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उमर खालिद को पत्र लिखने वाले कट्टरपंथी ज़ोहरान ममदानी हिम्मत है तो नारा लगा "Washinton/America तेरे टुकड़े होंगे इंशाअल्लाह", फिर देख तमाशा

लोकतंत्र में हर चुनाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं होता, कई बार वह भविष्य की चेतावनी भी होता है। न्यूयॉर्क जैसे शहर का मेयर बनना केवल एक नगर निगम पद नहीं है, यह वैश्विक राजनीति की प्रयोगशाला में प्रवेश का टिकट होता है। यही वजह है कि जोहरान ममदानी का सत्ता में आना केवल अमेरिका की आंतरिक घटना नहीं रह गया, बल्कि भारत सहित पूरी दुनिया में राजनीतिक चिंता का विषय बन गया है।
भारत की न्यायपालिका पर कटघरे में खड़ा करने वाले न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान क्वामे ममदानी का दिल्ली दंगे के आरोपी उमर खालिद को लिखे पत्र का अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को संज्ञान लेकर कार्यवाही करनी चाहिए, वरना वह दिन दूर नहीं जब यही कट्टरपंथी अमेरिका को पाकिस्तान या बांग्लादेश बनाने का मौका नहीं चुकेगा। भारत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी इसे गंभीरता से लेकर ट्रम्प को लिखना चाहिए। मोदी और ट्रम्प को ममदानी के इस पत्र को हल्के में नहीं लेना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट को भी संज्ञान लेकर कार्यवाही करनी चाहिए।   

अमेरिका के सबसे बड़े और प्रभावशाली शहर न्यूयॉर्क की मेयर की कुर्सी पर बैठते ही जोहरान क्वामे ममदानी ने ऐसा कदम उठाया है, जो न केवल विवादास्पद है, बल्कि भारत के लिए सीधी चुनौती जैसा लगता है। 1 जनवरी को शपथ लेने के ठीक अगले दिन उनका एक हैंडरिटन पत्र सामने आया, जो दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद विवादित कार्यकर्ता उमर खालिद के नाम लिखा गया था। इस पत्र ने भारत में आग की तरह फैलते गुस्से को और भड़का दिया है। कई लोग इसे ममदानी की भारत विरोधी मानसिकता का खुला प्रमाण बता रहे हैं।

जोहरान ममदानी खुद को प्रोग्रेसिव और डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट कहता है, लेकिन उसके पहले ही कदम से साफ लगता है कि उसकी प्राथमिकता में सेलेक्टेड चीजे हैं। यानी उसके मुद्दे बहुत सोच-विचार के चुने हुए हैं, खासकर जो मुस्लिम पहचान और कथित इस्लामी पीड़ितों से जुड़े हों।

ममदानी के मेयर बनने के बाद ही क्यों सामने आया उमर खालिद को लिखा पत्र?

कोई भी नया निर्वाचित नेता आम तौर पर शहर की समस्याओं से शुरुआत करता है। अपने शहर की आवास, ट्रांसपोर्ट, अपराध, शिक्षा से जुड़ी समस्या। लेकिन ममदानी ने ऐसा नहीं किया। बल्कि ममदानी ने सत्ता संभालते ही भारत से जुड़े एक अत्यंत विवादित मुद्दे या यूँ समझें कि आतंकवादी को चुना। वो है दिल्ली की जेल में बंद उमर खालिद।

यह कोई संयोग नहीं था। यह एक सोचा-समझा राजनीतिक संकेत था। जोहरान ममदानी जानता था कि उमर खालिद का नाम भारत में किस तरह ध्रुवीकरण पैदा करता है। UAPA जैसे कानून, देशद्रोह के आरोप, दंगे, हिंसाये सब ऐसे विषय हैं जिन पर भारत की न्यायिक प्रक्रिया बेहद संवेदनशील है। इसके बावजूद एक अमेरिकी मेयर का इस मुद्दे पर टिप्पणी करना साफ बताता है कि उसका मकसद ‘मानवाधिकारट से ज्यादा ‘वैश्विक पहचान’ बनाना था।

यह कहानी सिर्फ वामपंथ की नहीं, बल्कि उस वैचारिक इस्लामी राजनीति की है, जो अब लोकतांत्रिक संस्थानों के भीतर घुसपैठ कर रही है।

वामपंथी या इस्लामी… ममदानी की असली पहचान क्या?

