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मध्य प्रदेश : मस्जिद की खुदाई में निकली भगवान राम और माँ सीता की मूर्ति, हिंदू पूजा करने पहुँचे: सागर का मामला, पुरात्व विभाग जाँच में जुटा

     मध्य प्रदेश में मस्जिद की खुदाई में मिली राम-सीता की मूर्तियाँ (साभार : livehindustan & Dainikbhaskar)
आज मुस्लिम कट्टरपंथियों और इनको समर्थन देने वाले नेताओं और उनकी पार्टियों ने "सेकुलरिज्म और गंगा-जमुनी तहजीब" जैसे पाखंडी और गुमराह करने वालों नारों से देश को पागल बना बारूद के ढेर पर बैठा दिया है। इनमें कोई माई का लाल बताए कि किस मुस्लिम मुल्क में सेकुलरिज्म है? भारत में जब तक हिन्दू बहुसंख्यक है ये पाखंडी "सेकुलरिज्म" है, खुदा न खास्ता अगर भारत गजवा-ए-हिन्द बन गया इन्ही नेताओं और उनकी पार्टियों द्वारा "सेकुलरिज्म" बोलने पर मुस्लिम कट्टरपंथियों की प्रताड़ना झेलनी पड़ेगी और सिर पर हाथ रखकर रोयेंगे। देशहित में सरकार को इन पाखंडी और जनता को भ्रमित करने वाले नारों पर प्रतिबन्ध लगाना चाहिए। 

दूसरे, मथुरा, काशी और अन्य स्थानों पर खुदाई का विरोध क्यों किया जाता है अयोध्या के बाद अब उसका जीवित उदाहरण मध्य प्रदेश है। जहां मस्जिद की चार दीवारी बनाए जाने के लिए हो रही खुदाई में पुरुषोत्तम श्रीराम और सीता माता की मूर्ति निकली। मध्य प्रदेश को चाहिए कि मस्जिद के पूरे परिसर की खुदाई करवाए।             

मध्य प्रदेश के सागर जिले के पापेड़ गाँव में मस्जिद की चारदीवारी के लिए चल रही खुदाई के दौरान जमीन के नीचे से भगवान राम की कुछ मूर्तियाँ मिली हैं। मूर्तियाँ मिलते ही गाँव में खबर आग की तरह फैल गई। हिंदू समाज के लोग बड़ी संख्या में मौके पर पहुँचे और मूर्तियों की पूजा शुरू कर दी, साथ ही मंदिर बनाने की माँग करने लगे।

इससे हिंदू और मुस्लिम, दोनों समुदायों के बीच तनाव की स्थिति बन गई। हालात संभालने के लिए पुलिस और प्रशासन के अधिकारी मौके पर पहुँचे और फिलहाल निर्माण कार्य रुकवा दिया गया है। प्रशासन ने मूर्तियों की जाँच के लिए पुरातत्व विभाग को बुलाया है।

मस्जिद की खुदाई में मिलीं प्राचीन मूर्तियाँ

जानकारी के अनुसार, यह घटना सागर जिले की बंडा तहसील के पापेड़ गाँव की है। गाँव में बनी एक मस्जिद के परिसर में चारदीवारी बनाने के लिए खुदाई का काम चल रहा था। इसी खुदाई के दौरान जमीन के अंदर से भगवान राम और माता सीता की कुछ प्राचीन मूर्तियाँ मिली हैं। इनमें से कुछ मूर्तियाँ खंडित भी हैं। मजदूरों ने जब मूर्तियाँ मिलने की जानकारी गाँव वालों को दी, तो यह खबर तुरंत पूरे गाँव में फैल गई।

हिंदू संगठनों ने की पूजा और की मंदिर की माँग

मूर्तियाँ मिलने की सूचना मिलते ही हिंदू संगठनों और गाँव के लोग बड़ी संख्या में मौके पर पहुँच गए। उन्होंने वहाँ मिली मूर्तियों की पूजा-अर्चना शुरू कर दी। हिंदू संगठनों ने तो भगवान राम का अभिषेक करके, वहीं एक चबूतरा बनाकर मूर्तियों को स्थापित भी कर दिया। हिंदू संगठनों की माँग है कि इस जगह पर मंदिर बनाया जाए। उनका दावा है कि पहले यहाँ एक मंदिर था, जिसे तोड़कर मस्जिद बना दी गई थी।

दो समुदायों के आमने-सामने आने से बढ़ा तनाव

मंदिर बनाने की माँग को लेकर हिंदू और मुस्लिम, दोनों समुदायों के लोग आमने-सामने आ गए। इससे गाँव में माहौल तनावपूर्ण हो गया। मुस्लिम पक्ष के ग्रामीणों का कहना है कि यह जमीन करीब 200 साल पहले मस्जिद को दी गई थी। उनका यह भी कहना है कि मूर्तियाँ मस्जिद परिसर में नहीं मिली हैं, बल्कि पास में पत्थरों की खखरी (ढेर) से मिली हैं, जिन्हें बाद में परिसर में रखा गया है। दोनों पक्षों की बातों से गाँव में तनाव की स्थिति पैदा हो गई।

प्रशासन ने रुकवाया निर्माण, होगी पुरातत्व विभाग की जाँच

तनावपूर्ण स्थिति को देखते हुए तुरंत पुलिस और प्रशासन की टीम मौके पर पहुँची। अधिकारियों ने दोनों पक्षों को समझा-बुझाकर माहौल को शांत कराया। बंडा एसडीएम नवीन ठाकुर ने बताया कि फिलहाल मौके पर चल रहे निर्माण कार्य को रुकवा दिया गया है।
उन्होंने साफ किया कि यह जमीन मस्जिद के स्वामित्व की है, लेकिन जाँच पूरी होने तक कोई निर्माण नहीं होगा। मूर्तियों को पुलिस की निगरानी में रखा जाएगा और उनकी जाँच पुरातत्व विभाग से कराई जाएगी। जाँच के बाद ही यह पता चल पाएगा कि ये मूर्तियाँ कितनी पुरानी हैं और किसकी हैं।

उत्तर प्रदेश : जब रूस से लौटे समाजवादी पार्टी यूथ विंग अध्यक्ष इंजीनियर दीपक त्यागी को लव जिहाद की एक घटना ने बना डाला महंत यति नरसिंहानन्द; लेकिन अनवर शेख से लेकर Understanding Muhammad and Muslims पर चुप्पी क्यों?

 
डासना मंदिर के महंत यति नरसिंहानंद के खिलाफ शुक्रवार (4 अक्टूबर 2024) को भारत के कई हिस्सों में मुस्लिम भीड़ ने हिंसक प्रदर्शन किया। मुस्लिम भीड़ यति नरसिंहानंद को गुस्ताख़ बताते हुए अपने पैगंबर के अपमान का आरोप लगा रही थी। यति नरसिंहानंद इससे पहले भी कई बार अपने बयानों को लेकर चर्चा में रहे हैं। मुस्लिम बहुल इलाके में मौजूद पौराणिक डासना मंदिर का महंत बनने से पहले यति नरसिंहानंद की पहचान इंजीनियर दीपक त्यागी के तौर पर हुआ करती थी। आइए जानते हैं कि कैसे एक इंजीनियर रहे दीपक ने भगवा धारण करके अपने जीवन को पूरी तरह से बदला।

सबसे ज्वलंत प्रश्न यह है कि जब कोई गैर-मुस्लिम पैगम्बर या इस्लाम के विरुद्ध जरा-सा भी कुछ बोलता है कट्टरपंथी 'सिर तन से जुदा' गैंग को मैदान में उतार देते हैं, जब वही बात मुस्लिम बोलता है तब क्यों नहीं उनके खिलाफ बोलते? अनवर शेख द्वारा अपने जीवनकाल में कई पुस्तकें लिखने के साथ एक्स मुस्लिम पुस्तकें लिख रहे हैं, सोशल मीडिया लेखक अली सीना द्वारा लिखित पुस्तक Understanding Muhammad and Muslims पर वायरल है। किसी की आवाज़ नहीं निकल रही, सारे कट्टरपंथी अंधे और गूंगे बन गए हैं। जबकि इस किताब में लेखक अली सीना ने साफ लब्जों में थूक से लेकर चॉकलेट पर शौच लगाए जाने तक की घटनाओं का जिक्र किया है, जिस कारण इस्लाम पूरी दुनियां में बदनाम हो रहा है। दूसरे, इस पुस्तक को पढ़ने के बाद मुसलमान इस्लाम छोड़ रहे हैं। नूपुर शर्मा विवाद दिनों में इनके आक्रोश को देख शक हो रहा था कि जिस दिन इन एक्स मुस्लिमों की संख्या 1+ लाख हो गयी हैवानियत करने वाले 'सिर तन से जुदा' गैंग और इनको समर्थन देने वालों का क्या होगा, जब ये जमात सोशल मीडिया से बाहर निकल इन दहशतगर्तों के खिलाफ सडकों पर होंगे? सनातन के विरुद्ध अनर्गल बातें हिन्दू बर्दाश्त कर सकता है, लेकिन ये जमात बर्दाश्त नहीं करेगी।       

