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दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर बना वॉशिंगटन, ट्रंप सरकार ने फ्रीडम 250 पर फोड़े थे 8.5 लाख पटाखे: आसपास के शहर भी हुए प्रभावित


अमेरिका के 04 जुलाई को 250वें स्वतंत्रता दिवस के बाद वॉशिंगटन दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर बन गया है। IQAir ने इसके पीछे ट्रंप सरकार के ‘फ्रीडम 250’ कार्यक्रम को बताया, जिसके तहत शहर में 8.50 लाख से ज्यादा पटाखे फोड़े गए।

ट्रंप सरकार ने जिस ‘पायरोटेक्निको’ कंपनी को ‘फ्रीडम 250’ कार्यक्रम का जिम्मा दिया था, उस कंपनी ने 40 मिनट में 8.5 लाख आतिशबाजी के साथ वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने का टारगेट रखा था। लेकिन इस आतिशबाजी के बाद कुछ घंटों के लिए वॉशिन्गटन दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर बन गया।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, उस वक्त वॉशिन्गटन में बारीक कणों से होने वाला प्रदूषण 200 माइक्रोग्राम प्रति क्यूबिक मीटर से ज्यादा के उच्चतम स्तर पर पहुँच गया। आसपास के वर्जीनिया और मैरीलैंड जैसे क्षेत्रों को कोड पर्पल अलर्ट ने चपेट में ले लिया, ये हवा की ऐसी गुणवत्ता का संकेत देते हैं जिसे सिर्फ जोखिम वाले समूहों के लिए ही नहीं बल्कि सभी के लिए हानिकारक माना जाता है।

 

असम, तमिलनाडु, केरलम और पश्चिम बंगाल में मुस्लिम लीगी बनी कांग्रेस; पाकिस्तान की मांग नहीं करने वाले भाग गए और मांगने वाले रुके रहे भारत में

                                                                                    साभार: सोशल मीडिया  
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पिछले कुछ वर्षों से अपने भाषणों में लगातार एक बात कहते रहे हैं कि कांग्रेस अब एमएलसी यानी ‘मुस्लिम लीगी कांग्रेस’ बनती जा रही है। कांग्रेस के युवराज और अन्य नेता इसे चुनावी जुमला कहकर खारिज करता रहे हैं, लेकिन हाल ही में पश्चिम बंगाल, असम और तमिलनाडु के विधानसभा चुनावों के आंकड़े कांग्रेस की राजनीति की ऐसी तस्वीर साफ-साफ पेश कर रहे हैं। जनता-जनार्दन द्वारा दिए गए जनादेश में अब कांग्रेस के लिए भी इसे नजरअंदाज करना आसान नहीं है। 

याद करो, आज़ादी से पहले जब मुस्लिम लीग की मांग पर भारत खंडित हुआ था तब भारत को खंडित करने वाले पाकिस्तान नहीं गए, पाकिस्तान भागे पाकिस्तान नहीं मांगने वाले। दूसरे, भारत के खंडित होने पर मोहम्मद अली जिन्ना ने कहा था "पाकिस्तान जाने वाले मुसलमानों का नारा है 'हंस के लिया पाकिस्तान लड़के लेंगे हिंदुस्तान' तो मुस्लिम लीग को हिन्दुस्तान में बैन कर दो लेकिन मुस्लिम वोट की भूखी कांग्रेस ने बैन करने की बजाए सिर्फ केरल तक सीमित रखा लेकिन इंदिरा गाँधी उसी विभाजनकारी लीग को केरल से बाहर ले आयी। और आज कांग्रेस नेहरू और इन्दिरा की मुस्लिम वोटबैंक सियासत को अपना कर सनातन का अपमान करती आ रही है और गुलाम हिन्दू कांग्रेस की सेकुलरिज्म की शराब में डूबा है।  

भारत का संविधान बनाने में संविधान सभा में 23 सदस्य ऐसे थे जो 1946 में पाकिस्तान बनाने के लिए मुस्लिम लीग की टिकट पर जीते थे,

लेकिन जब इन्होंने पाकिस्तान बना लिया तो उसके बाद यह बड़ी होशियारी से पाकिस्तान नहीं गए और फिर नेहरू गांधी ने इनको भारत का संविधान बनाने का जिम्मा भी दे दिया, इन सब ने भी अपना संविधान बनाया है।
इन लोगों ने पाकिस्तान के नाम पर पंजाब के टुकड़े कर दिए और जहां पंजाब के हिन्दू सिख बहुतायत में थे वहां पाकिस्तान बनने के बाद लाखों हिन्दू सिखों को तलवार के दम पर ज़बरदस्ती मुस्लिम बनाया गया। हिन्दुओं की हालत वहां सिखों से थोड़ी अच्छी थी, क्योंकि सिखों के साथ ऐसा व्यवहार करने का एक बहुत बड़ा कारण था जिसकी सजा आज भी सिखों को मिल रही है। कांग्रेस और इसके पाकिस्तानी साथियों ने सिखों का ही ज्यादा नरसंहार किया था पार्टीशन के वक्त।

अम्बेडकर भी ऐसे ही इन लोगों का विरोध नहीं करता था और इसी विरोध के कारण कांग्रेस ने उसको भी अपने रास्ते से हटा दिया और मुस्लिम समुदाय के तुष्टिकरण में जुट गई। कांगड़ी का वोट बैंक एकजुट माइनॉरिटी और बिखरा हुआ हिन्दू रहा है जिसके लिए सेक्युलर शब्द बनाया गया जो न हिन्दू था और न मुस्लिम। जो इनके बीच का (हिजड़ा) था वह सेक्युलर था।

यह सिर्फ भारत में मुल्ला नेहरू और गांधी ही कर सकते थे कि जिनको गद्दारी का चार्ज लगाकर जेल में सड़ाना था, उन जेहादियों को ही सीधे संविधान बनाने की जिम्मेदारी दे दी। इनमें से ये केवल कुछ नाम हैं...

