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जंतर-मंतर हिंसा: शांतिपूर्ण आंदोलन के दावों के बीच लहूलुहान वर्दी का सच; आयोजकों को हिरासत में लेकर पूछा जाए "गुंडों को किसने बुलाया?"


देश की राजधानी दिल्ली का जंतर-मंतर, जो लंबे समय से जन-आंदोलनों और असहमति की आवाज़ उठाने का केंद्र रहा है, हाल ही में एक भीषण हिंसात्मक टकराव का गवाह बना। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) ने पेपर लीक को लेकर आयोजित इस विरोध-प्रदर्शन को पूरी तरह से शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक बताया था। हालांकि, ‘संसद चलो’ मार्च के दौरान उग्र हुई भीड़ और उसके बाद सामने आए तथ्यों ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दावों पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

जब तक आयोजकों को हिरासत में लेकर सख्ती से यह नहीं पूछा जाए कि छात्रों के प्रदर्शन में गुंडों का क्या काम था? किसके कहने पर गुंडे आए? दिल्ली हिन्दू दंगा के आरोपितों की रिहाई की आवाज़ किसके कहने पर उठी थी? ये प्रदर्शन NEET को लेकर हुआ था या इन आरोपियों की रिहाई के लिए? क्या ये प्रदर्शन सनातन को बदनाम करने के लिए था? क्योकि जिस तरह की हिंसा हुई वह कोई साधारण हिंसा नहीं थी, नेपाल, श्रीलंका और बांग्लादेश में हुए हंगामे की तरह ही था। पुलिस तो अपना काम कर रही है लेकिन निचली अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक को इस प्रायोजित हिंसा को हल्के में नहीं लेना चाहिए।     

प्रदर्शन के दौरान कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए तैनात दिल्ली पुलिस के कई अधिकारियों और जवानों पर जानलेवा हमले हुए, जिनमें 180 से अधिक पुलिसकर्मी और दर्जनों प्रदर्शनकारी घायल हो गए। इस दौरान भारी सुरक्षा बैरिकेड्स तोड़े गए, पत्थरबाजी हुई और सरकारी वाहनों को नुकसान पहुँचाया गया। इस पूरी घटना ने उस समय एक नया और संवेदनशील मोड़ ले लिया, जब ड्यूटी पर घायल हुए पुलिसकर्मियों के परिजनों ने मीडिया के सामने आकर अपनी आपबीती साझा की।

 घायलों के परिजनों ने आरोप लगाया कि छात्रों के अधिकारों की आड़ में आए उपद्रवियों द्वारा ऑन-ड्यूटी सुरक्षा बलों पर बर्बर हमले किए गए और बाद में सोशल मीडिया पर पुलिस को ही खलनायक बनाकर पेश करने की कोशिश की गई। पीड़ितों के परिवारों का कहना है कि वर्दी पहनने का मतलब मानवाधिकारों का त्याग करना नहीं होता। इस मामले में अब पुलिस कर्मियों के परिवारों ने भी देश की सर्वोच्च अदालत का रुख किया है, जिससे इस मुद्दे ने सामाजिक, कानूनी और राजनीतिक रूप से एक बड़ा आकार ले लिया है।

घायल पुलिसकर्मियों के परिवारों की आपबीती: “जब खून से लथपथ घर पहुंचे हमारे अपने”
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान परिजनों ने अपनी आपबीती साझा की। सेवानिवृत्त सैनिकों के बच्चों, अधिकारियों की पत्नियों और युवा छात्रों ने मीडिया के सामने घटना वाले दिन के जो संस्मरण रखे, वे दिल दहला देने वाले थे।

मरीन कमांडो रहे सब-इंस्पेक्टर की बेटी: “पिता की लिंचिंग की कोशिश की गई”
नेवी में 15 वर्षों तक मरीन कमांडो के रूप में देश सेवा करने के बाद दिल्ली पुलिस में कार्यरत सब-इंस्पेक्टर (SI) की बेटी ने भावुक होकर बताया कि उनके पिता मुख्य बैरिकेड्स पर तैनात थे। उन्होंने कहा: “मेरे पिता अक्सर कहते थे कि यह केवल छात्रों का आंदोलन नहीं रह गया है, इसमें कई असामाजिक तत्व शामिल हो चुके हैं। 25 तारीख को दोपहर लगभग 2 बजे जंतर-मंतर मंच के पास उग्र भीड़ ने मेरे पिता को घसीटा और उनकी लिंचिंग की कोशिश की। वह RML अस्पताल में चार घंटे तक बेहोश रहे और जब देर रात उनके साथी उन्हें घर लाए, तो उनकी वर्दी खून से सनी हुई थी… जब मैंने सोशल मीडिया खोला, तो देखा कि मेरे ही पिता को क्रिमिनल कहा जा रहा था। जिन लोगों ने उन पर हमला किया, वही सुप्रीम कोर्ट चले गए। इसलिए हमने भी न्याय के लिए सर्वोच्च न्यायालय का रुख किया है।”

सब-इंस्पेक्टर की बेटी ने यह भी दोहराया कि उनके पिता अक्सर घर आकर यह चिंता जताते थे कि आंदोलन को उग्र तत्वों द्वारा हायजैक कर लिया गया है। 25 तारीख को हुए लिंचिंग के प्रयास और 4 घंटे तक बेहोश रहने के बाद जब उन्हें घर लाया गया, तो परिवार पूरी तरह सदमे में था।

घायल एसीपी (ACP) की पत्नी: “दो साल की बच्ची और मेरे लिए वह पल दर्दनाक था”
20 जुलाई की घटना का जिक्र करते हुए एक घायल एसीपी की पत्नी ने अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहा: 20 जुलाई की देर रात जब मेरे पति घायल अवस्था में घर लौटे, तो वह क्षण मेरे और हमारी दो साल की बेटी के लिए बेहद दर्दनाक था। हम यहां अपने परिवार का दर्द साझा करने आए हैं क्योंकि पुलिसकर्मियों के परिवारों का भी इस देश में न्याय पाने का बराबर अधिकार है।”

युवा पीढ़ी की अपील: “हम भी जेन-जी हैं, हमारी बात भी सुनी जाए”
हिंसा में घायल जवानों के बच्चों, जो स्वयं छात्र और जेन-जी (Gen-Z) पीढ़ी का हिस्सा हैं, ने भी सार्वजनिक रूप से अपनी आवाज़ उठाई। उन्होंने देश के नागरिकों और मीडिया से अपील की कि वे हिंसा का शिकार हुए पुलिसकर्मियों के बच्चों का दर्द भी समझें।

1971 युद्ध के दिग्गज के पोते व ASI के बेटे का बयान: “अचानक हुआ जानलेवा पथराव”
चार वीरता पुरस्कार प्राप्त कर चुके एक एएसआई (ASI) के बेटे लक्ष्य सिंह बिष्ट ने बताया कि उनके दादाजी BSF में थे और उन्होंने 1971 के युद्ध में भाग लिया था। उन्होंने बताया: “मेरे पिता बैरिकेड्स पर तैनात थे। अचानक उग्र भीड़ ने बिना किसी उकसावे के पत्थरबाजी शुरू कर दी। जब वे अपने वरिष्ठ अधिकारियों को सुरक्षित स्थान पर ले जा रहे थे, तभी एक भारी पत्थर उनके सिर पर लगा। जब मैंने अस्पताल में उनकी तस्वीर देखी, तो उनके सिर पर चार टांके लगे थे।”

33 साल से सेवारत ASI की पत्नी: “गमले और कांच की बोतलें फेंकी गईं”
33 वर्षों से पुलिस सेवा में कार्यरत एक अन्य एएसआई की पत्नी ने बताया कि उनके पति 20 जुलाई को संसद की ओर बढ़ रही भीड़ को रोकने के लिए तैनात थे। “शाम को मुझे खबर मिली कि वे LNJP अस्पताल में भर्ती हैं। उन्होंने बताया कि भीड़ में शामिल उपद्रवियों ने पुलिसकर्मियों पर गमले, पत्थर, जूते और कांच की बोतलें फेंकी और सुरक्षा बैरिकेड्स तोड़ डाले।”

राहुल गांधी से पूछा गया सवाल, तो कहा: “आप बीजेपी से हैं”
घायल पुलिसकर्मियों के परिजनों द्वारा की गई प्रेस कॉन्फ्रेंस के बाद जब मीडियाकर्मियों ने कांग्रेस नेता और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से इस संबंध में प्रतिक्रिया जाननी चाही, तो एक नया विवाद खड़ा हो गया। परिजनों ने सवाल उठाया था कि जिस संसद की रक्षा करते हुए पुलिसकर्मी घायल हुए, उन्हें ‘गुंडे’ कैसे कहा जा सकता है। हालांकि, जब एक पत्रकार ने इस बाबत राहुल गांधी से सवाल किया, तो उन्होंने सवाल का जवाब देने के बजाय पत्रकार पर ही तंज कसते हुए कह दिया कि “आप बीजेपी से हैं।” आलोचकों और सोशल मीडिया पर यह तर्क दिया जा रहा है कि जब भी कोई सवाल राजनीतिक रूप से असुविधाजनक होता है, तो पत्रकारों पर किसी खास पार्टी का होने का ठप्पा लगा दिया जाता है। इस वाकये के बाद प्रेस की आजादी के बड़े-बड़े दावे करने वाली विपक्षी राजनीति और उनकी कार्यशैली पर भी सवाल उठने लगे हैं।

