Showing posts with label #Tamil Nadu. Show all posts
Showing posts with label #Tamil Nadu. Show all posts

MOU के बाद भी सुस्त रहा तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश ने फुर्ती से पकड़े मझगाँव डॉक के 29000 करोड़ रूपए: चंद्रबाबू नायडू के नेतृत्व में NDA सरकार ला रही बड़े निवेश

                 मझगांव डॉक ने किया आंध्र प्रदेश में 29000 करोड़ रूपए का निवेश (फोटो साभार: MDL)
कहते हैं गायक का जुबान और नाचने वाले के पैर कभी नहीं रुकते। ठीक उसी तरह दिमाग में विकास वाला नेता विकास का कोई मौका नहीं छोड़ता। आंध्र प्रदेश के दो टुकड़े होने से पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने जो विकास किया था दुर्भाग्य से विकासशील हिस्सा तेलंगाना में चला गया। देखा जाए तो आज तेलंगाना नायडू की बोई फसल पर जी रहा है। 

आंध्र प्रदेश देश में निवेश के सबसे बड़े केंद्र के रूप में उभर रहा है। तमिलनाडु की द्रमुक सरकार के ढुलमुल रवैए का फायदा उठाते हुए अब मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की अगुवाई वाली एनडीए सरकार ने एक और बड़ा दाँव मारा है। यह रफ्तार आगे भी जारी रहने वाली है क्योंकि सरकारी जहाज बनाने वाली कंपनी मझगांव डॉक लिमिटेड (MDL) तिरुपति जिले के दुगराजपटनम में आंध्र प्रदेश के प्रस्तावित मेगा शिपबिल्डिंग क्लस्टर में 29,000 करोड़ रुपए से ज्यादा का निवेश कर रही है।

मझगांव डॉक लिमिटेड (MDL) नाम की यह बड़ी डिफेंस पीएसयू (PSU) आंध्र प्रदेश के शिपबिल्डिंग प्रोजेक्ट में मुख्य निवेशक बनने के लिए तैयार है, जिसका लक्ष्य 1.2 मिलियन टन सालाना क्षमता का है। इस मेगा प्रोजेक्ट में राज्य सरकार और विशाखापत्तनम पोर्ट अथॉरिटी जमीन और समुद्री बुनियादी ढाँचे के लिए 5,289 करोड़ रुपए का योगदान देंगे, जबकि मुख्य निवेशक MDL इसमें 23,964 करोड़ रुपए का निवेश करेगा।

मझगांव डॉक लिमिटेड के प्रतिनिधि जल्द ही इस जगह की संभावनाओं का आकलन करने के लिए आंध्र प्रदेश का दौरा कर सकते हैं।

तमिलनाडु की सुस्ती बनी आंध्र प्रदेश के लिए मौका

आंध्र प्रदेश सरकार और MDL के बीच राज्य के प्रस्तावित शिपबिल्डिंग क्लस्टर में भारी निवेश को लेकर बातचीत शुरू होने से पहले इस डिफेंस पीएसयू ने तमिलनाडु की तत्कालीन द्रमुक (DMK) सरकार के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए थे।

सितंबर 2025 में MDL ने ‘मैरीटाइम अमृत काल विजन 2047’ के तहत थूथुकुडी में 15,000-18,000 करोड़ रुपए की अनुमानित लागत से एक ग्रीनफील्ड शिपयार्ड बनाने के लिए तमिलनाडु सरकार के साथ समझौता किया था। हालाँकि द्रमुक सरकार ने इसमें ढुलमुल रवैया अपनाया और बाद में MDL के साथ तय प्रक्रिया को छोड़कर दक्षिण कोरिया की एचडी हुंडई हेवी इंडस्ट्रीज (HD Hyundai Heavy Industries) के साथ एक विशेष समझौता कर लिया।

MDL को तमिलनाडु सरकार से एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EoI) का इंतजार था, हालाँकि द्रमुक सरकार ने न तो प्रोजेक्ट शुरू करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया और न ही इस प्रस्ताव को सीधे तौर पर मना किया।

तमिलनाडु सरकार के इस कदम से MDL-थूथुकुडी प्रोजेक्ट अधर में लटक गया और भारत की एक प्रमुख डिफेंस पीएसयू किनारे हो गई। MDL ने आरोप लगाया कि द्रमुक सरकार द्वारा तय चयन प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया और भारतीय शिपबिल्डिंग कंपनियों को प्रतिस्पर्धा करने का सही मौका नहीं दिया गया। पीएसयू ने पारदर्शिता और जिस तरह से तमिलनाडु सरकार ने एंकर शिपयार्ड का चयन किया, उस पर भी सवाल उठाए।

अब जब MDL के आंध्र प्रदेश में बड़ा निवेश करने की खबरें आ रही हैं, तो तमिलनाडु के कई लोग द्रमुक सरकार की आलोचना कर रहे हैं कि उनकी वजह से राज्य के हाथ से रक्षा क्षेत्र से जुड़ा एक महत्वपूर्ण निवेश निकल गया।

आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के बीच रक्षा, मैन्युफैक्चरिंग और बंदरगाह से जुड़े निवेश को लेकर लंबे समय से मुकाबला चल रहा है। दोनों राज्य निवेश को आकर्षित करने के लिए अपने तटीय इलाकों, कुशल कामगारों और रियायतों का इस्तेमाल करते हैं। तेलुगु देशम पार्टी (TDP) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) गठबंधन के शासन वाले आंध्र प्रदेश ने ‘बिजनेस करने की रफ्तार’ (speed of doing business) को लेकर बड़े स्तर पर मार्केटिंग की है, जिसमें जमीन की उपलब्धता, नीतिगत स्थिरता और राज्य व केंद्र दोनों जगह भाजपा की सरकार होने के कारण केंद्रीय समन्वय को प्रमुखता से दिखाया गया है।

चंद्रबाबू नायडू की NDA सरकार में आंध्र प्रदेश बना उद्योगों के लिए आकर्षक

बीते कुछ महीनों में तमिलनाडु और कॉन्ग्रेस शासित कर्नाटक से एनडीए शासित आंध्र प्रदेश में कई बड़े निवेशकों का ट्रांसफर देखा गया है।

अगस्त 2025 में तमिलनाडु की द्रमुक सरकार ने थूथुकुडी में दक्षिण कोरिया की ह्वासुंग फुटवियर (Hwaseung Footwear) द्वारा 1,720 करोड़ रुपये के नॉन-लेदर फुटवियर प्लांट की घोषणा की थी, जिससे 20,000 से अधिक नौकरियों का वादा किया गया था। हालाँकि तमिलनाडु सरकार की ओर से हुई देरी और लापरवाही के कारण ह्वासुंग को बेहतर विकल्पों की तलाश करनी पड़ी। नवंबर 2025 तक यह प्रोजेक्ट आंध्र प्रदेश के कुप्पम में शिफ्ट हो गया।

दक्षिण कोरियाई कंपनी ह्वासुंग ने एनडीए के नेतृत्व वाले राज्य आंध्र प्रदेश में 150 मिलियन डॉलर के निवेश के साथ अपना नॉन-लेदर स्पोर्ट्स शू मैन्युफैक्चरिंग हब स्थापित करने की घोषणा की। राज्य सरकार ने ह्वासुंग को 100 एकड़ जमीन आवंटित की। अब यह प्रोजेक्ट आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की विधानसभा सीट कुप्पम में आकार ले रहा है।

मई 2026 में तमिलनाडु के हाथ से प्रस्तावित एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) फ्लाइट टेस्टिंग और इंटीग्रेशन कॉम्प्लेक्स डिफेंस एयरोस्पेस प्रोजेक्ट भी निकल गया और यह आंध्र प्रदेश के पास चला गया। हालाँकि तमिलनाडु सरकार डीआरडीओ (DRDO) से जुड़े इस 15,000 करोड़ रुपए के प्रोजेक्ट को हासिल करने की कोशिश में थी और उसने बेंगलुरु के एयरोस्पेस क्लस्टर के पास होसुर में जमीन और रनवे की पेशकश की थी। लेकिन आंध्र प्रदेश ने तेजी से मंजूरी देने और एक एकीकृत डिफेंस कॉरिडोर के विजन की पेशकश करके यह बाजी जीत ली।

यह प्रोजेक्ट आंध्र प्रदेश के पुट्टपार्थी में गया, और इस साल मई में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और मुख्यमंत्री नायडू ने 600 एकड़ की इस फैसिलिटी का शिलान्यास किया। इस पर केंद्र द्वारा पक्षपात करने के आरोप भी लगे, हालाँकि खबरों में कहा गया कि आंध्र प्रदेश को प्रोजेक्ट सौंपना विभिन्न राज्यों में रक्षा निर्माण क्षमताओं को बाँटने की रणनीति का हिस्सा था।

जहाँ तमिलनाडु ने होसुर में 100 एकड़ जमीन मुफ्त देने की पेशकश की थी, वहीं आंध्र प्रदेश ने पुट्टपार्थी में 650 एकड़ का एक बड़ा डेडिकेटेड हब ऑफर किया।

राज्यों के बीच यह मुकाबला सिर्फ आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका विस्तार कर्नाटक तक भी है। जुलाई 2025 में कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार को तीन साल से चल रहे किसानों के लगातार विरोध प्रदर्शनों के कारण बेंगलुरु हवाई अड्डे के पास एक प्लान्ड एयरोस्पेस पार्क के लिए देवनहल्ली में कृषि भूमि का अधिग्रहण करने के प्रस्ताव को रद्द करना पड़ा था।

राज्य ने पहले इस एयरोस्पेस प्रोजेक्ट के लिए चन्नरायपटना और देवनहल्ली तालुक के आसपास के गाँवों में 1,777 एकड़ जमीन का अधिग्रहण करने का प्रस्ताव रखा था। लेकिन किसानों ने पहले दिन से ही इस कदम का विरोध करते हुए दावा किया था कि यह जमीन उपजाऊ है और उनकी आजीविका का एकमात्र साधन है।

जब कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार ने इस प्रोजेक्ट को रद्द कर दिया, तो आंध्र प्रदेश ने तुरंत इस मौके का फायदा उठाया। राज्य के मानव संसाधन विकास मंत्री नारा लोकेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक खुला निमंत्रण देते हुए लिखा, ‘प्रिय एयरोस्पेस इंडस्ट्री, इसके (विरोध प्रदर्शन) बारे में सुनकर दुख हुआ। मेरे पास आपके लिए एक बेहतर विचार है। आप इसके बजाय आंध्र प्रदेश को क्यों नहीं देखते? हमारे पास आपके लिए एक आकर्षक एयरोस्पेस नीति है, जिसमें बेहतरीन प्रोत्साहन और 8000 एकड़ से अधिक तैयार जमीन (बेंगलुरु के ठीक बाहर) उपलब्ध है! उम्मीद है कि टेबल पर बैठकर बात करने के लिए आपसे जल्द ही मुलाकात होगी।”

साफ है कि आंध्र प्रदेश की एनडीए सरकार न केवल राज्य को मैन्युफैक्चरिंग प्रोजेक्ट्स के लिए एक आदर्श जगह के रूप में पेश कर रही है, बल्कि तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे प्रतिस्पर्धी राज्यों में दिक्कतों का सामना कर रहे निवेशकों को भी आक्रामक रूप से अपने साथ जोड़ रही है।