इनमें से बाद में बहुत सारे लोग केंद्र और राज्यो में मंत्री और अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के चांसलर तक बने....

from Madras

१ Mohamed Ismail Sahib

२ K.T.M. Ahmed Ibrahim·

३ Mahboob Ali Baig Sahib Bahadur·

४ B Pocker Sahib Bahadur from mubai

५ Abdul Kadar Mohammad Shaikh

६ Abdul Kadir Abdul Aziz Khan from Asam

७ Muhammad Saadulla,

८ Abdur Rouf from Up

९ Begum Qudsia Aijaz Rasul nbab of hardoi

१० Syed Fazl-ul-Hasan harshat mohani of AMU

११ Nabab ismail khan of meerut who

became chancellor of AMU

१२ ZH LARI from Bihar

१३ Husaain imam from gaya

१४ Saiyid Jafar Imam·

१५ Latifur Rahman·

१६ Mohammad Tahir

आज इनके वंशज बड़े-बड़े नेता बनकर बोल रहे हैं कि हमारा भी खून शामिल है इस देश की मिट्टी में...


सबसे बड़ा आश्चर्य तो मुझे तब हुआ जब इन्टरनेट पर पूरा खोजा कि इनके नाम मिल जाएँ, तो किसी भी वेबसाइट पर किसी भी तथाकथित हिन्दूवादी पार्टी या संगठन ने इनका नाम तक गूगल पर नहीं डाला है। खोज खोज कर नाम ढूँढे हैं। हम राष्ट्रवादियों को विचारधारा और शत्रुबोध के स्तर पर अभी बहुत ज्यादा काम करने की जरूरत है। इस्लामिक जिहादी मुस्लिम हमसे इस मामले में हजार गुना आगे हैं कि इन सब करतूतों के बाद भी देश में अपनी इतने बड़े तथाकथित देशभक्त की इमेज बनाये हुए हैं।

आज जहां पूरी दुनियाँ की ऑंखें खुल रही हैं, वहीँ कट्टर सनातन तथा हिन्दू विरोधी और देशद्रोही कॉंग्रेस के दोगले, बिकाऊ, लालची, स्वार्थी, कायर, सेक्युलर, नपुंसक, चमचे सो रहे हैं.

इन तीन राज्यों की कुल 654 विधानसभा सीटों पर 433 उम्मीदवार उतारे थे। इनमें से कांग्रेस केवल 35 सीटें जीत पाई, यानी कांग्रेस का जीत का प्रतिशत करीब 8 फीसदी ही रहा। लेकिन इससे भी अधिक चौंकाने वाला तथ्य यह है कि इन 35 विधायकों में से 21 मुस्लिम समुदाय से हैं। यानी कांग्रेस के कुल विजयी विधायकों में लगभग 60 प्रतिशत तो मुस्लिम ही हैं। और यह संयोग नहीं है, क्योंकि कांग्रेस ने इन तीन राज्यों में करीब 42 मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट दिया था। अर्थात जिन मुस्लिम उम्मीदवारों को कांग्रेस ने उतारा, उनमें लगभग आधे चुनाव जीत गए। यह आंकड़ा किसी व्यापक सामाजिक प्रतिनिधित्व वाली राष्ट्रीय पार्टी का कम और एक विशेष मुस्लिम समुदाय केंद्रित राजनीति करने वाली पार्टी का अधिक प्रतीत होता है।

तीन राज्यों के चुनावी आंकड़ों ने खड़े किए बड़े सवाल
भारतीय राजनीति में चुनाव केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम नहीं होते, बल्कि वे दलों की वैचारिक दिशा और सामाजिक स्वीकार्यता का भी आईना बनते हैं। असम, पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु के हालिया विधानसभा चुनावों ने कांग्रेस के सामने ऐसा ही असहज दर्पण खड़ा कर दिया है, जिसमें पार्टी का चेहरा अब “सर्वधर्म समभाव” वाली राष्ट्रीय पार्टी से अधिक एक सीमित वोट बैंक पर निर्भर संगठन जैसा दिखाई देने लगा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वर्षों से कांग्रेस पर “एमएलसी” यानी “मुस्लिम लीगी कांग्रेस” बताते रहे हैं। इन तीन राज्यों के चुनावी आंकड़ों ने ही पीएम मोदी की बात को सच साबित कर दिखाया है।

असम: कांग्रेस की असमिया अस्मिता की बजाए मुस्लिम राजनीति
असम के चुनाव परिणाम कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा संकेत लेकर आए हैं। राज्य में कांग्रेस लंबे समय से खुद को “संतुलित” विकल्प दिखाने की कोशिश करती रही थी, लेकिन हालिया चुनावों में उसका टिकट वितरण और जीत का पैटर्न कुछ और ही कहानी कहता है। कांग्रेस ने बड़ी संख्या में मुस्लिम उम्मीदवार उतारे और पार्टी की जीत का बड़ा हिस्सा उन्हीं सीटों से आया जहां मुस्लिम आबादी निर्णायक भूमिका में है। इससे यह धारणा और मजबूत हुई कि कांग्रेस अब व्यापक असमिया अस्मिता की राजनीति के बजाय विशेष समुदाय आधारित गणित पर निर्भर होती जा रही है। यही कारण है कि ऊपरी असम, चाय बागान क्षेत्रों और राष्ट्रवादी वोटरों में कांग्रेस का आधार तेजी से सिकुड़ता गया। भाजपा ने इसी “तुष्टिकरण बनाम विकास” की बहस को धार दी और कांग्रेस रक्षात्मक मुद्रा में आ गई। असम के परिणाम यह बताते हैं कि कांग्रेस की रणनीति उसे सीमित पॉकेट्स तक तो बचा सकती है, लेकिन पूरे राज्य की पार्टी नहीं बना सकती। यहां बीजेपी ने फिर से प्रचंड बहुमत से सरकार बनाई है।

