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‘....राहुल गाँधी धोखेबाज’: DMK का कांग्रेस पर तीखा हमला


जब कोई नेता अपनी अक्ल की बजाए विदेशों में बैठे अपने आकाओं के कठपुतली बन बोलता हो, क्या ऐसे नेता से किसी हित की कल्पना की जा सकती है? वास्तव में नेता प्रतिपक्ष को इतना संवेदनशील, दूरगामी और परिपक़्व होना चाहिए कि जब वह बोले सत्तापक्ष ध्यान से सुने और विपक्ष नेता के मुंह बात पर चिंता करे। लेकिन देश को ऐसा विपक्षी नेता मिला है जो खुद मजाक बन रहा है। कोई गंभीरता नाम की चीज ही नहीं, उपद्रवी भाषा। अगर राहुल विदेश में बैठे अपने आकाओं के चक्कर काटने की बजाए अपने दादा फिरोज जहांगीर की कब्र पर जाकर दुआ मांगते शायद दादा फिरोज अल्लाह मियां को बोलकर कुछ अक्ल दिलवा देते। कांग्रेस पार्टी को सिर्फ show piece बना दिया।      

तमिलनाडु में कांग्रेस और डीएमके के बीच राजनीतिक अलगाव के बाद एक-दूसरे पर तीखे वाण छोड़े जा रहे हैं।

द्रविड़ मुनेत्र कड़गम यानी डीएमके के मुखपत्र ‘मुरासोली’ और पार्टी की आईटी विंग ने कांग्रेस नेता राहुल गाँधी पर तीखा हमला बोला है और उन्हें ‘पीठ में छुरा घोंपने वाला’ और ‘राजनीतिक रूप से अपरिपक्व’ के साथ-साथ ‘एक बड़ा मजाक’ करार दिया है।

डीएमके ने अपने मुखपत्र के संपादकीय में आरोप लगाया कि राहुल गाँधी और कांग्रेस पार्टी ने विधानसभा चुनावों में इंडी गठबंधन के सहयोगियों के खिलाफ काम किया और उन्हें कमजोर किया। पार्टी का कहना है कि राहुल गाँधी इंडी गठबंधन की बैठकों में विपक्षी एकजुटता की बात करते हैं, लेकिन उन्होंने ही अलग-अलग राज्यों में विपक्ष की एकजुटता को सबसे ज्यादा नुकसान पहुँचाया है।

दरअसल तमिलनाडु विधानसभा चुनाव में एक-दूसरे की ‘दोस्ती की मिसाल’ देने वाली ये दोनों पार्टियाँ चुनाव बाद के नतीजों के बाद एक-दूसरे की दुश्मन बन गई हैं। डीएमके का कहना है कि कांग्रेस ने राज्य में गठबंधन धर्म का पालन नहीं किया और गठबंधन में होने के बावजूद, सरकार बनाने के लिए अभिनेता विजय की पार्टी यानी टीवीके को समर्थन दे दिया। डीएमके ने दावा किया है कि कांग्रेस अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रही थी, तब उन्होंने कांग्रेस का साथ दिया, लेकिन नया विकल्प मिलते ही उन्होंने डीएमके को धोखा दे दिया।

MOU के बाद भी सुस्त रहा तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश ने फुर्ती से पकड़े मझगाँव डॉक के 29000 करोड़ रूपए: चंद्रबाबू नायडू के नेतृत्व में NDA सरकार ला रही बड़े निवेश

                 मझगांव डॉक ने किया आंध्र प्रदेश में 29000 करोड़ रूपए का निवेश (फोटो साभार: MDL)
कहते हैं गायक का जुबान और नाचने वाले के पैर कभी नहीं रुकते। ठीक उसी तरह दिमाग में विकास वाला नेता विकास का कोई मौका नहीं छोड़ता। आंध्र प्रदेश के दो टुकड़े होने से पहले तत्कालीन मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने जो विकास किया था दुर्भाग्य से विकासशील हिस्सा तेलंगाना में चला गया। देखा जाए तो आज तेलंगाना नायडू की बोई फसल पर जी रहा है। 

आंध्र प्रदेश देश में निवेश के सबसे बड़े केंद्र के रूप में उभर रहा है। तमिलनाडु की द्रमुक सरकार के ढुलमुल रवैए का फायदा उठाते हुए अब मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की अगुवाई वाली एनडीए सरकार ने एक और बड़ा दाँव मारा है। यह रफ्तार आगे भी जारी रहने वाली है क्योंकि सरकारी जहाज बनाने वाली कंपनी मझगांव डॉक लिमिटेड (MDL) तिरुपति जिले के दुगराजपटनम में आंध्र प्रदेश के प्रस्तावित मेगा शिपबिल्डिंग क्लस्टर में 29,000 करोड़ रुपए से ज्यादा का निवेश कर रही है।

मझगांव डॉक लिमिटेड (MDL) नाम की यह बड़ी डिफेंस पीएसयू (PSU) आंध्र प्रदेश के शिपबिल्डिंग प्रोजेक्ट में मुख्य निवेशक बनने के लिए तैयार है, जिसका लक्ष्य 1.2 मिलियन टन सालाना क्षमता का है। इस मेगा प्रोजेक्ट में राज्य सरकार और विशाखापत्तनम पोर्ट अथॉरिटी जमीन और समुद्री बुनियादी ढाँचे के लिए 5,289 करोड़ रुपए का योगदान देंगे, जबकि मुख्य निवेशक MDL इसमें 23,964 करोड़ रुपए का निवेश करेगा।

मझगांव डॉक लिमिटेड के प्रतिनिधि जल्द ही इस जगह की संभावनाओं का आकलन करने के लिए आंध्र प्रदेश का दौरा कर सकते हैं।

तमिलनाडु की सुस्ती बनी आंध्र प्रदेश के लिए मौका

आंध्र प्रदेश सरकार और MDL के बीच राज्य के प्रस्तावित शिपबिल्डिंग क्लस्टर में भारी निवेश को लेकर बातचीत शुरू होने से पहले इस डिफेंस पीएसयू ने तमिलनाडु की तत्कालीन द्रमुक (DMK) सरकार के साथ एक समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए थे।

सितंबर 2025 में MDL ने ‘मैरीटाइम अमृत काल विजन 2047’ के तहत थूथुकुडी में 15,000-18,000 करोड़ रुपए की अनुमानित लागत से एक ग्रीनफील्ड शिपयार्ड बनाने के लिए तमिलनाडु सरकार के साथ समझौता किया था। हालाँकि द्रमुक सरकार ने इसमें ढुलमुल रवैया अपनाया और बाद में MDL के साथ तय प्रक्रिया को छोड़कर दक्षिण कोरिया की एचडी हुंडई हेवी इंडस्ट्रीज (HD Hyundai Heavy Industries) के साथ एक विशेष समझौता कर लिया।

MDL को तमिलनाडु सरकार से एक्सप्रेशन ऑफ इंटरेस्ट (EoI) का इंतजार था, हालाँकि द्रमुक सरकार ने न तो प्रोजेक्ट शुरू करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया और न ही इस प्रस्ताव को सीधे तौर पर मना किया।

तमिलनाडु सरकार के इस कदम से MDL-थूथुकुडी प्रोजेक्ट अधर में लटक गया और भारत की एक प्रमुख डिफेंस पीएसयू किनारे हो गई। MDL ने आरोप लगाया कि द्रमुक सरकार द्वारा तय चयन प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया और भारतीय शिपबिल्डिंग कंपनियों को प्रतिस्पर्धा करने का सही मौका नहीं दिया गया। पीएसयू ने पारदर्शिता और जिस तरह से तमिलनाडु सरकार ने एंकर शिपयार्ड का चयन किया, उस पर भी सवाल उठाए।

अब जब MDL के आंध्र प्रदेश में बड़ा निवेश करने की खबरें आ रही हैं, तो तमिलनाडु के कई लोग द्रमुक सरकार की आलोचना कर रहे हैं कि उनकी वजह से राज्य के हाथ से रक्षा क्षेत्र से जुड़ा एक महत्वपूर्ण निवेश निकल गया।

आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु के बीच रक्षा, मैन्युफैक्चरिंग और बंदरगाह से जुड़े निवेश को लेकर लंबे समय से मुकाबला चल रहा है। दोनों राज्य निवेश को आकर्षित करने के लिए अपने तटीय इलाकों, कुशल कामगारों और रियायतों का इस्तेमाल करते हैं। तेलुगु देशम पार्टी (TDP) और भारतीय जनता पार्टी (BJP) गठबंधन के शासन वाले आंध्र प्रदेश ने ‘बिजनेस करने की रफ्तार’ (speed of doing business) को लेकर बड़े स्तर पर मार्केटिंग की है, जिसमें जमीन की उपलब्धता, नीतिगत स्थिरता और राज्य व केंद्र दोनों जगह भाजपा की सरकार होने के कारण केंद्रीय समन्वय को प्रमुखता से दिखाया गया है।

चंद्रबाबू नायडू की NDA सरकार में आंध्र प्रदेश बना उद्योगों के लिए आकर्षक

बीते कुछ महीनों में तमिलनाडु और कॉन्ग्रेस शासित कर्नाटक से एनडीए शासित आंध्र प्रदेश में कई बड़े निवेशकों का ट्रांसफर देखा गया है।

अगस्त 2025 में तमिलनाडु की द्रमुक सरकार ने थूथुकुडी में दक्षिण कोरिया की ह्वासुंग फुटवियर (Hwaseung Footwear) द्वारा 1,720 करोड़ रुपये के नॉन-लेदर फुटवियर प्लांट की घोषणा की थी, जिससे 20,000 से अधिक नौकरियों का वादा किया गया था। हालाँकि तमिलनाडु सरकार की ओर से हुई देरी और लापरवाही के कारण ह्वासुंग को बेहतर विकल्पों की तलाश करनी पड़ी। नवंबर 2025 तक यह प्रोजेक्ट आंध्र प्रदेश के कुप्पम में शिफ्ट हो गया।

दक्षिण कोरियाई कंपनी ह्वासुंग ने एनडीए के नेतृत्व वाले राज्य आंध्र प्रदेश में 150 मिलियन डॉलर के निवेश के साथ अपना नॉन-लेदर स्पोर्ट्स शू मैन्युफैक्चरिंग हब स्थापित करने की घोषणा की। राज्य सरकार ने ह्वासुंग को 100 एकड़ जमीन आवंटित की। अब यह प्रोजेक्ट आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू की विधानसभा सीट कुप्पम में आकार ले रहा है।

मई 2026 में तमिलनाडु के हाथ से प्रस्तावित एडवांस्ड मीडियम कॉम्बैट एयरक्राफ्ट (AMCA) फ्लाइट टेस्टिंग और इंटीग्रेशन कॉम्प्लेक्स डिफेंस एयरोस्पेस प्रोजेक्ट भी निकल गया और यह आंध्र प्रदेश के पास चला गया। हालाँकि तमिलनाडु सरकार डीआरडीओ (DRDO) से जुड़े इस 15,000 करोड़ रुपए के प्रोजेक्ट को हासिल करने की कोशिश में थी और उसने बेंगलुरु के एयरोस्पेस क्लस्टर के पास होसुर में जमीन और रनवे की पेशकश की थी। लेकिन आंध्र प्रदेश ने तेजी से मंजूरी देने और एक एकीकृत डिफेंस कॉरिडोर के विजन की पेशकश करके यह बाजी जीत ली।

यह प्रोजेक्ट आंध्र प्रदेश के पुट्टपार्थी में गया, और इस साल मई में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह और मुख्यमंत्री नायडू ने 600 एकड़ की इस फैसिलिटी का शिलान्यास किया। इस पर केंद्र द्वारा पक्षपात करने के आरोप भी लगे, हालाँकि खबरों में कहा गया कि आंध्र प्रदेश को प्रोजेक्ट सौंपना विभिन्न राज्यों में रक्षा निर्माण क्षमताओं को बाँटने की रणनीति का हिस्सा था।

जहाँ तमिलनाडु ने होसुर में 100 एकड़ जमीन मुफ्त देने की पेशकश की थी, वहीं आंध्र प्रदेश ने पुट्टपार्थी में 650 एकड़ का एक बड़ा डेडिकेटेड हब ऑफर किया।

राज्यों के बीच यह मुकाबला सिर्फ आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका विस्तार कर्नाटक तक भी है। जुलाई 2025 में कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार को तीन साल से चल रहे किसानों के लगातार विरोध प्रदर्शनों के कारण बेंगलुरु हवाई अड्डे के पास एक प्लान्ड एयरोस्पेस पार्क के लिए देवनहल्ली में कृषि भूमि का अधिग्रहण करने के प्रस्ताव को रद्द करना पड़ा था।