टेक, डेटा सेंटर, एआई (AI) और एयरोस्पेस से लेकर आंध्र प्रदेश ने दूसरे राज्यों से निवेश हासिल किया है और वह इसका दावा करने से पीछे नहीं हटता।

साल 2025 में गूगल (Google) ने भारत के सबसे बड़े एआई और डेटा सेंटर्स में से एक के लिए विशाखापत्तनम में 15 बिलियन डॉलर या 1.25 लाख करोड़ रुपये के भारी-भरकम निवेश का ऐलान किया।

बेंगलुरु के पास आईटी की ताकत और बुनियादी ढाँचा होने के बावजूद गूगल द्वारा इस दौड़ में अपने प्रतिस्पर्धी कर्नाटक के बजाय आंध्र प्रदेश को चुनना कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार को रास नहीं आया। कर्नाटक के आईटी मंत्री प्रियांक खड़गे की X पर आंध्र प्रदेश के आईटी मंत्री नारा लोकेश के साथ तीखी बहस भी हुई थी।

आंध्र प्रदेश सरकार ने 22,000 करोड़ रुपए के बड़े प्रोत्साहन पैकेज की पेशकश करके गूगल का यह निवेश सुरक्षित किया। इस पैकेज में जमीन पर 25% की छूट, पानी के टैरिफ पर 25% की छूट, 100% मुफ्त बिजली ट्रांसमिशन के साथ-साथ स्टेट जीएसटी (SGST) की पूरी प्रतिपूर्ति शामिल थी।

आंध्र प्रदेश ने पिछले साल कर्नाटक की सरला एविएशन के 1,300 करोड़ रुपए के इलेक्ट्रिक एयर-टैक्सी मैन्युफैक्चरिंग प्रोजेक्ट ‘स्काई फैक्ट्री‘ को भी अपने नाम कर लिया। यह प्रोजेक्ट आंध्र प्रदेश के अनंतपुरम जिले में विकसित किया जाएगा। कर्नाटक की एक कंपनी का अपने गृह राज्य को छोड़कर मैन्युफैक्चरिंग प्रोजेक्ट के लिए दूसरे राज्य को चुनना कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार के लिए एक बड़े झटके के रूप में देखा गया।

इसके अलावा आंध्र प्रदेश की ‘काम करने की रफ्तार’ का असर कॉन्ग्रेस शासित तेलंगाना पर भी पड़ा है। मार्च 2025 में हैदराबाद की प्रीमियर एनर्जीज (Premier Energies) ने घोषणा की कि वह तेलंगाना के सीतारामपुर से आंध्र प्रदेश के नायडूपेटा में अपना 1,700 करोड़ रुपये का प्रस्तावित 4 GW सोलर फोटोवोल्टिक सेल मैन्युफैक्चरिंग प्लांट शिफ्ट कर रही है। इस प्रोजेक्ट से करीब 3,500 नौकरियाँ पैदा होंगी।

प्रतिस्पर्धी राज्यों की तुलना में आगे निकलकर एक और प्रोजेक्ट को हासिल करने की जानकारी देते हुए आंध्र प्रदेश के आईटी मंत्री नारा लोकेश ने X पर लिखा, “एपी (AP) ने रिकॉर्ड समय में एपीआईआईसी (APIIC) के माध्यम से 269 एकड़ जमीन को तेजी से मंजूरी दी। ये बातचीत अक्टूबर 2024 में शुरू हुई थी और फरवरी 2025 तक जमीन आवंटित कर दी गई। यह जमीन बंदरगाहों के करीब है और सक्रिय प्रोत्साहनों से समर्थित है। यह आंध्र प्रदेश को एक अग्रणी सौर विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करता है, जिससे औद्योगिक विकास और राज्य की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी, जिसकी क्षमता को 7 GW तक बढ़ाने की योजना है। आंध्र प्रदेश को भारत के दूसरे सबसे बड़े एकीकृत सौर सेल और मॉड्यूल निर्माता का एपी में स्वागत करते हुए गर्व हो रहा है – जो हमारे युवाओं के लिए बैकवर्ड इंटीग्रेशन और ग्रीन जॉब्स को बढ़ावा देगा।”

                                                            नारा लोकेश के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

यहाँ एक दिलचस्प बात यह है कि खबरों के मुताबिक आंध्र प्रदेश ने एनडीए शासन के दो सालों के भीतर लगभग 23 लाख करोड़ रुपए का निवेश आकर्षित किया है।

मुख्यमंत्री नायडू ने इस बारे में कहा, “कल्याण, विकास और सुशासन प्रदान करने के साथ-साथ एनडीए सरकार विशाखापत्तनम, अमरावती और तिरुपति क्षेत्रों का विकास कर रही है। रायलसीमा में रक्षा, ड्रोन, स्पेस, एयरोस्पेस और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्रों के उद्योग आ रहे हैं। एनडीए शासन के दौरान राज्य ने अब तक 23 लाख करोड़ रुपए का निवेश आकर्षित किया है। हम हर घर में सोलर रूफटॉप के जरिए बिजली पैदा करने का अवसर दे रहे हैं। रॉयल एनफील्ड तिरुपति में 18 महीनों में एक मोटरसाइकिल मैन्युफैक्चरिंग प्लांट स्थापित कर रही है।”

हालाँकि आंध्र प्रदेश की आक्रामक निवेश रणनीतियों से अन्य राज्य सरकारों का सतर्क होना स्वाभाविक है, लेकिन एनडीए शासित यह राज्य भारत की विकास गाथा में योगदान देने में जितना हो सके आगे रहना चाहता है। आंध्र प्रदेश सरकार वैश्विक और घरेलू कंपनियों को राज्य में अपनी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स लगाने के लिए सिंगल-विंडो क्लीयरेंस, लैंड बैंक, सब्सिडी और केंद्रीय सहयोग का पूरा इस्तेमाल कर रही है।

हर कब्र-दरगाह वक्फ की प्रॉपर्टी नहीं: सिर्फ इस्लाम से जुड़े होने के कारण बोर्ड नहीं कर सकता कब्जा: मद्रास हाई कोर्ट

                           दरगाह पर मद्रास हाईकोर्ट का फैसला (प्रतिकात्मक फोटो, साभार- chatgpt)
मद्रास हाई कोर्ट ने 5 जून को दरगाह और वक्फ बोर्ड की संपत्ति को लेकर अहम फैसला सुनाया है। कोर्ट का कहना है कि किसी दरगाह का किसी जगह पर होना ही इस बात का सबूत नहीं है कि जिस जमीन पर वो है, वो वक्फ की प्रॉपर्टी बन जाए। कोर्ट ने साफ किया कि वक्फ बोर्ड को जमीन पर अपना हक साबित करने के लिए डॉक्यूमेंट्स और प्रोसिजर को फॉलो करना होगा।

240 साल पुरानी दरगाह से जुड़े मामले में मद्रास हाई कोर्ट ने देखा कि जमीन का ना तो वक्फ सर्वे हुआ था और न ही उसे वक्फ प्रॉपर्टी के तौर पर नोटिफाइड किया गया था। इसी आधार पर दरगाह के रजिस्ट्रेशन के आदेश को कोर्ट ने रद्द कर दिया।

तमिलनाडु वक्फ बोर्ड बनाम सैयद हबीबुल्लाह शाह कहदारी के मामले में न्यायमूर्ति के गोविंदराजन थिलाकवाड़ी ने कहा कि वक्फ बोर्ड को कानूनी रूप से भूमि पर स्वामित्व साबित करना होगा। कोर्ट ने कहा, किसी दरगाह होने मात्र से वह वक्फ बोर्ड के अधिकार क्षेत्र में नहीं आ जाता, जब तक कि कानून के मुताबिक वह भूमि वक्फ की संपत्ति माना न जाए।

न्यायाधीश ने इस बात पर जोर दिया कि हर कब्र या दरगाह अपने आप वक्फ की संपत्ति नहीं बन जाती। उन्होंने साफ किया कि मुस्लिम कानून के मुताबिक किसी धार्मिक उद्देश्य के लिए जब कोई मुस्लिम व्यक्ति अपनी संपत्ति को पूरी तरह से दे देता है, तब वह वक्फ बोर्ड का होता है।

कोर्ट ने तमिलनाडु वक्फ बोर्ड के प्रस्ताव को भी खारिज कर दिया, जिसमें ट्रिप्लिकेन में मौजूद सैय्यद हबीबुल्लाह शाह खदारी आरिफ रब्बानी हजरत दरगाह के लिए बोर्ड ने एक मुतवल्ली नियुक्त किया था। बोर्ड ने बगैर सर्वेक्षण पूरा किए वक्फ अधिनियम के तहत रजिस्ट्रेशन का भी निर्देश दिया था।

240 साल पुराने दरगाह का 40 साल से परिवार कर रहा देखरेख

ये मामला ट्रिप्लिकेन के 240 साल पुराने दरगाह से जुड़ा हुआ है।इसकी देखरेख याचिकाकर्ता का परिवार पिछले 40 साल से कर रहा है। उसने वक्फ बोर्ड के फैसले को कोर्ट में चुनौती देते हुए कहा कि जमीन लोक निर्माण विभाग की है, न की वक्फ बोर्ड की।

याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट में कहा कि वक्फ अधिनियम के तहत प्रक्रिया का पालन किए बगैर संपत्ति को वक्फ संपत्ति घोषित करने या किसी मुतवल्ली को नियुक्त करने का अधिकार वक्फ बोर्ड को नहीं है।

तमिलनाडु वक्फ बोर्ड ने कोर्ट में इसका विरोध करते हुए कहा कि भूमि और आसपास का क्षेत्र दरगाह का है और बाद में यह लोकनिर्माण विभाग में आ गया।

लोक निर्माण विभाग ने कोर्ट को बताया कि यह सरकारी भूमि था और इसे भारत स्काउट्स एंड गाइड्स को बिना किराए के आवंटित किया गया था। विभाग ने यह भी आरोप लगाया कि परिवार ने उसकी सहमति के बिना दरगाह की भूमि को धोखाधड़ी से पंजीकृत कराया था।

कोर्ट ने इस मामले में फैसला सुनाते हुए कहा कि ऐसा कोई प्रमाण नहीं है, जिससे साबित हो सके कि संपत्ति वक्फ बोर्ड की है। इसलिए वक्फ बोर्ड के दावे को खारिज कर दिया गया।

कोर्ट ने कहा कि हर कब्र और दरगाह को खुद ब खुद वक्फ संपत्ति नहीं माना जा सकता है और कोर्ट को निजी पारिवारिक कब्र और सार्वजनिक धार्मिक उद्देश्य वाली जमीन में अंतर करना होगा।

कोर्ट ने कहा, ” यदि किसी दरगाह का कभी सर्वेक्षण नहीं किया गया है, उसे पंजीकृत नहीं किया गया है या वक्फ के रूप में अधिसूचित नहीं किया गया है, तो वक्फ बोर्ड सामान्यतः केवल इसलिए स्वतः नियंत्रण ग्रहण नहीं कर सकता क्योंकि वह एक मुस्लिम धार्मिक संस्था है।”

वक्फ बोर्ड को किसी संस्था पर नियंत्रण रखने से पहले उस पर उसका अधिकार है, इससे जुड़े दस्तावेज और दूसरे सबूत देने होंगे। ऐसा कोई कानूनी दस्तावेज नहीं है, जिससे साबित हो कि संपत्ति वक्फ बोर्ड को दी गई थी या यह बोर्ड की संपत्ति थी। बिना सर्वे के दरगाह को पंजीकृत कराना गलत है