दूसरे, इन एक्स मुस्लिमों की निपुणता नूपुर शर्मा तथाकथित विवाद के दिनों में Jaipur Dialogue, Sach और NewsNation पर 'इस्लाम क्या कहता है' पर देखने को मिली। इनके सवालों पर उन मौलानाओं को, जिन्हे हर मुसलमान बड़ी इज्जत बक्शता है, AC में पसीने पोंछते देखा। इन लोगों द्वारा कुरान की आयत ठीक से न पढने इन एक्स मुस्लिमों ने फटकार भी लगाई।         

रूस में पढ़ाई, लंदन में नौकरी

वर्तमान में महामंडलेश्वर की पदवी प्राप्त महंत यति नरसिंहानन्द की उम्र लगभग 55 वर्ष है। उनके पिता रक्षा मंत्रालय में नौकरी करते थे। रिटायरमेन्ट के बाद वो कांग्रेस से जुड़ गए थे। उन्होंने अपने बेटे दीपक की शुरूआती शिक्षा-दीक्षा मेरठ से करवाई। हालाँकि वो मूलतः बुलंदशहर के निवासी थे। बाद में उच्च शिक्षा के लिए दीपक त्यागी रूस गए। यहाँ वो मॉस्को सहित अन्य कई शहरों में रहे। रूस में उन्होंने ‘मॉस्को इंस्टिट्यूट ऑफ केमिकल मशीन बिल्डिंग’ से मास्टर्स की डिग्री ली।
उन्होंने बतौर इंजीनियर लम्बे समय तक कार्य किया। तब दीपक त्यागी को लंदन तक से नौकरी के ऑफर मिले। उन्होंने यहाँ मार्केटिंग टीम का भी नेतृत्व किया। यति नरसिंहानंद का यह भी दावा है कि वो इजरायल की भी यात्रा कर चुके हैं और साथ ही उन्हें 1992 में ‘ऑल यूरोप ओलम्पियाड’ में गणित से विजेता घोषित किया गया था। कई अलग-अलग देशों में रहते हुए लगभग 10 वर्षों के बाद साल 1997 में दीपक त्यागी भारत लौट आए।

राजनीति से रहा जुड़ाव

दीपक त्यागी (वर्तमान में यति नरसिंहानन्द) जब भारत लौटे तो उस समय उत्तर प्रदेश की राजनीति में में समाजवादी पार्टी का बोलबाला हुआ करता था, तब यूपी के सबसे बड़े नेता मुलायम सिंह यादव माने जाते थे। दीपक त्यागी को एक बार समाजवादी पार्टी में यूथ विंग का अध्यक्ष पद ऑफर हुआ तो उन्होंने स्वीकार कर लिया। इस दौरान दीपक त्यागी के बहुत से मुस्लिम दोस्त भी बने। दीपक त्यागी के पूर्वज भी समाजवादी विचारधारा वाले थे।

भाजपा नेता के भाषणों से जगी हिंदुत्व में आस्था

यति नरसिंहानन्द ने कई बार खुले मंचों से भाजपा नेता बी एल शर्मा प्रेम (अब दिवंगत) को अपना गुरु बताया है। वो बताते हैं कि समाजवादी पार्टी का पदाधिकारी रहने के दौरान उनको कई बार बी एल शर्मा ‘प्रेम’ (बैकुंठ लाल शर्मा) के भाषण सुनने को मिला। उनके द्वारा रखे गए तथ्य और दिए जाने वाले सबूतों से दीपक त्यागी का झुकाव धीरे-धीर उनकी तरफ होने लगा। हालाँकि इसके बावजूद वो समाजवादी पार्टी से जुड़े रहे।

लव जिहाद की एक घटना ने बना दिया नरसिंहानंद

दीपक त्यागी के यति नरसिंहानंद बनने के पीछे लव जिहाद की एक घटना ने बहुत अहम रोल अदा किया। वह घटना शम्भू दयाल कॉलेज में पढ़ने वाली त्यागी समाज की एक लड़की से जुड़ी है जिसने तब रो-रो कर उनको (यति नरसिंहानंद) अपनी पीड़ा बताई थी। पीड़िता ने उन्हें बताया था कि एक मुस्लिम सहेली ने उसकी जान-पहचान अपने मजहब के लड़के से करवा दी थी। दोस्ती के ही दौरान मुस्लिम युवक ने पीड़िता के साथ अपने कुछ फोटो और वीडियो बना डाले थे। इसी फोटो व वीडियो को दिखाकर पीड़िता को कई मुस्लिम युवकों से संबंध बनाने के लिए मजबूर किया गया था।
तब पीड़िता ने दीपक त्यागी को यह भी बताया कि उसके मुस्लिम साथी ने उसको न सिर्फ अपने दोस्तों बल्कि कई नेताओं और यहाँ तक कि प्रिंसिपल तक के आगे परोसा था। लड़की ने दीपक त्यागी पर भी आरोप लगाया कि उनको चुप रहने के लिए कुछ न कुछ लालच दिया गया होगा। यहीं से दीपक त्यागी के मन को आघात लगा और वो हिंदुत्व की तरफ झुकते चले गए। उनको बी एल शर्मा प्रेम के दावों का सबूत जैसा मिल गया और वो दीपक त्यागी से यति नरसिंहानंद बन गए।

हिन्दुओं को जोड़ने के लिए चलाया ‘अजगर’ अभियान

जिस समय दीपक त्यागी ने खुद को यति नरसिंहानंद के रूप में ढाला तब उन्होंने हिंदू समाज को तोड़ने के लिए राजनैतिक लोगों द्वारा की जा रही साजिशों को समझना शुरू किया। उन्होंने पाया कि पश्चिम उत्तर प्रदेश में हिंदू धर्म की 4 जातियों के बीच लड़ाने की सबसे अधिक साजिश होती है। ये जातियाँ यादव, जाट, गुर्जर और राजपूत थीं। आरोप है कि तब अलग-अलग जातियों के अपने-अपने नेता थे जो एक दूसरे के खिलाफ वैमन्सयता फैला कर मुस्लिम वोट बैंक को साधते थे।
यति नरसिंहानंद ने इन चारों जातियों को जोड़ने के लिए एक अभियान चलाया था जिसका नाम उन्होंने ‘अजगर’ दिया था। अजगर एक शॉर्ट फॉर्म था जिसका पूरा नाम अहीर, जाट, गुर्जर और राजपूत था। यति नरसिंहानंद ने पश्चिम उत्तर प्रदेश के कई हिस्सों में अजगर सभाएँ करवाईं। इन सभाओं में सभी जातियों को एक दूसरे का पूरक बनने और हिंदुत्व के लिए खड़े होने का संकल्प दिलवाया जाता था। इन्हीं सभाओं में यति नरसिंहानंद मुस्लिमों को देश और हिंदू धर्म के लिए खतरा बताते हुए जनसंख्या नियंत्रण कानून लाने की वकालत करते थे।

डासना मंदिर को चुना स्थाई ठिकाना

अपने एक इंटरव्यू में यति नरसिंहानंद ने ऑपइंडिया को बताया था कि हिन्दुओं को जागृत करने के लिए उनको एक स्थाई ठिकाने की जरूरत थी। आखिरकार उन्होंने मुस्लिम बहुल इलाके डासना में मौजूद शक्तिपीठ देवी मंदिर को चुना। वहाँ जाने से पहले ही उनको पता चला था कि उनसे पहले भी कई संतों और महंतों की मंदिर में हत्या की जा चुकी थी। मंदिर में डकैती डालकर कई बार लूट भी हो चुकी थी।
यति नरसिंहानंद बताते हैं कि दशकों पहले ही उस मंदिर पर मुस्लिम आबादी कब्ज़ा करने की कगार पर थी लेकिन उन्होंने ऐसा न होने देने का संकल्प लिया। इसी संकल्प के साथ वो डासना मंदिर के पुजारी बन गए और बाद में महंत। ताजा घटनाक्रम से पहले भी उन पर मंदिर में कई बार हमले की कोशिश की जा चुकी है। हालाँकि उन्होंने किसी डर या दबाव में मंदिर छोड़ने से साफ इंकार कर दिया।

महाराष्ट्र : हाजी मलंग की दरगाह के नीचे गुरु मछिंद्रनाथ का मंदिर: हिंदू समूहों का दावा, बोले महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री - मैं इसे मुक्त कराऊँगा