राज्य ने पहले इस एयरोस्पेस प्रोजेक्ट के लिए चन्नरायपटना और देवनहल्ली तालुक के आसपास के गाँवों में 1,777 एकड़ जमीन का अधिग्रहण करने का प्रस्ताव रखा था। लेकिन किसानों ने पहले दिन से ही इस कदम का विरोध करते हुए दावा किया था कि यह जमीन उपजाऊ है और उनकी आजीविका का एकमात्र साधन है।

जब कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार ने इस प्रोजेक्ट को रद्द कर दिया, तो आंध्र प्रदेश ने तुरंत इस मौके का फायदा उठाया। राज्य के मानव संसाधन विकास मंत्री नारा लोकेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर एक खुला निमंत्रण देते हुए लिखा, ‘प्रिय एयरोस्पेस इंडस्ट्री, इसके (विरोध प्रदर्शन) बारे में सुनकर दुख हुआ। मेरे पास आपके लिए एक बेहतर विचार है। आप इसके बजाय आंध्र प्रदेश को क्यों नहीं देखते? हमारे पास आपके लिए एक आकर्षक एयरोस्पेस नीति है, जिसमें बेहतरीन प्रोत्साहन और 8000 एकड़ से अधिक तैयार जमीन (बेंगलुरु के ठीक बाहर) उपलब्ध है! उम्मीद है कि टेबल पर बैठकर बात करने के लिए आपसे जल्द ही मुलाकात होगी।”

साफ है कि आंध्र प्रदेश की एनडीए सरकार न केवल राज्य को मैन्युफैक्चरिंग प्रोजेक्ट्स के लिए एक आदर्श जगह के रूप में पेश कर रही है, बल्कि तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे प्रतिस्पर्धी राज्यों में दिक्कतों का सामना कर रहे निवेशकों को भी आक्रामक रूप से अपने साथ जोड़ रही है।

टेक, डेटा सेंटर, एआई (AI) और एयरोस्पेस से लेकर आंध्र प्रदेश ने दूसरे राज्यों से निवेश हासिल किया है और वह इसका दावा करने से पीछे नहीं हटता।

साल 2025 में गूगल (Google) ने भारत के सबसे बड़े एआई और डेटा सेंटर्स में से एक के लिए विशाखापत्तनम में 15 बिलियन डॉलर या 1.25 लाख करोड़ रुपये के भारी-भरकम निवेश का ऐलान किया।

बेंगलुरु के पास आईटी की ताकत और बुनियादी ढाँचा होने के बावजूद गूगल द्वारा इस दौड़ में अपने प्रतिस्पर्धी कर्नाटक के बजाय आंध्र प्रदेश को चुनना कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार को रास नहीं आया। कर्नाटक के आईटी मंत्री प्रियांक खड़गे की X पर आंध्र प्रदेश के आईटी मंत्री नारा लोकेश के साथ तीखी बहस भी हुई थी।

आंध्र प्रदेश सरकार ने 22,000 करोड़ रुपए के बड़े प्रोत्साहन पैकेज की पेशकश करके गूगल का यह निवेश सुरक्षित किया। इस पैकेज में जमीन पर 25% की छूट, पानी के टैरिफ पर 25% की छूट, 100% मुफ्त बिजली ट्रांसमिशन के साथ-साथ स्टेट जीएसटी (SGST) की पूरी प्रतिपूर्ति शामिल थी।

आंध्र प्रदेश ने पिछले साल कर्नाटक की सरला एविएशन के 1,300 करोड़ रुपए के इलेक्ट्रिक एयर-टैक्सी मैन्युफैक्चरिंग प्रोजेक्ट ‘स्काई फैक्ट्री‘ को भी अपने नाम कर लिया। यह प्रोजेक्ट आंध्र प्रदेश के अनंतपुरम जिले में विकसित किया जाएगा। कर्नाटक की एक कंपनी का अपने गृह राज्य को छोड़कर मैन्युफैक्चरिंग प्रोजेक्ट के लिए दूसरे राज्य को चुनना कर्नाटक की कॉन्ग्रेस सरकार के लिए एक बड़े झटके के रूप में देखा गया।

इसके अलावा आंध्र प्रदेश की ‘काम करने की रफ्तार’ का असर कॉन्ग्रेस शासित तेलंगाना पर भी पड़ा है। मार्च 2025 में हैदराबाद की प्रीमियर एनर्जीज (Premier Energies) ने घोषणा की कि वह तेलंगाना के सीतारामपुर से आंध्र प्रदेश के नायडूपेटा में अपना 1,700 करोड़ रुपये का प्रस्तावित 4 GW सोलर फोटोवोल्टिक सेल मैन्युफैक्चरिंग प्लांट शिफ्ट कर रही है। इस प्रोजेक्ट से करीब 3,500 नौकरियाँ पैदा होंगी।

प्रतिस्पर्धी राज्यों की तुलना में आगे निकलकर एक और प्रोजेक्ट को हासिल करने की जानकारी देते हुए आंध्र प्रदेश के आईटी मंत्री नारा लोकेश ने X पर लिखा, “एपी (AP) ने रिकॉर्ड समय में एपीआईआईसी (APIIC) के माध्यम से 269 एकड़ जमीन को तेजी से मंजूरी दी। ये बातचीत अक्टूबर 2024 में शुरू हुई थी और फरवरी 2025 तक जमीन आवंटित कर दी गई। यह जमीन बंदरगाहों के करीब है और सक्रिय प्रोत्साहनों से समर्थित है। यह आंध्र प्रदेश को एक अग्रणी सौर विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करता है, जिससे औद्योगिक विकास और राज्य की अर्थव्यवस्था मजबूत होगी, जिसकी क्षमता को 7 GW तक बढ़ाने की योजना है। आंध्र प्रदेश को भारत के दूसरे सबसे बड़े एकीकृत सौर सेल और मॉड्यूल निर्माता का एपी में स्वागत करते हुए गर्व हो रहा है – जो हमारे युवाओं के लिए बैकवर्ड इंटीग्रेशन और ग्रीन जॉब्स को बढ़ावा देगा।”

                                                            नारा लोकेश के ट्वीट का स्क्रीनशॉट

यहाँ एक दिलचस्प बात यह है कि खबरों के मुताबिक आंध्र प्रदेश ने एनडीए शासन के दो सालों के भीतर लगभग 23 लाख करोड़ रुपए का निवेश आकर्षित किया है।

मुख्यमंत्री नायडू ने इस बारे में कहा, “कल्याण, विकास और सुशासन प्रदान करने के साथ-साथ एनडीए सरकार विशाखापत्तनम, अमरावती और तिरुपति क्षेत्रों का विकास कर रही है। रायलसीमा में रक्षा, ड्रोन, स्पेस, एयरोस्पेस और इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्रों के उद्योग आ रहे हैं। एनडीए शासन के दौरान राज्य ने अब तक 23 लाख करोड़ रुपए का निवेश आकर्षित किया है। हम हर घर में सोलर रूफटॉप के जरिए बिजली पैदा करने का अवसर दे रहे हैं। रॉयल एनफील्ड तिरुपति में 18 महीनों में एक मोटरसाइकिल मैन्युफैक्चरिंग प्लांट स्थापित कर रही है।”

हालाँकि आंध्र प्रदेश की आक्रामक निवेश रणनीतियों से अन्य राज्य सरकारों का सतर्क होना स्वाभाविक है, लेकिन एनडीए शासित यह राज्य भारत की विकास गाथा में योगदान देने में जितना हो सके आगे रहना चाहता है। आंध्र प्रदेश सरकार वैश्विक और घरेलू कंपनियों को राज्य में अपनी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स लगाने के लिए सिंगल-विंडो क्लीयरेंस, लैंड बैंक, सब्सिडी और केंद्रीय सहयोग का पूरा इस्तेमाल कर रही है।

‘सनातन का नाश होना चाहिए’: तमिलनाडु विधानसभा में बोले उदयनिधि स्टालिन-चुपचाप सुनते रहे ईसाई CM विजय; क्या सनातन विरोध करना DMK के DNA में है?

                            तमिलनाडु विधानसभा में उदयनिधि स्टालिन और CM विजय (फोटो साभार: ANI)
तमिलनाडु में मिली करारी हार के बाद भी द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) का राजनीतिक अहंकार कम होने का नाम नहीं ले रहा है। तमिलनाडु विधानसभा में विपक्ष के नेता और DMK विधायक उदयनिधि स्टालिन ने एक बार फिर सनातन के खिलाफ जहर उगला है। सनातन धर्म को लेकर अपना पुराना बयान दोहराते हुए उन्होंने सनातन को खत्म करने की बात कही है।

स्टालिन को ज्ञान नहीं कि सदियों प्राचीनतम सनातन को ख़त्म करने पता नहीं कितने आये और गए कोई उनका नामलेवा भी नहीं। अभी स्टालिन के पाप का घड़ा भरा नहीं है। जिस दिन भर जाएगा शायद इनका अपना परिवार ही इसे अपनाने से मना कर दे। सनातन विश्व का सबसे प्राचीन धर्म है। यह अडिग और अमर है और रहेगा। अब जो कालचक्र चल रहा है। जिस दिन बंगाल की तरह तमिलनाडु में भी हिन्दू और सनातन एकजुट हो गया राज्य के इतिहास में भी इनका कोई नामलेवा नहीं मिलेगा। क्या सनातन विरोध करना DMK के DNA में है?    

तमिलनाडु के नवनिर्वाचित ईसाई मुख्यमंत्री C जोसेफ विजय की मौजूदगी में मंगलवार (12 मई 2026) को विधानसभा को संबोधित करते हुए उदयनिधि स्टालिन ने कहा, “सनातन, जिसने लोगों को बाँटा है। उसका नाश होना चाहिए।”

यह पहली बार नहीं है जब उदयनिधि स्टालिन ने सनातन के खिलाफ जहर उगला हो, इससे पहले भी वो सनातन को खत्म करने की बात कह चुके हैं। इस साल की शुरुआत में मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने सनातन धर्म पर उनकी 2023 की टिप्पणी को हिंदू समुदाय के खिलाफ ‘हेट स्पीच’ माना था।

तमिलनाडु सरकार में युवा कल्याण और खेल विकास मंत्री रहते हुए सितंबर 2023 में उदयनिधि स्टालिन ने ‘सनातन उन्मूलन सम्मेलन’ को संबोधित करते हुए सनातन धर्म की तुलना मच्छर, डेंगू, मलेरिया और कोरोना जैसी बीमारियों से की थी। उन्होंने कहा था कि सनातन धर्म का सिर्फ विरोध नहीं बल्कि उसका पूरी तरह नाश होना चाहिए।

बाद में उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर भी अपने बयान का समर्थन किया। उन्होंने दावा किया कि सनातन धर्म जाति और धर्म के नाम पर लोगों को बाँटता है। उन्होंने कहा था कि मानवता और समानता के लिए सनातन धर्म को ‘जड़ से खत्म’ करना जरूरी है।

इसके बाद जनवरी 2026 में मद्रास हाई कोर्ट की मदुरै बेंच ने त्रिची सिटी पुलिस द्वारा भाजपा नेता अमित मालवीय के खिलाफ दर्ज FIR को रद्द कर दिया था। यह FIR उदयनिधि के सनातन धर्म पर दिए गए बयान को तोड़-मरोड़कर पेश करने के आरोप में दर्ज की गई थी। जस्टिस एस श्रीमथी ने तब कहा था कि उदयनिधि का कथित बयान स्वयं ‘हेट स्पीच’ की श्रेणी में आता है, ऐसे में उस पर सवाल उठाने को अपराध नहीं माना जा सकता है।

INDI गठबंधन में तकरार, राहुल के खिलाफ मणिशंकर अय्यर बने स्टालिन के समर्थक, ममता-लालू पहले ही विरोधी

