद 
1954 में वक्फ की संपत्ति और उसके रखरखाव के लिए वक्फ एक्ट-1954 बनाया गया था। कोई भी ऐसी चल या अचल संपत्ति वक्फ की हो सकती है, जिसे इस्लाम को मानने वाला कोई भी व्यक्ति धार्मिक कार्यों के लिए दान कर दे। देशभर में वक्फ की संपत्तियों को संभालने के लिए एक केंद्रीय और 32 स्टेट वक्फ बोर्ड हैं। 1995 में वक्फ कानून में संशोधन करते हुए वक्फ बोर्ड को असीमित शक्तियां दे दी गईं। आज इसी शक्ति की वजह वक्फ और मुसलमान समुदाय देशभर में लैंड जिहाद चला रहा है। कानून कहता है कि यदि वक्फ बोर्ड किसी संपत्ति पर अपना दावा कर दे, तो उसे उसकी संपत्ति माना जाएगा। वक्फ संपत्तियों के रखरखाव के लिए जिस तरह की कानूनी व्यवस्था की गई, वैसी व्यवस्था हिंदू, जैन, बौद्ध, सिख, ईसाई या अन्य किसी पंथ के अनुयायियों के लिए नहीं है। यह पंथनिरपेक्षता, एकता एवं अखंडता की भावना के विपरीत है।

वक्फ ट्रिब्यूनल न्याय की व्यवस्था के विरुद्ध
संविधान ने तीन तरह के न्यायालयों की व्यवस्था की है। अनुच्छेद 124-146 के तहत संघीय न्यायपालिका, अनुच्छेद 214-231 के तहत हाई कोर्ट और अनुच्छेद 233-237 के तहत अधीनस्थ न्यायालय। संविधान निर्माताओं की मंशा थी कि सभी तरह के नागरिक विवाद संविधान के तहत बनी न्यायपालिकाओं में ही सुलझाए जाएं। ऐसे में वक्फ ट्रिब्यूनल को लेकर इस अधिनियम में की गई व्यवस्था संविधान द्वारा प्रदत्त न्याय व्यवस्था के विरुद्ध है।

वक्फ बोर्ड अनुच्छेद 27 का स्पष्ट उल्लंघन
वक्फ बोर्ड में मुस्लिम विधायक, मुस्लिम सांसद, मुस्लिम आइएएस अधिकारी, मुस्लिम टाउन प्लानर, मुस्लिम अधिवक्ता, मुस्लिम बुद्धिजीवी और मुतावल्ली होते हैं। इन सभी को सरकारी कोष से भुगतान किया जाता है, जबकि केंद्र या राज्य सरकारें किसी मस्जिद, मजार या दरगाह की आय से एक भी रुपया नहीं लेती हैं। दूसरी ओर, केंद्र व राज्य सरकारें देश के चार लाख मंदिरों से करीब एक लाख करोड़ रुपये लेती हैं, लेकिन उनके लिए ऐसा कोई अधिनियम नहीं है। यह अनुच्छेद 27 का स्पष्ट रूप से उल्लंघन है, जिसमें व्यवस्था दी गई है कि किसी व्यक्ति को ऐसा कोई कर चुकाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है, जिसका प्रयोग किसी विशिष्ट धर्म या धार्मिक संप्रदाय की अभिवृद्धि के लिए हो।

वक्फ बोर्ड को मिले असीमित अधिकार समानत के सिद्धांत का उल्लंघन
वक्फ अधिनियम, 1955 की धाराओं 4, 5, 6, 7, 8, 9 और 14 में वक्फ संपत्तियों को विशेष दर्जा दिया गया है, जो किसी ट्रस्ट आदि से ऊपर है। हिंदू, जैन, बौद्ध, सिख, ईसाई व अन्य समुदायों के पास सुरक्षा का कोई विकल्प नहीं है, जिससे वे अपनी संपत्तियों को वक्फ बोर्ड की संपत्ति में शामिल होने से बचा सकें, जो एक बार फिर समानत को लेकर संविधान के अनुच्छेद 14, 15 का उल्लंघन है।