जोहरान ममदानी खुद को वामपंथी कहता है। लेकिन दुनिया जानती है कि आधुनिक वामपंथ अब केवल आर्थिक असमानता की लड़ाई नहीं रह गया। यह पहचान की राजनीति में तब्दील हो चुका है, जहाँ धर्म, जाति और नस्ल को हथियार बनाया जाता है। ऐसे में ये सवाल उठने स्वाभाविक हैं कि अगर ममदानी सिर्फ वामपंथी है, तो उसकी संवेदनशीलता बार-बार केवल इस्लामी मुद्दों पर ही क्यों दिखती है? अगर वो मानवाधिकारों का पैरोकार है, तो चीन के उइगर, पाकिस्तान के बलूच, बांग्लादेश के हिंदुओं पर उसकी आवाज़ क्यों खामोश रहती है? यही सेलेक्टिव नैतिकता ही असली समस्या है।

कुरान हाथ में लेकर शपथ को मानें उसका राजनीतिक संदेश

अमेरिका में किसी भी धार्मिक ग्रंथ पर शपथ लेना कानूनी रूप से गलत नहीं है। लेकिन राजनीति में प्रतीक कभी मासूम नहीं होते। ममदानी द्वारा कुरान पर हाथ रखकर शपथ लेना सिर्फ निजी आस्था नहीं था, बल्कि वह एक सांस्कृतिक संदेश था। यह संदेश न्यूयॉर्क के मतदाताओं से ज्यादा वैश्विक इस्लामी राजनीति के लिए था कि सत्ता के केंद्रों में ‘हमारा आदमी’ पहुँच चुका है।

यही वह बिंदु है जहाँ मजहब निजी नहीं रह जाता, बल्कि राजनीतिक हथियार बन जाता है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ममदानी ने हाल ही में एक पत्र लिखकर खालिद के अम्मी-अब्बू को सौंपा। पत्र में लिखा है, “प्रिय उमर, मैं अक्सर तुम्हारे कड़वाहट न अपनाने वाले शब्दों के बारे में सोचता हूँ। तुम्हारे माता-पिता से मिलकर खुशी हुई। हम सभी तुम्हारे बारे में सोच रहे हैं।”

यह छोटा पत्र सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और भारतीय मीडिया में सुर्खियाँ बटोर रहा है। सवाल यह है कि न्यूयॉर्क के मेयर को भारत के आंतरिक मामलों में इतनी दिलचस्पी क्यों? पद संभालते ही शहर की समस्याओं क्राइम, हाउसिंग, ट्रैफिक की बजाय दिल्ली जेल के एक कैदी को पत्र लिखना क्या संयोग है या सोचा-समझा प्रोपेगेंडा?

UAPA केस में मुख्य साजिशकर्ता है उमर खालिद

उमर खालिद का मामला कोई साधारण नहीं है। पूर्व जेएनयू छात्र खालिद को सितंबर 2020 में दिल्ली दंगों की साजिश के लिए गिरफ्तार किया गया। उन पर यूएपीए जैसे सख्त कानून लगे, जिसमें देशद्रोह और आतंकवादी गतिविधियों के आरोप हैं। सरकार के पास सबूत हैं कि दंगे भड़काने में उनकी भूमिका थी। पाँच साल से ज्यादा जेल में हैं, ट्रायल शुरू नहीं हुआ। उनके समर्थक इसे राजनीतिक बदला बताते हैं। हालाँकि वो ऐसे व्यक्ति सैयद कासिम रसूल इलियास का बेटा है,जो प्रतिबंधित आतंकी संगठन SIMI से जुड़ा हुआ था।

भारत पर क्यों साध रहा निशाना?