                              एकनाथ शिंदे और दरगाह (चित्र साभार: NDTV & Fiazan E qadir/FB)
रामजन्मभूमि विवाद के समय हिन्दू संगठनों ने मुस्लिम कट्टरपंथियों से कहा था कि "हिन्दुओं के तीन तीर्थ-अयोध्या, काशी और मथुरा- दे दो, हम बाकि मस्जिद अथवा दरगाह से अपना अधिकार छोड़ देंगे।" लेकिन कट्टरपंथी और इनके छद्द्म सेक्युलरिस्ट्स विवादों को जिन्दा रख अपनी तिजोरियां भरने पर लगे रहे। यह लगभग सभी राजनीतिज्ञों का मानना था कि जब तक केंद्र और उत्तर प्रदेश में बीजेपी सरकारें नहीं बनती, ये विवाद समाप्त नहीं होंगे। कालचक्र ऐसा घूमा कि 2014 में बीजेपी सरकार आ गयी और अयोध्या मुद्दा सुलझ गया, काशी और मथुरा बाकि हैं। लेकिन इनके अलावा अब तक 4 और निशाने पर आ गए हैं। संभावनाएं व्यक्त की जा रही हैं कि 2024 चुनावों के बाद कोर्ट में इस विवादित मुद्दों की एक लम्बी कतार लगने वाली है। आखिर कब तक कट्टरपंथी और छद्दम सेक्युलरिस्ट्स वास्तविकता को छुपाकर जनमानस को गुमराह करते रहेंगे। 

महाराष्ट्र के ठाणे जिला में स्थित हाजी अब्दुल रहमान उर्फ़ मलंग शाह की दरगाह को लेकर एक बार फिर विवाद गहरा गया है। हिन्दू संगठनों का दावा है कि इस दरगाह के नीचे हिन्दू मंदिर हैं। उन्होंने इसकी जाँच की माँग को तेज कर दिया है। हिंदू संगठनों की इस कोशिश में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे का साथ मिला है।

क्या है इस हाजी मलंग शाह की दरगाह को लेकर विवाद?

मलंग शाह दरगाह ठाणे की माथेरान पहाड़ियों पर स्थित एक दुर्ग (किला) में स्थित है। दुर्ग का नाम मलंगगढ़ है। यहीं पर हाजी मलंग शाह नाम की यह दरगाह स्थित है। मुस्लिम पक्ष का कहना है कि यह दरगाह 12वीं शताब्दी में यमन से भारत आए सूफी फकीर अब्द उल रहमान या अब्दुल रहमान की है।
दूसरी तरफ हिन्दू पक्ष इस तर्क से सहमत नहीं है। हिंदू पक्ष का कहना है कि मुस्लिमों का दरगाह नहीं, बल्कि गुरु गोरखनाथ के गुरु और नवनाथों में से एक गुरु मछिंद्रनाथ का मंदिर है। हिन्दू पक्ष का कहना है कि नाथ परम्परा को समर्पित यह हिंदू मंदिर इस दरगाह के नीचे स्थित है।

कहाँ से शुरू हुआ विवाद?

इस दरगाह को लेकर सदियों से विवाद चला आ रहा है। इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में कहा गया है कि 18वीं शताब्दी में यहाँ मराठाओं ने इस धार्मिक स्थल का प्रबन्धन करने के लिए काशीनाथ पन्त केतकर को भेजा था। तब से आज तक काशीनाथ पंत केतकर नाम के ब्राह्मण का परिवार ही इस दरगाह का प्रबंधन देखता है।
हालाँकि, स्थानीय मुस्लिमों ने इसका विरोध किया। उनका कहना था कि यहाँ दरगाह है और इसका प्रबन्धन एक हिंदू नहीं कर सकता। हालाँकि, बाद में इसका निर्णय एक लॉटरी के जरिए किया गया, जिसमें निर्णय केतकर के पक्ष में गया। इसके बाद इस दरगाह पर 1980 के दशक में दोबारा विवाद हुआ।
दरगाह के साथ में मंदिर होने का दावा लेकर शिवसेना के नेता आनंद दीघे ने आवाज उठाई और मछिन्द्रनाथ के मंदिर को लेकर शिवसैनिकों को यहाँ 1996 में पूजा की। इस पूजा में महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री मनोहर जोशी भी शामिल हुए थे। यहाँ पर हिन्दू मछिन्द्रनाथ की पूजा, आरती और रोज भोग लगाते हैं। हर पूर्णिमा को यहाँ विशेष पूजा होती है।
हिंदुओँ के साथ-साथ यहाँ मलंग शाह के अनुयायी भी पहुँचते हैं। कई बार हिन्दू श्रद्धालुओं के साथ यहाँ बदसलूकी और पूजा में व्यवधान डालने के मामले में भी सामने आए हैं। मार्च 2021 में ऐसा ही एक मामला सामने आया था, जब आरती कर रहे हिन्दू श्रद्धालुओं के सामने 50-60 मुस्लिमों ने ‘अल्लाह हू अकबर’ के नारे लगाए थे। इसके अलावा भी समय-समय पर यहाँ इस तरह के मामले सामने आते रहे हैं।

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री ने क्या कहा?

महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे ने हिन्दू भक्तों से कहा है, “मलंगगढ़ को लेकर आपकी भावनाओं को मैं समझता हूँ। आनंद दीघे ने इस मंदिर को मुक्त करवाने को लेकर अभियान शुरू किया था। उन्होंने हमें ‘जय मलंग, श्री मलंग’ के नारे लगवाये थे। मैं आपको बताना चाहता हूँ कि कुछ मामले ऐसे होते हैं, जो जनता में बात करने के लिए नहीं होते। मैं मलंगगढ़ के विषय में आपकी भावनाएँ जानता हूँ और कहना चाहता हूँ कि एकनाथ शिंदे आपकी इच्छाओं को पूरा करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा।”
महाराष्ट्र के वर्तमान मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे, आनंद दीघे के राजनीतिक शिष्य हैं। आनंद दीघे महाराष्ट्र में शिवसेना के बड़े नेता थे और जहाँ बाल ठाकरे पार्टी का करिश्माई चेहरा थे तो वहीँ आनंद दीघे का संगठन बनाने में बड़ा हाथ माना जाता है।

खरगोन का पुराना वीडियो वायरल : 'कर देंगे तड़ी पार, बुलाऊँ क्या अली को…’: मंदिर के बाहर तमंचे और हरे झंडे के साथ नजर आई मुस्लिम भीड़

                                 मंदिर के बाहर तमंचे और हरे झंडे के साथ नजर आई मुस्लिम भीड़, पुराना वीडियो वायरल
मध्य प्रदेश के खरगोन में रामनवमी के मौके पर निकली शोभायात्रा पर रविवार (10 अप्रैल 2022) को जमकर पथराव किया गया। बताया गया कि मस्जिद के बाहर डीजे को लेकर मुस्लिमों ने आपत्ति जताई थी वहीं राम भक्तों पर पथराव के साथ 30 से ज्यादा दुकानों और मकानों में आग लगा दी गई और मंदिरों में भी तोड़फोड़ की गई थी। वहीं कई पुराने वीडियो वायरल हो रहे हैं जिसमें मुस्लिम भीड़ इस्लामी गाने पर कट्टा और हथियार लहराते हुए मंदिर के बाहर डांस करती नजर आ रही है।

स्वराज की पत्रकार स्वाति गोयल शर्मा ने एक पुराना वीडियो ट्वीट करते हुए लिखा है, “ये है खरगोन, जहाँ एक मस्जिद के बाहर संगीत बजाने पर रामनवमी के जुलूस पर पथराव किया गया है। जबकि यह ठीक एक मंदिर के सामने हो रहा है। हाथ में पिस्तौल लिए भीड़ को देखिए।”

उन्होंने अपने दूसरे ट्वीट में वीडियो को संभवतः 2018 का बताते हुए लिखा है, “मध्य प्रदेश के खरगोन में एक मंदिर के पास से हरे झंडे और डीजे के साथ जुलूस, जहाँ रामनवमी के जुलूस पर पत्थरों से हमला किया गया था।” उन्होंने अपने उसी ट्वीट में गाबे के बोल भी शेयर किए हैं जो कि भड़काऊ हैं।

इस्लामी गाने के बोल है-

कर देंगे तड़ी पार
बुलाऊँ क्या अली को
एक बार में मिट जाएगा हर बार का झगड़ा
बुलाऊँ क्या अली को

वहीं स्वाति गोयल शर्मा ने ओवैसी को टैग करते हुए एक और वीडियो शेयर किया है जिसमें मुस्लिम भीड़ इस्लामी गाने पर मंदिर के बाहर नाचती-कूदती नजर आ रही है। उत्तराखंड के इस वीडियो में भी गाने के बोल भड़काऊं हैं।

जहाँ खरगोन में इतने भड़काऊ इस्लामी गीत पर मुस्लिम भीड़ खुलेआम हथियार लहराते हुए मंदिर के बाहर डीजे बजाकर उछल रही है जबकि पूरे इलाके में हिन्दुओं द्वारा कोई उपद्रव पैदा नहीं किया गया। वहीं रामनवमी पर हिन्दुओं की शोभायात्रा को बस इसलिए निशाना बनाया गया, पत्थरबाजी की गई, दुकानें जलाई गईं कि शोभायत्रा में डीजे बज रहा था।