वक्फ के सामने हिंदुओं के संपत्ति के अधिकार भी सुरक्षित नहीं
अधिनियम की धारा 40 में वक्फ बोर्ड को अधिकार दिया गया है कि वह किसी भी संपत्ति के बारे में यह जांच कर सकता है कि वह वक्फ की संपत्ति है या नहीं। यदि बोर्ड को लगता है कि किसी ट्रस्ट, मुत्त, अखरा या सोसायटी की कोई संपत्ति वक्फ संपत्ति है, तो वह संबंधित ट्रस्ट या सोसायटी को नोटिस जारी कर पूछ सकता है कि क्यों न उस संपत्ति को वक्फ संपत्ति में शामिल कर लिया जाए। यानी संपत्ति का भाग्य वक्फ बोर्ड या उसके अधीनस्थों पर निर्भर करता है। यह अनुच्छेद 14, 15, 26, 27, 300-ए का उल्लंघन है।

वक्फ संपत्ति को लिमिटेशन एक्ट से भी छूट
वक्फ के रूप में दर्ज संपत्ति को रिकवर करने के लिए लिमिटेशन एक्ट के तहत भी कार्रवाई नहीं की जा सकती है। धारा 107 में वक्फ की संपत्तियों को इससे छूट दी गई है। इस तरह की छूट हिंदू या अन्य किसी भी संप्रदाय से जुड़े ट्रस्ट की संपत्तियों के मामले में नहीं है।

दीवानी अदालतों की सीमा से भी बाहर
धारा 83 के तहत ट्रिब्यूनल का गठन करते हुए विवादों की सुनवाई के मामले में दीवानी अदालतों का अधिकार छीन लिया गया है। संसद के पास ऐसा अधिकार नहीं है जिसके तहत वह ऐसा ट्रिब्यूनल गठित कर दे, जिससे न्याय व्यवस्था को लेकर संविधान के अनुच्छेद 323-ए का उल्लंघन होता हो। वक्फ बोर्ड को कई ऐसे अधिकार दिए गए हैं, जो इसी तरह के अन्य ट्रस्ट या सोसायटी के पास नहीं हैं।

कांग्रेस ने रामसेतु को बताया था काल्पनिक
कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार की ओर से 2008 में सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दाखिल कर रामसेतु को काल्पनिक करार देते हुए कहा, “वहां कोई पुल नहीं है। ये स्ट्रक्चर किसी इंसान ने नहीं बनाया। यह किसी सुपर पावर से बना होगा और फिर खुद ही नष्ट हो गया। इसी वजह से सदियों तक इसके बारे में कोई बात नहीं हुई। न कोई सुबूत है।” कांग्रेस द्वारा दाखिल किए गए इस हलफनामे का खूब विरोध हुआ था, जिसके बाद कांग्रेस ने इसे वापिस लिया और कहा कि वह सभी धर्मों का सम्मान करती है।

सेतुसमुद्रम प्रोजेक्ट के लिए रामसेतु पर थी खुदाई की योजना
कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए-1 सरकार ने 2005 में सेतुसमुद्रम शिपिंग कैनाल प्रोजेक्ट का ऐलान किया था। इसका प्रस्ताव डीएमके ने रखा था, गठबंधन की सरकार में डीएमके के पास जहाजरानी मंत्रालय था। सेतुसमुद्रम शिपिंग कैनाल प्रोजेक्ट के तहत बड़े जहाजों के परिवहन के लिए करीब 83 किलोमीटर लंबा नया रास्ता बनना था, जिसके लिए समुद्र में कम गहराई वाले हिस्से की खुदाई करनी थी। यह खुदाई रामसेतु की जगह पर भी होनी थी।

