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हर कब्र-दरगाह वक्फ की प्रॉपर्टी नहीं: सिर्फ इस्लाम से जुड़े होने के कारण बोर्ड नहीं कर सकता कब्जा: मद्रास हाई कोर्ट

                           दरगाह पर मद्रास हाईकोर्ट का फैसला (प्रतिकात्मक फोटो, साभार- chatgpt)
मद्रास हाई कोर्ट ने 5 जून को दरगाह और वक्फ बोर्ड की संपत्ति को लेकर अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट का कहना है कि किसी दरगाह का किसी जगह पर होना ही इस बात का सबूत नहीं है कि जिस जमीन पर वो है, वो वक्फ की प्रॉपर्टी बन जाए। कोर्ट ने साफ किया कि वक्फ बोर्ड को जमीन पर अपना हक साबित करने के लिए डॉक्यूमेंट्स और प्रोसिजर को फॉलो करना होगा।

240 साल पुरानी दरगाह से जुड़े मामले में मद्रास हाई कोर्ट ने देखा कि जमीन का ना तो वक्फ सर्वे हुआ था और न ही उसे वक्फ प्रॉपर्टी के तौर पर नोटिफाइड किया गया था। इसी आधार पर दरगाह के रजिस्ट्रेशन के आदेश को कोर्ट ने रद्द कर दिया।

तमिलनाडु वक्फ बोर्ड बनाम सैयद हबीबुल्लाह शाह कहदारी के मामले में न्यायमूर्ति के गोविंदराजन थिलाकवाड़ी ने कहा कि वक्फ बोर्ड को कानूनी रूप से भूमि पर स्वामित्व साबित करना होगा। कोर्ट ने कहा, किसी दरगाह होने मात्र से वह वक्फ बोर्ड के अधिकार क्षेत्र में नहीं आ जाता, जब तक कि कानून के मुताबिक वह भूमि वक्फ की संपत्ति माना न जाए।

न्यायाधीश ने इस बात पर जोर दिया कि हर कब्र या दरगाह अपने आप वक्फ की संपत्ति नहीं बन जाती। उन्होंने साफ किया कि मुस्लिम कानून के मुताबिक किसी धार्मिक उद्देश्य के लिए जब कोई मुस्लिम व्यक्ति अपनी संपत्ति को पूरी तरह से दे देता है, तब वह वक्फ बोर्ड का होता है।

कोर्ट ने तमिलनाडु वक्फ बोर्ड के प्रस्ताव को भी खारिज कर दिया, जिसमें ट्रिप्लिकेन में मौजूद सैय्यद हबीबुल्लाह शाह खदारी आरिफ रब्बानी हजरत दरगाह के लिए बोर्ड ने एक मुतवल्ली नियुक्त किया था। बोर्ड ने बगैर सर्वेक्षण पूरा किए वक्फ अधिनियम के तहत रजिस्ट्रेशन का भी निर्देश दिया था।

240 साल पुराने दरगाह का 40 साल से परिवार कर रहा देखरेख

ये मामला ट्रिप्लिकेन के 240 साल पुराने दरगाह से जुड़ा हुआ है।इसकी देखरेख याचिकाकर्ता का परिवार पिछले 40 साल से कर रहा है। उसने वक्फ बोर्ड के फैसले को कोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि जमीन लोक निर्माण विभाग की है, न की वक्फ बोर्ड की।

याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट में कहा कि वक्फ अधिनियम के तहत प्रक्रिया का पालन किए बगैर संपत्ति को वक्फ संपत्ति घोषित करने या किसी मुतवल्ली को नियुक्त करने का अधिकार वक्फ बोर्ड को नहीं है।

तमिलनाडु वक्फ बोर्ड ने कोर्ट में इसका विरोध करते हुए कहा कि भूमि और आसपास का क्षेत्र दरगाह का है और बाद में यह लोकनिर्माण विभाग में आ गया।

लोक निर्माण विभाग ने कोर्ट को बताया कि यह सरकारी भूमि था और इसे भारत स्काउट्स एंड गाइड्स को बिना किराए के आवंटित किया गया था। विभाग ने यह भी आरोप लगाया कि परिवार ने उसकी सहमति के बिना दरगाह की भूमि को धोखाधड़ी से पंजीकृत कराया था।

कोर्ट ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि ऐसा कोई प्रमाण नहीं है, जिससे साबित हो सके कि संपत्ति वक्फ बोर्ड की है। इसलिए वक्फ बोर्ड के दावे को खारिज कर दिया गया।

कोर्ट ने कहा कि हर कब्र और दरगाह को खुद ब खुद वक्फ संपत्ति नहीं माना जा सकता है और कोर्ट को निजी पारिवारिक कब्र और सार्वजनिक धार्मिक उद्देश्य वाली जमीन में अंतर करना होगा।

कोर्ट ने कहा, ” यदि किसी दरगाह का कभी सर्वेक्षण नहीं किया गया है, उसे पंजीकृत नहीं किया गया है या वक्फ के रूप में अधिसूचित नहीं किया गया है, तो वक्फ बोर्ड सामान्यतः केवल इसलिए स्वतः नियंत्रण ग्रहण नहीं कर सकता क्योंकि वह एक मुस्लिम धार्मिक संस्था है।”

वक्फ बोर्ड को किसी संस्था पर नियंत्रण रखने से पहले उस पर उसका अधिकार है, इससे जुड़े दस्तावेज और दूसरे सबूत देने होंगे। ऐसा कोई कानूनी दस्तावेज नहीं है, जिससे साबित हो कि संपत्ति वक्फ बोर्ड को दी गई थी या यह बोर्ड की संपत्ति थी। बिना सर्वे के दरगाह को पंजीकृत कराना गलत है

मुनंबम जमीन विवाद में केरल हाई कोर्ट ने वक्फ बोर्ड को दिया झटका, कहा- साधारण डीड से नहीं कर सकते कब्जा

                केरल उच्च न्यायालय ने वक्फ बोर्ड को फटकार लगाई (फोटो साभार - बार एंड बेंच/ऑनमनोरम)
केरल हाई कोर्ट ने एक अहम फैसले में कहा कि केरल वक्फ बोर्ड का 2019 में मुनंबम की विवादित जमीन को वक्फ संपत्ति घोषित करने का फैसला गलत था। जस्टिस एसए धर्माधिकारी और जस्टिस श्याम कुमार वीएम की डिवीजन बेंच ने यह बात तब कही, जब उन्होंने एकल जज के उस आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें राज्य सरकार द्वारा 600 परिवारों के अधिकारों की जाँच के लिए बनाए गए आयोग को खारिज किया गया था। ये परिवार मुनंबम में जमीन को वक्फ घोषित करने के बाद बेदखली का सामना कर रहे थे।

केरल हाईकोर्ट ने कहा कि मोहम्मद सिद्दीक सैट द्वारा 1950 में फारूक कॉलेज मैनेजमेंट कमिटी के पक्ष में बनाया गया एंडोमेंट डीड वक्फ डीड नहीं था, बल्कि एक साधारण गिफ्ट डीड था। कोर्ट ने कहा कि इस दस्तावेज में कहीं भी यह नहीं दिखाया गया कि संपत्ति को हमेशा के लिए अल्लाह के नाम पर समर्पित किया गया था। इसलिए इसे वक्फ संपत्ति नहीं कहा जा सकता।

जस्टिस सुष्रुत अरविंद धर्माधिकारी और जस्टिस श्याम कुमार वी एम ने की खंडपीठ यह फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार की दो याचिकाओं को स्वीकार कर लिया और सिंगल बेंच के पुराने आदेश को रद्द कर दिया, जिसमें सरकार द्वारा गठित जाँच आयोग को अवैध बताया गया था।

कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि वक्फ की परिभाषा में ‘स्थायी समर्पण’ (Permanent Dedication) का होना आवश्यक है। इसका मतलब यह होता है कि कोई व्यक्ति अपनी संपत्ति का स्वामित्व पूरी तरह से और हमेशा के लिए अल्लाह के नाम कर दे, ताकि उस संपत्ति का उपयोग केवल मजहबी, पाक या परोपकारी उद्देश्यों के लिए ही हो।

कोर्ट ने पाया कि सिद्दीक सैट द्वारा फारूक कॉलेज को दी गई संपत्ति में कॉलेज को यह अधिकार दिया गया था कि वह जमीन को बेच सकता है, लीज पर दे सकता है या अन्य किसी तरह उपयोग में ला सकता है। जब किसी संपत्ति को बेचने या ट्रांसफर करने की अनुमति दी जाती है, तो वह संपत्ति वक्फ नहीं रह जाती, बल्कि वह सार्वजनिक चैरिटेबल संपत्ति के रूप में मानी जाती है।

कोर्ट ने कहा कि 1950 का यह दस्तावेज स्थाई समर्पण की भावना को प्रदर्शित नहीं करता, बल्कि इसमें संपत्ति के पुनः वापसी (Reversion) का प्रावधान था। इसमें लिखा था कि अगर संपत्ति का कोई हिस्सा बचा रह जाता है तो वह वापस दाता या उसके वारिसों को लौटाया जा सकता है। कोर्ट ने इसे वक्फ की मूल भावना के विपरीत बताया और कहा कि यह सिर्फ एक साधारण उपहार था, जिसे फारूक कॉलेज के प्रबंधन के लिए दिया गया था।

इस फैसले में कोर्ट ने केरल वक्फ बोर्ड की 2019 की कार्रवाई को भी कठोर शब्दों में फटकार लगाई। कोर्ट ने कहा कि लगभग 69 साल तक न तो सिद्दीक सैट के वारिसों ने और न ही फारूक कॉलेज ने इस संपत्ति को वक्फ माना था।

इसके बावजूद वक्फ बोर्ड ने 2019 में एकतरफा तरीके से इसे वक्फ संपत्ति घोषित कर दिया, जो पूरी तरह मनमानी और अवैध कार्रवाई थी। कोर्ट ने इसे ‘भूमि हड़पने की कोशिश’ यानी ‘Land Grabbing Tactic’ बताया। जजों ने टिप्पणी की कि वक्फ बोर्ड ने बिना किसी विधिक जाँच या सभी हितधारकों को शामिल किए बिना यह कदम उठाया, जो न केवल अव्यवहारिक बल्कि असंवैधानिक भी है।

कोर्ट ने अपने आदेश में यह भी कहा कि राज्य सरकार को मुनम्बम भूमि विवाद की जाँच के लिए आयोग गठित करने का पूरा अधिकार है। यह आयोग एक तथ्य खोजने वाली संस्था (Fact-Finding Commission) होगी, जिसका मकसद विवाद का समाधान निकालना है, न कि स्वामित्व या टाइटल पर फैसला देना। राज्य सरकार ने 27 नवंबर 2024 को रिटायर्ड जस्टिस सी एन रामचंद्रन नायर की अध्यक्षता में यह आयोग गठित किया था, ताकि इस लंबे समय से चल रहे विवाद का स्थायी समाधान निकाला जा सके।

मामला क्या है?

मुनंबम भूमि विवाद केरल के एर्नाकुलम जिले में करीब 404 एकड़ जमीन से जुड़ा है। इस इलाके में लगभग 600 हिंदू और ईसाई परिवार दशकों से रह रहे हैं। वक्फ बोर्ड का दावा है कि यह जमीन 1950 में वक्फ संपत्ति के रूप में दर्ज की गई थी, जबकि स्थानीय निवासियों का कहना है कि उन्होंने यह जमीन फारूक कॉलेज से कानूनी रूप से खरीदी थी।

यह विवाद अब एक राजनीतिक मुद्दे में बदल गया है। भाजपा नेताओं ने वक्फ बोर्ड पर सार्वजनिक और निजी जमीनों पर कब्जा करने का आरोप लगाया है। केंद्रीय मंत्री सुरेश गोपी ने इसे ‘बर्बरता’ कहा और कहा कि संसद में ऐसे कदमों को रोकने के लिए नया कानून लाया जाएगा। मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने भाजपा के आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उनकी सरकार मुनम्बम के लंबे समय से रह रहे लोगों के साथ है और उनकी संपत्ति की सुरक्षा के लिए काम कर रही है।

दरअसल, वक्फ विवाद कोई नया विषय नहीं है। देशभर में ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहाँ वक्फ बोर्ड ने निजी या सरकारी संपत्तियों पर दावा ठोका है। इसमें तमिलनाडु के कुछ गाँव, सूरत की सरकारी इमारतें, बेंगलुरु का ईदगाह मैदान, हरियाणा का जठलाना गाँव और हैदराबाद का एक पाँच सितारा होटल तक शामिल हैं।

वक्फ द्वारा जमीनों पर कब्जा करने के तीन सामान्य तरीके हैं। किसी जमीन को कब्रिस्तान बताना, उस पर मजार या दरगाह बनाना और सार्वजनिक भूमि पर नमाज पढ़ना शुरू करना। जब किसी स्थान पर लगातार मजहबी गतिविधियाँ होने लगती हैं, तो वक्फ बोर्ड उस जगह को ‘वक्फ संपत्ति’ के रूप में पंजीकृत करने की माँग कर देता है।

क्या कहता है वक्फ कानून

वक्फ कानून के अनुसार, एक बार अगर कोई संपत्ति वक्फ घोषित हो जाती है, तो वह हमेशा वक्फ रहती है। इसका अर्थ यह है कि उस पर फिर से दावा करना या उसे बेच पाना लगभग असंभव हो जाता है। कई मामलों में वक्फ बोर्ड बिना किसी ठोस दस्तावेज के भी संपत्तियों पर दावा कर देता है। यह न केवल संपत्ति अधिकारों का उल्लंघन है, बल्कि इससे सांप्रदायिक तनाव भी पैदा होता है।

