Showing posts with label #kerala. Show all posts
Showing posts with label #kerala. Show all posts

केरल : विधायक फातिमा तहिलिया द्वारा दीपक जलाने पर इस्लामी कट्टरपंथियों ने मचा दिया बवाल… निलाविलक्कु विवाद ; क्या सेक्युलर होने का ठेका सिर्फ हिंदुओं का?

                                                     साभार - इंडियन एक्सप्रेस, विकिपीडिया
केरल में इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग (IUML) की महिला विधायक फातिमा तहिलिया के एक रेस्टोरेंट उद्घाटन कार्यक्रम में पारंपरिक तेल का दीपक निलाविलक्कु जलाने पर शुरु हुआ विवाद थमने का नाम ही नहीं ले रहा है।

3 जून 2026 को कोझिकोड में ‘सामस्था केरला जमीय्यतुल उलेमा’ की बैठक में कहा गया था कि मुसलमानों का ऐसे धार्मिक कार्यों में शामिल होना, जिनका इस्लाम में कोई आधार नहीं है, सही नहीं माना जाता।

संगठन ने फातिमा तहिलिया को इस्लाम से बाहर निकालने की धमकी तक दे दी लेकिन आए दिन कट्टरता का ज्ञान देने वाले इस पर शांत बैठे हैं। सेक्युलरिज्म की बातें करने वालों को साँप सूँघ गया है।

सेक्युलरिज़्म तब खत्म होता है जब इस्लाम शुरू होता है: केरल के मुसलमान और गहरे इस्लामीकरण की ओर बढ़ रहे हैं, जबकि हिंदू अपने धर्म को सेक्युलर बनाने में लगे हैं।

केरल में निलाविलक्कु विवाद के बीच यह पहली बार नहीं है जब किसी मुस्लिम संगठन ने मुसलमानों को गैर-मुस्लिम धार्मिक परंपराओं से दूर रहने की सलाह दी हो। ‘सामस्था केरला जमीय्यतुल उलेमा’ पहले भी मुसलमानों को निलाविलक्कु जलाने से बचने की सलाह दे चुका है।
दरअसल, संगठन पर लंबे समय से अधिक कट्टर इस्लामी सोच को बढ़ावा देने के आरोप लगते रहे हैं। फरवरी 2026 में संगठन ने एक प्रस्ताव पास कर मुस्लिम महिलाओं की बढ़ती सार्वजनिक भागीदारी पर चिंता जताई थी। संगठन का कहना था कि महिलाओं को ऐसी गतिविधियों से दूर रहना चाहिए जो उन्हें उनकी ‘मुख्य जिम्मेदारियों’ से भटका सकती हैं।
इससे पहले 2021 में सामस्था से जुड़े छात्र संगठन सामस्था केरल सुन्नी छात्र संगठन (SKSSF) ने केरल से अलग मुस्लिम बहुल ‘मालाबार राज्य’ बनाने की माँग की थी। संगठन की पत्रिका ‘सत्यधारा’ के संपादक अनवर सादिक फैजी ने कहा था कि नया मालाबार राज्य बनाया जाए और उसकी राजधानी कोझिकोड हो। इस माँग के पीछे मालाबार क्षेत्र में मुस्लिम आबादी अधिक होने का तर्क दिया गया था।
2019 में ‘सामस्था केरला जमीय्यतुल उलेमा’ ने महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश का विरोध दोहराते हुए कहा था कि महिलाओं को घर पर ही नमाज पढ़नी चाहिए। उस समय संगठन के महासचिव के. अलीकुट्टी मुसलियार ने कहा था कि धार्मिक मामलों में अदालतों का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं किया जा सकता और ऐसे मामलों में केवल धार्मिक नेताओं की बात मानी जानी चाहिए।
दिलचस्प बात यह है कि कड़े धार्मिक विचारों के बावजूद सामस्था खुद को केरल का अपेक्षाकृत ‘मध्यमार्गी’ मुस्लिम संगठन बताता है। फरवरी 2026 में संगठन ने जमात-ए-इस्लामी की कथित ‘थियोक्रेटिक’ विचारधारा का विरोध करते हुए उसे ‘चरमपंथी’ करार दिया था।
2022 में सामस्था से जुड़े एक सुन्नी नेता नसर फैजी कूडाथायी ने कुडुम्बश्री स्वयंसेवकों को दिलाई जाने वाली उस संवैधानिक शपथ का विरोध किया था जिसमें मुस्लिम महिलाओं को पिता की संपत्ति में समान कानूनी अधिकार देने की बात कही गई थी। उनका कहना था कि यह कुरान की शिक्षाओं के खिलाफ है क्योंकि इस्लामी उत्तराधिकार नियमों में पुरुषों को महिलाओं की तुलना में दोगुना हिस्सा मिलता है।
केरल में कई मुस्लिम संगठन पहले भी मुसलमानों को ‘ओणम’ में पूरी तरह शामिल न होने की सलाह दे चुके हैं। उनका तर्क रहा है कि ओणम का संबंध महाबली और भगवान विष्णु के वामन अवतार से जुड़ी पौराणिक कथाओं से है। कुछ संगठनों ने कहा कि बहुदेववादी (Polytheistic) या ‘काफिर’ माने जाने वाले समुदायों के त्योहार मनाना ‘शिर्क’ की श्रेणी में आ सकता है।
2016 में कुछ सलाफी प्रचारकों ने खुले तौर पर ओणम और क्रिसमस को मुसलमानों के लिए ‘हराम’ बताया था। उनका कहना था कि इन त्योहारों की जड़ें गैर-इस्लामी धार्मिक मान्यताओं से जुड़ी हैं।
अगस्त 2025 में एक मुस्लिम स्कूल शिक्षिका खादिजा का मामला भी सामने आया था। रिपोर्ट्स के मुताबिक, उन्होंने मुस्लिम छात्रों से ओणम समारोह में हिस्सा न लेने को कहा था। शिक्षिका ने कथित तौर पर कहा था कि मुसलमानों को इस्लाम के अनुसार जीवन जीना चाहिए और ओणम जैसे बहुदेववादी त्योहारों को बढ़ावा नहीं देना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा था कि दूसरे धर्मों की परंपराओं में शामिल होना ‘शिर्क’ की ओर ले जा सकता है।
कुल मिलाकर, केरल में मुस्लिम संगठनों, मौलानाओं और शिक्षकों के बीच मजहबी रीति-रिवाजों को लेकर कड़ा रुख देखने को मिलता रहा है। निलाविलक्कु विवाद के बाद यह बहस फिर तेज हो गई है कि धार्मिक पहचान और सार्वजनिक जीवन में भागीदारी के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए।
हाल ही में केरल के पलक्कड़ में बन रही एक अधूरी जिम बिल्डिंग राष्ट्रीय चर्चा का विषय बन गई थी। वजह यह थी कि सोशल मीडिया पर इसे ‘इस्लाम-फ्रेंडली जिम‘ के रूप में प्रचारित किया जा रहा था। जिम के मुस्लिम मालिक नवास मुथु टी ने कहा था कि वह एक ऐसा नया मॉडल लाने जा रहे हैं, जिसमें ‘फिटनेस और आस्था’ को जोड़ा जाएगा और जो इस्लामी रीति-रिवाजों व परंपराओं के अनुसार होगा।
केरल के मुसलमान अपने धर्म का पालन करने को लेकर पूरी स्पष्टता रखते हैं। मुस्लिम संगठन भी यह सुनिश्चित करते हैं कि समुदाय, खासकर युवा, ‘सेक्युलरिज्म’ की तय सीमा से आगे न जाएँ और इस्लामी मान्यताओं से दूर न हों।
इसके उलट, केरल के हिंदुओं के व्यवहार को लेकर भी बहस होती रही है। मलयाली हिंदुओं का एक बड़ा वर्ग दूसरे धर्मों की मान्यताओं को समायोजित करने के लिए अतिरिक्त प्रयास करता है जबकि अन्य समुदाय अपनी मजहबी पहचान को खुलकर सामने रखते हैं। इसी संदर्भ में ओणम के ‘सेक्युलराइजेशन’ या ‘डी-हिंदुइजेशन’ (हिंदू पहचान कमजोर करने) की चर्चा भी होती है।
हालाँकि, ओणम नई फसल से जुड़ा त्योहार माना जाता है लेकिन इसका मुख्य आधार हिंदू धार्मिक कथा है। सदियों से ओणम को राजा महाबली की वापसी के उत्सव के रूप में मनाया जाता रहा है। हाल के वर्षों में इसे केवल एक ‘हार्वेस्ट फेस्टिवल’ यानी फसल उत्सव तक सीमित करके पेश किया जा रहा है। इस प्रक्रिया में ओणम की हिंदू धार्मिक जड़ों को कमजोर किया जा रहा है।
हिंदू त्योहारों के धार्मिक पक्ष को धीरे-धीरे हटाया जा रहा है और उन्हें केवल सांस्कृतिक कार्यक्रम या कार्निवाल की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है। गैर-हिंदू समुदाय भी इन परंपराओं को नए तरीके से अपनाने या परिभाषित करने की कोशिश कर रहे हैं।
तमिलनाडु में हिंदू विरोधी द्रविड़ लोग पोंगल या मकर संक्रांति के साथ भी यही कर रहे हैं। वहाँ पोंगल को उसके हिंदू धार्मिक संदर्भ से अलग कर केवल ‘तमिल कृषि पर्व’ के रूप में प्रचारित किया जा रहा है, ठीक वैसे ही जैसे केरल में ओणम को ‘सांस्कृतिक त्योहार’ कहा जाता है।
केरल में एक वर्ग के बीच बीफ (गोमांस) खाने को लेकर भी बहस होती रही है। आलोचक कहते हैं कि कुछ लोग इसे “सेक्युलर पहचान” या “संस्कृति” के प्रतीक के रूप में पेश करते हैं, जबकि हिंदू धार्मिक ग्रंथों में गाय की हत्या और गोमांस खाने का विरोध बताया गया है। वहीं कुछ लोग इसे स्थानीय खानपान, इतिहास और सांस्कृतिक मिश्रण का हिस्सा मानते हैं।
इसी तरह, केरल के हिंदुओं के एक हिस्से के लिए बीफ (गाय का मांस) खाना कूल, दिखावे और सेक्युलरिज्म का सबसे बड़ा उदाहरण बन गया है जबकि वेदों जैसे हिंदू धर्मग्रंथों में गोहत्या और गाय का मांस खाने पर सख्त रोक है। गाय का मांस खाने को ‘हमारे इतिहास, मिली-जुली संस्कृति और खाने का हिस्सा’ बताने की साजिश की जाती है।

