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उमर खालिद को पत्र लिखने वाले कट्टरपंथी ज़ोहरान ममदानी हिम्मत है तो नारा लगा "Washinton/America तेरे टुकड़े होंगे इंशाअल्लाह", फिर देख तमाशा

लोकतंत्र में हर चुनाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं होता, कई बार वह भविष्य की चेतावनी भी होता है। न्यूयॉर्क जैसे शहर का मेयर बनना केवल एक नगर निगम पद नहीं है, यह वैश्विक राजनीति की प्रयोगशाला में प्रवेश का टिकट होता है। यही वजह है कि जोहरान ममदानी का सत्ता में आना केवल अमेरिका की आंतरिक घटना नहीं रह गया, बल्कि भारत सहित पूरी दुनिया में राजनीतिक चिंता का विषय बन गया है।
भारत की न्यायपालिका पर कटघरे में खड़ा करने वाले न्यूयॉर्क के मेयर जोहरान क्वामे ममदानी का दिल्ली दंगे के आरोपी उमर खालिद को लिखे पत्र का अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प को संज्ञान लेकर कार्यवाही करनी चाहिए, वरना वह दिन दूर नहीं जब यही कट्टरपंथी अमेरिका को पाकिस्तान या बांग्लादेश बनाने का मौका नहीं चुकेगा। भारत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी इसे गंभीरता से लेकर ट्रम्प को लिखना चाहिए। मोदी और ट्रम्प को ममदानी के इस पत्र को हल्के में नहीं लेना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट को भी संज्ञान लेकर कार्यवाही करनी चाहिए।   

अमेरिका के सबसे बड़े और प्रभावशाली शहर न्यूयॉर्क की मेयर की कुर्सी पर बैठते ही जोहरान क्वामे ममदानी ने ऐसा कदम उठाया है, जो न केवल विवादास्पद है, बल्कि भारत के लिए सीधी चुनौती जैसा लगता है। 1 जनवरी को शपथ लेने के ठीक अगले दिन उनका एक हैंडरिटन पत्र सामने आया, जो दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद विवादित कार्यकर्ता उमर खालिद के नाम लिखा गया था। इस पत्र ने भारत में आग की तरह फैलते गुस्से को और भड़का दिया है। कई लोग इसे ममदानी की भारत विरोधी मानसिकता का खुला प्रमाण बता रहे हैं।

जोहरान ममदानी खुद को प्रोग्रेसिव और डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट कहता है, लेकिन उसके पहले ही कदम से साफ लगता है कि उसकी प्राथमिकता में सेलेक्टेड चीजे हैं। यानी उसके मुद्दे बहुत सोच-विचार के चुने हुए हैं, खासकर जो मुस्लिम पहचान और कथित इस्लामी पीड़ितों से जुड़े हों।

ममदानी के मेयर बनने के बाद ही क्यों सामने आया उमर खालिद को लिखा पत्र?

कोई भी नया निर्वाचित नेता आम तौर पर शहर की समस्याओं से शुरुआत करता है। अपने शहर की आवास, ट्रांसपोर्ट, अपराध, शिक्षा से जुड़ी समस्या। लेकिन ममदानी ने ऐसा नहीं किया। बल्कि ममदानी ने सत्ता संभालते ही भारत से जुड़े एक अत्यंत विवादित मुद्दे या यूँ समझें कि आतंकवादी को चुना। वो है दिल्ली की जेल में बंद उमर खालिद।

यह कोई संयोग नहीं था। यह एक सोचा-समझा राजनीतिक संकेत था। जोहरान ममदानी जानता था कि उमर खालिद का नाम भारत में किस तरह ध्रुवीकरण पैदा करता है। UAPA जैसे कानून, देशद्रोह के आरोप, दंगे, हिंसाये सब ऐसे विषय हैं जिन पर भारत की न्यायिक प्रक्रिया बेहद संवेदनशील है। इसके बावजूद एक अमेरिकी मेयर का इस मुद्दे पर टिप्पणी करना साफ बताता है कि उसका मकसद ‘मानवाधिकारट से ज्यादा ‘वैश्विक पहचान’ बनाना था।

यह कहानी सिर्फ वामपंथ की नहीं, बल्कि उस वैचारिक इस्लामी राजनीति की है, जो अब लोकतांत्रिक संस्थानों के भीतर घुसपैठ कर रही है।

वामपंथी या इस्लामी… ममदानी की असली पहचान क्या?

