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अगर दलित-जाट-तमिल कोई नहीं है हिंदू…नोमानी बताओ कि शिया, सुन्नी, वहाबी, अहमदी, पठान और पासमांदा मुस्लिम हैं? अगर मुस्लिम है तो एक ही मस्जिद में नमाज क्यों नहीं पढ़ सकते? मौलाना सज्जाद नोमानी खुले में कर रहा भारतीयों को तोड़ने का प्रयास: सनातनियों से करता है घृणा, तालिबानियों को भेजता है सलाम

                                                   सज्जाद नोमानी (फोटो साभार - यूट्यूब/)
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड से जुड़े मौलाना खलीलुर रहमान सज्जाद नोमानी का एक विवादित बयान की वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से शेयर हो रही है। वायरल हो रही एक वीडियो क्लिप में वह दावा करते हैं कि भारत में हिंदू अल्पसंख्यक हैं। किसी भी परिस्थिति में हिंदुओं को बहुसंख्यक नहीं माना जा सकता।

नोमानी जिस तरह हिन्दुओं को विभाजित करने की कोशिश कर रहा है उसके जवाब में हिन्दुओं को भी इन कट्टरपंथियों से पूछना चाहिए कि जब शिया, सुन्नी, वहाबी, अहमदी, पासमांदा आदि दूसरे फिरके मुस्लिम हैं तो एक मस्जिद में नमाज क्यों नहीं पढ़ सकते? क्यों नहीं एक ही कब्रिस्तान में मुर्दे को दफ़न किया जा सकता? इस कट्टरपंथी को मालूम है कि हिन्दू को जाति बांटकर विभाजित किया जा सकता है, लेकिन इन कट्टरपंथियों अपनी मुस्लिम कौम से सभी फिरकों को एक ही मस्जिद में नमाज पढ़ने और सभी के मुर्दे एक ही कब्रिस्तान में दफ़न होने चाहिए।

 

इतना ही नहीं, समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के कुछ कालनेमि हिन्दू भी प्रोग्राम में शामिल थे,  क्योकि उनकी पार्टियों को इनके वोट चाहिए। वीडियो में देखिए कितनी मुस्लिम महिलाएं हिजाब, नकाब या बुर्के हैं। दूसरे, क्या शिया, सुन्नी और वहाबी आदि पचासों फिरकों के लिए अलग मस्जिद और कब्रिस्तान के लिए जगह क्या land jihad नहीं?               

मौलाना नोमानी ने अपने इस दावे के पीछे तर्क देते हुए देश के कई बड़े सामाजिक और क्षेत्रीय समूहों को हिंदू धर्म के दायरे से बाहर आते हैं। उन्होंने कहा, सिख, ईसाई और बौद्ध ये तो हिंदू हैं ही नहीं। इनके अलावा अनुसूचित जाति (SC), जाट और जनजातीय लोग भी हिंदू नहीं हैं। न ही तमिलनाडु के लोग और लिंगायत खुद को हिंदू मानते हैं। 

भाषण में नोमानी की दिखी हिंदू घृणा

अपने भाषण में नोमानी ने केवल सामाजिक वर्गीकरण ही नहीं किया, बल्कि देश की राजनीति और मुस्लिम समुदाय के रुख पर भी गहरी निराशा और हताशा व्यक्त की। उन्होंने कहा “हमने हिंदुओं को ‘सेकुलर’ (धर्मनिरपेक्ष) और ‘फासिस्ट’ (फासीवादी) श्रेणियों में बाँट दिया। हम राजनीतिक समर्थन के लिए सेकुलर हिंदुओं पर निर्भर रहे, लेकिन इन समूहों ने आखिरकार देश की कमान उन लोगों के हाथों में सौंप दी जिन्हें हम फासिस्ट हिंदू कहते हैं। दोनों ने ही मिलकर हमारे मकसद को नुकसान पहुँचाया।”

 सज्जान नोमानी का यह भाषण 2 फरवरी, 2026 को नई दिल्ली के इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर में आयोजित ‘मिल्लत टाइम्स कॉन्क्लेव 2026’ के समापन सत्र के दौरान दिया गया था।

यह कार्यक्रम इस मीडिया हाउस की 10वीं वर्षगांठ के उपलक्ष्य में रखा गया था। इस कार्यक्रम में कॉन्ग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर, सलमान खुर्शीद, इमरान प्रतापगढ़ी, समाजवादी पार्टी की सांसद इकरा हसन चौधरी और भाजपा नेता यासिर जिलानी जैसे कई बड़े राजनेता और पत्रकार शामिल थे।

मौलाना नोमानी ने जोर देकर कहा कि उनका यह बयान हवा-हवाई नहीं है, बल्कि देश भर में धार्मिक, जातिगत और आदिवासी पहचानों पर किए गए उनके तीन दशकों के सफर और शोध पर आधारित है।

पहले भी उगल चुका है हिंदुओं के लिए जहर

 हिंदुओं को तोड़ने और हिंदुओं को बाँटने की बात करने वाला सज्जाद नोमानी का ये पहला विवादित बयान नहीं है। ये वही सज्जाद नोमानी है जिसे तालिबान के आने पर खुशी हुई थी और जो बच्चियों की शिक्षा का विरोधी रहा है।

साल 2023 में नोमानी की वीडियो सामने आई थी। अपनी वीडियो में वह कहता सुनाई पड़ रहे थे, “पाक रमजान की रात में उन लोगों पर लानत भेजता हूँ जो अपनी बच्चियों को अकेले कोचिंग सेंटर या कॉलेज भेजते हैं। अल्लाह उन्हें जहन्नुम में भेजेगा।”

इतना ही नहीं साल 2021 में तालिबान ने जब अफगानिस्तान पर कब्जा किया था तब सज्जाद नोमानी ने भारत में इसका स्वागत किया था। मौलाना सज्जाद नोमानी ने तालिबान की तारीफों के पुल बाँधते हुए तालिबानियों को सलाम भेजा था।

सज्जाद नोमानी की हिंदू घृणा  और भारत को तोड़ने का प्रयास

अजीब बात है कि एक तरफ सज्जाद नोमानी खुलकर भारत के हिंदुओं के विरुद्ध अपनी घृणा जाहिर करता है, उन्हें बाँटने की बात करता है, उनके अस्तित्व पर सवाल उठाता है। दूसरी तरफ खुलकर तालिबान के लिए अपना समर्थन देता है, इस्लामी कट्टरपंथ की पैरवी करता है, बच्चियों की पढ़ाई को हराम बताता है, बड़े-बड़े नेता, लेखक, विचारक उसके भाषणों को सुनते हैं और स्वरा भास्कर जैसे लोग तो मुस्लिमों के बीच राजनीति करने के लिए अपना पहनावा तक बदलकर इनके आगे सरेंडर कर देते हैं। लेकिन फिर भी भारत के लिबरल उसे बुद्धिजीवी मानकर इतना बड़ा मंच देते हैं। उसे सुनने के लिए बड़ी तादाद में लोग आते हैं।

कहना गलत नहीं है कि जिन ‘सेकुलर हिंदुओं’ ने कभी अपनी उदारता दिखाने के लिए नोमानी को ‘महान स्कॉलर’ के रूप में स्थापित किया, आज वही स्कॉलर मंचों से खुलेआम हिंदुओं के अस्तित्व और उनकी जनसांख्यिकीको चुनौती दे रहे हैं। आज मंच से खुलेआम इवकी नफरत जगजाहिर हो रही है।

नोमानी का यह दावा कि भारत में हिंदू बहुसंख्यक नहीं हैं और जो खुद को हिंदू मानते हैं वो असल में अलग-अलग पहचानों में बंटे हैं… कोई साधारण बयान नहीं है।

ये हिंदुओं के लिए ही सीखने का समय है कि जब हम खुद को राजनीति जाति और क्षेत्रो में खुद को बाँटते हैं, तभी नोमानी जैसे लोग इसी कमजोरी को पकड़कर हम पर चोट करते हैं। खुलकर हम भारतीयों को तोड़ने का प्रयास करते हैं और ये संदेश देते हैं कि देश में हिंदू आबादी बहुसंख्यक नहीं है और जो लोग खुद को हिंदू मानते हैं वो अलग हैं। इसका सीधा उद्देश्य बहुसंख्यक समाज के भीतर एक ऐसा हीनभावना और भ्रम पैदा करना है जिससे वे अपनी सामूहिक ताकत को भूल जाएँ और कट्टरपंथी ताकतों का गजवा-ए-हिंद का रास्ता आसान हो सके।

गृह मंत्री अमित शाह जी पत्थरबाजों पर blind firing कब? कहीं किया पथराव तो कहीं तोड़ीं मूर्तियाँ, सरस्वती पूजा पर भी इस्लामी कट्टरपंथियों ने मचाया बवाल

   24 जनवरी को झारखंड के हजारीबाग में एक मुस्लिम भीड़ ने सरस्वती पूजा विसर्जन जुलूस पर पथराव किया। (साभार)
हिन्दू त्योहारों पर पत्थरबाज़ी करने वालों पर blind firing कब करोगो, गृह मंत्री अमित शाह जी? आखिर हिन्दू पुलिस के साये में कब तक अपने त्यौहार मनाएगा? बर्दाश्त की भी एक सीमा होती है।     
ज्ञान और बुद्धि की देवी माँ सरस्वती को समर्पित बसंत पंचमी का पर्व पूरे देश में हिंदुओं द्वारा श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया जाता है। देश में हिंदू त्योहारों के जश्न को बिगाड़ना अब एक घृणित और नियोजित ट्रेंड बन चुका है। राम नवमी, हनुमान जयंती और अन्य त्योहारों के दौरान विघ्न डालने की प्रवृत्ति इस साल बसंत पंचमी पर भी दिखी। देश के कई हिस्सों में हिंदू विरोधी तत्वों ने सरस्वती पूजा में व्यवधान डालने की कोशिश की। पूजा के दौरान और विसर्जन के समय उत्सव को निशाना बनाकर हमला और तोड़फोड़ की कई घटनाएँ दर्ज की गईं।