एक कहावत है जहां जहां पैर पड़े अभागे के वहां वहां बंटाधार और यह गाँधी परिवार पर सटीक बैठ रहा है। जब से परिवार गुलामों ने सोनिया गाँधी को कांग्रेस अध्यक्ष बनाने तत्कालीन अध्यक्ष दलित सीताराम केसरी को पार्टी ऑफिस से बाहर फेंका था कांग्रेस बैसाखियों के सहारे सरकार बनाती रही। और 2014 के बाद से तो सत्ता के लिए इस तरह तड़प रही है जिस तरह पानी से बाहर मछली। और उस तड़पन में सोनिया के बाद राहुल गाँधी और प्रियंका वाड्रा मोदी-योगी-अमित और बीजेपी का विरोध करते करते देश विरोध करने लगे हैं। जो देशहित में नहीं और जनता को वोट देते समय कांग्रेस और इसको समर्थन देने वाले INDI गठबंधन से दूरी बनानी होगी।   
पश्चिम बंगाल चुनाव नजदीक आते ही विपक्षी राजनीति के भीतर दबे हुए अंतर्विरोध सतह पर आने लगे हैं। भाजपा विरोध के नाम पर बना INDI गठबंधन अब नेतृत्व के सवाल पर उलझता दिखाई दे रहा है। यह केवल पद का विवाद नहीं, बल्कि चुनावी रणनीति, स्वीकार्यता और राजनीतिक विश्वसनीयता का प्रश्न बन चुका है। दरअसल, विपक्षी राजनीति में एक पुरानी कहावत है कि “सत्ता से पहले सहमति।” लेकिन आज जो दृश्य उभर रहा है, वह इस कहावत को चुनौती देता दिखाई दे रहा है। विपक्षी INDI गठबंधन अब अपने ही नेतृत्व के प्रश्न पर उलझता नजर आ रहा है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर को ही इंडिया गठबंधन के संयोजक के लिए राहुल गांधी के बजाए एम.के स्टालिन ज्यादा उपयुक्त नजर आते हैं। लालू यादव ने भी इंडी गठबंधन के नेतृत्व के लिए अपना वोट राहुल गांधी के बजाए ममता बनर्जी को दिया है। ममता बनर्जी की खुद की भी चाहत संयोजक बनने की है, लेकिन उनकी राह में रोड़ा जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला बना हुए हैं। और खुद राहुल गांधी कांग्रेस की ही डूबती नैया को नहीं बचा पा रहे हैं। ऐसे में पद को लेकर उठती आवाजें, पुराने नेताओं की असहमति, और क्षेत्रीय दलों की महत्वाकांक्षाएं, ये सब मिलकर उस अंतर्विरोध को उजागर कर रहे हैं जिसे लंबे समय तक दबाकर रखा गया है। लेकिन आंतरिक विरोध के इस गुब्बारे की हवा पश्चिम बंगाल के चुनाव में निकल सकती है।

अब इंडिया गठबंधन का ‘कप्तान’ बदलने का वक्त आ गया
दरअसल, महाराष्ट्र के बाद बिहार विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की करारी हार के बाद नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी चौतरफा मुसीबतों में घिरे नजर आ रहे हैं। एक ओर राहुल गांधी पर अमेरिकी उद्योगपति जॊर्ज सोरोस के साथ कनेक्शन का बड़ा खुलासा हुआ है, तो दूसरी ओर इंडिया ब्लॊक के अंदर से ही राहुल गांधी के नेतृत्व को लेकर बगावत जैसे हालात पैदा हो गए हैं। राहुल गांधी की कथित ब्रिटिश नागरिकता को लेकर जांच पहले से ही चल रही है। इंडिया ब्लॊक की पांच प्रमुख पार्टियों ने गठबंधन की कमान बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को सौंपने का समर्थन कर कांग्रेस खासकर, राहुल गांधी के लिए ऐसी मुसीबत खड़ी कर दी है, जिससे पार पाना मुश्किल होगा। ममता बनर्जी और उनकी पार्टी ने राहुल गांधी के खिलाफ खुल्लम-खुल्ला मोर्चा खोल दिया है। दावा यही है कि अब इंडिया गठबंधन का कप्तान बदलने का वक्त आ गया है। राहुल गांधी की कैप्टेंसी में इंडिया गठबंधन के लिए लगातार मजबूत हो रही भाजपा को हराना असंभव होगा।

पांच प्रमुख दलों ने राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर उठाए सवाल
लोकसभा चुनाव में टीम एनडीए का स्कोर कार्ड 293 रहा, जो स्पष्ट बहुमत से कहीं ज्यादा है। एनडीए के कप्तान नरेन्द्र मोदी ने अपनी टीम को शानदार जीत दिलाई। वहीं, टीम इंडिया गठबंधन का स्कोर 235 ही रहा। लगातार तीसरी हार के बाद अब विपक्षी टीम की कैप्टेंसी को लेकर नई जंग छिड़ गई है। टीएमसी की मांग है कि हरियाणा और महाराष्ट्र में कांग्रेस का स्कोर कार्ड ऐसा है कि अब टीम इंडिया का कप्तान बदलना होगा। मतलब टीम इंडिया में कैप्टन की कुर्सी को लेकर अंदरूनी झगड़ा शुरू हो गया है। हरियाणा, महाराष्ट्र और अब बिहार में कांग्रेस की बुरी हार के बाद पांच प्रमुख दल राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर सवाल उठा चुके हैं। पश्चिम बंगाल चुनाव में कांग्रेस नेतृत्व से कोई खास उम्मीद नहीं की जा रही। क्योंकि इस राज्य में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का आत्मविश्वास बुरी तरह डगमगाया हुआ है।

राहुल की भूमिका पर अय्यर की असहमति ने हलचल मचाई

कांग्रेस नेता राहुल गांधी भले ही चुनाव ना जितवा पा रहे हैं, लेकिन लंबे समय से विपक्ष का प्रमुख चेहरा है। भारत जोड़ो यात्रा और संसद में नारेबाजी और नंगे प्रदर्शन से कांग्रेसी चाहे बदनाम हुए, लेकिन सुर्खियों में आए। लेकिन गठबंधन राजनीति का गणित केवल जनसभाओं और नारों से तय नहीं होता। चुनावी साल में सबसे महत्वपूर्ण सवाल होता है क्या नेतृत्व पर सहयोगी दलों की सहमति है? इसी संदर्भ में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता मणिशंकर अय्यर द्वारा राहुल की भूमिका को लेकर व्यक्त की गई असहमति ने राजनीतिक हलकों में हलचल पैदा कर दी है। जब पार्टी के भीतर से ही नेतृत्व को लेकर शंकाएं सामने आती हैं, तो विपक्षी एकता की छवि पर असर पड़ना स्वाभाविक है। चुनावी रणनीति में “धारणा” ही सबसे बड़ा हथियार होती है, और फिलहाल धारणा यह बन रही है कि विपक्ष अभी भी अपने चेहरे को लेकर आश्वस्त नहीं है।

राहुल गांधी में न “पीएम मटेरियल” और न ही संयोजक के योग्य

बिहार की राजनीति के दिग्गज लालू प्रसाद यादव पहले भी राहुल गांधी के नेतृत्व पर सवाल उठाते रहे हैं और उन्होंने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के प्रति समर्थन का संकेत दिए हैं। ममता बनर्जी स्वयं भी संयोजक पद को लेकर खुली दावेदारी के संकेत दे चुकी हैं। बंगाल में चुनावी समीकरणों को देखते हुए वे राष्ट्रीय स्तर पर अपनी भूमिका मजबूत करना चाहती हैं। उनके लिए यह केवल गठबंधन का प्रश्न नहीं, बल्कि क्षेत्रीय वर्चस्व और राष्ट्रीय पहचान का विस्तार है। यह पूरा घटनाक्रम उस समय सामने आया है जब भाजपा चुनावी मोड में पूरी ताकत से उतर चुकी है। एक मार्च से भाजपा की पश्चिम बंगाल में व्यापक स्तर पर परिवर्तन यात्रा शुरू होने जा रही है। बीजेपी ने इस मतभेद को तुरंत मुद्दा बनाया है। उसका तर्क सीधा और आक्रामक है कि जब कांग्रेस के अपने वरिष्ठ नेता ही राहुल गांधी को “पीएम मटेरियल” या संयोजक के योग्य नहीं मानते, तो देश क्यों माने? भाजपा की रणनीति विपक्ष की आंतरिक असहमति को “अस्थिरता” के प्रतीक के रूप में पेश करने की है।

लालू-ममता को भी नहीं भा रहा है राहुल गांधी का नेतृत्व

कांग्रेस के भीतर से ही आवाजें उठने लगें—जैसे मणिशंकर अय्यर जैसे वरिष्ठ नेता का सार्वजनिक असहमति जताना तो यह संकेत मात्र व्यक्तिगत मतभेद का नहीं, बल्कि व्यापक असंतोष का प्रतीक बन जाता है। दूसरी ओर, बिहार की राजनीति के प्रमुख लालू प्रसाद यादव पहले भी राहुल गांधी के नेतृत्व पर अप्रत्यक्ष सवाल उठा चुके हैं और ममता बनर्जी के प्रति समर्थन का संकेत दे चुके हैं। वहीं तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन का नाम भी संभावित संयोजक के रूप में उभर रहा है। यह परिदृश्य बताता है कि गठबंधन के भीतर नेतृत्व को लेकर एकमतता नहीं है। यहां प्रश्न यह नहीं कि कौन अधिक सक्षम है, बल्कि यह है कि क्या गठबंधन किसी स्पष्ट ढांचे के साथ आगे बढ़ रहा है? यदि संयोजक पद को लेकर क्षेत्रीय संतुलन, राजनीतिक प्रभाव और व्यक्तिगत समीकरण निर्णायक बनेंगे, तो क्या यह गठबंधन राष्ट्रीय स्तर पर बेहद अस्थिर विकल्प के रूप में नहीं देखा जाएगा?

लोकसभा चुनाव में दोस्ती और विधानसभा चुनावों में परस्पर दुश्मन

इंडिया गठबंधन की मूल अवधारणा भाजपा के खिलाफ एक साझा मोर्चा बनाने की थी। लेकिन क्या केवल “विरोध” ही पर्याप्त है? किसी भी गठबंधन को टिकाऊ बनाने के लिए साझा न्यूनतम कार्यक्रम, स्पष्ट नेतृत्व संरचना और आपसी विश्वास की आवश्यकता होती है। लेकिन गठबंधन के दलों में ना तो आपसी विश्वास है और ना ही नैतिकता। क्योंकि गठबंधन के यही दल लोकसभा चुनाव में एकजुट होने की कस्मे खाते हैं और विधानसभा के चुनावों में एक-दूसरे के खिलाफ खड़े नजर आते हैं। जनता इनकी चालें खूब देख रही है। यहां तक कि अब तो संयोजक के नाम पर ही मतभेद सार्वजनिक हो गया है। वह भी किसी अन्य दल की ओर से नहीं, बल्कि कांग्रेस के भीतर से ही एक वरिष्ठ नेता के माध्यम से आया है। इससे साफ संदेश जाता है कि सत्ता से पहले ही इंडिया गठबंधन में असहमति चरम पर है।