पश्चिम बंगाल: हिंदू मतदाता की दूरी और मुस्लिम निर्भरता
पश्चिम बंगाल में कांग्रेस की स्थिति और भी अधिक गंभीर दिखाई दी। कभी बंगाल की मुख्यधारा की राजनीति का केंद्रीय स्तंभ रही कांग्रेस अब मुस्लिम बहुल इलाकों तक सिमटती जा रही है। पार्टी जिन सीटों पर प्रभावी रही, वहां उसका सामाजिक आधार लगभग पूरी तरह अल्पसंख्यक वोटों पर निर्भर दिखाई दिया। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर कांग्रेस को हिंदू समाज में स्वीकार्यता क्यों नहीं मिल रही? क्या कारण है कि पार्टी को टिकट वितरण में भी मुस्लिम चेहरे अधिक “सुरक्षित” लगते हैं? बंगाल में कांग्रेस का यह स्वरूप उसे तृणमूल कांग्रेस की “सॉफ्ट सेक्युलर” राजनीति और वामपंथ की पुरानी लाइन के बीच फंसा देता है। विडंबना यह है कि जिस कांग्रेस ने कभी बंगाल में बंकिम, विवेकानंद और नेताजी की विरासत की बात की थी, आज वही पार्टी चुनावी अस्तित्व बचाने के लिए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण वाले सीमित समीकरणों पर निर्भर दिखाई देती है। यही कारण है कि पार्टी की सीटें घटती गईं और उसका प्रभाव भी सिमटता गया।

तमिलनाडु: द्रविड़ राजनीति में कांग्रेस की पहचान का संकट
तमिलनाडु में कांग्रेस डीएमके के सहारे चुनाव लड़ती है, इसलिए वहां उसकी स्वतंत्र राजनीतिक पहचान पहले ही कमजोर हो चुकी है। लेकिन इस चुनाव में भी कांग्रेस के मुस्लिम उम्मीदवारों का अनुपात और उनकी जीत दर ने बहस को जन्म दिया। कांग्रेस ने यहां भी ऐसे निर्वाचन क्षेत्रों पर अधिक फोकस किया जहां धार्मिक ध्रुवीकरण उसके पक्ष में काम कर सके। समस्या केवल मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट देने की नहीं है। किसी भी लोकतंत्र में हर समुदाय को प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए। असली सवाल यह है कि क्या कांग्रेस अब अपने पारंपरिक हिंदू, दलित, पिछड़े और मध्यमवर्गीय वोटरों का भरोसा पूरी तरह खो चुकी है? तमिलनाडु के परिणाम यही संकेत देते हैं। कांग्रेस की राजनीति अब सहयोगी दलों के एजेंडे और अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के इर्द-गिर्द घूमती दिखाई देती है, जबकि राज्य का बड़ा वर्ग उसे केवल “डीएमके की परछाई” मानने लगा है।

कांग्रेस की सर्व समाज से “विशेष समाज” तक की यात्रा
कांग्रेस की सबसे बड़ी ताकत कभी उसकी समावेशी छवि थी। पार्टी हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, दलित, आदिवासी और मध्यम वर्ग सभी की राजनीतिक आकांक्षाओं का मंच मानी जाती थी। लेकिन अब उसकी राजनीति में संतुलन कम और तुष्टिकरण के प्रति झुकाव अधिक दिखाई देता है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री मोदी का मुस्लिम लीगी कांग्रेस कहना केवल चुनावी नारा भर नहीं रह गया, बल्कि विपक्ष के भीतर भी चर्चा का विषय बन चुका है। इन चुनाव परिणामों ने तो इसे साबित भी किया है। इन चुनावों ने यह भी दिखाया कि कांग्रेस को टिकट देने के लिए कई बार हिंदू उम्मीदवारों से अधिक “बेहतर” मुस्लिम उम्मीदवार नजर आते हैं, जबकि दूसरी ओर मुस्लिम मतदाता भी कांग्रेस में उन्हीं चेहरों को प्राथमिकता देते दिखाई दे रहे हैं जो उनकी सामुदायिक पहचान का प्रतिनिधित्व करते हों। यह प्रवृत्ति किसी भी राष्ट्रीय दल के लिए खतरनाक संकेत है, क्योंकि इससे पार्टी का सामाजिक संतुलन बिगड़ता है और वह धीरे-धीरे व्यापक जनाधार खोने लगती है।