CJP का दावा बनाम पुलिस का पक्ष
जंतर-मंतर पर घटित इस घटनाक्रम ने आयोजकों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दावों और पुलिस प्रशासन द्वारा प्रस्तुत किए गए जमीनी तथ्यों के बीच एक बड़ा विरोधाभास पैदा कर दिया है।

CJP और आयोजकों का दावा: आयोजकों का तर्क है कि उनका आंदोलन परीक्षा प्रणाली में सुधारों और छात्र हितों को लेकर पूरी तरह अहिंसक और लोकतांत्रिक था। उन्होंने आरोप लगाया कि पुलिस प्रशासन ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को रोकने के लिए अत्यधिक बल प्रयोग, लाठीचार्ज और आंसू गैस के गोले छोड़े, जिससे छात्र घायल हुए।

दिल्ली पुलिस प्रशासन का आधिकारिक पक्ष: पुलिस जांच और डिजिटल सर्विलांस के आंकड़ों के अनुसार, भीड़ की आड़ में कई उग्र तत्व शामिल थे। पुलिस का कहना है कि जब भीड़ ने संसद भवन की ओर जबरन बढ़ने और सुरक्षा घेरा तोड़ने का प्रयास किया, तब कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए अनुपातिक बल प्रयोग अनिवार्य हो गया था।

सुरक्षा बलों के मानवाधिकार और सुप्रीम कोर्ट की कानूनी कार्यवाही
जंतर-मंतर हिंसा का मामला अब भारत के सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है। इस मामले ने सुरक्षा बलों के मानवाधिकारों पर एक राष्ट्रीय कानूनी बहस शुरू कर दी है:

अनुच्छेद 21 और ऑन-ड्यूटी जवानों के अधिकार: याचिका में कहा गया है कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 (जीवन और शारीरिक सुरक्षा का अधिकार) जितना आम नागरिकों पर लागू होता है, उतना ही ऑन-ड्यूटी पुलिस अधिकारियों पर भी लागू होता है। भीड़ द्वारा जानलेवा हमला करना उनके मौलिक अधिकारों का हनन है।

सुप्रीम कोर्ट के निर्देश: मामले की सुनवाई के दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया है कि घटना से जुड़े सभी सीसीटीवी (CCTV) फुटेज, ड्रोन फुटेज और बॉडी-वर्न कैमरों की रिकॉर्डिंग को सुरक्षित रखा जाए। इसके साथ ही कोर्ट ने हिंसा की निष्पक्ष और पारदर्शी जांच पर जोर दिया है।

आयोजकों की जवाबदेही: कोर्ट इस पहलू पर भी विचार कर रहा है कि यदि अनुमति प्राप्त प्रदर्शन हिंसक रूप लेता है, तो आयोजकों की नागरिक व आपराधिक जवाबदेही तय की जानी चाहिए ताकि भविष्य में आंदोलनों की आड़ में कानून-व्यवस्था को नुकसान न पहुंचाया जा सके।

उत्तर प्रदेश : किस ‘शर्त’ पर चुनावों में सपा के समर्थन को तैयार हैं स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद, क्यों हिंदू विरोधी अतीत को दे रहे हैं ‘क्लीनचिट’?

      स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की आरती करतीं डिंपल यादव और अखिलेश यादव (फोटो साभार: X/Dimple Yadav)
जैसे-जैसे उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव निकट आ रहे हैं, सनातन को अपमानित करने वाली समाजवादी पार्टी ने कालनेमि बन हिन्दुओं को गुमराह करने साधु-संतों की शरण में जाना शुरू कर दिया है। हिन्दू यह भी नहीं भुला कि किस तरह समाजवादी नेता रामायण के पृष्ठ फाड़ रहे थे, सनातन के विरुद्ध बयानबाज़ी कर रहे थे और आज सत्ता पाने उसी सनातन की शरण में जा रही है। लेकिन हिन्दुओं को इन सनातन विरोधियों से बंगाल की तरह दूरी बनानी होगी।       
गाय को ‘राष्ट्रमाता’ का दर्जा दिलाने और गौहत्या पर प्रतिबंध की माँग को लेकर निकाली जा रही स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की ‘गविष्ठी यात्रा’ लगातार चर्चाओं में है। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की यात्रा को लेकर यह सवाल उठ रहे थे कि इसे समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस ने हाईजैक तो नहीं कर लिया है। अब अखिलेश यादव के एक बयान के बाद विवाद और बढ़ गया है।

दरअसल, अखिलेश यादव ने शुक्रवार (12 जून 2026) को एटा में कहा कि शंकराचार्य भी PDA हो गए हैं। विधानसभा चुनाव 2026 में टिकट बँटवारे को लेकर पूछे गए एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा, “पूजनीय शंकराचार्य जी भी पीड़ित, दुखी, अपमानित हो रहे हैं इस सरकार में। वह भी PDA हो गए हैं, इसलिए हम उनके साथ हैं।” अखिलेश यादव के इस बयान और यात्रा में सपा नेताओं के शामिल होने पर उठ रहे सवालों को लेकर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के मीडिया प्रभारी संजय पांडेय ने ऑपइंडिया से बात की है।

गलफहमी ना पालें अखिलेश: स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का पक्ष

3 मई 2026 से शुरू हुई इस 81 दिवसीय यात्रा को लेकर संजय पांडेय ने कहा कि यात्रा को लेकर जनता का रुख सकारात्मक है और यात्रा के बाद से मुस्लिम और ईसाई भी समर्थन में आ गए हैं। वहीं, अखिलेश यादव के बयान पर उन्होंने कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने कहा, “अगर ऐसा कुछ भी अखिलेश जी ने बयान दिया है कि महाराज जी PDA का हिस्सा हो गए हैं, तो ये उनकी गलतफहमी है। महाराज जी सिर्फ सनातन धर्म के हैं। वो किसी राजनीतिक दल के नहीं हैं।”

हालाँकि, उन्होंने कहा, “अगर PDA अभी यह घोषणा कर दे कि सरकार बनने पर गाय को ‘राज्य माता’ घोषित किया जाएगा और गौकशी पर पूरी तरह रोक लगाई जाएगी, तो उन्हें शंकराचार्य जी का समर्थन और आशीर्वाद मिलेगा। वे और उनके समर्थक PDA के साथ खड़े होंगे। लेकिन अगर ऐसा नहीं किया गया तो शंकराचार्य जी का समर्थन उन्हें नहीं मिलेगा।”

संजय पांडेय ने कहा, “यह किसी विशेष दल का समर्थन करने का मामला नहीं है। अगर बीजेपी, कॉन्ग्रेस या PDA कोई भी दल अपने घोषणा पत्र में गाय को राज्य माता घोषित करने और गोकशी बंद कराने का लिखित व सार्वजनिक वादा करेगा तो उन्हें समर्थन दिया जाएगा। यह मुद्दा किसी पार्टी का नहीं बल्कि गौ माता के प्राणों की रक्षा का है।”

सपा-कांग्रेस के नेताओं के यात्रा में शामिल होने पर क्या बोले अविमुक्तेश्वरानंद के मीडिया प्रभारी?

स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद की यात्रा को लेकर यह सवाल पूछा जा रहा है कि कहीं उनकी यात्रा को उत्तर प्रदेश में विपक्षी दलों ने हाईजैक तो नहीं कर लिया है। दरअसल, उनकी यात्रा के मंचों पर सपा और कांग्रेस के नेता खूब नजर आ रहे हैं और स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का रुख सरकार को लेकर गोरक्षा के विषय से आगे बढ़कर आक्रामक नजर आ रहा है।

कुछ दिनों पहले उनकी यात्रा जब इटावा के सैफई पहुँची तो उनके मंच पर अखिलेश यादव की सांसद पत्नी डिंपल यादव और उनके चाचा शिवपाल यादव नजर आए थे। इस दौरान उन्होंने मुलायम सिंह यादव के परिवार की न सिर्फ जमकर तारीफ की बल्कि मुलायम सिंह को ‘संतों का सम्मान करने वाला’ और ‘दशकों पुराना सच्चा हितैषी’ तक करार दे दिया।

उन्होंने अखिलेश यादव और डिंपल यादव को ‘बड़े दिल वाला’ बताते हुए मुलायम सिंह यादव द्वारा पूर्व में स्वामी स्वरूपानंद सरस्वती की गिरफ्तारी का भी एक तरह से बचाव कर डाला था। इस बारे में भी संजय पांडेय ने स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद का रुख स्पष्ट किया है।