 स्टालिन दक्षिण भारत में अपनी भूमिका का चाहते हैं विस्तार

दरअसल, क्षेत्रीय दलों की राजनीति भी इस समीकरण को जटिल बनाती है। ममता बनर्जी पश्चिम बंगाल में अपनी जमीन मजबूत करना चाहती हैं। स्टालिन दक्षिण भारत में अपनी भूमिका का विस्तार देख रहे हैं। लालू प्रसाद यादव बिहार की राजनीति के पुराने खिलाड़ी हैं। ऐसे में कांग्रेस का “स्वाभाविक नेतृत्व” दावा चुनौती में बदल जाता है। सवाल उठता है कि क्या कांग्रेस अपने सहयोगियों को बराबरी का स्पेस देने को तैयार है? या वह अभी भी राष्ट्रीय पार्टी होने के अंध-विश्वास में नेतृत्व को अपना अधिकार मानती है? राहुल गांधी के सामने भी चुनौती है। उन्हें केवल कांग्रेस कार्यकर्ताओं ही नहीं, बल्कि क्षेत्रीय दलों के नेताओं का भी विश्वास जीतना होगा। गठबंधन राजनीति में व्यक्तिगत छवि से ज्यादा महत्वपूर्ण सामूहिक स्वीकार्यता होती है। यदि सहयोगी दलों को लगे कि नेतृत्व एकतरफा है, तो असंतोष स्वाभाविक है।
चुनावी साल में राहुल गांधी के लिए संतुलन साधना आसान नहीं
दक्षिण भारत से तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन का नाम भी संयोजक के रूप में चर्चा में है। स्टालिन अपेक्षाकृत कम विवादित नेता माने जाते हैं। यदि उनका नाम आगे बढ़ता है, तो यह संकेत होगा कि विपक्ष नेतृत्व को कांग्रेस-केंद्रित ढांचे से बाहर निकालना चाहता है। लेकिन यही बिंदु कांग्रेस के लिए असहज हो सकता है—क्या वह राष्ट्रीय पार्टी होते हुए भी नेतृत्व साझा करने को तैयार है? दूसरी ओर, कांग्रेस के सामने दुविधा है। यदि वह नेतृत्व पर अड़ती है, तो क्षेत्रीय दल असहज हो सकते हैं। यदि वह पीछे हटती है, तो उसके कार्यकर्ताओं में यह संदेश जा सकता है कि पार्टी राष्ट्रीय राजनीति में अपनी केंद्रीय भूमिका खो रही है। चुनावी साल में राहुल गांधी के लिए यह संतुलन साधना आसान नहीं होगा। चुनावी साल में मतदाता यह भी देखता है कि कौन-सा गठबंधन आंतरिक रूप से कितना स्थिर है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि यदि नेतृत्व को लेकर सार्वजनिक बयानबाजी ऐसे ही जारी रहती है, तो विपक्ष का संदेश बिखरा हुआ प्रतीत होगा।
विपक्ष का सबसे बड़ा चेहरा होने के दम भरने वाले राहुल गांधी के दिन क्या अब लदने वाले हैं? क्या इंडिया गठबंधन का चेहरा राहुल गांधी के बजाए पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी बनने जा रही हैं? इन सवालों का जवाब चाहे जो हो, लेकिन ये अब शीशे की तरह साफ हो गया है कि इंडी ब्लॉक के अंदर राहुल गांधी को लेकर खटपट का समंदर लहरा रहा है। इंडिया गठबंधन के ज्यादातर खिलाड़ी कैप्टन बदलने के पक्ष में खड़े नजर आ रहे हैं। तृणमूल कांग्रेस की मांग है कि ममता बनर्जी को इंडिया गठबंधन का कैप्टन बनाया जाए। ममता बनर्जी की दावेदारी के बाद इंडिया गठबंधन पूरी तरह खेमों में बंटा हुआ नजर आ रहा है। वैसे यदि दिमाग पर थोड़ा-सा जोर डालें तो याद आएगा कि पीएम मोदी ने तो लोकसभा चुनाव से पहले ही भविष्यवाणी कर दी थी कि इंडी गठबंधन के दल सिर्फ चुनावी स्वार्थ के लिए जुड़े हैं। चुनाव होने के बाद गठबंधन के दल आपस में टकराने लग जाएंगे। वही अब हो रहा है। केजरीवाल ने दिल्ली में कांग्रेस से अलग राह पकड़ ली है। 
चुनाव हार रहे राहुल गांधी इंडी गठबंधन को आगे कैसे ले जा सकते हैं
टीएमसी के सांसद कीर्ति आजाद ने कुछ समय पहले यह बयान दिया था कि अब इंडिया ब्लॊक की कमान बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को सौंप दी जानी चाहिए। क्योंकि राहुल गांधी के नेतृत्व में कांग्रेस खुद बुरी तरह हार का सामना कर रही है। ऐसे में वह इंडिया गठबंधन को आगे लेकर कैसे जा सकती है। अपने सांसद के इस बयान पर पहली प्रतिक्रिया ममता बनर्जी ने ही दी। उन्होंने साफ तौर पर कह दिया कि सभी दल राजी हों तो वे ‘इंडिया’ की कमान संभालने को तैयार हैं। इसके बाद तो ममता बनर्जी को समर्थन की झड़ी सी लग गई। समाजवादी पार्टी अध्यक्ष अखिलेश यादव, एनसीपी चीफ शरद पवार, शिवसेना (उद्धव) और अब लालू यादव ने भी मांग कर दी कि इंडिया ब्लॊक की कमान ममता बनर्जी को सौंप दी जानी चाहिए।
अब गठबंधन के कई घटक दल राहुल को अपना नेता मानने को तैयार नहीं
इंडिया गठबंधन में चल रही उठापटक के बीच कांग्रेस और राहुल गांधी की ओर से चुप्पी साध ली गई है। राहुल गांधी और उनकी पार्टी संसद के सत्र में गौतम अडानी का अपना वही पुराना मुद्दा उठा रहे हैं। इस मुद्दे पर टीएमसी और समाजवादी पार्टी का उसे समर्थन ना मिलने से समझा जा सकता है कि इंडिया के कई प्रमुख घटक दल राहुल गांधी को अपना नेता मानने को तैयार नहीं हैं। इंडिया ब्लॊक के प्रमुख घटक दल राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने भी ममता बनर्जी को इंडिया का नेतृत्व सौंपने की मांग कर एक प्रकार से कांग्रेस का साथ छोड़ दिया है। पटना में पत्रकारों ने जब लालू यादव से मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के बयान के संबंध में पूछा तो उन्होंने कहा, “इंडिया गठबंधन का नेतृत्व ममता बनर्जी को दे देना चाहिए, हम सहमत हैं।” कांग्रेस की आपत्ति से जुड़े सवाल पर लालू ने कहा, “कांग्रेस के आपत्ति जताने से कुछ नहीं होगा। ममता बनर्जी को नेतृत्व दे देना चाहिए।”
ममता का नाम आगे करने के बयानों से सियासी पारा चढ़ा
भले ही कहने को कांग्रेस की ओर से इंडिया ब्लॊक की कमान कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे संभाल रहे हैं, लेकिन सहयोगी दल मानते हैं कि इंडिया की कमान अप्रत्यक्ष रूप से राहुल गांधी के हाथों में ही है। मल्लिकार्जुन तो कठपुतली मात्र हैं। कांग्रेस की ओर से मुख्य चेहरा राहुल गांधी ही हैं। ऐसे में इंडी गठबंधन के सहयोगी दलों का निशाना सीधे-सीधे राहुल गांधी की नेतृत्व क्षमता पर ही है। सहयोगी दलों ने एक प्रकार से राहुल गांधी के प्रति बगावत कर उनके प्रति अविश्वास व्यक्त कर दिया है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को विपक्षी दलों के गठबंधन का नेतृत्व देने के लेकर कई दलों के बयान के बाद सियासी पारा चढ़ गया है। अब सत्ता पक्ष से लेकर विपक्ष के नेता इस बयानबाजी में शामिल हो गए हैं। इंडी गठबंधन के नेतृत्व पर लालू-शरद-उद्धव आदि नेताओं का साथ मिलने ममता बनर्जी फूली नहीं समा रही हैं। लालू यादव, शरद पवार से लेकर संजय राउत ने भी ममता बनर्जी को प्रमुख भूमिका देने की बात कही है। इस बीच ममता बनर्जी ने इंडिया ब्लॉक के नेतृत्व में बदलाव की चर्चाओं पर अपनी पहली प्रतिक्रिया दी है, उन्होंने इस पद के लिए उनका समर्थन करने वाले विपक्षी नेताओं को धन्यवाद दिया है। वाईएसआर कांग्रेस पार्टी ने भी ममता बनर्जी को गठबंधन का नेतृत्व करने के लिए सबसे बेहतर उम्मीदवार बताया।

तमिलनाडु : कार्तिगई दीपम विवाद : सनातन विरोधी DMK सरकार ने HC के आदेश के बाद भी नहीं मनाने दिया उत्सव

                                कार्तिगई दीपम विवाद, प्रतीकात्मक तस्वीर (फोटो साभार: AI ChatGPT)
तमिलनाडु के प्राचीन थिरुप्परनकुंद्रम मंदिर में कार्तिगई दीपम उत्सव के दौरान एक बड़ा विवाद खड़ा हो गया। मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने 1 दिसंबर 2025 को स्पष्ट आदेश दिया था कि थिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी के शिखर पर स्थित प्राचीन ‘दीपाथून’ स्तंभ पर पवित्र दीप जलाया जाए। लेकिन डीएमके सरकार ने इस आदेश की खुलेआम अवहेलना की।

बुधवार (3 दिसंबर 2025) की शाम 6 बजे दीप जलाने का समय था, लेकिन मंदिर प्रशासन ने पारंपरिक तरीके से उचीपिल्लैयार मंदिर के पास ही दीप जला दिया, जो पहाड़ी के नीचे है। इससे नाराज हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं और पुलिस के बीच झड़पें हो गईं। कोर्ट ने सरकार को ‘जानबूझकर अवज्ञा’ का दोषी ठहराया और कहा कि यह लोकतंत्र के लिए खतरा है।

यह घटना सिर्फ एक धार्मिक रस्म का मामला नहीं है। यह तमिलनाडु की सांस्कृतिक विरासत, अदालती आदेशों की मर्यादा और राजनीतिक साजिशों का मिश्रण है। डीएमके सरकार पर हिंदू विरोधी होने का पुराना आरोप लगता रहा है। विपक्षी भाजपा और हिंदू संगठन इसे सनातन धर्म के खिलाफ साजिश बता रहे हैं।

याचिकाकर्ता राम रविकुमार ने कोर्ट में कहा कि मंदिर प्रशासन ने दीपाथून पर कोई इंतजाम नहीं किया। जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन ने 1 दिसंबर 2025 को आदेश दिया कि दीप जलाया जाए, क्योंकि यह मंदिर की संपत्ति है। उन्होंने साल 1923 के एक कोर्ट डिक्री का हवाला दिया, जिसपर प्रिवी काउंसिल ने भी मुहर लगाई थी।

हाई कोर्ट के आदेश के बाद बुधवार (03 दिसंबर 2025) की शाम को जब हिंदू कार्तिगई दीपम के लिए पहाड़ी पर चढ़ने लगे, तो उन्हें रोक लिया गया। हाई कोर्ट के आदेश की खुलेआम धज्जियाँ उड़ाई। सेंट्रल इंडस्ट्रियल सिक्योरिटी फोर्स (सीआईएसएफ) को सुरक्षा के लिए तैनात किया गया था, लेकिन स्थानीय प्रशासन ने धारा 144 लगा दी। हिंदू संगठनों के कार्यकर्ताओं ने बैरिकेड तोड़े, पत्थर फेंके और नारेबाजी की।

एएनआई की रिपोर्ट के मुताबिक, दर्जनों लोग घायल हुए। कोर्ट ने इसे ‘अवमानना’ करार दिया और कहा, “यह आदेश की खुली अवहेलना है। लोकतंत्र का अंत हो जाएगा अगर अधिकारी कानून से ऊपर समझें।” जस्टिस स्वामीनाथन ने याचिकाकर्ता को 10 लोगों के साथ प्रतीकात्मक रूप से दीप जलाने की इजाजत दी और सीआईएसएफ को सुरक्षा का आदेश दिया। लेकिन अपील के बाद पुलिस ने सबको रोक लिया। हालाँकि अब गुरुवार (04 दिसंबर 2025) को कोर्ट ने इस मामले में अवमानना की कार्रवाई शुरू कर दी है।

सरकार के सूत्रों ने सफाई दी कि वे हिंदुओं के खिलाफ नहीं हैं, बल्कि शांति बनाए रखना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि कोई सच्चा भक्त कोर्ट नहीं गया और 100 साल पुरानी परंपरा का पालन हो रहा है। लेकिन भाजपा नेता के.अन्नामलई ने कहा, “डीएमके का सनातन धर्म से दुश्मनी अब छिपी नहीं। हिंदू धार्मिक निधि विभाग खुद भक्तों के खिलाफ अपील कर रहा है।”

कार्तिगई दीपम को लेकर विवाद क्या? क्यों DMK सरकार कर रही हिंदुओं का दमन

 कार्तिगई दीपम तमिलनाडु का एक प्रमुख हिंदू त्योहार है, जो कार्तिगई मास की पहली पूर्णिमा को मनाया जाता है। यह प्रकाश के विजय का प्रतीक है। थिरुप्परनकुंद्रम सुब्रमण्या स्वामी मंदिर भगवान मुरुगन के छह प्रमुख निवास स्थान में से पहला है, इस उत्सव का केंद्र रहा है।

थिरुप्परनकुंद्रम सुब्रमण्या स्वामी मंदिर छठी शताब्दी में पांड्य राजाओं द्वारा बनाया गया था और पहाड़ी को काटकर तराशा गया है। मंदिर के पुजारी रोजाना तीन बार पूजा करते हैं, जिसमें अभिषेक, अलंकरण, नैवेद्य और दीप आराधना शामिल है। ये प्रक्रिया अब भी जारी है।

लेकिन बीते कुछ समय से इस्लामी कट्टरपंथी इस पहाड़ी पर कब्जे और इसके नाम बदलने की कोशिश में हैं। कुछ समय पहले मुस्लिम प्रदर्शनकारियों ने पहाड़ी पर नमाज की माँग की, लेकिन पुलिस ने रोक दिया।

प्रिवी काउंसिल का फैसला और ‘सिकंदर हिल्स’ का दावा

थिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी का इतिहास संगम युग तक जाता है। संत नक्कीरार ने भगवान मुरुगन के 6 पवित्र निवासों में इसे पहला बताया है। यह तेवर स्थलम भी है, जहाँ शिव और मुरुगन की पूजा होती है। पहाड़ी 500 फुट ऊँची है और मंदिर चट्टान को काटकर बनाया गया। भक्त घिरी वीधी (परिक्रमा पथ) पर चक्कर लगाते हैं, जो मंदिर की संपत्ति है।

विवाद की जड़ 19वीं-20वीं शताब्दी के मुस्लिम दावों में है। कुछ लोग इसे ‘सिकंदर हिल्स’ कहते हैं, लेकिन 1931 में प्रिवी काउंसिल ने साफ किया कि यह मंदिर की संपत्ति है। पाँच सदस्यीय पैनल ने कहा, “पहाड़ी का खाली हिस्सा समय से परे मंदिर के कब्जे में है।”