सातवीं सदी से 16वीं सदी तक मंदिरों की संपदा को लूटा गया

भारत के परम वैभव से आकर्षित होकर सातवीं सदी की शुरुआत से सौलहवीं सदी तक निरंतर हजारों हिन्दू, जैन और बौद्ध मंदिरों का न केवल विध्वंस किया गया बल्कि उसकी संपदा को भी लूट लिया गया। खासतौर पर ऐसे पूजास्थलों पर आक्रमण किया गया जो अपने विशालतम आकार से कहीं ज्यादा देश की गौरवशाली अस्मिता का प्रतीक थे। अपनेप्रत्येक आक्रमण में गजनवी ने सनातन धर्मियों केकितने ही छोटे-बड़े मंदिरों को अपना निशाना बनाया। मंदिरों में जमा धन को लूटा और मंदिरों को तोड़ दिया। वर्ष 725 में सिंध के अरब शासक अल-जुनैद ने महमूद गज़नी से पहले ही इस मंदिर में तबाही मचाई थी। जगन्नाथ मंदिर को 20 बार विदेशी हमलावरों द्वारा लूटे जाने की कहानी हो या सोमनाथ के संघर्ष के इतिहास से हर कोई रूबरू है। विदेशी आततातियों के इतने आक्रमण और लूटे जाने के बाद भी हिन्दुस्तान के मंदिर धार्मिक सहिष्णुता और समन्वय का अद्भुत उदाहरण आज भी बना हुए हैं। लेकिन कांग्रेस की सरकारों ने इस पर हमला जारी रखा।

मध्य प्रदेश : कमलनाथ सरकार के 15 महीने में मठ और मंदिरों की जमीन नीलाम करने की थी तैयारी, हुए आधा दर्जन से अधिक घोटाले

जब दीमक लगनी शुरू होती है, कभी पता नहीं चलता, जब तक वह कागजों और लकड़ी से बाहर नहीं आती। ठीक वही स्थिति कांग्रेस की सनातन को लेकर रही है, जो अब कुछ वर्षों से बड़ी तेजी से सामने आ रही हैं। इन्हें केवल सनातन धर्म में ही कमियां नज़र आती रही, जबकि अन्य मजहबों में सनातन से अधिक कमियां हैं, उनको दूर करना तो दूर, उनके विरुद्ध बोलने की हिम्मत नहीं किसी में नहीं हुई। तुष्टिकरण और छद्दम सेकुलरिज्म के नाम पर हिन्दुओं के विरुद्ध साज़िशें होती रही। जिनके विरुद्ध नरेंद्र मोदी के केंद्र में आने से पहले भाजपा तक में हिम्मत नहीं हुई। 

हिन्दुओं को भ्रमित करने राहुल गाँधी कोट पर जनेऊ पहन लेते हैं, प्रियंका हाथ में कलावा बांध लेती हैं, चुनावों में मंदिरों में पूजा करने का नाटक करती हैं, जबकि वही प्रियंका जब केरल जाती है बिना कलावा के। लेकिन चुनाव समाप्त होते ही समस्त भाजपा विरोधी अपने असली रंग में आ जाते हैं। हिन्दू धार्मिक स्थलों को विवादित बनाने वाले भी ये गैंग है। इस गैंग ने भारतवासियों को गलत इतिहास पढ़ाने का दुस्साहस किया है, और जब आज भारत का वास्तविक इतिहास उजागर होना शुरू हो रहा है, सनातन धर्म पर प्रहार किया जा रहा है। सत्य को झुठलाकर जितना अधिक सनातन पर प्रहार होगा, उतनी ही तेजी इन छद्दम सेक्युलरिस्ट, गंगा-जमुनी तहजीब का नारा लगाने वाले और तुष्टिकरण करने अपने पतन की ओर अग्रसर हो रहे हैं, जिसे ये गैंग समझ नहीं रहा। इस गैंग ने वोट ध्रुवीकरण कर शुरू कर दिया है। हिन्दुओं के धैर्य की अग्नि परीक्षा ली जा रही है, संयम को तोड़ने का दुस्साहस किया जा रहा है और जिस दिन हिन्दुओं के धैर्य की सीमा टूटी उसके दुष्कर एवं परिणामों के हिन्दू नहीं बल्कि ये हिन्दू विरोधी शत-प्रतिशत जिम्मेदार होंगे। तमिलनाडु के स्टालिन द्वारा सनातन पर कीजड़ फेंकने पर साधु-संत समाज का उग्र होना स्पष्ट संकेत दे रहा है।  