तमिलनाडु : शपथ में उडी संविधान की धज्जियाँ ; कांग्रेस मंत्री शपथ लेने के बीच चिल्लाकर लगाने लगे राहुल-राजीव गाँधी का नाम: राज्यपाल ने फटकारा, कहा- ये सब नहीं चलेगा

     कांग्रेस नेता ने शपथ के दौरान राहुल-राजीव गाँधी के नारे लगाए, राज्यपाल ने टोका (साभार : PTI Video SS)
तमिलनाडु में सी जोसेफ विजय के नेतृत्व वाली कैबिनेट का गुरुवार (21 मई 2026) को विस्तार हुआ। इस दौरान कुल 23 मंत्रियों ने शपथ ली। शपथ ग्रहण में तब विवाद हो गया जब कांग्रेस  मंत्री एस राजेश कुमार ने राहुल गाँधी और राजीव गाँधी के नाम के नारे लगाए।

राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ अर्लेकर ने उन्हें तुरंत बीच में ही रोक दिया। राज्यपाल ने कड़े शब्दों में कहा कि यह शपथ का हिस्सा नहीं है। इस घटना का Video सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है।

कांग्रेस पार्टी पूरे 59 साल बाद राज्य सरकार का हिस्सा बनी है। इससे पहले कॉन्ग्रेस 1967 में सत्ता में थी। 2026 के विधानसभा चुनाव में विजय की पार्टी (TVK) सबसे बड़े दल के रूप में उभरी थी। बहुमत के लिए उन्होंने कॉन्ग्रेस और अन्य क्षेत्रीय दलों के साथ गठबंधन किया।

‘तमिलनाडु में मोदी की हार, सनातन की हार’: कांग्रेस विधायक JMH मौलाना ने उगला हिंदुओं के खिलाफ जहर, कहा- राज्य में नहीं रहेगा ये धर्म

                                                      तमिलनाडु कांग्रेस नेता मौलाना
तमिलनाडु के वेलाचरी से विधानसभा चुनाव जीते कांग्रेस विधायक जेएमएच आसान मौलाना ने सनातन धर्म पर हमला बोला है। उनका कहना है कि राज्य की सत्ता से पलनीस्वामी बाहर है मतलब पीएम मोदी बाहर हैं। इसका मतलब है कि सनातन धर्म तमिलनाडु से बाहर हो चुकी है और राज्य में यह हार गई है।

एक समय था जब कांग्रेस दक्षिण भारत के बलबूते केंद्र में सरकार बनाकर सुरमा भोपाली बनती थी आज उसी दक्षिण में कांग्रेस लगभग शून्य है। और अब वर्तमान तमिलनाडु चुनाव में सिर्फ 5 सीट जीत सुरमा भोपाली बन सनातन के विरुद्ध बकवास कर रही है। सच्चाई यह है कि अन्य प्रदेशों की भांति तमिलनाडु में भी हिन्दू जातिगत सियासत में जकड़ा हुआ है, जबकि हिन्दू बहुसंख्यक है। और जिस दिन हिन्दू इस जकड़न से बाहर हुआ जितने भी सनातन विरोधी हैं सभी चारों खाने चित होंगे जिस तरह बंगाल में। यह लगता है एक या दो चुनाव की बात है जब तमिलनाडु, केरलम आदि राज्यों में सनातन पताका फहराएगी।    

उनके बयान का वीडियो सामने आने के बाद लोगों की प्रतिक्रिया सामने आ रही है। कई लोग इसे धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुँचाने वाला और हिन्दू विरोधी करार दिया है।

तमिलनाडु में कांग्रेस ने 5 विधानसभा सीटें जीती हैं और विजय सरकार का समर्थन कर रही है। 

अवलोकन करें:-

असम, तमिलनाडु, केरलम और पश्चिम बंगाल में मुस्लिम लीगी बनी कांग्रेस; पाकिस्तान की मांग नहीं करने
असम, तमिलनाडु, केरलम और पश्चिम बंगाल में मुस्लिम लीगी बनी कांग्रेस; पाकिस्तान की मांग नहीं करने
 

असम, तमिलनाडु, केरलम और पश्चिम बंगाल में मुस्लिम लीगी बनी कांग्रेस; पाकिस्तान की मांग नहीं करने वाले भाग गए और मांगने वाले रुके रहे भारत में

                                                                                    साभार: सोशल मीडिया  
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पिछले कुछ वर्षों से अपने भाषणों में लगातार एक बात कहते रहे हैं कि कांग्रेस अब एमएलसी यानी ‘मुस्लिम लीगी कांग्रेस’ बनती जा रही है। कांग्रेस के युवराज और अन्य नेता इसे चुनावी जुमला कहकर खारिज करता रहे हैं, लेकिन हाल ही में पश्चिम बंगाल, असम और तमिलनाडु के विधानसभा चुनावों के आंकड़े कांग्रेस की राजनीति की ऐसी तस्वीर साफ-साफ पेश कर रहे हैं। जनता-जनार्दन द्वारा दिए गए जनादेश में अब कांग्रेस के लिए भी इसे नजरअंदाज करना आसान नहीं है। 

याद करो, आज़ादी से पहले जब मुस्लिम लीग की मांग पर भारत खंडित हुआ था तब भारत को खंडित करने वाले पाकिस्तान नहीं गए, पाकिस्तान भागे पाकिस्तान नहीं मांगने वाले। दूसरे, भारत के खंडित होने पर मोहम्मद अली जिन्ना ने कहा था "पाकिस्तान जाने वाले मुसलमानों का नारा है 'हंस के लिया पाकिस्तान लड़के लेंगे हिंदुस्तान' तो मुस्लिम लीग को हिन्दुस्तान में बैन कर दो लेकिन मुस्लिम वोट की भूखी कांग्रेस ने बैन करने की बजाए सिर्फ केरल तक सीमित रखा लेकिन इंदिरा गाँधी उसी विभाजनकारी लीग को केरल से बाहर ले आयी। और आज कांग्रेस नेहरू और इन्दिरा की मुस्लिम वोटबैंक सियासत को अपना कर सनातन का अपमान करती आ रही है और गुलाम हिन्दू कांग्रेस की सेकुलरिज्म की शराब में डूबा है।  

भारत का संविधान बनाने में संविधान सभा में 23 सदस्य ऐसे थे जो 1946 में पाकिस्तान बनाने के लिए मुस्लिम लीग की टिकट पर जीते थे,

लेकिन जब इन्होंने पाकिस्तान बना लिया तो उसके बाद यह बड़ी होशियारी से पाकिस्तान नहीं गए और फिर नेहरू गांधी ने इनको भारत का संविधान बनाने का जिम्मा भी दे दिया, इन सब ने भी अपना संविधान बनाया है।
इन लोगों ने पाकिस्तान के नाम पर पंजाब के टुकड़े कर दिए और जहां पंजाब के हिन्दू सिख बहुतायत में थे वहां पाकिस्तान बनने के बाद लाखों हिन्दू सिखों को तलवार के दम पर ज़बरदस्ती मुस्लिम बनाया गया। हिन्दुओं की हालत वहां सिखों से थोड़ी अच्छी थी, क्योंकि सिखों के साथ ऐसा व्यवहार करने का एक बहुत बड़ा कारण था जिसकी सजा आज भी सिखों को मिल रही है। कांग्रेस और इसके पाकिस्तानी साथियों ने सिखों का ही ज्यादा नरसंहार किया था पार्टीशन के वक्त।

अम्बेडकर भी ऐसे ही इन लोगों का विरोध नहीं करता था और इसी विरोध के कारण कांग्रेस ने उसको भी अपने रास्ते से हटा दिया और मुस्लिम समुदाय के तुष्टिकरण में जुट गई। कांगड़ी का वोट बैंक एकजुट माइनॉरिटी और बिखरा हुआ हिन्दू रहा है जिसके लिए सेक्युलर शब्द बनाया गया जो न हिन्दू था और न मुस्लिम। जो इनके बीच का (हिजड़ा) था वह सेक्युलर था।

यह सिर्फ भारत में मुल्ला नेहरू और गांधी ही कर सकते थे कि जिनको गद्दारी का चार्ज लगाकर जेल में सड़ाना था, उन जेहादियों को ही सीधे संविधान बनाने की जिम्मेदारी दे दी। इनमें से ये केवल कुछ नाम हैं...

इनमें से बाद में बहुत सारे लोग केंद्र और राज्यो में मंत्री और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के चांसलर तक बने....

from Madras

१ Mohamed Ismail Sahib

२ K.T.M. Ahmed Ibrahim·

३ Mahboob Ali Baig Sahib Bahadur·

४ B Pocker Sahib Bahadur from mubai

५ Abdul Kadar Mohammad Shaikh

६ Abdul Kadir Abdul Aziz Khan from Asam

७ Muhammad Saadulla,

८ Abdur Rouf from Up

९ Begum Qudsia Aijaz Rasul nbab of hardoi

१० Syed Fazl-ul-Hasan harshat mohani of AMU

११ Nabab ismail khan of meerut who

became chancellor of AMU

१२ ZH LARI from Bihar

१३ Husaain imam from gaya

१४ Saiyid Jafar Imam·

१५ Latifur Rahman·

१६ Mohammad Tahir

आज इनके वंशज बड़े-बड़े नेता बनकर बोल रहे हैं कि हमारा भी खून शामिल है इस देश की मिट्टी में...


सबसे बड़ा आश्चर्य तो मुझे तब हुआ जब इन्टरनेट पर पूरा खोजा कि इनके नाम मिल जाएँ, तो किसी भी वेबसाइट पर किसी भी तथाकथित हिन्दूवादी पार्टी या संगठन ने इनका नाम तक गूगल पर नहीं डाला है। खोज खोज कर नाम ढूँढे हैं। हम राष्ट्रवादियों को विचारधारा और शत्रुबोध के स्तर पर अभी बहुत ज्यादा काम करने की जरूरत है। इस्लामिक जिहादी मुस्लिम हमसे इस मामले में हजार गुना आगे हैं कि इन सब करतूतों के बाद भी देश में अपनी इतने बड़े तथाकथित देशभक्त की इमेज बनाये हुए हैं।

आज जहां पूरी दुनियाँ की ऑंखें खुल रही हैं, वहीँ कट्टर सनातन तथा हिन्दू विरोधी और देशद्रोही कॉंग्रेस के दोगले, बिकाऊ, लालची, स्वार्थी, कायर, सेक्युलर, नपुंसक, चमचे सो रहे हैं.