प्रिवी काउंसिल ने 1923 के अधीनस्थ जज के फैसले को बहाल किया, जिसमें मस्जिद स्थल को छोड़कर पूरी पहाड़ी मंदिर की बताई गई। प्रिवी काउंसिल ने ऐतिहासिक दस्तावेजों का हवाला दिया, जिसमें 1144 का दस्तावेज ‘मलाईप्रकरम’ (पहाड़ी परिक्रमा) का जिक्र है।

फैसले में कहा गया कि मुगल आक्रमणकारियों ने राजस्व भूमि छीनी, लेकिन मंदिर या पहाड़ी कभी धर्मनिरपेक्ष हाथों में नहीं गई। कुछ मस्जिदें और घर बने, लेकिन वे हिंदुओं पर जबरन कब्जे का परिणाम था। इसके अलावा ईस्ट इंडिया कंपनी ने भी मंदिर के अधिकार मान्य किए थे। फैसले में प्रिवी काउंसिल ने लिखा, “कोई ऐतिहासिक प्रमाण नहीं कि मुस्लिम आक्रमणकारियों ने पवित्र पहाड़ी में हस्तक्षेप किया।” यह फैसला 2025 में भी प्रासंगिक है, क्योंकि जस्टिस स्वामीनाथन ने इसे ही आधार बनाया।

जस्टिस स्वामीनाथन के फैसले को नहीं मान रही डीएमके सरकार

हालाँकि हिंदू-विरोधी मिजाज वाली सत्ताधारी द्रविड़ मुनेत्र कढ़गम (डीएमके) सरकार ने कानून-व्यवस्था के नाम पर 1 दिसंबर 0025 के कोर्ट के निर्देश को चुनौती दी है। मामला तब और बिगड़ा जब याचिकाकर्ता राम रविकुमार सेंट्रल इंडस्ट्रियल सिक्योरिटी फोर्स (सीआईएसएफ) के जवानो के साथ कोर्ट के फैसले पर पहाड़ी चढ़ने लगे।

लेकिन मदुरै के पुलिस कमिश्नर जे. लोगनाथन के नेतृत्व वाली राज्य पुलिस ने हस्तक्षेप किया और उन्हें रोक दिया। मदुरै जिला कलेक्टर ने रोकथाम वाले आदेश जारी किए थे, दावा किया कि जनता की सुरक्षा और मौजूदा कानून-व्यवस्था की स्थिति खतरे में है।

हिंदू मुननेत्र मंड्रम संगठन के सदस्यों और अन्य कार्यकर्ताओं ने मंदिर के सामने इकट्ठा होकर मांग की कि कोर्ट के निर्देशित स्थान पर दीप जलाया जाए। कुछ लोग पुलिस की बैरिकेडिंग तोड़ने की कोशिश में लगे। इससे धक्का-मुक्की हुई और एक पुलिसकर्मी घायल हो गया। हिंदू मुननेत्र मंड्रम के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि मंदिर प्रशासन ने हाईकोर्ट के फैसले का पालन करने के लिए बिल्कुल कोई इंतजाम नहीं किया।

खास बात ये है कि मंदिर प्रबंधन ने पहले ही कोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी, दावा किया कि इससे सांप्रदायिक सौहार्द खतरे में पड़ जाएगा। लेकिन जज स्वामीनाथन ने सख्त हिदायत दी थी कि शाम 6 बजे तक दीप जलाना है, वरना 6:05 बजे अवमानना की कार्रवाई शुरू हो जाएगी। इसके बावजूद डीएमके सरकार और प्रशासन ने कोर्ट की नहीं सुनी।

हिंदुओं को नीचा दिखाकर मुस्लिमों का पक्ष ले रही DMK सरकार

डीएमके सरकार का ये रवैया चिंताजनक तो है, लेकिन हैरान करने वाला नहीं, क्योंकि हिंदू-नफरत करने वाली द्रविड़ पार्टी का इतिहास यही है। राज्य सरकार और हिंदू धार्मिक तथा चैरिटेबल एंडोमेंट्स विभाग ने पहले ही फैसले के खिलाफ अपील कर दी है। ऊपर से डीएमके और उसके सहयोगी जिला प्रशासन से कह रहे हैं कि कोर्ट के आदेश का पालन न करें।

डीएमके कोर्ट के आदेश तोड़ने के लिए बिना झिझक तैयार है, सिर्फ हिंदू धर्म के प्रति अपनी घृणा दिखाने के लिए। न्यायपालिका ने तथ्यों और सबूतों के आधार पर हिंदुओं का साथ दिया है, लेकिन सरकार सांप्रदायिक सौहार्द का विकृत कथा चलाने पर तुली है। उनकी टेढ़ी नजर में सहिष्णुता और धर्मनिरपेक्षता तभी बनी रहती है जब हिंदुओं के खर्च पर हो और उनके धार्मिक अधिकारों पर कब्जा हो।

वहीं, जब डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) (बैन हो चुके पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) के राजनीतिक विंग) ने जब इस पवित्र स्थान पर जानवरों की कुर्बानी की कोशिश की, तो ये मूल्य कभी खतरे में नहीं पड़े। जब इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (आईयूएमएल) के नेता और रामनाथपुरम सांसद के. नावास कानी (आईएमयूएल) ने एक अन्य विधायक और समर्थकों के साथ पवित्र पहाड़ी पर नॉन-वेज बिरयानी खाई, तो भी खतरा नहीं था। कानी ने यहाँ तक घोषणा कर दी कि जगह वक्फ बोर्ड की है।

दिल्ली के सुल्तानों के प्रतिनिधि के नाम पर इसे सिक्कंदर हिल्स नाम देने की कोशिशें भी चल रही थीं, जो मदुरै पर शासन करते थे, जिससे हिंदुओं ने विरोध किया। डीएमके ने इन उकसाने वाली हरकतों को सौहार्द और शांति के लिए खतरा नहीं माना, सिर्फ इसलिए क्योंकि हिंदू धर्म का एक बड़ा हिस्सा अपमानित हो रहा था, जिसे पार्टी चुपचाप समर्थन देती है। लेकिन जब हिंदू कानूनी तरीके से अपने अधिकारों के लिए लड़ते हैं, तो इनपर दुखों का पहाड़ टूट पड़ता है।

इसी तरह, हाईकोर्ट द्वारा इसे हिंदू मंदिर घोषित करने के बाद भी मुस्लिमों का पहाड़ी पर अवैध कब्जा जारी है और डीएमके सरकार ने इन उल्लंघनों को बर्दाश्त किया है।

द्रविड़वाद के झंडाबरदार हमेशा थिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी से जुड़े झूठे मुस्लिम दावों का साथ देते रहे हैं और असली हिंदू चिंताओं तथा वैध अधिकारों का विरोध करते रहे हैं। यहाँ तक कि अपने प्रभाव वाले मीडिया आउटलेट्स के जरिए मामले को राजनीतिक रंग भी देने की कोशिश करती है, ताकि मुस्लिम उसके पक्ष में लामबंद हो सकें।

ऐसे ही एक मामले में तमिलनाडु सरकार ने हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद हिंदुओं को अन्नदान करने से रोक दिया, जबकि कोर्ट ने सरकार को स्पष्ट तौर पर कहा था कि वो इस काम में अड़ंगा न लगाए। क्योंकि इसकी वजह ये थी कि डीएमके सरकार अपने ईसाई समर्थकों को खुश करने में जुटी रही। ये मामला कुछ ही समय पहले का है।

HC के आदेश का पालन न करने पर DMK पर क्यों उठाई जा रही उंगली?

आप सोच रहे होंगे कि ऐसा सिर्फ सरकार कर रही है, इसका सत्ताधारी डीएमके पार्टी से कोई लेना देना नहीं है। तो हम बता दें कि तमिलनाडु सरकार में हिंदू धार्मिक तथा चैरिटेबल एंडोमेंट्स विभाग नाम से अलग मंत्रालय है। ये मंत्रालय ही हिंदू मंदिरों से जुड़े तमाम फैसले करता है।

मौजूदा समय में थिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी पर स्थित मुरुगन मंदिर में भी प्रशासकों की तैनाती है, जो तमिल नाडु की डीएमके सरकार की तरफ से की गई है। ऐसे में वो डीएमके के निर्देश पर ही हाई कोर्ट तक के फैसले को नहीं मान रहे। यहाँ तक कि हाई कोर्ट की कार्यवाही तक से गैर-हाजिर रहे। फिर यहाँ खुद मंदिर के प्रशासक को आगे बढ़कर हिंदुओं के हित में काम करना चाहिए था और हाई कोर्ट का आदेश भी था, लेकिन यहाँ सरकार द्वारा बिठाया मंदिर प्रशासक ही हिंदू विरोधी डीएमके सरकार के लक्ष्य को पूरा करने में जुटा रहा।

इतना ही नहीं, एक तरफ तो वो खुलकर हिंदू विरोध करती है, तो दूसरी तरह हिंदू मंदिरों के पैसों को डकार भी जाती है। इन सब बातों को जानते हुए भी डीएमके को कब तक नजरअंजाद किया जाए? जब उसका अतीत ही हिंदू और सनातन विरोध से भरा पड़ा है।

सनातन का बार-बार अपमान करती रही है डीएमके

बीते कुछ समय के घटनाक्रम को देखें तो डीएमके सांप्रदायिक सौहार्द या कानून-व्यवस्था के पीछे छिप जाती है, लेकिन हिंदू धर्म और उसके अनुयायियों के प्रति अपनी नफरत जाहिर करने से कभी नहीं हिचकिचाई। मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के उपमुख्यमंत्री बेटे और ‘गर्वित ईसाई’ उदयनिधि स्टालिन ने 2023 में सनातन धर्म के विनाश की खुली अपील की।

डीएमके सांसद ए राजा ने तो और आगे बढ़कर कहा कि उदयनिधि की अपमानजनक टिप्पणियाँ तो काफी हल्की थीं। सनातन धर्म की तुलना तो एचआईवी और कुष्ठ रोग से तुलना करनी चाहिए। यही नहीं, हिंदू धर्म को जंजीर कहने वाले कमल हासन को डीएमके ने बाकायदा राज्यसभा भी भेजा है। वहीं, डीएमके सरकार के मंत्री ने तो हिंदू धर्म को लेकर सेक्स पोजिशन तक की घटिया टिप्पणी की थी।

डीएमके ने न सिर्फ हिंदू धर्म को निशाना बनाया है, बल्कि ऐसे कदम भी उठाए हैं जो धर्म का अपमान करते हैं। तमिलनाडु सरकार ने जुलाई में चेन्नई के किलपुक में वाडेल्स रोड का नाम बदलकर आर्चबिशप एज्रा सरगुनम रोड रख दिया, जो मृत एंटी-हिंदू ईसाई प्रचारक और बिशप एज्रा सरगुनम को सम्मान देने के लिए था। उसने हिंदुओं को मारने का सार्वजनिक आदेश भी दिया था। यही नहीं, डीएमके सरकार में तो दुर्दांत आतंकियों की भव्य आखिरी यात्रा भी निकलती है, जो कोर्ट से सजा पाए हो।

हिंदुओं से नफरत करने वालों की डीएमके में होती है पूछ

हिंदू धर्म से नफरत करने वाले लोग डीएमके में जगह पाते हैं, क्योंकि पूरी पार्टी अपनी खतरनाक धर्मनिरपेक्षता के बहाने हिंदू-विरोध को मूर्त रूप देती है। वे (डीएमके के लोग) सनातन के कट्टर आलोचक ईवी पेरियार की पूजा करते हैं और अब्राहमिक मजहबों खासकर इस्लाम और ईसाई धर्म को आदर देते हैं।

थिरुप्परनकुंद्रम पहाड़ी पर बार-बार होने वाले टकराव इसी का हिस्सा हैं। डीएमके सरकार हिंदुओं के अधिकारों पर कुचलने के लिए तुली है, भले ही इसके लिए कोर्ट के आदेश तोड़ने पड़ें या उन्हें चुनौती देनी पड़े। इसके अलावा डीएमके या ‘धर्मनिरपेक्ष पार्टियाँ’ कभी मुस्लिमों या अन्य मजहबों के अनुयायियों के साथ ऐसा हौसला नहीं दिखातीं, जो उनकी असली मंशा और मकसद बयान करता है।

पवित्र पहाड़ी पर मद्रास हाई कोर्ट का फैसला हिंदुओं के पक्ष में आने पर मुस्लिमों को पीड़ित दिखाने वाली कहानी गढ़ने में जुट गया The News Minute

                                           थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी ( फोटो साभार-द न्यूज मिनट्स)
तमिलनाडु के मदुरै में स्थित प्रसिद्ध ‘थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी’ हिंदू और मुस्लिम के बीच तनाव का कारण रहा है। हालाँकि मद्रास हाईकोर्ट ने हिंदुओं के पक्ष में अपना फैसला सुना कर भगवान मुरुगन की इस पहाड़ी पर विवाद खत्म करने की कोशिश की है।