केंद्र सरकार अब वक्फ कानून में सुधार लाने की तैयारी में है। नए प्रावधानों के तहत किसी भी निजी या सरकारी संपत्ति को वक्फ घोषित करने से पहले संपत्ति मालिक की सहमति और राजस्व विभाग की विस्तृत जाँच आवश्यक होगी। साथ ही वक्फ बोर्ड को अपने दावे का पूरा दस्तावेज़ी प्रमाण देना होगा। इन कदमों का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि किसी भी व्यक्ति या समुदाय की भूमि पर अनुचित या झूठा दावा न किया जा सके।

केरल हाईकोर्ट का यह फैसला सिर्फ एक जमीन विवाद का समाधान नहीं है, बल्कि पूरे देश के लिए एक बड़ी कानूनी मिसाल है। कोर्ट  ने साफ कहा कि वक्फ तभी बनता है जब संपत्ति स्थाई रूप से और बिना वापसी की शर्त के अल्लाह के नाम समर्पित की जाए। अगर संपत्ति के ट्रांसफर, बिक्री या रिवर्शन का प्रावधान है, तो वह वक्फ नहीं बल्कि एक साधारण चैरिटेबल गिफ्ट है। इस फैसले से यह भी स्पष्ट होता है कि राज्य सरकारें वक्फ बोर्ड के एकतरफा निर्णयों के खिलाफ जाँच कर सकती हैं और नागरिकों के संपत्ति अधिकारों की रक्षा करना उनका वैधानिक दायित्व है।

यह निर्णय न केवल मुनंबम के हजारों परिवारों के लिए राहत लेकर आया है, बल्कि उन तमाम नागरिकों के लिए भी एक उम्मीद की किरण है, जिनकी संपत्तियों पर वक्फ बोर्ड ने वर्षों बाद दावा ठोका है। कोर्ट ने अपने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि कानून की आड़ में भूमि हड़पने की कोई भी कोशिश बर्दाश्त नहीं की जाएगी। यह फैसला इस दिशा में एक मजबूत कदम है कि भारत में हर नागरिक की संपत्ति सुरक्षित रहे, चाहे वह किसी भी धर्म या समुदाय से जुड़ा हो।

चुनाव बिहार का, पर बजा रहे वक्फ-शरिया की डफली: विकास-संविधान से नहीं सरोकार, मुस्लिम वोटों का ‘ध्रुवीकरण’ ही RJD-कांग्रेस-ओवैसी का एजेंडा

    कालनेमि हिन्दू तेजस्वी मुस्लिम वोट के लिए नमाज पढ़ रहे हो क्या किसी मुस्लिम को मंदिर में पूजा करते देखा? जो अपने धर्म का नहीं हुआ किसी मजहब का नहीं हो सकता। ऐसे पाखंडियों से सतर्क रहने की जरुरत है। 
पटना के गाँधी मैदान में रविवार (29 जून 2025) को ‘वक्फ बचाओ, दस्तूर बचाओ’ नाम से एक बड़ी रैली हुई। इस रैली का आयोजन इमारत-ए-शरिया नाम के एक मजहबी संगठन ने किया था। इसका मकसद था वक्फ संशोधन बिल 2025 का विरोध करना। इस रैली में बिहार की विपक्षी पार्टियों के बड़े-बड़े नेता शामिल हुए जैसे तेजस्वी यादव, पप्पू यादव और AIMIM के अख्तरुल ईमान।

दरअसल, पटना के गाँधी मैदान में आयोजित ‘वक्फ बचाओ, दस्तूर बचाओ’ रैली सिर्फ वक्फ बिल के खिलाफ नहीं थी, बल्कि इसके पीछे 2025 के बिहार विधानसभा चुनाव की सियासत है। ये रैली थी क्या और क्यों, इसका असली मकसद क्या था और इसने बिहार की सियासत को कैसे गर्म कर दिया। चुनाव चाहे किसी राज्य का हो या आम चुनाव, विपक्ष मुस्लिम वोटों में ही सत्ता का रास्ता खोजने लगते हैं। खुद वोटों का ध्रुवीकरण बीजेपी पर साम्प्रदायिकता का आरोप लगाते हैं। विपक्ष नमाज तक पढ़ने को तैयार हो जाते हैं। अक्ल से पैदल और हरामखोरी की आदत वाले मुसलमानों को सोंचना चाहिए कि जो अपने धर्म का नहीं किसी मजहब का नहीं हो सकता। जबकि मुस्लिम वोट के पीछे अंधे होकर भागने वालों को इतिहास का ज्ञान नहीं। जयचन्द ने हिन्दू सम्राटों से गद्दारी करने पर क्या मिला? आज जयचन्द और मीर ज़फर तो क्या इनके परिवार का कोई नामलेवा तक नहीं।    

गाँधी मैदान की रैली में क्या – क्या कहा गया

रविवार को पटना के ऐतिहासिक गाँधी मैदान में हजारों लोग जमा हुए, खासकर मुस्लिम समुदाय के लोग। रैली में नेताओं ने केंद्र की बीजेपी सरकार पर जमकर हमला बोला। तेजस्वी यादव ने कहा, “ये देश किसी के बाप का नहीं है। ये हम सबका हिंदुस्तान है।” उन्होंने बीजेपी पर आरोप लगाया कि वो न सिर्फ वक्फ की संपत्तियों पर कब्जा करना चाहती है, बल्कि मुस्लिमों, पिछड़ों और दलितों के वोट देने के अधिकार को भी छीनने की साजिश रच रही है। तेजस्वी ने ऐलान किया कि अगर बिहार में उनकी सरकार बनी, तो वो इस वक्फ संशोधन कानून को लागू नहीं होने देंगे।

AIMIM के नेता अख्तरुल ईमान ने इस बिल को अल्पसंख्यकों के खिलाफ साजिश करार दिया। उन्होंने कहा कि ये कानून वक्फ बोर्ड की आजादी छीनता है और जिलाधिकारियों को ज्यादा ताकत देता है।

कॉन्ग्रेस के राज्यसभा सांसद इमरान खान प्रतापगढ़ी ने शेरो-शायरी के साथ अपनी बात रखी और कहा, “ये बिल मुसलमानों को मंजूर नहीं है। ये हमारी बर्बादी का कारण बनेगा।” वहीं, निर्दलीय सांसद मगर कॉन्ग्रेस नेता पप्पू यादव ने मंच से खूब माहौल बनाने की कोशिश की।

वीआइपी पार्टी के नेता मुकेश सहनी ने कहा कि जैसे मछली को पानी चाहिए, वैसे ही मुसलमानों को वक्फ बोर्ड चाहिए। उन्होंने बीजेपी पर मुस्लिमों की विरासत लूटने का इल्जाम लगाया।

सीपीआई माले के दीपंकर भट्टाचार्य ने कहा कि ये बिल पूरे हिंदुस्तान पर हमला है और इसे रोकने के लिए नफरत फैलाने वालों को सत्ता से हटाना होगा। राजद के अब्दुल बारी सिद्दीकी ने उम्मीद जताई कि सुप्रीम कोर्ट में इस बिल के खिलाफ फैसला उनके पक्ष में आएगा। कुल मिलाकर रैली में काफी भड़काऊ बयानबाजी हुई, जिसमें शरिया, वक्फ और मुस्लिम अधिकारों की बातें जोर-शोर से उठीं।

वक्फ बिल क्या है और विवाद क्यों?

वक्फ का मतलब है वो संपत्ति जो मुस्लिम समुदाय के मजहबी, सामाजिक या शैक्षिक कामों के लिए दी जाती है – जैसे मस्जिद, कब्रिस्तान या स्कूल। वक्फ बोर्ड इन संपत्तियों को संभालता है। केंद्र सरकार ने 2025 में वक्फ कानून में कुछ बदलाव किए, जिसे वक्फ संशोधन बिल कहा जा रहा है। सरकार का कहना है कि ये बदलाव पारदर्शिता लाने, महिलाओं को ज्यादा हिस्सेदारी देने और वक्फ संपत्तियों के गलत इस्तेमाल को रोकने के लिए हैं। इस बिल को बनाने से पहले संसदीय समिति, मुस्लिम संगठनों और कई लोगों से सलाह ली गई थी। सरकार कहती है कि कोई कानून थोपा नहीं गया।

लेकिन विपक्ष का कहना है कि ये बिल वक्फ बोर्ड की आजादी छीनता है और मुस्लिम समुदाय के अधिकारों पर हमला है। उनका इल्जाम है कि बीजेपी इस बिल के जरिए मुस्लिमों की संपत्ति पर कब्जा करना चाहती है और उनके वोट देने के हक को भी कमजोर कर रही है। सुप्रीम कोर्ट में इस बिल की वैधता पर सुनवाई चल रही है और फैसला अभी तक नहीं आया है।

बिहार में इस्लामी सियासत का POWER GAME

बिहार में 2025 में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं। बिहार की 243 विधानसभा सीटों में से करीब 48 सीटों पर मुस्लिम वोटरों का दबदबा है। इन सीटों पर 20 से 40 फीसदी या उससे ज्यादा मुस्लिम आबादी है। बिहार में कुल 18 फीसदी मुस्लिम आबादी है, जो किसी भी पार्टी का खेल बना या बिगाड़ सकती है। यही वजह है कि विपक्षी पार्टियाँ जैसे आरजेडी, कॉन्ग्रेस और AIMIM इस रैली के जरिए मुस्लिम वोटरों को अपने पाले में लाने में जुट गईं।

विपक्ष बीजेपी पर सांप्रदायिकता और ध्रुवीकरण की सियासत करने का इल्जाम लगाता है। लेकिन इस रैली को देखकर लगता है कि खुद विपक्ष ध्रुवीकरण की कोशिश कर रहा है। वक्फ जैसे मुद्दों को उठाकर ये पार्टियाँ मुस्लिम समुदाय को भड़काने और अपने पक्ष में करने की कोशिश में हैं। तेजस्वी यादव ने रैली में कहा, “हम मुस्लिम समाज के साथ हैं और उनकी लड़ाई अंतिम साँस तक लड़ेंगे।” ये बयान साफ दिखाता है कि उनका मकसद मुस्लिम वोटों को अपनी तरफ खींचना है।

वक्फ के बहाने सक्रिय हुई AIMIM

पिछले यानी साल 2020 के विधानसभा चुनाव में AIMIM ने बिहार में 5 सीटें जीती थीं, खासकर सीमांचल इलाके में। सीमांचल के चार जिलों किशनगंज, अररिया, कटिहार और पूर्णिया में 24 विधानसभा सीटें हैं, जिनमें से 12 पर मुस्लिम वोटर निर्णायक हैं। AIMIM की जीत ने विपक्षी गठबंधन (महागठबंधन) का खेल बिगाड़ा था, क्योंकि उनके वोट बँट गए। इस बार भी AIMIM वक्फ जैसे मुद्दों को उठाकर मुस्लिम वोटरों को अपने पाले में लाने की कोशिश कर रही है।

इमारत-ए-शरिया और मौलाना अहमद वली फैसल रहमानी

इस रैली के पीछे इमारत-ए-शरिया और इसके प्रमुख मौलाना अहमद वली फैसल रहमानी का बड़ा रोल रहा। मौलाना ने वक्फ संपत्तियों की रक्षा के लिए देशभर में जागरूकता अभियान चलाया। उन्होंने 5 करोड़ ईमेल के जरिए अपनी बात सरकार तक पहुँचाई। हालाँकि वो ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) से निकाले जा चुके हैं और उनकी इस रैली को भी AIMPLB ने समर्थन नहीं दिया। AIMPLB ने साफ कहा कि वो इस मुद्दे का राजनीतिकरण नहीं चाहता, इसके बावजूद इस मजहबी संगठन के मंच पर सभी विपक्षी राजनीतिक पार्टियाँ न सिर्फ मौजूद रही, बल्कि अपने-अपने अंदाज में मुस्लिमों से समर्थन भी माँग लिया।

बिहार में असली मुद्दा क्या होना चाहिए?

बिहार के चुनाव में स्थानीय मुद्दों जैसे रोजगार, उद्योग और विकास की बात होनी चाहिए। लेकिन इस रैली में सिर्फ वक्फ और मजहबी मुद्दों पर जोर रहा। विपक्षी पार्टियाँ मुस्लिम वोटरों को साधने के लिए तुष्टिकरण की सियासत कर रही हैं। बीजेपी पर ध्रुवीकरण का इल्जाम लगाने वाले ये लोग खुद मजहबी आधार पर वोट माँग रहे हैं। ये रैली इसका सबूत है।
मुस्लिम समुदाय में भी कई सवाल हैं। जैसे, वक्फ बोर्ड की अरबों की संपत्ति का फायदा आम मुसलमान को क्यों नहीं मिलता? शिया और सुन्नी बोर्ड अलग-अलग क्यों हैं? गाँधी संग्रहालय के संयुक्त सचिव और मुस्लिम स्कॉलर आसिफ वासी कहते हैं, “वक्फ बिल का ज्यादा असर नहीं होगा, क्योंकि मुस्लिम वोट 18 पार्टियों में बँटा हुआ है। 18 फीसदी मुस्लिम वोट हैं, तो 78 फीसदी गैर-मुस्लिम वोट भी हैं।” उनका कहना है कि वक्फ बोर्ड की संपत्ति से आम मुसलमान को आज तक कोई खास फायदा नहीं हुआ।