भारत आज उभरती वैश्विक शक्ति है। भारत का लोकतंत्र, उसकी न्यायपालिका और उसके कानून अंतरराष्ट्रीय वामपंथी और इस्लामी नैरेटिव के लिए असहज हैं। फिर UAPA जैसे कानून इसीलिए भी निशाने पर रहते हैं क्योंकि वे ‘पीड़ित’ और ‘अल्पसंख्यक’ की उस कहानी को तोड़ते हैं, जिसे वैश्विक मंच पर बेचा जाता है।
ऐसे में ममदानी का भारत पर फोकस इसी रणनीति का हिस्सा है। भारत को ‘असहिष्णु’ दिखाओ, उसकी संस्थाओं पर सवाल उठाओ और फिर खुद को नैतिक ऊँचाई पर खड़ा करो।

भारत और हिंदुओं को पहले भी बनाता रहा है निशाना

मेयर जोहरान ममदानी का राजनीतिक करियर उसके तीखे और विवादास्पद बयानों के कारण भी चर्चा में रहा है। वो न सिर्फ हिंदुओं के खिलाफ आग उगलता रहा है, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी निशाना साधता रहा है। उसने पीएम मोदी को युद्ध अपराधी तक कहा था, वो भी अपने चुनाव प्रचार के दौरान ही। वो अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन को ‘मस्जिद के विध्वंस का उत्सव’ और ‘हिंदुत्व फासीवाद’ का प्रतीक बता चुका है।

न्यूयॉर्क से आगे की तैयारी?

यह मानना भोलापन होगा कि ममदानी सिर्फ मेयर बनकर संतुष्ट हो जाएगा। न्यूयॉर्क अमेरिकी राजनीति की सीढ़ी है, मंज़िल नहीं। इतिहास गवाह है कि जो न्यूयॉर्क जीतता है, वह राष्ट्रीय राजनीति की दहलीज़ पर पहुँच जाता है। आज वो भारत पर बोल रहे हैं, कल वो अमेरिका की विदेश नीति पर प्रभाव डालना चाहेगा। भले ही आज वो ‘मानवाधिकार’ की बात कर रहा है, लेकिन कल उसकी बोली इस्लामी कट्टरपंथियों के दबाव से अलग ही जहरीली हो चुकी होगी।
कुछ विश्लेषक मानते हैं कि ममदानी अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की तैयारी कर रहे हैं, मुस्लिम और प्रोग्रेसिव वोट बैंक को मजबूत करके। अमेरिका में मुस्लिम नेता जैसे इल्हान उमर, रशीदा तलीब पहले से हैं और ममदानी उन कट्टरपंथियों का नेक्स्ट जेन वर्जन लगते हैं।

मेयर बनते ही पत्र का सामने आना कोई साधारण बात नहीं

जोहरान ममदानी का पत्र अकेला नहीं। ठीक इसी समय आठ अमेरिकी सांसदों ने भारत के राजदूत को पत्र लिखकर खालिद को बेल और निष्पक्ष ट्रायल की माँग की। ये सांसद डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रोग्रेसिव विंग से हैं, जो अक्सर भारत पर मानवाधिकार के नाम पर दबाव बनाते हैं। खालिद के पैरेंट्स की इनसे मुलाकात भी हुई थी।
ममदानी और इन सांसदों के पत्र की टाइमिंग संदेह पैदा करता है। क्या यह संयोग है कि मेयर बनते ही ममदानी ने यह कदम उठाया? विश्लेषक इसे खुद को मुस्लिम दुनिया में हीरो बनाने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं।

क्या ममदानी वाकई भारत के लिए बन सकता है खतरा?