झारखंड: हजारीबाग में माँ सरस्वती की शोभायात्रा पर कट्टरपंथियों ने किया पथराव

झारखंड के हजारीबाग में शनिवार (24 जनवरी 2026) को एक मुस्लिम भीड़ ने सरस्वती पूजा विसर्जन के लिए निकाली जा रही शोभायात्रा पर पथराव किया। केरेदरी प्रखंड के बेल्टू गाँव में मूर्ति विसर्जन के लिए जुलूस निकाला जा रहा था। अचानक, मुस्लिम भीड़ ने हिंदू जुलूस पर पथराव शुरू कर दिया। इसके जवाब में जुलूस में शामिल कुछ लोगों ने भी पलटवार किया।

विवाद जुलूस में बज रहे संगीत के कारण शुरू हुआ। मुस्लिम पक्ष को अचानक गीत आपत्तिजनक लगने लगे और थोड़ी ही देर में मामला हिंसा में बदल गया। मुस्लिम कट्टरपंथियों ने हिंदुओं पर पथराव किया, जिससे कई लोग घायल हो गए।

हजारीबाग वर्षों से हिंदुओं के खिलाफ इस्लामी हिंसा का केंद्र रहा है। राम नवमी, हनुमान जयंती, होली जैसी अवसरों पर मुसलमान अक्सर मामूली बहानों जैसे संगीत बजना या भगवा झंडा के हवाले से हिंदुओं पर हमले करते रहे हैं। 2020 में भी हजारीबाग के लखे सुंडी बस्ती में मुस्लिम भीड़ ने सरस्वती पूजा विसर्जन जुलूस पर पथराव किया, कई वाहन तोड़े और 4-5 लोग घायल हुए थे। आज भी हिंदुओं के त्योहारों पर इसी तरह का तरीका अपनाया जा रहा है।

असम: डिब्रूगढ़ में सरस्वती की मूर्ति तोड़ी गई

शनिवार (24 जनवरी 2026) को पूजा के दिन माँ सरस्वती की मूर्ति को अज्ञात व्यक्तियों ने तोड़ दिया। अब तक इस घटना के पीछे कौन लोग हैं, इसकी कोई जानकारी नहीं मिली है। स्थानीय हिंदुओं ने दोषियों की पहचान कर उन्हें सजा देने की माँग की है।

त्रिपुरा: कैलाशहर में सरस्वती पूजा के दौरान मुसलमानों ने अशांति फैलाई

त्रिपुरा के कैलाशहार में सरस्वती पूजा के दौरान तनाव की स्थिति उत्पन्न हो गई, जब कथित तौर पर लगभग 16 मुस्लिम युवाओं ने दरांती और डंडों से हिंदू जुलूस में तोड़ने का प्रयास किया। यह झड़पें कतल डिघीरपुर क्षेत्र में हुईं।

भाजपा मंडल अध्यक्ष प्रीतम घोष ने कहा कि लगभग 16 मुस्लिम युवाओं ने दरांती और डंडों से हिंदुओं पर हमला कर सरस्वती पूजा में विघटन करने का प्रयास किया। घोष ने कहा, “सूचना मिलते ही जब हम मौके पर पहुँचे, उन्होंने हमारे ऊपर बेतहाशा हमला कर दिया। स्थिति और हिंसक हो गई। ये शरारती तत्व बांग्लादेश जैसी खतरनाक स्थिति दोहराने की कोशिश कर रहे हैं। हमें ऐसे ताकतों के खिलाफ एकजुट होकर लड़ना होगा।”

हमले में प्रीतम घोष घायल हुए, वहीं भाजपा युवा मोर्चा जिला अध्यक्ष अरूप धर का घर भी तोड़ा गया। रिपोर्ट्स के अनुसार, कतल डिघीरपुर में भाजपा का दफ्तर भी आग के हवाले कर दिया गया। पुलिस बलों को स्थिति पर काबू पाने के लिए तैनात किया गया।

पश्चिम बंगाल: TMC की अंदरूनी लड़ाई ने उत्तर 24 परगना जिले में सरस्वती पूजा में खलल डाला

शुक्रवार (23 जनवरी) को पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के कामरहाटी शहर में तृणमूल कांग्रेस(TMC) के आंतरिक संघर्ष के कारण सरस्वती पूजा में बाधा उत्पन्न हो गई। सूत्रों के अनुसार, बेलघाड़िया सर्वजनिन श्री श्री दुर्गा चौक सोसाइटी मंदिर को TMC के एक गुट ने बंद कर दिया है।
इसके कारण स्थानीय हिंदू महिलाएँ माँ सरस्वती की पूजा नहीं कर पा रही हैं। स्थानीय पुलिस ने तब तक हस्तक्षेप करने या ताला हटाने से इनकार कर दिया है, जब तक TMC के विवादित गुटों के बीच किसी प्रकार का समझौता नहीं हो जाता।

TMC नेता ने ममता बनर्जी के स्कूल में सरस्वती पूजा न करने के लिए स्टूडेंट्स को धमकाया

साउथ कोलकाता के सरकारी समर्थित जोगेश चंद्र चौधरी कॉलेज में पढ़ाई कर रही एक महिला छात्रा ने बताया कि उन्हें तृणमूल कांग्रेस(TMC) के एक नेता ने सरस्वती पूजा आयोजित करने के खिलाफ धमकी दी।
पीड़िता के अनुसार, TMC नेता का नाम दाऊद आलम मोल्ला बताया गया। छात्रा ने एक वायरल वीडियो में कहा,”दाऊद आलम मोल्ला बाहर खड़ा है। उसने मुझे धमकी दी कि वह मेरी LLM को बर्बाद कर देगा।” संयोगवश, जोगेश चंद्र चौधरी लॉ कॉलेज से ही पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और TMC सुप्रीमो ममता बनर्जी ने पढ़ाई की है।

TMC गुटों के बीच अंदरूनी लड़ाई के कारण कूचबिहार में सरस्वती पूजा समारोह रोका गया

पश्चिम बंगाल के कूचबिहार जिले के दिनहाटा कॉलेज में शुक्रवार (23 जनवरी) को सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस(TMC) के दो गुटों के बीच आपसी झड़प के बाद सरस्वती पूजा मंडप को छोड़ना पड़ा।
स्थिति बिगड़ने पर कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस को बुलाया गया। मामले की जानकारी मिलते ही दिनहाटा थाने के प्रभारी और SDPO कॉलेज परिसर पहुँचे। सरस्वती पूजा में शामिल होने आए हिंदू श्रद्धालुओं को अपनी सुरक्षा के लिए वहाँ से भागने पर मजबूर होना पड़ा। मौके से सामने आई तस्वीरों में दिखा कि सत्तारूढ़ TMC के गुंडों ने कॉलेज परिसर को युद्ध के मैदान में बदल दिया।

हिंदू स्टूडेंट्स को स्कूल कैंपस में सरस्वती पूजा करने की इजाज़त नहीं है क्योंकि 50% से ज्यादा स्टूडेंट्स मुस्लिम हैं

पश्चिम बंगाल के उत्तर 24 परगना जिले के बारासात शहर से एक अन्य घटना सामने आई, जहाँ हिंदू छात्रों को स्कूल परिसर के भीतर सरस्वती पूजा आयोजित करने की अनुमति नहीं दी गई।
रिपोर्ट्स के अनुसार, यह अनुमति इसलिए रोकी गई क्योंकि संबंधित स्कूल में 50% से अधिक छात्र मुस्लिम समुदाय से हैं। सोशल मीडिया पर सामने आए एक वीडियो में पुलिसकर्मियों को छात्रों को देवी सरस्वती की पूजा करने से रोकते हुए देखा गया। बाद में हिंदू छात्रों को स्कूल परिसर के बाहर फुटपाथ पर सरस्वती पूजा आयोजित करने के लिए मजबूर होना पड़ा।
इस दौरान प्रदीप चटर्जी नामक एक व्यक्ति को यह कहते हुए सुना गया, “हमें बताया गया कि इस स्कूल में हिंदू अल्पसंख्यक हैं, इसलिए यहाँ पूजा नहीं हो सकती… पश्चिम बंगाल में रहने वाले हिंदुओं की स्थिति और बांग्लादेश में हिंदुओं की स्थिति में कोई फर्क नहीं रह गया है।”
उन्होंने आगे कहा कि यदि 50 प्रतिशत मुस्लिम छात्रों वाला तर्क पूरे देश में लागू किया जाए, तो कल हिंदू यह दावा कर सकते हैं कि देश में उनकी आबादी 50 प्रतिशत से अधिक है और ऐसे में नमाज की अनुमति भी नहीं दी जानी चाहिए।

झारखंड: लोहरदगा में सरस्वती पूजा जुलूस को लेकर मुसलमानों ने हिंदुओं पर हमला किया

झारखंड के लोहरदगा जिले में रविवार (25 जनवरी 2026) को सरस्वती पूजा जुलूस के दौरान हिंदुओं पर मुस्लिम भीड़ ने हमला किया। यह घटना लोहरदगा के कूडू थाना क्षेत्र अंतर्गत बारिडीह गाँव में सरस्वती पूजा विसर्जन के समय हुई। हिंदू श्रद्धालु गाँव से होकर माँ सरस्वती की झाँकी निकाल रहे थे, तभी मूर्ति ले जा रही गाड़ी एक मुस्लिम के घर की छत से हल्की सी टकरा गई।
इसके बाद मुस्लिम परिवार और उनके साथियों ने इकट्ठा होकर गाड़ी के ड्राइवर के साथ मारपीट की। सुबह तक मामला पूरी तरह हिंसक हो गया और मुस्लिम भीड़ ने हिंदुओं तथा उनके घरों पर हमला कर दिया। घटना की सूचना मिलते ही कूडू थाना की पुलिस और सीमा सुरक्षा बल (BSF) की बाइक दस्ता मौके पर पहुँचा और स्थिति को नियंत्रित करने का प्रयास किया।
                                                                                                                             फोटो – आज तक
हमले में तीन लोग घायल हुए हैं, जिनका स्थानीय अस्पताल में इलाज चल रहा है। पुलिस ने स्थिति पर काबू कर लिया है।