यह एक विडंबना है कि रेप करने वाले जिहादी जो प्यार का नाटक करके या नकली धार्मिक पहचान बताकर हिंदू महिलाओं को फँसाते हैं, वे हमेशा हिंदू महिलाओं को गाय का मांस खाने के लिए मजबूर करते हैं। यह काम काफिरों के धर्म का बड़ा मजाक उड़ाने और बेइज्जत करने की इस्लामी सोच का हिस्सा है। वे इन कामों को काफिरों पर इस्लामी जीत के काम के रूप में पसंद करते हैं।

यही ‘सेक्युलर-प्रोग्रेसिव’ लोग तब चुप्पी साध लेते हैं जब कुछ मुस्लिम व्यक्ति या संगठन रूढ़िवादी या विवादित बयान देते हैं और अपने समुदाय के लोगों को उन कामों से दूर रहने को कहते हैं, जिन्हें हिंदू धार्मिक परंपरा या अनुष्ठान मानते हैं। कुछ मौकों पर मुस्लिम संगठन अपनी सुविधानुसार संविधान और सेक्युलरिज्म का सहारा लेते नजर आते हैं, खासकर तब जब धार्मिक अधिकारों या पहचान से जुड़े मुद्दे सामने आते हैं।
एक ओर मुस्लिम समुदाय अपनी धार्मिक मान्यताओं और सिद्धांतों को लेकर बिना समझौते वाला रुख अपनाता है, भले ही उसके कुछ पहलुओं को दूसरे लोग रूढ़िवादी या पिछड़ा मानें। वहीं दूसरी ओर हिंदू समाज का एक हिस्सा दूसरे समुदायों को समायोजित करने को ही अपनी उदारता और बहुलतावाद का प्रतीक मानने लगा है। चाहे चाहें या न चाहें, भारत में सेक्युलरिज्म का बोझ हिंदू समाज ही उठाता है।

ईसाइयत के आगे सरेंडर, राहुल के लाडले वेणुगोपाल को नकारा; ईसाइयत का प्रचार करने वाली किताब के लेखक वीडी सतीशन को कांग्रेस ने चुना केरलम् का CM: खुद बाइबल के हैं फैन-चर्च है इनका फैन

                                         केरलम् के नए मुख्यमंत्री होंगे वीडी सतीशन (फोटो साभार: Facebook)
केरलम् में विधानसभा चुनाव के नतीजे को आए 10 दिन बीत चुके हैं। अब जाकर कांग्रेस नेतृत्व वाले UDF गठबंधन ने मुख्यमंत्री के नाम का ऐलान किया है। केरलम् के नए मुख्यमंत्री वीडी सतीशन होंगे। कांग्रेस नेता वीडी सतीशन बाइबल के फैन हैं और खुद भी ईसाई से जुड़ी किताब Aadham Ni Evide Akunnu लिख चुके हैं यानी ‘एडम’ ही वह है जो सत्य को सिद्ध करता है। ईसाइयत में ‘एडम’ को दुनिया का रचयिता माना जाता है।

दरअसल, केरलम् में अन्य राज्यों की तरह ही 4 मई 2026 को चुनाव की नतीजे घोषित किए जा चुके हैं। राज्य में कांग्रेस के नेतृत्व वाले UDF गठबंधन ने शानदार जीत दर्ज की। यह एक ऐतिहासिक जीत की तरह देखा गया क्योंकि राज्य में पिछले करीब 50 सालों से लेफ्ट की सरकार रही है।

केरलम् में नतीजे जारी होने के बावजूद भी मुख्यमंत्री पद की घोषणा नहीं की गई थी, जबकि अन्य राज्यों में मुख्यमंत्रियों का शपथग्रहण भी हो चुका है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इसकी वजह राज्य में जीते UDF गठबंधन के बीच मुख्यमंत्री पद को लेकर टकराव था। सीएम पद की रेस में पहले केसी वेणुगोपाल और रमेश चेन्नीथाला का नाम था। हालाँकि, जमीनी स्तर के नेता रहे वीडी सतीशन को हाई कमान ने मु्ख्यमंत्री बनाया। तमिलनाडु में ईसाई मुख्यमंत्री को समर्थन और अब केरलम में ईसाई मुख्यमंत्री। 

अब देखना यह है कि वेणुगोपाल मुख्यमंत्री नहीं बनाए जाने पर क्या कदम उठाते हैं या फिर गुलाम बन जी-हजूरी करते रहेंगे? यह अंदरखाने कुछ रंग दिखाएगी। क्योकि वेणुगोपाल को केरलम का चेहरा माना रहा है। अब वामपंथी अपने हाथों गयी सत्ता का बदला वेणुगोपाल को मोहरा बनाकर लेंगे या फिर मूकदर्शक बन बैठे रहेंगे। वैसे वामपंथी आसानी से चुपचाप बैठने वाले नहीं, क्योकि केरलम से सत्ता जाना देश से वामपंथ का समाप्त होना। सिर्फ केरलम ही ऐसा राज्य था जिसके बलबूते वामपंथी उछलते रहते थे। 

बड़बोले राहुल का केरलम में मुस्लिम-ईसाई वोटबैंक के आगे surrender; नहीं चुन पा रहे मुख्यमंत्री; हिंदू समीकरण और बीजेपी के बढ़ते असर ने बढ़ाया दबाव

                                                                                                         प्रतीकात्मक तस्वीर (साभार - AI)
केरल विधानसभा चुनाव के नतीजे आए आज 11 दिन बीत चुके हैं लेकिन राज्य में सरकार गठन को लेकर तस्वीर अब तक साफ नहीं हो पाई है। चुनाव जीतने वाला कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) अभी तक मुख्यमंत्री के चेहरे पर अंतिम फैसला नहीं कर सका है। जबकि सारा विपक्ष INDI गठबंधन के एकजुट होने का ढोल पीटता नज़र आता है, लेकिन केरलम में सब एक दूसरे के दुश्मन। कोई राहुल प्रियंका की बात तक सुनने को तैयार नहीं। क्योकि राहुल की सुई के सी वेणुगोपालन पर अटकी है। स्थानीय कांग्रेस वेणुगोपालन को नहीं चाहती। इस लड़ाई में राहुल और प्रियंका के खिलाफ आवाज़ बुलंद हो गयी है। इस हिसाब से लगता है अगर मुख्यमंत्री चुन भी लिया तो सरकार का अपना कार्यकाल पूरा करना मुश्किल होगा और वामपंथी भी कांग्रेस की हर चाल पर गिद्ध की नज़र रखे हुए है।  

आमतौर पर स्पष्ट जनादेश मिलने के बाद राजनीतिक दल तेजी से नेतृत्व तय कर लेते हैं ताकि जनता के बीच स्थिरता और आत्मविश्वास का संदेश जाए। लेकिन केरल में कांग्रेस की स्थिति अलग दिखाई दे रही है।

यही वजह है कि राजनीतिक गलियारों में लगातार यह सवाल उठ रहा है कि आखिर ऐसी कौन सी मजबूरी है जिसके कारण कांग्रेस मुख्यमंत्री के नाम पर सहमति नहीं बना पा रही। 

केरल की राजनीति में सामाजिक संतुलन और कांग्रेस की चुनौती

केरलम उन राज्यों में है जहाँ राजनीति सीधे सामाजिक समीकरणों से जुड़ी हुई है। यही सामाजिक समीकरण कांग्रेस का सिर दर्द बने हुए हैं। कॉन्ग्रेस और मुस्लिम लीग ने जो केरल चुनाव जीती है वो मुस्लिमों और ईसाइयों के दम पर जीता है। इसे आँकड़ों से भी समझने की कोशिश करते हैं।

अगर आँकड़ों की बात करें तो 140 सदस्यीय केरलम विधानसभा में इस बार कुल 35 मुस्लिम विधायक चुने गए हैं, जो लगभग 25 प्रतिशत है। इनमें सबसे ज्यादा हिस्सा UDF गठबंधन के पास है, जिसमें कांग्रेस और IUML मिलाकर कुल 30 मुस्लिम विधायक हैं, यानी करीब 85.7 प्रतिशत।

अकेले IUML के 22 और कांग्रेस के 8 विधायक इस आँकड़े में शामिल हैं। दूसरी तरफ LDF गठबंधन के पास कुल 5 मुस्लिम विधायक हैं, जिनमें CPI(M) के 4 और CPI का 1 विधायक शामिल है, यानी करीब 14.3 प्रतिशत।

अगर पार्टीवार देखें तो कॉन्ग्रेस के कुल 63 विधायकों में 8 मुस्लिम विधायक हैं, जो लगभग 12.7 प्रतिशत है। IUML के सभी 22 विधायक मुस्लिम हैं, जबकि CPI(M) के 4 और CPI का 1 विधायक मुस्लिम समुदाय से आते हैं।