पहाड़ी के नाम से लेकर सुल्तान सिकंदर बधुशा दरगाह (मंदिर) में पशु बलि की प्रथा और नेल्लितोप्पु क्षेत्र में मुसलमानों के इबादत करने के अधिकार पर अक्टूबर में मद्रास हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया, जिसकी काफी चर्चा की गई।

हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि पवित्र स्थल का नाम ‘थिरुपरनकुंद्रम पहाड़ी‘ ही रहेगा, सिविल न्यायालय के फैसले तक पशु बलि पर प्रतिबंध रहेगा और मुसलमान केवल रमज़ान और बकरीद के दौरान ही नेल्लितोप्पु क्षेत्र में शर्तों के साथ इबादत कर सकेंगे।

यह जगह सनातन धर्म के अनुयायियों के लिए काफी पूजनीय है, क्योंकि यहाँ ऐतिहासिक अरुलमिघु सुब्रमण्यम स्वामी का मंदिर है, जो भगवान मुरुगन के छह निवास स्थानों में एक माना जाता है।

फिर भी, वामपंथी मुखपत्र ‘द न्यूज मिनट’ ने कोर्ट के फैसले के बावजूद इस मुद्दे को फिर से हवा देने की कोशिश की है। इसका मकसद धार्मिक भावनाओं को भड़काना और भारतीय जनता पार्टी को निशाना बनाना है। 5 नवंबर को प्रकाशित ‘दक्षिण की अयोध्या – अनादि काल की एक समयरेखा’ शीर्षक वाले लेख में, मुस्लिमों को ‘पीड़ित’ दिखाने की झूठी कोशिश की गई। इसके लिए तथ्यों को तोड़-मरोड़कर पेश किया गया।

‘अयोध्या’ का जिक्र किए जाने से साफ पता चलता है कि मीडिया हाउस इस लेख के जरिए क्या हासिल करना चाहता है। इस दौरान इस बात को भी नजरअंदाज कर दिया गया कि राम जन्मभूमि का फैसला सुप्रीम कोर्ट ने सुनाया था। हालाँकि, यह वामपंथी प्रोपेगेंडा ऐसे फैसलों को तभी स्वीकार करता है जब वे उनके अनुसार हो। वरना वे हर संस्था को समझौतावादी बताते हैं या फैसलों का सम्मान नहीं करते, जैसा कि इस स्थिति में भी हुआ।

मुस्लिम को ‘पीड़ित’ बता बीजेपी पर हमला तेज

आर्टिकल में 4 जुलाई को 52 वर्षीय रसोइये सैयद अबुताहिर के साथ हुए एक साक्षात्कार का हवाला दिया गया है, जो तिरुपरनकुंड्रम स्थित दरगाह पर एक बकरे की बलि देना चाहते थे। उन्होंने दावा किया कि ‘सुन्नी मुसलमानों ने अपनी सूफी तीर्थयात्रा की तारीख क्रिसमस पर बदल दी। ताकि उनके गैर-ब्राह्मण हिंदू पड़ोसी इस उत्सव में शामिल हो सकें।”

हालाँकि, एक पुलिस निरीक्षक ने उन्हें बताया कि यहाँ पशुबलि निषेध है और उन्हें रोक दिया। दरगाह समिति के सदस्यों, स्थानीय जमात और कई मुस्लिम नेताओं ने इसका विरोध किया। लेकिन पुलिस ने तुरंत कार्रवाई की। इस दौरान आरोप लगा कि केवल मुस्लिम पुरुषों पर ही एफआईआर दर्ज कीं, जबकि हिंदुओं, महिलाओं और बच्चों को छोड़ दिया गया।

इस लेख की शुरुआत में मुसलमानों को ऐसे चित्रित किया गया, जैसे वे काफी प्यार से रहते हैं और ‘गैर ब्राह्मण’ हिन्दुओं के लिए अपनी आस्था तक कुर्बान कर देते हैं। लेख में थोड़ा आगे बढ़ते ही हिंदू मुन्नानी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पर हमला शुरू हो गया। जाहिर तौर पर वामपंथी प्रोपेगेंडा शुरू था, ताकि राज्य विधानसभा चुनावों के नजदीक आते ही इस मुद्दे को तूल दिया जा सके। लेख में हिन्दुओं पर पहाड़ी पर पूर्ण नियंत्रण के लिए राज्यव्यापी आंदोलन चलाने का भी आरोप लगाया गया।

मीडिया संस्थान ने इस बात पर जोर दिया कि हिंदू वर्ग दरगाह में नमाज पढ़ने और पशु बलि पर रोक लगाना चाहते थे, क्योंकि उनका तर्क था कि यह पूरी चट्टान हिंदू देवता मुरुगन के शरीर का प्रतिनिधित्व करती है।

अबुताहिर ने तो यह भी आरोप लगाया कि इस स्थल पर मुस्लिम प्रथाओं को लेकर वर्षों से कोई समस्या नहीं रही है, और यह भी कहा कि अगर पहले कोई आपत्ति नहीं थी, तो अब भी नहीं होनी चाहिए।

सबसे पहले तो यह तर्क ही त्रुटिपूर्ण है। क्योंकि कोई खास प्रथा वर्षों से चली आ रही है, इसका मतलब यह नहीं है कि उसे जारी रहने दिया जाना चाहिए। क्या इसी तरह तीन तलाक कानून जैसी प्रथाओं को भी वैसे ही छोड़ दिया जाना चाहिए था, जैसा पहले था। इसके लिए कानूनी बदलाव ये बताता है कि प्रथाएँ हमेशा सही नहीं होती।

इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह कोई हालिया विवाद नहीं है, बल्कि एक सदी से भी ज़्यादा समय से चला आ रहा है। हिंदुओं ने हमेशा से पूरी पहाड़ी पर अपना स्वामित्व बनाए रखा है, खासकर 1920 में दरगाह द्वारा मंडप बनाने के प्रयास के बाद से।

‘समन्वित पूजा स्थल’ और ‘सांप्रदायिक सद्भाव’ स्थल होने का दावा

लेख के अनुसार, जब पुलिस ने मुस्लिम कट्टरपंथियों को गिरफ्तार किया, तब न तो स्थानीय भाजपा इकाई और न ही कोई अन्य हिंदुत्व संगठन ‘तस्वीर में’ था। पुलिस को पशु बलि के संबंध में तिरुपरनकुंड्रम के किसी भी हिंदू निवासी से कोई औपचारिक शिकायत नहीं मिली थी।

दिलचस्प बात यह है कि मुस्लिम पक्ष ने इस मुद्दे को लेकर अदालत का रुख किया और दलीलों के दौरान दावा किया कि यह एक ‘समन्वित पूजा स्थल है जहाँ दोनों या सभी धर्मों के तीर्थयात्री आते हैं’। उन्होंने यह भी कहा कि ‘दरगाह में हलाल समारोह आयोजित करने वाला व्यक्ति परमशिवम नाम का एक हिंदू है, जो मुक्कुलाथोर या थेवर समुदाय का सदस्य है।’

परमशिवम के बेटे का हस्ताक्षर युक्त शपथ पत्र भी लेख में दिखाया गया है, जिसमें उसे ‘दरगाह का भक्त’ बताया गया है। लेख में कहा गया है कि परमशिवम का परिवार ‘हलाल’ करता है और एक पुराने अनुष्ठान के तहत मांस का एक हिस्सा अपने पास रखता है।

                                            (फोटो साभार- तमिलनाडु टूरिज्म)

इस्लामी आस्था के प्रतीक दरगाह को समन्वित संस्कृति और सांप्रदायिक सद्भाव स्थल के रूप में बताया गया है। साथ ही कहा गया कि इसके कार्यक्रम में हिंदू भी भाग लेते हैं, जो बेहद निराशाजनक है।

ईद या क्रिसमस पर हिंदुओं की भागीदारी या किसी मंदिर में गैर-हिंदुओं का जाना, इन अवसरों या स्थलों की धार्मिक प्रकृति को नुकसान नहीं पहुँचाता। इससे धार्मिक तत्वों को अलग नहीं किया जा सकता, भले ही इनमें विभिन्न धर्मों के लोग शामिल हों।

इसी तरह, जब हिंदू सैकड़ों वर्षों से पहाड़ी पर अपने वैध दावों के लिए संघर्ष कर रहे हैं और उन्हें लगातार इससे वंचित रखा जा रहा है, तो यह सांप्रदायिक सद्भाव का प्रतिनिधित्व कैसे कर सकता है?

दरगाह के कार्यक्रमों में शामिल कुछ हिंदुओं की हरकतें, व्यापक हिंदू समुदाय की भावनाओं का प्रतिनिधित्व नहीं करती। हिन्दुओं की आस्था को दूसरों की आस्था के समान ही महत्वपूर्ण क्यों नहीं माना जाना चाहिए?

फर्जी बयान को बनाए रखने के लिए आधिकारिक बयानों पर संदेह

तिरुपरनकुंद्रम राजस्व निरीक्षक के अनुसार, “दरगाह तक जाने वाले आम रास्ते को मुसलमानों ने जाम कर दिया था। उन्होंने बताया कि मुस्लिमों ने ‘पुलिस को अपना कर्तव्य निभाने से रोका’ और शिकायत में ‘पुलिस अराजकता मुर्दाबाद’ समेत कई विवादित नारे लगाए गए।” लेख में सवाल किया गया कि एक समुदाय के तीर्थयात्रियों को दूसरे समुदाय के तीर्थयात्रियों को दरगाह तक जाने देने में क्या आपत्ति हो सकती है?

                                                          साभार- आउटलुक ट्रेवलर

इसका जवाब शायद वैसा ही हो सकता है जैसे हर त्योहार पर हिंदू जुलूसों पर हमले होते हैं और उन्हें अक्सर ‘मुस्लिम इलाकों’ से गुजरने की इजाजत नहीं दी जाती। हालाँकि, वामपंथी लॉबी इस चर्चा के लिए तैयार नहीं है और न ही कभी होगी। उन्हें सबसे ज़्यादा परेशान करने वाली बात उनके पसंदीदा जनसांख्यिकी की सच्चाई को उजागर करने वाली असुविधाजनक सच्चाइयाँ हैं। इसलिए वे समुदाय के हर नापाक पहलू को नज़रअंदाज करते रहते हैं।

लेख में बताया गया है कि राजस्व निरीक्षक के आरोपों को मदुरै के पुलिस आयुक्त जे लोगनाथन ने मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ में अपनी याचिका में दोहराया और इस बात पर अफसोस जताया कि वे यह बताने को तैयार नहीं थे कि कैसे ‘राजपलायम के हिंदू अपने मुस्लिम पड़ोसियों के साथ एक परिवार की तरह बकरे की बलि देने और सूफ़ी रीति-रिवाजों में हिस्सा लेने के लिए यात्रा करते थे’, ताकि ‘सांप्रदायिक सद्भाव’ का प्रचार जोर शोर से किया जा सके।

कथित तौर पर अबुताहिर ने लगभग पंद्रह मिनट तक बात की और फिर अचानक संपर्क तोड़कर गायब हो गए। उन्होंने जमात के उन सदस्यों से भी संपर्क तोड़ दिया जिन्होंने मीडिया हाउस को उनसे संपर्क करवाया था और बातचीत जारी रखने के लिए तभी राज़ी हुए जब मदुरै के वकील एस वंचिनाथन ने उनका मामला लेने का वादा किया और उनके गायब होने के लिए स्थानीय पुलिस को जिम्मेदार ठहराया।

इसके बाद लेख में एक ‘आदर्श समाज’ को दिखाने की कोशिश की गई है। इसमें कहा गया कि एक अकेला मुस्लिम परिवार हिंदुओं के बीच रहता है। दोनों समुदायों के लोग तब तक मिलजुल कर रहते हैं, जब तक कि भाजपा या हिंदुत्व कार्यकर्ता उनके बीच तनाव पैदा नहीं कर देते।

हिंदू भावनाओं को नजरअंदाज किया गया

यह लेख बड़ी चालाकी से दोष दोनों पर डाल देता है। इस दौरान इस बात को नज़रअंदाज़ किया गया है कि यह मामला लंबे समय से हिंदू धार्मिक भावनाओं से जुड़ा हुआ है और राजनीति से इसका कोई लेना-देना नहीं है। यह लेख मूलतः हिंदुओं से ‘सांप्रदायिक सद्भाव’ के नाम पर अपने अधिकारों को छोड़ने या आरोप झेलने के लिए तैयार रहने को कहता है।

लेख के अनुसार, पुलिस ने जिला कलेक्टर से आदेश मिलने का दावा किया और उन्हें पहाड़ी पर चढ़ने से रोक दिया, लेकिन जमात ने जब जाँच की तो पाया कि ऐसा कोई आदेश नहीं दिया गया था। अधिकारियों ने तब दावा किया कि ये निर्देश जिला के राजस्व विकास अधिकारी (आरडीओ) ने जारी किए गए थे। हालाँकि, मुसलमानों ने दावा किया कि पुलिस को ऐसा कोई निर्देश जारी नहीं किया गया था।