इन तीन राज्यों की कुल 654 विधानसभा सीटों पर 433 उम्मीदवार उतारे थे। इनमें से कांग्रेस केवल 35 सीटें जीत पाई, यानी कांग्रेस का जीत का प्रतिशत करीब 8 फीसदी ही रहा। लेकिन इससे भी अधिक चौंकाने वाला तथ्य यह है कि इन 35 विधायकों में से 21 मुस्लिम समुदाय से हैं। यानी कांग्रेस के कुल विजयी विधायकों में लगभग 60 प्रतिशत तो मुस्लिम ही हैं। और यह संयोग नहीं है, क्योंकि कांग्रेस ने इन तीन राज्यों में करीब 42 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया था। अर्थात जिन मुस्लिम उम्मीदवारों को कांग्रेस ने उतारा, उनमें लगभग आधे चुनाव जीत गए। यह आंकड़ा किसी व्यापक सामाजिक प्रतिनिधित्व वाली राष्ट्रीय पार्टी का कम और एक विशेष मुस्लिम समुदाय केंद्रित राजनीति करने वाली पार्टी का अधिक प्रतीत होता है।

तीन राज्यों के चुनावी आंकड़ों ने खड़े किए बड़े सवाल
भारतीय राजनीति में चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं होते, बल्कि वे दलों की वैचारिक दिशा और सामाजिक स्वीकार्यता का भी आईना बनते हैं। असम, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के हालिया विधानसभा चुनावों ने कांग्रेस के सामने ऐसा ही असहज दर्पण खड़ा कर दिया है, जिसमें पार्टी का चेहरा अब “सर्वधर्म समभाव” वाली राष्ट्रीय पार्टी से अधिक एक सीमित वोट बैंक पर निर्भर संगठन जैसा दिखाई देने लगा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वर्षों से कांग्रेस पर “एमएलसी” यानी “मुस्लिम लीगी कांग्रेस” बताते रहे हैं। इन तीन राज्यों के चुनावी आंकड़ों ने ही पीएम मोदी की बात को सच साबित कर दिखाया है।

असम: कांग्रेस की असमिया अस्मिता की बजाए मुस्लिम राजनीति
असम के चुनाव परिणाम कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा संकेत लेकर आए हैं। राज्य में कांग्रेस लंबे समय से खुद को “संतुलित” विकल्प दिखाने की कोशिश करती रही थी, लेकिन हालिया चुनावों में उसका टिकट वितरण और जीत का पैटर्न कुछ और ही कहानी कहता है। कांग्रेस ने बड़ी संख्या में मुस्लिम उम्मीदवार उतारे और पार्टी की जीत का बड़ा हिस्सा उन्हीं सीटों से आया जहां मुस्लिम आबादी निर्णायक भूमिका में है। इससे यह धारणा और मजबूत हुई कि कांग्रेस अब व्यापक असमिया अस्मिता की राजनीति के बजाय विशेष समुदाय आधारित गणित पर निर्भर होती जा रही है। यही कारण है कि ऊपरी असम, चाय बागान क्षेत्रों और राष्ट्रवादी वोटरों में कांग्रेस का आधार तेजी से सिकुड़ता गया। भाजपा ने इसी “तुष्टिकरण बनाम विकास” की बहस को धार दी और कांग्रेस रक्षात्मक मुद्रा में आ गई। असम के परिणाम यह बताते हैं कि कांग्रेस की रणनीति उसे सीमित पॉकेट्स तक तो बचा सकती है, लेकिन पूरे राज्य की पार्टी नहीं बना सकती। यहां बीजेपी ने फिर से प्रचंड बहुमत से सरकार बनाई है।

पश्चिम बंगाल: हिंदू मतदाता की दूरी और मुस्लिम निर्भरता
पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की स्थिति और भी अधिक गंभीर दिखाई दी। कभी बंगाल की मुख्यधारा की राजनीति का केंद्रीय स्तंभ रही कांग्रेस अब मुस्लिम बहुल इलाकों तक सिमटती जा रही है। पार्टी जिन सीटों पर प्रभावी रही, वहां उसका सामाजिक आधार लगभग पूरी तरह अल्पसंख्यक वोटों पर निर्भर दिखाई दिया। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर कांग्रेस को हिंदू समाज में स्वीकार्यता क्यों नहीं मिल रही? क्या कारण है कि पार्टी को टिकट वितरण में भी मुस्लिम चेहरे अधिक “सुरक्षित” लगते हैं? बंगाल में कांग्रेस का यह स्वरूप उसे तृणमूल कांग्रेस की “सॉफ्ट सेक्युलर” राजनीति और वामपंथ की पुरानी लाइन के बीच फंसा देता है। विडंबना यह है कि जिस कांग्रेस ने कभी बंगाल में बंकिम, विवेकानंद और नेताजी की विरासत की बात की थी, आज वही पार्टी चुनावी अस्तित्व बचाने के लिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण वाले सीमित समीकरणों पर निर्भर दिखाई देती है। यही कारण है कि पार्टी की सीटें घटती गईं और उसका प्रभाव भी सिमटता गया।

तमिलनाडु: द्रविड़ राजनीति में कांग्रेस की पहचान का संकट
तमिलनाडु में कांग्रेस डीएमके के सहारे चुनाव लड़ती है, इसलिए वहां उसकी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान पहले ही कमजोर हो चुकी है। लेकिन इस चुनाव में भी कांग्रेस के मुस्लिम उम्मीदवारों का अनुपात और उनकी जीत दर ने बहस को जन्म दिया। कांग्रेस ने यहां भी ऐसे निर्वाचन क्षेत्रों पर अधिक फोकस किया जहां धार्मिक ध्रुवीकरण उसके पक्ष में काम कर सके। समस्या केवल मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देने की नहीं है। किसी भी लोकतंत्र में हर समुदाय को प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। असली सवाल यह है कि क्या कांग्रेस अब अपने पारंपरिक हिंदू, दलित, पिछड़े और मध्यमवर्गीय वोटरों का भरोसा पूरी तरह खो चुकी है? तमिलनाडु के परिणाम यही संकेत देते हैं। कांग्रेस की राजनीति अब सहयोगी दलों के एजेंडे और अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के इर्द-गिर्द घूमती दिखाई देती है, जबकि राज्य का बड़ा वर्ग उसे केवल “डीएमके की परछाई” मानने लगा है।

कांग्रेस की सर्व समाज से “विशेष समाज” तक की यात्रा
कांग्रेस की सबसे बड़ी ताकत कभी उसकी समावेशी छवि थी। पार्टी हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, दलित, आदिवासी और मध्यम वर्ग सभी की राजनीतिक आकांक्षाओं का मंच मानी जाती थी। लेकिन अब उसकी राजनीति में संतुलन कम और तुष्टिकरण के प्रति झुकाव अधिक दिखाई देता है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री मोदी का मुस्लिम लीगी कांग्रेस कहना केवल चुनावी नारा भर नहीं रह गया, बल्कि विपक्ष के भीतर भी चर्चा का विषय बन चुका है। इन चुनाव परिणामों ने तो इसे साबित भी किया है। इन चुनावों ने यह भी दिखाया कि कांग्रेस को टिकट देने के लिए कई बार हिंदू उम्मीदवारों से अधिक “बेहतर” मुस्लिम उम्मीदवार नजर आते हैं, जबकि दूसरी ओर मुस्लिम मतदाता भी कांग्रेस में उन्हीं चेहरों को प्राथमिकता देते दिखाई दे रहे हैं जो उनकी सामुदायिक पहचान का प्रतिनिधित्व करते हों। यह प्रवृत्ति किसी भी राष्ट्रीय दल के लिए खतरनाक संकेत है, क्योंकि इससे पार्टी का सामाजिक संतुलन बिगड़ता है और वह धीरे-धीरे व्यापक जनाधार खोने लगती है।

अब जनता चाहती है विकास, सुशासन और स्थिरता
अगर कांग्रेस इसी दिशा में चलती रही, तो उसकी स्थिति भविष्य में और सीमित हो सकती है। वह कुछ विशेष क्षेत्रों और विशेष समुदायों तक सिमटकर रह जाएगी। तब “भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस” का “राष्ट्रीय” स्वरूप केवल नाम तक सीमित रह जाएगा। तीनों राज्यों के चुनाव परिणामों ने कांग्रेस के सामने कठोर प्रश्न रख दिए हैं। सवाल केवल सीटों की हार का नहीं है, बल्कि राजनीतिक चरित्र के बदलने का है। और शायद यही वह बिंदु है जहां कांग्रेस को तय करना होगा कि वह फिर से “सर्व समाज” की पार्टी बनना चाहती है या “विशेष समाज” की राजनीति में खुद को स्थायी रूप से सीमित कर लेना चाहती है। केवल भाजपा विरोध को राजनीति का आधार बनाकर पार्टी लंबे समय तक नहीं चल सकती। उसे यह समझना होगा कि भारत की जनता अब केवल पहचान की राजनीति नहीं, बल्कि विकास, स्थिरता, सुशासन और सांस्कृतिक आत्मविश्वास चाहती है।

एक विशेष वोट बैंक तक सीमित राजनीति खतरे की घंटी
कांग्रेस की आज की तस्वीर तेजी से बदलती नजर आ रही है। असम में कांग्रेस के 19 विधायकों में 18 मुस्लिम होना केवल चुनावी गणित नहीं, बल्कि पार्टी की बदलती सामाजिक संरचना का संकेत है। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के दोनों विजेता मुस्लिम समुदाय से हैं। सवाल यह नहीं है कि मुस्लिम उम्मीदवार क्यों जीते। लोकतंत्र में हर नागरिक को समान अधिकार है। असली सवाल यह है कि क्या कांग्रेस धीरे-धीरे अपनी राजनीति को एक विशेष वोट बैंक तक सीमित करती जा रही है? विडंबना यही है कि कांग्रेस स्वयं को “समावेशी” पार्टी कहती है, लेकिन उसके टिकट वितरण और चुनावी रणनीति के आंकड़े इसके उलट कहानी कह रहे हैं। ऐसा प्रतीत होने लगा है कि कांग्रेस को टिकट देने के लिए हिंदुओं से ज्यादा “बेहतर विकल्प” मुस्लिम उम्मीदवार दिखाई दे रहे हैं, और दूसरी ओर मुस्लिम मतदाताओं को वोट देने के लिए कांग्रेस में सबसे भरोसेमंद चेहरा केवल मुस्लिम प्रत्याशी ही नजर आ रहा है। यह प्रवृत्ति किसी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं कही जा सकती। राष्ट्रीय दल तब मजबूत बनते हैं जब वे समाज के हर वर्ग में समान स्वीकार्यता रखते हैं, न कि तब जब उनका सामाजिक आधार सिमटकर पहचान आधारित राजनीति में बदलने लगे।

क्या हिन्दुओं पर हुए अत्याचारों की पराकाष्ठा ममता को ले डूबेगी? असम में BJP लगाएगी जीत की हैट्रिक: तमिलनाडु में DMK तो केरल में UDF सरकार के आसार


पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों की वोटिंग खत्म होने के बाद अब एग्जिट पोल के नतीजे सामने आ गए हैं। इन रुझानों ने कहीं सत्ता परिवर्तन तो कहीं पुरानी सरकार की वापसी के संकेत दिए हैं। सबसे बड़ी खबर पश्चिम बंगाल से है, जहाँ कई सर्वे में BJP को बहुमत मिलने का अनुमान जताया गया है।

बंगाल में बीजेपी आने का सनातन विरोधी और कालनेमि हिन्दुओं को साफ संकेत होगा कि युगों-युगों अतिप्राचीन सनातन का विरोध अब बर्दाश्त नहीं होगा। यह पहला ऐसा चुनाव है जिसमे ममता ने एक भी प्रेस कांफ्रेंस नहीं की और ना ही चोटिल होने का कोई स्वांग रचा। चर्चा यह भी सुनने को आ रही है कि मतदान ख़त्म होने से पहले TMC में भगदड़ होने लगी है। परदे के पीछे बाबरी मस्जिद का समर्थन भी ममता को ले डूबेगा। बंगाल में पासे पलटने के लिए हर हिन्दू को चुनाव आयोग द्वारा सख्ती करने के लिए धन्यवाद् देना होगा। अगर चुनाव आयोग ने स्थानीय पुलिस को पोलिंग बूथ से दूर नहीं रखा होता जैसा एग्जिट पोल दिखा रहे हैं संभव नहीं हो पता। यही वजह है कि बंगाल में इतना भारी मतदान हुआ। कई वृद्ध लोगों को यह तक कहते सुना कि "जिन्दगी में पहली बार वोट दिया पहले तो घर से निकले बिना ही वोट डाल दिया जाता था।    