यहाँ हिंदू आबादी लगभग 54 प्रतिशत, मुस्लिम आबादी करीब 26 प्रतिशत और ईसाई आबादी लगभग 18 प्रतिशत मानी जाती है। ये आँकड़े जनगणना और विभिन्न आधिकारिक रिपोर्ट्स के आधार पर सामने आते रहे हैं।

अब कांग्रेस के सामने इसी समीकरण को साधना सबसे बड़ी चुनौती है। यानी वो चुनाव मुस्लिम और ईसाइयों के दम पर जीती है तो ऐसे में ये गुट अपने समुदाय का मुख्यमंत्री होने को लेकर जोर लगा रहे हैं और कांग्रेस भी इनसे दबाव में है। लेकिन वो अंतिम फैसला नहीं ले पा रही है। क्योंकि अगर वो मुस्लिम या ईसाई को मुख्यमंत्री चुनती है तो उसके लिए राज्य के सबसे बड़े समुदाय यानी हिंदुओं को साधना मुश्किल हो जाएगा।

वहीं, अगर वो हिंदू मुख्यमंत्री चुनती है, जो शायद वो चुने भी तो फिर अल्पसंख्यकों का भरोसा कांग्रेस से एक बार फिर उठता दिखेगा और वो भी फिर CPM की और जा सकते हैं। वोटों की इस लड़ाई में बीजेपी का एक अहम खिलाड़ी बनते जाना कांग्रेस की चुनौतियों को और बढ़ा रहा है।

बीजेपी की बढ़ती मौजूदगी ने कांग्रेस की चिंता बढ़ाई

कई सालों तक केरलम को ऐसा राज्य माना जाता रहा जहाँ बीजेपी चुनावी तौर पर सीमित प्रभाव वाली पार्टी थी। लेकिन पिछले एक दशक में तस्वीर धीरे-धीरे बदली है। बीजेपी का वोट शेयर लगातार बढ़ा है।
2019 के लोकसभा चुनाव और उसके बाद के चुनावों में पार्टी ने कई सीटों पर अपनी मौजूदगी मजबूत की। भले ही सीटों के हिसाब से बीजेपी को बड़ी सफलता नहीं मिली हो, लेकिन वोट प्रतिशत और संगठनात्मक विस्तार ने बाकी दलों को सतर्क जरूर किया है।
इसके पीछे RSS की लंबे समय से चली आ रही जमीनी मौजूदगी को भी महत्वपूर्ण माना जाता है। केरलम उन राज्यों में रहा है जहाँ RSS ने दशकों तक कैडर आधारित नेटवर्क तैयार किया।
यही नेटवर्क अब बीजेपी के राजनीतिक विस्तार में मददगार माना जाता है। बीजेपी फिलहाल सिर्फ सत्ता की लड़ाई नहीं लड़ रही बल्कि वह खुद को कांग्रेस और वाम दलों के बीच तीसरे विकल्प से मुख्य विपक्षी ताकत में बदलने की कोशिश कर रही है।
यही कारण है कि कांग्रेस कोई ऐसा राजनीतिक संदेश नहीं देना चाहती जिससे बीजेपी को नए वोटरों के बीच जगह बनाने का मौका मिले। और ऐसे वक्त में कांग्रेस अगर किसी ईसाई या मुस्लिम चेहरे को आगे बढ़ाती है तो BJP का यह नैरेटिव और मजबूत होगा कि कांग्रेस हिंदुओं को प्रतीकात्मक प्रतिनिधित्व से ज्यादा कुछ नहीं देना चाहती। ये बीजेपी के विस्तार से लिए एक फर्टाइल जमीन तैयार करना होगा।

पश्चिम बंगाल का उदाहरण कांग्रेस को क्यों परेशान करता है

पश्चिम बंगाल में बीजेपी की बंपर विजय भी कांग्रेस को परेशान कर रही हैं। इसे पीछे एक खास वजह भी है, वो है 3 का आँकड़ा। इस चुनाव में बीजेपी ने केरल में 3 सीटें जीते हैं, ये उतनी ही सीटें हैं जितनी BJP ने 2016 के बंगाल चुनाव में जीती थीं। 10 सालों में BJP में अपनी तस्वीर पूरी तरह बदल दी है। इस बार बीजेपी ने बंगाल में 293 में से 207 सीटें जीती हैं।
कांग्रेस का मुख्यमंत्री चुनने का कन्फ्यूजन बीजेपी की बढ़ती ताकत से और अधिक गंभीर हो रहा है। कांग्रेस ऐसा कोई मौका BJP या वामपंथियों को नहीं देना चाहती है जिससे उसके लिए संकट आए लेकिन मौजूदा हालात में ऐसा होना लगभग असंभव है।
अब केरल में कांग्रेस के सामने एक तरफ पारंपरिक अल्पसंख्यक समर्थन को बनाए रखने की चुनौती है, दूसरी तरफ हिंदू वोटरों के बीच अपनी स्वीकार्यता मजबूत रखने की जरूरत है। इसके साथ बीजेपी का बढ़ता राजनीतिक विस्तार और बदलता चुनावी माहौल कांग्रेस की मुश्किल को और बढ़ा रहा है।
अवलोकन करें:-
असम, तमिलनाडु, केरलम और पश्चिम बंगाल में मुस्लिम लीगी बनी कांग्रेस; पाकिस्तान की मांग नहीं करने
आने वाले समय में कांग्रेस किस चेहरे पर भरोसा करती है, यह सिर्फ नेतृत्व परिवर्तन का फैसला नहीं होगा। यह तय करेगा कि पार्टी अपने पुराने सामाजिक गठबंधन को कितनी मजबूती से बचा पाती है और बदलती भारतीय राजनीति में खुद को किस तरह ढालती है। अगर देखा जाए तो कांग्रेस के सामने असली परीक्षा सिर्फ मुख्यमंत्री चुनने की नहीं बल्कि अपने पूरे सामाजिक गठबंधन को एकजुट बनाए रखने की है।

क्या हिन्दुओं पर हुए अत्याचारों की पराकाष्ठा ममता को ले डूबेगी? असम में BJP लगाएगी जीत की हैट्रिक: तमिलनाडु में DMK तो केरल में UDF सरकार के आसार


पाँच राज्यों के विधानसभा चुनावों की वोटिंग खत्म होने के बाद अब एग्जिट पोल के नतीजे सामने आ गए हैं। इन रुझानों ने कहीं सत्ता परिवर्तन तो कहीं पुरानी सरकार की वापसी के संकेत दिए हैं। सबसे बड़ी खबर पश्चिम बंगाल से है, जहाँ कई सर्वे में BJP को बहुमत मिलने का अनुमान जताया गया है।

बंगाल में बीजेपी आने का सनातन विरोधी और कालनेमि हिन्दुओं को साफ संकेत होगा कि युगों-युगों अतिप्राचीन सनातन का विरोध अब बर्दाश्त नहीं होगा। यह पहला ऐसा चुनाव है जिसमे ममता ने एक भी प्रेस कांफ्रेंस नहीं की और ना ही चोटिल होने का कोई स्वांग रचा। चर्चा यह भी सुनने को आ रही है कि मतदान ख़त्म होने से पहले TMC में भगदड़ होने लगी है। परदे के पीछे बाबरी मस्जिद का समर्थन भी ममता को ले डूबेगा। बंगाल में पासे पलटने के लिए हर हिन्दू को चुनाव आयोग द्वारा सख्ती करने के लिए धन्यवाद् देना होगा। अगर चुनाव आयोग ने स्थानीय पुलिस को पोलिंग बूथ से दूर नहीं रखा होता जैसा एग्जिट पोल दिखा रहे हैं संभव नहीं हो पता। यही वजह है कि बंगाल में इतना भारी मतदान हुआ। कई वृद्ध लोगों को यह तक कहते सुना कि "जिन्दगी में पहली बार वोट दिया पहले तो घर से निकले बिना ही वोट डाल दिया जाता था।    

दूसरे, असम में कांग्रेस छोड़ बीजेपी में आये हिमंत सरमा का लगातार तीसरी बार मुख्यमंत्री बनने पर राहुल गाँधी और इसकी गुलामी करने वालों को राजनीति छोड़ देनी चाहिए। हिमंत वही स्वाभिमानी व्यक्ति है जिसे राहुल से मिलने जाने पर राहुल द्वारा अपने कुत्ते द्वारा जो बिस्कुट नहीं खाया उसे हिमंत को देना बहुत भारी पड़ा। इतनी बेइज्जती देख कांग्रेस छोड़ बीजेपी में शामिल हो गए।  

बाबरी मस्जिद की आड़ में बंगाल में पैर ज़माने की कोशिश करने वाले असदुद्दीन ओवैसी कहीं दिखाई नहीं दे रहे। ओवैसी को दलित हिन्दुओं का रोना रोने से पहले मुस्लिम समाज में उस जातिगत सियासत के लिए सड़क पर आना चाहिए, जहाँ शिया, सुन्नी, अहमदी, पठान, वहाबी और पासमांदा आदि फिरके एक दूसरे की मस्जिद में नमाज और दूसरे के कब्रिस्तान में अपने मुर्दे को दफना नहीं सकते, क्यों नहीं इस भेदभाव को ख़त्म करने की आवाज़ उठाते? ओवैसी जानते है कि जिस दिन उस खतरनाक मुद्दे पर मुंह खोला कोई मुसलमान भी इसकी पार्टी को वोट नहीं देगा। 

वहीं, असम में BJP तीसरी अपनी सत्ता बचाती दिख रही है। केरल और तमिलनाडु में क्षेत्रीय और विपक्षी गठबंधन मजबूत नजर आ रहे हैं। असली नतीजे 4 मई को आएँगे, लेकिन Exit Poll ने हार-जीत की चर्चा तेज कर दी है।

पश्चिम बंगाल: क्या दीदी का किला ढहेगा?