संजय पांडेय ने कहा, “किसी भी राजनीतिक दल वाले आ रहे हैं तो वो सनातनी ही हैं। जब मुस्लिम समर्थन कर रहे हैं, गौ माता को राष्ट्र माता बोल रहे हैं जबकि उनके धर्म में पशु माना जाता है। तो जब वो तैयार हो गए हैं, किसी भी राजनीतिक पार्टी का हिंदू अगर आ रहा है, तो उसका स्वागत है। उसमें भाजपा के भी लोग आएँ, उनके लिए भी कोई रोक नहीं है।”

‘सपा के हिंदू विरोधी अतीत’ से जुड़े सवालों पर उन्होंने कहा, “शंकराचार्य जी महाराज, परंपरा से जुड़े हुए हैं और सपा की सच्चाई भी इनको मालूम है। सपा जहाँ गड़बड़ है, सपा जो गलत कर रही है धर्म विरोधी, तो सपा का भी विरोध रहेगा। अभी जब राजकुमार भाटी ने बयान दिया था ब्राह्मणों और धर्म के खिलाफ तो महाराज श्री ने उनकी भी निंदा की थी और कहा था कि समाजवादी पार्टी को जनता ठीक कर देगी।”

उन्होंने कहा, “जितना धर्म के अंश में वह काम करेंगे, उतना ही शंकराचार्य जी का उनके साथ समर्थन रहेगा, आशीर्वाद रहेगा। जो भी अधर्म करेगा, यहाँ तक कि हम शिष्य भी अगर अधर्म करेंगे तो हम लोग को वह मार के भगा देंगे। शंकराचार्य जी को केवल शास्त्र और धर्म से मतलब है और किसी से कोई उनका और मतलब नहीं है। अगर कोई ऐसा सोचता है तो उसकी मूर्खता है।”

वहीं, मजहबी आधार पर आरक्षण की माँग करने वाली पार्टियों को लेकर सवाल पूछे जाने पर उन्होंने हर तरह के आरक्षण का विरोध करने की बात कही हैं। उन्होंने कहा, “हम लोग तो किसी आधार पर आरक्षण नहीं चाहते हैं। किसी भी मजहब या किसी भी तरह से, आरक्षण से हम लोग का देश नष्ट ही हो जाएगा। शंकराचार्य जी का मानना है कि आरक्षण नहीं होना चाहिए।”

जिन्ना के कदमों पर भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर रावण, दलितों के लिए माँगा ‘अलग निर्वाचक मंडल’: अंबेडकर ने खुद विरोध कर संविधान में लगाया था प्रतिबंध


भारत में हिन्दू सम्राट पृथ्वीराज चौहान के बाद 500 साल मुगलों ने.. 200 साल अंग्रेजों ने और 70 साल कांग्रेस ने शासन किया फिर 770 साल दलितों का शोषण सवर्णों ने कैसे किया? हमारे देश में ऐसा नेता है जो महाज्ञानी रावण को बदनाम कर रहा है जिसके पीछे चन्द्रशेखर "रावण" लगता है। रावण एक ऐसा महाज्ञानी पंडित था जिसने माता सीता को छुआ तक नहीं और एक ये कलयुग का "रावण" है जिसने एक दलित बेटी का बार बार शोषण किया है। आज ये जिस प्रकार दलितों को बली का बकरा बना कर शांति दूतों से क*ट*वा रहा है। और एक शब्द तक नहीं बोलता क्योंकि कहीं इसके वोट बैंक को बुरा न लग जाए। 
भारत में जब मुग़ल आक्रांता और ब्रिटिश आये थे अपने साथ कोई फौज नहीं लेकर आए थे क्योकि उनको मालूम था कि भारत में बिकाऊ जयचन्दों और मीर ज़ाफरों की कोई कमी नहीं। एक ठूंठोंगे हज़ार मिल जाएंगे। वही भूमिका हमारे कुछ सांसद और पार्टियां निभा रही है। जो देश को जाति और मजहब के नाम पर तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं। किसी में यह कहने की हिम्मत नहीं कि सभी भारतीय हैं और सबको समान अधिकार मिलने चाहिएं। 

दूसरे, आंबेडकर की माला जपने वाले देश को बताएं कि क्या आंबेडकर ने आरक्षण मांगने पर इसके दुरूपयोग होते देख ख़त्म करने के लिए नहीं बोला था? फिर उसी आरक्षण पर इतना बवाल क्यों? इसमें दोषी जनता भी है जो जाति आधारित पार्टियों को वोट देती है। इतना ही नहीं जितनी भी पार्टियां है सभी इस जहर को परोस रही हैं। देश में ऐसी कौन-सी पार्टी है जिसने अल्पसंख्यक प्रकोष्ठ और अनुसूचित जनजाति प्रकोष्ठ नही बनाया हुआ। किसी भी पार्टी में इन प्रकोष्ठों को बंद करने की हिम्मत नहीं। जब हमाम में सभी नंगे है फिर एक-दूसरी पार्टी पर दोषारोपण क्यों? फिर कहते हैं कि हम भारतीय हैं। जब सभी भारतीय हैं तो इन प्रकोष्ठों की नौटंकी क्यों? आखिर इस नौटंकी की कब राम नाम सत्य होगी।        

भीम आर्मी चीफ चंद्रशेखर रावण ने लोकसभा में विवादित बयान दिया है। उन्होंने कहा है कि अगर सरकार सचमुच में पिछड़ों, महिलाओं और दलितों को सशक्त बनाना चाहती है तो उनके लिए अलग निर्वाचक मंडल लागू करे।

उन्होंने कहा कि आरक्षण इन लोगों को सशक्त बनाने में सफल नहीं हो पाया है और यह महज एक नारा बनकर रह गया है। उन्होंने तर्क दिया कि सामाजिक न्याय प्राप्त करने के लिए, आधे-अधूरे नारों पर निर्भर रहने के बजाय, समस्याओं के पूर्ण, साहसिक और सीधे समाधान की ओर बढ़ना अनिवार्य है।  

नगीना से लोकसभा सांसद ने बीएसपी संस्थापक कांशी राम और उनकी पुस्तक ‘चमचा युग’ का हवाला देते हुए दावा किया कि आरक्षित सीटों से चुने गए प्रतिनिधि व्यवस्था के भीतर काम करने के लिए मजबूर होते हैं। ये लोग अपने समुदाय की तुलना में अपनी पार्टी के प्रति ज्यादा वफादार होते हैं।

उन्होंने कहा, “इसलिए एक अलग निर्वाचक मंडल ही एक मात्र व्यवहार्य समाधान है।”

दरअसल संसद में दिए गए चंद्रशेखर रावण के बयान न केवल गैरकानूनी हैं, बल्कि भारतीय संविधान के मूलभूत सिद्धांतों के खिलाफ भी है। इतना ही नहीं यह गणतंत्र के संस्थापकों की परिकल्पना ‘भारत के विचार’ के भी विपरीत है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि अनुच्छेद 325 धर्म, जाति, लिंग या अन्य कारकों पर आधारित ऐसी सिफारिशों को सिरे से खारिज करता है।

संविधान के अनुच्छेद 325 में प्रावधान

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 325 में स्पष्ट रूप से कहा गया है, “संसद के किसी भी सदन या राज्य के विधानमंडल के किसी भी सदन के चुनाव के लिए प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र के लिए एक सामान्य मतदाता सूची होगी और कोई भी व्यक्ति केवल धर्म, जाति, नस्ल, लिंग या इनमें से किसी भी आधार पर ऐसी किसी भी सूची में शामिल होने के लिए अयोग्य नहीं होगा या ऐसे किसी भी निर्वाचन क्षेत्र के लिए किसी विशेष मतदाता सूची में शामिल होने का दावा नहीं करेगा। ”

1948 के संविधान के मसौदे में अनुच्छेद 289ए शामिल नहीं था, जिसे बाद में अनुच्छेद 325 के रूप में अधिनियमित किया गया। 16 जून 1949 को, मसौदा समिति के अध्यक्ष ने यह प्रावधान पेश किया। इसमें निर्दिष्ट किया गया कि राज्य विधान सभाओं और संसद के चुनावों के लिए प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र में एक ही मतदाता सूची होगी।

इसके अलावा, लिंग, जाति, नस्ल या धर्म के आधार पर किसी भी व्यक्ति को सूची से बाहर नहीं रखा जाएगा। इसका उद्देश्य अलग निर्वाचक मंडल की संभावना को पूरी तरह समाप्त करना था। इसे उसी दिन बिना किसी बहस के सर्वसम्मति से अनुमोदित कर दिया गया।

डॉ. भीमराव रामजी अंबेडकर ने संविधान को प्रतिपादित किया था। उस संविधान के मूलभूत सिद्धांतों में से एक के लिए दिया गया यह निर्णायक समर्थन दर्शाता है कि देश ने हमेशा प्रत्येक नागरिक के लिए निष्पक्ष और न्यायपूर्ण चुनावी समानता का समर्थन किया है। अंग्रेजों ने सांप्रदायिकता और अलग-अलग निर्वाचक मंडल का जो बीज भारत में बोया, उसे अस्वीकार किया गया। अखिल भारतीय मुस्लिम लीग द्वारा प्रस्तावित और उपनिवेशवादियों द्वारा समर्थित हिंसक भारत विभाजन की पृष्ठभूमि में इस निर्णय का महत्व और भी बढ़ गया।