अगर यह सच है, तो क्या यह वर्तमान सरकार के अधीन अधिकारियों की प्रशासनिक विफलता नहीं है? हालाँकि, लेख में जिम्मेदार अधिकारियों से सवाल पूछने के बजाय, हिंदू समूहों और भाजपा से सवाल पूछे गए हैं। ऐसा तब है जब राज्य विधानसभा में भाजपा के सिर्फ 4 सदस्य हैं।

लेख में यह भी जोड़ा गया कि जैनियों ने पुरातात्विक साक्ष्य प्रस्तुत किए हैं जिनसे पता चलता है कि उन्होंने अन्य दो धर्मों से बहुत पहले तीर्थस्थल स्थापित किए थे, बिना यह बताए कि कैसे इस्लामवादियों ने उनकी गुफाओं को भी नहीं छोड़ा और उन्हें हरे रंग से रंग दिया।

लेख में कहा गया, “इस संघर्ष से जुड़े बदलते कानूनी और राजनीतिक समीकरणों ने विस्तार से बताया कि कैसे पुलिस और नौकरशाही की कार्रवाइयों ने एक खालीपन पैदा किया , जिसे भाजपा ने अपने हिंदुत्व के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए तेजी से भर दिया।”

निष्पक्षता का भ्रम पैदा करने के लिए लेख में दावा किया गया कि “धर्मनिरपेक्ष समूह पुलिस और द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) के नेतृत्व वाली राज्य मशीनरी से बेहद निराश हैं, जिसे वे द्रविड़ मॉडल की सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्धता को सक्रिय रूप से कमज़ोर करने वाला मानते हैं।”

पूरा लेख हिंदुत्व और भाजपा की निंदा करने के लिए समर्पित है, जबकि जिस सरकार को जवाबदेह ठहराया जाना चाहिए, उसकी आलोचना केवल राज्य में उनकी बढ़ती उपस्थिति के बावजूद “सामाजिक न्याय” प्रदान करने में विफल रहने के लिए की जा रही है।

गौरतलब है कि यह वही पार्टी है जिसके मंत्री, विधायक और यहाँ तक कि सांसद भी सनातन धर्म को खत्म करना चाहते हैं। इसके प्रति अपनी घृणा सार्वजनिक तौर पर जाहिर कर चुके हैं। यह बेहद हास्यास्पद है कि लेख में यह सुझाव दिया गया है कि ऐसे प्रशासन ने उन शरारती ‘हिंदुत्ववादी ताकतों’ के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की, जिनका वास्तव में राज्य में कोई दबदबा नहीं है।

इसके बाद मीडिया संस्थान ने इसी बयानबाजी को दोहराया और कहा कि ‘हिंदुत्व समूह इसे दक्षिण भारत का अयोध्या कह रहे हैं।’ इसने आगे इस बात की निंदा की कि कैसे ‘हिंदू मुन्नानी, हिंदू मक्कल कच्ची, आरएसएस और भाजपा लगभग पाँच लाख लोगों के साथ 22 जून को मदुरै में मुरुगन ‘मानडु’ (सम्मेलन) के लिए एकत्रित हुए।’ यह राज्य के इतिहास में सबसे बड़ा हिंदुत्व सम्मेलन था।

इस दौरान पूरी पहाड़ी पर कब्जा करने का संकल्प लिया गया। भगवान मुरुगन के इस निवास स्थान में मौजूद दरगाह में पशु बलि पर रोक लगाने की माँग की गई। हिंदू मक्कल कच्ची ने अदालत में सिकंदर मलाई नाम के इस्तेमाल पर रोक लगाने के लिए याचिका दायर की और इस बात पर ज़ोर दिया कि मुरुगन के कई नामों में से एक के सम्मान में पहाड़ी को स्कंदर मलाई कहा जाए।

मुसलमानों ने उस स्थान पर अपनी बलि प्रथा जारी रखी और मुस्लिम नेताओं ने भी उस स्थान का दौरा किया। हालाँकि, मीडिया संगठन ने सिर्फ हिंदुओं के वहाँ जमा होकर लोकतांत्रिक तरीके से अपनी बात रखने पर आपत्ति जताई। अगर हिंदू धर्मनिरपेक्षता के निर्धारित मार्ग से ज़रा भी विचलित होते हैं, अपनी धार्मिक पहचान का दावा करते हैं या कोई सच्ची माँग करते हैं, तो अदालत के फैसले की परवाह किए बिना उन्हें ‘हिंदुत्ववादी’ करार दिया जाएगा।

कानूनी विवादों का इतिहास एक सदी पुराना है

लेख में आरोप लगाया गया है कि “कुंड्रम, कुंदरू या मलाई हर एक नाम और दावे के पीछे एक कहानी है, जो उस समय से जुड़ी है जिसका ऐतिहासिक साक्ष्य काफी कम है।” हालाँकि, जैसा कि पहले बताया गया है, दरगाह ने 1920 में एक मंडप बनाने की कोशिश की, लेकिन तिरुपरनकुंड्रम स्थित अरुलमिगु सुब्रमण्यम स्वामी मंदिर ने पूरे क्षेत्र पर स्वामित्व की घोषणा की।

निचली अदालत ने 1923 में कहा कि मंदिर के पास लगभग पूरी पहाड़ी है, सिवाय नेल्लीथोप्पु की लगभग 33 सेंट ज़मीन के, जहाँ दरगाह का ध्वजस्तंभ और मस्जिद स्थित हैं। उस समय की सर्वोच्च अदालत, प्रिवी काउंसिल ने, दरगाह की अपील के बाद, 1931 में ‘अनादि काल से’ पहाड़ी पर मंदिर के अधिकारों को बरकरार रखा।

इस रुख का समर्थन अन्य मामलों द्वारा भी किया गया। अदालत ने 1958 में दरगाह की प्रतिबंधित सीमाओं के बाहर खुदाई पर रोक लगा दी। साल 2011 में कोर्ट ने मंदिर की सहमति के बिना किसी भी नए निर्माण कार्य पर रोक लगा दी।

अदालतें एक सदी से भी ज़्यादा समय से पहाड़ी पर मंदिर के नियंत्रण को बरकरार रखती आई हैं, और दरगाह के अधिकारों को केवल उसके 33 सेंट के दायरे तक ही सीमित कर दिया है।

मुस्लिम अतिक्रमण का विरोध करते रहे हैं हिन्दू

हकीकत उस चित्रण के बिल्कुल उलट है जो द न्यूज़ मिनट ने अपने लेख में गढ़ने की कोशिश की थी। मुसलमानों द्वारा किए गए अवैध अतिक्रमणों का विरोध करने के लिए हिंदुओं को बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन करने पड़े और कानूनी लड़ाई भी लड़नी पड़ी।
डीएमके सरकार की मंज़ूरी से पशु बलि की अनुमति दी गई थी। जब प्रतिबंधित पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (पीएफआई) की राजनीतिक शाखा, डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (एसडीपीआई) ने सांप्रदायिक तनाव भड़काने की कोशिश की, तो हिंदू श्रद्धालुओं के उग्र प्रदर्शन के बाद अधिकारियों को अंततः कार्रवाई करने के लिए मजबूर होना पड़ा। इसके अलावा, डीएमके पहाड़ी का नाम बदलकर सिकंदर मलाई करने की कोशिश करता रहा।
निजी स्वार्थों वाले लोग दरगाह को सांप्रदायिक सद्भाव और धर्मनिरपेक्षता का प्रतीक मान सकते हैं, लेकिन सच्चाई यही है कि इसका इस्तेमाल हिंदुओं के धार्मिक अधिकारों को कुचलने, उनके पवित्र स्थल पर अतिक्रमण करने और उनकी धार्मिक भावनाओं का शोषण करने के लिए किया गया है। उच्च न्यायालय का फैसला और इस क्षेत्र की कानूनी पृष्ठभूमि भी इसी सच्चाई को रेखांकित करती है, जिसे उदार-वामपंथी मीडिया छिपानी की कोशिश करता है।

तमिलनाडु: ‘नेताओं को लड़कियां सप्लाई करता है पति’, पत्नी ने लगाया आरोप, मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन से की कार्रवाई की मांग

                                     पत्नी का आरोप, नेताओं को लड़कियां उपलब्ध कराता है पति
तमिलनाडु के अराकोणम से DMK युवा विंग के पदाधिकारी दैवसीयाल पर उनकी 20 वर्षीय पत्नी ने यौन शोषण का आरोप लगाया है। पार्टी में ऊँचा पद पाने के दैवसीयाल अपनी पत्नी समेत करीब 20 अन्य युवतियों को भी राजनेताओं के साथ यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर करता था।

पीड़ित पत्नी ने बताया कि दैवसीयाल उसे ‘पागल कुत्ते की तरह काटता’ था और धमकी देता था कि उसे काट देगा। इसके अलावा पुलिस उसका ही साथ देगी। एक बार दैवसीयाल ने कॉलेज जाते समय हमला किया और फोन तोड़ दिया। पीड़िता ने परेशान होकर आत्महत्या की कोशिश भी की। पीड़िता ने मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन से न्याय की गुहार लगाते हुए कही कि अगर कार्रवाई नहीं हुई तो वह अपनी जान दे देगी।

इन आरोपों के बाद, दैवसीयाल फरार हो गया है और पुलिस उसकी तलाश कर रही है। वहीं, AIADMK ने DMK पर आरोप लगाया है कि राजनीतिक दबाव के कारण पुलिस ने शुरू में FIR दर्ज करने में देरी की। AIADMK महासचिव एडप्पादी के. पलानीस्वामी ने चेतावनी दी है कि अगर दैवसीयाल के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई तो उनकी पार्टी बड़ा विरोध प्रदर्शन करेगी।

शिकायत करने पर दी धमकी

महिला ने पुलिस को दी शिकायत में कहा है कि उसका पति देइवासेयाल है। वह खुद डीएमके की युवा शाखा का उप सचिव होने का दावा करता है। महिला का आरोप है कि उसके पति ने पुलिस से शिकायत करने पर जान से मारने की धमकी दी थी। साथ ही परिवार के सदस्यों को आग लगाने की भी धमकी दी है। पीड़िता का आरोप है कि स्थानीय पुलिस भी शिकायक के बाद कोई कार्रवाई नहीं कर रही है। जबकि वह कई बार इस मामले में पुलिस से शिकायत कर चुकी है।

फिलहाल, पुलिस का कहना है कि प्रारंभिक जाँच में यौन उत्पीड़न का कोई सीधा सबूत नहीं मिला है और मामले की जाँच जारी है।

घर से बाहर निकलना किया बंद

पीड़िता का आरोप है कि वह कॉलेज से पढ़ाई कर रही है। पति की प्रताड़ना से तंग आकर वह अपने पिता के पास आ गई। यहां भी उसका पति पीछे पड़ा हुआ है। उसने घर से बाहर निकलना बंद कर दिया है। इसी वजह से उसकी परीक्षा भी नहीं दे सकी। उसका पति घर पर आकर भी गाली-गलौज करता है। पीड़िता ने इस मामले में अब डीएमके प्रमुख और मुख्यमंत्री एमके स्टालिन से कार्रवाई की मांग की है।

सनातन विरोध में कितना नीचे गिरेगी कांग्रेस? सनातन विरोधी कांग्रेस-DMK नेताओं से क्यों नहीं हो रहा बर्दाश्त IIT मद्रास के डायरेक्टर द्वारा ‘गौमूत्र’ में औषधीय गुण बताया जाना? माफी मँगवाने पर अड़े, प्रदर्शन की भी धमकी

कांग्रेस मुस्लिम तुष्टिकरण करते कितना नीचे गिरेगी? एक सीमा होती है। 7 नवंबर 1966 को गौ हत्या का विरोध कर रहे निहत्ते साधु-संतों के खून की होली खेलने वाली तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी भी कालपात्रु जी महाराज के अभिशाप से बच नहीं पायी। जब से जो कांग्रेस का पतन शुरू हुआ आज तक नहीं रुक रहा। दूसरे, दिल्ली से गौ को निकालने वाली तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित का क्या हुआ हाल? सबके सामने है कोई बताने की जरुरत नहीं। 
फिर जब स्कूल में पढ़ते थे तब माध्यमिक कक्षाओं में गाय का प्रस्ताव याद करवाया जाता था। परीक्षा में भी प्रस्ताव लिखने को आता था। प्रस्ताव में एक लाइन होती थी कि गौ मूत्र से दवाइयां बनती हैं। लेकिन सनातन विरोधियों को नहीं मालूम कि धरती पर एकमात्र गाय है जिसके मूत्र में बदबू नहीं होती, क्योकि गाय में 33 कोटि देवी-देवताओं में वास होता है। इतना ही नहीं पहले के समय घरों में फर्श की लिपाई गौ गोबर से होती थी, भैंस के गोबर से नहीं क्योकि इसके गोबर तक में बदबू नहीं होती। कोई कीड़ा तक नहीं होता था। यानी मूत्र तो क्या गोबर भी दवाई ही है। गौर करने की बात है कि गाय का बछड़ा हजार गऊओं के बीच अपनी अपनी माँ को पहचान जाता है, यह विशेषता किसी अन्य पशु या पक्षी में नहीं है। यही कारण है कि पहले के लोग भैंस के दूध की बजाए गौ दूध पीते और पिलाते थे। लेकिन जब से गौ दूध की बजाए भैंस के दूध का चलन हुआ परिवारों में दूरी बन गयी। मुस्लिम तुष्टिकरण के चलते आयुर्वेद को दरकिनार कर यूनानी पद्धति को बढ़ावा दिया गया। लेकिन आज सनातन विरोधी कांग्रेस-DMK नेताओं को IIT मद्रास के डायरेक्टर प्रोफ़ेसर वी कामकोटी द्वारा ‘गौमूत्र’ में बताए औषधीय गुण बताए जाने पर मातम करना शुरू कर दिया। अपने आपको जनहितैषी बताने वाली कांग्रेस और DMK पार्टियां विरोध कर क्यों अपनी तिजोरी और कुर्सी की खातिर जनता को गुमराह कर रही है?   