 पश्चिम बंगाल की 294 सीटों पर आए Exit Poll ने सबको चौंका दिया है। पोल ऑफ पोल्स के अनुसार BJP 149 सीटों के साथ बहुमत के पार जा सकती है, जबकि TMC को 140 सीटें मिलने का अनुमान है।

पी-मार्क ने BJP को 150 से 175 और टीएमसी को 118 से 138 सीटें दी हैं।

वहीं जेवीसी के मुताबिक BJP 138-159 और टीएमसी 131-152 के बीच रह सकती है।

मैट्रीज ने BJP को 146-161 और टीएमसी को 125-140 सीटें दी हैं।

चाणक्य स्ट्रैटेजीज ने भी BJP को 150-160 सीटों के साथ आगे रखा है।

हालाँकि, पीपुल्स पल्स ने टीएमसी की वापसी का दावा करते हुए उन्हें 178-187 सीटें दी हैं।

असम: फिर से बीजेपी सरकार के संकेत

असम में बहुमत का आँकड़ा 64 है। पोल ऑफ पोल्स ने NDA को 92 और कॉन्ग्रेस प्लस को 30 सीटें दी हैं।

एक्सिस माय इंडिया ने NDA को 88-100 और कॉन्ग्रेस प्लस को 24-36 सीटें दी हैं।

पोल डायरी ने एनडीए को 86-101 और पी-मार्क ने 82-94 सीटें मिलने की बात कही है।

मैट्रीज ने एनडीए को 85-95 और कॉन्ग्रेस प्लस को 25-32 सीटें दी हैं।

जेवीसी एग्जिट पोल ने एनडीए को 88-101 सीटें दी हैं।

जनमत पोल्स ने भी एनडीए को 87-98 सीटों के साथ बड़ी जीत दी है। हालाँकि पीपुल्स पल्स ने यहाँ कड़ा मुकाबला बताते हुए एनडीए को 68-72 और कॉन्ग्रेस प्लस को 22-26 सीटें दी हैं।

तमिलनाडु: DMK और ADMK के बीच काँटे की टक्कर

तमिलनाडु की 234 सीटों पर बहुमत का आँकड़ा 118 है। पोल ऑफ पोल्स के मुताबिक DMK गठबंधन (SPA) को 122 और NDA को 95 सीटें मिल सकती हैं।

पीपुल्स पल्स और पी-मार्क दोनों ने ही SPA को 125-145 सीटें देकर स्पष्ट बहुमत का इशारा किया है, जबकि NDA को इन दोनों सर्वे में क्रमशः 65-80 और 65-85 सीटें दी गई हैं।

मैट्रीज ने SPA को 122-132 और एनडीए को 87-100 सीटें दी हैं।

एक्सिस माय इंडिया का सर्वे थोड़ा अलग है, जिसने एसपीए को 92-100 और एनडीए को 22-32 सीटें दी हैं, लेकिन अन्य (OTH) को 98-120 सीटें देकर मुकाबला फँसा दिया है।

हालाँकि, जन की बात (JAN KI BAAT) ने यहाँ NDA की जीत का दावा करते हुए उन्हें 128-147 सीटें दी हैं।

केरल: सत्ता बदलने का रिवाज रह सकता है कायम

केरल में इस बार यूडीएफ (UDF) बाजी मारता दिख रहा है। पोल ऑफ पोल्स के अनुसार यूडीएफ को 72 और एलडीएफ को 63 सीटें मिल सकती हैं।

एक्सिस माय इंडिया ने यूडीएफ को 78-90 और एलडीएफ को 49-62 सीटें मिलने का अनुमान जताया है।

मैट्रीज ने यूडीएफ को 70-75 और पी-मार्क ने 72-79 सीटें दी हैं।

पीपुल्स पल्स के मुताबिक भी यूडीएफ 75-85 सीटों के साथ सरकार बना सकता है, जबकि एलडीएफ 55-65 सीटों पर सिमट सकता है।

पुडुचेरी: NRC गठबंधन की बढ़त

30 सीटों वाले पुडुचेरी में बहुमत के लिए 16 सीटें चाहिए। पोल ऑफ पोल्स ने यहाँ NDA को 19 और SPA को 8 सीटें दी हैं।

एक्सिस माय इंडिया ने NDA को 16-20 और एसपीए को 6-8 सीटें मिलने का अनुमान जताया है।

पीपुल्स पल्स के मुताबिक एनडीए 16-19 और एसपीए 10-12 सीटें ला सकता है।

जेवीसी एग्जिट पोल ने एनडीए को 15-17 और एसपीए को 11-13 सीटें दी हैं।

प्रजा पोल ने एनडीए को 19-25 और कामाख्या एनालिटिक्स ने 17-24 सीटें देकर एनडीए की एकतरफा जीत का दावा किया है।

केरल का पादरी कानपुर में चला रहा था ‘हाउस चर्च’, हिंदुओं को ईसाई बनाने के लिए विदेश से आ रहा था पैसा

                           केरल का पादरी एल्विन और उसकी पत्नी (साभार : FB_Shubham Shaurya)
उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले की घाटमपुर पुलिस ने 13 जनवरी 2026 को केरल के रहने वाले एक पादरी को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है। इस पादरी पर लालच देकर और डरा-धमकाकर हिंदुओं का धर्म परिवर्तन कराने का गंभीर आरोप है। यह पूरा खेल घाटमपुर के नौरंगा गाँव में एक ‘हाउस चर्च’ (घर में बने अवैध चर्च) के जरिए चलाया जा रहा था। पादरी यहाँ आर्थिक रूप से कमजोर हिंदुओं को निशाना बनाता था और उन्हें तरह-तरह के प्रलोभन देकर ईसाई धर्म अपनाने के लिए उकसाता था।

पुलिस ने यह कार्रवाई फतेहपुर जिले के जहानाबाद निवासी मुकेश कुमार की लिखित शिकायत के बाद की है। मुकेश की शिकायत के आधार पर पादरी के खिलाफ एफआईआर (FIR) दर्ज की गई, जिसकी कॉपी ऑपइंडिया के पास उपलब्ध है। गिरफ्तारी के बाद आरोपित पादरी को कोर्ट में पेश किया गया, जहाँ से उसे न्यायिक हिरासत में जेल भेज दिया गया है।

बीमारी ठीक करने के नाम पर धर्मांतरण का धंधा

 यह घटना 13 जनवरी की है, जब पुलिस को सूचना मिली कि नौरंगा गाँव के एक घर के अंदर प्रार्थना सभा चल रही है। खबर मिलते ही बजरंग दल के कार्यकर्ता भी वहाँ पहुँच गए। उन्होंने देखा कि प्रार्थना और बीमारी ठीक करने के नाम पर असल में वहाँ लोगों का धर्म परिवर्तन कराया जा रहा था। कार्यकर्ताओं ने तुरंत इसकी जानकारी पुलिस को दी। मौके पर पहुँची पुलिस ने वहाँ मौजूद सभी लोगों को हिरासत में लिया और पूछताछ के लिए थाने ले आई।

इस मामले में बजरंग दल के जिला संयोजक शुभम शौर्य अग्निहोत्री ने एसीपी कृष्णकांत यादव को एक लिखित शिकायत सौंपी। शिकायत में बताया गया कि नौरंगा के एक घर से ‘हाउस चर्च’ चलाया जा रहा था, जहाँ केरल का रहने वाला एल्विन और उसकी पत्नी हिंदुओं को लालच देकर उनका धर्म बदलवाने का काम कर रहे थे।

शुरुआती पूछताछ के बाद पुलिस ने अन्य सभी लोगों को तो छोड़ दिया, लेकिन आरोपित पादरी को हिरासत में ले लिया। इस मामले में मुकेश कुमार की शिकायत पर एफआईआर (FIR) दर्ज की गई, जिसमें पादरी पर लालच देकर धर्म परिवर्तन कराने और डराने-धमकाने के आरोप लगाए गए हैं।

पुलिस की जाँच और दर्ज शिकायत के मुताबिक, आरोपित पादरी एल्विन ने अपने घर को ही एक ‘हाउस चर्च’ बना रखा था। यहाँ वह नियमित रूप से प्रार्थना सभाएँ और बीमारी ठीक करने (हीलिंग सेशन) के नाम पर कार्यक्रम आयोजित करता था। मीडिया रिपोर्ट्स की मानें तो इन सभाओं में गरीब और मजबूर हिंदुओं को बुलाया जाता था। उन्हें पैसों का लालच और कई तरह के वादे किए जाते थे ताकि उन्हें ईसाई धर्म अपनाने के लिए मनाया जा सके।

मीडिया से बातचीत में स्थानीय लोगों ने बताया कि पादरी खुद के पास चमत्कारी शक्तियाँ होने का दावा करता था। उसका कहना था कि उसके घर पर होने वाली प्रार्थना से बड़ी से बड़ी बीमारियाँ ठीक हो सकती हैं। कई बार तो लोगों को यह तक डराया जाता था कि उनकी बीमारी बुरी ताकतों (प्रेत बाधा) की वजह से है और अगर वे धर्म परिवर्तन कर लेंगे, तभी उन्हें इन बीमारियों से छुटकारा मिलेगा।