अंबेडकर ने अलग निर्वाचक मंडल का किया था विरोध

संविधान सभा की बहस के दौरान संविधान निर्माता डॉ भीमराव अंबेडकर ने अलग- अलग निर्वाचक मंडल बनाए जाने को अस्वीकार कर दिया था।

आधुनिक भारत के निर्माताओं ने दिसंबर 1946 और जनवरी 1950 के बीच आयोजित संविधान सभा की बहसों के दौरान इस बात पर जोर दिया कि लोकतंत्र सांप्रदायिक विभाजन के बजाय सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार और ‘एक व्यक्ति, एक वोट’ की अवधारणा पर केंद्रित होना चाहिए।

संविधान के सूत्रधार अंबेडकर ने अनुच्छेद 289ए पर चर्चा के दौरान कहा, “इसका उद्देश्य केवल सदन के उस निर्णय को लागू करना है कि अब से कोई अलग निर्वाचक मंडल नहीं होगा। वास्तव में, यह खंड अनावश्यक है क्योंकि बाद के संशोधनों द्वारा हम मसौदा संविधान में निहित उन प्रावधानों को हटा देंगे जिनमें मुसलमानों, सिखों, एंग्लो-इंडियन आदि के प्रतिनिधित्व का प्रावधान है।”

साभार- संविधान सभा की बहसें (खंड 8) (स्रोत: constitutionofindia.net)

अंबेडकर ने आगे कहा, “इसलिए इसकी कोई आवश्यकता नहीं है। लेकिन यह भावना है कि चूँकि हमने एक बहुत महत्वपूर्ण निर्णय लिया है, जो व्यावहारिक रूप से अतीत को निरस्त कर देता है, इसलिए बेहतर है कि संविधान में इसे स्पष्ट रूप से बताया जाए। यही कारण है कि मैंने यह संशोधन पेश किया है।”

जब उनसे पूछा गया कि क्या उद्देश्य संशोधन को पारित कराना था, तो अंबेडकर ने उत्तर दिया कि वह अपने प्रस्ताव के पीछे के तर्क को व्यक्त करना चाहते थे, और यह बताना चाहते थे कि पृथक निर्वाचक मंडलों को अस्वीकार करने को लेकर वे कितने दृढ़ हैं।

इसके बाद, धर्म, जाति या नस्ल के आधार पर अलग-अलग चुनावी अभिलेखों को रोकने, सभी नागरिकों के लिए समान राजनीतिक अधिकारों की गारंटी देने और एक समान चुनावी प्रक्रिया के माध्यम से राष्ट्रीय एकता और सामाजिक एकीकरण को बढ़ावा देने के लिए अनुच्छेद 325 को अपनाया गया।

पृथक निर्वाचक मंडल वाली बीज अंग्रेजों ने बोए

पृथक निर्वाचक मंडल की उत्पत्ति ब्रिटिश भारत में हुई। अंग्रेजों ने इस्लामी कट्टरपंथियों की सांप्रदायिक योजनाओं को आगे बढ़ाने के लिए उनकी मांगों को स्वीकार कर लिया। ब्रिटिश संसद के भारतीय परिषद अधिनियम 1909 में मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचक मंडल बनाने का प्रस्ताव था। इसे मार्ले-मिंटो सुधार अधिनियम भी कहा जाता है।
इस व्यवस्था ने धार्मिक आधार पर ही अपने प्रतिनिधियों को चुनने की स्वतंत्रता देकर राजनीतिक परिदृश्य में सांप्रदायिक विभाजन को औपचारिक रूप दे दिया। कई दशकों तक कायम रही इस प्रणाली ने राष्ट्रीय पहचान के बजाय धार्मिक पहचान को बढ़ावा दिया। इसके चलते मुस्लिम लीग ने एक अलग राज्य बनाने की वकालत की। अंततः 1947 में देश का विभाजन हुआ और 1956 में इस्लामी गणराज्य पाकिस्तान की स्थापना हुई।
भारतीय परिषद अधिनियम के तहत पहली बार विधायी निकायों में सीटों का वितरण पहचान के आधार पर किया गया। पिछड़े वर्गों (अनुसूचित जातियों) को भी 1919 में कुछ सीटें मिलीं। इन सीटों को 1925 में बढ़ाई गई। यह मुद्दा बाद में मोहनदास करमचंद गाँधी और अंबेडकर के बीच विवाद का विषय बन गया। उन्होंने दलितों के लिए विशेष निर्वाचक मंडल की माँग की थी, हालाँकि बाद में इसे छोड़ दिया।

गाँधी और अंबेडकर के बीच मतभेद

महात्मा गाँधी ने दलित वर्गों के लिए अलग निर्वाचक मंडल की अवधारणा को अस्वीकार कर दिया, जबकि दूसरे ग्रुप को लेकर उनके विचार अलग थे। उनका मानना ​​था कि यह अंग्रेजों की हिंदू आबादी को विभाजित करने, सामाजिक विभाजन को कायम रखने और सत्ता पर अपनी कमजोर पकड़ को मजबूत करने की एक चाल थी। उनके विचार में, यह निर्णय दर्शाता था कि दलित हिंदू समुदाय का हिस्सा नहीं हैं। पुणे की येरवडा सेंट्रल जेल में बंद गाँधी जी ने आमरण अनशन शुरू कर दिया।
दूसरी ओर, अंबेडकर दलित वर्गों के लिए एक अलग निर्वाचक मंडल चाहते थे। उन्होंने 1930 में ‘प्रथम गोलमेज सम्मेलन’ के दौरान आवाज उठाई थी। हालाँकि गाँधी और भारतीय राष्ट्रीय कॉन्ग्रेस इसके खिलाफ थे। ये इसे भारतीय समाज को कमजोर और खंडित करने की एक योजना के रूप में देखते थे।
उन्होंने देखा कि ब्रिटिश सरकार अपने हितों की रक्षा करने और पुरस्कार के माध्यम से अपनी शक्ति का विस्तार करने के लिए अपनी कुख्यात ‘फूट डालो और राज करो’ नीति का प्रयोग कर रही थी। उनके आमरण अनशन ने अंबेडकर पर हस्तक्षेप करने के लिए जन दबाव डाला और अंततः दोनों पक्षों के बीच समझौता होने पर भूख हड़ताल समाप्त हुई।

पूना पैक्ट: संघर्ष का समाधान

24 सितंबर 1932 को उच्च जाति के हिंदुओं की ओर से डॉ. मदन मोहन मालवीय और दलित वर्गों की ओर से अंबेडकर के बीच ‘पुणे समझौता‘ हुआ। इसने साझा निर्वाचक मंडल के ढाँचे के भीतर आरक्षित सीटों की संख्या बढ़ाने पर सहमति बनी।
दिलचस्प बात यह है कि अंबेडकर ने 1918-1919 में मताधिकार (साउथबोरो) समिति के समक्ष अपनी उपस्थिति के बाद से ही सांप्रदायिक प्रतिनिधित्व के लिए अभियान चलाया था। हालांकि, द प्रिंट की रिपोर्ट के अनुसार , उन्होंने प्रतिनिधित्व प्राप्त करने के साधन के रूप में सांप्रदायिक मतदाताओं की उपयुक्तता पर गंभीर संदेह व्यक्त किया था।
अम्बेडकर ने ‘साइमन कमीशन’ के समक्ष अपनी उपस्थिति के दौरान वयस्क मताधिकार का समर्थन किया, जिसके तहत मतदान के अधिकार आय, प्रतिष्ठा या शिक्षा के बजाय आयु के आधार पर निर्धारित किए जाएँगे। जिरह के दौरान उन्होंने उल्लेख किया कि मिश्रित मतदाता प्रणाली होनी चाहिए जिसमें सीटें आवंटित हों, अन्यथा दलित वर्गों को मुसलमानों के समान प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए।
मुस्लिम लीग के प्रतिनिधियों, रियासतों और अन्य लोगों ने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार का विरोध किया। ब्रिटिश सरकार भी देश को सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार देने में हिचकिचा रही थी। इसका कारण उनके रुख में बदलाव और अलग निर्वाचक मंडल पर उनका जोर हो सकता है।
हालाँकि डॉ. अंबेडकर का पूरा ध्यान अनुसूचित जातियों के लिए अलग निर्वाचक मंडल की अवधारणा के बजाय देश की राजनीतिक संरचना के भीतर उनके प्रतिनिधित्व को बढ़ावा देने पर था।
भारत पहले ही विभाजन का खामियाजा भुगत चुका है, जिसकी शुरुआत मुस्लिम समुदाय के लिए अलग निर्वाचक मंडल की माँग से हुई थी। इसकी जड़ें न्याय और प्रतिनिधित्व के भेष में छिपे कट्टरवाद और अतिवाद में हैं।
हालाँकि यह राष्ट्र के सामाजिक ताने-बाने के लिए भी हानिकारक है। इसका फायदा निहित स्वार्थ वाले लोग उठाएँगे और सामाजिक दरारों को और गहरा करेंगे। इससे भारत की विकास यात्रा पटरी से उतर जाएगी और अब तक हुई प्रगति व्यर्थ चली जाएगी।
समकालीन भारत में पृथक निर्वाचक मंडल का कोई महत्व नहीं है, न ही भविष्य में होगा और न ही अतीत में था। आक्रमणकारियों द्वारा देश पर प्रभुत्व स्थापित करने के लिए रची गई साजिश को ‘सशक्तिकरण’ के बहाने सुदृढ़ नहीं किया जा सकता, क्योंकि वास्तव में यह विभाजन का एक तंत्र मात्र है। यह राष्ट्रीय एकता को कमजोर करता है। भारत और भारत के लोगों की प्रगति में एक बड़ी बाधा भी है।
बेशक, जनता की समस्याओं का समाधान किया जाना चाहिए, लेकिन यह देश के संविधान को तोड़-मरोड़ कर देश को नुकसान पहुँचाए बिना नहीं किया जा सकता। चंद्रशेखर रावण को सामान्य सी बात समझनी होगी कि राष्ट्र के वर्तमान और भविष्य को खतरे में डालकर राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं को आगे बढ़ाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