वक्फ रैली पर बीजेपी और जेडीयू की प्रतिक्रिया रही तीखी

पटना की इस रैली पर बिहार के उपमुख्यमंत्री विजय सिन्हा ने कड़ा रुख अपनाया। उन्होंने इसे तुष्टिकरण की पराकाष्ठा और लोकतांत्रिक परंपराओं को चुनौती देने वाला कदम बताया। सिन्हा ने कहा कि वक्फ संशोधन बिल संसद की माँग और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के आधार पर पारित हुआ है। इसका मकसद वक्फ संपत्तियों में पारदर्शिता लाना और उनके गलत इस्तेमाल को रोकना है। उन्होंने साफ किया कि इस कानून में मजहबी स्वतंत्रता पर कोई आँच नहीं आती। गैर-मुस्लिम सदस्यों की भूमिका सिर्फ प्रशासनिक होगी, न कि मजहबी।
सिन्हा ने राजद-कॉन्ग्रेस पर हमला बोलते हुए कहा कि ये पार्टियाँ वोटबैंक की सियासत के लिए भ्रम और अराजकता फैलाना चाहती हैं। उन्होंने 2013 के वक्फ कानून का जिक्र किया, जब रातोंरात दिल्ली की 120 से ज्यादा वीवीआईपी संपत्तियाँ वक्फ को सौंप दी गई थीं। सिन्हा ने कहा कि अब ऐसी मिलीभगत की संस्कृति नहीं चलेगी।
बिहार बीजेपी ने इस रैली में तेजस्वी यादव के बयान पर सीधा निशाना साधा। बिहार बीजेपी ने लिखा, “तेजस्वी यादव की गाँधी मैदान रैली का असली एजेंडा अब सामने आ गया है। मंच से अब बाबा साहेब अंबेडकर के संविधान की नहीं, बल्कि शरीया और शरीयत की बातें हो रही हैं। क्या तेजस्वी और राहुल गाँधी बिहार को संविधान नहीं, शरीयत से चलाना चाहते हैं? देश को बाँटने वाली इस खतरनाक राजनीति का जवाब जनता 2025 में देगी। बिहार बाबा साहब के संविधान से चलेगा, शरीयत से नहीं।”
बिहार के मंत्री जमा खान ने विपक्ष के नेता तेजस्वी यादव पर तंज कसा। उन्होंने कहा कि तेजस्वी मुख्यमंत्री बनने की जल्दबाजी में कुछ भी बोल रहे हैं, बिना ये सोचे कि उनकी बातें समाज में सौहार्द बिगाड़ सकती हैं। खान ने कहा कि विपक्ष खासकर राजद और कॉन्ग्रेस मुस्लिम समुदाय को बहकाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन बिहार की जनता नीतीश कुमार पर भरोसा करती है। जमा खान ने रैली को सियासी मंच बताते हुए कहा कि ये सिर्फ भावनाओं को भड़काने की कोशिश थी, लेकिन 2025 में एनडीए फिर से सरकार बनाएगी, क्योंकि जनता सच्चाई जानती है।

लालू और नीतीश में मुस्लिम वोटर किसके साथ?

बिहार में वक्फ बिल का मुद्दा इसलिए भी गर्म है, क्योंकि यहाँ 18 फीसदी मुस्लिम आबादी है, जो चुनाव में बड़ा रोल अदा करती है। इस मुद्दे पर दो बड़े नेता लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार की साख दाँव पर है। लालू की पार्टी राजद हमेशा से मुस्लिम-यादव (MY) समीकरण के सहारे सियासत करती रही है। दूसरी तरफ नीतीश कुमार अपनी ‘सेकुलर’ छवि और सभी समाज के लिए काम करने के लिए जाने जाते हैं, इसलिए बिहार में मुस्लिमों का एक बड़ा वर्ग हमेशा उनके समर्थन में रहा है।
90 के दशक में लालू और नीतीश एक साथ थे और दोनों को सेकुलर माना जाता था। लेकिन 2005 में नीतीश ने बीजेपी के साथ गठबंधन कर सरकार बनाई और अपनी अलग पहचान बनाई। उस वक्त मुस्लिम वोटरों ने उनका साथ दिया। 2005 में जेडीयू के 4 मुस्लिम विधायक जीते, 2010 में 7, और 2015 में 5। लेकिन 2020 के चुनाव में नीतीश का एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं जीता, जो दिखाता है कि मुस्लिम वोटरों में उनकी लोकप्रियता घटी है। वक्फ बिल पर जेडीयू के समर्थन ने इस नाराजगी को और बढ़ाया है।

सीमांचल का सियासी समीकरण

सीमांचल के चार जिले किशनगंज, अररिया, कटिहार और पूर्णिया मुस्लिम बहुल हैं। यहाँ की 24 विधानसभा सीटों में से 12 पर मुस्लिम वोटर हार-जीत तय करते हैं। 2020 में एनडीए ने 11 सीटें जीतीं, महागठबंधन को 8 मिलीं और AIMIM ने 5 सीटें हासिल कीं। अब वक्फ संसोधन कानून के बहाने इस बार राजद और AIMIM इसी वोटबैंक पर नजर जमाए बैठे हुए हैं।
‘वक्फ बचाओ, दस्तूर बचाओ’ रैली ने बिहार की सियासत में हलचल मचा दी। ये रैली दिखाती है कि राजद, कॉन्ग्रेस और AIMIM जैसी विपक्षी पार्टियां मुस्लिम वोटरों को साधने के लिए तुष्टिकरण की सियासत कर रही हैं। ऐसे में सवाल ये है कि क्या ये पार्टियाँ वाकई मुस्लिम समुदाय की भलाई चाहती हैं या सिर्फ वोटबैंक की सियासत कर रही हैं? बिहार के 18 फीसदी मुस्लिम वोटर इस चुनाव में किसके साथ जाएँगे, ये वक्त बताएगा। लेकिन इतना साफ है कि इस रैली ने बिहार के चुनाव को मजहबी रंग दे दिया है। रोजगार, विकास और शिक्षा जैसे मुद्दों की जगह वक्फ जैसे मुद्दों ने सियासत को गर्म कर दिया है और ये देखना बाकी है कि इसका असर चुनाव में कैसे दिखेगा।

13000+ प्रॉपर्टी, कीमत 1 लाख करोड़ रूपए … शत्रु संपत्ति,को भी हड़पना चाहता था वक्फ बोर्ड?: यदि कांग्रेस सांसदों की चलती तो आज नीलाम नहीं हो पाती परवेज मुशर्रफ की जमीन

                                      नरेंद्र मोदी, राजा महमूदाबाद का किला (फोटो साभार: Mind/Jagran)
वक़्फ़ कानून बनाकर मोदी सरकार ने मुस्लिम सियासतखोरों और वक़्फ़ जायदादों पर कब्ज़ा कर ऐश करने वालों पर कुठाराघात करने पर इन सबका बिलबिलाना और चीखना-चिल्लाना तो बनता ही है। वक़्फ़ की जमीन हड़पकर उसका कुछ हज़ार महीना देकर हर महीने हो रही करोड़ों की कमाई पर ताला पड़ गया है। वक़्फ़ बोर्ड के नाम पर हिन्दू ही नहीं मुसलमानों को भी पागल बनाया जाता रहा। अभी तो सिर्फ पियादे ही बिलबिला रहे हैं बड़ी मछलियां के बाहर आने पर देखो क्या होगा?  बिहार चुनाव को देखते हुए वक़्फ़ कानून से हुए बेरोजगार हुए लोगों का जमावड़ा होना और मुस्लिम तुष्टिकरण करने वालों का एक मंच पर जमा होना अपने आप ड्रामा का भंडाभोड़ कर दिया। इस ड्रामा में सनसनी मोड़ तेजस्वी यादव द्वारा सत्ता में आने पर कानून को कूड़ेदान में फेंकने की बात बोलकर मुस्लिम वोट लूटने की होड़ लग गयी। यानि मुस्लिमों का डराकर विपक्ष द्वारा उनके वोट लूटने के लिए यह षड़यंत्र रचा गया है। 

दरअसल मुस्लिम वोट लेने के लालच में हिन्दू बने कालनेमि हिन्दू सनातन का अपमान करने से नहीं चूक रहे। लेकिन इतिहास से अनपढ़ इन कालनेमियों को नहीं मालूम कोई जयचन्द का सम्मान से नाम नहीं लेता। उसे घृणित दृष्टि से देखा जाता है, इतना ही नहीं कोई इसका नामलेवा भी नहीं। ठीक वही हाल इन सत्ता के भूखे इन पाखंडियों का होने वाला है। 

हिन्दुओं को इन पाखंडी हिन्दू सियासतखोरों से पूछना चाहिए कि जिस तरह तुम मुस्लिम वोटों के लिए सनातन को कलंकित करते हो क्या किसी अन्य मजहब के खिलाफ बोलने की हिम्मत है?    

उत्तर प्रदेश के बागपत में 2 दिन पहले पाकिस्तान के पूर्व तानाशाह परवेज मुशर्रफ की जमीन सरकार ने नीलाम कर दी। कुछ दिन पहले उत्तराखंड में राजा महमूदाबाद की संपत्ति को सरकार ने पार्किंग प्लेस में बदल दिया, तो बीते साल दिसंबर में पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान की संपत्ति (जिसमें 1918 में बनी मस्जिद भी शामिल थी) को कोर्ट के आदेश के बाद सरकार ने अपने कब्जे में ले लिया।

इस जमीन को लेकर दावा किया गया था कि देश की आजादी से पहले ही इसे वक्फ कर दिया गया था, जो दावा फर्जी निकला। ऐसे में मस्जिद होने और वक्फ के दावे के बावजूद ये जमीन सरकार को मिली, क्योंकि ये जमीन एनिमी प्रॉपर्टी (शत्रु संपत्ति) के दायरे में आती थी।

तीनों मामलों को देखें तो इनमें एक लिंक कॉमन था। वो था शत्रु संपत्ति का होना और अब ऐसी संपत्तियों को भारत सरकार अपने हितों के मुताबिक इस्तेमाल कर सकती है। ऐसा इसलिए हो पाया, क्योंकि साल 2017 में मोदी सरकार एक कानून लाई थी, जिसका नाम शत्रु संपत्ति (संशोधन और सत्यापन) विधेयक 2016 था। इस कानून के मुताबिक, सिर्फ दुश्मन देश में गया व्यक्ति ही नहीं, दुश्मन देश गए व्यक्ति के वारिस भी दुश्मन की श्रेणी में आएँगे और वो दुश्मन संपत्ति यानी शत्रु संपत्ति पर कोई दावा नहीं कर पाएँगे।

मोदी सरकार के इस कदम से देश भर की 13 हजार से अधिक संपत्तियाँ, जिनकी कीमत 1 लाख करोड़ रुपए से अधिक है, वो अब सरकार की होंगी। इस बारे में आगे विस्तार से बताएँगे… फिलहाल ये बता दें कि मोदी सरकार जो वक्फ संसोधन कानून लेकर आई है, जिसमें भी एविक्टी (शत्रु संपत्ति) पर वक्फ के दावों को नकार दिया गया है। इसका असर दूरगामी है।

मोदी सरकार ने दोनों कानून लाकर वो काम किया है, जो कांग्रेस की पूर्ववर्ती सरकारें तमाम वजहों से करने से बचती रही हैं। कांग्रेस का जिक्र आया ही है और शत्रु संपत्ति के मामले में, तो एक अहम जानकारी आपको जो होनी चाहिए- वो दे देते हैं। लेकिन उससे पहले बताते हैं कि आखिर शत्रु संपत्ति है क्या और कैसे मोदी सरकार वो कानून लेकर आई, जिसे न लाकर कांग्रेस नीत यूपीए सरकार ने हजारों करोड़ की संपत्ति देश के दुश्मनों के वारिसों दे दी थी।

शत्रु संपत्ति क्या है?

शत्रु संपत्ति वो संपत्तियाँ हैं, जो उन लोगों के पास थीं, जिन्होंने 1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन के दौरान या 1962 (चीन के साथ युद्ध), 1965 और 1971 (पाकिस्तान के साथ युद्ध) के बाद भारत छोड़कर पाकिस्तान या चीन की नागरिकता ले ली। भारत सरकार ने इन्हें ‘शत्रु’ माना, क्योंकि ये लोग उन देशों के साथ चले गए, जो भारत के खिलाफ युद्ध में थे। ऐसी संपत्तियों को जब्त करने का मकसद था कि इनका इस्तेमाल देश की सुरक्षा और विकास के लिए हो।

शत्रु संपत्ति अधिनियम 1968 के तहत इन संपत्तियों की देखरेख के लिए कस्टोडियन ऑफ एनिमी प्रॉपर्टी फॉर इंडिया (CEPI) बनाया गया, जो गृह मंत्रालय के अधीन काम करता है। देश भर में ऐसी 13,252 संपत्तियाँ हैं, जिनमें से 12,485 पाकिस्तानी नागरिकों और 126 चीनी नागरिकों की हैं। इनकी कुल कीमत 1.04 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा है। इसमें भी सबसे ज्यादा संपत्तियाँ उत्तर प्रदेश (6,255) और पश्चिम बंगाल (4,088) में हैं।

उदाहरण के लिए, मुजफ्फरनगर में पाकिस्तान के पहले प्रधानमंत्री लियाकत अली खान की आठ बिसवा जमीन थी, जिस पर मस्जिद और दुकानें बनी थीं। जाँच में पाया गया कि ये शत्रु संपत्ति थी। इसी तरह भोपाल में नवाब हमीदुल्लाह खान की बेटी आबिदा सुल्तान (जो 1950 में पाकिस्तान चली गई थीं) की संपत्तियाँ- जैसे फ्लैग स्टाफ हाउस और नूर-उस-सबाह पैलेस (कीमत 15,000 करोड़ रुपये से ज्यादा) भी शत्रु संपत्ति घोषित हुईं। परवेज मुशर्रफ की बागपत में 13 बीघा जमीन को 2024 में 1.38 करोड़ रुपये में नीलाम किया गया। ये सारी संपत्तियाँ भारत सरकार के कब्जे में हैं, ताकि इनका दुरुपयोग न हो।

शत्रु संपत्ति और वक्फ का टकराव

अब सवाल ये है कि शत्रु संपत्ति और वक्फ संपत्ति का आपस में क्या झगड़ा है? दरअसल, कई बार ऐसा हुआ कि जो संपत्तियाँ शत्रु संपत्ति थीं, उन्हें वक्फ बोर्ड ने अपने कब्जे में लेने की कोशिश की। इसका सबसे बड़ा कारण 1984 और 1995 के वक्फ कानूनों में कुछ खामियाँ थीं।