उत्तराखंड : कुदरत का बुलडोजर, खुदा की लाठी… ख़ुशी मनाओ: बादल फटने से देवभूमि में तबाही, इस्लामी कट्टरपंथी फैला रहे हिंदू घृणा

                            उत्तराखंड में बादल फटने से आई बाढ़ में बह गया धराली गाँव (साभार: हिंदुस्तान टाइम्स)
उत्तराखंड के उत्तरकाशी में मंगलवार (5 अगस्त 2025) को बादल फटने से आई भयावह बाढ़ ने कई इलाकों को तहस-नहस कर दिया। गंगोत्री के पास बसे गाँव धराली में तबाही सबसे ज्यादा देखने को मिली। यहाँ लोगों के घर, जीवन और रोजगार सब पानी में बह गए। इस भयानक मंजर का एक वीडियो भी सोशल मीडिया पर वायरल हुआ, जिसने हर किसी को दुखी कर दिया। जहाँ देश के ज्यादातर लोगों ने इस आपदा पर दुख और संवेदना जताई, वहीं कुछ इस्लामी कट्टरपंथी सोशल मीडिया यूजर्स ने इस त्रासदी का मजाक उड़ाया। 

अली सोहराब, करिश्मा अजीज जैसे लोग और उनके समर्थकों ने इस दर्दनाक घटना पर खुशी जताई। उन्होंने इसे ‘कुदरत का बुलडोजर’ बताया। धराली में आम लोगों के घर-सम्पत्ति बर्बाद होने और जानें जाने पर असंवेदनशील रवैया दिखाते हुए यह इस्लामी कट्टरपंथी अपनी घृणा का प्रदर्शन करते रहे।

देवभूमि उत्तराखंड में हाल के महीनों में राज्य सरकार ने अवैध निर्माण के खिलाफ सख्त कदम उठाए हैं। खासतौर पर उन जगहों पर कार्रवाई हुई जहाँ बिना अनुमति के मजहबी ढाँचे खड़े किए गए थे। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी की सरकार ने बुलडोजर चलाकर सार्वजनिक जमीनें खाली कराईं। कई जगह मजार-मदरसे तोड़े गए।

ये कार्रवाई कुछ इस्लामी कट्टरपंथियों को पसंद नहीं आई। यही लोग इस प्राकृतिक आपदा को ‘अल्लाह का बदला’ बताकर पेश कर रहे हैं। किसी ने ट्वीट किया, “ये आपदा है या बुलडोजर चल रहा है?” एक और ने लिखा, “खुदा की लाठी में आवाज नहीं होती।” ये सब बातें सीधे-सीधे एक मजहबी बहाने से मानव त्रासदी का मजाक उड़ाना है।

इन प्रतिक्रियाओं की जड़ उस मानसिकता में है जहाँ कुछ लोग खुद को कानून से ऊपर समझते हैं। सालों तक चली तुष्टिकरण की राजनीति ने कुछ मुस्लिम वर्गों को ये यकीन दिला दिया कि उनको कोई भी कानून तोड़ने का अधिकार है। लेकिन जब मोदी सरकार और उत्तराखंड की धामी सरकार ने कानून को सब पर बराबर लागू किया, तो यह लोगों को चुभने लगा।

इस्लामी कट्टरपंथी कानूनी कार्रवाई को दमन बताते हैं। यही वजह है कि जब देवभूमि में बाढ़ आई, तो उन्होंने इसे ‘अल्लाह का बदला’ कहकर पेश किया, क्योंकि वहाँ की सरकार ने अवैध निर्माण गिराए थे। उनके हिसाब से यह उन पर हुए दमन का हिसाब हो रहा था।

यह सोच वही है जिसने देश के बँटवारे को जायज बताया, दंगों में तालियाँ बजाईं और आतंकवादियों तक के लिए सहानुभूति जताई। इन लोगों को सिर्फ वही बातें सही लगती हैं जो उनके मजहबी एजेंडे को पूरा करती हैं।

सबसे शर्मनाक बात ये है कि तथाकथित ‘सेकुलर’ या ‘उदारवादी’ आवाजें इस पर खामोश हैं। अगर कोई हिंदू इस तरह मुस्लिम आबादी वाले इलाके की किसी त्रासदी पर खुशी जताता, तो हर चैनल, हर मँच पर हंगामा होता। लेकिन जब हिंदुओं के दुख पर जश्न मनाया जाता है, तो सब चुप हो जाते हैं।

ये लड़ाई किसी मजहब के खिलाफ नहीं है, ये लड़ाई उस जहरीली सोच के खिलाफ है जो मानवता को बाँटती है और त्रासदी को मजाक का जरिया बनाती है। ऐसे समय में जब पूरे देश को एकजुट होकर पीड़ितों के लिए खड़ा होना चाहिए, तब इस्लामी कट्टरपंथियों ने इसे बदला और अल्लाह का बदला दिखाने का हथियार बनाना चुना है।

जिस ख़ुशी के साथ वे मृत्यु का जश्न मनाते हैं, वह उनके वैचारिक दिवालियापन का आईना है और बाकी देश के लिए एक चेतावनी है। जब किसी की मौत पर कोई हँसे, तो समझ लीजिए कि हम सिर्फ डिजिटल नफरत नहीं देख रहे, ये हमारी आत्मा पर हमला है।

क्योंकि जब इंसानियत मरने लगे और मौत पर ताली बजाई जाए, तब हम सिर्फ राजनीतिक विरोध नहीं बल्कि उस विचारधारा से जूझ रहे होते हैं जो देश की आत्मा को ही नष्ट करना चाहती है।

काली और दुर्गा तो न#% होती हैं… हिंदू देवियों पर भद्दा कमेंट करने वाली हबीबा खातून की गिरफ्तार होते ही हेकड़ी निकली बोली- अब से नहीं फैलाऊँगी नफरत

                                           कछार पुलिस ने किया हीबा खातून को गिरफ्तार
मुस्लिम कट्टरपंथियों में फिर से सनातन के खिलाफ बोलने का कीड़ा काटने लगा है। इन सिरफिरों को नहीं मालूम कि सनातन विरोधियों का नामलेवा तक नहीं रहता। इस कटु सच्चाई का इतिहास साक्षी है। ये गाज़ी जिन्हे मुग़ल बादशाह कहकर भारत की जनता को गुमराह किया गया है देख लो भारत से बाहर इनका कोई नामलेवा नहीं। यहाँ कुर्सी के भूखे नेताओं और उनकी पार्टियों ने उनका नाम जिन्दा रखा हुआ है। हिन्दू सम्राटों के गौरवशाली इतिहास को दरकिनार कर मुगलों के खून से इतिहास को नज़रअंदाज़ कर महान बता दिया। और जिन इतिहासकारों ऐसा दुष्कर्म किया वर्तमान सरकार को चाहिए उन इतिहासकारों को ब्लैकलिस्ट किया जाए। पूछो इनसे कि दिने इलाही चलाने वाला अकबर माता ज्वाला को छतर चढ़ाने नंगे पैर क्यों गया था? मीना बाजार क्यों लगाता था और उसे बंद करवाने वाली हिन्दू शेरनी कौन थी? प्रश्न बहुत है। जिसका मुस्लिम कट्टरपंथी पूरा फायदा उठा रहे हैं।  

असम की कछार पुलिस ने हीबा नूर (कुछ जगह हबीबा खातून) नाम की सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर को गिरफ्तार किया है। उस पर आरोप है कि वो अपने अकॉउंट से हिंदू घृणा से सने पोस्ट डालती थी। साथ ही साथ हिंदू देवी-देवताओं पर अभद्र टिप्पणी भी करती थी। हाल में जब उसकी प्रोफाइल और उस पर डाले कंटेंट सोशल मीडिया पर वायरल होना शुरू हुए तो लोगों ने उसे अरेस्ट करने की माँग उठाई।

वायरल स्क्रीनशॉट में दिखाई दे रहा है कि हीबा खातून कमेंट पर माँ काली के लिए अभद्र शब्द बोलती थी। उसने लिखा था- वैसे काली और दुर्गा तो नं$% होती हैं इसका मतलब ये सब नंगी रहना चाहती हैं।

आगे स्क्रीनशॉट में उसने लिखा- हमें किसी के धर्म से कोई मतलब नहीं। हम आगे से किसी को गाली नहीं देते, लेकिन अगर हमें छेड़ोगे तो हम उसका जवाब जरूर देंगे।

उसके स्क्रीनशॉट वायरल होने के बाद कछार पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया है। कछार पुलिस ने 1 जून को ट्वीट करके बताया कि हीबा खातून गिरफ्तार है। उसे कोर्ट के आगे पेश किया गया था। पुलिस ने कहा कि एक वीडियो सोशल मीडिया पर आई थी जिसमें हबीबा खातून जो सिलचर के तुकेग्राम की है। उसे माँ काली पर अश्लील टिप्पणी करते देखा गया। पुलिस उसे पकड़ चुकी है।  