भारत के लिए तो जरूर चिंता की बात है। एक विदेशी मेयर का भारत के कानूनी मामलों में दखल खासकर ऐसे व्यक्ति के लिए जो गंभीर आरोपों में जेल में है, विदेशी हस्तक्षेप जैसा लगता है। न्यूयॉर्क के बदलते डेमोग्राफिक्स, बढ़ते मुस्लिम और प्रोग्रेसिव वोटर ने उसे जिताया, लेकिन इससे अमेरिका में इस्लामी राजनीतिक ताकतें मजबूत हो रही हैं। अगर ममदानी आगे बढ़े, तो भारत-अमेरिका रिश्तों पर असर पड़ सकता है।
भारत को, अमेरिका को और दुनिया को यह समझना होगा कि आज की राजनीति में सबसे खतरनाक चीज बंदूक नहीं, बल्कि नैरेटिव है। और जो नेता सत्ता में आते ही नैरेटिव युद्ध शुरू कर देता है, वह सिर्फ एक शहर का मेयर नहीं रह जाता, वह एक वैश्विक एजेंडा बन जाता है।


कभी केरल की पहली महिला IPS बन जमाई थी धाक, अब तिरुवनंतपुरम में वामपंथियों को दी मात

आर श्रीलेखा
केरल की राजधानी तिरुवनंतपुरम की राजनीति में एक नया अध्याय जुड़ गया है। केरल की पहली महिला IPS अधिकारी और पूर्व पुलिस महानिदेशक (DGP) आर श्रीलेखा ने तिरुवनंतपुरम नगर निगम चुनाव में सस्थामंगलम वार्ड से भारतीय जनता पार्टी (BJP) की उम्मीदवार के तौर पर शानदार जीत दर्ज की है।

इस जीत के साथ ही वह न सिर्फ वामपंथ के गढ़ में सेंध लगाने में सफल रहीं बल्कि भाजपा की ओर से तिरुवनंतपुरम की पहली महिला महापौर बनने की सबसे मजबूत दावेदार के रूप में उभर कर सामने आई हैं।

45 साल से लगातार नगर निगम पर काबिज वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) को इस बार करारी हार मिली है। भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) 101 में से 50 वार्ड जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बन गई है।

श्रीलेखा की व्यक्तिगत जीत इस बदलाव का सबसे बड़ा चेहरा बनकर सामने आई है। एक सख्त, बेबाक और ईमानदार पुलिस अधिकारी के रूप में पहचानी जाने वाली श्रीलेखा ने अब पूरी ताकत के साथ राजनीति में कदम रख दिया है।

केरल की पहली महिला IPS का लंबा और बेदाग सफर

तिरुवनंतपुरम में जन्मी आर श्रीलेखा का पालन-पोषण भी यही हुआ है। जनवरी 1987 में उन्होंने इतिहास रचते हुए केरल की पहली महिला IPS अधिकारी बनी थी। उस दौर में जब पुलिस सेवा को पुरुषों का क्षेत्र माना जाता था, श्रीलेखा ने अपनी काबिलियत से न सिर्फ जगह बनाई बल्कि ऊँचे पद तक पहुँचीं।

करीब 33 साल के अपने सेवा काल में उन्होंने केरल पुलिस के कई अहम विभागों में काम किया। वे जिला पुलिस प्रमुख रहीं, क्राइम ब्रांच, विजिलेंस, फायर फोर्स, मोटर वाहन विभाग और जेल विभाग जैसे महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी संभाली। इसके अलावा उन्होंने CBI में भी सेवाएँ दीं।

CBI में रहते हुए उन्होंने कई हाई-प्रोफाइल मामलों में सख्त कार्रवाई की। भ्रष्टाचार और अपराध के खिलाफ उनकी बेखौफ छवि के चलते उन्हें ‘रेड श्रीलेखा’ के नाम से भी जाना गया। वह अनुशासन, पारदर्शिता और कड़क प्रशासन के लिए मशहूर रहीं।