1984 में इंदिरा गाँधी सरकार ने वक्फ कानून में एक संशोधन किया, जिसके तहत ‘इवैक्यूई प्रॉपर्टी’ (यानी वो संपत्तियाँ जो विभाजन के दौरान छोड़ी गई थीं) को वक्फ घोषित करने की छूट दी गई। अगर कोई संपत्ति पहले वक्फ थी, लेकिन बाद में शत्रु संपत्ति बन गई, तो उसे फिर से वक्फ में बदला जा सकता था। इसका मतलब ये हुआ कि जो संपत्तियाँ देश छोड़कर गए लोगों की थीं, उन्हें वक्फ बोर्ड अपने नाम कर सकता था।

मोदी सरकार ने साल 2017 में कानून में किया संशोधन: 2017 में शत्रु संपत्ति (संशोधन और सत्यापन) अधिनियम लाया गया, जिसने इस कानून को और सख्त किया। इस संशोधन ने कई अहम बदलाव किए-

शत्रु की परिभाषा का विस्तार: अब शत्रु के वारिस, भले ही वे भारत के नागरिक हों, इन संपत्तियों पर दावा नहीं कर सकते।

कस्टोडियन का मालिकाना हक: शत्रु संपत्ति का मालिक अब कस्टोडियन (भारत सरकार) है।

सिविल कोर्ट की भूमिका खत्म: शत्रु संपत्ति से जुड़े मामले अब सिविल कोर्ट में नहीं, बल्कि खास ट्रिब्यूनल में सुने जाएँगे।

बिक्री की अनुमति: सरकार अब ऐसी संपत्तियों को बेच सकती है, और इसका पैसा देश के खजाने (Consolidated Fund of India) में जाएगा।

राजा महमूदाबाद की हजारों करोड़ की संपत्तियों का मामला

राजा महमूदाबाद, यानी मोहम्मद अमीर अहमद खान एक प्रमुख शिया मुस्लिम परिवार से थे। महमूदाबाद एस्टेट के तहत उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में विशाल साम्राज्य था। उनके अब्बू महाराजा सर मोहम्मद अली मोहम्मद खान ने 1931 में अपनी मृत्यु के बाद विशाल संपत्ति छोड़ी, जिसमें लखनऊ का बटलर पैलेस, हजरतगंज में महमूदाबाद मेंशन, नैनिताल में मेट्रोपोल होटल और सीतापुर में 956 एकड़ जमीन, एक चीनी मिल, पॉलिटेक्निक संस्थान और डिग्री कॉलेज शामिल थे।

मोहम्मद अमीर अहमद खान 1945 में इराक चले गए और 1957 में पाकिस्तानी नागरिकता ले ली। वे मुस्लिम लीग के कोषाध्यक्ष और मोहम्मद अली जिन्ना के करीबी सहयोगी थे, जिन्होंने पाकिस्तान आंदोलन को वित्तीय और राजनीतिक समर्थन दिया। खास बात ये है कि अमीर अहमद खान ने अपनी सारी संपत्तियाँ पाकिस्तान को दान दे दी थी, जो उनके पास थी। लेकिन भारत में उनकी संपत्तियाँ छूटी हुई थी। ऐसे में भारत सरकार ने उनकी संपत्तियों को शत्रु संपत्ति अधिनियम 1968 के तहत जब्त कर लिया।

उनके बेटे मोहम्मद अमीर मोहम्मद खान (जिन्हें सुलैमान मियाँ भी कहा जाता था) भारतीय नागरिक थे और उन्होंने 1974 से अपनी पैतृक संपत्तियों को वापस पाने के लिए कानूनी लड़ाई शुरू की। यह लड़ाई 37 साल तक चली, जिसमें जिला अदालत, बॉम्बे हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट शामिल थे। साल 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने एक बड़ा फैसला दिया, जिसमें कहा गया कि सुलैमान मियाँ भारतीय नागरिक हैं और ‘शत्रु’ नहीं हैं। कोर्ट ने उनकी सभी संपत्तियों को वापस करने का आदेश दिया, जिनकी कीमत उस समय 20,000 से 50,000 करोड़ रुपये बताई गई। इनमें लखनऊ का बटलर पैलेस, हजरतगंज की प्राइम रियल एस्टेट, महमूदाबाद का किला और सीतापुर की विशाल जमीनें शामिल थीं।

संपत्तियाँ लौटाने के खेल में कांग्रेस सरकार की भूमिका

साल 2005 में जब सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया, तब केंद्र में मनमोहन सिंह के प्रधानमंत्रित्व में कांग्रेस नीत यूपीए सरकार थी। इस फैसले ने सरकार को असहज स्थिति में डाल दिया, क्योंकि इतनी विशाल संपत्तियाँ एक ऐसे परिवार को लौटाना, जिसके अब्बा ने पाकिस्तान आंदोलन का समर्थन किया था, राष्ट्रीय सुरक्षा और जनभावना के लिए संवेदनशील मुद्दा था। लेकिन यूपीए सरकार ने इस फैसले को प्रभावी ढंग से लागू करने की दिशा में कदम उठाए। लखनऊ जिला प्रशासन ने 21 दिसंबर 2005 को बटलर पैलेस की चाबी और छह अन्य संपत्तियों के दस्तावेज सुलैमान मियाँ को सौंप दिए।

कांग्रेस सरकार की इस कार्रवाई की कई वजहें थीं। जिनमें…

  1. सुप्रीम कोर्ट का फैसला लागू करना कानूनी रूप से जरूरी था।
  2. सुलैमान मियाँ खुद 1985 और 1989 में कांग्रेस के टिकट पर महमूदाबाद से विधायक रह चुके थे, जिससे उनका पार्टी के साथ गहरा रिश्ता था।
  3. उस समय कांग्रेस की राजनीति में मुस्लिम वोट बैंक को मजबूत करने की रणनीति थी।
कई लोग मानते हैं कि कांग्रेस ने इस मामले में ढील बरती और सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में मजबूती से अपना पक्ष नहीं रखा, जिसके कारण इतनी बड़ी संपत्तियाँ राजा महमूदाबाद को लौटाने का रास्ता साफ हुआ।
हालाँकि, इस फैसले के बाद भारी विवाद हुआ। कई राजनीतिक दलों खासकर बीजेपी ने इसे राष्ट्रीय हितों के खिलाफ बताया। इसके जवाब में यूपीए सरकार ने 2010 में एक आकस्मिक अध्यादेश (Ordinance) लाने की कोशिश की, जिसमें कहा गया कि शत्रु संपत्तियों पर केवल सरकार का अधिकार होगा। लेकिन यह अध्यादेश संसद में विधेयक के रूप में पेश नहीं हो सका, क्योंकि कांग्रेस के भीतर और बाहर से दबाव था। इस दबाव में सलमान खुर्शीद की अहम भूमिका थी, जिसने सुप्रीम कोर्ट वाले केस में राजा महमूदाबाद की पैरवी की थी और अगले ही साल वो यूपीए की केंद्र सरकार में कानून मंत्री जैसी हैसियत में था।

सलमान खुर्शीद की पर्दे के पीछे की भूमिका

वरिष्ठ वकील और कांग्रेस नेता सलमान खुर्शीद उस समय केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री थे। वे राजा महमूदाबाद के वकील के तौर पर सुप्रीम कोर्ट में उनके पक्ष में लड़े। इस केस में उनके सामने पी. चिदंबरम, अरुण जेटली और राम जेठमलानी जैसे दिग्गज वकील थे, जो सरकार की तरफ से थे। खुर्शीद ने तर्क दिया कि सुलैमान मियाँ भारतीय नागरिक हैं और उनके पिता की गतिविधियों के आधार पर उन्हें ‘शत्रु’ नहीं माना जा सकता। उनकी दलीलों ने 2005 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले में अहम भूमिका निभाई।
लेकिन सलमान खुर्शीद की भूमिका सिर्फ कोर्टरूम तक सीमित नहीं थी। 2010 में जब यूपीए सरकार ने शत्रु संपत्ति अधिनियम को संशोधित करने के लिए अध्यादेश लाने की कोशिश की, तो खुर्शीद ने इसका विरोध किया। उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात कर एक मुस्लिम सांसदों के समूह का नेतृत्व किया, जिसमें लालू प्रसाद यादव, मुलायम सिंह यादव और मोहम्मद अदीब जैसे नेता शामिल थे। इस समूह ने तर्क दिया कि शत्रु संपत्ति कानून में संशोधन ‘मुस्लिम विरोधी’ है और इससे भारतीय मुस्लिम समुदाय की भावनाएँ आहत होंगी।
खुर्शीद की अगुआई में इस दबाव के चलते अध्यादेश को संसद में विधेयक के रूप में पेश नहीं किया गया। इसके अलावा अध्यादेश में एक प्रावधान था कि शत्रु संपत्ति के वारिस को 120 दिनों के भीतर अपनी भारतीय नागरिकता साबित करनी होगी। लेकिन जब विधेयक तैयार हुआ, तो इस प्रावधान को हटा दिया गया, जिससे शत्रु संपत्तियों पर दावे आसान हो गए। कई विश्लेषकों का मानना है कि खुर्शीद ने अपनी कानूनी और राजनीतिक पहुँच का इस्तेमाल कर राजा महमूदाबाद के पक्ष में माहौल बनाया और कांग्रेस सरकार को इस मामले में नरम रुख अपनाने के लिए मजबूर किया।
इसके पीछे की वजहें थीं, जिसमें…
  1. सलमान खुर्शीद का कांग्रेस में मजबूत प्रभाव और उनकी मुस्लिम समुदाय के बीच लोकप्रियता।
  2. राजा महमूदाबाद का कांग्रेस से पुराना रिश्ता, क्योंकि सुलैमान मियाँ दो बार कॉन्ग्रेस विधायक रह चुके थे।
  3. यूपीए सरकार की वह रणनीति, जिसमें वह मुस्लिम वोट बैंक को खुश रखना चाहती थी।
इस पूरे मामले में खुर्शीद की भूमिका को साफ तौर पर ‘वोट बैंक की राजनीति’ से जोड़कर देखा जा सकता है, क्योंकि उन्होंने इसे मुस्लिम समुदाय के हितों से जोड़ा, भले ही इसका राष्ट्रीय सुरक्षा पर असर पड़ता।

मोदी सरकार का वक्फ (संशोधन) विधेयक 2024, शत्रु संपत्तियों को वक्फ बनने से रोकना

मोदी सरकार ने वक्फ (संशोधन) विधेयक 2024 में शत्रु संपत्तियों को वक्फ बनने से रोकने के लिए कई सख्त कदम उठाए। पुराने वक्फ अधिनियम 1995 में कुछ खामियाँ थीं, जिनके चलते वक्फ बोर्ड मनमाने तरीके से संपत्तियों को वक्फ घोषित कर सकता था। उदाहरण के लिए, धारा 40 के तहत बोर्ड बिना ठोस सबूत के किसी भी संपत्ति को वक्फ बता सकता था और इसे केवल वक्फ ट्रिब्यूनल में चुनौती दी जा सकती थी। इससे कई शत्रु संपत्तियाँ जैसे मुजफ्फरनगर में लियाकत अली खान की जमीन, वक्फ के दावे में फँस गई थीं।
वक्फ (संशोधन) विधेयक 2024 ने इन खामियों को दूर किया और इन अहम प्रावधानों के जरिए शत्रु संपत्तियों को वक्फ बनने से रोका..
धारा 40 का खात्मा: पुराने कानून में धारा 40 वक्फ बोर्ड को अनियंत्रित शक्ति देती थी। अब इसे हटा दिया गया है, जिससे बोर्ड बिना दस्तावेजी सबूत के किसी संपत्ति को वक्फ नहीं बता सकता। इससे शत्रु संपत्तियों पर वक्फ का दावा करना लगभग असंभव हो गया है। उदाहरण के लिए – भोपाल में नवाब की संपत्तियाँ जो शत्रु संपत्ति हैं, अब वक्फ नहीं बन सकतीं।
केंद्रीय वक्फ संपत्ति पोर्टल: इस विधेयक ने एक केंद्रीय पोर्टल की व्यवस्था की है, जहाँ सभी वक्फ संपत्तियों का रिकॉर्ड पारदर्शी तरीके से रखा जाएगा। इससे केवल वैध दस्तावेजों वाली संपत्तियाँ ही वक्फ मानी जाएँगी। शत्रु संपत्तियों जैसे लियाकत अली खान की जमीन अब वक्फ के नाम पर कब्जा नहीं किया जा सकेगा।
शत्रु संपत्ति को वक्फ में बदलने पर रोक: पुराने कानून की धारा 108 और 108A जो शत्रु संपत्तियों को वक्फ में बदलने की छूट देती थीं, अब खत्म कर दी गई हैं। इससे यह सुनिश्चित हुआ है कि कोई भी शत्रु संपत्ति वक्फ नहीं बन सकती। उदाहरण के लिए -विजयपुरा (कर्नाटक) में 123 एकड़ जमीन पर वक्फ बोर्ड का दावा खारिज हुआ, क्योंकि वह शत्रु संपत्ति थी।
जिला कलेक्टर की जाँच: अब जिला कलेक्टर को वक्फ संपत्तियों की जाँच का अधिकार है। अगर कोई संपत्ति शत्रु संपत्ति निकलती है, तो कलेक्टर उसे वक्फ घोषित होने से रोक सकता है। यह प्रावधान वक्फ बोर्ड की मनमानी को रोकता है।
मुतवल्ली की जवाबदेही: विधेयक में मुतवल्ली (वक्फ संपत्ति के प्रबंधक) की जवाबदेही बढ़ाई गई है। अगर कोई मुतवल्ली रिकॉर्ड नहीं रखता या संपत्ति का दुरुपयोग करता है, तो उसे हटाया जा सकता है। इससे शत्रु संपत्तियों को गलत तरीके से वक्फ बताने की कोशिशें रुकेंगी।

मोदी सरकार ये प्रावधान न करती तो क्या होता?