सोशल मीडिया पर हिंदू घृणा फैलाने वाली हीबा के खिलाफ जैसे ही सोशल मीडिया पर शिकायत हुई उसी के बाद हीबा का एक पोस्ट आया जिसमें उसने लिखा था- “आज से मैं रोस्टिंग वीडियो और हिंदू-मुस्लिम नफरत फैलाने वाला, जो भी कंटेंट होगा वो मैं नहीं बनाऊँगी और कुछ ऐसा कमेंट भी नहीं करूँगी।” इसके अलावा अब 19 हजार फॉलोवर वाली हीबा के सोशल मीडियासे सारे पोस्ट भी डिलीट किए जा चुके हैं।

ऐसे मामले पहले भी बहुत बार आए हैं। कुछ समय पहले खुद को फेमिनिस्ट समझने वाली प्रियंका पॉल की आईडी वायरल हुई थी जिसमें उसने न केवल हिंदुओं के लिए, बल्कि हिंदू देवी-देवताओं के लिए अश्लील बातें की हुई थीं। पोस्ट वायरल होने के बाद उसके खिलाफ भी शिकायत हुई थी।

सृष्टि के पहले दिन से काल की गणना, चंद्र और सूर्य ग्रहण की अग्रिम जानकारी: दुनिया के सबसे प्राचीन और सटीक कैलेंडर ‘विक्रम संवत’ का वर्ष 2082 शुरू, जानिए किसने और कब की थी शुरुआत

                                        विक्रम संवत की शुरुआत करने वाले सम्राट विक्रमादित्य (साभार: न्यूज 18)
चैत्र शुक्ल प्रतिपदा के साथ ही रविवार (30 मार्च 2025) को हिंदू नव वर्ष 2082 की शुरुआत हो गई। इसे नव संवत्सर(वर्ष) या विक्रम संवत भी कहा जाता है। कहा जाता है सम्राट विक्रमादित्य के नवरत्नों में से एक महान खगोलविद वाराह मिहिर ने इस कैलेंडर की शुरुआत की थी और उसका नाम विक्रम संवत या विक्रमी संवत रखा था। माना जाता है कि ब्रह्मा ने इसी दिन सृष्टि की रचना की थी। यानी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को सृष्टि उत्पन्न हुई थी।

विचारणीय बात यह है कि विश्व सनातन को इतना सम्मान देता है कि वित्तीय वर्ष अप्रैल से शुरू होता है, जबकि अंतरराष्ट्रीय नया साल 1 जनवरी से होता है। एक तरफ भारत में ढोंगी और छद्दम हिन्दू मुस्लिम वोटों की खातिर सनातन को अपमानित करते रहते हैं। क्या सनातन को अपमानित करने वालों को हिन्दू कहना उचित है?   

देश-दुनिया भले ही पोप ग्रेगरी द्वारा विकसित ग्रेगोरियन कैलेंडर प्रचलित हो, लेकिन विक्रम संवत आज भी भारतीय और नेपाल मूल के लोगों के जीवन का अंग है। नेपाल ने विक्रम संवत वाला हिंदू कैलेंडर ही लागू है। वहीं, भारत सहित दुनिया भर के हिंदू शादी-विवाह से लेकर अन्य शुभ मुहूर्त एवं पर्व-त्यौहार इसी कैलेंडर पर आधारित कालगणना से तय करते हैं। विक्रम संवत दुनिया का सबसे वैज्ञानिक एवं सटीक कालगणना है।

जानकारों का कहना है कि विक्रम संवत सूर्य की और चंद्र की गति, दोनों की गति पर आधारित है। दुनिया का ये अकेला कैलेंडर है, जो गणना करके सूर्य ग्रहण या चंद्र का पहले ही घोषणा कर देता है कि इस दिन को इतने बजे सूर्य या चंद्र ग्रहण लगेगा। इस कैलेंडर के जरिए किसी भी खगोलीय स्थिति की गणना वर्षों पहले लगाई जा सकती है। इस तरह की खगोलीय जानकारी पश्चिमी कैलेंडरों से नहीं मिलती है।

सम्राट विक्रमादित्य के नवरत्नों में शामिल आचार्य वाराह मिहिर ने पृथ्वी द्वारा सूर्य के चक्कर लगाने की एकदम सटीक गणना की है। उसी गणना के आधार पर उन्होंने दिन और रात के समय का निर्धारण किया है। इसमें पल, प्रतिपल, घटी, मुहूर्त और पहर होते हैं। इन्हीं के आधार पर तिथियों का निर्धारण एवं उनकी गणना की जाती है। इतना ही नहीं, यह कैलेंडर साल में आने वाले विभिन्न ऋतुओं के अलावा नक्षत्रों के बारे में भी बताता है।

अति प्राचीन ग्रंथ ‘सूर्य सिद्धांत’ में कहा गया है कि पृथ्वी सूर्य का चक्कर लगाने में 365 दिन 15 घटी 31 पल तथा 24 प्रतिपल लगाती है। विक्रम संवत में 12 मास होते हैं और मास सिर्फ 30 दिन का होता है। यह मास 15 दिन के दो पक्ष में बँटा होता है, जो शुक्ल पक्ष और कृष्ण पक्ष का होता है। विक्रम संवत में हर तीन साल पर एक मास बढ़ जाता है, जिसे अधिमास या मलमास कहा जाता है।

दरअसल, मासों की गणना या निर्माण पृथ्वी की अपनी कक्षा से नहीं की गई, इसका निर्धारण चंद्रमा के पृथ्वी के चारों ओर की कक्षा से किया गया। इसलिए इसे चंद्र मास भी कहते हैं। चंद्रमा का एक मास 30 चंद्र तिथियों का होता है, परंतु वह सौर मास (सूर्य मास) से लगभग आधा दिन छोटा होता है। दोनों मासों में सामंजस्य बैठाने के लिए भारतीय ज्योतिषाचार्यों ने मलमास या अधिमास का विधान किया। 

यह अधिमास या मलमास इसलिए होता है, ताकि सूर्य वर्ष से एकरूपता लाई जा सके। इसी के कारण हिंदू महीनों, वर्ष, ऋतुओं एवं खगोलीय गणना में सटीकता रहती है। विक्रम संवत से ऋतु परिवर्तन की सटीक जानकारी, नक्षत्रों की स्थिति, ग्रहों की स्थिति, सूर्य या चंद्र ग्रहण का काल, तिथि और मुहूर्त की गणना सटीक होती है। वहीं, यूरोप में पहले एक साल 360 दिन का हुआ करता था।

विक्रम संवत का जिक्र ब्रह्म पुराण में भी है। इसमें कहा गया है कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा ब्रह्मा का पहला दिन है और सृष्टि के कालचक्र का भी पहला दिन है। विक्रम संवत की शुरुआत इसी चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होती है। ग्रेगोरियन कैलेंडर की शुरुआत ईसा मसीह के जन्म से होती है। इसे ईसाई कैलेंडर भी कहा जाता है। ग्रेगोरियन कैलेंडर विक्रम संवत से 57 साल पीछे चल रहा है। ग्रेगोरियन कैलेंडर के अनुसार अभी साल 2025 चल रहा है, विक्रम संवत के अनुसार यह 2082 चल रहा है।

विक्रम संवत को हिंदू से लेकर जैन धर्मग्रंथों में इस संवत को शुरू करने में सम्राट विक्रमादित्य का नाम लिया जाता है। जैन ग्रंथ कल्काचार्य में कहा गया है कि विक्रम काल की स्थापना सम्राट विक्रमादित्य ने आकाश नाम के राजा को हराने के बाद की थी। इस दिन को उन्होंने विजय हासिल की थी। हालाँकि, ये राजा कौन हैं, ये स्पष्ट नहीं है। हिंदू ग्रंंथों कहा गया है कि उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य ने शकों पर इसी दिन जीत हासिल की थी।

ये वही सम्राट विक्रमादित्य हैं, जिनके दरबार में आयुर्वेद के जनक धन्वंतरि, जैन संन्यासी एवं नीति शास्त्र के ज्ञाता क्षपणक, बौद्ध ज्ञाता अमर सिंह, विद्वान कवि शंकु, कवि घटखर्पर, राजकवि कालिदास, तंत्र शास्त्र के ज्ञानी वेताल भट्ट, व्याकरण के आचार्य वररुचि, खगोलशास्त्री वाराह मिहिर शामिल थे। इनमें अमर सिंह और वाराह मिहिर का जन्म क्षत्रिय कुल में हुआ था, जबकि कालिदास और वेताल भट्ट ब्राह्मण कुल के थे। बाकी वैश्य एवं आज दलित कहे जाने वाले समुदाय से भी थे।

कहा जाता है कि विक्रम संवत से पहले युधिष्ठिर संवत, कलियुग संवत, सप्तर्षि संवत आदि प्रचलन में आए थे। माना जाता है कि सभी संवत की शुरुआत चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से होती ही थी, लेकिन अन्य बातें स्पष्ट नहीं थीं। इसके बाद विक्रम संवत अस्तित्व में आया और इसमें तिथि से लेकर तिथि, मास, संवत्सर (यानी वर्ष), नक्षत्र आदि की स्पष्टता थी।

अलीगढ़ : ‘ये हिंदू है, मारो सा@ को’: VHP कार्यकर्ता को अकेला देख ईद पर शराब पी रहे मुस्लिमों ने चाकुओं से गोदा

                                                      पीड़ित हिन्दू विकास (बाएँ) के आई चोटें
उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ में ईद पर शराब पी रहे मुस्लिमों ने एक विश्व हिन्दू परिषद (VHP) कार्यकर्ता पर जानलेवा हमला किया। हिन्दू व्यक्ति ने मुस्लिम युवकों को शराब पीने से रोका था। मुस्लिमों ने पूरे शरीर पर चाकू मारे और उसे गंभीर रूप से घायल कर दिया। पीड़ित हिन्दू का इलाज चल रहा है। मामले में FIR दर्ज करवाई गई है।