आखिर सोनिया नेहरू के पत्र क्यों नहीं वापस कर रही? सोनिया गाँधी के पास मौजूद इन दस्तावेजों में दफन है क्या राज?

             सोनिया गाँधी के पास है जवाहरलाल नेहरू के 51 बक्से पत्र (फोटो साभार : RGF/News18)
देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के ’51 बक्से पत्रों’ को लेकर एक बार फिर राजनीति गर्मा गई है। सोनिया गाँधी के पास मौजूद नेहरू-एडविना समेत कई हस्तियों के पत्रों के कॉन्टेंट को लेकर अक्सर चर्चा होती है। प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय (PMML) लंबे वक्त से इन पत्रों को माँग रहा है लेकिन कॉन्ग्रेस इनकी मौजूदगी से इनकार करती रही है। अब कॉन्ग्रेस ने लोकसभा में नेहरू के पत्रों से जुड़े सरकार के एक जवाब के बाद खुद की ‘जीत’ की डुगडुगी बजाकर बीजेपी पर आरोप लगा दिया। लेकिन कॉन्ग्रेस की यह खुशी ज्यादा देर नहीं टिकी और केंद्र सरकार ने सारा सच सामने रखते हुए कॉन्ग्रेस की खुशी पर पानी फेर दिया। अब इस मामले को सिलसिलेवार तरीके से समझते हैं।

कैसे शुरु हुआ विवाद?

हालिया विवाद की शुरुआत हुई 15 दिसंबर 2025 को लोकसभा में बीजेपी सांसद संबित पात्रा द्वारा पूछे गए एक सवाल से। संबित ने संस्कृति मंत्रालय से पूछा कि ‘क्या वर्ष 2025 में पीएमएमएल के वार्षिक निरीक्षण के दौरान भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू से संबंधित कतिपय दस्तावेज संग्रहालय से गायब पाए गए हैं। इसके जबाव में संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री गजेन्द्र सिंह शेखावत ने बताया कि ‘निरीक्षण के दौरान संग्रहालय से जवाहरलाल नेहरू से संबंधित कोई दस्तावेज गायब नहीं पाया गया है’।

कॉन्ग्रेस का ‘मनगढ़ंत’ नैरेटिव: ‘गायब’ शब्द के सहारे बचने की कोशिश

कॉन्ग्रेस ने लोकसभा में संस्कृति मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत द्वारा दिए गए एक लिखित उत्तर को अपनी ढाल बनाया है। बस, इसी एक शब्द ‘गायब’ को पकड़कर कॉन्ग्रेस ने ढिंढोरा पीटना शुरू कर दिया कि भाजपा का प्रोपेगेंडा धराशायी हो गया।
कॉन्ग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने X पर (ट्वीट) पोस्ट कर पूछा, “कल आखिरकार लोकसभा में सच्चाई सामने आ ही गई। क्या अब माफी माँगी जाएगी?”

संस्कृति मंत्रालय का ‘पोस्ट वार’: कॉन्ग्रेस को दिखाया आईना

कॉन्ग्रेस के शोर के बीच संस्कृति मंत्रालय ने सिलसिलेवार पोस्ट के जरिए दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया। मंत्रालय ने बताया कि 29 अप्रैल 2008 को सोनिया गाँधी के प्रतिनिधि एमवी राजन ने बकायदा पत्र लिखकर माँग की थी कि सोनिया गाँधी पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के सभी निजी पारिवारिक पत्र और नोट्स वापस लेना चाहती हैं।
इसके बाद, 5 मई 2008 को 51 कार्टन (बक्से) भरकर नेहरू पेपर्स सोनिया गाँधी के आवास पर भेज दिए गए थे। मंत्रालय ने यह भी लिखा कि PMML पेपर्स को वापस पाने के लिए सोनिया गाँधी के ऑफिस के साथ लगातार संपर्क में है।
मंत्रालय ने दो तारीख ’28 जनवरी 2025 और 3 जुलाई 2025′ को बताते हुए लिखा कि नेहरू पेपर्स PMML से ‘गायब’ नहीं हैं क्योंकि उनकी लोकेशन (whereabouts) का पता है- वे सोनिया गाँधी के पास हैं।
मंत्रालय का सबसे कड़ा प्रहार यह था कि ये दस्तावेज भारत के प्रथम प्रधानमंत्री से संबंधित हैं और राष्ट्र की ‘दस्तावेजी विरासत’ हैं, न कि किसी की ‘निजी संपत्ति’ (Private Property)। इनका PMML की कस्टडी में होना और नागरिकों एवं विद्वानों के लिए उपलब्ध होना शोध की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।

इन 51 बक्सों में आखिर क्या है?

विवाद की सबसे बड़ी जड़ वे दस्तावेज हैं जो इन 51 बक्सों के भीतर कैद हैं। PMML के रिकॉर्ड बताते हैं कि इन कागजातों में नेहरू जी द्वारा विभिन्न महान हस्तियों को लिखे गए पत्र और नोट्स शामिल हैं। संबित पात्रा ने ट्वीट कर पूछा कि आखिर एडविना माउंटबेटन को लिखे गए उन पत्रों में ऐसा क्या है जिसे ‘सेंसर’ करने की जरूरत पड़ गई? एडविना के अलावा, इन बक्सों में जयप्रकाश नारायण, अल्बर्ट आइंस्टीन, अरुणा आसफ अली, विजयलक्ष्मी पंडित और बाबू जगजीवन राम के साथ हुए पत्राचार भी शामिल हैं।
इतिहासकारों का मानना है कि इन पत्रों में देश के विभाजन, तत्कालीन कूटनीति और नेहरू के व्यक्तिगत विचारों के ऐसे पहलू हो सकते हैं जो कॉन्ग्रेस के बनाए ‘महिमा मंडित’ इतिहास को चुनौती दे सकें। अहमदाबाद के इतिहासकार रिजवान कादरी ने पत्र लिखकर इन पत्रों तक पहुँच माँगी। उनका कहना है कि गाँधी जी और पटेल के रिकॉर्ड तो व्यवस्थित हैं, लेकिन नेहरू के रिकॉर्ड का एक बड़ा हिस्सा (जो सोनिया गाँधी के पास है) शोध के लिए उपलब्ध नहीं है। क्या कॉन्ग्रेस डरती है कि अगर ये 51 बक्से सार्वजनिक हुए, तो नेहरू की वह छवि धूमिल हो जाएगी जो दशकों से पेश की जाती रही है?

पहले भी हुआ है विवाद: क्या इतिहास पर किसी एक परिवार का एकाधिकार है?

नेहरू के दस्तावेजों पर कब्जे का विवाद कोई नया नहीं है। 1971 के बाद इंदिरा गाँधी ने ये कागजात नेहरू मेमोरियल को सौंपे थे, लेकिन एक शर्त के साथ। शर्त यह थी कि इंदिरा गाँधी ही इन दस्तावेजों की ‘मालकिन’ रहेंगी और उनकी अनुमति के बिना कोई भी शोधकर्ता इन्हें देख नहीं पाएगा।
1984 में इंदिरा गाँधी की मृत्यु के बाद सोनिया गाँधी इन दस्तावेजों की ‘ट्रस्टी-गार्जियन’ बन गईं। PMML सोसाइटी अब इस पर कानूनी राय ले रही है कि क्या कोई दान की गई चीज इस तरह वापस ली जा सकती है और क्या राष्ट्रीय इतिहास के दस्तावेजों पर किसी परिवार का मालिकाना हक हो सकता है।
हाल ही में ‘द नेहरू आर्काइव‘ के नाम से एक डिजिटल प्रोजेक्ट शुरू किया गया है, जिसमें नेहरू के 104 खंडों के कार्यों को ऑनलाइन किया गया है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि जब तक सोनिया गाँधी के पास रखे 51 बक्से वापस नहीं आते, तब तक यह आर्काइव अधूरा रहेगा। भाजपा का तर्क है कि कॉन्ग्रेस ने हमेशा इतिहास को ‘कंट्रोल’ करने की कोशिश की है।
नेहरू स्मारक संग्रहालय और पुस्तकालय (NMML) का नाम बदलकर प्रधानमंत्री संग्रहालय एवं पुस्तकालय (PMML) करने पर भी कॉन्ग्रेस ने खूब विरोध किया था, क्योंकि वे नेहरू को केवल एक परिवार तक सीमित रखना चाहते हैं, जबकि सरकार उन्हें देश के सभी प्रधानमंत्रियों की विरासत का हिस्सा मानती है।

माफी किसे माँगनी चाहिए?