अगर वक्फ (संशोधन) विधेयक 2024 में ये प्रावधान न किए जाते तो शत्रु संपत्तियाँ वक्फ बोर्ड के कब्जे में जा सकती थीं। उदाहरण के लिए – महमूदाबाद की संपत्तियाँ, जिनकी कीमत 50,000 करोड़ रुपये से ज्यादा थी, वक्फ के नाम पर जा सकती थीं। इससे न सिर्फ आर्थिक नुकसान होता, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा को भी खतरा हो सकता था, क्योंकि ऐसी संपत्तियों का दुरुपयोग देश के खिलाफ हो सकता था। साथ ही वक्फ बोर्ड की अनियंत्रित शक्तियाँ और बढ़ जातीं, जिससे आम लोगों की संपत्तियों पर भी गलत दावे हो सकते थे। जैसे, विजयपुरा में 123 एकड़ जमीन और मुनंबम (केरल) में कई संपत्तियों पर वक्फ बोर्ड ने दावे किए थे, जो शत्रु संपत्तियाँ थीं।
कॉन्ग्रेस नीत यूपीए सरकार ने 2005 में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राजा महमूदाबाद को हजारों करोड़ रुपये की संपत्तियाँ लौटाने में अहम भूमिका निभाई। इस प्रक्रिया में सलमान खुर्शीद की भूमिका निर्णायक थी, जिन्होंने न सिर्फ कोर्ट में सुलैमान मियाँ का पक्ष मजबूती से रखा, बल्कि 2010 में अध्यादेश को कमजोर करने के लिए मुस्लिम सांसदों का नेतृत्व कर सरकार पर दबाव बनाया। लेकिन वक्फ (संशोधन) विधेयक 2024 और शत्रु संपत्ति (संशोधन) अधिनियम 2017 ने ऐसी संपत्तियों को वक्फ बनने से रोकने के लिए सख्त कदम उठाए।
मोदी सरकार ने राजा महमूदाबाद की संपत्तियों को वापस करने से इनकार कर दिया है। ये मामला कोर्ट में लंबित है और अब मौजूदा कानूनों के तहत इनका वापस राजा महमूदाबाद के वारिसों तक पहुँचना असंभव दिखता है। ऐसे में साफ है कि मोदी सरकार के लाए इन कानूनों ने न सिर्फ वक्फ बोर्ड की मनमानी पर लगाम लगाई, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया कि शत्रु संपत्तियाँ देश के हित में रहें। मोदी सरकार का यह कदम न सिर्फ आर्थिक और कानूनी पारदर्शिता को बढ़ाते हैं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा को भी मजबूत करते हैं।

अयोध्या से लेकर वक़्फ़ बोर्ड तक मुसलमानों को लुटते रहे कट्टरपंथी और कपिल सिब्बल, राजीव धवन, अभिषेक मनु सिंघवी गैंग; आखिर कब कट्टरपंथियों के चुंगल से बाहर आएगा मुसलमान? पूछो इस गैंग से कि बाबरी मस्जिद के नाम पर मिली जमीन पर मस्जिद क्यों नहीं बनी?

कपिल सिब्बल, अभिषेक मनु सिंगवी, हुजेफा अहमदी और राजीव धवन (फोटो साभार: Bhaskar/Jagran/Amar Ujala/India Today)

विवाद चाहे अयोध्या का हो या अब वक़्फ़ बोर्ड कानून का, आखिर कपिल सिब्बल, राजीव धवन, अभिषेक मनु सिंघवी आदि वकील ही खड़े होते हैं, क्या मुसलमानों ने सोंचा? जितनी दौलत अयोध्या विवाद पर मुक़दमेबाज़ी में गवाई है पता नहीं कितनी गरीब मुस्लिम महिलाओं का घर आबाद हो गया होता। मुस्लिम कट्टरपंथियों से लेकर ये वकील गैंग अपनी तिजोरियां भरने के चक्कर में आम मुसलमानों को हमेशा सूली पर टंगे रहते हैं। CAA विरोध में क्या हुआ, दंगे और इन लोगों के चक्कर में बदनाम हुआ मुसलमान। ये मुस्लिम विरोधी गैंग आम मुसलमान को सच्चाई से दूर रख मालपुए खा रहा है। 
सच्चाई यह है कि अधिकतर मुसलमानों को न ही CAA की, हिन्दू धार्मिक स्थलों के विवाद की और न ही वक़्फ़ बोर्ड की कोई जानकारी है। इन्हे डराया जाता है कि तुम्हारी मस्जिदें और कब्रिस्तान छिन जाएंगे। बस इसी डर से मुसलमान इन कट्टरपंथियों के मकड़जाल में फंसा रहता है। क्या किसी मुसलमान ने इस गैंग से पूछने की हिम्मत की कि अयोध्या में तो हिन्दुओं ने अपना मन्दिर बना लिया लेकिन बाबरी मस्जिद के नाम पर मिली जमीन पर अब तक मस्जिद क्यों नहीं बनी?      

सुप्रीम कोर्ट में मामले में पहले दिन की सुनवाई 20 मई 2025 को सुबह 11:41 बजे शुरू हुई। केंद्र सरकार की ओर से सॉलिसिटर जनरल (एसजी) तुषार मेहता ने दलीलें दीं, जबकि याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल, राजीव धवन, ए.एम. सिंघवी, सी.यू. सिंह और हुजेफा अहमदी ने तर्क रखे। कोर्ट ने पहले तीन मुद्दों पर सुनवाई तय की थी, लेकिन याचिकाकर्ताओं ने कई अन्य बिंदु भी उठाए।सुप्रीम कोर्ट में 20 मई 2025 से वक्फ (संशोधन) अधिनियम 2025 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई हो रही है। यह कानून 1995 के वक्फ अधिनियम में बदलाव करता है, जो वक्फ संपत्तियों (इस्लामिक कानून के तहत धार्मिक या धर्मार्थ उद्देश्यों के लिए समर्पित संपत्तियों) के प्रबंधन से संबंधित है।

याचिकाकर्ताओं का कहना है कि यह कानून मुस्लिम समुदाय के खिलाफ भेदभाव करता है और उनकी धार्मिक स्वतंत्रता में दखल देता है। दूसरी ओर केंद्र सरकार का दावा है कि यह संशोधन वक्फ प्रावधानों के दुरुपयोग को रोकने और निजी व सरकारी संपत्तियों पर अतिक्रमण को खत्म करने के लिए लाया गया है। सुनवाई में मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) बी.आर. गवई और जस्टिस ए.जी. मसीह की बेंच ने याचिकाकर्ताओं, केंद्र सरकार और अन्य पक्षों के तर्क सुने।

सुनवाई के पहले दिन याचिकाकर्ताओं की ओर से दी गई दलील


कपिल सिब्बल ने दी ये दलीलें
  • कपिल सिब्बल ने कहा, “यह कानून वक्फ की सुरक्षा के लिए लाया गया है, लेकिन इसका असली मकसद वक्फ संपत्तियों को हड़पना है। यह कानून इस तरह बनाया गया है कि बिना किसी प्रक्रिया के वक्फ संपत्ति छीनी जा सकती है। कोई सरकारी अधिकारी फैसला करता है और संपत्ति तुरंत वक्फ नहीं रह जाती। कोई भी विवाद खड़ा कर सकता है।”
  • वक्फ-बाय-यूजर (लंबे समय तक उपयोग से बनी वक्फ संपत्ति) को खत्म करने पर उन्होंने कहा, “वक्फ-बाय-यूजर की अवधारणा को खत्म कर दिया गया है, जिसे बाबरी मस्जिद केस में मान्यता मिली थी। 1925 के कानून में पंजीकरण का प्रावधान था, लेकिन अगर पंजीकरण नहीं हुआ तो संपत्ति वक्फ नहीं रह जाती, यह नया है।”
  • प्राचीन स्मारकों पर सिब्बल ने तर्क दिया, “अगर कोई संपत्ति प्राचीन स्मारक घोषित हो जाती है, तो वह वक्फ नहीं रहती। इससे धार्मिक अधिकार छिन जाते हैं। यह संविधान के अनुच्छेद 25 का उल्लंघन है।”
  • धारा 3(सी) पर उन्होंने कहा, “धारा 3(सी) के तहत बिना जाँच के संपत्ति वक्फ नहीं रह जाती। कोई ज्यूडिशियल प्रक्रिया नहीं है। वक्फ बनाने वाले को कोर्ट जाना पड़ता है और तब तक संपत्ति का दर्जा बदल जाता है। यह अनुच्छेद 25, 26 और 27 का उल्लंघन है।”
  • 5 साल तक इस्लाम का अभ्यास करने की शर्त पर सिब्बल ने तंज कसते हुए कहा, “मुझे यह साबित करना होगा कि मैं 5 साल से मुस्लिम हूँ। कौन तय करेगा कि मैं मुस्लिम हूँ? अगर मैं मरने से पहले वक्फ बनाना चाहूँ, तो क्या मुझे 5 साल इंतजार करना होगा? यह अपने आप में असंवैधानिक है।”
  • गैर-मुस्लिमों को वक्फ बोर्ड में शामिल करने पर सिब्बल ने कहा, “पहले वक्फ बोर्ड में सभी मुस्लिम थे, अब 12 में से 7 गैर-मुस्लिम हो सकते हैं। यह धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप है और अनुच्छेद 25 और 26 का उल्लंघन करता है।” सिब्बल ने धारा 3(डी) और 3(ई) पर सवाल उठाया, “ये धाराएँ मूल बिल में नहीं थीं और जेपीसी में इन पर चर्चा नहीं हुई। यह प्रक्रियात्मक रूप से गलत है।”
राजीव धवन की दलीलें
राजीव धवन ने कहा, “यह कानून धर्मनिरपेक्षता के खिलाफ है। ब्रिटिश काल में भी वक्फ की परिभाषा नहीं बदली गई। इस बड़े पैमाने पर वक्फ की अवधारणा को खत्म करने की क्या जरूरत थी? यह हर धर्म के लिए खतरा है।” उन्होंने जोड़ा, “यह कानून अनुच्छेद 25, 26 और 29 का उल्लंघन करता है। अनुच्छेद 29 संस्कृति संरक्षण का अधिकार देता है। इसे छीनने से धर्मनिरपेक्ष ढाँचा खत्म हो जाएगा।”
अभिषेक मनु सिंघवी की दलीलें
  • सुप्रीम कोर्ट में अपनी दलील पेश करते हुए अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा, “यह कानून मुस्लिमों को बार-बार दफ्तरों के चक्कर लगाने के लिए मजबूर करता है। यह आतंक पैदा करने की रेसिपी है।”
  • वक्फ-बाय-यूजर पर उन्होंने कहा, “वक्फ-बाय-यूजर ज्यादातर गैर-पंजीकृत होते हैं। इसे खत्म करना और 5 साल तक इस्लाम का अभ्यास साबित करने की शर्त केवल मुस्लिमों के लिए है। यह अनुच्छेद 15 का उल्लंघन है।”
  • धारा 3(डी) पर सिंघवी ने तर्क दिया, “यह धारा प्राचीन स्मारक अधिनियम को वक्फ कानून पर हावी करती है, जिससे 1991 के पूजा स्थल अधिनियम के तहत संरक्षित स्मारकों पर भी असर पड़ता है।”
  • सरकार के दावे का खंडन करते हुए उन्होंने कहा, “सरकार कहती है कि 2013 के बाद वक्फ संपत्तियों में 116% की वृद्धि हुई। यह वृद्धि नहीं, बल्कि डिजिटाइजेशन का नतीजा है।”
इस मामले में वकील चंदर उदय सिंह ने अपनी दलील में कहा, “पहले गैर-पंजीकरण की सजा सिर्फ मुतवल्ली पर जुर्माना था। अब 2025 के कानून में पूरी वक्फ संपत्ति ही खत्म हो जाती है।”
सीनियर एडवोकेट हुजेफा अहमदी की दलीलें
  • अहमदी ने कहा, “धारा 3(डी) का प्रभाव बहुत गंभीर है। यह पुरानी मस्जिदों को भी प्रभावित करता है। इसे तुरंत रोकना चाहिए।”
  • 5 साल की शर्त पर उन्होंने पूछा, “क्या कोई मुझसे पूछेगा कि मैं 5 बार नमाज पढ़ता हूँ या शराब पीता हूँ? प्रैक्टिसिंग इस्लाम का कोई स्पष्ट सिद्धांत नहीं है।”
  • धारा 107 और 108 पर अहमदी ने कहा, “ये धाराएँ पुरानी वक्फ संपत्तियों को रेट्रोस्पेक्टिव रूप से खत्म करती हैं। यह अनुच्छेद 15 का उल्लंघन है।”
केंद्र सरकार की तरह से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने रखा पक्ष
  • तुषार मेहता ने कहा, “कोर्ट ने तीन मुद्दों पर सुनवाई तय की थी, लेकिन याचिकाकर्ता कई अन्य बिंदु उठा रहे हैं। मैं अनुरोध करता हूँ कि सुनवाई इन्हीं तीन मुद्दों तक सीमित रहे।”
  • उन्होंने जोड़ा, “यह कानून वक्फ संपत्तियों के दुरुपयोग को रोकने और निजी व सरकारी संपत्तियों पर अतिक्रमण को खत्म करने के लिए है।” साथ ही उन्होंने जोड़ा कि वक्फ इस्लाम के पालन की आवश्यक शर्त नहीं है।
  • मेहता ने कहा, “17 अप्रैल को सरकार ने आश्वासन दिया था कि कुछ प्रमुख प्रावधान लागू नहीं किए जाएँगे। इसलिए कानून पर पूरी तरह रोक की जरूरत नहीं है।”
सुप्रीम कोर्ट ने की ये टिप्पणियाँ
सीजेआई गवई ने कहा, “किसी कानून को असंवैधानिक मानने के लिए बहुत मजबूत आधार चाहिए। कानून की संवैधानिकता की धारणा होती है।”
सिब्बल से पूछा, “पुराने कानून में पंजीकरण अनिवार्य था या स्वैच्छिक?” सिब्बल ने जवाब दिया, “1923 के कानून में ‘शैल’ शब्द था, लेकिन गैर-पंजीकरण की कोई सजा नहीं थी, सिवाय मुतवल्ली को हटाने के।”
प्राचीन स्मारकों पर सीजेआई ने कहा, “खजुराहो मंदिर में लोग प्रार्थना करते हैं, भले ही वह प्राचीन स्मारक है। क्या इससे प्रार्थना का अधिकार छिनता है?”