अब जनता चाहती है विकास, सुशासन और स्थिरता
अगर कांग्रेस इसी दिशा में चलती रही, तो उसकी स्थिति भविष्य में और सीमित हो सकती है। वह कुछ विशेष क्षेत्रों और विशेष समुदायों तक सिमटकर रह जाएगी। तब “भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस” का “राष्ट्रीय” स्वरूप केवल नाम तक सीमित रह जाएगा। तीनों राज्यों के चुनाव परिणामों ने कांग्रेस के सामने कठोर प्रश्न रख दिए हैं। सवाल केवल सीटों की हार का नहीं है, बल्कि राजनीतिक चरित्र के बदलने का है। और शायद यही वह बिंदु है जहां कांग्रेस को तय करना होगा कि वह फिर से “सर्व समाज” की पार्टी बनना चाहती है या “विशेष समाज” की राजनीति में खुद को स्थायी रूप से सीमित कर लेना चाहती है। केवल भाजपा विरोध को राजनीति का आधार बनाकर पार्टी लंबे समय तक नहीं चल सकती। उसे यह समझना होगा कि भारत की जनता अब केवल पहचान की राजनीति नहीं, बल्कि विकास, स्थिरता, सुशासन और सांस्कृतिक आत्मविश्वास चाहती है।

एक विशेष वोट बैंक तक सीमित राजनीति खतरे की घंटी
कांग्रेस की आज की तस्वीर तेजी से बदलती नजर आ रही है। असम में कांग्रेस के 19 विधायकों में 18 मुस्लिम होना केवल चुनावी गणित नहीं, बल्कि पार्टी की बदलती सामाजिक संरचना का संकेत है। पश्चिम बंगाल में कांग्रेस के दोनों विजेता मुस्लिम समुदाय से हैं। सवाल यह नहीं है कि मुस्लिम उम्मीदवार क्यों जीते। लोकतंत्र में हर नागरिक को समान अधिकार है। असली सवाल यह है कि क्या कांग्रेस धीरे-धीरे अपनी राजनीति को एक विशेष वोट बैंक तक सीमित करती जा रही है? विडंबना यही है कि कांग्रेस स्वयं को “समावेशी” पार्टी कहती है, लेकिन उसके टिकट वितरण और चुनावी रणनीति के आंकड़े इसके उलट कहानी कह रहे हैं। ऐसा प्रतीत होने लगा है कि कांग्रेस को टिकट देने के लिए हिंदुओं से ज्यादा “बेहतर विकल्प” मुस्लिम उम्मीदवार दिखाई दे रहे हैं, और दूसरी ओर मुस्लिम मतदाताओं को वोट देने के लिए कांग्रेस में सबसे भरोसेमंद चेहरा केवल मुस्लिम प्रत्याशी ही नजर आ रहा है। यह प्रवृत्ति किसी स्वस्थ लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं कही जा सकती। राष्ट्रीय दल तब मजबूत बनते हैं जब वे समाज के हर वर्ग में समान स्वीकार्यता रखते हैं, न कि तब जब उनका सामाजिक आधार सिमटकर पहचान आधारित राजनीति में बदलने लगे।

INDI गठबंधन में तकरार, राहुल के खिलाफ मणिशंकर अय्यर बने स्टालिन के समर्थक, ममता-लालू पहले ही विरोधी

एक कहावत है जहां जहां पैर पड़े अभागे के वहां वहां बंटाधार और यह गाँधी परिवार पर सटीक बैठ रहा है। जब से परिवार गुलामों ने सोनिया गाँधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने तत्कालीन अध्यक्ष दलित सीताराम केसरी को पार्टी ऑफिस से बाहर फेंका था कांग्रेस बैसाखियों के सहारे सरकार बनाती रही। और 2014 के बाद से तो सत्ता के लिए इस तरह तड़प रही है जिस तरह पानी से बाहर मछली। और उस तड़पन में सोनिया के बाद राहुल गाँधी और प्रियंका वाड्रा मोदी-योगी-अमित और बीजेपी का विरोध करते करते देश विरोध करने लगे हैं। जो देशहित में नहीं और जनता को वोट देते समय कांग्रेस और इसको समर्थन देने वाले INDI गठबंधन से दूरी बनानी होगी।   
पश्चिम बंगाल चुनाव नजदीक आते ही विपक्षी राजनीति के भीतर दबे हुए अंतर्विरोध सतह पर आने लगे हैं। भाजपा विरोध के नाम पर बना INDI गठबंधन अब नेतृत्व के सवाल पर उलझता दिखाई दे रहा है। यह केवल पद का विवाद नहीं, बल्कि चुनावी रणनीति, स्वीकार्यता और राजनीतिक विश्वसनीयता का प्रश्न बन चुका है। दरअसल, विपक्षी राजनीति में एक पुरानी कहावत है कि “सत्ता से पहले सहमति।” लेकिन आज जो दृश्य उभर रहा है, वह इस कहावत को चुनौती देता दिखाई दे रहा है। विपक्षी INDI गठबंधन अब अपने ही नेतृत्व के प्रश्न पर उलझता नजर आ रहा है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर को ही इंडिया गठबंधन के संयोजक के लिए राहुल गांधी के बजाए एम.के स्टालिन ज्यादा उपयुक्त नजर आते हैं। लालू यादव ने भी इंडी गठबंधन के नेतृत्व के लिए अपना वोट राहुल गांधी के बजाए ममता बनर्जी को दिया है। ममता बनर्जी की खुद की भी चाहत संयोजक बनने की है, लेकिन उनकी राह में रोड़ा जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला बना हुए हैं। और खुद राहुल गांधी कांग्रेस की ही डूबती नैया को नहीं बचा पा रहे हैं। ऐसे में पद को लेकर उठती आवाजें, पुराने नेताओं की असहमति, और क्षेत्रीय दलों की महत्वाकांक्षाएं, ये सब मिलकर उस अंतर्विरोध को उजागर कर रहे हैं जिसे लंबे समय तक दबाकर रखा गया है। लेकिन आंतरिक विरोध के इस गुब्बारे की हवा पश्चिम बंगाल के चुनाव में निकल सकती है।