कॉन्ग्रेस ने ‘गायब’ शब्द के पीछे छिपकर जिस तरह भाजपा से माफी की माँग की है, वह ‘चोरी और ऊपर से सीनाजोरी’ जैसा मामला है। सरकार के जवाब ने यह स्पष्ट कर दिया है कि दस्तावेज चोरी नहीं हुए, बल्कि सोनिया गाँधी ने उन्हें ‘होल्ड’ कर रखा है। अब सवाल यह उठता है कि क्या देश के पहले प्रधानमंत्री के पत्र किसी निजी अलमारी में बंद होने चाहिए या राष्ट्रीय पुस्तकालय में?
अगर कॉन्ग्रेस पारदर्शी है, तो उसे ये 51 बक्से तुरंत वापस करने चाहिए। माफी भाजपा को नहीं, बल्कि कॉन्ग्रेस को माँगनी चाहिए जिसने 2008 में राष्ट्रीय महत्व के दस्तावेजों को एक निजी आवास की संपत्ति बना दिया।

क्या कुत्ता लेकर संसद पहुँचीं कांग्रेस सासंद रेणुका चौधरी ने साबित कर दिया विपक्ष की मनोस्थिति कुत्ते जैसी हो गयी है?

                      कुत्ते के साथ संसद पहुँची रेणुका चौधरी (फोटो: नवभारत टाइम्स / वन इंडिया)
आज सांसद रेणुका चौधरी ने जनता को यह सोंचने के मजबूर कर दिया है कि वह किसी समझदार उम्मीदवार को वोट देने जा रहे हैं या मनुष्य के रूप में किसी कुत्ते को? आज विपक्ष नरेंद्र मोदी विरोध में इतना नीचे गिर जायेगा, शायद ही किसी ने कल्पना की हो। विपक्ष इतना ज्यादा पगला गया कि सुप्रीम कोर्ट में भी मात खाने के बाद भी SIR के मुद्दे पर संसद रोक जनता के पैसे को बर्बाद कर रहा है। क्या ऐसा विपक्ष एक भी एक भी वोट के काबिल है जो घुसपैठियों और बोगस वोट बचाने जनता के पैसे को बर्बाद करे?    

संसद के शीतकालीन सत्र का पहला दिन बेहद हंगामेदार रहा। SIR समेत अलग-अलग मुद्दों को लेकर विपक्ष और सत्तापक्ष आमने-सामने आते दिखाई दिए। लोकसभा हो या राज्यसभा, दोनों ही सदनों में बहस और हंगामा देखने को मिला। हालांकि, सदन के अंदर ही नहीं बाहर भी घमासान कम नहीं था। इसी बीच सत्र के पहले ही दिन एक नया विवाद सामने आया जब कांग्रेस सांसद रेणुका चौधरी एक डॉगी को साथ लेकर संसद परिसर में पहुंच गईं। इसे लेकर बवाल उस समय बढ़ गया जब बीजेपी के दिग्गज नेता और सांसद जगदंबिका पाल ने इस मुद्दे को उठाया। उन्होंने इस मामले में कड़ी कार्रवाई की मांग कर दी।

कांग्रेस सांसद रेणुका चौधरी सोमवार (1 दिसंबर 2025) को शीतकालीन सत्र के पहले दिन कुत्ते को गाड़ी में लेकर संसद भवन पहुँची जिसे लेकर हंगामा हो गया है। बीजेपी ने इसे संसद का अपमान बताते हुए रेणुका के खिलाफ कड़ी कार्रवाई किए जाने की माँग की है।

सोशल मीडिया पर सामने आई तस्वीरों में रेणुका की गाड़ी में एक कुत्ता बैठा नजर आ रहा है। इस पर हुए विवाद पर सफाई देते हुए रेणुका ने कहा कि उन्हें यह कुत्ता सड़क पर मिला था। उन्होंने कहा, “मैं रास्ते में आ रही थी। वहाँ पर एक स्कूटर और एक कार की टक्कर हो गई थी और उसके आगे ये पिल्ला सड़क पर घूम रहा था। मुझे लगा कि इसे टक्कर लग जाएगी। तो मैंने इसे उठाया, कार में रखा, संसद आई और वापस भेज दिया।”

जगदंबिका पाल ने कांग्रेस सांसद के रवैये पर उठाए सवाल

डुमरियागंज से बीजेपी सांसद जगदंबिका पाल ने कहा कि कांग्रेस सांसद रेणुका चौधरी का ये कदम, सांसद के तौर पर दिए गए विशेषाधिकार का दुरुपयोग है। ऐसे में कार्रवाई की मांग भी की है। उन्होंने कहा कि सांसदों के कुछ विशेष अधिकार होते हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि वे अमर्यादित आचरण करें।

सांसद के विशेषाधिकार का दुरुपयोग- बीजेपी सांसद

बीजेपी नेता ने जोर देकर कहा कि संसद देश की नीतियों पर चर्चा करने के लिए है। यह जनता की ओर से चुने गए जनप्रतिनिधियों का सदन है। कांग्रेस सांसद रेणुका चौधरी को शायद यह एहसास नहीं है कि लोकसभा और राज्यसभा देश की जनता की भावनाओं का प्रतिनिधित्व करते हैं।
कांग्रेस सांसद का अपने कुत्ते को संसद परिसर में लाना और फिर सवाल उठाए जाने पर सफाई देना देश को शर्मसार करने वाला कृत्य है। उन्होंने इसे लोकतंत्र पर कुठाराघात और संसद का अपमान करार दिया।

रेणुका ने आगे विवादित बयान देते हुए कहा, “असली काटने वाले तो संसद में बैठे हैं। वे सरकार चलाते हैं। क्या सरकार के पास और कुछ करने को नहीं है? हम उन लोगों के बारे में बात नहीं करते जो संसद में बैठकर हमें रोज काटते हैं।” रेणुका चौधरी ने तंज भरे लहजे में कहा कि अगर कुत्ते के लिए भी कोई पास बनता है तो बना दिया जाए।

कुत्ता विवाद पर रेणुका चौधरी ने क्या कहा

संसद में कुत्ता लाने पर हुए विवाद पर कांग्रेस MP रेणुका चौधरी ने कहा कि 'कोई कानून बना है क्या? मैं रास्ते में आ रही थी। वहां पर एक स्कूटर और एक कार का टकर हुआ। उसके आगे ये पिल्ला सड़क पर घूम रहा था। मुझे लगा कि इसे टक्कर लग जाएगी। तो मैंने इसे उठाया, कार में रखा, संसद आई और वापस भेज दिया। कार चली गई, और कुत्ता भी गया। तो इस पर चर्चा का क्या मतलब है? असली काटने वाले तो संसद में बैठे हैं। वे सरकार चलाते हैं। हम एक बेजुबान जानवर की देखभाल करते हैं, और यह एक बड़ा मुद्दा और चर्चा का विषय बन गया है। क्या सरकार के पास और कुछ करने को नहीं है? मैंने कुत्ते को घर भेज दिया और उनसे कहा कि इसे घर पर ही रखो... हम उन लोगों के बारे में बात नहीं करते जो संसद में बैठकर हमें रोज़ काटते हैं।'

बीजेपी सांसद जगदंबिका पाल ने इस मुद्दे पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। उन्होंने रेणुका चौधरी के खिलाफ कार्रवाई की माँग करते हुए कहा कि अगर सांसद को कुछ विशेषाधिकार मिलते हैं तो उनका गलत तरीके से इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।

पाल ने कहा, “संसद देश की नीतियों पर चर्चा करने की जगह है। वहाँ पर अपने कुत्ते को लेकर आना और उस पर इस तरह का बयान देना। वह देश को शर्मसार कर रही हैं। उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए।” 

मध्य प्रदेश : मस्जिद की खुदाई में निकली भगवान राम और माँ सीता की मूर्ति, हिंदू पूजा करने पहुँचे: सागर का मामला, पुरात्व विभाग जाँच में जुटा