साल 2017 में उन्हें पुलिस महानिदेशक (DGP) पद पर प्रमोट किया गया। इसके साथ ही वे केरल की पहली महिला DGP बनीं। उन्होंने दिसंबर 2020 में रिटायरमेंट ले ली।  

रिटायरमेंट के बाद राजनीति में एंट्री

रिटायरमेंट के बाद आर श्रीलेखा ने कई मुद्दों पर खुलकर अपनी राय रखी। साल 2017 के अभिनेत्री यौन उत्पीड़न मामले में उन्होंने अभिनेता दिलीप को झूठा फंसाए जाने का दावा किया, जिससे राजनीतिक और सामाजिक हलकों में विवाद खड़ा हो गया। इसके अलावा उन्होंने कांग्रेस  से निष्कासित नेता राहुल ममकुटाथिल के खिलाफ यौन उत्पीड़न की शिकायत दर्ज करने में हुई देरी पर सवाल उठाए, जिस पर काफी चर्चा हुई।

इन बयानों के चलते कुछ लोग उनके समर्थक बने तो कुछ आलोचक, लेकिन यह साफ हो गया कि श्रीलेखा अब चुप रहने वालों में से नहीं हैं। अक्टूबर 2024 में उन्होंने औपचारिक रूप से भारतीय जनता पार्टी की सदस्यता ली।

भाजपा में शामिल होने के बाद जब उनसे कारण पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि वे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व और कार्यशैली से प्रभावित होकर पार्टी में आई हैं। पार्टी में शामिल होने के कुछ ही समय बाद उन्होंने स्थानीय निकाय चुनाव लड़ने का फैसला किया।

नगर निगम चुनाव में उन्होंने तिरुवनंतपुरम के सस्थामंगलम वार्ड से चुनाव लड़ा और भारी मतों से जीत दर्ज की। खुद श्रीलेखा ने कहा कि उन्हें जानकारी मिली है कि इस वार्ड में अब तक किसी उम्मीदवार को इतनी बड़ी बढ़त नहीं मिली थी। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि चुनाव के दौरान LDF और कॉन्ग्रेस की ओर से उनके खिलाफ लगातार व्यक्तिगत हमले किए गए, लेकिन जनता ने उन सभी आलोचनाओं को नकार दिया।

इस चुनाव में भाजपा ने 50 वार्ड जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बनते हुए 45 साल पुराने वामपंथी शासन का अंत कर दिया। हालाँकि भाजपा एक सीट से पूर्ण बहुमत से चूक गई लेकिन निर्दलीय पार्षदों के समर्थन से निगम में सत्ता का रास्ता साफ माना जा रहा है।

क्या श्रीलेखा बनेंगी पहली महिला महापौर?

तिरुवनंतपुरम नगर निगम चुनाव में भाजपा नीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) की जीत ने केरल की राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत दिए है। 101 वार्डों वाले निगम में भाजपा को 50 सीटें मिली हैं, जबकि वाम लोकतांत्रिक मोर्चा (LDF) 29 और कांग्रेस नीत संयुक्त लोकतांत्रिक मोर्चा (UDF) 19 सीटों पर सिमट गया। दो सीटें निर्दलीयों के खाते में गईं। इस परिणाम के साथ ही निगम पर 45 सालों से चले आ रहे वामपंथी शासन का अंत हो गया।

इस ऐतिहासिक जीत के बाद केरल की पहली महिला IPS अधिकारी और भाजपा से विजयी रहीं श्रीलेखा को महापौर बनाए जाने की अटकलें तेज हो गई हैं। उनका प्रशासनिक अनुभव, सख्त छवि और चुनावी जीत भाजपा के लिए मजबूत नेतृत्व विकल्प मानी जा रही है।

शंकराचार्यजी महाराज का कहना उचित हिन्दुओं बहरूपी हिन्दुओं से सावधान; इस्लामिक गोलबंदी में नहीं फंसे, देखिए वीडियो ; नाम में हिंदू, पर हमदर्द इस्लामी कट्टरपंथियों का: भारत विरोधी ढोंगी Hindu for Human Rights को सुहा नहीं रही लंदन की दीवाली, मुस्लिम मेयर से कहा- हिंदू संगठनों से तोड़ो रिश्ते