यह घटना अलीगढ़ के छर्रा थाना क्षेत्र के सलगवाँ गाँव में हुई है। इस मामले में पीड़ित विकास सिंह के मामा ने बताया है कि उनका भांजा ईद (31 मार्च, 2025) के दिन काम निपटा कर गाँव आ रहा था। गाँव के ही मोड़ पर उसे 3-4 लोग शराब पीते हुए दिखाई दिए।

विकास ने उन्हें सार्वजनिक स्थल पर शराब पीने से मना किया। इसके बाद मुस्लिम भड़क गए। उनमें से एक अमन ने विकास का नाम पूछा। विकास ने जब अपना नाम बताया तो अमन ने कहा कि यह व्यक्ति हिन्दू है और इसे मारो। इसके बाद अमन ने अपने साथी फरहत और अरबाज के साथ मिलाकर हमला कर दिया।

उन्होंने विकास को पकड़ कर चाकू मारे। इससे विकास गंभीर रूप से घायल हो गया। विकास इसके बाद किसी तरह यहाँ से बच कर निकला। उसके मामा ने बताया है कि मुस्लिम विकास को जान से मार देना चाहते थे। इसके बाद विकास को अस्पताल ले जाया गया। विकास को इस हमले में गंभीर चोटें आई हैं।

मामले में छर्रा थाने में FIR लिखवाई गई है। ऑपइंडिया के पास FIR की कॉपी मौजूद है। पीड़ित विकास को गंभीर चोटों के चलते अलीगढ़ के एक अस्पताल रेफर किया गया है। मामले में अब पुलिस कार्रवाई कर रही है। उसने 2 मुख्य आरोपितों को गिरफ्तार भी किया है।

मामले में छर्रा थाना CO धनंजय कुमार ने बताया है कि इस संबंध में FIR दर्ज कर ली गई है और 2 मुख्य आरोपितों को हिरासत में लिया गया है और उन्हें जेल भेजा जा रहा है। पुलिस ने बताया है कि वह अब आगे की कार्रवाई कर रही है।

ऑपइंडिया ने इस विषय में विश्व हिन्दू परिषद के बृज प्रांत के मीडिया प्रभारी प्रतीक रघुवंशी से भी बात की। उन्होंने बताया कि पीड़ित विश्व हिन्दू परिषद का कार्यकर्ता है और उस पर हमला करने वाले मुस्लिम उसे पहले से जानते रहे हैं। प्रतीक रघुवंशी ने बताया कि पीड़ित ड्राइवर का काम करता है और मुस्लिम उस पर शराब पीने से रोके जाने के चलते हमला किया।

प्रतीक रघुवंशी ने इस मामले में कड़ी कार्रवाई किए जाने की माँग की है। उन्होंने कहा है कि विश्व हिन्दू परिषद इस मामले में कार्रवाई ना होने पर सड़कों पर भी उतरेगा।

दिल्ली चुनाव में EVM बदनाम नहीं हुई क्योकि आकाओं पर ट्रम्प ने डाल दी नकेल; चर्च, जिहादी, नक्सली, NGO… भारत विरोधी हर एजेंट को पाल-पोस रहा था अमेरिका का USAID, हिंदुओं के धर्मांतरण पर भी था जोर

                                                            USAID को ट्रंप ने किया बैन
डोनाल्ड ट्रम्प के अमेरिका का राष्ट्रपति बनने पर Deep State और Tool kit पर नकेल डाली उसका असर भारत में भी दिखाई दे रहा है। Deep State और Tool kit की मिली भीख से भारत में कभी कहीं आंदोलन तो कभी किसी बात पर उपद्रव होते देखा। इतना ही नहीं दिल्ली विधानसभा चुनाव से पहले हुए चुनावों में बीजेपी की जीत पर EVM पर ऐसा शोर मचाया जाता था इस गीत "नाच मेरी बुलबुल पैसा मिलेगा" की याद ताजा हो जाती है। लेकिन जब "बुलबुल" को नचाने पर भीख मिलने का कोई आसार देख आन्दोलनजीवियों के आका मुंह में दही जमाकर बैठ गए। यानि देश में हंगामा अपने आपको जनहितैषी, संविधान रक्षक और देशप्रेमी कहने वाले नेता और उनकी पार्टियां Deep State और Tool kit की भीख से जनता को गुमराह किया जा रहा था।  
डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के बाद USAID पर ताला लगा दिया गया है। ‘मानव भलाई’ के नाम पर यह विवादित एजेंसी साल 1960 से ही अमेरिकियों का पैसा दुनिया भर में उथल-पुथल पैदा करने पर खर्च करती रही है। खासकर भारत और हिंदू इसके टारगेट पर रहे हैं।

भारत और हिंदू विरोधी गैर सरकारी संगठनों (NGO) से लेकर ईसाई-इस्लामी संगठनों तक को यह फंड देती रही है। ऐसे ही संगठनों में एटलांटिक काउंसिल और वर्ल्ड विजन शामिल है। ये संगठन भारत सरकार विरोधी गतिविधियों और हिंदुओं के धर्मांतरण को बढ़ावा देते हैं।

                                                                वर्ल्ड विजन को मिली मदद

एटलांटिक काउंसिल को जॉर्ज सोरोस तक से फंड मिला है। यह संगठन भारत के पत्रकारों और फैक्टचेकर्स का इस्तेमाल करके पीएम मोदी के खिलाफ माहौल बनाने का काम कर रहा था। वहीं ‘वर्ल्ड विजन’ का दावा है कि वह बिना धार्मिक भेदभाव के इंसानों की भलाई के लिए काम करता है। लेकिन गहराई से पड़ताल करने पर पता चलता है कि उसकी निष्ठा केवल चर्चों तक सीमित है।

                                               वर्ल्ड विजन की साइट पर जुड़ी जानकारी

ये संगठन भारत के अलग-अलग इलाकों में काम कर रहा है। कुछ इलाकों में इसका खासा प्रभाव है। उड़ीसा के गजपति जिले के गुम्मा ब्लॉक में तो 85 से 90% लोग इसके झाँसे में आकर ईसाई बन चुके हैं। इनका एक साझेदार ‘वर्ल्ड एवेंजेलिकल एलायंस (WEA)’ भी है।

इस संगठन का उद्देश्य ही हर राष्ट्र में ईसाई धर्म स्थापित करना है और बच्चों के लिए चर्च बनाना है। ये बात धर्म की आजादी की करते हैं, लेकिन उससे इनका मतलब ईसाई धर्म में लोगों को परिवर्तित करना होता है। जानकर हैरानी होगी कि WEA धर्मांतरण की बातों को खुलेआम साल 2008 में स्वीकार भी कर चुके हैं।

एक इस्लामी संगठन से भी इसका समझौता भी हुआ था। इसका आधार यह था कि जब दोनों ही समुदायों का उद्देश्य धर्मांतरण है तो फिर बाद में विवाद नहीं होना चाहिए।

‘वर्ल्ड विजन’ आतंकी संगठन हमास को पैसे देने के कारण भी बदनाम है। साल 2021 में इजरायलियों ने इसकी एक ब्रांच को बंद करने के लिए आवाज उठाई थी। उस समय वर्ल्ड विजन का गाजा में मैनेजर मोहम्मद अल हबाबी था जिसपर हमास को 50 मिलियन डॉलर की मदद देने का आरोप था। जब इस पर सवाल उठे तो वर्ल्ड विजन के अन्य अधिकारियों ने इन आरोपों को खारिज कर दिया।

इसी तरह वर्ल्ड विजन का कनेक्शन उस वर्ल्ड काउंसिल ऑफ चर्चेस से भी है जिसके संपर्क में ब्रेड फॉर द वर्ल्ड जैसी संस्था है जो भारत में हर्ष मंदर जैसे हिंदू विरोधियों, अलगाववादियों और अर्बन नक्सलियों को सहायता करते हैं। इनको भी यूएसएड मदद करती है। खुद यूएसएड की एडमिनिस्ट्रेटर ने इसकी तारीफ कुछ ही महीने की थी।

साल 2024 में जब यूपी सरकार ने धर्मांतरण विरोधी कानून पारित किया तो वर्ल्ड काउंसिल ऑफ चर्चेस, वर्ल्ड इवेंजेलिकल अलायंस और वर्ल्ड विजन ने धर्मांतरण विरोधी कानूनों के खिलाफ रैली निकाली थी। वहीं 2014 से पहले WEA हिंदुओं को निशाना बनाने का काम और तथ्यों को गलत दिखाने का काम करता था। इनकी यही भारत विरोधी हरकतों के साथ जनवरी 2024 में मोदी सरकार ने वर्ल्ड विजन का एफसीआरए लाइसेंस निलंबित कर दिया जिससे वामपंथी काफी नाराज हुए थे।

विवादित ढाँचों को बचाने सुप्रीम कोर्ट पहुँची कांग्रेस, Places of Worship Act 1991 का किया समर्थन: ताकि हिन्दू वापस न ले सके अपने देवस्थल; जब मुसलमान किसी भी विवादित जगह को छोड़ने को तैयार नहीं फिर हिन्दू क्यों छोड़े? हिन्दुओं आंखे खोलो नहीं तो "बटोगे तो कटोगे"


मुग़ल और इस्लामी शासन के दौरान कब्जाए गए मंदिरों को वापस लेने से रोकने वाले कानून Places of Worship Act 1991(POWA) के बचाव में कांग्रेस पार्टी उतर आई है। उसने सुप्रीम कोर्ट में इस कानून के समर्थन में एक याचिका दायर की है। 
कांग्रेस सुप्रीम कोर्ट में इस कानून की वैधता पर चल रही सुनवाई में पक्ष बनने के लिए पहुँची है। कांग्रेस ने कहा है कि यह कानून देश में सेक्युलरिज्म बचाने के लिए जरूरी है। उसने कहा है कि यदि कानून में कोई बदलाव हुआ तो इससे देश का सेक्युलरिज्म खतरे में आ जाएगा।