अब इंडिया गठबंधन का ‘कप्तान’ बदलने का वक्त आ गया
दरअसल, महाराष्ट्र के बाद बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के बाद नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी चौतरफा मुसीबतों में घिरे नजर आ रहे हैं। एक ओर राहुल गांधी पर अमेरिकी उद्योगपति जॊर्ज सोरोस के साथ कनेक्शन का बड़ा खुलासा हुआ है, तो दूसरी ओर इंडिया ब्लॊक के अंदर से ही राहुल गांधी के नेतृत्व को लेकर बगावत जैसे हालात पैदा हो गए हैं। राहुल गांधी की कथित ब्रिटिश नागरिकता को लेकर जांच पहले से ही चल रही है। इंडिया ब्लॊक की पांच प्रमुख पार्टियों ने गठबंधन की कमान बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को सौंपने का समर्थन कर कांग्रेस खासकर, राहुल गांधी के लिए ऐसी मुसीबत खड़ी कर दी है, जिससे पार पाना मुश्किल होगा। ममता बनर्जी और उनकी पार्टी ने राहुल गांधी के खिलाफ खुल्लम-खुल्ला मोर्चा खोल दिया है। दावा यही है कि अब इंडिया गठबंधन का कप्तान बदलने का वक्त आ गया है। राहुल गांधी की कैप्टेंसी में इंडिया गठबंधन के लिए लगातार मजबूत हो रही भाजपा को हराना असंभव होगा।

पांच प्रमुख दलों ने राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर उठाए सवाल
लोकसभा चुनाव में टीम एनडीए का स्कोर कार्ड 293 रहा, जो स्पष्ट बहुमत से कहीं ज्यादा है। एनडीए के कप्तान नरेन्द्र मोदी ने अपनी टीम को शानदार जीत दिलाई। वहीं, टीम इंडिया गठबंधन का स्कोर 235 ही रहा। लगातार तीसरी हार के बाद अब विपक्षी टीम की कैप्टेंसी को लेकर नई जंग छिड़ गई है। टीएमसी की मांग है कि हरियाणा और महाराष्ट्र में कांग्रेस का स्कोर कार्ड ऐसा है कि अब टीम इंडिया का कप्तान बदलना होगा। मतलब टीम इंडिया में कैप्टन की कुर्सी को लेकर अंदरूनी झगड़ा शुरू हो गया है। हरियाणा, महाराष्ट्र और अब बिहार में कांग्रेस की बुरी हार के बाद पांच प्रमुख दल राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठा चुके हैं। पश्चिम बंगाल चुनाव में कांग्रेस नेतृत्व से कोई खास उम्मीद नहीं की जा रही। क्योंकि इस राज्य में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का आत्मविश्वास बुरी तरह डगमगाया हुआ है।

राहुल की भूमिका पर अय्यर की असहमति ने हलचल मचाई

कांग्रेस नेता राहुल गांधी भले ही चुनाव ना जितवा पा रहे हैं, लेकिन लंबे समय से विपक्ष का प्रमुख चेहरा है। भारत जोड़ो यात्रा और संसद में नारेबाजी और नंगे प्रदर्शन से कांग्रेसी चाहे बदनाम हुए, लेकिन सुर्खियों में आए। लेकिन गठबंधन राजनीति का गणित केवल जनसभाओं और नारों से तय नहीं होता। चुनावी साल में सबसे महत्वपूर्ण सवाल होता है क्या नेतृत्व पर सहयोगी दलों की सहमति है? इसी संदर्भ में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर द्वारा राहुल की भूमिका को लेकर व्यक्त की गई असहमति ने राजनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है। जब पार्टी के भीतर से ही नेतृत्व को लेकर शंकाएं सामने आती हैं, तो विपक्षी एकता की छवि पर असर पड़ना स्वाभाविक है। चुनावी रणनीति में “धारणा” ही सबसे बड़ा हथियार होती है, और फिलहाल धारणा यह बन रही है कि विपक्ष अभी भी अपने चेहरे को लेकर आश्वस्त नहीं है।

राहुल गांधी में न “पीएम मटेरियल” और न ही संयोजक के योग्य

बिहार की राजनीति के दिग्गज लालू प्रसाद यादव पहले भी राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल उठाते रहे हैं और उन्होंने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के प्रति समर्थन का संकेत दिए हैं। ममता बनर्जी स्वयं भी संयोजक पद को लेकर खुली दावेदारी के संकेत दे चुकी हैं। बंगाल में चुनावी समीकरणों को देखते हुए वे राष्ट्रीय स्तर पर अपनी भूमिका मजबूत करना चाहती हैं। उनके लिए यह केवल गठबंधन का प्रश्न नहीं, बल्कि क्षेत्रीय वर्चस्व और राष्ट्रीय पहचान का विस्तार है। यह पूरा घटनाक्रम उस समय सामने आया है जब भाजपा चुनावी मोड में पूरी ताकत से उतर चुकी है। एक मार्च से भाजपा की पश्चिम बंगाल में व्यापक स्तर पर परिवर्तन यात्रा शुरू होने जा रही है। बीजेपी ने इस मतभेद को तुरंत मुद्दा बनाया है। उसका तर्क सीधा और आक्रामक है कि जब कांग्रेस के अपने वरिष्ठ नेता ही राहुल गांधी को “पीएम मटेरियल” या संयोजक के योग्य नहीं मानते, तो देश क्यों माने? भाजपा की रणनीति विपक्ष की आंतरिक असहमति को “अस्थिरता” के प्रतीक के रूप में पेश करने की है।