जोहरान ममदानी खुद को वामपंथी कहता है। लेकिन दुनिया जानती है कि आधुनिक वामपंथ अब केवल आर्थिक असमानता की लड़ाई नहीं रह गया। यह पहचान की राजनीति में तब्दील हो चुका है, जहाँ धर्म, जाति और नस्ल को हथियार बनाया जाता है। ऐसे में ये सवाल उठने स्वाभाविक हैं कि अगर ममदानी सिर्फ वामपंथी है, तो उसकी संवेदनशीलता बार-बार केवल इस्लामी मुद्दों पर ही क्यों दिखती है? अगर वो मानवाधिकारों का पैरोकार है, तो चीन के उइगर, पाकिस्तान के बलूच, बांग्लादेश के हिंदुओं पर उसकी आवाज़ क्यों खामोश रहती है? यही सेलेक्टिव नैतिकता ही असली समस्या है।

कुरान हाथ में लेकर शपथ को मानें उसका राजनीतिक संदेश

अमेरिका में किसी भी धार्मिक ग्रंथ पर शपथ लेना कानूनी रूप से गलत नहीं है। लेकिन राजनीति में प्रतीक कभी मासूम नहीं होते। ममदानी द्वारा कुरान पर हाथ रखकर शपथ लेना सिर्फ निजी आस्था नहीं था, बल्कि वह एक सांस्कृतिक संदेश था। यह संदेश न्यूयॉर्क के मतदाताओं से ज्यादा वैश्विक इस्लामी राजनीति के लिए था कि सत्ता के केंद्रों में ‘हमारा आदमी’ पहुँच चुका है।

यही वह बिंदु है जहाँ मजहब निजी नहीं रह जाता, बल्कि राजनीतिक हथियार बन जाता है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, ममदानी ने हाल ही में एक पत्र लिखकर खालिद के अम्मी-अब्बू को सौंपा। पत्र में लिखा है, “प्रिय उमर, मैं अक्सर तुम्हारे कड़वाहट न अपनाने वाले शब्दों के बारे में सोचता हूँ। तुम्हारे माता-पिता से मिलकर खुशी हुई। हम सभी तुम्हारे बारे में सोच रहे हैं।”

यह छोटा पत्र सोशल मीडिया पर वायरल हो गया और भारतीय मीडिया में सुर्खियाँ बटोर रहा है। सवाल यह है कि न्यूयॉर्क के मेयर को भारत के आंतरिक मामलों में इतनी दिलचस्पी क्यों? पद संभालते ही शहर की समस्याओं क्राइम, हाउसिंग, ट्रैफिक की बजाय दिल्ली जेल के एक कैदी को पत्र लिखना क्या संयोग है या सोचा-समझा प्रोपेगेंडा?

UAPA केस में मुख्य साजिशकर्ता है उमर खालिद

उमर खालिद का मामला कोई साधारण नहीं है। पूर्व जेएनयू छात्र खालिद को सितंबर 2020 में दिल्ली दंगों की साजिश के लिए गिरफ्तार किया गया। उन पर यूएपीए जैसे सख्त कानून लगे, जिसमें देशद्रोह और आतंकवादी गतिविधियों के आरोप हैं। सरकार के पास सबूत हैं कि दंगे भड़काने में उनकी भूमिका थी। पाँच साल से ज्यादा जेल में हैं, ट्रायल शुरू नहीं हुआ। उनके समर्थक इसे राजनीतिक बदला बताते हैं। हालाँकि वो ऐसे व्यक्ति सैयद कासिम रसूल इलियास का बेटा है,जो प्रतिबंधित आतंकी संगठन SIMI से जुड़ा हुआ था।

भारत पर क्यों साध रहा निशाना?