मध्य प्रदेश में विधानसभा चुनाव अब दहलीज पर आ चुका है। प्रदेश में दोनों प्रमुख पार्टियां भारतीय जनता पार्टी और इंडियन नेशनल कांग्रेस आमने सामने है। दोनों पार्टियां एक दूसरे को पटखनी देने के लिए दांव भिड़ा रही है। लेकिन जहां तक प्रदेश की जनता की बात है तो वे आज भी कमलनाथ सरकार के 15 महीने के कार्यकाल के दौरान हुए घोटाले का नाम सुनकर सिहर जाती है। वह चाहे सिंचाई परियोजनाओं में हुए घोटाले हो या इफको उर्वरक घोटाला, मोजर वेयर घोटाला हो या अगस्ता वेस्टेलैंड हेलिकॉप्टर घोटाले में पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के भांजे का नाम हो, महज 15 महीने के कार्यकाल में ही आधा दर्जन से अधिक घोटाले सामने आ गए। इन घोटालों से प्रदेश की जनता सचेत है।

मुख्यमंत्री रहते कमलनाथ का हिंदू विरोधी फैसला
दिसंबर 2018 से लेकर मार्च 2020 तक मध्य प्रदेश की सरकार चलाने वाले मुख्यमंत्री कमलनाथ पर भाजपा ने हिंदू विरोधी फैसले लेने का भी आरोप लगाया है। भाजपा नेता का कहना है कि कमलनाथ सरकार के धार्मिक न्यास और धर्मस्व विभाग द्वारा मंदिरों की जमीन नीलाम करने की तैयारी की थी। जो बाद में विवाद के रूप में सबके सामने आ गया। बीजेपी ने सरकार के इस प्रयास को हिंदू विरोधी करार दिया। उन्होंने कहा कि राज्य के धार्मिक न्यास और धर्मस्व विभाग के मंत्री पी.सी. शर्मा ने संवाददाताओं से बातचीत करते हुए माना कि राज्य के कई मंदिरों के पास हजारों एकड़ जमीन है, जिसका उपयोग नहीं हो रहा है. ऐसी जमीनों की नीलामी किए जाने पर विचार हो रहा है।

इस्तीफे के 15 दिन पहले हुआ मोबाइल घोटाला

मालूम हो कि दिसंबर 2018 में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री बने कमलनाथ को 20 मार्च 2020 को इस्तीफा देना पड़ा। हालांकि उनके इस्तीफे का तात्कालिक कारण पार्टी की अंतर्कलह बताई गई, लेकिन प्रदेश की जनता महज 15 महीने के उनके कार्यकाल के दौरान हुए कई घोटालों से त्रस्त आ चुकी थी। महज 15 महीने में ही आधा दर्जन से अधिक घोटालों को अंजाम दिया गया। बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष की मानें तो कमलनाथ मुख्यमंत्री पद को छोड़ते-छोड़ते मोबाइल घोटाले को अंजाम देते गए। इस घोटाले को तो उन्होंने अपने इस्तीफे 15 दिन पहले अंजाम दिया। घोटाला तो घोटाला कमलनाथ सरकार हिंदू विरोधी फैसले लेने के कारण प्रदेश में अलोकप्रिय हो गई थी। कमलनाथ सरकार के 15 महीने के दौरान प्रदेश में जो घोटाले हुए थे वो इस प्रकार है।

सिंचाई परियोजनाओ में 870 करोड़ का भुगतान घोटाला

कमलनाथ सरकार के 15 महीने के दौरान छह सिंचाई परियोजनाओं में 870 करोड़ रुपये भुगतान कर घोटाले को अंजाम दिया गया। यह सिर्फ आरोप नहीं है बल्कि इसका संज्ञान लेते हुए आर्थिक अन्वेषण ब्यूरो इस मामले की जांच भी कर रहा है। घोटाले को लेकर कमलनाथ सरकार की लोकप्रियता भी रसातल में पहुंच गई थी। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष का कहना है कि जितने घोटाले इस सरकार के दौरान हुई उतने तो कांग्रेस की दूसरी सरकारों में भी नही हुए।