हालाँकि दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के मुताबिक रामनवमी शोभायात्रा पर पथराव और खरगोन में हिंसा की घटना अचानक नहीं घटी। यह पूर्व नियोजित हमला था। उपद्रवियों ने पहले से ही छतों पर पत्थर और पेट्रोल बम जमा कर रखे थे। एक बार नहीं, बल्कि दो-दो बार आगजनी की घटना को अंजाम दिया गया। यहाँ तक कि शाम में हुए हमले के बाद शांति-व्यवस्था कायम रखने के लिए कर्फ्यू लगा दिया गया था। इसके बाद रात के लगभग 12 बजे एक बार फिर से हिंसा भड़की और कई घरों को आग के हवाले कर दिया गया। कई घरों में लूटपाट की गई। जिस पर बाद में शिवराज सरकार ने बुलडोजर चलाकर एक्शन भी लिया।

खरगोन में हर साल रामनवमी के मौके पर तालाब क्षेत्र से शोभा यात्रा निकाले जाने की परंपरा रही है। इस साल भी बड़ी तैयारी के साथ दोपहर 3 बजे ये शुरू हुआ। मुख्य झाँकी को दांगी मोहल्ले में ही खड़ा कर रामनवमी की शोभा यात्रा रोकनी पड़ी थी। फायर फाइटर का कांच तोड़ दिया गया था। बिजली ट्रांसफर्मरों को आग के हवाले किया गया। वहीं यह भी बताया जा रहा है कि 7 साल पहले भी जब खरगोन में दंगे हुए थे तो इसी तरह से भारी संख्या में घरों की छतों पर पत्थर मिले थे।

कोरोना वैक्सीन के खिलाफ मिशनरी प्रोपेगंडा पर चुप क्यों मीडिया? ‘बाइबिल ठीक करेगा कोरोना’

देश भर में कोरोना वायरस की वैक्सीन को लेकर जहाँ केंद्र सरकार जागरूकता फैलाने में लगी हुई है और रोज ज्यादा से ज्यादा टीकाकरण का लक्ष्य लेकर चल रही है, वहीं कुछ देश विरोधी मजहबी ताकतें ऐसी हैं जो मोदी विरोधियों के संरक्षण में कोरोना के खिलाफ इस लड़ाई को कमजोर कर के कट्टरता के सहारे लोगों को बरगलाने में लगी हुई है। हाल ही में हमने बताया था कि कैसे ‘इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (IMA)’ के अध्यक्ष JA जयलाल देश के अस्पतालों में ईसाई धर्मांतरण की साज़िश रच रहे थे।

भारत के स्वास्थ्य प्रोफेशनल्स के सबसे बड़े परिषद ‘इंडिया मेडिकल एसोसिएशन (IMA)’ के अध्यक्ष JA जयलाल ‘सेक्युलर संस्थाओं’ के ईसाई धर्मांतरण की इच्छा रखते हैं और चाहते हैं कि अस्पतालों का इस्तेमाल भी ईसाई धर्मांतरण के लिए हो। उन्होंने कहा था कि वे चाहते हैं कि IMA ‘जीसस क्राइस्ट के प्यार’ को साझा करे और सभी को भरोसा दिलाए कि जीसस ही व्यक्तिगत रूप से रक्षा करने वाले हैं। उनका मानना है कि चर्चों और ईसाई दयाभाव के कारण ही विश्व में पिछली कई महामारियों और रोगों का इलाज आया।

इतने बड़े पद पर बैठा व्यक्ति जब इस तरह की बातें करता है तो मीडिया उसकी आलोचना क्यों नहीं करती? मीडिया में उसकी आलोचना तो दूर की बात, कहीं उसकी मंशा को लेकर एक खबर तक नहीं मिलेगी। जिस व्यक्ति को एक वैज्ञानिक और मेडिकल प्रोफेशनल्स की संस्था का मुखिया चुना गया है, वो इसके इस्तेमाल मजहबी गतिविधियों के लिए करता है और मीडिया में कहीं कोई सवाल नहीं।

इन चीजों का अब दुष्प्रभाव भी देखने को मिल रहा है। उत्तर-पूर्वी राज्यों में ईसाई संगठनों ने कोरोना वैक्सीन को लेकर इतनी अफवाहें फैलाई हैं कि वहाँ लोग इसे ‘शैतानी ताकत’ बताते हुए इसकी डोज लेने से इनकार कर रहे हैं। ‘प्रेयर वॉरियर्स’ जैसी संस्थाएँ इसके पीछे हैं। एक ईसाई संगठन ने टीकाकरण को ‘ईश्वर की इच्छा के विरुद्ध’ बताते हुए इससे दूर रहने की अपील की थी। बरगलाया गया कि कोरोना का टीका लेने वाले ईसाई साम्राज्य में प्रवेश नहीं कर पाएँगे।

इसके पीछे जयलाल किस्म के लोग ही हैं। ये लोग मेडिकल संस्थाओं से लेकर चर्चों तक में बैठे हुए हैं। ऐसा नहीं है कि अन्य मजहबों में ये समस्या नहीं है। महाराष्ट्र और गुजरात में मुस्लिमों को कोरोना वैक्सीनेशन के प्रति जागरूक करने के लिए मस्जिदों से अजान के वक़्त इसके बारे में बताया गया, लेकिन असर ढाक के तीन पात ही रहा। कुछ मुस्लिम बहुल इलाकों में अफवाह फैली कि कोरोना वैक्सीन से लोग नपुंसक हो जाएँगे।

लेकिन, ईसाई मिशनरियों द्वारा इस तरह के अफवाह फैलाने के दुष्परिणाम दूरगामी होते हैं। भारत में ईसाईयों में अधिकतर वो लोग हैं, जो पहले हिन्दू थे और गरीबी के कारण उन्हें लालच देकर ईसाई बनाया गया। धर्मांतरण का ये खेल केरल से लेकर झारखंड और उत्तर-पूर्व तक चल रहा है। गरीबों पर इस महामारी की सबसे ज्यादा मार पड़ी है और उन्हें ही टीके से दूर किया जा रहा है। मणिपुर के ईसाईयों का मानना है कि उन्हें वैक्सीन नहीं, बाइबिल बचाएगी।

इसी तरह मध्य प्रदेश के रतलाम में एक महिला डॉक्टर मरीजों से ये कहते हुए पाई गई कि वो ठीक होने के लिए जीसस से प्रार्थना करें। बाजना गाँव में अनुबंध पर बहाल ये डॉक्टर ‘कोरोना को मारने के लिए’ ईसाई मजहबी गतिविधियों का प्रचार कर रही थी। भाजपा विधायक रामेश्वर शर्मा ने इस घटना के बारे में ट्वीट करते हुए कहा भी कि दवाई की जगह धर्म परिवर्तन की घुट्टी पिलाने वालों को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।

आज अगर ये सब हो रहा है तो इसके पीछे वो नेतागण भी जिम्मेदार हैं, जो विपक्ष में बैठे हुए हैं। राहुल गाँधी से लेकर अखिलेश यादव तक ने कोरोना वैक्सीन को लेकर जम कर अफवाहों का बाजार गर्म किया। अखिलेश ने तो इसे "बीजेपी वैक्सीन" बताया था। विपक्षी दलों व इनके नेताओं ने कभी वैक्सीन के ट्रायल को लेकर तो कभी इसके ‘साइड इफेक्ट्स’ को लेकर अफवाहें फैलाईं। आज यही नेता टीकाकरण के आँकड़े दिखा कर इसके धीमे होने का आरोप लगा रहे हैं।

इनके लिए वैक्सीन पहले अच्छा था और अब बुरा हो गया है। इन नेताओं ने जम कर विदेशी वैक्सीन्स की पैरवी की। इसके लिए पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्टर मनमोहन सिंह से पत्र भी लिखवाया गया। वो अलग बात है कि उन्होंने और उनकी पत्नी ने स्वदेशी वैक्सीन की दोनों डोज ले ली थी। इसके बाद दोनों कोरोना संक्रमित हुए लेकिन अस्पताल से सकुशल वापस आए। वैक्सीन की दूसरी डोज लेने के बाद एंटीबॉडी बनने में दो हफ्ते का वक़्त लगता है।

इन सबके बावजूद सवाल किस से पूछे जा रहे हैं? हिन्दुओं से। निशाना किस पर साधा जा रहा है? मंदिरों पर। उन मंदिरों पर जो लंदन से लेकर अयोध्या तक जनहित के कार्यों में लगे हुए हैं। UK की सरकार ने कोरोना के खिलाफ जागरूकता के लिए वहाँ के स्वामीनारायण मंदिर की मदद ली। अयोध्या में राम मंदिर ने अपने निर्माण से पहले ही ऑक्सीजन प्लांट्स लगवाने का फैसला लिया। कई मंदिरों ने राज्यों और केंद्र के आपदा कोष में धन दान किए। 