दूसरे, असम में कांग्रेस छोड़ बीजेपी में आये हिमंत सरमा का लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने पर राहुल गाँधी और इसकी गुलामी करने वालों को राजनीति छोड़ देनी चाहिए। हिमंत वही स्वाभिमानी व्यक्ति है जिसे राहुल से मिलने जाने पर राहुल द्वारा अपने कुत्ते द्वारा जो बिस्कुट नहीं खाया उसे हिमंत को देना बहुत भारी पड़ा। इतनी बेइज्जती देख कांग्रेस छोड़ बीजेपी में शामिल हो गए।  

बाबरी मस्जिद की आड़ में बंगाल में पैर ज़माने की कोशिश करने वाले असदुद्दीन ओवैसी कहीं दिखाई नहीं दे रहे। ओवैसी को दलित हिन्दुओं का रोना रोने से पहले मुस्लिम समाज में उस जातिगत सियासत के लिए सड़क पर आना चाहिए, जहाँ शिया, सुन्नी, अहमदी, पठान, वहाबी और पासमांदा आदि फिरके एक दूसरे की मस्जिद में नमाज और दूसरे के कब्रिस्तान में अपने मुर्दे को दफना नहीं सकते, क्यों नहीं इस भेदभाव को ख़त्म करने की आवाज़ उठाते? ओवैसी जानते है कि जिस दिन उस खतरनाक मुद्दे पर मुंह खोला कोई मुसलमान भी इसकी पार्टी को वोट नहीं देगा। 

वहीं, असम में BJP तीसरी अपनी सत्ता बचाती दिख रही है। केरल और तमिलनाडु में क्षेत्रीय और विपक्षी गठबंधन मजबूत नजर आ रहे हैं। असली नतीजे 4 मई को आएँगे, लेकिन Exit Poll ने हार-जीत की चर्चा तेज कर दी है।

पश्चिम बंगाल: क्या दीदी का किला ढहेगा?

 पश्चिम बंगाल की 294 सीटों पर आए Exit Poll ने सबको चौंका दिया है। पोल ऑफ पोल्स के अनुसार BJP 149 सीटों के साथ बहुमत के पार जा सकती है, जबकि TMC को 140 सीटें मिलने का अनुमान है।

पी-मार्क ने BJP को 150 से 175 और टीएमसी को 118 से 138 सीटें दी हैं।

वहीं जेवीसी के मुताबिक BJP 138-159 और टीएमसी 131-152 के बीच रह सकती है।

मैट्रीज ने BJP को 146-161 और टीएमसी को 125-140 सीटें दी हैं।

चाणक्य स्ट्रैटेजीज ने भी BJP को 150-160 सीटों के साथ आगे रखा है।

हालाँकि, पीपुल्स पल्स ने टीएमसी की वापसी का दावा करते हुए उन्हें 178-187 सीटें दी हैं।

असम: फिर से बीजेपी सरकार के संकेत

असम में बहुमत का आँकड़ा 64 है। पोल ऑफ पोल्स ने NDA को 92 और कॉन्ग्रेस प्लस को 30 सीटें दी हैं।

एक्सिस माय इंडिया ने NDA को 88-100 और कॉन्ग्रेस प्लस को 24-36 सीटें दी हैं।

पोल डायरी ने एनडीए को 86-101 और पी-मार्क ने 82-94 सीटें मिलने की बात कही है।

मैट्रीज ने एनडीए को 85-95 और कॉन्ग्रेस प्लस को 25-32 सीटें दी हैं।

जेवीसी एग्जिट पोल ने एनडीए को 88-101 सीटें दी हैं।

जनमत पोल्स ने भी एनडीए को 87-98 सीटों के साथ बड़ी जीत दी है। हालाँकि पीपुल्स पल्स ने यहाँ कड़ा मुकाबला बताते हुए एनडीए को 68-72 और कॉन्ग्रेस प्लस को 22-26 सीटें दी हैं।

तमिलनाडु: DMK और ADMK के बीच काँटे की टक्कर

तमिलनाडु की 234 सीटों पर बहुमत का आँकड़ा 118 है। पोल ऑफ पोल्स के मुताबिक DMK गठबंधन (SPA) को 122 और NDA को 95 सीटें मिल सकती हैं।

पीपुल्स पल्स और पी-मार्क दोनों ने ही SPA को 125-145 सीटें देकर स्पष्ट बहुमत का इशारा किया है, जबकि NDA को इन दोनों सर्वे में क्रमशः 65-80 और 65-85 सीटें दी गई हैं।

मैट्रीज ने SPA को 122-132 और एनडीए को 87-100 सीटें दी हैं।

एक्सिस माय इंडिया का सर्वे थोड़ा अलग है, जिसने एसपीए को 92-100 और एनडीए को 22-32 सीटें दी हैं, लेकिन अन्य (OTH) को 98-120 सीटें देकर मुकाबला फँसा दिया है।

हालाँकि, जन की बात (JAN KI BAAT) ने यहाँ NDA की जीत का दावा करते हुए उन्हें 128-147 सीटें दी हैं।

केरल: सत्ता बदलने का रिवाज रह सकता है कायम

केरल में इस बार यूडीएफ (UDF) बाजी मारता दिख रहा है। पोल ऑफ पोल्स के अनुसार यूडीएफ को 72 और एलडीएफ को 63 सीटें मिल सकती हैं।

एक्सिस माय इंडिया ने यूडीएफ को 78-90 और एलडीएफ को 49-62 सीटें मिलने का अनुमान जताया है।

मैट्रीज ने यूडीएफ को 70-75 और पी-मार्क ने 72-79 सीटें दी हैं।

पीपुल्स पल्स के मुताबिक भी यूडीएफ 75-85 सीटों के साथ सरकार बना सकता है, जबकि एलडीएफ 55-65 सीटों पर सिमट सकता है।

पुडुचेरी: NRC गठबंधन की बढ़त

30 सीटों वाले पुडुचेरी में बहुमत के लिए 16 सीटें चाहिए। पोल ऑफ पोल्स ने यहाँ NDA को 19 और SPA को 8 सीटें दी हैं।

एक्सिस माय इंडिया ने NDA को 16-20 और एसपीए को 6-8 सीटें मिलने का अनुमान जताया है।

पीपुल्स पल्स के मुताबिक एनडीए 16-19 और एसपीए 10-12 सीटें ला सकता है।

जेवीसी एग्जिट पोल ने एनडीए को 15-17 और एसपीए को 11-13 सीटें दी हैं।

प्रजा पोल ने एनडीए को 19-25 और कामाख्या एनालिटिक्स ने 17-24 सीटें देकर एनडीए की एकतरफा जीत का दावा किया है।

तमिलनाडु : कार्तिगई दीपम विवाद : सनातन विरोधी DMK सरकार ने HC के आदेश के बाद भी नहीं मनाने दिया उत्सव

                                कार्तिगई दीपम विवाद, प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI ChatGPT)
तमिलनाडु के प्राचीन थिरुप्परनकुंद्रम मंदिर में कार्तिगई दीपम उत्सव के दौरान एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया। मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने 1 दिसंबर 2025 को स्पष्ट आदेश दिया था कि थिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी के शिखर पर स्थित प्राचीन ‘दीपाथून’ स्तंभ पर पवित्र दीप जलाया जाए। लेकिन डीएमके सरकार ने इस आदेश की खुलेआम अवहेलना की।

बुधवार (3 दिसंबर 2025) की शाम 6 बजे दीप जलाने का समय था, लेकिन मंदिर प्रशासन ने पारंपरिक तरीके से उचीपिल्लैयार मंदिर के पास ही दीप जला दिया, जो पहाड़ी के नीचे है। इससे नाराज हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं और पुलिस के बीच झड़पें हो गईं। कोर्ट ने सरकार को ‘जानबूझकर अवज्ञा’ का दोषी ठहराया और कहा कि यह लोकतंत्र के लिए खतरा है।

यह घटना सिर्फ एक धार्मिक रस्म का मामला नहीं है। यह तमिलनाडु की सांस्कृतिक विरासत, अदालती आदेशों की मर्यादा और राजनीतिक साजिशों का मिश्रण है। डीएमके सरकार पर हिंदू विरोधी होने का पुराना आरोप लगता रहा है। विपक्षी भाजपा और हिंदू संगठन इसे सनातन धर्म के खिलाफ साजिश बता रहे हैं।

याचिकाकर्ता राम रविकुमार ने कोर्ट में कहा कि मंदिर प्रशासन ने दीपाथून पर कोई इंतजाम नहीं किया। जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन ने 1 दिसंबर 2025 को आदेश दिया कि दीप जलाया जाए, क्योंकि यह मंदिर की संपत्ति है। उन्होंने साल 1923 के एक कोर्ट डिक्री का हवाला दिया, जिसपर प्रिवी काउंसिल ने भी मुहर लगाई थी।

हाई कोर्ट के आदेश के बाद बुधवार (03 दिसंबर 2025) की शाम को जब हिंदू कार्तिगई दीपम के लिए पहाड़ी पर चढ़ने लगे, तो उन्हें रोक लिया गया। हाई कोर्ट के आदेश की खुलेआम धज्जियाँ उड़ाई। सेंट्रल इंडस्ट्रियल सिक्योरिटी फोर्स (सीआईएसएफ) को सुरक्षा के लिए तैनात किया गया था, लेकिन स्थानीय प्रशासन ने धारा 144 लगा दी। हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं ने बैरिकेड तोड़े, पत्थर फेंके और नारेबाजी की।

एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक, दर्जनों लोग घायल हुए। कोर्ट ने इसे ‘अवमानना’ करार दिया और कहा, “यह आदेश की खुली अवहेलना है। लोकतंत्र का अंत हो जाएगा अगर अधिकारी कानून से ऊपर समझें।” जस्टिस स्वामीनाथन ने याचिकाकर्ता को 10 लोगों के साथ प्रतीकात्मक रूप से दीप जलाने की इजाजत दी और सीआईएसएफ को सुरक्षा का आदेश दिया। लेकिन अपील के बाद पुलिस ने सबको रोक लिया। हालाँकि अब गुरुवार (04 दिसंबर 2025) को कोर्ट ने इस मामले में अवमानना की कार्रवाई शुरू कर दी है।

सरकार के सूत्रों ने सफाई दी कि वे हिंदुओं के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि शांति बनाए रखना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि कोई सच्चा भक्त कोर्ट नहीं गया और 100 साल पुरानी परंपरा का पालन हो रहा है। लेकिन भाजपा नेता के.अन्नामलई ने कहा, “डीएमके का सनातन धर्म से दुश्मनी अब छिपी नहीं। हिंदू धार्मिक निधि विभाग खुद भक्तों के खिलाफ अपील कर रहा है।”

कार्तिगई दीपम को लेकर विवाद क्या? क्यों DMK सरकार कर रही हिंदुओं का दमन

 कार्तिगई दीपम तमिलनाडु का एक प्रमुख हिंदू त्योहार है, जो कार्तिगई मास की पहली पूर्णिमा को मनाया जाता है। यह प्रकाश के विजय का प्रतीक है। थिरुप्परनकुंद्रम सुब्रमण्या स्वामी मंदिर भगवान मुरुगन के छह प्रमुख निवास स्थान में से पहला है, इस उत्सव का केंद्र रहा है।