हिन्दू कांग्रेस से यह पूछना चाहता है कि क्या पूजा स्थलों को वापस लेना सेकुलरिज्म नहीं? यदि नहीं फिर नहीं चाहिए ऐसा पाखंडी सेकुलरिज्म। इसका मतलब साफ है कि सेकुलरिज्म के नाम पर हिन्दुओं की पीठ में छुरा खोंपा जा रहा है। दूसरे, क्या इस्लाम में किसी विवादित जगह इबादत करना जायज है? हिन्दुओं के पूजा स्थलों पर बनी मस्जिदें, दरगाह या कब्रिस्तान सनातन के नाम पर कलंक है। संविधान को पहले ही काफी हद तक शरीयत बना दिया है। हिन्दुओं परमपिता परमात्मा की महिमा है कि 2014 में कांग्रेस सत्ता से बेदखल हो गयी वरना यूपीए सरकार तो इससे भी खतरनाक कानून Anti-Communal Violence Bill ले आयी थी। गनीमत है कि अपने कार्यकाल में पेश किया बिल लोकसभा में पास नहीं हो पाया था अगर ये बिल पास हो गया होता भारत संविधान नहीं शरीयत से चल रहा होता। यही असली वजह थी 2024 चुनावों में संविधान खतरे में का शोर मचाया था और I.N.D.I alliance बना। 

हिन्दुओं एकजुट हो जाओ वरना योगी का कहना कि "बटोगे तो कटोगे" सच होगा। इन सभी सनातन विरोधियों को अपने वोट से धूल चटवाओ। नहीं तो ये सनातन विरोधी हिन्दुओं को कहीं का नहीं छोड़ेंगे। रोते रहना। जब मुसलमान विवादित मस्जिद, दरगाह और कब्रिस्तान को छोड़ने को तैयार नहीं फिर हिन्दू क्यों छोड़े? 

कांग्रेस ने क्या कहा?

यह याचिका सुप्रीम कोर्ट में कांग्रेस ने अपने वकीलों के माध्यम से दायर की है। याचिका में कांग्रेस ने कहा, “आवेदक Places of Worship Act 1991 के संवैधानिक और सामाजिक महत्व पर जोर देने के लिए इस मामले में हस्तक्षेप करना चाहती है क्योंकि उसे आशंका है कि इसमें कोई भी बदलाव भारत के मजहबी एकता और सेक्युलरिज्म को खतरे में डाल सकता है और इससे राष्ट्र की संप्रभुता और अखंडता को खतरा हो सकता है।”
कांग्रेस ने आगे कहा कि वह सेक्युलरिज्म को बचाए रखना चाहती है और जब कानून बना था तो लोकसभा में जनता पार्टी के साथ वह बहुमत में थी। कांग्रेस ने कहा क्योंकि कानून बनाने के लिए वह अपने सांसदों के माध्यम से जिम्मेदार थी, ऐसे में उसे सुप्रीम कोर्ट के भीतर इसका बचाव करने के लिए मौक़ा दिया जाए। कांग्रेस ने दावा किया कि इस कानून के विरोध में डाली गई याचिकाओं में गलत दावे किए गए हैं। कांग्रेस ने यह भी दावा किया कि इससे हिन्दू, सिख, जैन और बौद्ध धर्म के लोगों के साथ कोई भेदभाव नहीं होता।
कांग्रेस ने याचिका में कहा, “याचिका में यह भी गलत कहा गया है कि Places of Worship Act 1991 पक्षपाती है क्योंकि यह केवल हिन्दू, सिख, जैन और बौद्ध समुदायों के सदस्यों के लिए लागू है। Places of Worship Act 1991 को देखने से ही पता लगता है कि यह सभी धर्मों के बीच समानता को बढ़ावा देता है और याचिका में बताए गए धर्म के लोगों से अलग व्यवहार नहीं करती है। यह सभी धर्मों के पूजा स्थलों के लिए समान रूप से लागू है और 15 अगस्त, 1947 के अनुसार उनकी स्थिति का पता लगाता है और उसे स्थापित करता है।”

सुप्रीम कोर्ट में क्या लड़ाई चल रही?

इस कानून को हिन्दुओं की तरफ से सुब्रमण्यम स्वामी, अश्विनी उपाध्याय और बाकी संगठनों ने चुनौती दी है। वहीं मुस्लिमों की तरफ से आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और जमीयत ने याचिका दायर की है। इस मामले में नई याचिका ज्ञानवापी मस्जिद कमिटी ने दायर की है। उसका कहना है कि वह भी प्रभावित है।
मुस्लिम चाहते हैं कि इस कानून के खिलाफ दायर की गई याचिकाएँ खारिज कर दी जाएँ और कानून को पूरी तरह से लागू किया जाए। उनका कहना है कि कानून के तहत अब किसी भी मुस्लिम मजहबी स्थल पर दावा नहीं किया जाना चाहिए।
वहीं हिन्दू पक्ष ने कहा है कि इस कानून के जरिए उन सभी धार्मिक स्थलों को कानूनी मान्यता दे दी गई जिनका स्वरुप 1947 से पहले बदल दिया गया था। हिन्दू पक्ष ने कहा है कि इस कानून की धारा 2,3 और 4 को रद्द कर दिया जाए। हिन्दू पक्ष ने कहा है कि कानून के चलते उन धार्मिक स्थलों को भी वह वापस नहीं ले सकते, जिनको आक्रांताओं ने तोड़ा था।
हिन्दू पक्ष ने इस कानून को संसद में पास किए जाने का भी विरोध किया है। हिन्दू पक्ष का कहना है कि यह ऐसा कानून है जो लोगों को न्यायालय के दरवाजे खटखटाने से रोकता है ऐसे में यह असंवैधानिक है। हिन्दू पक्ष ने इसके अलावा कानून की संवैधानिकता पर भी प्रश्न उठाए हैं।
इस मामले में को लेकर 12 दिसम्बर, 2024 को सुनवाई की थी। इसकी सुनवाई CJI संजीव खन्ना की बेंच ने की थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस सुनवाई में आदेश दिया था कि अब देश की अदालतों में कोई भी ऐसी याचिका स्वीकार नहीं की जाएगी, जिसमें किसी मजहबी स्थल की स्थिति को लेकर चुनौती दी गई हो। सुप्रीम कोर्ट ने प्लेसेस ऑफ़ वर्शिप एक्ट मामले में केंद्र सरकार से एक हलफनामा दायर करने को कहा था।

क्या है 1991 का प्लेसेस ऑफ़ वर्शिप एक्ट?

पूजास्थल अधिनियम, 1991 या फिर Places of Worship Act 1991 पीवी नरसिम्हा राव की अगुवाई वाली कांग्रेस सरकार 1991 में लेकर आई थी। इस कानून के जरिए किसी भी धार्मिक स्थल की प्रकृति यानी वह मस्जिद है मंदिर या फिर चर्च-गुरुद्वारा, यह निर्धारित करने को लेकर नियम बनाए गए हैं।
इस कानून के अनुसार, देश के आजाद होने के दिन यानी 15 अगस्त, 1947 को जिस धार्मिक स्थल की स्थिति जैसी थी, वैसी ही रहेगी। यानि इस दिन यदि कोई स्थान मस्जिद था तो वह मस्जिद रहेगा। कानून में कहा गया है कि अगर कोई व्यक्ति किसी धार्मिक स्थल का स्वरुप बदलने की कोशिश करेगा तो उसकी 3 वर्ष तक का कारावास हो सकता है।
इसी कानून में कहा गया है कि कोई भी व्यक्ति यदि किसी धार्मिक स्थल के स्वरुप के बदलने को लेकर याचिका कोर्ट में लगाएगा तो वह भी नहीं मानी जाएगी। यानि कोई भी व्यक्ति किसी मस्जिद के मंदिर होने का दावा नहीं कर सकता या फिर किसी मंदिर के मस्जिद होने का दावा नहीं किया जा सकता।
कानून में यह भी स्पष्ट तौर पर कहा है कि यदि यह स्पष्ट तौर पर साबित हो जाए कि इतिहास में किसी धार्मिक स्थल की प्रकृति में बदलाव किए गए थे तो भी उसका स्वरुप नहीं बदला जाएगा। यानी यह सिद्ध भी हो जाए कि किसी मंदिर को इतिहास में तोड़कर मस्जिद बनाई गई थी तो भी उसे अब दोबारा मंदिर में नहीं बदला जा सकता।
कुल मिलाकर यह कानून कहता है कि 1947 के पहले जिस भी धार्मिक स्थल में जो कुछ बदलाव हो गए या फिर उस दिन जैसे थे, वह वैसे ही रहेंगे। उनके ऊपर अब कोई दावा नहीं किया जा सकेगा। इसी कानून में राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद को छूट दी गई थी।
इस कानून में कई छूट भी दी गई हैं। यह कानून कहता है कि यदि किसी धार्मिक स्थल में बदलाव 15 अगस्त, 1947 के बाद हुए हैं तो ऐसे में कानूनी लड़ाई हो सकती है। इसके अलावा ASI द्वारा संरक्षित स्मारकों को लेकर भी इसमें छूट दी गई है।

आंध्र प्रदेश : जिस चर्च में हर महीने होता था 3000 हिंदुओं का धर्मांतरण, उस पर चलेगा बुलडोजर: एशिया के दूसरे सबसे बड़े चर्च को लेकर सरकार का फैसला