मुंबई में जैन मंदिरों ने खुद को कोविड केयर सेंटर्स में तब्दील कर लिया। काशी विश्वनाथ मंदिर ने गरीबों के भोजन का बीड़ा उठाया। तिरुपति बालाजी मंदिर के कर्मचारियों ने अपना 1 दिन का वेतन दान किया। पटना के महावीर मंदिर, गुजरात के सोमनाथ मंदिर और बनासकांठा के अम्बाजी मंदिर ने एक-एक करोड़ रुपए सरकार को दान में दिए। इस तरह हर छोटे बड़े मंदिरों, मठों व साधुओं ने अपना-अपना योगदान दिया।

अवलोकन करें:-

मध्य प्रदेश : आदिवासी बहुल इलाके में कोविड-19 ड्यूटी के दौरान ईसाई धर्म का प्रचार करती नर्स

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मध्य प्रदेश : आदिवासी बहुल इलाके में कोविड-19 ड्यूटी के दौरान ईसाई धर्म का प्रचार करती नर्स
‘चीन के प्रोपेगंडा ने मीडिया को बना दिया अंधा, वुहान लैब से कोरोना के लीक होने पर नहीं की गई रिसर

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‘चीन के प्रोपेगंडा ने मीडिया को बना दिया अंधा, वुहान लैब से कोरोना के लीक होने पर नहीं की गई रिसर

कभी किसी खबर में सुना कि इन्होंने दान के बदले में धर्मांतरण को आगे बढ़ाया हो? ये काम तो वो लोग कर रहे हैं, जिन्हें दवाओं और मेडिकल गाइडलाइंस के प्रति लोगों में जागरूकता फैलानी चाहिए। पर IMA के JA जयलाल जैसे लोग उलटे बाबा रामदेव पर आरोप लगा रहे हैं कि जीवन को खतरे में डालने और एलोपैथी दवाओं को लेकर झूठी अफवाह फैलाने के लिए उन पर मुकदमा चलाया जाना चाहिए।

AAP की IT सेल वाली अंकिता ने करवा दी अपने ही नेता केजरीवाल की बेइज्जती

अंग्रेजी में एक कहावत "Eye or no eye" यानि भारत जिन जयचंदों के कारण गुलाम हुआ था, वह इन्हीं जयचंदों के कारण हुआ था। जो हिन्दू चोला ओढ हिन्दुत्व का विरोध करते हैं। अयोध्या में राममंदिर एवं वास्तविक इतिहास को लेकर कुर्सी के भूखे तुष्टिकरण पुजारियों के बयान आते रहते हैं। ये जयचंद इतने अल्पज्ञानी हैं कि इतिहास से कुछ भी सिखने का प्रयत्न नहीं करते। एक से बढ़कर एक अत्याचारी आए, लेकिन हिन्दुत्व को मिटा नहीं पाए। इतिहास में किसी भी जयचंद का नाम नहीं, अगर कहीं आ भी जाता है, सम्मान के साथ के नहीं।  
सोशल मीडिया पर आम आदमी पार्टी (AAP) की राष्ट्रीय सोशल मीडिया टीम की सदस्य अंकिता शाह ने कोरोना वायरस की बढ़ती दूसरी लहर का फायदा उठा कर यूँ तो राम मंदिर पर निशाना साधना चाहा, लेकिन लोगों ने उनके ही नेता की असलियत उनके सामने रख दी। मंदिर को लेकर भाजपा और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की आलोचना करने वाली अंकिता शाह को लोगों ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की सच्चाई बताई।

अंकिता ने ट्विटर पर लिखा, “कहाँ है वो बेवकूफ जो राम मंदिर का चंदा जमा कर रहे थे, काश सरकारों से मंदिर की जगह हॉस्पिटल माँगे होते तो आज ये दशा नहीं होती! Bloody religious morons…”। उन्होंने राम मंदिर के लिए चंदा इकट्ठा करने वालों को गाली दी। लेकिन, उन्हें एक ट्विटर हैंडल ने याद दिलाया कि कैसे सीएम केजरीवाल ने दिल्ली के सभी मस्जिदों के इमामों का वेतन बढ़ाया था।

लोगों ने पूछा कि अगर मुस्लिमों के लिए सरकार कुछ करे तो ठीक और हिन्दू खुद रुपए जमा करके धर्म के लिए कुछ करें तो वो बुरा कैसे? ‘अद्वितीय’ नामक हैंडल ने लिखा, “कहाँ है ये बेवकूफ जो टैक्स पेयर की मेहनत की कमाई से मस्जिदों के मौलानाओं को तनख्वाह बाँट रहा था। काश ये पैसा वोट बैंक पॉलिटिक्स पर लुटाने की जगह अगर हॉस्पिटल्स में खर्च किया गया होता तो आज दिल्ली की ये दशा नहीं होती।”

जनवरी 2019 में दिल्ली के मस्ज़िदों के इमामों के वेतन को ₹10,000 से बढ़ा कर 18,000 रूपए करने का ऐलान किया गया था। मस्जिदों में अज़ान पढ़ने वाले मुअज़्ज़िनों के वेतन में भी बढ़ोतरी कर इसे 9,000 रूपए  से 16,000 रूपए कर दिया गया था। दिल्ली में ऐसे 1,500 से भी अधिक मस्ज़िद हैं जो बोर्ड के अंतर्गत नहीं आते हैं, उनके कर्मचारियों को भी वेतन की घोषणा हुई थी। उनके इमामों को 14,000 रूपए और मुअज़्ज़िनों को 12,000 रूपए दिए जाने का ऐलान हुआ था।

‘स्नेहा’ नामक ट्विटर यूजर ने वो खबर निकाली, जिसमें सीएम केजरीवाल ने लोगों को मुफ्त में राम मंदिर का दर्शन कराने की घोषणा की थी। उन्होंने खुद को हनुमान भक्त भी बताया था। राम मंदिर के भूमिपूजन के दौरान उन्होंने देशवासियों को बधाई दी थी। अगर मंदिर गलत है तो केजरीवाल ने ये सब क्यों किया? साथ ही लोगों ने ये भी सवाल दागा कि दिल्ली की AAP सरकार ने कितने अस्पताल बनवाए हैं?

फिर लोग एक RTI से हुए खुलासों को लेकर आए। इससे पता चला था कि 2015-19 में दिल्ली सरकार ने एक भी नया अस्पताल या फ्लाईओवर नहीं बनवाया। सीएम केजरीवाल ने दावा किया था कि पिछले साढ़े चार साल में उनकी सरकार ने 23 फ्लाईओवर बनाए हैं, लेकिन वास्तविकता इसके उलट है कि दिल्ली में AAP सरकार ने वर्षों से केवल विज्ञापन ही दिया है। इस खुलासे के बाद भी केजरीवाल सरकार घिरी थी।

दिल्ली : कालिंदी कुंज में 4 गायों को काट कर अवशेष मंदिर के पास फेंका

                                          कालिंदी कुंज में 4 गायों को काट कर फेंका
दिल्ली के कालिंदी कुज इलाके से गाय को काट कर फेंकने का मामला सामने आया है। घटना कालिंदी कुंज थाने के मदनपुर खादर इलाके की है। यहाँ पर कम से कम 4 गायों को काट कर फेंकने की बात कही जा रही है।

इस बाबत ऑपइंडिया ने बीजेपी के पूर्व मंडल अध्यक्ष प्रभु नारायण से बात की। बता दें कि घटना के बारे में सबसे पहले इनको ही जानकारी मिली। जिसके बाद उन्होंने मामले को उजागर किया। उन्होंने बताया कि घटना रात के 2 से 4 बजे के बीच हुई है। उन्होंने बताया कि आरोपित ने गाय को काट कर उसके अंदर का लोथड़ा तीन-चार जगहों पर फेंक रखा है।

वो कहते हैं, “कुल मिलाकर आरोपितों ने 4 गायों को काटा। एक उन्होंने शीतला माता मंदिर पॉकेट-1 के पास फेंका। दूसरे गाय का अवशेष उन्होंने डी ब्लॉक के पार्क के पास स्थित मंदिर के पास फेंके। इसके अलावा कंचनकुंज के नाले के पास उन्होंने गाय का सिर और बाकी अपशिष्ट फेंके। वहाँ पर हमें एक आईडी कार्ड भी मिला था। जो हमने ACP को दे दिया है।”

उनका कहना है कि आरोपित गाय के अपशिष्ट को फेंकने के लिए वहाँ गए थे, मगर गलती से उन्होंने उसका सिर भी फेंक दिया, जो कि वो फेंकते नहीं हैं। यहीं पर नाले में उसका पर्स गिर गया। जिसमें उसके आईडी कार्ड थे। बरामद हुई आईडी कार्ड के मुताबिक उसका नाम इसानुल होडा और उसके पिता का नाम अब्दुल जलील है। 

प्रभु नारायण ने कहा कि ये लोग इधर-उधर घूमती गायों को कुछ खिला देते हैं, जिससे वह अधमरा होकर वहीं पड़ी रहती है। इसके बाद वो वहीं पर उसे काटकर गाड़ी में भर कर चल देते हैं। अवशेष को फेंक देते हैं।