प्रोफेसर कामकोटी ने देसी गायों के संरक्षण की बात कही (फोटो साभार: Freepik & IndiaAI)
 

IIT मद्रास के डायरेक्टर प्रोफ़ेसर वी कामकोटी ने गौमूत्र के औषधीय गुणों के की तारीफ़ की है। उन्होंने गौमूत्र से एक साधु का बुखार ठीक होने की घटना भी बताई है। उनके इस बयान के बाद कॉन्ग्रेस और DMK के नेता भड़क गए हैं। उनके इस बयान का तमिलनाडु भाजपा के अध्यक्ष के अन्नामलाई ने बचाव किया है।

प्रोफ़ेसर वी कामकोटी ने गौमूत्र की यह तारीफ़ चेन्नई में एक कार्यक्रम में की। यह कार्यक्रम पोंगल के उपलक्ष्य में आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि गौमूत्र में एंटी बैक्टीरियल, एंटी फंगल और पाचक गुण होते हैं। उन्होंने कहा कि गौमूत्र पेट की समस्याओं के लिए भी अच्छी दवा है। उन्होंने इसके बाकी औषधीय गुण भी बताए।

प्रोफ़ेसर कामकोटी ने गौमूत्र की विशेषता बताए हुए कहा इससे बुखार कम होने की बात कही। उन्होंने इस बीच एक सन्यासी का नाम भी लिया। प्रोफ़ेसर कामकोटी ने गौमूत्र के यह गुण आर्गेनिक फार्मिंग के फायदे बताते हुए गिनाए।

उन्होंने कहा, “अगर हम उर्वरकों का खाद का करेंगे तो हम भूमि माता को भूल जाएँगे। जितनी जल्दी हम जैविक, प्राकृतिक खेती की ओर रुख करेंगे, हमारे लिए उतना ही बेहतर होगा।” उन्होंने गोवंश की देशी नस्लों की वकालत भी की और। उन्होंने इसके अर्थव्यवस्था और खेती में महत्व पर भी बात की।

प्रोफ़ेसर कामकोटी के इस बयान पर DMK और कॉन्ग्रेस नेता भड़क गए। कॉन्ग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने इसे झूठा विज्ञान और गलत करार दिया। DMK के एक नेता ने इसे देश में शिक्षा व्यवस्था को बर्बाद करने का प्रयास बताया। तमिलनाडु के बाकी पेरियार समर्थक संगठनों ने इस बयान पर माफी की माँग की। उन्होंने प्रदर्शन की भी धमकी दी।

प्रोफ़ेसर कामकोटी के बयान का तमिलनाडु भाजपा अध्यक्ष के अन्नामलाई ने बचाव किया है और इसके राजनीतिकरण ना किए जाने की अपील की है। उन्होंने कहा, “IIT मद्रास के डायरेक्टर क्वांटम फिजिक्स के विशेषज्ञ हैं और वे शीर्ष सरकारी एजेंसियों के सदस्य भी रहे हैं। वह अपनी धार्मिक मान्यताओं और गाय के प्रति सम्मान में दृढ़ हैं, जो कहीं से गलत नहीं है।”

अन्नामलाई ने आगे कहा, “उन्होंने किसी को गाय का मूत्र पीने के लिए मजबूर नहीं किया और केवल अपनी मान्यताओं को व्यक्त किया। हमें ऐसे बयानों का राजनीतिकरण नहीं करना चाहिए। IIT-M के डायरेक्टर तमिलनाडु से हैं, जो हमारे प्रदेश के लिए गर्व की बात है। मैं उन्हें जानता हूँ और मैं इसका राजनीतिकरण नहीं करना चाहता।”

क्या आतंकी मुस्लिम तुष्टिकरण करने वालों के सरपरस्त होते हैं? जिसने मार डाला 58 भारतीय लोगों को… उस आंतकी के जनाजे में शामिल मुस्लिम भीड़ के साथ कई विधायक-नेता-एक्टर: अनहोनी से बचने के लिए तैनात रहे 2000+ पुलिसकर्मी

                  आतंकी एस ए बाशा को अंतिम विदाई (फोटो साभार: X_MeghUpdates/newstaglive)
एस ए बाशा के जनाजे में हज़ारों मुस्लिमों के साथ-साथ नेताओं और एक्टरों के शामिल होने ने फिर साबित कर दिया कि आतंकवाद का मजहब होता है। लाख टीवी चौपालों में बैठ कट्टरपंथी कहे कि 'आतंकवाद का कोई मजहब नहीं होता', कोई एंकर यह पूछने की हिम्मत नहीं करता कि अगर आतंकवाद का कोई फिर किसी भी आतंकी के जनाजे में ये जमावड़ा करने वाले कौन? आखिर कब तक इस दोगलेपन से जनता को गुमराह किया जाता रहेगा? क्या कोई भी आतंकवादी मुस्लिम तुष्टिकरण करने वालों का आका होता हैं?        

साल 1998 में कोयंबटूर में सीरियल ब्लास्ट हुए थे। इन धमाकों में 58 लोगों की जान चली गई थी, तो 231 लोग घायल हो गए थे। इन धमाकों के पीछे अल-उम्मा नाम के कट्टरपंथी संगठन का नाम आया था, जिसे बैन कर दिया गया। इसी संगठन का मुखिया था एस ए बाशा, जो उन सीरियल ब्लास्ट के मुख्य कर्ता-धर्ताओं में से एक था। उसे उम्रकैद की सजा मिली थी। एसए बाशा दुर्दांत आतंकियों में था, जिसने 2003 में गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी को भी जान से मारने की धमकी थी। एसए बाशा की सोमनार (16 दिसंबर 2024) को अस्पताल में मौत हो गई थी, और अगले दिन (17 दिसंबर 2024) उसे दफनाया गया।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, एस ए बाशा नाम के आतंकी को अंतिम विदाई देने के लिए हजारों लोग पहुँचे। उसे किसी ‘हीरो’ की तरह विदाई दी गई, जबकि उसने तमिलनाडु को कई बार आतंकी हमलों का दर्द दिया। उसकी आखिरी विदाई के लिए पूरे कोयंबटूर में 2000 पुलिसवालों और 200 आरएएफ जवानों की तैनाती की गई। इतनी भारी सुरक्षा में उसका विदाई जुलूस निकाला गया और किसी ‘शहीद’ जैसी विदाई दी गई।

आतंकी एसए बाशा की अंतिम यात्रा पर वरिष्ठ पत्रकार राहुल शिवशंकर ने ट्वीट किया। उन्होंने लिखा, “कोयंबटूर, तमिलनाडु में इस्लामी आतंकी एस.ए. बाशा की शवयात्रा निकाली जा रही है। ये वही आतंकी है जो 1998 कोयंबटूर धमाकों का मास्टरमाइंड था, जिसमें 58 भारतीयों की जान गई थी। ये पाकिस्तान या बांग्लादेश में नहीं, बल्कि भारत में हो रहा है। न कोई ‘शांतिप्रिय’ इसे लेकर आवाज उठा रहा है, न ‘धर्मनिरपेक्षता’ का झंडा लहराने वाले कुछ कह रहे हैं। ‘संवैधानिकता’ के ठेकेदार तो संविधान के नाम पर अपनी राजनीति में व्यस्त हैं!”

हैरानी की बात नहीं है कि इस्लामिक कट्टरपंथी धड़ों, राजनीतिक पार्टियों के नेता उसकी अंतिम यात्रा में पहुँचे। यही नहीं, खुद को तमिलियन नेशनल कहने वाली पार्टी के सबसे बड़े नेता सीमान ने तो यहाँ तक कह दिया कि डीएमके सरकार को एसए बाशा को पहले ही रिहा कर देना था, जोकि डीएमके सरकार के हाथ में था। ऐसा न करने के लिए डीएमके सरकार की आलोचना भी की गई।

हालाँकि बाशा को पैरोल देकर अस्पताल में रखने वाले इन्हीं मुख्यमंत्री एमके स्टालिन के पिता करुणानिधि जब मुख्यमंत्री थे, तब बाशा के साथी आतंकवादी को जेल में मालिक तक की सुविधा दी जाती थी। आईए, अब बताते हैं कि कौन से बड़े नेता इस आतंकवादी की आखिरी यात्रा में पहुँचे, जो उसके दक्षिण उक्कड़म स्थित रोज गार्डन वाले घर से शुरू होकर फ्लावर मार्केट स्थित हैदर अली टीपू सुल्तान सुन्नथ जमात मस्जिद तक गई।

1- एनटीके नेता सीमान- सीमान तमिल एक्टर हैं और नाम तमिलार काची नाम की राजनीतिक पार्टी चलाते हैं। वो तमिल पहचान, भाषा, स्वायत्तता की बात करते हैं। तमिल ईलम जैसे बैन आउटफिट के समर्थक भी हैं। उन्होंने डीएमके सरकार को ये कहते हुए बयान दिया है कि आतंकवादी एसए बाशा को पहले ही डीएमके सरकार जेल से निकाल सकती थी।

2- कोंगु इलैगनार पेरावई पार्टी के अध्यक्ष यू थानियारसु। इनकी पार्टी तमिलनाडु के अंदर भी क्षेत्रीय पार्टी है और AIADMK-DMK के बीच झूलती रहती है। थानियारसु AIADMK के टिकट पर 2 बार विधायक भी रहे हैं।

3- वीसीके के उप महासचिव वन्नी अरासु: VCK यानी विदुथलाई चिरुथैगल काची, इस पार्टी को दलित पैंथर्स पार्टी या दलित पैंथर्स इयक्कम यानी आंदोलन भी कहा जाता है। कहने को ये पार्टी दलित और तमिल राष्ट्रवाद की बात कहती है, लेकिन पार्टी के उप महासचिव वन्नी अरासु आतंकवादी को अंतिम विदाई देने पहुँचे।

4- मणिथानेया मक्कल काची के महासचिव और मन्नापरई विधायक पी अब्दुल समद: स्थानीय विधायक पी अब्दुल समद, एसए बाशा का करीबी रहा है। अल-उम्मा के बैन होने के बाद इसके जुड़े सदस्यों ने कट्टरपंथी संगठन की जगह एमकेके नाम से इस्लामी पार्टी बनाई। ये पार्टी AIADMK के बाद DMK के साथ गठबंधन में है और इस पार्टी के 2 विधायक हैं।

इस पार्टी का अध्यक्ष एम एच जवाहिरुद्दीन है। जवाहरुद्दीन सिमी का सदस्य भी रहा है और एसए बाशा का बेहद करीबी भी। वो राज्य में 25 से ज्यादा इस्लामिक ट्रस्ट, सोसायटी चलाता है और मजहबी दान के नाम पर एंबुलेस सेवा भी देता है।

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इन नेताओं के अलावा कई छोटे-बड़े छुटभैय्ये नेता भी एसए बाशा जैसे दोषी पाए गए और उम्रकैद की सजा काट रहे आतंकवादी को आखिरी विदाई देने पहुँचे। खास बात ये है कि तमिलनाडु में इस्लामिक आतंकवाद को बढ़ाने वालों में से एक रहे बाशा की आखिरी यात्रा निकालने की योजना का बीजेपी ने विरोध किया था, लेकिन डीएमके सरकार ने आतंकवादी की न सिर्फ शान से विदाई यात्रा निकाली, बल्कि ‘हीरो’ की तरह विदाई देने जनाजे में उमड़ी भीड़ को मैनेज करने के लिए 2000-2200 जवानों की सेवाएँ भी उपलब्ध कराई।