जाँच के दौरान पुलिस ने इस तथाकथित हाउस चर्च से कई फाइलें, दस्तावेज और भारी मात्रा में ईसाई धर्म के प्रचार-प्रसार की सामग्री बरामद की है। अब पुलिस इस बात की गहराई से जांच कर रही है कि क्या इन सामग्रियों का इस्तेमाल योजनाबद्ध तरीके से हिंदुओं को प्रभावित करने और उन्हें ईसाई धर्म अपनाने का लालच देने के लिए किया जा रहा था।

विदेशी फंडिंग का एंगल

पुलिस की पूछताछ में यह बात सामने आई है कि आरोपित मूल रूप से केरल का रहने वाला है और पिछले करीब दस सालों से नौरंगा इलाके में रह रहा था। शुरुआत में वह किराए के मकान में रहता था, लेकिन बाद में उसने खुद की जमीन खरीदी और 2022 में अपना घर बना लिया। इसी घर को उसने बिना किसी अनुमति के एक ‘हाउस चर्च’ में बदल दिया।
हैरानी की बात यह है कि आरोपित का अपना कोई ज्ञात काम या कारोबार नहीं था, फिर भी वह काफी आराम की जिंदगी जी रहा था। इससे पुलिस को शक है कि उसे विदेश या कहीं और से भारी फंडिंग (पैसे) मिल रही थी। अब पुलिस इस बात की बारीकी से जांच कर रही है कि हाउस चर्च चलाने, प्रार्थना सभाएँ आयोजित करने और अन्य गतिविधियों के लिए पैसा कहाँ से आ रहा था।
अधिकारी इस बात की भी पड़ताल कर रहे हैं कि आरोपित अकेला ही यह सब कर रहा था या वह किसी ऐसे बड़े गिरोह का हिस्सा है जो अलग-अलग जिलों में धर्म परिवर्तन कराने के काम में लगा हुआ है।

एफआईआर में क्या लिखा है?

ऑपइंडिया के पास मौजूद एफआईआर की कॉपी के मुताबिक, यह शिकायत 13 जनवरी को बजरंग दल के कार्यकर्ता मुकेश कुमार ने दर्ज कराई थी। उनकी शिकायत के आधार पर पुलिस ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) 2023 की धारा 352 और 351(3) के साथ-साथ उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम 2021 की धारा 3 और 5(1) के तहत मामला दर्ज किया है।
मुकेश ने अपनी शिकायत में बताया कि उन्हें जानकारी मिली थी कि नौरंगा गाँव में एल्विन नाम के व्यक्ति ने अपने घर को चर्च बना लिया है। वह वहाँ गरीब लोगों को बुलाकर उन्हें तरह-तरह के लालच देता था और ईसाई धर्म अपनाने के लिए उनका ब्रेनवॉश कर रहा था।
शिकायत में आगे कहा गया है कि जब मुकेश अपने दोस्त मनीष सचान के साथ उस चर्च में पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि आरोपित जबरन लोगों को घर के अंदर बिठाकर प्रार्थना करवा रहा था और उन्हें हिंदू धर्म छोड़ ईसाई बनने के लिए उकसा रहा था। जब मुकेश और उनके साथी ने इस पर आपत्ति जताई, तो आरोपित एल्विन ने उन्हें गालियाँ दीं और जान से मारने की धमकी दी, जिसके बाद वहाँ मौजूद लोग घर छोड़कर चले गए।

बजरंग दल के खिलाफ शिकायत

बजरंग दल के कार्यकर्ताओं के खिलाफ शिकायत पादरी की गिरफ्तारी के बाद उसके परिवार और कुछ स्थानीय लोगों ने पुलिस को एक अलग शिकायत दी है। इसमें आरोप लगाया गया है कि बजरंग दल के कार्यकर्ताओं ने उनके साथ बदसलूकी और मारपीट की। पुलिस अधिकारियों का कहना है कि इन आरोपों की अलग से जाँच की जा रही है और अगर सबूत मिलते हैं, तो उसी के आधार पर आगे की कार्रवाई की जाएगी।

घाटमपुर इलाके में धर्मांतरण के पुराने विवादों को एक बार फिर चर्चा में ला दिया है। इससे पहले भी यहाँ इस तरह की कई घटनाएँ सामने आ चुकी हैं। पुलिस अधिकारी अब इस बात की पड़ताल कर रहे हैं कि क्या इस पादरी के तार पहले के मामलों से जुड़े हैं। साथ ही, यह भी देखा जा रहा है कि पादरी अकेला काम कर रहा था या वह किसी ऐसे संगठित गिरोह का हिस्सा है जो कई जिलों में सक्रिय है।

प्रशासन का कहना है कि जाँच के दौरान मिले दस्तावेजों, गवाहों के बयानों और पैसों के लेनदेन (फंडिंग) के सबूतों के आधार पर आगे की सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

कभी केरल की पहली महिला IPS बन जमाई थी धाक, अब तिरुवनंतपुरम में वामपंथियों को दी मात

आर श्रीलेखा
केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम की राजनीति में एक नया अध्याय जुड़ गया है। केरल की पहली महिला IPS अधिकारी और पूर्व पुलिस महानिदेशक (DGP) आर श्रीलेखा ने तिरुवनंतपुरम नगर निगम चुनाव में सस्थामंगलम वार्ड से भारतीय जनता पार्टी (BJP) की उम्मीदवार के तौर पर शानदार जीत दर्ज की है।

इस जीत के साथ ही वह न सिर्फ वामपंथ के गढ़ में सेंध लगाने में सफल रहीं बल्कि भाजपा की ओर से तिरुवनंतपुरम की पहली महिला महापौर बनने की सबसे मजबूत दावेदार के रूप में उभर कर सामने आई हैं।

45 साल से लगातार नगर निगम पर काबिज वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) को इस बार करारी हार मिली है। भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) 101 में से 50 वार्ड जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बन गई है।

श्रीलेखा की व्यक्तिगत जीत इस बदलाव का सबसे बड़ा चेहरा बनकर सामने आई है। एक सख्त, बेबाक और ईमानदार पुलिस अधिकारी के रूप में पहचानी जाने वाली श्रीलेखा ने अब पूरी ताकत के साथ राजनीति में कदम रख दिया है।

केरल की पहली महिला IPS का लंबा और बेदाग सफर

तिरुवनंतपुरम में जन्मी आर श्रीलेखा का पालन-पोषण भी यही हुआ है। जनवरी 1987 में उन्होंने इतिहास रचते हुए केरल की पहली महिला IPS अधिकारी बनी थी। उस दौर में जब पुलिस सेवा को पुरुषों का क्षेत्र माना जाता था, श्रीलेखा ने अपनी काबिलियत से न सिर्फ जगह बनाई बल्कि ऊँचे पद तक पहुँचीं।

करीब 33 साल के अपने सेवा काल में उन्होंने केरल पुलिस के कई अहम विभागों में काम किया। वे जिला पुलिस प्रमुख रहीं, क्राइम ब्रांच, विजिलेंस, फायर फोर्स, मोटर वाहन विभाग और जेल विभाग जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाली। इसके अलावा उन्होंने CBI में भी सेवाएँ दीं।

CBI में रहते हुए उन्होंने कई हाई-प्रोफाइल मामलों में सख्त कार्रवाई की। भ्रष्टाचार और अपराध के खिलाफ उनकी बेखौफ छवि के चलते उन्हें ‘रेड श्रीलेखा’ के नाम से भी जाना गया। वह अनुशासन, पारदर्शिता और कड़क प्रशासन के लिए मशहूर रहीं।

साल 2017 में उन्हें पुलिस महानिदेशक (DGP) पद पर प्रमोट किया गया। इसके साथ ही वे केरल की पहली महिला DGP बनीं। उन्होंने दिसंबर 2020 में रिटायरमेंट ले ली।  

रिटायरमेंट के बाद राजनीति में एंट्री

रिटायरमेंट के बाद आर श्रीलेखा ने कई मुद्दों पर खुलकर अपनी राय रखी। साल 2017 के अभिनेत्री यौन उत्पीड़न मामले में उन्होंने अभिनेता दिलीप को झूठा फंसाए जाने का दावा किया, जिससे राजनीतिक और सामाजिक हलकों में विवाद खड़ा हो गया। इसके अलावा उन्होंने कांग्रेस  से निष्कासित नेता राहुल ममकुटाथिल के खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज करने में हुई देरी पर सवाल उठाए, जिस पर काफी चर्चा हुई।

इन बयानों के चलते कुछ लोग उनके समर्थक बने तो कुछ आलोचक, लेकिन यह साफ हो गया कि श्रीलेखा अब चुप रहने वालों में से नहीं हैं। अक्टूबर 2024 में उन्होंने औपचारिक रूप से भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ली।

भाजपा में शामिल होने के बाद जब उनसे कारण पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि वे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व और कार्यशैली से प्रभावित होकर पार्टी में आई हैं। पार्टी में शामिल होने के कुछ ही समय बाद उन्होंने स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने का फैसला किया।

नगर निगम चुनाव में उन्होंने तिरुवनंतपुरम के सस्थामंगलम वार्ड से चुनाव लड़ा और भारी मतों से जीत दर्ज की। खुद श्रीलेखा ने कहा कि उन्हें जानकारी मिली है कि इस वार्ड में अब तक किसी उम्मीदवार को इतनी बड़ी बढ़त नहीं मिली थी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि चुनाव के दौरान LDF और कॉन्ग्रेस की ओर से उनके खिलाफ लगातार व्यक्तिगत हमले किए गए, लेकिन जनता ने उन सभी आलोचनाओं को नकार दिया।

इस चुनाव में भाजपा ने 50 वार्ड जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनते हुए 45 साल पुराने वामपंथी शासन का अंत कर दिया। हालाँकि भाजपा एक सीट से पूर्ण बहुमत से चूक गई लेकिन निर्दलीय पार्षदों के समर्थन से निगम में सत्ता का रास्ता साफ माना जा रहा है।

क्या श्रीलेखा बनेंगी पहली महिला महापौर?