     मध्य प्रदेश में मस्जिद की खुदाई में मिली राम-सीता की मूर्तियाँ (साभार : livehindustan & Dainikbhaskar)
आज मुस्लिम कट्टरपंथियों और इनको समर्थन देने वाले नेताओं और उनकी पार्टियों ने "सेकुलरिज्म और गंगा-जमुनी तहजीब" जैसे पाखंडी और गुमराह करने वालों नारों से देश को पागल बना बारूद के ढेर पर बैठा दिया है। इनमें कोई माई का लाल बताए कि किस मुस्लिम मुल्क में सेकुलरिज्म है? भारत में जब तक हिन्दू बहुसंख्यक है ये पाखंडी "सेकुलरिज्म" है, खुदा न खास्ता अगर भारत गजवा-ए-हिन्द बन गया इन्ही नेताओं और उनकी पार्टियों द्वारा "सेकुलरिज्म" बोलने पर मुस्लिम कट्टरपंथियों की प्रताड़ना झेलनी पड़ेगी और सिर पर हाथ रखकर रोयेंगे। देशहित में सरकार को इन पाखंडी और जनता को भ्रमित करने वाले नारों पर प्रतिबन्ध लगाना चाहिए। 

दूसरे, मथुरा, काशी और अन्य स्थानों पर खुदाई का विरोध क्यों किया जाता है अयोध्या के बाद अब उसका जीवित उदाहरण मध्य प्रदेश है। जहां मस्जिद की चार दीवारी बनाए जाने के लिए हो रही खुदाई में पुरुषोत्तम श्रीराम और सीता माता की मूर्ति निकली। मध्य प्रदेश को चाहिए कि मस्जिद के पूरे परिसर की खुदाई करवाए।             

मध्य प्रदेश के सागर जिले के पापेड़ गाँव में मस्जिद की चारदीवारी के लिए चल रही खुदाई के दौरान जमीन के नीचे से भगवान राम की कुछ मूर्तियाँ मिली हैं। मूर्तियाँ मिलते ही गाँव में खबर आग की तरह फैल गई। हिंदू समाज के लोग बड़ी संख्या में मौके पर पहुँचे और मूर्तियों की पूजा शुरू कर दी, साथ ही मंदिर बनाने की माँग करने लगे।

इससे हिंदू और मुस्लिम, दोनों समुदायों के बीच तनाव की स्थिति बन गई। हालात संभालने के लिए पुलिस और प्रशासन के अधिकारी मौके पर पहुँचे और फिलहाल निर्माण कार्य रुकवा दिया गया है। प्रशासन ने मूर्तियों की जाँच के लिए पुरातत्व विभाग को बुलाया है।

मस्जिद की खुदाई में मिलीं प्राचीन मूर्तियाँ

जानकारी के अनुसार, यह घटना सागर जिले की बंडा तहसील के पापेड़ गाँव की है। गाँव में बनी एक मस्जिद के परिसर में चारदीवारी बनाने के लिए खुदाई का काम चल रहा था। इसी खुदाई के दौरान जमीन के अंदर से भगवान राम और माता सीता की कुछ प्राचीन मूर्तियाँ मिली हैं। इनमें से कुछ मूर्तियाँ खंडित भी हैं। मजदूरों ने जब मूर्तियाँ मिलने की जानकारी गाँव वालों को दी, तो यह खबर तुरंत पूरे गाँव में फैल गई।

हिंदू संगठनों ने की पूजा और की मंदिर की माँग

मूर्तियाँ मिलने की सूचना मिलते ही हिंदू संगठनों और गाँव के लोग बड़ी संख्या में मौके पर पहुँच गए। उन्होंने वहाँ मिली मूर्तियों की पूजा-अर्चना शुरू कर दी। हिंदू संगठनों ने तो भगवान राम का अभिषेक करके, वहीं एक चबूतरा बनाकर मूर्तियों को स्थापित भी कर दिया। हिंदू संगठनों की माँग है कि इस जगह पर मंदिर बनाया जाए। उनका दावा है कि पहले यहाँ एक मंदिर था, जिसे तोड़कर मस्जिद बना दी गई थी।

दो समुदायों के आमने-सामने आने से बढ़ा तनाव

मंदिर बनाने की माँग को लेकर हिंदू और मुस्लिम, दोनों समुदायों के लोग आमने-सामने आ गए। इससे गाँव में माहौल तनावपूर्ण हो गया। मुस्लिम पक्ष के ग्रामीणों का कहना है कि यह जमीन करीब 200 साल पहले मस्जिद को दी गई थी। उनका यह भी कहना है कि मूर्तियाँ मस्जिद परिसर में नहीं मिली हैं, बल्कि पास में पत्थरों की खखरी (ढेर) से मिली हैं, जिन्हें बाद में परिसर में रखा गया है। दोनों पक्षों की बातों से गाँव में तनाव की स्थिति पैदा हो गई।

प्रशासन ने रुकवाया निर्माण, होगी पुरातत्व विभाग की जाँच

तनावपूर्ण स्थिति को देखते हुए तुरंत पुलिस और प्रशासन की टीम मौके पर पहुँची। अधिकारियों ने दोनों पक्षों को समझा-बुझाकर माहौल को शांत कराया। बंडा एसडीएम नवीन ठाकुर ने बताया कि फिलहाल मौके पर चल रहे निर्माण कार्य को रुकवा दिया गया है।
उन्होंने साफ किया कि यह जमीन मस्जिद के स्वामित्व की है, लेकिन जाँच पूरी होने तक कोई निर्माण नहीं होगा। मूर्तियों को पुलिस की निगरानी में रखा जाएगा और उनकी जाँच पुरातत्व विभाग से कराई जाएगी। जाँच के बाद ही यह पता चल पाएगा कि ये मूर्तियाँ कितनी पुरानी हैं और किसकी हैं।

तमिलनाडु: ‘नेताओं को लड़कियां सप्लाई करता है पति’, पत्नी ने लगाया आरोप, मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन से की कार्रवाई की मांग

                                     पत्नी का आरोप, नेताओं को लड़कियां उपलब्ध कराता है पति
तमिलनाडु के अराकोणम से DMK युवा विंग के पदाधिकारी दैवसीयाल पर उनकी 20 वर्षीय पत्नी ने यौन शोषण का आरोप लगाया है। पार्टी में ऊँचा पद पाने के दैवसीयाल अपनी पत्नी समेत करीब 20 अन्य युवतियों को भी राजनेताओं के साथ यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर करता था।

पीड़ित पत्नी ने बताया कि दैवसीयाल उसे ‘पागल कुत्ते की तरह काटता’ था और धमकी देता था कि उसे काट देगा। इसके अलावा पुलिस उसका ही साथ देगी। एक बार दैवसीयाल ने कॉलेज जाते समय हमला किया और फोन तोड़ दिया। पीड़िता ने परेशान होकर आत्महत्या की कोशिश भी की। पीड़िता ने मुख्यमंत्री एम.के. स्टालिन से न्याय की गुहार लगाते हुए कही कि अगर कार्रवाई नहीं हुई तो वह अपनी जान दे देगी।

इन आरोपों के बाद, दैवसीयाल फरार हो गया है और पुलिस उसकी तलाश कर रही है। वहीं, AIADMK ने DMK पर आरोप लगाया है कि राजनीतिक दबाव के कारण पुलिस ने शुरू में FIR दर्ज करने में देरी की। AIADMK महासचिव एडप्पादी के. पलानीस्वामी ने चेतावनी दी है कि अगर दैवसीयाल के खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई तो उनकी पार्टी बड़ा विरोध प्रदर्शन करेगी।

शिकायत करने पर दी धमकी

महिला ने पुलिस को दी शिकायत में कहा है कि उसका पति देइवासेयाल है। वह खुद डीएमके की युवा शाखा का उप सचिव होने का दावा करता है। महिला का आरोप है कि उसके पति ने पुलिस से शिकायत करने पर जान से मारने की धमकी दी थी। साथ ही परिवार के सदस्यों को आग लगाने की भी धमकी दी है। पीड़िता का आरोप है कि स्थानीय पुलिस भी शिकायक के बाद कोई कार्रवाई नहीं कर रही है। जबकि वह कई बार इस मामले में पुलिस से शिकायत कर चुकी है।

फिलहाल, पुलिस का कहना है कि प्रारंभिक जाँच में यौन उत्पीड़न का कोई सीधा सबूत नहीं मिला है और मामले की जाँच जारी है।

घर से बाहर निकलना किया बंद

पीड़िता का आरोप है कि वह कॉलेज से पढ़ाई कर रही है। पति की प्रताड़ना से तंग आकर वह अपने पिता के पास आ गई। यहां भी उसका पति पीछे पड़ा हुआ है। उसने घर से बाहर निकलना बंद कर दिया है। इसी वजह से उसकी परीक्षा भी नहीं दे सकी। उसका पति घर पर आकर भी गाली-गलौज करता है। पीड़िता ने इस मामले में अब डीएमके प्रमुख और मुख्यमंत्री एमके स्टालिन से कार्रवाई की मांग की है।

कांग्रेस के नए दफ्तर पर विवाद: उठी ‘सरदार मनमोहन सिंह भवन’ नाम रखने की मांग, लेकिन पार्टी परिवार से आगे कुछ सोंच नहीं सकती ; उद्घाटन रिमोट कंट्रोल अध्यक्ष खड़के ने नहीं सोनिया ने किया