                                       VHP और BAPS को लेकर HfHR ने एक पत्र लिखा है
कुछ ही समय पहले पूज्यनीय शंकराचार्य ने ढोंगी हिन्दुओं से सतर्क रहने की बात कही बहुत जल्दी उनकी बात सच होते भी देखी जा रही है। उनके प्रवचनों से विरोधियों की नींद हराम हो रही है। उन्होंने स्पष्ट कहा कि इस्लाम जो गोलबंदी कर रहा है हिन्दुओं को उससे भी सतर्क रहना चाहिए। इसी तरह 1555 में फ्रैंच ज्योतिष नॉस्त्रेदमस ने भविष्यवाणियां की थी जो आज तक शत-प्रतिशत सच हो रही है। 2014 में सत्ता परिवर्तन की बात करते कहा कि 2014 में देश को असली आज़ादी ही नहीं अखंड हिन्दू राष्ट्र और विश्व गुरु बनने की राह पर चलेगा। देख लो बात सच हो रही है।(विस्तार से भविष्यवाणियां पढ़ने के लिए Organiser Weekly 1986/87 का अवलोकन किया जा सकता है)। 

दूसरे, मार्च 7, 1966 को गोहत्या का विरोध कर रहे निहत्ते साधु-संतों से तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी ने पुलिस से गोलियां चलवाकर खून की होली खेलते पार्लियामेंट स्ट्रीट को खून से रंग दिया था तब आचार्य कृपालुजी महाराज ने रोते हुए कहा कि "इन्दिरा जिस तरह गोपाष्टमी के दिन हम निहत्ते साधुओं-संतों से खून की होली खेली है तेरी भी... इसी तरह गोपाष्टमी के दिन. ..(31 अक्टूबर को गोपाष्टमी ही थी) और कांग्रेस को ख़त्म करने से मॉडर्न ड्रेस में एक तपस्वी आएगा।" अगर अभी भी हिन्दू हिन्दुत्व का चोला ओढे घूम रहे हैं, जैसाकि शंकराचार्य जी ने भी कहा है, ऐसे लोगों से सतर्क रहने की जरुरत है। देखिए वीडियो:               

हिंदू और भारत विरोधी अमेरिकी संगठन हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स (HfHR) ने इंग्लैंड की राजधानी लंदन में दिवाली मनाने में खलल डालने की कोशिश की है। HfHR के डायरेक्टर राजीव सिन्हा ने लंदन के मेयर सादिक खान को एक पत्र लिखकर विश्व हिंदू परिषद (VHP), BAPS और चिन्मय मिशन जैसी हिंदू संस्थाओं के साथ ‘सभी संबंध खत्म’ करने को कहा है।

भारत विरोधी ताकतों के साथ हाथ मिलाने के लिए कुख्यात हिंदू विरोधी संगठन HfHR, इस बात से नाराज था कि इन हिंदू संस्थाओं ने 27 अक्टूबर को लंदन के ट्राफलगर स्क्वायर में दिवाली कार्य्रकम के आयोजन में भाग लिया था।

HfHR द्वारा लिखे इस पत्र को एक्स(पहले ट्विटर) पर सुहाग शुक्ला ने साझा किया। इस पत्र हिन्दूस फॉर ह्यूमन राइट्स (HfHR) ने इस बात पर ‘निराशा’ जताई कि VHP और बाकी संस्थाओं ने लंदन के मेयर सादिक खान के कार्यक्रम को आयोजित करने में मदद की थी।

हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स (HfHR) ने लंदन के मेयर से इन हिंदू संगठनों से संबंध तोड़ने और भविष्य में दिवाली समारोह आयोजित करने के लिए नए संगठन तलाशने को कहा है। HfHR ने दावा किया कि यह हिंदू संगठन ”भारत और यूके में हिंदुत्व आंदोलन के लिए एक मुखौटे का काम करते हैं।” 