तिरुवनंतपुरम नगर निगम चुनाव में भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की जीत ने केरल की राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत दिए है। 101 वार्डों वाले निगम में भाजपा को 50 सीटें मिली हैं, जबकि वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) 29 और कांग्रेस नीत संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (UDF) 19 सीटों पर सिमट गया। दो सीटें निर्दलीयों के खाते में गईं। इस परिणाम के साथ ही निगम पर 45 सालों से चले आ रहे वामपंथी शासन का अंत हो गया।

इस ऐतिहासिक जीत के बाद केरल की पहली महिला IPS अधिकारी और भाजपा से विजयी रहीं श्रीलेखा को महापौर बनाए जाने की अटकलें तेज हो गई हैं। उनका प्रशासनिक अनुभव, सख्त छवि और चुनावी जीत भाजपा के लिए मजबूत नेतृत्व विकल्प मानी जा रही है।

केरल : लेफ्ट-कांग्रेस के गढ़ में खिल गया कमल, थरूर के तिरुवनंतपुरम में बीजेपी की ऐतिहासिक जीत; INDI गठबंधन पस्त

केरल में जहां लेफ्ट, मुस्लिम लीग और कांग्रेस का वर्जस्व होने की वजह से भारतीय जनसंघ से लेकर बीजेपी को कोई गरदंता नहीं था, जबकि संघ के केरल में काम को नज़रअंदाज़ किया जाता था। स्वयंसेवकों की निर्मम हत्या की जाती थी। लेकिन नगर निकाय और पंचायतों के हुए चुनावों में बीजेपी ने लेफ्ट, मुस्लिम लीग और कांग्रेस को चौंका दिया। जो आगामी विधानसभा और लोकसभा चुनावों में बीजेपी के दरवाजे खोलने से INDI गठबंधन की नींद उड़ा दी है।      
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश के सबसे लोकप्रिय नेता हैं और उनका जादू देश के लोगों सर चढ़कर बोल रहा है। ये मोदी लहर का नतीजा है कि केरल की राजनीति में एक बहुत बड़ा उलटफेर देखने को मिला है। केरल की राजधानी में नगर निकाय चुनाव ने राजनीति की दिशा बदल दी है। बीजेपी ने यहां ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। आमतौर पर लेफ्ट और कांग्रेस के मजबूत गढ़ माने जाने वाले इस राज्य में, बीजेपी ने तिरुवनंतपुरम नगर निगम चुनाव में भगवा लहराकर सभी को हैरान कर दिया है। यह जीत इसलिए भी अहम है क्योंकि बीजेपी ने लोकतांत्रिक मोर्चा- LDF से सत्ता छीन ली है, जो इस निकाय पर पिछले चार दशकों से काबिज था। यह दिखाता है कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में बीजेपी का जनाधार अब उन दक्षिणी राज्यों में भी फैल रहा है, जहां उसकी जमीन पारंपरिक रूप से कमजोर थी। बीजेपी-एनडीए ने कांग्रेस नेता शशि थरूर के संसदीय क्षेत्र राजधानी तिरुवनंतपुरम में शानदार प्रदर्शन किया। 101 वार्डों में से एनडीए ने सीधे 50 पर जीत हासिल करके बहुमत का आंकड़ा छू लिया। वहीं, सत्ताधारी LDF 29 सीटों पर सिमट गई, जबकि कांग्रेस के नेतृत्व वाला UDF सिर्फ 19 सीटें ही जीत पाया, और दो सीटों पर निर्दलीय उम्मीदवारों ने बाजी मारी। इस जीत से साफ है कि मोदी लहर अब केरल के तटीय इलाकों तक भी पहुंच चुकी है और यह बीजेपी के लिए ‘दक्षिणी विजय’ की शुरुआत साबित हो सकती है।

बीजेपी की इस जबरदस्त जीत पर प्रधानमंत्री मोदी ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पोस्ट करते हुए इसे केरल की राजनीति में एक ऐतिहासिक क्षण बताया। उन्होंने कहा कि जनता को पूरा भरोसा है कि राज्य की विकास संबंधी आकांक्षाओं को केवल बीजेपी ही पूरा कर सकती है। उन्होंने तिरुवनंतपुरम की जनता का आभार व्यक्त किया और शहर के विकास के लिए काम करने का वादा किया।

पीएम मोदी ने अपनी पार्टी के मेहनती कार्यकर्ताओं को भी इस सफलता का श्रेय दिया। उन्होंने कहा कि यह जीत उन सभी कार्यकर्ताओं के कठिन परिश्रम और संघर्षों का फल है, जिन्होंने जमीनी स्तर पर काम किया और आज के शानदार नतीजे को मुमकिन बनाया। उन्होंने कार्यकर्ताओं को पार्टी की ताकत बताया और उन पर गर्व जताया।

‘The Kerala Story' फिल्म को प्रोपेगंडा फिल्म बताने वाले वामपंथियों की लड़कियों के Love Jehad का शिकार होने पर ले रहे चुपचाप एक्शन

                         लव जिहाद को लेकर वामपंथी नेता का विरोध (फोटो साभार: केरल कौमुदी)
केरल के एक कम्युनिस्ट नेता की बेटी मुस्लिम लड़के से शादी करना चाहती है और अब पिता लव जिहाद का रोना रो रहा है। ये सुनने में अजीब लगता है न? लेकिन यही हकीकत है।

Love Jehad की गाथा 1980 के लगभग केरल से ही शुरू हुई, लेकिन तुष्टिकरण के चलते धर्म-निरपेक्षता के नाम पर दबाया जाता रहा और हिन्दू स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा इस मुद्दे को उठाने पर इसे साम्प्रदायिकता का नाम देकर बदनाम किया जाता रहा। लेकिन जब आज वही आग इनके घरों में घुस गयी तब चुपचाप कार्यवाही की जा रही है। अब कोई 'Love is Love' कहने की हिम्मत नहीं। मामला घर में लगी आग का है। यह सच है कि वामपंथी किसी धर्म या मजहब को नहीं मानते, लेकिन दोगले अपने-अपने घरों में पूजा पाठ और नमाज तक पढ़ते हैं। 

   

केरल के कासरगोड में सीपीएम के एरिया कमिटी मेंबर पीवी भास्करन की बेटी संगीता ने एक वीडियो जारी किया है। इसमें वो बताती है कि उसके पिता ने उसे घर में कैद कर रखा है, बुरी तरह पीटा जा रहा है, मेडिकल ट्रीटमेंट नहीं दे रहे। संगीता पैरालाइज्ड है, एक्सीडेंट के बाद कमर से नीचे लकवा मार गया। वो राशिद नाम के मुस्लिम लड़के से शादी करना चाहती है, बस इसी बात पर घर में हंगामा मच गया।

संगीता का कहना है कि तलाक के बाद मिले पैसे उसके पिता और भाई ने हड़प लिए। पिता ने धमकी दी कि ‘कम्युनिज्म यहाँ नहीं चलेगा, मार दूँगा और केस से बच जाऊँगा’। संगीता ने कोर्ट में हैबियस कॉर्पस की पिटीशन डाली, लेकिन पुलिस ने रिपोर्ट में कहा कि वो माता-पिता के साथ है। लोकल पुलिस ने पिता के राजनीतिक प्रभाव से बात नहीं सुनी।

अब पिता भास्करन का दावा है कि राशिद पहले से शादीशुदा है और संगीता की 1.5 करोड़ की प्रॉपर्टी के लिए उसे फँसाया है। भास्करन वही नेता हैं, जो पहले ‘The Kerala Story' फिल्म को संघ परिवार का प्रोपगैंडा बताते थे। ये फिल्म लव जिहाद पर बेस्ड है, जो केरल में नॉन-मुस्लिम लड़कियों को टारगेट करने के नेटवर्क्स को दिखाती है। केरल में लेफ्ट और कांग्रेस दोनों ही लव जिहाद को फर्जी बताते हैं, वोट बैंक के चक्कर में। लेकिन अब जब खुद की बेटी का मामला आया, तो भास्करन को लव जिहाद याद आ गया। ये दोहरा चरित्र नहीं तो क्या है?