नई दिल्ली में आज, 15 जनवरी को कांग्रेस के नए मुख्यालय का उद्घाटन किया गया। कांग्रेस की पूर्व अध्यक्ष सोनिया गांधी ने इसका उद्घाटन किया। इस अवसर पर कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और सोनिया गांधी के बेटे राहुल गांधी भी मौजूद रहे। कांग्रेस के नए मुख्यालय का नाम ‘इंदिरा भवन’ रखा गया है। लेकिन दफ्तर के नाम को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। पार्टी कार्यकर्ता इसका नाम पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नाम पर करने की मांग कर रहे हैं। उन्होंने पार्टी मुख्यालय के बाहर ‘सरदार मनमोहन सिंह भवन’ के पोस्टर भी लगा दिए।

कांग्रेस दफ्तर का नाम मनमोहन सिंह के नाम पर नहीं रखने पर कार्यकर्ता पार्टी पर उन्हें नजरअंदाज करने के आरोप भी लगा रहे हैं। उनका कहना है कि पूर्व पीएम के निधन के बाद अंतिम संस्कार और स्मारक को लेकर पार्टी ने सरकार पर अपमान करने के आरोप लगाए थे। लेकिन अब जब सम्मान देने की बात आई तो उन्हें नजरअंदाज कर रही है।

इस मामले पर बीजेपी का कहना है कि ‘पार्टी पर एक परिवार के आगे सोच नहीं पाती। कांग्रेस ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नाम पर ओछी राजनीति की। राष्ट्रीय शोक के समय राहुल गांधी पार्टी के लिए विदेश यात्रा पर निकल गए। पार्टी ने पीवी नरसिम्हा राव, प्रणब मुखर्जी समेत कई नेताओं का भी अपमान किया। नए दफ्तर का नाम उनके नाम पर रखने की भारी मांग के बाद भी उन्हें नजरअंदाज कर दिया गया और इंदिरा गांधी के नाम पर भवन का नाम रखा गया। सिख समुदाय को गाली देना और अपमानित करना और हमेशा परिवार को सबसे पहले रखना शर्मनाक मानसिकता है।’ सोशल मीडिया पर इसको लेकर बहस जारी है। लोगों का कहना है कि कार्यकर्ताओं ने नए कांग्रेस मुख्यालय के बाहर पोस्टर लगा इसका नाम ‘सरदार मनमोहन सिंह भवन’ रखने की मांग की। लेकिन कांग्रेस ने इसका नाम ‘इंदिरा गांधी भवन’ रख अंबेडकर, एमके गांधी और मनमोहन सिंह को नजरअंदाज किया।

 

दिल्ली : जामा मस्जिद का भी हो सर्वे: सीढ़ियों में दबे हैं सैकड़ों मंदिरों के अवशेष एवं मूर्तियाँ, हिंदू संगठन ने ASI के डायरेक्टर जनरल को लिखी चिट्ठी; देखिए आधा-अधूरा सच बताती वीडियो


दिल्ली स्थित जामा मस्जिद की सर्वे कराने की माँग करते हुए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के डायरेक्टर जनरल को चिट्ठी लिखी गई है। इसमें कहा गया है कि मुगल आक्रांता औरंगज़ेब ने जोधपुर और उदयपुर के कृष्ण मंदिर को तोड़कर उसके देव प्रतिमा को दिल्ली की जामा मस्जिद की सीढ़ियों में लगवाए थे। इसके पीछे औरंगजेब पर साकी मुस्तक खान की पुस्तक मसीर-ई-आलमगीरी को आधार बनाया गया है। अभी सिर्फ जामा मस्जिद ही नहीं फतेहपुरी मस्जिद भी लपेटे में आने वाली है। 

ASI के डायरेक्टर को चिट्ठी हिंदू सेना के प्रमुख विष्णु गुप्त ने लिखी है। इससे पहले हिंदू सेना प्रमुख ने राजस्थान के अजमेर स्थित मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह को संकटमोचन महादेव मंदिर बताते हुए कोर्ट में एक याचिका दायर की थी। कोर्ट ने याचिका को स्वीकार करते हुए केंद्रीय अल्पसंख्यक मंत्रालय, ASI और दरगाह कमिटी को नोटिस देकर 20 दिसंबर तक जवाब माँगा है।

विष्णु गुप्ता ने अपनी चिट्ठी में लिखा है कि जोधपुर और उदयपुर के सैकड़ों मंदिरों को तोड़कर औरंगजेब ने हिंदुओं को अपमानित करने के लिए उनके अवशेषों को दिल्ली की जामा मस्जिद की सीढ़ियों पर लगवा दिया। जामा मस्जिद ASI के नियंत्रण में है और वह इसके पीछे की सच्चाई पता लगाने के लिए उसका सर्वे कराए। मस्जिदों की सीढ़ियों के नीचे दबे मंदिरों के अवशेषों से हिंदुओं की भावना आहत होती है।

विष्णु गुप्ता ने कहा कि मसीर-ई-आलमगीरी में लिखा है कि 24-25 मई 1689 को रविवार का दिन था। उस दिन खान जहाँ बहादुर जोधपुर से मंदिरों को तबाह करके लौटा। खान जहाँ बहादुर द्वारा मंदिरों को लूटने, प्रतिमाओं को खंडित करने और फिर उन्हें ध्वस्त कर के बाद बैल गाड़ियों से टूटी हुई मूर्तियों के अवशेष को दिल्ली रवाना कर दिया। इससे औरंगजेब बहुत खुश हुआ था।

इस वीडियो में अधूरा सच बताया गया है। जब अंग्रेजों ने जामा मस्जिद ही नहीं फतेहपुरी मस्जिद को भी नामस्जिद घोषित कर अपनी फौज और फौज के घोड़ों को इसमें रखा तब सैकड़ों हिन्दुओं ने इसे अंग्रेजों से मुक्त करवाने धरने और प्रदर्शन पुलिस की लाठियां खाई थी। तब उस समय दो व्यापारियों- सेठ छुन्ना मल और सत्य नारायण गुड़ वाले- मैदान में उतरे और दोनों मस्जिदों की नीलामी कर ख़रीदा था। यही वजह है अडानी अम्बानी को रोने वाले इस व्यापारियों का नाम नहीं लेते। इनके नामों को इन छद्दम धर्म-निरपेक्ष नेताओं और पार्टियों ने मिटटी में दबा दिया। छुन्ना मल ने जामा मस्जिद का मुतवल्ली, जामा मस्जिद के पीछे इंद्रप्रस्थ स्कूल के पास, उनके निवास पर बड़ा सा लोहे का गेट है, क्षेत्रीय निवासी को नियुक्त किया था। 1987 के लगभग इस परिवार का क़ौमी आवाज़, उर्दू दैनिक में पत्र प्रकाशित भी हुआ था कि मस्जिद के प्रबंधन में हमें क्यों नहीं शामिल किया जाता? छुन्ना मल ने हमें इस मस्जिद का मुतवल्ली नियुक्त किया था। इस गंभीर मुद्दे पर अपने युवा जीवन में रामजन्मभूमि विवाद के कई मुस्लिम नेताओं, मौलानाओं से भी प्रश्न किया था, शुरू में तो मुझे फिरकापरस्त आदि कहने लगे लेकिन जब उन्हें उन्ही की भाषा में जवाब देते दोगला और मुस्लिमों का दुश्मन बताते बहुत कुछ कहना शुरू करने पर कबूला कि 'हाँ, जब 1865 के बाद की तवारीख पढ़ते है, तब ऐसा हवाला आता है।'         

विष्णु गुप्ता का कहना है कि हिंदू सेना चाहती है कि दिल्ली स्थित जामा मस्जिद का ASI सर्वे कराए और उन मूर्तियों को बाहर निकाल कर फिर से मंदिरों में स्थापित किया जाए। इस सर्वे से मुगल आक्रांता औरंगजेब की क्रूरता और मंदिर तोड़ने की सच्चाई भी दुनिया के सामने आ सकेगी। विष्णु गुप्ता द्वारा ASI को लिखी गई चिट्ठी की कॉपी ऑपइंडिया के पास मौजूद है।

अजमेर के मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह का सर्वे कराने की माँग को लेकर भी उन्होंने एक याचिका दी है। इसके बाद कोर्ट ने अल्पसंख्यक मंत्रालय और ASI से जवाब माँगा है। इस याचिका के बाद विष्णु गुप्ता को जान से मारने की धमकी भी मिली है। तीन दिन पहले उन्हें कनाडा से के एक नंबर से धमकी भरा कॉल आया था।

 विष्णु गुप्ता को फोन करने वाले कॉल करने वाले कॉलर ने उन्हें ‘सर तन से जुदा’ करने की धमकी दी थी। विष्णु गुप्ता ने बताया था कि धमकी देने वाले ने कहा था, “तेरा सिर कलम कर दिया जाएगा, गर्दन काट दी जाएगी। तुमने अजमेर दरगाह का केस फाइल करके बहुत बड़ी गलती कर दी है। अब तू नहीं बचेगा।”