भारत आज उभरती वैश्विक शक्ति है। भारत का लोकतंत्र, उसकी न्यायपालिका और उसके कानून अंतरराष्ट्रीय वामपंथी और इस्लामी नैरेटिव के लिए असहज हैं। फिर UAPA जैसे कानून इसीलिए भी निशाने पर रहते हैं क्योंकि वे ‘पीड़ित’ और ‘अल्पसंख्यक’ की उस कहानी को तोड़ते हैं, जिसे वैश्विक मंच पर बेचा जाता है।
ऐसे में ममदानी का भारत पर फोकस इसी रणनीति का हिस्सा है। भारत को ‘असहिष्णु’ दिखाओ, उसकी संस्थाओं पर सवाल उठाओ और फिर खुद को नैतिक ऊँचाई पर खड़ा करो।

भारत और हिंदुओं को पहले भी बनाता रहा है निशाना

मेयर जोहरान ममदानी का राजनीतिक करियर उसके तीखे और विवादास्पद बयानों के कारण भी चर्चा में रहा है। वो न सिर्फ हिंदुओं के खिलाफ आग उगलता रहा है, बल्कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी निशाना साधता रहा है। उसने पीएम मोदी को युद्ध अपराधी तक कहा था, वो भी अपने चुनाव प्रचार के दौरान ही। वो अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन को ‘मस्जिद के विध्वंस का उत्सव’ और ‘हिंदुत्व फासीवाद’ का प्रतीक बता चुका है।

न्यूयॉर्क से आगे की तैयारी?

यह मानना भोलापन होगा कि ममदानी सिर्फ मेयर बनकर संतुष्ट हो जाएगा। न्यूयॉर्क अमेरिकी राजनीति की सीढ़ी है, मंज़िल नहीं। इतिहास गवाह है कि जो न्यूयॉर्क जीतता है, वह राष्ट्रीय राजनीति की दहलीज़ पर पहुँच जाता है। आज वो भारत पर बोल रहे हैं, कल वो अमेरिका की विदेश नीति पर प्रभाव डालना चाहेगा। भले ही आज वो ‘मानवाधिकार’ की बात कर रहा है, लेकिन कल उसकी बोली इस्लामी कट्टरपंथियों के दबाव से अलग ही जहरीली हो चुकी होगी।
कुछ विश्लेषक मानते हैं कि ममदानी अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव की तैयारी कर रहे हैं, मुस्लिम और प्रोग्रेसिव वोट बैंक को मजबूत करके। अमेरिका में मुस्लिम नेता जैसे इल्हान उमर, रशीदा तलीब पहले से हैं और ममदानी उन कट्टरपंथियों का नेक्स्ट जेन वर्जन लगते हैं।

मेयर बनते ही पत्र का सामने आना कोई साधारण बात नहीं

जोहरान ममदानी का पत्र अकेला नहीं। ठीक इसी समय आठ अमेरिकी सांसदों ने भारत के राजदूत को पत्र लिखकर खालिद को बेल और निष्पक्ष ट्रायल की माँग की। ये सांसद डेमोक्रेटिक पार्टी के प्रोग्रेसिव विंग से हैं, जो अक्सर भारत पर मानवाधिकार के नाम पर दबाव बनाते हैं। खालिद के पैरेंट्स की इनसे मुलाकात भी हुई थी।
ममदानी और इन सांसदों के पत्र की टाइमिंग संदेह पैदा करता है। क्या यह संयोग है कि मेयर बनते ही ममदानी ने यह कदम उठाया? विश्लेषक इसे खुद को मुस्लिम दुनिया में हीरो बनाने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं।

क्या ममदानी वाकई भारत के लिए बन सकता है खतरा?