सोचिए कि जो वामपंथी नेता जनता को लेक्चर देते हैं कि धर्म के नाम पर कुछ नहीं होता, सब प्रोपगैंडा है। लेकिन जब घर की इज्जत दांव पर लगे, तो वही लव जिहाद का शोर मचाते हैं। ये सिर्फ भास्करन का मामला नहीं। केरल में ही एक और केस हुआ था, जहाँ एक क्रिश्चियन सीपीएम कैडर की बेटी या रिश्तेदार मुस्लिम लड़के से रिलेशनशिप में थी। कोर्ट ने कपल को साथ रहने की इजाजत दी, लेकिन कम्युनिस्टों का ग्रुप ने मुस्लिम लड़के को कोर्ट के सामने पीट दिया।

यही लोग बाहर से कहते हैं कि इंटरफेथ मैरिज फ्रीडम है, लेकिन जब अपना परिवार हो, तो असलियत सामने आ जाती है। वामपंथी खुद को सेकुलर बताते हैं, लेकिन अंदर से परिवार की रक्षा के लिए वही बातें करते हैं जो आम हिंदू या क्रिश्चियन परिवार करते हैं।

लव जिहाद क्या है, ये केरल तो जानता ही है। वहाँ सबसे बड़े नेटवर्क्स का खुलासा हो चुका है। ISIS जैसे वैश्विक आतंकवाद से जुड़े केस सामने आए। ‘The Kerala Story' ने इन्हीं हकीकतों को दिखाया, लेकिन वामपंथियों ने विरोध किया। फिल्म को बैन करने की माँग की, प्रोपगैंडा कहा। क्यों? क्योंकि अल्पसंख्यक वोट बैंक को नाराज नहीं करना।

केरल में लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट और यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट दोनों ही लव जिहाद को झूठ बताते हैं। लेकिन रियलिटी ये है कि मुस्लिम लड़के नॉन-मुस्लिम लड़कियों को टारगेट करते हैं। पहले दोस्ती, फिर लव, फिर कन्वर्जन और निकाह। संपत्ति, परिवार तोड़ना सब इन्वॉल्व। केरल स्टोरी जैसी फिल्में हकीकत बयान करती हैं, लेकिन पॉलिटिशियंस इसे दबाते हैं।

ऐसे मामले सिर्फ केरल तक सीमित नहीं। पूरे देश में फैले हैं। पश्चिम बंगाल में भी वामपंथी शासन के समय कई केस हुए, जहाँ हिंदू लड़कियाँ मुस्लिम लड़कों के जाल में फँसती रहीं। ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने भी लव जिहाद को डिबेट ही नहीं होने दिया। लेकिन प्राइवेट में कई लेफ्ट फैमिलीज ने अपनी बेटियों को बचाने के लिए चुपके से एक्शन लिया।

एक उदाहरण लीजिए केरल के ही सीएम पिनारायी विजयन की बेटी वीणा का केस। वो DYFI के मुस्लिम प्रेसिडेंट मुहम्मद रियास से शादी कर ली। ये पॉजिटिव तरीके से पेश किया गया, लेकिन क्या ये असली लव था या पॉलिटिकल वैल्यू? वामपंथी इसे सेकुलरिज्म का प्रतीक बताते हैं, लेकिन अगर कोई आम लड़की ऐसा करे और बाद में परेशानी हो, तो वो प्रोपगैंडा। दोहरा मापदंड साफ दिखता है।

वामपंथियों का असली चेहरा ये केस खोलते हैं। वो खुद को धर्म-विरोधी बताते हैं, लेकिन घर में पूजा-पाठ करते हैं। कई नेता नमाज पढ़ते पकड़े गए। जनता को दिखाने के लिए कट्टर कम्युनिस्ट, लेकिन परिवार बचाने के लिए रिलिजन मैटर्स। ये फर्जीवाड़ा है। सेकुलरिज्म का मतलब ये नहीं कि अपनी बेटी को खतरे में डालो। लव जिहाद एक सिस्टम है- जहाँ लड़के ट्रेनिंग लेते हैं, लड़कियों को फँसाते हैं। केरल, यूपी, हरियाणा हर जगह केस सामने आए हैं। लेकिन वामपंथी मीडिया और पॉलिटिक्स इसे कवर-अप करते हैं। क्यों? वोट के लिए। अल्पसंख्यक वोट बैंक को खुश रखना।

संगीता का केस दुखद है। वो पैरालाइज्ड है, मदद की जरूरत है, लेकिन परिवार संपत्ति के चक्कर में उसे सताने लगा। राशिद का बैकग्राउंड संदिग्ध लगता है- पहले से शादी, प्रॉपर्टी का लालच। भास्करन ने सही कहा हो या गलत, लेकिन उनका डर जायज है। आम परिवारों में यही होता है। लेकिन वही लोग जो बाहर से कहते हैं ‘Love is Love', घर में डरते हैं। ये दिखाता है कि लव जिहाद रियल है, फिल्में झूठ नहीं बोलतीं। पुलिस का रोल भी शक के घेरे में है कि उसने पॉलिटिकल इन्फ्लुएंस से केस को दबा कर रखा। संगीता ने डीएसपी और कलेक्टर तक से शिकायत की, लेकिन अभी तक कोई एक्शन नहीं। ये केरल के पुलिसिया सिस्टम की भी नाकामी है।

भास्करन का केस एक आईना है। वामपंथी सेकुलरिज्म फेक है। असली सेकुलरिज्म परिवार की सुरक्षा है, न कि वोट बैंक की गुलामी। ऐसे लव जिहाद को नकारना बंद करें और असलियत को स्वीकार कर कार्रवाई के लिए सामने आएँ, वर्ना फर्जी वामपंथ के चक्कर में तमाम परिवार बर्बाद होते ही रहेंगे।

केरल : वायनाड के किसान ने धान के खेत में उकेरी प्रधानमंत्री की तस्वीर


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी देश के सबसे लोकप्रिय नेता हैं। देश की जनता उनसे बेशुमार प्रेम करती है। प्रधानमंत्री मोदी 140 करोड़ से अधिक लोगों के दिल में बसते हैं। यह प्रधानमंत्री मोदी के प्रति प्रेम ही है कि केरल के वायनाड जिले में बाथरी गांव के किसान थायिल प्रसीद ने अपनी रचनात्मकता का अनोखा उदाहरण पेश करते हुए अपने हरे-भरे धान के खेतों को एक विशाल जीवंत कलाकृति में बदल दिया है। प्रधानमंत्री मोदी के 75वें जन्मदिन पर उपहार स्वरूप उन्होंने धान की विभिन्न किस्मों से एक भव्य ‘पोर्ट्रेट आर्ट’ तैयार की। यह कलाकृति उनके 40 मीटर लंबे और 30 मीटर चौड़े खेत में फैली हुई है। प्रसीद ने 31 अगस्त 2025 को इस ‘लिविंग कैनवास’ की प्रक्रिया शुरू की थी। उन्होंने धान के पौधों की बारीकी से रोपाई की ताकि उनके बढ़ने पर प्रधानमंत्री मोदी की छवि खेत में उभर सके। जैसे-जैसे पौधे बढ़ते गए, प्रधानमंत्री का छवि उभरती गई। लगभग 20 दिनों में खेत में हरे, सुनहरे और भूरे रंग के धान के पौधे इस अंदाज में विकसित हुए कि दूर से देखने पर प्रधानमंत्री का चेहरा साफ दिखाई देने लगा।

बेटे की शादी में मेहमानों से गिफ्ट में मांगा पीएम मोदी के लिए वोट
यह पीएम मोदी के प्रति लगाव ही है कि तेलंगाना के संगारेड्डी के नंदीकांति नरसिंहलू और निर्मला ने अपने बेटे की शादी में मेहमानों से गिफ्ट में नरेन्द्र मोदी के लिए वोट मांगा। नंदीकांति नरसिंहलू और निर्मला के बेटे साईं कुमार की शादी 4 अप्रैल, 2024 को हुई। साईं कुमार की शादी के लिए एक छपवाए गए निमंत्रण पत्र में उन्होंने एक अनोखा संदेश लिखवाया। शादी के कार्ड पर उन्होंने मेहमानों से गिफ्ट की जगह लोकसभा चुनावों में प्रधानमंत्री मोदी को वोट देने का आग्रह किया। शादी के निमंत्रण पत्र पर लिखा गया- नरेन्द्र मोदी जी को आपका वोट ही इस शादी का गिफ्ट है। इस लाइन के ऊपर प्रधानमंत्री मोदी का फोटो लगा था और उनकी तस्वीर के बगल में हल्दी लगाई गई थी। शादी का यह कार्ड सोशल मीडिया पर वायरल हुआ।

प्रधानमंत्री के कटआउट को पहनाया पारंपरिक परिधान फेरन
प्रधानमंत्री मोदी के प्रयासों के कारण जम्मू-कश्मीर में विकास की बहार बहने लगी है। राज्य में शांति बहाल होने से आम लोगों के जीवन में खुशहाली आई है। इलाके शांति-अमन आने से स्थानीय लोग काफी खुश हैं। ऐसे में फेरन डे के अवसर पर श्रीनगर के लालचौक पर घंटाघर के पास एक कश्मीरी युवा जमाल बडगामी उर्फ जमाल कश्मीरी ने प्रधानमंत्री मोदी के कटआउट को ना सिर्फ स्थानीय पारंपरिक परिधान फेरन पहनाया बल्कि उनके चेहरे को चूम कर अपना आभार भी जताया। कटआउट को किस करने के बाद जमाल ने कहा कि आजादी के बाद हमने ऐसा प्रधानमंत्री नहीं देखा है। मोदी जी किसी अवतार से कम नहीं हैं। युगों के बाद ऐसे लोग आते हैं। उन्होंने सारी दुनिया में भारत का सर ऊंचा किया है।

मोदी के लिए रखा उपवास, ट्रक ड्राइवरी छोड़ थामा झाडू
हरियाणा के चरखी दादरी के कारी मोद गांव के रहने वाले 71 साल के रामचंद्र स्वामी प्रधानमंत्री मोदी को भगवान कृष्ण और खुद को गरीब सुदामा बताते हैं। प्रधानमंत्री मोदी के स्वच्छ भारत अभियान से प्रेरित होकर रामचंद्र स्वच्छाग्रही बनकर दूसरों के लिए मिसाल पेश कर रहे हैं। उनकी मेहनत और समर्पण को देखते हुए कई पंचायतें उन्हें प्रशस्ति-पत्र दे चुकी हैं। वहीं गुजरात में भी स्वच्छता अभियान के लिए उन्हें कई बार प्रमाण-पत्र मिल चुका है।नदरअसल रामचंद्र स्वामी एक ट्रक ड्राइवर थे। अक्सर ट्रक लेकर गुजरात आते-जाते थे। गुजरात में विकास कार्यों से प्रभावित होकर उनके मन में राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रति आस्था जगी। जब 2014 के आम चुनाव के लिए बीजेपी ने नरेन्द्र मोदी को अपना प्रधानमंत्री उम्मीदवार बनाया तो उन्हें खुशी का ठिकाना नहीं रहा। उन्होंने उनके प्रधानमंत्री बनने की कामना करते हुए तीन महीने नौ दिन का उपवास रखा। करोड़ों लोगों की तरह रामचंद्र की भी कामना पूरी हुई और नरेन्द्र मोदी देश के प्रधानमंत्री निर्वाचित हो गए। इससे रामचंद्र का प्रधानमंत्री मोदी में अटूट आस्था बन गई,जो आज भी बनी हुई है।