थिरुप्परनकुंद्रम सुब्रमण्या स्वामी मंदिर छठी शताब्दी में पांड्य राजाओं द्वारा बनाया गया था और पहाड़ी को काटकर तराशा गया है। मंदिर के पुजारी रोजाना तीन बार पूजा करते हैं, जिसमें अभिषेक, अलंकरण, नैवेद्य और दीप आराधना शामिल है। ये प्रक्रिया अब भी जारी है।

लेकिन बीते कुछ समय से इस्लामी कट्टरपंथी इस पहाड़ी पर कब्जे और इसके नाम बदलने की कोशिश में हैं। कुछ समय पहले मुस्लिम प्रदर्शनकारियों ने पहाड़ी पर नमाज की माँग की, लेकिन पुलिस ने रोक दिया।

प्रिवी काउंसिल का फैसला और ‘सिकंदर हिल्स’ का दावा

थिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी का इतिहास संगम युग तक जाता है। संत नक्कीरार ने भगवान मुरुगन के 6 पवित्र निवासों में इसे पहला बताया है। यह तेवर स्थलम भी है, जहाँ शिव और मुरुगन की पूजा होती है। पहाड़ी 500 फुट ऊँची है और मंदिर चट्टान को काटकर बनाया गया। भक्त घिरी वीधी (परिक्रमा पथ) पर चक्कर लगाते हैं, जो मंदिर की संपत्ति है।

विवाद की जड़ 19वीं-20वीं शताब्दी के मुस्लिम दावों में है। कुछ लोग इसे ‘सिकंदर हिल्स’ कहते हैं, लेकिन 1931 में प्रिवी काउंसिल ने साफ किया कि यह मंदिर की संपत्ति है। पाँच सदस्यीय पैनल ने कहा, “पहाड़ी का खाली हिस्सा समय से परे मंदिर के कब्जे में है।”

प्रिवी काउंसिल ने 1923 के अधीनस्थ जज के फैसले को बहाल किया, जिसमें मस्जिद स्थल को छोड़कर पूरी पहाड़ी मंदिर की बताई गई। प्रिवी काउंसिल ने ऐतिहासिक दस्तावेजों का हवाला दिया, जिसमें 1144 का दस्तावेज ‘मलाईप्रकरम’ (पहाड़ी परिक्रमा) का जिक्र है।

फैसले में कहा गया कि मुगल आक्रमणकारियों ने राजस्व भूमि छीनी, लेकिन मंदिर या पहाड़ी कभी धर्मनिरपेक्ष हाथों में नहीं गई। कुछ मस्जिदें और घर बने, लेकिन वे हिंदुओं पर जबरन कब्जे का परिणाम था। इसके अलावा ईस्ट इंडिया कंपनी ने भी मंदिर के अधिकार मान्य किए थे। फैसले में प्रिवी काउंसिल ने लिखा, “कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं कि मुस्लिम आक्रमणकारियों ने पवित्र पहाड़ी में हस्तक्षेप किया।” यह फैसला 2025 में भी प्रासंगिक है, क्योंकि जस्टिस स्वामीनाथन ने इसे ही आधार बनाया।

जस्टिस स्वामीनाथन के फैसले को नहीं मान रही डीएमके सरकार

हालाँकि हिंदू-विरोधी मिजाज वाली सत्ताधारी द्रविड़ मुनेत्र कढ़गम (डीएमके) सरकार ने कानून-व्यवस्था के नाम पर 1 दिसंबर 0025 के कोर्ट के निर्देश को चुनौती दी है। मामला तब और बिगड़ा जब याचिकाकर्ता राम रविकुमार सेंट्रल इंडस्ट्रियल सिक्योरिटी फोर्स (सीआईएसएफ) के जवानो के साथ कोर्ट के फैसले पर पहाड़ी चढ़ने लगे।

लेकिन मदुरै के पुलिस कमिश्नर जे. लोगनाथन के नेतृत्व वाली राज्य पुलिस ने हस्तक्षेप किया और उन्हें रोक दिया। मदुरै जिला कलेक्टर ने रोकथाम वाले आदेश जारी किए थे, दावा किया कि जनता की सुरक्षा और मौजूदा कानून-व्यवस्था की स्थिति खतरे में है।

हिंदू मुननेत्र मंड्रम संगठन के सदस्यों और अन्य कार्यकर्ताओं ने मंदिर के सामने इकट्ठा होकर मांग की कि कोर्ट के निर्देशित स्थान पर दीप जलाया जाए। कुछ लोग पुलिस की बैरिकेडिंग तोड़ने की कोशिश में लगे। इससे धक्का-मुक्की हुई और एक पुलिसकर्मी घायल हो गया। हिंदू मुननेत्र मंड्रम के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि मंदिर प्रशासन ने हाईकोर्ट के फैसले का पालन करने के लिए बिल्कुल कोई इंतजाम नहीं किया।

खास बात ये है कि मंदिर प्रबंधन ने पहले ही कोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी, दावा किया कि इससे सांप्रदायिक सौहार्द खतरे में पड़ जाएगा। लेकिन जज स्वामीनाथन ने सख्त हिदायत दी थी कि शाम 6 बजे तक दीप जलाना है, वरना 6:05 बजे अवमानना की कार्रवाई शुरू हो जाएगी। इसके बावजूद डीएमके सरकार और प्रशासन ने कोर्ट की नहीं सुनी।

हिंदुओं को नीचा दिखाकर मुस्लिमों का पक्ष ले रही DMK सरकार

डीएमके सरकार का ये रवैया चिंताजनक तो है, लेकिन हैरान करने वाला नहीं, क्योंकि हिंदू-नफरत करने वाली द्रविड़ पार्टी का इतिहास यही है। राज्य सरकार और हिंदू धार्मिक तथा चैरिटेबल एंडोमेंट्स विभाग ने पहले ही फैसले के खिलाफ अपील कर दी है। ऊपर से डीएमके और उसके सहयोगी जिला प्रशासन से कह रहे हैं कि कोर्ट के आदेश का पालन न करें।

डीएमके कोर्ट के आदेश तोड़ने के लिए बिना झिझक तैयार है, सिर्फ हिंदू धर्म के प्रति अपनी घृणा दिखाने के लिए। न्यायपालिका ने तथ्यों और सबूतों के आधार पर हिंदुओं का साथ दिया है, लेकिन सरकार सांप्रदायिक सौहार्द का विकृत कथा चलाने पर तुली है। उनकी टेढ़ी नजर में सहिष्णुता और धर्मनिरपेक्षता तभी बनी रहती है जब हिंदुओं के खर्च पर हो और उनके धार्मिक अधिकारों पर कब्जा हो।

वहीं, जब डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) (बैन हो चुके पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के राजनीतिक विंग) ने जब इस पवित्र स्थान पर जानवरों की कुर्बानी की कोशिश की, तो ये मूल्य कभी खतरे में नहीं पड़े। जब इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) के नेता और रामनाथपुरम सांसद के. नावास कानी (आईएमयूएल) ने एक अन्य विधायक और समर्थकों के साथ पवित्र पहाड़ी पर नॉन-वेज बिरयानी खाई, तो भी खतरा नहीं था। कानी ने यहाँ तक घोषणा कर दी कि जगह वक्फ बोर्ड की है।

दिल्ली के सुल्तानों के प्रतिनिधि के नाम पर इसे सिक्कंदर हिल्स नाम देने की कोशिशें भी चल रही थीं, जो मदुरै पर शासन करते थे, जिससे हिंदुओं ने विरोध किया। डीएमके ने इन उकसाने वाली हरकतों को सौहार्द और शांति के लिए खतरा नहीं माना, सिर्फ इसलिए क्योंकि हिंदू धर्म का एक बड़ा हिस्सा अपमानित हो रहा था, जिसे पार्टी चुपचाप समर्थन देती है। लेकिन जब हिंदू कानूनी तरीके से अपने अधिकारों के लिए लड़ते हैं, तो इनपर दुखों का पहाड़ टूट पड़ता है।

इसी तरह, हाईकोर्ट द्वारा इसे हिंदू मंदिर घोषित करने के बाद भी मुस्लिमों का पहाड़ी पर अवैध कब्जा जारी है और डीएमके सरकार ने इन उल्लंघनों को बर्दाश्त किया है।

द्रविड़वाद के झंडाबरदार हमेशा थिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी से जुड़े झूठे मुस्लिम दावों का साथ देते रहे हैं और असली हिंदू चिंताओं तथा वैध अधिकारों का विरोध करते रहे हैं। यहाँ तक कि अपने प्रभाव वाले मीडिया आउटलेट्स के जरिए मामले को राजनीतिक रंग भी देने की कोशिश करती है, ताकि मुस्लिम उसके पक्ष में लामबंद हो सकें।

ऐसे ही एक मामले में तमिलनाडु सरकार ने हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद हिंदुओं को अन्नदान करने से रोक दिया, जबकि कोर्ट ने सरकार को स्पष्ट तौर पर कहा था कि वो इस काम में अड़ंगा न लगाए। क्योंकि इसकी वजह ये थी कि डीएमके सरकार अपने ईसाई समर्थकों को खुश करने में जुटी रही। ये मामला कुछ ही समय पहले का है।

HC के आदेश का पालन न करने पर DMK पर क्यों उठाई जा रही उंगली?

आप सोच रहे होंगे कि ऐसा सिर्फ सरकार कर रही है, इसका सत्ताधारी डीएमके पार्टी से कोई लेना देना नहीं है। तो हम बता दें कि तमिलनाडु सरकार में हिंदू धार्मिक तथा चैरिटेबल एंडोमेंट्स विभाग नाम से अलग मंत्रालय है। ये मंत्रालय ही हिंदू मंदिरों से जुड़े तमाम फैसले करता है।

मौजूदा समय में थिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी पर स्थित मुरुगन मंदिर में भी प्रशासकों की तैनाती है, जो तमिल नाडु की डीएमके सरकार की तरफ से की गई है। ऐसे में वो डीएमके के निर्देश पर ही हाई कोर्ट तक के फैसले को नहीं मान रहे। यहाँ तक कि हाई कोर्ट की कार्यवाही तक से गैर-हाजिर रहे। फिर यहाँ खुद मंदिर के प्रशासक को आगे बढ़कर हिंदुओं के हित में काम करना चाहिए था और हाई कोर्ट का आदेश भी था, लेकिन यहाँ सरकार द्वारा बिठाया मंदिर प्रशासक ही हिंदू विरोधी डीएमके सरकार के लक्ष्य को पूरा करने में जुटा रहा।

इतना ही नहीं, एक तरफ तो वो खुलकर हिंदू विरोध करती है, तो दूसरी तरह हिंदू मंदिरों के पैसों को डकार भी जाती है। इन सब बातों को जानते हुए भी डीएमके को कब तक नजरअंजाद किया जाए? जब उसका अतीत ही हिंदू और सनातन विरोध से भरा पड़ा है।

सनातन का बार-बार अपमान करती रही है डीएमके

बीते कुछ समय के घटनाक्रम को देखें तो डीएमके सांप्रदायिक सौहार्द या कानून-व्यवस्था के पीछे छिप जाती है, लेकिन हिंदू धर्म और उसके अनुयायियों के प्रति अपनी नफरत जाहिर करने से कभी नहीं हिचकिचाई। मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के उपमुख्यमंत्री बेटे और ‘गर्वित ईसाई’ उदयनिधि स्टालिन ने 2023 में सनातन धर्म के विनाश की खुली अपील की।