सुनवाई के दूसरे दिन केंद्र सरकार ने अपनी दलीलें विस्तार से रखीं

सुप्रीम कोर्ट में वक्फ मामले की दूसरे दिन बुधवार (21 मई 2025) को सुनवाई सुबह 12:15 बजे शुरू हुई। इस दिन केंद्र सरकार ने अपनी दलीलें विस्तार से रखीं। जिसमें केंद्र सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलीलें पेश की।
  • मेहता ने कहा, “यह कानून 1923 से चली आ रही वक्फ संपत्तियों के दुरुपयोग की समस्या को खत्म करने के लिए है। जेपीसी ने 36 बैठकों में 96 लाख प्रतिनिधित्वों को सुना और व्यापक चर्चा के बाद यह कानून पारित हुआ।”
  • धारा 3(सी) पर उन्होंने कहा, “धारा 3(सी) के तहत राजस्व अधिकारी केवल राजस्व रिकॉर्ड ठीक करते हैं। यह अंतिम निर्णय नहीं है। वक्फकर्ता ट्रिब्यूनल, हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकता है।”
  • मेहता ने जोड़ा, “धारा 3(सी) का फैसला सिर्फ पेपर एंट्री है। सरकार को स्वामित्व लेने के लिए टाइटल सूट दायर करना होगा।”
  • वक्फ-बाय-यूजर पर मेहता ने कहा, “वक्फ-बाय-यूजर को खत्म करने का मकसद यह सुनिश्चित करना है कि बिना पंजीकरण के कोई संपत्ति वक्फ न बने। इससे निजी और सरकारी संपत्तियों पर अतिक्रमण रुकेगा।”
  • मजहबी अधिकारों पर मेहता ने तर्क दिया, “वक्फ इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं है। दान हर धर्म में होता है, लेकिन इसे अनिवार्य धार्मिक प्रथा नहीं माना गया।”
  • गैर-मुस्लिमों को बोर्ड में शामिल करने का बचाव करते हुए उन्होंने कहा, “यह समावेशिता के लिए है। वक्फ संपत्ति, जैसे स्कूल या अनाथालय, गैर-मुस्लिमों के लिए भी हो सकती है।”
  • 5 साल की शर्त पर मेहता ने कहा, “शरिया कानून में निकाह, तलाक या वसीयत के लिए भी खुद को मुस्लिम साबित करना होता है। इस कानून में बस 5 साल की समय सीमा तय की गई है।”
  • पंजीकरण पर मेहता ने सिब्बल की दलील का खंडन किया, “यह कहना गलत है कि 1923 में पंजीकरण नहीं था। बंगाल वक्फ अधिनियम में भी वक्फ-बाय-यूजर था और पंजीकरण जरूरी था।”
याचिकाकर्ताओं की दलीलें
  • एक याचिकाकर्ता के वकील ने कहा, “वक्फ-बाय-यूजर को खत्म करना और गैर-पंजीकृत वक्फ को अमान्य करना धार्मिक और संपत्ति के अधिकारों का हनन है।”
  • सिब्बल ने दोहराया, “धारा 3(डी) और 3(ई) को बिना जेपीसी चर्चा के शामिल किया गया, जो प्रक्रियात्मक रूप से गलत है।”
कोर्ट की अहम टिप्पणियाँ
  • सीजेआई ने मेहता से पूछा, “क्या धारा 3(सी) के तहत सरकार अपने ही दावे का फैसला करेगी?” मेहता ने जवाब दिया, “राजस्व अधिकारी केवल रिकॉर्ड ठीक करते हैं, टाइटल का फैसला नहीं।”
  • कोर्ट ने कहा, “धारा 3(सी) के तहत संपत्ति का कब्जा तब तक नहीं लिया जा सकता, जब तक धारा 83 की प्रक्रिया पूरी न हो।”
  • सिब्बल की दलील पर सीजेआई ने कहा, “मेहता तकनीकी रूप से सही हैं कि 1923 में भी पंजीकरण का प्रावधान था।”

सुनवाई के तीसरे दिन की अहम दलीलें

वक्फ कानून को लेकर सुनवाई तीसरे दिन भी चली। गुरुवार (22 मई 2025) को सुनवाई सुबह 12:06 बजे शुरू हुई। इस दिन केंद्र सरकार और अन्य पक्षों ने अपनी दलीलें पूरी कीं, और कोर्ट ने कुछ अहम टिप्पणियाँ कीं।
केंद्र सरकार का पक्ष सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने रखा
  • मेहता ने अपनी दलील शुरू करते हुए कहा, “1923 के बाद से वक्फ संपत्तियों के दुरुपयोग की शिकायतें थीं। 1954 में एक और कानून आया। 1995 में नया वक्फ अधिनियम बना। लेकिन 2013 में धारा 40 ने वक्फ बोर्ड को असीमित अधिकार दे दिए, जिसके कारण निजी और सरकारी संपत्तियों पर अतिक्रमण बढ़ा।”
  • उन्होंने कहा, “लाखों की संख्या में शिकायतें थीं कि गांव के गांव वक्फ संपत्ति घोषित हो रहे हैं। निजी संपत्तियों को वक्फ बोर्ड हड़प रहा है। यह कानून उस दुरुपयोग को रोकने के लिए है।”
  • धारा 3(सी) पर मेहता ने दोहराया, “यह केवल राजस्व रिकॉर्ड को ठीक करने की प्रक्रिया है। अगर कोई विवाद है, तो कलेक्टर जांच करता है। यह अंतिम फैसला नहीं है। वक्फकर्ता ट्रिब्यूनल या कोर्ट जा सकता है।”
  • वक्फ-बाय-यूजर पर उन्होंने कहा, “वक्फ-बाय-यूजर की अवधारणा पुराने कानून में भी थी, लेकिन इसे और सख्त करना जरूरी था ताकि बिना दस्तावेज के संपत्तियां वक्फ न बनें।”
  • गैर-मुस्लिमों को बोर्ड में शामिल करने पर मेहता ने कहा, “वक्फ बोर्ड का काम धार्मिक नहीं, बल्कि धर्मनिरपेक्ष है। स्कूल, अस्पताल जैसी वक्फ संपत्तियां सभी के लिए होती हैं। गैर-मुस्लिमों को शामिल करना समावेशिता के लिए है।”
  • 5 साल की शर्त का बचाव करते हुए उन्होंने कहा, “यह शरिया कानून के हिसाब से है। वक्फ बनाने के लिए व्यक्ति को मुस्लिम होना चाहिए, और यह सुनिश्चित करने के लिए 5 साल की शर्त रखी गई है।”
  • मेहता ने जोड़ा, “यह कानून जेपीसी की 36 बैठकों और 96 लाख प्रतिनिधित्वों के बाद बनाया गया है। यह एक सोचा-समझा कदम है।”
अन्य पक्षों की दलीलें-
वरिष्ठ वकील हरीश साल्वे (1995 के वक्फ अधिनियम को चुनौती देने वाले याचिकाकर्ता की ओर से) कहा, “1995 के वक्फ अधिनियम के कई प्रावधान 2025 के संशोधन में भी हैं। सुप्रीम कोर्ट को दोनों कानूनों पर एक साथ विचार करना चाहिए। हाई कोर्ट की याचिकाओं को यहाँ लाने की जरूरत नहीं है।” उन्होंने जोड़ा, “अगर 100 साल पुरानी वक्फ संपत्तियाँ अब वक्फ नहीं रहेंगी, तो यह गंभीर समस्या है।”
के. परमेश्वर (याचिकाकर्ता की ओर से) ने कहा, “लिखित दलीलें पूरी याचिका की तरह हैं। हमें सभी मुद्दों पर बहस करने की इजाजत दी जानी चाहिए।” उन्होंने धारा 3(सी) पर कहा, “यह धारा संपत्ति का दर्जा बदल देती है बिना किसी ज्यूडिशियल प्रक्रिया के। यह गलत है।”
डॉ. जी. मोहन गोपाल (श्री नारायण मानव धर्मम ट्रस्ट की ओर से) ने कहा, “सभी पाँच मुख्य याचिकाएँ मुस्लिम पक्षों की हैं। इससे यह धारणा बनती है कि मामला ध्रुवीकृत है। गैर-मुस्लिम पक्षों को भी सुनना चाहिए।” उन्होंने जोड़ा, “यह कानून केवल मुस्लिमों के खिलाफ नहीं, बल्कि सभी धर्मों के लिए खतरा है।”
वरिष्ठ अधिवक्ता गुरु कृष्णकुमार (वक्फ बोर्ड) ने कहा, “धारा 32 कहती है, ‘वक्फ बोर्ड वक्फकर्ता (Waqif) की इच्छाओं के अनुसार काम करता है।’ धारा 96 और 97 भी इस पर चर्चा करती हैं, जो राज्य वक्फ बोर्ड और केंद्र सरकार के निर्देशों से जुड़ी हैं।”
वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायण ने कहा, “280 एएसआई (ASI) स्मारकों पर वक्फ दावा किया गया है। धारा 25(2)(ए) राज्यों को आर्थिक और राजनीतिक मुद्दों पर कानून बनाने की अनुमति देती है।” उन्होंने कहा, “न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) पर एक नौ-सदस्यीय पीठ (Nine-Judge Bench) विचार कर रही है। शरूर मठ (Shrur Mutt) मामला अंतरिम आदेश (Interim Order) पर प्रासंगिक है।”
सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा, “CEO (Chief Executive Officer) पहले मुस्लिम होना चाहिए था, लेकिन अब यह ‘Enabling Provision’ (सक्षम करने वाला प्रावधान) है। धारा 38 कहती है, ‘Executive Officer (Executive Officer) मुस्लिम होना चाहिए।'” उन्होंने कहा, “वक्फ बोर्ड संविधान के अनुच्छेद 12 (Article 12) के तहत ‘State’ (राज्य) है। इसमें ‘Community Restriction’ (समुदाय पाबंदी) नहीं है।”
सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणियाँ
सीजेआई गवई ने कहा, “हमने पहले कहा था कि 1995 के वक्फ अधिनियम को चुनौती देने वाली याचिकाओं को इस मामले में नहीं सुना जाएगा। हम केवल 2025 के संशोधन पर ध्यान देंगे।”
  • धारा 3(सी) पर सीजेआई ने पूछा, “क्या कलेक्टर अपने ही दावे का फैसला करेगा?” मेहता ने जवाब दिया, “यह भ्रामक और गलत तर्क है। कलेक्टर केवल रिकॉर्ड ठीक करता है, स्वामित्व का फैसला नहीं।”
  • वक्फ-बाय-यूजर पर कोर्ट ने कहा, “अगर जामा मस्जिद जैसे स्मारक को वक्फ-बाय-यूजर के तहत मान्यता मिली है, तो उसे कैसे खत्म किया जा सकता है?”
  • गैर-मुस्लिमों को बोर्ड में शामिल करने पर कोर्ट ने पूछा, “क्या हिंदू धार्मिक ट्रस्ट में मुस्लिमों को शामिल किया जा सकता है?” मेहता ने जवाब दिया, “यह समावेशिता का सवाल है। वक्फ बोर्ड का काम धर्मनिरपेक्ष है।”
  • सिब्बल की दलील पर सीजेआई ने टोका, “आप कहते हैं कि मस्जिदों में चढ़ावा नहीं चढ़ता। मैं दरगाह गया हूँ और मैंने देखा है कि वहाँ भी चढ़ावा चढ़ाया जाता है।”
तीनों दिनों की सुनवाई में याचिकाकर्ताओं ने धार्मिक स्वतंत्रता और संपत्ति अधिकारों पर हमले की बात कही, जबकि सरकार ने इसे वक्फ मैनेजमेंट सुधारने का कदम बताया। कोर्ट ने अभी तक कोई अंतरिम आदेश नहीं दिया है और अगली सुनवाई 5 जून 2025 को होगी। यह मामला धार्मिक, आर्थिक और राजनीतिक पहलुओं से जुड़ा है, इसलिए सभी पक्षों की चिंताओं को संतुलित करना जरूरी है।

गुजरात : वक्फ संपत्ति घोटाला में सलीम, महमूद समेत 5 गिरफ्तार : उर्दू स्कूल के लिए मिली जमीन पर बनाई दुकानें, 20 साल तक वसूला लाखों का किराया

                वक्फ की 100 करोड़ की संपत्तियों पर 20 सालों से अवैध निर्माण (फोटो साभार : Opindia)
वक़्फ़ संशोधक बिल कानून बनने से सारे मुसलमानों में डर नहीं बल्कि डर सिर्फ उन्हीं को है जो वक़्फ़ की जमीन का दुरूपयोग कर किराया हज़ारों में देकर हर महीने करोड़ों कमा रहे हैं। अभी कुछ दिन पहले News18 पर एंकर लुबिका लियाकत मुस्लिम बहुल क्षेत्र में पहुँच उनसे वक़्फ़ कानून के बारे में पूछा तो पूरे शो में यही बात निकल कर आयी कि आम मुसलमान को वक़्फ़ नाम से वाकिफ नहीं। अब सवाल यह पैदा होता है कि सड़क पर उतर कर दंगा करने वाले गुंडे कौन हैं और किसके हाथ बिकाऊ हैं?  