                         सतीश कुमार और कैल्वरी टेंपल चर्च (साभार: calvary temple/Tripadvisor)
आज हर प्रदेश में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मांग होती है उसका कारण है। योगी की तरह सख्त निर्णय लेना। योगी के बुलडोज़र से परेशान मुस्लिम कट्टरपंथी और सेकुलरिज्म के नाम पर गुमराह करने वाला गैंग सुप्रीम कोर्ट तक दौड़ लगाता है। लेकिन बाबा का बुलडोज़र हर प्रदेश में पहुँच रहा है।  

आंध्र प्रदेश के अल्पसंख्यक कल्याण विभाग ने गुंटूर जिले में स्थित कैल्वरी टेम्पल चर्च को गिराने के आदेश जारी किया है। यह चर्च पेडकाकनी मंडल के नम्बुरु गाँव में स्थित है। इस चर्च को अवैध रूप से संचालन किया जा रहा था। एक जाँच के बाद इसका खुलासा हुआ था। प्रारंभिक जानकारी के अनुसार, केवल उन संरचनाओं को ध्वस्त किया जाएगा जो बिना कानूनी अनुमति के चल रही हैं।

दरअसल, नवंबर 2024 में इस चर्च के खिलाफ प्रधानमंत्री कार्यालय को एक शिकायत दी गई थी। शिकायत में आरोप लगाया गया था कि इसका संचालन पंचायती राज, राजस्व, पुलिस और ध्वनि प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड जैसे सरकारी विभागों से कानूनी अनुमति के बिना किया जा रहा है। इसमें ये भी कहा गया था कि पादरी डॉक्टर सतीश कुमार ने टैक्स का भुगतान किए बिना दान के जरिए लोगों को लूटा।

 शिकायत के बाद जाँच में पाया गया कि यह चर्च अवैध रूप से संचालित हो रहा था और गरीबों को किराने का सामान देकर तथा फर्जी दावे करके हिंदुओं को ईसाई धर्म में परिवर्तित कर रहा था। अक्टूबर में बताया गया था कि हैदराबाद के पादरी डॉक्टर सतीश कुमार के नेतृत्व में कैल्वरी चर्च ने हर महीने लगभग 3,000 हिंदुओं को ईसाई धर्म में धर्मांतरित किया है।

पादरी सतीश कुमार ने विशेष रूप से दावा किया कि उन्होंने अब तक 3.5 लाख से अधिक हिंदुओं को ईसाई धर्म में परिवर्तित किया है। सतीश कुमार ने अगले 10 वर्षों में पूरे भारत में 40 ऐसे चर्च स्थापित करने की योजना बताई थी। CBN न्यूज़ (द क्रिश्चियन ब्रॉडकास्टिंग नेटवर्क इंक) का एक वीडियो 26 अक्टूबर 2024 को सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म X पर वायरल हुआ।

इस वीडियो में कैल्वरी टेम्पल चर्च की धर्मांतरण गतिविधियों के बारे में बात की गई थी। बाद में 28 अक्टूबर 2024 को लीगल राइट्स प्रोटेक्शन फ़ोरम (LRPF) ने X पर साझा किया कि काकीनाडा के जिला कलेक्टर के आदेश के बाद राजस्व अधिकारियों ने कैल्वरी टेम्पल चर्च को ज़ब्त कर लिया है। चर्च पर भूमि कब्जाने, संदिग्ध समझौतों के ज़रिए नए चर्च बनाने, कानून का उल्लंघन सहित कई आरोप हैं।

कैल्वरी टेंपल चर्च एशिया के सबसे बड़े चर्चों में से एक है, जिसके सदस्यों की संख्या 4 लाख से अधिक है। वहीं, साप्ताहिक उपस्थिति 20,000 से अधिक होती है। चर्च के अलावा, सतीश कुमार का संगठन कैल्वरी बाइबल कॉलेज, कैल्वरी अस्पताल और कैल्वरी स्कूल चलाता है। पादरी सतीश कुमार का आंध्र प्रदेश और उसके बाहर राजनीति से लेकर हर क्षेत्र में काफी प्रभाव माना जाता है।

इसके साथ ही राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय ईसाई समुदायों में भी सतीश कुमार की तगड़ी पहुँच है। वह मिशनरी गतिविधियों के लिए अक्सर अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका, कोरिया सहित विभिन्न देशों में आते-जाते रहते हैं। अमेरिका के तत्कालीन उपराष्ट्रपति माइक पेंस ने साल 2018 में सतीश कुमार से मुलाकात की तस्वीरें सोशल मीडिया साइट X पर शेयर की थी और मुलाकात को प्रेरणादायक बताया था।

चर्च की स्थापना

कैल्वरी टेम्पल इंडिया की स्थापना 2005 में सतीश कुमार ने की थी। उन्हें अक्सर एक सम्मानित पादरी, लेखक और अंतरराष्ट्रीय वक्ता बताया जाता है। उन्हें दूरदर्शी नेतृत्व और ईमानदार बताया जाता है। हालाँकि, जाँच में उनके मिशनरी कामों का पता चला। पादरी सतीश ‘बाइबिल के मानकों’ पर जोर देते हैं, जो रणनीतिक रूप से उनके अनुयायियों को बढ़ाने के लिए तैयार किया गया लगता है।
यह भारत में आक्रामक तरीके से धर्मांतरण को बढ़ावा देने के उनके लक्ष्य को दिखाता है। चर्च की वेबसाइट पर कैल्वरी के बारे में खूब प्रशंसा की गई है। इसमें चर्च के 400,000 सदस्य होने का दावा किया गया है। ये सब कुछ हिंदुओं को लक्षित करने के लिए धन जुटाने की रणनीति के तहत किया गया लगता है। कैल्वरी चर्च का यह भी दावा है कि चर्च का निर्माण केवल 52 दिनों में किया गया था।
जब कैल्वरी बाइबिल कॉलेज और कैल्वरी अस्पताल जैसी पहलों के साथ-साथ प्रदान किए जाने वाले मुफ़्त भोजन पर विचार किया जाता है, तो यह परोपकार के बारे में कम और धार्मिक साम्राज्य के निर्माण के बारे में अधिक प्रतीत होता है। पादरी सतीश कुमार अपनी कई गतिविधियों के कारण कुख्यात हो चुके हैं। हालाँकि, ईसाई उनकी गतिविधियों को समुदाय के लिए एक बड़ी सेवा मानते हैं।

हिंदू संत को बांग्लादेश ने क्यों किया गिरफ्तार, क्या बदले की कार्रवाई कर रही मोहम्मद यूनुस सरकार

                             पुलिस की गिरफ्त में चिन्मय कृष्ण दास (फोटो साभार: @deepscribble)
बांग्लादेश में हिन्दू संत चिन्मय कृष्ण दास को सोमवार (25 नवम्बर, 2024) को गिरफ्तार कर लिया गया था। उन्हें मंगलवार को भी जमानत नहीं दी गई। बांग्लादेश की पुलिस ने हिन्दुओं पर इस्लामी कट्टरपंथियों के उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाने वाले चिन्मय दास को कथित देशद्रोह के मामले में गिरफ्तार किया है। वर्तमान में वह जेल में हैं। उनकी रिहाई के लिए हिन्दुओं ने प्रदर्शन किया तो उन पर भी पुलिस ने हमला किया और इस्लामी कट्टरपंथियों ने भी उन्हें निशाना बनाया।

चिन्मय कृष्ण दास की गिरफ्तारी के बाद युनुस सरकार पर सवाल उठ रहे हैं। बांग्लादेश के कानून के जानकार कह रहे हैं कि चिन्मय कृष्ण दास के मामले में सही प्रक्रिया का पालन नहीं हुआ है। कुछ का कहना है कि जिस आधार पर चिन्मय दास पर कार्रवाई हुई है, वैसे ही कार्रवाई बाकी पर होने लगे तो हजारों लोग देशद्रोह के दोषी हो जाएँगे। 

किस मामले में गिरफ्तार हुए चिन्मय कृष्ण दास?

 25 अक्टूबर, 2024 को बांग्लादेश के चटगाँव में हिन्दुओं ने एक रैली आयोजित की। इस रैली का नेतृत्व चिन्मय कृष्ण दास कर रहे थे। यह रैली चटगाँव में ऐतिहासिक लाल दीघी मैदान में आयोजित की गई थी। इसमें हजारों हिन्दू शामिल हुए थे। चटगाँव में यह रैली हिंदुओं पर इस्लामी कट्टरपंथियों के हमलों के विरोध में आयोजित की गई थी।

इस रैली के दौरान हिन्दुओं ने भगवा झंडे लहराए और सरकार से कार्रवाई की माँग की। चटगाँव में हुई इस रैली के कारण इस्लामी कट्टरपंथी बिदक गए। उन्होंने इस रैली में एक जगह पर एक भगवा झंडा, बांग्लादेश के झंडे से ऊँचा लहराता हुआ देख लिया।

इसी के आधार पर फिरोज खान नाम के एक शख्स ने चटगाँव में ही चिन्मय कृष्ण दास समेत 19 लोगों के खिलाफ FIR दर्ज करवाई। फिरोज खान ने आरोप लगाया कि बांग्लादेश का झंडा नीचे करके लहराया जा रहा था जो इसका अपमान है और यह देशद्रोह का कार्य है। फिरोज ने आरोप लगाया कि इससे चिन्मय कृष्ण दास देश में अशांति लाना चाहते हैं।

इसके बाद चिन्मय कृष्ण दास को गिरफ्तार कर लिया गया। उन्हें चटगाँव की अदालत में पेश किया गया। यहाँ मजिस्ट्रेट काजी नजरुल इस्लाम ने उन्हें देशद्रोह का आरोपित मानते हुए जमानत देने से इनकार कर दिया और जेल भेज दिया।

क्या कहता है कानून?