लालू-ममता को भी नहीं भा रहा है राहुल गांधी का नेतृत्व

कांग्रेस के भीतर से ही आवाजें उठने लगें—जैसे मणिशंकर अय्यर जैसे वरिष्ठ नेता का सार्वजनिक असहमति जताना तो यह संकेत मात्र व्यक्तिगत मतभेद का नहीं, बल्कि व्यापक असंतोष का प्रतीक बन जाता है। दूसरी ओर, बिहार की राजनीति के प्रमुख लालू प्रसाद यादव पहले भी राहुल गांधी के नेतृत्व पर अप्रत्यक्ष सवाल उठा चुके हैं और ममता बनर्जी के प्रति समर्थन का संकेत दे चुके हैं। वहीं तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन का नाम भी संभावित संयोजक के रूप में उभर रहा है। यह परिदृश्य बताता है कि गठबंधन के भीतर नेतृत्व को लेकर एकमतता नहीं है। यहां प्रश्न यह नहीं कि कौन अधिक सक्षम है, बल्कि यह है कि क्या गठबंधन किसी स्पष्ट ढांचे के साथ आगे बढ़ रहा है? यदि संयोजक पद को लेकर क्षेत्रीय संतुलन, राजनीतिक प्रभाव और व्यक्तिगत समीकरण निर्णायक बनेंगे, तो क्या यह गठबंधन राष्ट्रीय स्तर पर बेहद अस्थिर विकल्प के रूप में नहीं देखा जाएगा?

लोकसभा चुनाव में दोस्ती और विधानसभा चुनावों में परस्पर दुश्मन

इंडिया गठबंधन की मूल अवधारणा भाजपा के खिलाफ एक साझा मोर्चा बनाने की थी। लेकिन क्या केवल “विरोध” ही पर्याप्त है? किसी भी गठबंधन को टिकाऊ बनाने के लिए साझा न्यूनतम कार्यक्रम, स्पष्ट नेतृत्व संरचना और आपसी विश्वास की आवश्यकता होती है। लेकिन गठबंधन के दलों में ना तो आपसी विश्वास है और ना ही नैतिकता। क्योंकि गठबंधन के यही दल लोकसभा चुनाव में एकजुट होने की कस्मे खाते हैं और विधानसभा के चुनावों में एक-दूसरे के खिलाफ खड़े नजर आते हैं। जनता इनकी चालें खूब देख रही है। यहां तक कि अब तो संयोजक के नाम पर ही मतभेद सार्वजनिक हो गया है। वह भी किसी अन्य दल की ओर से नहीं, बल्कि कांग्रेस के भीतर से ही एक वरिष्ठ नेता के माध्यम से आया है। इससे साफ संदेश जाता है कि सत्ता से पहले ही इंडिया गठबंधन में असहमति चरम पर है।