अहमदाबाद में पाँच मुस्लिमों ने वक्फ बोर्ड की जमीन पर अवैध रूप से दुकानें खड़ी कर दीं। इसके बाद उन्होंने खुद को वक्फ का ट्रस्टी घोषित कर 2 दशक से उनका किराया वसूला। यह जमीन अहमदाबाद नगर निगम ने वक्फ बोर्ड को उर्दू स्कूलों के लिए दी थी लेकिन इन पर करोड़ों की दुकाने चल रही थीं। इस मामले में अब FIR दर्ज हुई है।

यह दुकानें अहमदाबाद के जमालपुर में थीं। यह मामला काँच वाली मस्जिद के पास स्थित वक्फ बोर्ड की उस भूमि से जुड़ा है। दरअसल, 2001 में आए विनाशकारी भूकंप में यह स्कूल जर्जर हो गए थे और इन्हें तोड़ दिया गया था। इसके बाद यह जमीन खाली पड़ी थी।

इसी का फायदा उठाते हुए सलीम खान पठान नामक एक व्यक्ति ने उस जमीन पर 10 दुकानें बना लीं और उन्हें किराए पर उठा दिया। सलीम खान के साथ ही मोहम्मद यासर शेख, महमूद खान पठान, फैज मोहम्मद पीर मोहम्मद और शाहिद अहमद शेख ने ना केवल इन दुकानों से बल्कि वक्फ बोर्ड की लगभग 150 और संपत्तियों से भी पिछले 20 वर्षों से लगातार किराया वसूला।

यह सारा किराया वक्फ बोर्ड के आधिकारिक खाते में जमा होने के बजाय इन आरोपितों की निजी जेबों में जाता रहा, जिससे बोर्ड को करोड़ों रुपये का नुकसान भी झेलना पड़ा। इस व्यापक धोखाधड़ी की जानकारी वक्फ बोर्ड को तब हुई जब जमालपुर के एक रिक्शा चालक, मोहम्मद रफीक अंसारी ने इस संबंध में शिकायत दर्ज कराई।

ऑपइंडिया से बातचीत में अंसारी ने बताया कि उन्होंने खुद गुजरात वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष मोहसिन लोखंडवाला को इस अवैध कब्जे की सूचना दी, लेकिन बोर्ड की ओर से कोई कार्रवाई नहीं की गई। बाद में इस मामले की पुलिस में FIR दर्ज करवाई गई। पाँचों आरोपितों को इस मामले में गिरफ्तार कर लिया गया है। ऑपइंडिया के पास यह FIR कॉपी मौजूद है।

वक्फ संपत्तियों की सुरक्षा वक्फ बोर्ड के सदस्यों और अधिकारियों की देखरेख में आता है। ऐसे में उनकी कार्यशैली पर प्रश्न उठ रहे हैं। इससे जुड़े लोगों ने पूछा है कि वक्फ की इतनी बेशकीमती जमीन पर अवैध निर्माण कैसे हो गया और कुछ बाहरी लोगों ने स्वयं को ट्रस्टी बताकर इतने लंबे समय तक किराया कैसे वसूला।

शिकायतकर्ता अंसारी ने यह भी आशंका जताई है कि इस गोरखधंधे में वक्फ बोर्ड के कुछ अंदरूनी लोग भी शामिल हो सकते हैं, जिसके कारण उनकी शिकायत पर कोई सुनवाई नहीं हुई।अंसारी ने इस मामले में अहमदाबाद पुलिस की तत्परता की सराहना की है।

उन्होंने बताया कि पुलिस अधिकारियों, विशेष रूप से गोसाई साहब, ने उनकी शिकायत पर गंभीरता से ध्यान दिया और मामले की जाँच शुरू कर दी है।

वक्फ कानून के लिए पीएम मोदी का धन्यवाद: अंसारी

ऑपइंडिया से बातचीत में शिकायतकर्ता ने हाल ही में लागू हुए नए वक्फ अधिनियम का पुरजोर समर्थन किया है। उनका मानना है कि इस नए कानून के प्रावधानों के तहत सलीम खान पठान जैसे लोगों के लिए वक्फ की जमीन पर अवैध कब्जा करना और वक्फ बोर्ड के लिए ऐसी गतिविधियों पर आँख बंद करना अब संभव नहीं होगा।
अंसारी ने इस कानून के लिए भाजपा सरकार की प्रशंसा भी की। शिकायतकर्ता ने ऑपइंडिया से बात करते हुए कहा कि नए वक्फ एक्ट के कारण सलीम खान पठान जैसे लोग अब वक्फ की जमीनों पर कब्जा नहीं कर पाएँगे और वक्फ बोर्ड भी इस पर आंख मूंदकर नहीं रह पाएगा।
उन्होंने कहा, “गांधीनगर जाकर गुजरात वक्फ बोर्ड के चेयरमैन से शिकायत करने के बावजूद उन्होंने कुछ नहीं किया। अब अगर नए कानून आ गए तो कोई भी जबरदस्ती वक्फ की जमीन पर कब्जा नहीं कर पाएगा। मैं इस कानून के लिए भाजपा सरकार की बहुत सराहना करता हूँ।”
इसके अलावा, शिकायतकर्ता को यह भी संदेह है कि सलीम खान पठान के साथ-साथ वक्फ बोर्ड के कुछ कथित ठेकेदार भी इस घोटाले में शामिल हो सकते हैं। इसीलिए वक्फ बोर्ड से शिकायत करने के बाद भी उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं की।
इसके बाद उन्होंने अहमदाबाद पुलिस से संपर्क किया और अहमदाबाद पुलिस की तारीफ करते हुए कहा, “पुलिस अधिकारी गोसाई साहब और अहमदाबाद पुलिस ने मेरी काफी मदद की है और ऐसे ठेकेदारों के खिलाफ कार्रवाई भी की है।”

पहले कानून बनती तो नहीं होती गड़बड़ी

विडंबना है कि कुछ स्वार्थी तत्व वक्फ अधिनियम को लेकर मुस्लिमों को गुमराह कर रहे हैं और उन्हें सड़कों पर उतरने के लिए उकसा रहे हैं। अहमदाबाद में सामने आया यह करोड़ों का घोटाला ऐसे ही लोगों के स्वार्थों को उजागर करता है। यदि नया वक्फ (संशोधन) अधिनियम पहले ही लागू हो गया होता, तो इस धोखाधड़ी का पर्दाफाश बहुत पहले हो गया होता।
यदि पहले यह संशोधन लागू कर दिया गया होता तो इन मुस्लिम ठेकेदारों की दुकानें बंद हो जातीं और करोड़ों की अवैध कमाई रुक जाती। यही कारण है कि वे इस नए कानून से नाराज हैं और इसे मुसलमानों के खिलाफ अत्याचार का एक साधन बता रहे हैं। लेकिन, कानून का असल उद्देश्य यह है कि वक्फ की जमीनों का असल फायदा गरीब मुस्लिमों को मिले।
यदि नया कानून लागू हो जाता तो संपत्तियों के सर्वेक्षण और रजिस्ट्रार में बदलाव होता, राज्य और केंद्र में वक्फ बोर्ड की संरचना में बदलाव होता, पिछड़े वर्ग के मुसलमानों और महिलाओं को भी बोर्ड में सदस्यता दी जाती और वक्फ और भूमि नियंत्रण की प्रक्रिया से लेकर उसकी देखरेख और वक्फ ट्रिब्यूनल में बदलाव किए जाते।
अगर ऐसा होता तो इस तरह के घोटाले बंद हो जाते और वक्फ बोर्ड के नाम पर गरीब मुसलमानों के साथ अन्याय नहीं होता। केवल 5-7 अधिकारी ही वक्फ संपत्तियों का उपयोग बंद कर देते और बड़ी मुस्लिम आबादी को इसका सीधा लाभ मिलता।
कानून लागू होने के बाद जो लोग अवैध संपत्ति अर्जित कर रहे थे, वे रुक जाएँगे। इसीलिए आज वक्फ एक्ट का विरोध हो रहा है। ताकि वे दोनों हाथों से वक्फ संपत्तियों को लूट सकें और घोटाले करके अपनी जेबें भर सकें।
हकीकत यह है कि ऐसे लोग नए वक्फ कानून पर इसलिए आपत्ति जता रहे हैं क्योंकि यह उन्हें ऐसी सम्पत्तियाँ हड़पने से रोकेगा। उन्हें ना तो गरीब मुसलमानों की परवाह है और न ही उनके मजहब की संपत्तियों की। उनकी एकमात्र चिंता यह है कि यदि कानून लागू हुआ तो उनकी दुकानें बंद हो जाएंगी।
अहमदाबाद की इस घटना का निष्कर्ष यह है कि जहाँ बहुत अधिक संपत्ति होगी, वहाँ केवल 5-7 लोग ही वक्फ की जमीनों पर शासन करेंगे और संपत्ति को अपने पास रख लेंगे। गरीब मुस्लिमों साथ हो रहे इस अन्याय को रोकने के लिए सरकार ने वक्फ अधिनियम में संशोधन किया है।

फिर से शाहीन बाग़ सजाने की तैयारी, दंगों की साजिश? CAA के बाद अब वक्फ के बहाने रामनवमी पर हो सकती है हिंसा, एजेंसियों के कान खड़े

अप्रैल 3 को News18 पर 'भईया जी कहिन' लाइव शो में यह भी चौकाने वाला मुद्दा सामने आया कि कुछ 5/3 स्टार होटल 1 रूपए महीना दे रहे हैं लेकिन लाखों रूपए महीना दूसरे रास्ते से दिए जा रहे हैं। हालाँकि इस बात की पुष्टि नहीं हो पायी है, अगर यह बात सत्य है तो मतलब खुलेआम हो रही लूट पर लगाम।     
वक्फ कानून की असीमित शक्तियों पर लगाम कसने के लिए केंद्र की मोदी सरकार ने वक्फ संशोधन बिल पेश किया, जिसे संसद के दोनों सदनों में पारित कर लिया गया है। अब इस पर राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होने के बाद यह कानून बन जाएगा। इस बीच मुस्लिमों के विरोध को लेकर सरकारें सतर्क हैं। खासकर पिछले कुछ समय से रामनवमी पर हिंदुओं के खिलाफ होने वाली हिंसा को देखकर यह सतर्कता लाजिमी है।

हालात का अनुमान लगाकर उत्तर प्रदेश सरकार ने तो पुलिस कर्मियों की छुट्टियाँ रद्द कर दी हैं। उन्हें सेवा में वापस लौटने के लिए कह दिया गया है। दरअसल, वक्फ बिल को लेकर मुस्लिमों के मजहबी नेता से लेकर मुस्लिम संगठनों के प्रमुख तक वक्फ को लेकर अफवाह फैला रहे हैं और मुस्लिमों को एक तरह से उकसाने का काम कर रहे हैं। कुछ लोगों ने यहाँ तक धमकी दे दी है कि कृषि कानूनों की तरह इसे भी वापस लेना होगा।

वक्फ संशोधन बिल पर चर्चा के दौरान हैदराबाद से सांसद और तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन औवेसी पहले ही सदन में उसकी कॉपी फाड़ चुके हैं। वो ये भी कह चुके हैं कि इस बिल के माध्यम से सरकार मुस्लिमों की संपत्तियों को ही नहीं, बल्कि उनके मजहबी स्थलों- मस्जिद, दरगाह, कब्रिस्तान आदि पर कब्जा कर लेगी। उन्होंने इसका पुरजोर विरोध करने की बात कही थी।

हैदराबाद से सांसद असदुद्दीन ओवैसी ने आगे कहा, “ये बिल मुस्लिमों के साथ अन्याय है। यह एक जंग का ऐलान है। हमारे मदरसों और मस्जिदों को निशाना बनाया जा रहा है। इस बिल से मुस्लिमों के अधिकारों को छीना जा रहा है। इस बिल से मुस्लिमों के अधिकारों को छीना जा रहा है। इसके जरिए मुस्लिमों को दूसरे दर्जे का शहरी बनाने की कोशिश की जा रही है।”

इस्लामी नेता इसहाक गोरा ने कहा कि यह बिल मुस्लिमों के धार्मिक स्वतंत्रता और कानूनी हकों पर सीधा हमला है। इससे मुस्लिमों की वक्फ संपत्तियों पर सरकारी नियंत्रण हो जाएगा। ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (AIMPLB) के प्रवक्ता सैयद कासिम रसूल इलियास ने कहा, “विधेयक पास हो जाता है तो हम इसके खिलाफ देशव्यापी आंदोलन शुरू करेंगे। हम चुप नहीं बैठेंगे।”

वहीं, जमीयत उलेमा-ए-हिंद इस बिल को बहुसंख्यकवादी मानसिकता वाला बताया है। संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि सरकार जबरन इस बिल को संसद में लाई है। जमीयत उलेमा-ए-हिंद मुंबई के अध्यक्ष मौलाना सिराज खान ने तो धमकी तक दे डाली। उन्होंने कहा, “सरकार ध्यान से सुन ले, हम जेल जाने से डरते नहीं हैं।”

सिराज ने कहा, “हमारे किसी भी मामले में अगर सरकार दखलअंदाजी करेगी तो हम जेलों को आबाद करेंगे। हम अपनी आजादी के लिए सब कुछ करने को तैयार हैं। हमारे नबी ने जीने का जो तरीका बताया है, हम उसी के हिसाब से जीने की कोशिश करते हैं। दिल्ली के शाहीन बाग की तरह देश भर में धरना प्रदर्शन किया जाएगा। महाराष्ट्र में भी शाहीन बाग की तरह आंदोलन किया जाएगा।”