कार्रवाई के बारे में पूछे जाने पर उन्होंने कहा कि फिलहाल अज्ञात लोगों के खिलाफ FIR दर्ज किया गया है। पुलिस ने आश्वासन दिया है कि बरामद आईडी कार्ड के आधार पर तफ्तीश कर रही है। पुलिस का कहना है कि वो बदरपुर के हरि नगर का रहने वाला है। 

पूर्व मंडल अध्यक्ष ने पुलिस पर मामला दबाने का आरोप लगाते हुए कहा कि पुलिस गाड़ी लेकर आ गई और कहा कि इसको जल्दी से भरो इसमें। तुम्हें कैसे पता कि गाय है, सूअर हो सकता है, भैंस हो सकता है। इसके बाद वो लोग इस बात पर अड़ गए कि चेक करवाया जाए कि गाय का है या नहीं। तब जाकर SHO और ACP ने सैंपल इकट्ठा किया। उनका कहना है कि पुलिस का रवैया सहयोगात्मक नहीं है।

उन्होंने कहा कि अगर पुलिस ने कल (फरवरी 19, 2021) तक कार्रवाई नहीं की या फिर संतोषजनक जवाब नहीं दिया तो रविवार (फरवरी 21, 2021) को भारतीय जनता पार्टी और हिंदू संगठन प्रदर्शन करेंगे, विशाल जुलूस निकालेंगे। उन्होंने बताया कि स्थानीय नागरिक विपिन चौहान ने 100 नंबर पर कॉल करके शिकायत दर्ज करवाई थी। वहीं गौरक्षा संगठन से गब्बर चौहान समेत अन्य लोग भी वहाँ पर आए थे। हालाँकि, हमने पुलिस से भी बात करने की कोशिश की, लेकिन उन्होंने फोन उठा कर एक लाइन सुन कर काट दिया। दोबारा कॉल करने पर रिसीव नहीं हुआ।

जब एयरपोर्ट, उद्योग, व्यापार आदि सरकार के हाथ में नहीं, तो फिर मंदिरों पर नियंत्रण कैसे: सद्गुरु

वर्तमान मोदी सरकार द्वारा कई ऐसे कानूनों को ख़त्म किया जा चूका है, लेकिन मंदिरों पर सरकारी कब्जे को समाप्त करने की ओर बिलकुल भी ध्यान नहीं। आखिर हिन्दुओं पर कब तक अत्याचार होता रहेगा?
मंदिरों पर सरकार का स्वामित्व या नियंत्रण देश में एक प्रमुख विषय रहा है। इस पर अब सद्गुरु जग्गी वासुदेव का एक वीडियो ट्विटर पर खूब शेयर किया जा रहा है। समाचार चैनल सीएनएन के रिपोर्टर आनंद नरसिम्हन के साथ इस बातचीत को सद्गुरु ने अपने ट्विटर अकाउंट से एक वीडियो शेयर करते हुए लिखा है, “हम ऐसे समय में रहते हैं जहाँ हम समझते हैं कि सरकार को एयरलाइंस, हवाई अड्डों, उद्योग, खनन, व्यापार का प्रबंधन नहीं करना चाहिए, लेकिन फिर यह कैसे है कि सरकार द्वारा पवित्र मंदिरों का प्रबंधन किया जा सकता है। ये किस तरह से सरकारी प्रबंधन योग्य हो गए?”

इस वीडियो में सद्गुरु ईस्ट इण्डिया द्वारा लाए गए ‘मद्रास रेगुलेशन 1817’ का जिक्र करते हुए बताते हैं कि किस तरह मंदिरों पर अधिकार ज़माने के लिए मद्रास रेगुलेशन-111, 1817 लाया गया, लेकिन ईस्ट इंडिया कम्पनी ने 1840 में यह रेगुलेशन वापस ले लिया था। इसके बाद, 1863 में रिलिजियस एंडोवमेंट एक्ट लाया गया, जिसके अनुसार मंदिर ब्रिटिश ट्रस्टी को सौंप दिए गए।

ये ट्रस्टी ही मंदिर चलाते थे, लेकिन सरकार की दखलअंदाज़ी इसमें न्यूनतम होती थी। मंदिर का पैसा ज़्यादातर मंदिर के कार्यों के लिए ही प्रयोग किया जाता था। सैकड़ों मंदिर इस एक्ट के अनुसार चलते थे। जग्गी वासुदेव बताते हैं कि फिर ब्रिटिश सरकार ‘द मद्रास रिलीजियस एंड चैरिटेबल एंडावमैंट एक्ट-1925’ ले आई, जिससे अब हिन्दुओं के अलावा मुस्लिम और ईसाई संस्थाएँ भी इस कानून के दायरे में आ गईं। ईसाइयों और मुस्लिमों ने इसका कड़ा विरोध किया, तो सरकार को ये कानून दोबारा लाना पड़ा था।

विरोध के चलते ईसाई और मुस्लिमों को इस दायरे से बाहर करना पड़ा और नया कानून बनाया गया जिसका नाम था – ‘मद्रास हिन्दू रिलिजियस एंड एंडोवमेंट एक्ट-1927’। 1935 में इस एक्ट में बड़े बदलाव किए गए। आज़ादी के बाद तमिलनाडु सरकार ने वर्ष 1951 में एक कानून पारित किया- ‘हिन्दू रिलिजियस एंड एंडोवमेंट एक्ट’।

इस कानून को मठों ओर मंदिरों ने मद्रास हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सरकार को बहुत सी धाराएँ हटानी पड़ीं और 1959 में तत्कालीन कॉन्ग्रेस राज्य सरकार ने हिन्दू रिलिजियस एंड चेरिटेबल एक्ट पास किया और बोर्ड भंग कर दिए गए। अब सरकारी ‘हिन्दू रिलिजियस एंड चेरिटेबल एंडावमेंट विभाग’ होता था, जिसका प्रमुख कमिश्नर होता है। तबसे मंदिरों में दान और चढ़ावे की 65 से 70% राशि प्रशासकीय कार्यों पर खर्च होती है।

सद्गुरु जग्गी कहते हैं, “अब 37,000 मंदिर सरकार के नियंत्रण में हैं। सिर्फ एक समुदाय के मंदिर सरकार के नियंत्रण में हैं। आप ऐसा किसी भी अन्य देश में नहीं सुनेंगे। हिन्दू मंदिरों की बात करते हुए अक्सर लोग कहते हैं कि चर्च, गुरुद्वारों और मस्जिदों का भी नियंत्रण किया जाना चाहिए। जबकि मैं कहता हूँ सेक्योलर देश में सरकार को मंदिरों या धार्मिक स्थलों में हस्तक्षेप से दूर रहना चाहिए चाहे वो किसी भी धर्म का हो।”

“यह समाधान नहीं है, जरुरी चीज यह है कि इतने सारे लोग जहाँ अपनी आस्था लेकर जाते हैं उन्हें आजाद होना चाहिए। उनके मानवाधिकारों के लिए यह होना चाहिए। अब विवाद और तर्क कुछ लोग यह देते हैं कि ये राजा के नियंत्रण में थे, तब वो सरकार थे इसलिए अब भी ये सरकार के ही पास होने चाहिए। यह सच्चाई नहीं है। राजा श्रद्दालू होते थे। वो कुछ मामलों में इतने बड़े श्रद्दालू हुआ करते थे कि कुछ साम्राज्यों में देवताओं को ही राजा मान लिया जाता था। राजा देवता के दीवान के रूप में काम करते थे। यानी हमारे मंत्री, और इस तरह सिर्फ देवता के नाम पर देवता के प्रतिनिधि की तरह वह राज करते थे। इस कारण वो लोग हमेशा दूसरी तरह के लोग रहे हैं।”

सरकारी नियंत्रण में मंदिरों की हो रही फजीहत का जिक्र करते हुए सद्गुरु कहते हैं, “यह खासकर दक्षिण भारतीय राज्यों में है। खासकर तमिलनाडु के मंदिरों का निर्माण बेहद खूबसूरती से हुआ है। उनकी इंजिनयरिंग और उनका आर्किटेक्चर.. अगर आप देखेंगे कि उन्होंने हजार-बारह सौ साल पहले किस तरह का निर्माण किया है, यह सब मंत्रमुग्ध कर देने वाला है। लेकिन बाद में यह सब चुरा लिया गया। सब कुछ बर्बाद होता रहा क्योंकि लोगों की भावनाएँ मंदिरों के प्रति उतनी प्रबल नहीं रहीं।”

“मेरी दिलचस्पी इन सब बातों में नहीं है। मेरी दिलचस्पी इस बात में है कि मौलिक रूप से अगर आप इस देश को आगे बढ़ाना चाहते हैं तो आपको सभी लोगों को साथ लेकर चलना होगा। आप लोगों के साथ भेदभाव नहीं कर सकते। सबके पास समान अधिकार होने चाहिए। तमिलनाडु के मंदिरों को स्वतंत्र करना ही होगा।”

बातचीत में ईशा फाउंडेशन के संस्थापक जग्गी वासुदेव (सद्गुरु) कहते हैं कि तमिलनाडु राज्य में यह मंदिर और आस्था पूरे नियंत्रण में है और अगर आप एक नया मंदिर बनाना चाहते हैं जो कि यदि प्रसिद्ध हो जाता है, तो फ़ौरन सरकार की ओर से इसे टेक ओवर करने का नोटिस आ जाएगा। वह सवाल करते हैं कि आखिर एक सेक्युलर देश में यह कैसे हो सकता है?