 स्टालिन दक्षिण भारत में अपनी भूमिका का चाहते हैं विस्तार

दरअसल, क्षेत्रीय दलों की राजनीति भी इस समीकरण को जटिल बनाती है। ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में अपनी जमीन मजबूत करना चाहती हैं। स्टालिन दक्षिण भारत में अपनी भूमिका का विस्तार देख रहे हैं। लालू प्रसाद यादव बिहार की राजनीति के पुराने खिलाड़ी हैं। ऐसे में कांग्रेस का “स्वाभाविक नेतृत्व” दावा चुनौती में बदल जाता है। सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस अपने सहयोगियों को बराबरी का स्पेस देने को तैयार है? या वह अभी भी राष्ट्रीय पार्टी होने के अंध-विश्वास में नेतृत्व को अपना अधिकार मानती है? राहुल गांधी के सामने भी चुनौती है। उन्हें केवल कांग्रेस कार्यकर्ताओं ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय दलों के नेताओं का भी विश्वास जीतना होगा। गठबंधन राजनीति में व्यक्तिगत छवि से ज्यादा महत्वपूर्ण सामूहिक स्वीकार्यता होती है। यदि सहयोगी दलों को लगे कि नेतृत्व एकतरफा है, तो असंतोष स्वाभाविक है।
चुनावी साल में राहुल गांधी के लिए संतुलन साधना आसान नहीं
दक्षिण भारत से तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन का नाम भी संयोजक के रूप में चर्चा में है। स्टालिन अपेक्षाकृत कम विवादित नेता माने जाते हैं। यदि उनका नाम आगे बढ़ता है, तो यह संकेत होगा कि विपक्ष नेतृत्व को कांग्रेस-केंद्रित ढांचे से बाहर निकालना चाहता है। लेकिन यही बिंदु कांग्रेस के लिए असहज हो सकता है—क्या वह राष्ट्रीय पार्टी होते हुए भी नेतृत्व साझा करने को तैयार है? दूसरी ओर, कांग्रेस के सामने दुविधा है। यदि वह नेतृत्व पर अड़ती है, तो क्षेत्रीय दल असहज हो सकते हैं। यदि वह पीछे हटती है, तो उसके कार्यकर्ताओं में यह संदेश जा सकता है कि पार्टी राष्ट्रीय राजनीति में अपनी केंद्रीय भूमिका खो रही है। चुनावी साल में राहुल गांधी के लिए यह संतुलन साधना आसान नहीं होगा। चुनावी साल में मतदाता यह भी देखता है कि कौन-सा गठबंधन आंतरिक रूप से कितना स्थिर है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि यदि नेतृत्व को लेकर सार्वजनिक बयानबाजी ऐसे ही जारी रहती है, तो विपक्ष का संदेश बिखरा हुआ प्रतीत होगा।
विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा होने के दम भरने वाले राहुल गांधी के दिन क्या अब लदने वाले हैं? क्या इंडिया गठबंधन का चेहरा राहुल गांधी के बजाए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बनने जा रही हैं? इन सवालों का जवाब चाहे जो हो, लेकिन ये अब शीशे की तरह साफ हो गया है कि इंडी ब्लॉक के अंदर राहुल गांधी को लेकर खटपट का समंदर लहरा रहा है। इंडिया गठबंधन के ज्यादातर खिलाड़ी कैप्टन बदलने के पक्ष में खड़े नजर आ रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस की मांग है कि ममता बनर्जी को इंडिया गठबंधन का कैप्टन बनाया जाए। ममता बनर्जी की दावेदारी के बाद इंडिया गठबंधन पूरी तरह खेमों में बंटा हुआ नजर आ रहा है। वैसे यदि दिमाग पर थोड़ा-सा जोर डालें तो याद आएगा कि पीएम मोदी ने तो लोकसभा चुनाव से पहले ही भविष्यवाणी कर दी थी कि इंडी गठबंधन के दल सिर्फ चुनावी स्वार्थ के लिए जुड़े हैं। चुनाव होने के बाद गठबंधन के दल आपस में टकराने लग जाएंगे। वही अब हो रहा है। केजरीवाल ने दिल्ली में कांग्रेस से अलग राह पकड़ ली है। 
चुनाव हार रहे राहुल गांधी इंडी गठबंधन को आगे कैसे ले जा सकते हैं
टीएमसी के सांसद कीर्ति आजाद ने कुछ समय पहले यह बयान दिया था कि अब इंडिया ब्लॊक की कमान बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को सौंप दी जानी चाहिए। क्योंकि राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस खुद बुरी तरह हार का सामना कर रही है। ऐसे में वह इंडिया गठबंधन को आगे लेकर कैसे जा सकती है। अपने सांसद के इस बयान पर पहली प्रतिक्रिया ममता बनर्जी ने ही दी। उन्होंने साफ तौर पर कह दिया कि सभी दल राजी हों तो वे ‘इंडिया’ की कमान संभालने को तैयार हैं। इसके बाद तो ममता बनर्जी को समर्थन की झड़ी सी लग गई। समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव, एनसीपी चीफ शरद पवार, शिवसेना (उद्धव) और अब लालू यादव ने भी मांग कर दी कि इंडिया ब्लॊक की कमान ममता बनर्जी को सौंप दी जानी चाहिए।
अब गठबंधन के कई घटक दल राहुल को अपना नेता मानने को तैयार नहीं
इंडिया गठबंधन में चल रही उठापटक के बीच कांग्रेस और राहुल गांधी की ओर से चुप्पी साध ली गई है। राहुल गांधी और उनकी पार्टी संसद के सत्र में गौतम अडानी का अपना वही पुराना मुद्दा उठा रहे हैं। इस मुद्दे पर टीएमसी और समाजवादी पार्टी का उसे समर्थन ना मिलने से समझा जा सकता है कि इंडिया के कई प्रमुख घटक दल राहुल गांधी को अपना नेता मानने को तैयार नहीं हैं। इंडिया ब्लॊक के प्रमुख घटक दल राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने भी ममता बनर्जी को इंडिया का नेतृत्व सौंपने की मांग कर एक प्रकार से कांग्रेस का साथ छोड़ दिया है। पटना में पत्रकारों ने जब लालू यादव से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बयान के संबंध में पूछा तो उन्होंने कहा, “इंडिया गठबंधन का नेतृत्व ममता बनर्जी को दे देना चाहिए, हम सहमत हैं।” कांग्रेस की आपत्ति से जुड़े सवाल पर लालू ने कहा, “कांग्रेस के आपत्ति जताने से कुछ नहीं होगा। ममता बनर्जी को नेतृत्व दे देना चाहिए।”
ममता का नाम आगे करने के बयानों से सियासी पारा चढ़ा
भले ही कहने को कांग्रेस की ओर से इंडिया ब्लॊक की कमान कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे संभाल रहे हैं, लेकिन सहयोगी दल मानते हैं कि इंडिया की कमान अप्रत्यक्ष रूप से राहुल गांधी के हाथों में ही है। मल्लिकार्जुन तो कठपुतली मात्र हैं। कांग्रेस की ओर से मुख्य चेहरा राहुल गांधी ही हैं। ऐसे में इंडी गठबंधन के सहयोगी दलों का निशाना सीधे-सीधे राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर ही है। सहयोगी दलों ने एक प्रकार से राहुल गांधी के प्रति बगावत कर उनके प्रति अविश्वास व्यक्त कर दिया है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को विपक्षी दलों के गठबंधन का नेतृत्व देने के लेकर कई दलों के बयान के बाद सियासी पारा चढ़ गया है। अब सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष के नेता इस बयानबाजी में शामिल हो गए हैं। इंडी गठबंधन के नेतृत्व पर लालू-शरद-उद्धव आदि नेताओं का साथ मिलने ममता बनर्जी फूली नहीं समा रही हैं। लालू यादव, शरद पवार से लेकर संजय राउत ने भी ममता बनर्जी को प्रमुख भूमिका देने की बात कही है। इस बीच ममता बनर्जी ने इंडिया ब्लॉक के नेतृत्व में बदलाव की चर्चाओं पर अपनी पहली प्रतिक्रिया दी है, उन्होंने इस पद के लिए उनका समर्थन करने वाले विपक्षी नेताओं को धन्यवाद दिया है। वाईएसआर कांग्रेस पार्टी ने भी ममता बनर्जी को गठबंधन का नेतृत्व करने के लिए सबसे बेहतर उम्मीदवार बताया।