शाहीन बाग की तर्ज पर हिंसा भड़काने की कोशिश

जिस तरह मुस्लिम नेता और मौलाना बयान दे रहे हैं, वह भड़काने वाला है। इसी तरह बात नागरिकता संशोधन विधेयक को लेकर फैलाई गई थी कि CAA और NRC कानून के जरिए मुस्लिमों की नागरिकता छीन ली जाएगी। ठीक उसी तर्ज पर वक्फ बिल को लेकर भी अफवाह फैलाने की कोशिश। की जा रही है कि सरकार मुस्लिमों की संपत्तियों और मस्जिद-दरगाहों पर कब्जा कर लेगी।
अगर मुस्लिम नेताओं से लेकर धर्मगुरुओं के बयानों को देखें तो वक्फ संशोधन बिल को लेकर भी ये अफवाह फैलाने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि मुस्लिमों को भ्रमित करके अधिक से अधिक उनका समर्थन हासिल किया जा सके। नागरिकता संशोधन कानून (CAA) और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC) को लेकर भी ऐसी ही अफवाह फैलाई गई थी।
उस समय तमाम नेता ने ऐसा ही किया था। जेल में बंद शरजील इमाम ने जामिया से लेकर तमाम देश के दूसरे हिस्सों तक में इसको लेकर अफवाह फैलाई थी। शरजील इमाम ने पैंफलेट छपवाकर कई मस्जिदों और यूनिवर्सिटी में बँटवाया और खुद बाँटा था। पैंफलेट में लिखा था कि मुस्लिमों को नागरिकता संशोधन कानून और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (CAA-NRC) का विरोध करना चाहिए।
पैंफलेंट सभी मुस्लिमों को एक साथ मिलकर विरोध करने की अपील की गई थी। मुस्लिमों को भड़काने के लिए इसमें कश्मीर से लेकर बाबरी ढाँचे तक का जिक्र गया था। उसमें लिखा गया था कि पहले कश्मीर, फिर बाबरी मस्जिद और अब CAA हुआ है। इस पैंफलेट में दिल्ली को डिस्टर्ब करने के लिए कहा गया था, ताकि दुनिया भर की मीडिया का ध्यान इस ओर जाए।
इस पैंफलेट बाँटने के एक दिन बाद 15 दिसंबर 2020 को कई जगहों पर हिंसा फैल गई थी। इसमें दिल्ली के जामिया मिलिया यूनिर्विसटी की हिंसा भी शामिल थी। आगे चलकर CAA-NRC के नाम पर की किए जा रहे विरोध प्रदर्शन को हिंसक बना दिया गया और आखिरकार फरवरी 2020 में पूर्वी दिल्ली के कई हिस्सों में सांप्रदायिक हिंसा फैल गई। इस हिंसा में कई लोगों की जान चली गई थी।

रामनवमी और हनुमान जयंती को लेकर सावधानी

शाहीन बाग की तर्ज पर ही वक्फ संशोधन बिल के विरोध के नाम पर एक बार फिर दिल्ली एवं अन्य जगहों को दहलाने की कोशिश की जा सकती है। रामनवमी पर वैसे भी पिछले कई सालों से सुनियोजित तरीके से हमले किए जा रहे हैं। ये हमले सिर्फ दिल्ली में ही नहीं, बल्कि यूपी-बिहार और झारखंड से लेकर कर्नाटक एवं महाराष्ट्र तक में दिया जाता रहा है।
कट्टरपंथियों द्वारा रामनवमी पर हिंसा की इस परिपाटी को वक्फ संशोधन विधेयक के विरोध के नाम पर दोहराने की कोशिश इस साल भी की जा सकती है। वैसे तो मूर्ति-पूजक हिंदुओं के खिलाफ मुस्लिम बहुल इलाकों में हमला करने की घटनाएँ अक्सर आती रहती हैं, लेकिन साल 2019 के बाद रामनवमी एवं हनुमान जयंती की शोभायात्रा पर हमले की घटनाएँ अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई हैं।
साल 2019 भारतीय राजनीति के लिए बेहद महत्वपूर्ण रहा है। इसी साल 5 अगस्त को केंद्र सरकार ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 को हमेशा के लिए खत्म कर दिया था। इसको लेकर कुछ कट्टरपंथियों के मन में एक कसक पैदा हो गई। इसी बीच 9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने लगभग 140 से अटके अयोध्या विवाद पर हिंदुओं के पक्ष में फैसला दे दिया।
कट्टरपंथियों पर यह दोहरी मार थी। अभी एक महीना भी नहीं बीते होंगे कि 11 दिसंबर 2019 को भारत सरकार ने नागरिक संशोधन विधेयक (CAA) और राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (NRC) कानून पास कर दिया। यह वह ऐसा था, जिसमें पड़ोसी इस्लामी देशों में रहने वाले वहाँ के अल्पसंख्यकों को भारत में नागरिकता देने का प्रावधान किया गया था।
इसको लेकर भी कट्टरपंथी मुस्लिमों एवं भारत विरोधी शक्तियों ने मुस्लिमों को भड़काना शुरू कर दिया कि इससे मुस्लिमों की नागरिकता छीन ली जाएगी। इसके बाद बड़े पैमाने पर हिंसा शुरू हो गई थी। मन में बसी यह कसक रामनवमी जैसी धार्मिक यात्रा पर हमला करके कट्टरपंथी निकालते रहते हैं। इस बार भी वे कुछ ऐसा ही करने की सोच रहे हैं। इससे सतर्क रहने की जरूरत है।

नेहरू ने थोपा वक्फ बोर्ड, कांग्रेस सरकारों ने पाला-पोस कर स्वतंत्र भारत में ‘मजहबी जमींदार’ को बना दिया देश के लिए नासूर


वक्फ संशोधन कानून को लेकर देश में चर्चा जारी है। मुस्लिम आक्रांताओं द्वारा मस्जिदों संचालन के लिए दिए गए दो गाँवों से शुरू हुआ भारत में वक्फ संपत्ति का रिवाज आज 9.4 लाख एकड़ तक पहुँच गया है। आज भारत में वक्फ के पास 8.7 लाख से ज्यादा संपत्तियाँ हैं। दुनिया के किसी भी देश, यहाँ तक कि मुस्लिमों मुल्कों में भी वक्फ के पास इतनी संपत्तियाँ नहीं हैं।

भारत में वक्फ की औपचारिक शुरुआत का श्रेय इस्लामी आक्रांता मोहम्मद गोरी को दिया जाता है। गोरी अफगानिस्तान के घोर प्रांत से आया एक तुर्की शासक था, जिसने 12वीं सदी के अंत में भारत पर कई हमले किए। 1175 में उसने मुल्तान के इस्माइली शासक को हराया था। गोरी ने सन 1185 में मुल्तान की जामा मस्जिद के लिए दो गाँव दान में दिए। इन गाँवों का मैनेजमेंट शेख-अल-इस्लाम को सौंपा गया।

मुगल काल में भी मस्जिद-मकबरों-दरगाहों को इस्लामी शासक बड़ी-बड़ी संपत्तियाँ देते रहे। अंग्रेज जब आए तो उन्होंने इस पर नियंत्रण करने की कोशिश की, लेकिन मुस्लिमों के विरोध के बाद उन्होंने इसे कानूनी रूप से दे दिया। इस कानून का ड्राफ्ट पाकिस्तान के जन्मदाता मोहम्मद अली जिन्ना ने तैयार किया था। भारत जब आजाद हुआ तो भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेेहरू ने इसे जारी रखा।

मुस्लिम तुष्टिकरण हवा देते हुए पहली सन 1954 में देश के पंडित नेहरू ने वक्फ एक्ट बनाया। इससे वक्फ बोर्ड नाम की एक संस्था बनी। इस कानून के तहत कांग्रेस सरकार ने बँटवारे के बाद भारत से पाकिस्तान गए मुस्लिमों की जमीनें एवं संपत्तियाँ वक्फ बोर्डों को दे दीं। इस कानून के लागू होने के एक साल बाद यानी सन 1955 में इसमें संशोधन करके हर राज्य में वक्फ बोर्ड बनाए जाने की बात कही गई।

इसका परिणाम ये हुआ है कि आज देश के करीब 32 राज्यों में वक्फ बोर्ड हैं। उत्तर प्रदेश और बिहार समेत कई राज्यों में शिया और सुन्नी मुस्लिमों के लिए अलग-अलग वक्फ बोर्ड हैं। ये बनाए तो गए थे वक्फ की संपत्तियों का रजिस्ट्रेशन, देखरेख और उनका प्रबंधन करने के लिए, लेकिन ये बोर्ड आज सरकारी जमीनों-इमारतों के साथ-साथ हिंदुओं के पूरे-के-पूरे गाँवों तक पर दावा किए जाने लगे।

सन 1964 में एक संशोधन पारित किया गया था। इसके तहत केंद्रीय वक्फ परिषद (Central Waqf Council) की स्थापना की गई। इसका उद्देश्य वक्फ संपत्तियों के केंद्रीकरण को बढ़ावा देना शामिल था। यह भारत सरकार का एक वैधानिक निकाय है। यह केन्द्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण के अधीन आता है। इसका काम केंद्र सरकार को सलाह देना है।

दरअसल, CWC का उद्देश्य वक्फ संबंधित मामलों में केंद्र सरकार को सलाह देने का काम था। यह सलाह वक्फ संपत्तियों के रख-रखाव से संबंधित होता था। CWV का अध्यक्ष केंद्रीय अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री होता है। सन 1984 में वक्फ प्रशासन के पुनर्गठन के लिए वक्फ जाँच समिति गठित की गई। उसकी रिपोर्ट का मुस्लिमों ने भारी विरोध किया। इसके बाद इसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।

शाहबानो और मंडल-कमंडल के बीच बाबरी ढाँचा गिरने के बाद तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने मुस्लिम तुष्टिकरण की नई परिभाषा लिखी। प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हाराव की सरकार ने दो बड़े विवादित कानून बनाए। इनमें से एक पूजा स्थल अधिनियम और दूसरा वक्फ बोर्ड 1995 शामिल है। वक्फ बोर्ड 1995 में तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने वक्फ बोर्ड को बेहद ताकतवर बना दिया।

इस एक्ट की धारा 3(R) में कहा गया कि अगर किसी संपत्ति को मुस्लिम कानून के मुताबिक पवित्र, मजहबी या परोपकारी मान लिया जाए तो वह वक्फ की संपत्ति हो जाएगी। इसमें ये कहा गया है कि यदि वक्फ बोर्ड को लगता है कि कोई भी जमीन किसी मुस्लिम की है तो वह उसे वक्फ संपत्ति घोषित कर सकता है। इसके लिए वक्फ बोर्ड को कोई कागजात पेश करने की जरूरत नहीं होगी।

उस जमीन पर जिस व्यक्ति को आपत्ति होगी, उसे कागजात दिखाकर साबित करना होगा कि यह उसकी संपत्ति है। इतना ही नहीं, इस अधिनियम की धारा 40 में कहा गया है कि जमीन किसकी है, यह वक्फ का सर्वेयर और वक्फ बोर्ड तय करेगा। बोर्ड का यह निर्णय ही अंतिम होगा, जब तक कि उस निर्णय पर वक्फ ट्रिब्यूनल रोक ना लगा दे या उसे बदल ना दे।

इसके अलावा, बोर्ड उस किसी भी संपत्ति की जाँच कर सकता है, जिसके वक्फ संपत्ति होने का दावा किया जाता है। इस धारा में आगे कहा गया है कि अगर वक्फ बोर्ड को विश्वास हो जाता है कि यह वक्फ की संपत्ति है तो उसे वक्फ संपत्ति के रूप में पंजीकृत करने का आदेश दे सकता है। केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने कहा कि वक्फ कानून की धारा 40 को ‘काला कानून’ बताया है।

बात यहीं रूक जाती तो समझ में आता। कांग्रेस के नेतृत्व वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन-2 (UPA-2) के शासनकाल में वक्फ अधिनियम को और मजबूत किया गया। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार ने साल 2013 में वक्फ कानून में संशोधन करके वक्फ बोर्डों को असीमित अधिकार दे दिए गए। इस संशोधन के जरिए वक्फ बोर्ड को स्वायत्ता दे दी गई।

इस संशोधन के जरिए इससे जुड़े विवाद में कलेक्टर को भी हस्तक्षेप करने से रोक दिया गया। इस कानून में कहा गया कि अगर वक्फ बोर्ड किसी व्यक्ति संपत्ति को वक्फ संपत्ति बता देता है तो उसके खिलाफ वह कोर्ट नहीं जा सकता। उसे वक्फ बोर्ड से ही गुहार लगाना होगा। अगर बोर्ड बात नहीं मानता है तो वह वक्फ ट्रिब्यूनल जा सकता है।

हालाँकि, कानून में यह भी प्रावधान कर दिया गया है कि विवादित मामले में वक्फ ट्रिब्यूनल का फैसला ही अंतिम अंतिम होगा। इस फैसले को कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती, यहाँ तक कि सुप्रीम कोर्ट में भी नहीं। इस तरह न्याय पाने के सारे दरवाजे को इस कानून के माध्यम से यूपीए सरकार ने हमेशा के लिए बंद कर दिया है।

अगर वर्तमान में हम वक्फ बोर्ड की संरचना की बात करें तो इसमें एक सर्वे कमिश्नर होता है। यह सर्वे कमिश्नर संपत्तियों का लेखा-जोखा रखता है। इसके अलावा, बोर्ड में मुस्लिम विधायक, मुस्लिम सांसद, मुस्लिम IAS अधिकारी, मुस्लिम टाउन प्लानर, मुस्लिम अधिवक्ता और मुस्लिम बुद्धिजीवी जैसे लोग शामिल होते हैं।

वक्फ ट्रिब्यूनल में प्रशासनिक अधिकारी होते हैं। ट्रिब्यूनल में कौन शामिल होगा, इसका फैसला संबंधित राज्य की सरकार करती है। मुस्लिम तुष्टिकरण की नीति और वोटबैंक की राजनीति के कारण राज्य सरकारें आमतौर पर वक्त बोर्ड और ट्रिब्यूनल में मुस्लिमों को ही शामिल करती हैं, ताकि वो खुद को मुस्लिम हितैषी दिखा सके।