डीएमके सांसद ए राजा ने तो और आगे बढ़कर कहा कि उदयनिधि की अपमानजनक टिप्पणियाँ तो काफी हल्की थीं। सनातन धर्म की तुलना तो एचआईवी और कुष्ठ रोग से तुलना करनी चाहिए। यही नहीं, हिंदू धर्म को जंजीर कहने वाले कमल हासन को डीएमके ने बाकायदा राज्यसभा भी भेजा है। वहीं, डीएमके सरकार के मंत्री ने तो हिंदू धर्म को लेकर सेक्स पोजिशन तक की घटिया टिप्पणी की थी।

डीएमके ने न सिर्फ हिंदू धर्म को निशाना बनाया है, बल्कि ऐसे कदम भी उठाए हैं जो धर्म का अपमान करते हैं। तमिलनाडु सरकार ने जुलाई में चेन्नई के किलपुक में वाडेल्स रोड का नाम बदलकर आर्चबिशप एज्रा सरगुनम रोड रख दिया, जो मृत एंटी-हिंदू ईसाई प्रचारक और बिशप एज्रा सरगुनम को सम्मान देने के लिए था। उसने हिंदुओं को मारने का सार्वजनिक आदेश भी दिया था। यही नहीं, डीएमके सरकार में तो दुर्दांत आतंकियों की भव्य आखिरी यात्रा भी निकलती है, जो कोर्ट से सजा पाए हो।

हिंदुओं से नफरत करने वालों की डीएमके में होती है पूछ

हिंदू धर्म से नफरत करने वाले लोग डीएमके में जगह पाते हैं, क्योंकि पूरी पार्टी अपनी खतरनाक धर्मनिरपेक्षता के बहाने हिंदू-विरोध को मूर्त रूप देती है। वे (डीएमके के लोग) सनातन के कट्टर आलोचक ईवी पेरियार की पूजा करते हैं और अब्राहमिक मजहबों खासकर इस्लाम और ईसाई धर्म को आदर देते हैं।

थिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी पर बार-बार होने वाले टकराव इसी का हिस्सा हैं। डीएमके सरकार हिंदुओं के अधिकारों पर कुचलने के लिए तुली है, भले ही इसके लिए कोर्ट के आदेश तोड़ने पड़ें या उन्हें चुनौती देनी पड़े। इसके अलावा डीएमके या ‘धर्मनिरपेक्ष पार्टियाँ’ कभी मुस्लिमों या अन्य मजहबों के अनुयायियों के साथ ऐसा हौसला नहीं दिखातीं, जो उनकी असली मंशा और मकसद बयान करता है।

‘तमिलनाडु की चुनावी प्रक्रिया में दखल दे रहे बिहारी’: P चिदंबरम ने बिहारियों के लिए घृणा से दिखाई कश्मीर के 370 वाली सोच; आरजेडी की चुप्पी यानी राहुल गाँधी की गुलामी?

                      पी चिदंबरम और नफरत की राजनीति की प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार: ChatGPT)
कांग्रेस वो जहरीला सांप है जो कभी जहर उगलने से बाज नहीं आता। जनता को किसी न किसी बहाने उलझा कर रख देश की एकता का स्वांग रच अपनी कुर्सी को बचाए रखो। लेकिन कांग्रेस प्रारम्भ से लेकर अब तक जनता की नब्ज को पढ़ने में जीरो साबित हो रही है। 2014 में मोदी सरकार बनने से पहले जनता के पास कमजोर विपक्ष होने के कारण कोई विकल्प नहीं होने की वजह से कांग्रेस के चुंगल से बाहर नहीं निकल सकी। अब मजबूत विकल्प होने पर भी कांग्रेस वही अपनी पुरानी नफरत वाली खूंसट सियासत से बाहर नहीं आ रही। यही खूंसट सोंच कांग्रेस को नीचे धकेल रही है। बाकि कांग्रेस को धरती में धाँसने में राहुल और गाँधी परिवार कमर तोड़ मेहनत कर ही रहा है।  

कांग्रेस के बड़े नेता और राज्यसभा सांसद पी. चिदंबरम ने एक ट्वीट करके तमिलनाडु में रहने वाले ‘बाहरियों’ खासकर बिहार के लोगों को नीचा दिखाने का काम किया है। उन्होंने तमिलनाडु में रहने वाले बिहारी प्रवासी मजदूरों को ‘बाहरी’ बताकर उनके वोटर बनने के हक पर सवाल उठाए। चिदंबरम ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग तमिलनाडु में 6.5 लाख प्रवासियों को वोटर लिस्ट में जोड़ रहा है, जो ‘गैरकानूनी और खतरनाक’ है।

चिदंबरम ने बिहार में 65 लाख वोटरों के नाम कटने का खतरा होने की बात कही। उनके ट्वीट का लहजा ऐसा है, जैसे बिहारी मजदूर तमिलनाडु में बसने या वोट देने के हकदार ही न हो।

चिदंबरम ने बिहारियों को ‘प्रवासी मजदूर’ कहकर और उनके ‘स्थाई घर’ को बिहार बताकर उनकी गरिमा को ठेस पहुँचाई। ये बातें सुनने में तो चुनावी नियमों की चिंता जैसी लगती हैं, लेकिन असल में ये बिहारियों को बाहरी और खतरे के रूप में दिखाने की कोशिश थी। वैसे भी, यह कोई नई बात नहीं है। इंडी गठबंधन पहले भी बिहारियों के खिलाफ नफरत भड़काकर वोट की राजनीति करता रहा है। चिदंबरम का ये बयान उसी पुरानी चाल का हिस्सा है, जिसे कांग्रेस और उसके सहयोगी चुपचाप बढ़ावा देते रहे हैं।

चिदंबरम ने की बिहारियों को नीचा दिखाने की कोशिश

चिदंबरम ने 3 अगस्त 2025 को X पर ट्वीट किया कि चुनाव आयोग तमिलनाडु में 6.5 लाख प्रवासियों को वोटर लिस्ट में जोड़ रहा है, जो ‘खतरनाक और गैरकानूनी’ है। उन्होंने सवाल उठाया कि बिहारी मजदूर तमिलनाडु में वोटर क्यों बन रहे हैं, जब उनका ‘स्थायी घर’ बिहार में है। उन्होंने छठ पूजा का जिक्र करते हुए कहा कि ये मजदूर बिहार लौटते हैं, तो फिर तमिलनाडु में वोटर बनने का क्या हक? चिदंबरम ने इसे चुनाव आयोग की साजिश बताकर तमिलनाडु के ‘चुनावी चरित्र’ को बदलने का आरोप लगाया।

ये बातें सुनने में तो तकनीकी लगती हैं, लेकिन इनका असली मकसद बिहारियों को तमिलनाडु में बाहरी और अनचाहा दिखाना था। चिदंबरम ने बिहारियों को ‘प्रवासी मजदूर’ कहकर उनकी पहचान को सिर्फ मजदूरी तक सीमित कर दिया, जैसे वे तमिलनाडु में बसने या वोट देने के हकदार ही नहीं हैं। यह न सिर्फ बिहारियों का अपमान है, बल्कि भारत के संविधान का भी उल्लंघन है, जो हर नागरिक को देश में कहीं भी रहने, काम करने और वोट देने का हक देता है। चिदंबरम का ये बयान बिहारियों को दोयम दर्जे का नागरिक बताने की कोशिश है।

बिहारी क्यों नहीं, जब राहुल को हक है?

चिदंबरम का बयान और कांग्रेस की नीति तब और हास्यास्पद हो जाती है, जब हम राहुल गाँधी की बात करते हैं। राहुल गाँधी दिल्ली के स्थाई निवासी हैं, लेकिन वे केरल के वायनाड और उत्तर प्रदेश के अमेठी और रायबरेली से चुनाव लड़ चुके हैं। अगर राहुल गाँधी दिल्ली में रहकर दूसरे राज्यों में वोटर बन सकते हैं और चुनाव लड़ सकते हैं, तो बिहारी मजदूर तमिलनाडु में वोटर क्यों नहीं बन सकते? क्या नियम सिर्फ बिहारियों के लिए अलग हैं?

भारत का कानून साफ कहता है कि कोई भी नागरिक, जो किसी जगह पर सामान्य रूप से रहता है, वहाँ वोटर बन सकता है। इसके लिए फॉर्म 6 भरना होता है, जिसमें निवास स्थान बदलने की अर्जी दी जाती है। और ये जरूरी नहीं कि आपके पास अपना मकान हो। किराए के घर में रहने वाला भी वोटर बन सकता है।

चिदंबरम और कांग्रेस ये बात अच्छे से जानते हैं, लेकिन फिर भी बिहारियों को ‘स्थायी रूप से बसे हुए’ कहकर उनका मजाक उड़ाते हैं। ये लोग भारी-भरकम अंग्रेजी शब्दों से बिहारियों को बेवकूफ बनाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन बिहारी इतने भोले नहीं हैं।

जेडीयू के प्रवक्ता और विधान परिषद के सदस्य नीरज कुमार ने चिदंबरम के ट्वीट पर तीखी प्रतिक्रिया दी। नीरज कुमार ने कहा, “कांग्रेस पार्टी का आज जो हश्र है, वो क्षेत्रीय भावनाओं का सम्मान न करने की वजह से है। क्षेत्रीय भावनाओं के उभार के साथ कांग्रेस का समर्थन कम होता गया। कांग्रेस ने अपने राज्य में असमान विकास किया। बिहार के साथ भेदभाव किया। अब इनकी स्थिति ये है कि ये देश में संविधान को खतरा बनाते हैं। ये चुनाव आयोग पर आरोप लगा रहे हैं।

उन्होंने कहा, “जो लोग तमिलनाडु या किसी भी अन्य राज्य में रहते हैं, वो वहाँ के वोटर बनते हैं। ये सामान्य है। बिहार में रहने वाली तमिलनाडु की नर्सें भी वोटर रही हैं, लेकिन किसी ने विरोध नहीं किया। ये तो इंडी गठबंधन सुविधा की बात हुई। राहुल गाँधी कहीं से भी चुनाव लड़ लें… आरजेडी किसी को हरियाणा से लाकर राज्यसभा भेज देती है। लेकिन बिहार का नाम आते ही ये लोग नाक-भौं सिकोड़ने लगते हैं।”

नीरज कुमार ने आगे कहा, “बिहार SIR में तेजस्वी यादव के नाम 2 EPIC नंबर मिले हैं। अब उन्होंने चुप्पी साध ली है। क्या राहुल गाँधी का यही परमाणु बम था, तेजस्वी यादव ने अपने सर पर फोड़ा?” उन्होंने कहा कि कांग्रेस का मूल चरित्र सुविधा के हिसाब से बदलने का है। बिहार बोझ किसी का नहीं है, वो बोझ उठाने वाले लोग हैं। चंपारण के सत्याग्रह से लेकर आजादी की लड़ाई में बिहार का योगदान रहा है। उन्होंने कहा कि चिदंबरम जैसे लोग जो कह रहे हैं, वो बैकवर्ड राज्यों के लिए उनकी घृणा दिख रही है।

इंडी गठबंधन का बिहार विरोधी रवैया

चिदंबरम का बयान कोई नई बात नहीं है। इंडी गठबंधन पहले भी बिहारियों को निशाना बनाकर राजनीति करता रहा है। 2021 के पश्चिम बंगाल चुनाव में तृणमूल कांग्रेस(टीएमसी) ने बिहारी प्रवासियों को बीजेपी का समर्थक बताकर बंगाली अस्मिता के खिलाफ खड़ा किया। ममता बनर्जी ने हिंदी भाषी प्रवासियों खासकर बिहारियों को ‘बाहरी’ कहकर बंगाल की जनता को भड़काया। इस दौरान बिहारियों के योगदान को नजरअंदाज किया गया, जो कोलकाता से लेकर छोटे शहरों तक मेहनत करके बंगाल की अर्थव्यवस्था को मजबूत करते हैं।

इसी तरह महाराष्ट्र में इंडी गठबंधन का हिस्सा शिवसेना ‘मराठी माणूस’ के नाम पर बिहारियों को निशाना बनाती रही है। 2000 के दशक में शिवसेना कार्यकर्ताओं ने मुंबई और अन्य शहरों में बिहारी मजदूरों पर हमले किए, उन्हें नौकरियाँ छीनने वाला बताया। मारवाड़ी और गुजरातियों को भी निशाना बनाया गया, लेकिन बिहारी सबसे आसान शिकार थे। कांग्रेस ने इन हमलों पर चुप्पी साधे रखी। यह दिखाता है कि कांग्रेस और उसके सहयोगी बिहारियों के खिलाफ नफरत को चुपचाप बढ़ावा देते हैं।

आरजेडी की चुप्पी यानी राहुल गाँधी की गुलामी?