HfHR का हिन्दू विरोधी इतिहास

हिंदू फॉर ह्यूमन राइट्स (HfHR) के नाम से लग सकता है कि यह हिंदू समुदाय के हित के लिए काम करने वाला कोई हिंदू संगठन है। असल में यह भेड़ की खाल में भेड़िया है। यह संगठन अमेरिका और ब्रिटेन में हिंदू विरोधी गतिविधियों को बढ़ाने में सबसे आगे रहा है।
इसने लगातार खुद को मानवाधिकारों के कथित रक्षक के रूप में पेश किया है, जबकि असल में यह अपना लिबरल एजेंडा चलाता है। इस संगठन को टाइड्स फाउंडेशन जैसी संस्थाओं से पैसा मिलता है। टाइड्स अमेरिका में हमास के समर्थन वाली रैलियों को भी पैसा देती है। HfHR अक्सर हिन्दुओं के विरोध में ही दिखता है।
टाइड्स फाउंडेशन खुद कई ऐसी गतिविधियों में शामिल रहा है जो वामपंथी और भारत विरोधी एजेंडे को आगे बढ़ाती हैं। विकिपीडिया को लेकर बनाए गए ऑपइंडिया के डोजियर में बताया गया है कि टाइड्स कई भारत विरोधी और हिंदू विरोधी संगठनों को पैसा देता रहा है। यह भारत और हिन्दुओं को बदनाम करते हैं और कट्टरपंथियों को बढ़ावा देते हैं।
HfHR अक्सर अपने एजेंडा को आगे बढ़ाने के लिए हिंदू प्रतीकों का उपयोग करता है। हिंदू विश्वासों को लगातार HfhR नीचा दिखाता रहा है। यह हिन्दू ग्रन्थों की गलत व्याख्या करके प्रश्न उठाने और हिन्दुओं कि छवि खराब में जुटा एक संगठन है।
HfHR का गठन वर्ष 2019 में इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (IAMC) और ऑर्गनाइजेशन फॉर माइनॉरिटीज ऑफ इंडिया (OFMI) द्वारा किया गया था। दिलचस्प बात यह है कि इन तीनों संगठनों ने अलायंस फॉर जस्टिस एंड अकाउंटेबिलिटी (AJA) नामक एक और संगठन बनाया था।
द हिंदू में छपे एक लेख के अनुसार, 22 सितंबर, 2019 को पीएम मोदी की ह्यूस्टन यात्रा के खिलाफ़ प्रदर्शन का नेतृत्व करने वालों में AJA सबसे आगे थी। ‘HfHR’ की सह-संस्थापक सुनीता विश्वनाथ ने भी 2019 में राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) को लेकर भारतीय मुसलमानों में दहशत पैदा करने की कोशिश की थी।

भगवान राम के रास्ते पर चलने से ही मिटेगी घृणा ; ‘माँ सीता एक दृढ़ और प्रतिबद्ध स्त्री, किसी प्रलोभन के आगे नहीं झुकीं’: एरिक एडम्स, न्यूयॉर्क के मेयर

                         न्यूयॉर्क शहर के मेयर ने माँ सीता को मजबूत महिला बताया (फोटो क्रेडिट-chalkbeat)
अमेरिका में इस बार दिवाली का उत्सव काफी धूम-धाम से मनाया गया। अमेरिका के राष्ट्रपति जो बायडन ने व्हाइट हाउस में अब तक के सबसे बड़े दिवाली समारोह की मेजबानी की। वहीं न्यूयॉर्क शहर में भी लोगों ने दिवाली मनाई। न्यूयॉर्क के मेयर एरिक एडम्स ने दिवाली के मौके पर लोगों से भगवान राम, सीता के दिखाए मार्ग पर चलने और और ‘प्रकाश की किरण’ बनने के लिए कहा। उन्होंने माँ सीता की सराहना करते हुए कहा की वह एक मजबूत महिला थीं, किसी भी प्रलोभन के आगे नहीं झुकी। वह दृढ़ और प्रतिबद्ध थी।