भारत के लिए तो जरूर चिंता की बात है। एक विदेशी मेयर का भारत के कानूनी मामलों में दखल खासकर ऐसे व्यक्ति के लिए जो गंभीर आरोपों में जेल में है, विदेशी हस्तक्षेप जैसा लगता है। न्यूयॉर्क के बदलते डेमोग्राफिक्स, बढ़ते मुस्लिम और प्रोग्रेसिव वोटर ने उसे जिताया, लेकिन इससे अमेरिका में इस्लामी राजनीतिक ताकतें मजबूत हो रही हैं। अगर ममदानी आगे बढ़े, तो भारत-अमेरिका रिश्तों पर असर पड़ सकता है।
भारत को, अमेरिका को और दुनिया को यह समझना होगा कि आज की राजनीति में सबसे खतरनाक चीज बंदूक नहीं, बल्कि नैरेटिव है। और जो नेता सत्ता में आते ही नैरेटिव युद्ध शुरू कर देता है, वह सिर्फ एक शहर का मेयर नहीं रह जाता, वह एक वैश्विक एजेंडा बन जाता है।


अमेरिका : भारत-हिंदू विरोधी जोहरान ममदानी बना न्यूयॉर्क सिटी का नया मेयर; अब्बू महमूद करता था ‘आत्मघाती हमलावरों’ का बचाव

              भारत-हिंदू विरोधी जोहरान ममदानी बना न्यूयॉर्क सिटी का नया मेयर (फोटो साभार : Aajtak)
न्यूयॉर्क सिटी को नया मेयर जोहरान ममदानी बन गया है। 34 वर्षीय डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट ममदानी ने पूर्व गवर्नर एंड्रयू क्यूमो और रिपब्लिकन उम्मीदवार कर्टिस स्लिवा को हराकर इस पद को हासिल किया है। युगांडा में जन्मे और भारतीय मूल के ममदानी ने जून 2025 के चुनाव में जीत हासिल कर न्यूयॉर्क के पहले भारतीय-अमेरिकी मुस्लिम मेयर बनने का रिकॉर्ड बनाया। लेकिन उनकी जीत जितनी बड़ी है, विवाद उतने ही गंभीर हैं, खासकर भारत और हिंदू धर्म को लेकर उनके बयानों ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

कौन हैं जोहरान ममदानी?

जोहरान ममदानी मशहूर फिल्मकार और हिंदू माँ, मीरा नायर और युगांडा मूल के लेखक-प्रोफेसर महमूद ममदानी के बेटे हैं। ममदानी ने प्रतिष्ठित ब्राउन यूनिवर्सिटी से हायर एजुकेशन प्राप्त की और साल 2020 में न्यूयॉर्क स्टेट असेंबली के सदस्य के रूप में राजनीति में कदम रखा। खुद को वे एक ‘डेमोक्रेटिक सोशलिस्ट’ कहते हैं और गरीबों के हित में मुफ्त बस सेवा, किराया नियंत्रण और सस्ती चाइल्डकेयर जैसी नीतियों को आगे बढ़ाने की बात करते हैं।
लेकिन ममदानी की राजनीतिक छवि का दूसरा पहलू भी उतना ही चर्चित है। ममदानी के विवादित और हिंदू-विरोधी बयानों ने न केवल भारतवंशी समुदाय को नाराज किया है, बल्कि उन्हें धर्म के आधार पर विभाजन फैलाने वाला नेता भी बना दिया है।

क्यों हैं जोहरान ममदानी हिंदू-विरोधी और भारत-विरोधी विवादों के केंद्र में?

मेयर जोहरान ममदानी का राजनीतिक करियर उनके प्रगतिशील वादों के साथ-साथ उनके तीखे और विवादास्पद बयानों के कारण भी चर्चा में रहा है। आलोचकों और हिंदू समुदाय के बड़े वर्ग द्वारा उन्हें ‘हिंदू-विरोधी’ और ‘भारत-विरोधी’ कहने के मुख्य कारण हैं। ममदानी ने सार्वजनिक रूप से भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ‘वॉर क्रिमिनल‘ (युद्ध अपराधी) कहकर संबोधित किया और उन्हें 2002 के गुजरात दंगों के लिए दोषी ठहराया। यह बयान तब दिया गया, जब भारत के सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पीएम मोदी को दंगों के संबंध में पहले ही क्लीन चिट दी जा चुकी है।

ममदानी ने दावा किया था कि ‘गुजरात में अब कोई मुसलमान नहीं बचा है’, जो कि पूरी तरह से झूठा और भड़काऊ बयान है। यह दावा गुजरात की मुस्लिम आबादी के मौजूदा आँकड़ों के विपरीत है और इसे विभाजनकारी राजनीति के रूप में देखा जाता है।