बिहार की सबसे बड़ी पार्टी राष्ट्रीय जनता दल (आरजेडी) चिदंबरम के बयान पर चुप्पी साधे हुए है। लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव की पार्टी RJD जो सामाजिक न्याय की बात करती है, वो इस मुद्दे पर कुछ बोलने को तैयार नहीं।
बिहार के वरिष्ठ पत्रकार ने पी चिदंबरम की कड़ी आलोचना की। उन्होंने कहा, “चिदंबरम का बयान बिहारियों के लिए अपमानजनक है। वे हमें दोयम दर्जे का नागरिक मानते हैं। कांग्रेस को माफी माँगनी चाहिए और आरजेडी की चुप्पी बिहार के गौरव के साथ धोखा है।” उन्होंने कहा कि बिहारी मजदूर देश भर में मेहनत करते हैं, लेकिन उन्हें बार-बार अपमान सहना पड़ता है।
जदयू के मुख्य प्रवक्ता राजीव रंजन ने भी कांग्रेस पर निशाना साधा। उन्होंने कहा, “बिहार के लोगों ने देश और दुनिया की अर्थव्यवस्था को अपने खून पसीने से सींचा है। अगर वो तमिलनाडु में लंबे समय से हैं, और वहाँ की वोटिंग प्रक्रिया का हिस्सा बनना चाहते हैं, तो इससे चिदंबरम या किसी को तकलीफ क्यों हो?”
उन्होंने कहा कि चिदंबरम और कांग्रेस का मकसद चुनाव को बिहारी वर्सेज बाहरी बनाने की है। जो कि पूरी तरह से गलत है। ऐसा कांग्रेस पार्टी लगातार कर रही है। उन्होंने कहा कि SIR पर कांग्रेस और सहयोगी दल ऊल-जलूल बयानबाजी करके सिर्फ राजनीतिक रोटियाँ सेंक रहे हैं, जबकि ये मामला सुप्रीम कोर्ट तक में है और सुप्रीम कोर्ट ने खुद SIR को हरी झंडी दी है।
राजीव रंजन ने कहा, “चिदंबरम का बयान कांग्रेस की दोहरी नीति को दिखाता है। ये लोग गरीबों की बात करते हैं, लेकिन बिहारी मजदूरों को राजनीतिक बोझ मानते हैं। आरजेडी की चुप्पी बताती है कि वे बिहार के लोगों से ज्यादा राहुल गाँधी के वफादार हैं।”
आरजेडी की चुप्पी इसलिए और दुखद है, क्योंकि ये वही पार्टी है जो बिहार में दलितों, पिछड़ों और गरीबों के हक की बात करती है। लेकिन जब उनके अपने लोग, बिहारी मजदूर, अपमानित हो रहे हैं, तो आरजेडी राहुल गाँधी के सामने सिर झुकाए खड़ी है। ये बिहार के लोगों के साथ गद्दारी है।
हालाँकि बिहार कांग्रेस के प्रवक्ता असित नाथ ने चिदंबरम के बयान का ये कहकर बचाव किया कि चुनाव आयोग आरएसएस के इशारे पर ऐसे काम कर रहा है, जिसमें गैर-कानूनी तरीके से बाहरी लोगों को वोटर लिस्ट में जोड़ दिया जाता है। कुछ खास वर्ग के लोगों के नाम हटाए जाते हैं, जबकि कुछ खास लोग हर चुनाव में राज्य बदलते हैं।
असित नाथ ने कहा कि बिहार के मजदूर धान की रोपाई-कटाई या खेती के कामों से बाहर जाते हैं, लेकिन बाद में लौट आते हैं। किसके पास इतनी फुरसत है कि वो वहाँ का वोटर बने? असित नाथ ने SIR की गड़बड़ियाँ भी गिनाई। उन्होंने ये भी कहा कि खुद उनकी पत्नी का नाम SIR की लिस्ट में नहीं है, जबकि लोकसभा चुनाव में उन्होंने वोट डाला था। अगर आखिरी लिस्ट में पत्नी का नाम नहीं आता, तो वो कोर्ट का रुख करेंगे। हालाँकि उन्होंने चिदंबरम के बिहार के मजदूरों को लेकर दिए बयान पर सीधे-सीधे कोई विरोध नहीं किया, भले ही वो बिहार कॉन्ग्रेस के प्रवक्ता हैं।

बिहारी मजदूर है देश की रीढ़, फिर भी निशाना

बिहारी प्रवासी मजदूर देश के हर कोने में मेहनत करते हैं। 2018 में गुजरात में एक बच्ची के साथ दुष्कर्म की अफवाह के बाद बिहारी मजदूरों पर हमले हुए। करीब 50,000 मजदूरों को गुजरात छोड़कर भागना पड़ा। 2023 में तमिलनाडु में भी ऐसी अफवाहें फैलीं कि बिहारी मजदूरों पर हमले हो रहे हैं। हालाँकि डीएमके सरकार ने इन अफवाहों को खारिज किया और मजदूरों को सुरक्षा का भरोसा दिया, लेकिन चिदंबरम का ताजा बयान फिर से बिहारियों को निशाना बनाने का काम कर रहा है।
तमिलनाडु में करीब 10 लाख प्रवासी मजदूर काम करते हैं, जिनमें ज्यादातर बिहारी हैं। ये लोग टेक्सटाइल उद्योग, निर्माण कार्य और छोटे-मोटे व्यवसायों में योगदान देते हैं। बिहारी मजदूर सिर्फ मजदूर नहीं हैं; कई उद्यमी, शिक्षक और कुशल पेशेवर भी हैं। फिर भी चिदंबरम जैसे नेता उन्हें सिर्फ ‘मजदूर’ कहकर उनकी गरिमा को ठेस पहुँचाते हैं। यह न सिर्फ अपमानजनक है, बल्कि देश की एकता के लिए भी खतरनाक है।

चिदंबरम का तर्क कानूनी और नैतिक रूप से भी गलत

चिदंबरम का ये कहना कि बिहारी मजदूर तमिलनाडु में वोटर नहीं बन सकते क्योंकि उनका ‘स्थायी घर’ बिहार में है, कानूनी रूप से गलत है। भारत का संविधान और जनप्रतिनिधित्व अधिनियम-1950 कहता है कि कोई भी भारतीय नागरिक, जो किसी जगह पर सामान्य रूप से रहता है, वहाँ वोटर बन सकता है। अगर कोई बिहारी मजदूर सालों से तमिलनाडु में रह रहा है, तो वह वहाँ वोटर बनने का हकदार है। चिदंबरम का इसे ‘गैरकानूनी’ कहना कानून की गलत व्याख्या है।
छठ पूजा का जिक्र करके चिदंबरम ने बिहारियों को अस्थाई निवासी दिखाने की कोशिश की। लेकिन छठ पूजा के लिए बिहार लौटना कोई सबूत नहीं कि वे तमिलनाडु में स्थायी रूप से नहीं रहते। क्या तमिलनाडु कोई अलग देश है, जहाँ बाहरी लोग बस नहीं सकते? यह तर्क जम्मू-कश्मीर के पुराने आर्टिकल 370 जैसा लगता है, जो बाहरी लोगों को वहाँ बसने से रोकता था।

खतरनाक मिसाल कायम कर रहे पी चिदंबरम

चिदंबरम का बयान ऐसे समय में आया है, जब बिहार में विधानसभा चुनाव की तैयारियाँ चल रही हैं। वोटर लिस्ट की सफाई को लेकर विपक्ष पहले ही चुनाव आयोग पर सवाल उठा रहा है। लेकिन चिदंबरम ने इसे तमिलनाडु बनाम बिहार का मुद्दा बनाकर 2026 के तमिलनाडु चुनावों के लिए क्षेत्रीय भावनाएँ भड़काने की कोशिश की। यह रणनीति न सिर्फ बिहारियों को तमिलनाडु में अलग-थलग कर सकती है, बल्कि राज्यों के बीच तनाव भी बढ़ा सकती है।
कांग्रेस और राहुल गाँधी की अगुवाई वाला इंडी गठबंधन बार-बार ऐसी राजनीति करता है, जो देश को बाँटने का काम करती है। एक तरफ वे ‘एकता में विविधता’ की बात करते हैं, दूसरी तरफ चिदंबरम जैसे नेता बिहारियों को बाहरी बताकर नफरत फैलाते हैं। आरजेडी की चुप्पी इस बात का सबूत है कि वह बिहार के हितों से ज्यादा गठबंधन की राजनीति को तरजीह दे रही है।

जहर फैलाने वालों को जवाबदेह बनाने की जरूरत

पी. चिदंबरम का बयान सिर्फ चुनाव आयोग की आलोचना नहीं, बल्कि बिहारी मजदूरों को अपमानित करने की कोशिश है। उन्हें तमिलनाडु में बाहरी और खतरे के रूप में दिखाकर वह क्षेत्रीय नफरत को हवा दे रहे हैं। कांग्रेस का ये दोहरा चरित्र, जहाँ राहुल गाँधी खुद दूसरे राज्यों से चुनाव लड़ते हैं, लेकिन बिहारियों को वोट देने का हक नहीं दिया जाता.. बेहद शर्मनाक है। इंडी गठबंधन का बिहारियों के खिलाफ नफरत भड़काने का इतिहास और आरजेडी की चुप्पी इस बात को और गंभीर बनाती है।
बिहारी मजदूर देश की रीढ़ हैं। वे करदाता हैं, वोटर हैं और भारत के विकास में हिस्सेदार हैं। उन्हें सम्मान मिलना चाहिए, न कि अपमान। चिदंबरम और कांग्रेस को अपने बयान के लिए माफी माँगनी चाहिए। आरजेडी को भी फैसला करना होगा कि वह बिहार के लोगों के साथ है या राहुल गाँधी की गुलामी करेगी। भारत की एकता को बनाए रखने के लिए ऐसे नेताओं को जवाबदेह बनाना जरूरी है।