सद्गुरु आगे कहते हैं, “आप एक नई आस्था का निर्माण करिए अगर इतना जरुरी है, लेकिन चली आ रही आस्था के साथ बहुसंख्यक आबादी की आबादी की आस्था का संचालन सरकार के नियंत्रण में है। तमिलनाडु के कई मंदिरों में जो प्राचीन पत्थर थे, जिन पर खूबसूरत कला थी, उन पर सिल्वर पेंट लगा दिया गया।”

“मंदिर निर्माण के विज्ञान को हाशिए पर रख दिया गया है। सम्पत्ति को नुकसान पहुँचाया गया। मेरा सवाल ये है कि मौलिक अधिकारों का दमन क्यों किया जा रहा है? यह वो चीजें हैं जो दोबारा वापस नहीं आने वालीं। अब समय आ गया है इन्हें स्वतंत्र किया जाना चाहिए। लोग कहते हैं कि भ्रष्टाचार हो जाएगा। मैं इसे अपमानजनक मानता हूँ। क्या उन्हें लगता है कि बहुसंख्यक आबादी अपनी आस्था का प्रबंधन नहीं कर सकती? हम ऐसे समय में हैं, जब हमें लगता है कि सरकार को एयरलाइन, पोर्ट्स, बिजनेस, माइनिंग आदि को समाज के हाथों में देना चाहिए, तब मंदिरों को सरकार के नियंत्रण में देने की बात कैसे कर सकते हैं?”

ओडिशा: मंदिर की मूर्तियाँ तोड़ीं, छत्र भी चोरी.. मिशनरी गतिविधियों के लिए जाना जाता है आंध्र की सीमा से लगा ये गाँव

                                                            भगवान रामेश्वर महादेव मंदिर
दिल्ली से लेकर आंध्रा और ओडिशा तक सुनियोजित साज़िश के तहत हिन्दू मंदिरों पर हो रहे प्रहारों से हिन्दुओं को एकजुट होकर केंद्र एवं राज्य सरकारों को सचेत करने की जरुरत है। यदि मंदिरों की बजाए किसी मस्जिद अथवा कब्र को नुकसान पहुंचा होता सारे गंगा-जमुनी तहजीब राग अलापने वाले गैंग सडकों पर आ चुके होते, लेकिन हिन्दू मंदिरों पर प्रहारों के समय इन सबके घरों में शायद कोई मातम हो रहा है, जिस कारण इनकी बोलती बंद है। 

शनिवार (जनवरी 02, 2021) देर रात ओडिशा के एक मंदिर में देवी सरस्वती, लक्ष्मी की मूर्तियों को कथित तौर पर कुछ अज्ञात उपद्रवियों द्वारा तोड़ दिया गया। यह घटना ओडिशा के दक्षिणी हिस्से में आंध्र प्रदेश की सीमा से लगे रायगढ़ जिला स्थित हुकुमटोला गाँव की है। दावा किया जा रहा है कि यह इलाका मिशनरी गतिविधियों के लिए मशहूर है।

खबरों के मुताबिक, भगवान रामेश्वर महादेव मंदिर के पुजारी को अगले दिन, रविवार सुबह इस मंदिर के दरवाजे खुले मिले। उन्होंने जब मंदिर में प्रवेश किया उन्होंने मंदिर के वास्तुशिल्प और मूर्तियों के टुकड़े मंदिर परिसर में पाए। इसके बाद पुजारी ने मंदिर प्रबंधन समिति को इस घटना की जानकारी दी। मंदिर प्रबंधन समिति ने यह भी आरोप लगाया है कि मूर्तियाँ तोड़ने वाले उपद्रवियों ने भगवान जगन्नाथ के गहने भी चोरी कर लिए।

इसके बाद, मंदिर प्रबंधन समिति ने इस संबंध में मुनिगुड़ा पुलिस स्टेशन में इस सम्बन्ध में एक लिखित शिकायत दर्ज की। स्थानीय निवासियों और मंदिर प्रबंधन ने उपद्रवियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की माँग की है। बताया जा रहा है कि कुछ शरारती तत्वों ने रामेश्वर शैवपीठ के देवता की मूर्तियों को क्षतिग्रस्त कर दिया। मंदिर में देवी सरस्वती, महालक्ष्मी और वृंदावती की भी मूर्तियाँ हैं उन्हें भी खंडित कर दिया गया है।

कुछ मूर्तियों को तोड़ दिया गया, किसी को कमर के हिस्से से ही क्षतिग्रस्त कर दिया गया। बताया जा रहा है कि मंदिर से भगवान जगन्नाथ का एक छत्र भी चोरी किया गया। जिसके बाद मंदिर प्रबंधन

समिति के सचिव पुरुषोत्तम जेना ने इसकी शिकायत मुनिगुड़ा थाने में की। हालाँकि, स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया कि रविवार शाम तक भी कथित तौर पर मंदिर परिसर का निरीक्षण नहीं किया गया था। सोशल मीडिया पर भी इस घटना को लेकर लोगों में आक्रोश देखा जा सकता है। कुछ ट्विटर यूजर्स ने इसमें मिशनरी लोगों का हाथ होने की सम्भावना भी जताई हैं।

मंदिरों पर लगातार हो रहे हमलों से घिरी आंध्र सरकार : गर्भगृह में घुसे उपद्रवी, भगवान राम की 400 साल पुरानी मूर्ति का सिर धड़ से अलग

एक तरफ आंध प्रदेश की सरकार पर मुस्लिमों और ईसाइयों के तुष्टिकरण के आरोप लग रहे हैं, दूसरी तरफ हिंदू मंदिरों पर हमले रुक नहीं रहे। ताजा घटना में प्रदेश के विजयनगरम जिले के नेल्लीमरला मंडल में एक पहाड़ी पर स्थित मंदिर में अज्ञात उपद्रवियों ने भगवान राम की मूर्ति को क्षतिग्रस्त कर दिया।

मूर्ति रामतीर्थम गाँव के पास पहाड़ी की चोटी पर स्थित बोडिकोंडा कोदंडाराम मंदिर में विराजमान थी। कथित तौर पर उपद्रवी ताला तोड़ मंदिर के गर्भगृह में घुसे और और स्वामी कोदंडारामुडु का सिर काटकर अलग कर दिया।

बताया जाता है कि यह मूर्ति 400 साल पुरानी थी। इसके साथ ही मंदिर में माता सीता और लक्ष्मण की भी मूर्तियाँ विराजमान हैं। मुख्य मंदिर पहाड़ी की तलहटी में है। जिस मंदिर में मूर्ति क्षतिग्रस्त की गई वह पहाड़ी की चोटी पर है। एक ही पुजारी दोनों मंदिरों में नियमित अनुष्ठान करते हैं। यह घटना तब सामने आई जब पुजारी मंगलवार (दिसंबर 29, 2020) सुबह मंदिर में नियमित अनुष्ठान करने के लिए पहुँचे। 

मंगलवार की सुबह, पुजारियों को रामतीर्थम में बोडिकोंडा पहाड़ी पर प्राचीन सीता लक्ष्मण कोदंडाराम मंदिर के दरवाजे खुले मिले और गर्भगृह में भगवान राम की मूर्ति का सिर धड़ से अलग दिखा। मंदिर के कर्मचारियों ने तुरंत इसकी सूचना स्थानीय पुलिस को दी। बुधवार को क्षतिग्रस्त किए गए हिस्से को पास के तालाब में प्रवाहित कर दिया गया।

जनसेना पार्टी के प्रमुख पवन कल्याण ने बुधवार (दिसंबर 30, 2020) को एक बयान में कहा, “जिस समय अयोध्या में राम जन्मभूमि पर राम मंदिर का निर्माण चल रहा है, हमारे राज्य में भगवान राम की मूर्ति को नष्ट कर दिया गया है। मूर्ति के सिर को अलग करना एक पागल व्यक्ति का कार्य नहीं हो सकता है। यह धार्मिक उन्मादियों का कृत्य है।”

उन्होंने कहा कि राज्य सरकार ऐसी घटनाओं को लेकर लापरवाह है। इसकी वजह से ही यह घटना हुई है। उन्होंने पूछा कि मंदिर पर लगातार हो रहे हमले पर मुख्यमंत्री जवाब क्यों नहीं दे रहे हैं? वे चुप क्यों हैं?