यह बात सही है कि बांग्लादेश के कानून के अनुसार, राष्ट्रीय झंडे से ऊपर कोई झंडा नहीं फहराया जा सकता। बांग्लादेश झंडा कानून, 1972 के अनुसार, अगर कोई व्यक्ति ऐसा करता पाया जाता है तो उसे 1 साल तक की सजा या फिर 5000 टका का जुर्माना हो सकता है। उस पर कोर्ट दोनों भी लगा सकती है।
इसके अलावा झंडे का अपमान करने पर बांग्लादेश की दंड संहिता की धारा 124 भी लग सकती है। इसका संबंध देशद्रोह से है। यदि झंडे के अपमान में या साबित होता है कि उस व्यक्ति ने देशद्रोह भी किया है, तो उसे आजीवन कारावास तक की सजा हो सकती है। उस पर जुर्माना भी लगाया जा सकता है।

वकीलों ने क्या बताया?

ढाका ट्रिब्यून की एक खबर के अनुसार, बांग्लादेश के बड़े वकीलों ने कहा कि यदि किसी ने झंडे का अपमान किया भी है, तो इससे यह नहीं सिद्ध होता कि वह देशद्रोही है। उन्होंने बताया कि अगर ऐसा होता तो जिन फैन्स ने अपनी फेवरेट टीम का झंडा, बांग्लादेश के झंडे से ऊपर फुटबॉल मैच के दौरान दिखाया, वह भी देशद्रोह के आरोपित बन जाते।
वकीलों ने बताया कि अगर किसी को लगता है कि किसी दूसरे व्यक्ति के झंडा फहराने के कारण उसकी देशभक्ति की भावना आहत हुई है तो वह मामला दर्ज करवा सकता है। ऐसी स्थिति में पहले कोर्ट मामले की जाँच करेगा और तय करेगा कि देशद्रोह का आरोप बनता भी है या नहीं।
चिन्मय कृष्ण दास के मामले में उन्हें बिना कोई राहत दिए हुए और मामले की जाँच किए बगैर ही देशद्रोही करार दिया जा रहा है। उन्हें कानूनी सहायता भी नहीं मिल रही है। बांग्लादेश के बड़े वकील ZI खान पन्ना ने बताया कि अगर किसी पर धारा 121 और 124 के आधार पर देशद्रोह का मामला दर्ज करना है तो इसके लिए पहले गृह मंत्रालय से अनुमति लेनी पड़ती है।
पन्ना ने इस बात पर हैरानी जताई है कि एक पुलिस थाने ने अपने ही मन से यह मामला दायर कर दिया। उन्होंने यूनुस सरकार पर नाराजगी जताते हुए कहा कि कल को अगर मोहम्मद यूनुस सत्ता से बाहर होंगे तो उन पर भी ऐसे ही देशद्रोह का मुकदमा लादा जाएगा। उन्होंने इस मामले में पूर्वाग्रह की बात कही है। 

क्या चिन्मय कृष्ण दास के साथ हो रहा भेदभाव?

चिन्मय कृष्ण दास बांग्लादेश में शेख हसीना के तख्तापलट के बाद से हिन्दुओं पर हो रहे अत्याचार के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं। वह बांग्लादेश में हिन्दू अधिकारों के लिए बोलने वाला एक बड़ा नाम बन कर उभरे हैं। उनकी धार्मिक पृष्ठभूमि के कारण उनको समर्थन भी अच्छा-ख़ासा है।
जिस दिन उन्हें यूनुस सरकार ने गिरफ्तार किया, तब भी वह ढाका से चटगाँव हिन्दुओं के लिए ही प्रदर्शन में जा रहे थे। इससे पहले कि वह चटगाँव पहुँचते, उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। इसके बाद उन्हें जमानत भी नहीं दी गई। चिन्मय कृष्ण दास के समर्थकों पर भी लाठी-डंडे चले।
मोहम्मद यूनुस की सरकार आने के बाद बांग्लादेश के न्यायालय एक के बाद एक मामले मसे देश की पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया को बरी करते जा रहे हैं। उनके अलावा देश भर में कई ऐसे मौलाना हैं जो भड़काऊ बयानबाजी करते हैं, उन पर कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है। यूनुस सरकार ने सत्ता में आते ही अल कायदा से जुड़े आतंकी संगठन के एक आतंकी को छोड़ दिया था।
ऐसे में शांति और सद्भाव का सन्देश देने वाले हिन्दू संत चिन्मय कृष्ण दास को गिरफ्तार करना और फिर उन्हें जमानत नहीं दिए जाने का कारण सिर्फ इस्लामी कट्टरपंथी सोच को ही माना जा सकता है। बांग्लादेश की सरकार में शामिल दो एडवाइजर ISKCON को प्रतिबंधित करने की माँग कर चुके हैं। यह कथित छात्र नेता हैं।


कनाडा में खालिस्तानी हमले के बाद योगी के नारे ‘बटेंगे तो कटेंगे’ की गूँज, एकजुट हुए हिंदू: मंदिरों ने नेताओं की एंट्री पर लगाया बैन, सुविधा का नहीं कर सकेंगे इस्तेमाल

                         कनाडा में हमले के बाद हिंदू सभा में नारे (फोटो साभार: वीडियो से लिया स्क्रीनशॉट)
कनाडा के ब्रैम्पटन में हिंदू मंदिर पर खालिस्तानी हमले के बाद हिंदुओं ने एकजुट होने का आह्वान किया है। एक वीडियो सामने आई है जिसमें हिंदू सभा मंदिर के सामने भीड़ जुटी है और धोती-कुर्ता पहने हिंदू पुजारी लोगों को ‘बँटोगे तो कटोगे’ का संदेश दे रहे हैं।

हिंदू पुजारी लोगों से नारे लगवाते हुए कहते हैं, “बटोगे तो कहोगे।” इसके बाद उन्होंने कहा, “ये हमला कोई अकेला हमला नहीं है। ये हमला हिंदू सभा पर हमला नहीं है। ये हमला पूरे विश्व में जितने हिंदू हैं उनके ऊपर है।”

लगभग 40 पहले विश्व हिन्दू परिषद् के अध्यक्ष अशोक सिंघल ने नारा दिया "जय श्री राम", और अब उत्तर प्रदेश मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने नारा दिया "बंटेंगे तो कटेंगे", दोनों ही नारों में शब्द है "तीन". जिस तरह "जय श्री राम" विश्व में गूंजा उसी तरह योगी का "बंटेंगे तो कटेंगे" की गूंज कनाडा भी पहुँच गयी। जिस तरह "जय श्री राम" ने अपना प्रभाव दिखाया उसी तरह "बंटेंगे तो कटेंगे" प्रभावी हो रहा है। जिस दिन भारतीय हिन्दुओं ने भी गंभीरता से इसे अपना लिया कोई गंगा-जमुनी तहजीब जैसे गुमराह करने नारों से बहका नहीं सकेगा। इन पाखंडियों ने यमुना का नाम बिगाड़कर जमुना कर दिया। खैर, गंगा और यमुना दोनों ही हिन्दू संस्कृति के प्रतीक है। जब मुस्लिम कट्टरपंथी हिन्दू देवी-देवताओं का अपमान करते हैं फिर क्यों गंगा-जमुनी तहजीब का इस्तेमाल कर जनता को गुमराह करते हैं?      

आगे उन्होंने कहा, “सुनिए, आज समय आ गया है जब हमें अपने लिए नहीं बल्कि अपनी संतति के बारे में सोचना पड़ेगा। सबको एक होना पड़ेगा। हम किसी का विरोध नहीं करते हैं लेकिन कोई हमारा विरोध करता है तो हम छोड़ेंगे नहीं उसे तोड़ेंगे।”  

इसके अलावा ये भी खबर सामने आई है कि कनाडा की राष्ट्रीय हिंदू परिषद और हिंदू फेडरेशन ने मंदिर के नेताओं और हिंदू समूहों के साथ मिलकर हिंदू मंदिर पर हमले के बाद एक आधिकारिक बयान जारी किया है। इसमें कहा गया है कि अब किसी राजनीतिक दलों के किसी राजनेता को राजनीतिक उद्देश्यों के लिए मंदिर की सुविधाओं का उपयोग करने की अनुमति नहीं दी जाएगी।

कुछ दिन पहले सीएम योगी आदित्यनाथ ने मंच से बटोगे तो कटोगे का बयान दिया था। इसके बाद इस पर चर्चा तेज हो गई। आज इसकी आवाज कनाडा से भी उठी वो भी तब जब खालिस्तानियों ने हिंदू मंदिर के परिसर के भीतर घुसकर हमला कर दिया। इस अटैक के दौरान खालिस्तानियों ने न हिंदू महिलाओं को छोड़ा और न बच्चों को। सबपर लाठी-डंडे से हमले किए गए।

अवलोकन करें:-

मंदिर में घुसे खालिस्तानी, हिंदुओं को दौड़ा-दौड़ा कर लाठी-डंडे से पीटा: कनाडा में हमले के बाद घि
मंदिर में घुसे खालिस्तानी, हिंदुओं को दौड़ा-दौड़ा कर लाठी-डंडे से पीटा: कनाडा में हमले के बाद घि

 

इस घटना के बाद कनाडाई नेताओं ने इस हमले की निंदा की, लेकिन कुछ नेता निंदा करते समय खुलकर खालिस्तानियों का नाम लेने से बचे। वहीं ओटावा स्थित भारतीय उच्चायोग ने भी इस घटना के बाद भारतीयों की सुरक्षा पर चिंता जाहिर की। उन्होंने कहा कि इस तरह की घटना कनाडा में निराश करने वाली हैं।