जिस न्यूटन दास ने बांग्लादेश में किया शेख हसीना के खिलाफ प्रदर्शन, वह अब पश्चिम बंगाल का नागरिक: TMC के साथ है लिंक

                बांग्लादेश में छात्र प्रदर्शन, बंगाल चुनाव में दिखा सुभाषीश ( फोटो साभार- पांचजन्य और एबीपी )
बांग्लादेशी नागरिकों को बंगाल की नागरिकता दिये जाने के सबूत सामने आए हैं। शेख हसीना को प्रधानमंत्री पद से हटाने के लिए बांग्लादेश में ‘छात्र विरोध प्रदर्शन’ में भाग लेने वाला न्यूटन दास अब बंगाल का नागरिक है।

यह खुलासा सबसे पहले टीवी9 बांग्ला ने शनिवार (7 जून 2025) को प्रकाशित एक रिपोर्ट में किया था। बांग्लादेशी नागरिक का नाम पश्चिम बंगाल के दक्षिण 24 परगना जिले के काकद्वीप शहर की मतदाता सूची में शामिल है।

न्यूटन दास का विधानसभा क्षेत्र काकद्वीप है, जबकि संसदीय क्षेत्र मथुरापुर आरक्षित सीट है। भारत में रहने वाले न्यूटन दास के भाई तपस दास ने माना है कि वह बांग्लादेशी नागरिक है।

न्यूटन दास को सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस सरकार ने नागरिकता दी है। उसका नाम वोटर सूची में भी मौजूद है यानी मतदान का अधिकार हासिल करने में वह कामयाब रहा है। उनके भाई तपस दास ने पुष्टि की, “उसे (न्यूटन दास) बांग्लादेश का मतदाता होना चाहिए। उनका जन्म वहीं हुआ था। वह कोविड-19 प्रकोप के बाद कुछ भूमि विवादों को निपटाने के लिए भारत आया था। मुझे नहीं पता कि वह अब कहाँ रहता है। मुझे नहीं पता कि वह यहाँ मतदाता कैसे बन गया?”

काकद्वीप पंचायत के सदस्य ने पुष्टि की है कि न्यूटन दास एक स्थानीय मतदाता हैं, लेकिन उन्होंने दावा किया कि उन्हें उनके बांग्लादेश से संबंधों के बारे में पता नहीं है।

बांग्लादेश में 2024 के छात्र विरोध प्रदर्शन में भाग लेने की तस्वीरें ऑनलाइन सामने आने के बाद आरोपित मुश्किल में पड़ गया। शेख हसीना सरकार के खिलाफ आयोजित प्रदर्शनों के दौरान उसे लाठी और झंडों के साथ पोज देते देखा गया था।

बीजेपी नेता सुकांत मजुमदार ने कहा, “असफल मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के विशेष प्रोत्साहन के कारण, सत्तारूढ़ पार्टी टीएमसी ने न केवल बम बनाने के उद्योग और कट मनी उद्योग में अग्रणी भूमिका निभाई है – बल्कि ‘अवैध घुसपैठ उद्योग’ भी काफी फल-फूल रहा है। तृणमूल कांग्रेस के बिना बंगाल के लोग कभी भी इस मॉडल को सही मायने में नहीं समझ पाते।”

उन्होने कहा कि ममता बनर्जी की घुसपैठ सिद्धांत और तुष्टिकरण की राजनीति की वजह से हजारों बांग्लादेशी ‘न्यूटन’ बंगाल में मतदान करते हैं। अवैध मतदाताओं और इन लाठीधारी बदमाशों को अपना समर्थन आधार बनाकर, वह पश्चिम बंगाल नहीं चला रही हैं… वह ग्रेटर बांग्लादेश के लिए खाका तैयार कर रही हैं,”

इस बीच सोशल मीडिया पर न्यूटन दास की तृणमूल कांग्रेस के नेता सुभाशीष दास के साथ एक तस्वीर सामने आई है। सुंदरबन के टीएमसी नेता आरोपी का जन्मदिन मनाते नजर आए।

टीवी9 बांग्ला से बात करते हुए सुभाशीष दास ने दावा किया कि न्यूटन के बांग्लादेशी नागरिक होने के बारे में उसे कोई खबर नहीं है।

आरोपित न्यूटन दास ने सोशल मीडिया पर वीडियो शेयर कर घड़ियाली आँसू बहाता हुआ दिखा।

न्यूटन ने आरोप लगाया कि 2024 में वारिस बनाए जाने के बाद वह भूमि विवादों को निपटाने के लिए बांग्लादेश गया था। ये महज संयोग है कि उसकी यात्रा और बांग्लादेश के ‘छात्र प्रदर्शन’ का वक्त एक ही था।

आरोपी ने दावा किया, “मैं 2014 से काकद्वीप में मतदाता हूँ। मैंने 2016 के विधानसभा चुनाव में भी भाग लिया था। हालाँकि, 2017 में मेरा वोटर कार्ड खो गया था, लेकिन हमारे विधायक की मदद से 2018 तक मुझे नया कार्ड मिल गया।”

इससे पहले मई 2022 में यह बात सामने आई थी कि तृणमूल कांग्रेस की उम्मीदवार अलो रानी सरकार, जिन्होंने 2021 का पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव लड़ा था, वह बांग्लादेश में अपने पति के साथ रहती है।