पुलिस की टीमों ने मौके पर पहुँचकर सबूत इकट्ठे किए और अपराधियों को पकड़ने के लिए विशेष टीमें बनाई है। पुलिस अधिकारियों के अनुसार, जाँच सभी संभावित एंगल से की जा रही है।

TNM से बात करते हुए, जिला पुलिस अधीक्षक (SP) राजा कुमारी ने कहा, “घटना सोमवार को मंदिर के बंद होने के बाद हो सकती है। यह कल (मंगलवार) हमारे संज्ञान में आई। अज्ञात बदमाशों ने भगवान राम की मूर्ति का सिर अलग कर दिया। अभी तक आरोपित का पता नहीं चला है। टीमें मामले पर काम कर रही हैं।”

मूर्ति के क्षतिग्रस्त होने के पीछे के मकसद के बारे में पूछे जाने पर एसपी ने कहा, “यह घटना दुर्घटना की तरह नहीं दिख रही है, बल्कि इरादन किया गया कृत्य जान पड़ता है। हालाँकि, फिलहाल हम इस बारे में निष्कर्ष नहीं निकाल सकते हैं कि इसके पीछे क्या इरादे थे।”

घटना की जानकारी मिलने के बाद टीडीपी के स्थानीय नेता एस.रविशेखर और अन्य लोगों ने मंदिर में जाकर पहाड़ी पर धरना दिया। उन्होंने सरकार से उपद्रवियों पर कार्रवाई करने और मंदिरों को सुरक्षा प्रदान करने की माँग की। वहीं भाजपा जिला अध्यक्ष आर.पावनी और अन्य लोगों ने भी मंदिर का दौरा किया और धरना दिया। उन्होंने भी घटना की निंदा की और सरकार से अपराधियों का पता लगाने और मंदिर की सुरक्षा करने की माँग की।

दूसरी तरफ, नेल्लीमारला के विधायक बी.पला नायडू ने मंदिर का दौरा किया और स्थिति की समीक्षा की। रामतीर्थम परिक्षेत्र परिषद के अध्यक्ष श्रीनिवासानंद स्वामी ने भी मंदिर का दौरा किया और कहा कि इसकी अपमानजनक घटना से भक्तों की भावनाएँ आहत हुई है। सरकार को इस मुद्दे पर तेजी से काम करना चाहिए और जनता में विश्वास पैदा करना चाहिए। राज्य के सभी मंदिरों को सुरक्षा प्रदान करनी चाहिए।

पिछले कुछ समय से आंध्र प्रदेश में लगातार हिंदू मंदिरों पर हमले की घटनाएँ सामने आ रही हैं। कहीं मूर्तियों को तोड़ा जा रहा है, तो कहीं रथों को आग में जलाकर राख किया जा रहा है। 27 सितंबर को चित्तूर जिले में एक शिव मंदिर पर हमला किया गया और मंदिर में स्थित नंदी की प्रतिमा को खंडित कर दिया गया। रिपोर्टों के अनुसार, मंदिर में नंदी की मूर्ति को 26 और 27 सितंबर की रात कुछ बदमाशों ने तोड़ा। मूर्ति के टुकड़े पास रखी कुर्सी पर बिखरे हुए पाए गए थे।

तेलंगाना: सचिवालय में ही मंदिर-मस्जिद बनवाएगी सरकार

Telangana: As CM KCR is missing in action, Congress questions if ...
तेलंगाना से आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
तेलंगाना की राज्य सरकार सचिवालय की नई इमारत बनवा रही है। इसके लिए कुछ पुरानी इमारतें और अतिक्रमण हटाने पड़े हैं। इस कोशिश में फिलहाल एक नया विवाद खड़ा हो गया है, क्योंकि पुराने निर्माण हटाने की चपेट में एक मंदिर और मस्जिद भी आ गई। सरकार की इस कार्रवाई के बाद काफी राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रियाएँ आ रही हैं।
समय की नजाकत को देख, मुख्यमंत्री ने सरकारी खर्चे पर सचिवालय परिसर में मंदिर और मस्जिद बनाने का निर्णय लेकर, हालत को बिगड़ने से बचा लिया। माहौल गर्म होने के डर से मुख्यमंत्री को परिसर में ही मंदिर-मस्जिद बनाने का निर्णय लेना पड़ा। ऐसा अब चर्चा यह हो रही है कि जब परिसर में ही मंदिर-मस्जिद बनाने थे, फिर तोड़े क्यों?   
तेलंगाना के मुख्यमंत्री केसीआर ने प्रेस वार्ता के दौरान इस मामले से जुड़ी जानकारी साझा की। केसीआर ने कहा सरकार ने एक नए सचिवालय भवन का निर्माण शुरू किया है इसके लिए पुरानी इमारतों को तोड़ना पड़ रहा है। मुझे इस बात की जानकारी मिली है कि इसी दौरान नज़दीक का एक मंदिर और मस्जिद प्रभावित हुए हैं। उनके कुछ हिस्से शायद टूट गए हैं। हम इसके लिए खेद जताते हैं, ऐसा नहीं होना चाहिए था।

केसीआर ने कहा कि सचिवालय भवन के भीतर ही सरकार एक मंदिर और मस्जिद बनवाएगी। पूरा निर्माण सरकारी ख़र्च पर होगा। निर्माण पूरा होने के बाद सरकार मंदिर और मस्जिद संबंधित लोगों को सौंप देगी।
दरअसल सचिवालय भवन के निर्माण के दौरान ऐसे कुल 3 स्थल थे जिनकी वजह से निर्माण कार्य में परेशानी आ रही थी। लेकिन राजनीतिक ज़मीन पर होने वाली हर छोटी बड़ी घटना अपने हिस्से का घर्षण लेकर ज़रूर आती है।
नतीजतन एआईएमआईएम नेता और सांसद असदुद्दीन ओवैसी समेत कुछ नेताओं ने यूनाइटेड मुस्लिम फोरम के तहत इस घटना को असंवैधानिक और दुर्भाग्यपूर्ण बताया है। इसके अलावा उनका कहना है कि जिस तरह सरकार द्वारा मस्जिदों को नुक्सान पहुँचाया गया है उसके बाद मुस्लिम समुदाय गुस्से में है। 
ओवैसी ने इस घटना पर विरोध जताते हुए कहा की एआईएमआईएम और तेलंगाना राष्ट्र समिति के बीच संबंध अच्छे हैं। लेकिन सरकार नई मस्जिद बनाने में असफल होती है तो उसका दोनों दलों के संबंधों पर असर पड़ेगा। साथ ही मुस्लिम समुदाय इस कदम का विरोध करने के लिए सड़कों पर भी उतरेगा।

वियतनाम: ASI को खुदाई में मिला 1100 साल पुराना शिवलिंग

वियतनाम-शिवलिंग
वियतनाम में मंदिर की खुदाई में मिला 1100 साल पुराना शिवलिंग
भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) को एक संरक्षण परियोजना की खुदाई के दौरान 9वीं शताब्दी का शिवलिंग मिला है। इस शिवलिंग के मिलने की जानकारी भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल पर तस्वीरों के साथ दी है।
खुदाई में प्राप्त बलुआ पत्थर से निर्मित यह शिवलिंग पूरी तरह से सुरक्षित है। इसे किसी तरह की हानि नहीं पहुँची है। यह शिवलिंग ASI को वियतनाम के माई-सन (मी-सान) मंदिर परिसर की खुदाई के दौरान मिला है।


इस ऐतिहासिक शिवलिंग के मिलने पर ASI की प्रशंसा करते हुए विदेश मंत्री एस जयशंकर ने अपने आधिकारिक ट्विटर एकाउंट से लिखा, “9वीं शताब्दी का अखंड बलुआ पत्थर शिवलिंग वियतनाम के ‘माई सन’ मंदिर परिसर में जारी संरक्षण परियोजना की नवीनतम खोज है। एएसआई की टीम को बधाई।”
इसके साथ ही विदेश मंत्री ने खुदाई में प्राप्त शिवलिंग की तस्वीरें ट्वीट कर 2011 में इस अभयारण्य की अपनी यात्रा का भी जिक्र किया है। एक अन्य ट्वीट में उन्होंने इस खोज को भारत की विकास साझेदारी का एक महान सांस्कृतिक उदाहरण भी बताया है।
पूरी तरह से सुरक्षित यह शिवलिंग हिंदू मंदिरों के एक परिसर का हिस्सा है। इसका निर्माण शक्तिशाली चंपा साम्राज्य द्वारा 4 शताब्दी ईस्वी सन् और 13 वीं शताब्दी ईस्वी के बीच माई सन में किया गया था।
‘माई सन’ एक यूनेस्को (UNESCO) विश्व धरोहर केंद्र है, जो 10 शताब्दियों में निर्मित विभिन्न हिंदू मंदिरों का घर है। यह चाम लोगों के उन्नत तकनीकी सभ्यता का एक अद्भुत उदाहरण है।