दिवाली की सीख को अपनाने की सलाह देते हुए उन्होंने 25 अक्टूबर, 2022 को कहा, “अँधेरा बहुत है। हम केवल उन जगहों को खोजने की इच्छा में उलझे हुए हैं जिनसे हम असहमत हैं ।”

एडम्स ने भारतीय-अमेरिकी, दक्षिण एशियाई और अन्य समुदायों के प्रमुख सदस्यों की एक बड़ी सभा को दीवाली की शुभकामनाएँ दीं। उनके आधिकारिक आवास पर दिवाली समारोह का आयोजन किया था। उन्होंने कहा, “आओ राम की तरह जीवन जीएँ, सीता की तरह जीवन जीएँ। आइए दिवाली की सीख को अपनाएँ। यह छुट्टी जिस चीज़ का प्रतिनिधित्व करती है, उसको जीते हैं, तब हमें पता चलेगा कि हमने अपनी जिम्मेदारी और दायित्व को पूरा किया है।”

उन्होंने कहा, “दीपावली हम सबके लिए साथ बैठने, संवाद करने और सिखों के खिलाफ घृणित अपराधों को ख़त्म करने का पर्व है। अंधेरा बहुत है और हमें प्रकाश की किरण बनने की जरूरत है, जो देश को दिखाए कि हमें अंधेरे को दूर करने की जरूरत है।”

इस कार्यक्रम  में भारत के महावाणिज्य दूत रणधीर जायसवाल और न्यूयॉर्क असेंबली की सदस्य जेनिफर राजकुमार भी मौजूद थीं। उन्होंने कहा, “अगर हम केवल एक दिन के लिए अंधेरे को दूर करने का जश्न मनाते हैं, तो हम दिवाली के सिद्धांतों के साथ विश्वासघात कर रहे हैं। हमें हर दिन उस परिमाण और उस ऊँचाई पर रहना चाहिए।” वहीं एडम्स ने कहा, “मेरे सिख भाइयों और बहनों लोगों के धर्म और आस्था की परवाह किए बिना अपने गुरुद्वारों में हजारों लोगों को खाना खिलाते हैं, जिसमें कोविड ​​​​-19 महामारी भी शामिल है।”

इससे एक सप्ताह पहले न्यूयॉर्क शहर के पब्लिक स्कूलों में रोशनी के त्योहार को सार्वजनिक अवकाश घोषित किया गया था। न्यूयॉर्क में प्रांत कार्यालय के लिए निर्वाचित होने वाली भारतीय मूल की जेनिफर राजकुमार ने राज्य की राजधानी में कानून पेश किया जो स्कूल कैलेंडर में दिवाली के लिए जगह बनाता है। राजकुमार ने कहा, ”हिंदू-अमेरिकियों के रूप में, यह हमारे लिए यह देखने का समय है कि हम कौन हैं। हमारी संस्कृति ने मार्टिन लूथर किंग जूनियर को प्रेरित किया, जिन्होंने कहा था कि भारत के महात्मा गाँधी सामाजिक परिवर्तन के लिए उनके आंदोलन के ‘गाइडिंग लाइट’ थे।

महिलाओं का सम्मान करने के महत्व पर जोर देते हुए, एडम्स ने कहा, “जब भी हम दिवाली के बारे में सोचते हैं, हमें राम का ख्याल आता है और हम बुराई के खिलाफ लड़ाई के बारे में सोचते हैं। लेकिन जब आप उस महत्वपूर्ण कहानी को देखते हैं, तो सीता को मत भूलना, उस कथा से सीता को बाहर मत करना। सीता एक मजबूत महिला थीं, जो किसी भी प्रलोभन के आगे नहीं झुकी, वह दृढ़ और प्रतिबद्ध थी।”