प्रधानमंत्री मोदी ने 2 अक्टूबर 2014 को स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत की तो रामचंद्र ने ट्रक स्टेयरिंग छोड़कर हाथ में झाड़ू थाम लिया और स्वच्छता अभियान में जुट गए। बीते नौ सालों से रामचंद्र नि:स्वार्थ भाव से स्वच्छता का कार्य कर रहे हैं। अपनी एक ओमिनी कार में हमेशा अपने साथ एक झाड़ू रखते है और अलग-अलग स्थानों पर पहुंचकर मुख्य बाजारों, चौक-चौराहों के अलावा सार्वजनिक स्थानों पर सफाई में जुटे रहते हैं। रामचंद्र ने हरियाणा के अलावा गुजरात में कई स्थानों पर लगातार स्वच्छता अभियान चलाया है।

100 वर्ष की बुजुर्ग महिला अपने सबसे प्यारे बेटे पीएम मोदी के नाम करना चाहती है 25 बीघा जमीन
प्रधानमंत्री मोदी जहां 140 करोड़ देशवासियों की उम्मीद है, वहीं गरीब बुजुर्गों के लिए बुढ़ापे का सबसे मजबूत सहारा है। उन्होंने अपनी गरीब कल्याण नीतियों और योजनाओं के माध्यम से गरीब बुजुर्गों को वो सारी सुख-सुविधाएं मुहैया कराई हैं, जिसकी सबसे अधिक जरूरत बुढ़ापे में होती है। जो बुजुर्ग शारीरिक रूप से असमर्थ है, उनका भी मोदी सरकार में पूरा ख्याल रखा जा रहा है। उनके जीवन में खुशहाली लाने के लिए हर संभव कोशिश की जा रही है। इसका परिणाम है कि मध्य प्रदेश की एक सौ साल की बुजुर्ग महिला प्रधानमंत्री मोदी पर अपनी ममता लूटा रही है। 14 बच्चों की माता होते हुए भी प्रधानमंत्री मोदी को अपना सबसे प्यारा बेटा मानती है। वो अपना 25 बीघा जमीन अपने इस प्यारे बेटे के नाम कर देना चाहती है। 

मध्य प्रदेश के राजगढ़ जिले के छोटे से गांव हरिपुरा जागीर में रहने वाली मांगीबाई तंवर प्रधानमंत्री मोदी को अपने बेटे की तरह मानती है। इस बात की जानकारी उस समय हुई,जब विकासकारी योजनाओं के पत्रक लेकर बीजेपी कार्यकर्ता मांगीबाई तंवर के घर पहुंचे। इस दौरान पत्रक लेकर मांगीबाई तंवर ने प्रधानमंत्री मोदी और उनकी योजनाओं के बारे में जो कुछ कहां उसे सुनकर बीजेपी कार्यकर्ता हैरान थे। उन्होंने बुजुर्ग महिला के साथ बातचीत का एक वीडियो सोशल मीडिया पर शेयर किया, जो देखते-देखते वायरल हो गया। वीडियो में बुजुर्ग महिला को यह कहते हुए सुना जा सकता है कि मोदी जी गेहूं, चावल, खाद-बीज देते हैं। फसल खराब होने पर मुआवजा देते हैं। बीमार पड़ने पर इलाज कराते हैं। उन्हें सरकार ने तीर्थ यात्रा करवाई। रहने के लिए घर दिया और विधवा पेंशन भी मिल रहा है। उन्होंने कहा कि मैं अपनी 25 बीघा जमीन मोदी जी के नाम करना चाहती हूं, क्योंकि उनके 14 बेटे हैं, लेकिन जितना काम उनके बेटे कर रहे हैं, उससे ज्यादा मोदी जी कर रहे हैं।

न्यूजीलैंड में एक बुजुर्ग मां ने पीएम मोदी पर लुटाई अपनी ममता
न्यूजीलैंड के ऑकलैंड में इसकी एक और झलक देखने को मिली। जहां सौ साल की एक बुजुर्ग महिला प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर पर इस कदर अपनी ममता लुटाती नजर आईं, मानो प्रधानमंत्री मोदी उनके सामने मौजूद हों। बुजुर्ग महिला का ममत्व देखकर पता चलता है कि प्रधानमंत्री मोदी लोगों के दिलों में बसते हैं। यह सब ऐसे नहीं हुआ है, बल्कि इसके पीछे प्रधानमंत्री मोदी के अपने देशवासियों और भारत के प्रति समर्पण और अथक परिश्रम है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी जनसेवा से लोगों का भरोसा जीता है। यह भरोसा और प्यार ही विभिन्न रूपों में देश और दुनिया में प्रदर्शित होता रहता है।

दरअसल रविवार (30 अप्रैल, 2023) को प्रधानमंत्री मोदी के रेडिया कार्यक्रम ‘मन की बात’ के 100 वें एपिसोड का प्रसारण किया गया। भारत में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी प्रधानमंत्री मोदी के मन की बात सुनने के लिए लोगों में खासा उत्साह देखने को मिला। न्यूजीलैंड के ऑकलैंड में भी प्रधानमंत्री मोदी के मन की बात सुनने के लिए एक खास कार्यक्रम आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम में बड़े पैमाने पर प्रवासी भारतीयों ने हिस्सा लिया। इसमें 100 साल की एक बुजुर्ग महिला रमी बेन भी शामिल थी। प्रधानमंत्री मोदी की मन की बात सुनने के बाद बुजुर्ग महिला रमी बेन काफी भावुक हो गई। प्रधानमंत्री मोदी की तस्वीर पर अपनी ममता लुटाते हुए रमी बेन ने कहा कि खुश रहो। रमी बेन सिर पर हाथ रखकर आशीर्वाद देते और बार-बार ‘सुखी रहो, सुखी रहो’ कहती नजर आईं। बुजुर्ग महिला रमी बेन को देखकर प्रधानमंत्री मोदी की मां हीराबेन की याद ताजा हो गई। बुजुर्ग महिला का यह वीडियो अब सोशल मीडिया पर खूब वायरल हो रहा है।

ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में गूंजा- मोदी है तो मुमकिन है!
भारत में ही नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रशंसक दुनियाभर में हैं। और अब पाकिस्तान भी पीएम मोदी का मुरीद हो गया जो पिछले 75 सालों से भारत से दुश्मनी मोल लेता रहा है और कश्मीर के नाम पर चार जंग कर चुका है। ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में आयोजित एक कार्यक्रम में मुसलमानों और ईसाइयों सहित विभिन्न धार्मिक समुदायों के सदस्यों ने पीएम मोदी की जमकर तारीफ की। मेलबर्न में 23 अप्रैल को हुए विश्व सद्भावना कार्यक्रम में एक बार फिर यह साबित हुआ कि पीएम मोदी “दुनिया के सबसे लोकप्रिय नेता” क्यों हैं। इसमें पाकिस्तानी मुसलमान भी विभिन्न धार्मिक समुदायों के साथ शामिल हुए। उन्होंने कार्यक्रम में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सभी समुदायों का सम्मान करने के लिए प्रशंसा की। ऑस्ट्रेलिया में पाकिस्तानी मुसलमानों ने कहा- “मोदी है तो मुमकिन है।” इससे पता चलता है कि पीएम मोदी के दीवाने पाकिस्तान में भी बहुत हैं। वहां के मुस्लिमों ने सद्भावना कार्यक्रम में पीएम मोदी का खूब गुणगान किया।

“हमें सिर्फ प्राइम मिनिस्टर मोदी चाहिए”
प्रधानमंत्री मोदी पाकिस्तान में भी काफी लोकप्रिय है। अगर पाकिस्तानियों की बातों पर यकीन करें तो वो पाकिस्तान में चुनाव लड़कर प्रधानमंत्री बन सकते हैं। प्रधानमंत्री मोदी और भारत की तरक्की से प्रभावित एक पाकिस्तानी ने अपने देश की मीडिया से बात करते हुए कहा कि 1947 में भारत का विभाजन नहीं हुआ होता। सारा पाक और हिन्द एक होता और टमाटर आज 20 रुपये किलो होता। चिकन 150 रुपये किलो और पेट्रोल 150 रुपये लीटर मिलता। उनकी बदकिस्मती है कि पाकिस्तान में मुसलमानों वाला कोई सिलसिला ही नहीं है। इससे अच्छ तो प्रधानमंत्री मोदी है, जिन्हें वहां की जनता काफी सम्मान देती है। प्रधानमंत्री मोदी अपने लोगों के लिए शमशेर हैं। हमें मोदी मिल जाए। हमें न नवाज शरीफ चाहिए, न बेनजीर चाहिए, न हमें इमरान खान चाहिए। कोई भी नहीं, हमें मुसर्रफ भी नहीं चाहिए। हमें सिर्फ प्राइम मिनिस्टर मोदी चाहिए, जो इस मुल्क के टेढ़ों को सीधा करें। इस मुल्क को ऊपर लेकर जाए।