63 हजार करोड़ का मोबाइल घोटाला

बीजेपी प्रदेश अध्यक्ष विष्णु दत्त शर्मा के मुताबिक मुख्यमंत्री कमलनाथ ने अपनी सरकार के गिरने से ठीक 15 दिन पहले 63 हजार करोड़ के मोबाइल घोटाले को अंजाम दिया। खास बात ये कि पूर्व मंत्री इमरती देवी के मना करने के बावजूद यह घोटाला किया गया।

 354 करोड़ का मोजर वेयर घोटाला

इस घोटाला मामले में तो प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते हुए कमलनाथ के भांजे अतुल पुरी को 2019 में ही केंद्रीय जांच एजेंसी प्रवंर्तन निदेशालय ने गिरफ्तार किया था। बैंक फ्रॉड केस में रतुल पुरी को गिरफ्तार किया गया। मालूम हो कि सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया की शिकायत पर सीबीआई ने कमलनाथ के भांजे रतुल पुरी के साथ ही उनके पिता दीपक पुरी और मां नीता पुरी के खिलाफ 354 करोड़ रुपये की ठगी और जालसाजी का केस दर्ज किया था।
450 करोड़ रुपये का छिंदवाड़ा परियोजना घोटाला
छिंदवाड़ा भाजपा के जिलाध्यक्ष विवेक साहू ने कमलनाथ सरकार पर एक सिंचाई परियोजना में 20 फरवरी 2020 से 15 मार्च 2020 के बीच 450 करोड़ रु. से ज्यादा का गलत भुगतान करने का आरोप लगाया है। उन्होंने वर्तमान सरकार से इस दौरान हुए भुगतान की जांच करने की मांग की है। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष कमलनाथ से पूछा है कि ‘छिंदवाड़ा परियोजना को लेकर अग्रिम 450 करोड़ रुपए आपकी सरकार रहते किसे दिए गए?
131 करोड़ रुपये का जनसंपर्क घोटाला
कमलनाथ सरकार के कार्यकाल के दौरान ही 131 करोड़ रुपये का जनसंपर्क घोटाला सामने आया। कहा जाता है कि इस मामले के तहत कमलनाथ सरकार ने कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह की पत्रकार रही पत्नी जिस मीडिया संस्थान में सहभागी बनी, उस मीडिया संस्थान को पैसे दिए।
25 हजार करोड़ का किसान कर्जमाफी घोटाला
मध्य प्रदेश के गृहमंत्री नरोत्तम मिश्रा ने आरोप लगाया है कि कमलनाथ की सरकार ने आखिर के 6 महीने में जो फैसले लिए हैं, उसकी शिवराज सरकार जांच करवा रही है। उन्होंने कहा कि किसान कर्ज माफी में बड़ा घोटाला हुआ है। यह सदी का सबसे बड़ा घोटाला है। किसान कर्जमाफी को लेकर प्रदेश में 25 हाजर करोड़ रुपये के घोटाले सामने आए हैं।
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1178 करोड़ रुपये के किसानों के गेहूं बोनस घोटाला
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में पीसीसी चीफ कमलनाथ के कई चौराहों पर पोस्टर लगाए गए है। इसमें कमलनाथ को वांटेड और करप्शन नाथ बताया गया है। उन पर मुख्यमंत्री रहने के दौरान 1178 करोड़ रुपये के गेहूं बोनस घोटाला का आरोप लगाया गया है। कहा गया है कि कमलनाथ सरकार ने किसानों को गेहूं पर बोनस देने के नाम पर उनके हक का पैसा मार लिया। इतना ही नहीं भाजपा के प्रदेश अध्य ने कमलनाथ पर हिंदू विरोधी काम करने का भी आरोप लगाया है।