ममदानी ने अयोध्या में राम मंदिर के उद्घाटन को ‘मस्जिद के विध्वंस का उत्सव’ और ‘हिंदुत्व फासीवाद’ का प्रतीक बताया। यह बयान भारत के लोकतांत्रिक और कानूनी प्रक्रिया के तहत आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को नकारता है और करोड़ों हिंदुओं की आस्था को ठेस पहुँचाता है। जनवरी 2024 में, ममदानी न्यूयॉर्क में राम मंदिर के प्राण प्रतिष्ठा समारोह के खिलाफ आयोजित प्रदर्शनों में शामिल हुए। इन रैलियों के दौरान कथित तौर पर हिंदुओं के खिलाफ अपमानजनक नारे लगाए गए थे।

इन सभी बयानों से यह स्पष्ट है कि ममदानी केवल राजनीतिक आलोचना तक सीमित नहीं रहे, बल्कि उन्होंने सीधे तौर पर एक समुदाय की धार्मिक भावनाओं और राष्ट्रीय प्रतीकों को निशाना बनाया, जिससे उन्हें हिंदू और भारत-समर्थक समुदायों के बीच एक अत्यधिक विवादास्पद छवि वाला नेता बना दिया।

कट्टरपंथी समूहों का साथ

जोहरान ममदानी के विवाद सिर्फ उनके बयानों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि उनका जुड़ाव कुछ ऐसे संगठनों और व्यक्तियों से भी रहा है, जिन पर गंभीर आरोप हैं। इसके अलावा, पश्चिमी मीडिया के एक वर्ग ने भी उनकी विवादास्पद छवि को ढकने का प्रयास किया है।

                                    जोहरान ममदानी का अब्बू आतंकियों का समर्थक

ममदानी ने हाल ही में इमाम सिराज वहाज से मुलाकात की थी, जिस पर 1993 के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर बम धमाके के साजिशकर्ताओं से संबंध रखने के गंभीर आरोप लगे थे। इस मुलाकात के लिए उन्हें अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प समेत कई नेताओं की कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा।

जोहरान ममदानी इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल (IAMC) जैसे संगठनों से भी जुड़े बताए जाते हैं। इन समूहों पर भारत-विरोधी प्रचार चलाने, हिंदू समूहों पर ‘हिंदुत्व आतंकवाद’ का आरोप लगाकर डर और अविश्वास का माहौल बनाने का आरोप है।

वॉशिंगटन पोस्ट जैसे कुछ पश्चिमी मीडिया हाउसों ने ममदानी के स्पष्ट हिंदू-विरोधी बयानों को केवल ‘मोदी की कड़ी आलोचना’ बताकर हल्का करने की कोशिश की थी। आलोचकों का मानना है कि इस तरह से मीडिया एक निर्वाचित अधिकारी के घृणास्पद प्रचार को ‘राजनीतिक असहमति’ का जामा पहनाकर सही ठहरा रहा है।

 गौरतलब है कि अतीत में इन्हीं मीडिया प्लेटफॉर्म्स ने 2008 के मालेगाँव बम धमाके जैसे मामलों में ‘हिंदू आतंकवाद’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया था, जिससे वैश्विक स्तर पर हिंदू समुदाय की छवि को गहरी चोट पहुँची थी। आज यही मीडिया ममदानी की आलोचनाओं को दबाकर, हिंदू समुदाय की चिंताओं को पूरी तरह से अनदेखा कर रहा है।

अब्बू महमूद ममदानी: चरमपंथी विचारधारा का वैचारिक समर्थन?

जोहरान ममदानी के विवादित विचारों की जड़ें उनके पारिवारिक पृष्ठभूमि तक जाती हैं। ममदानी के अब्बू, युगांडा मूल के प्रसिद्ध लेखक और प्रोफेसर महमूद ममदानी पर भी गंभीर वैचारिक आरोप लगे हैं। महमूद ममदानी पर आरोप है कि उन्होंने अपनी पुस्तकों और व्याख्यानों के माध्यम से इस्लामी चरमपंथ और हिंसा को वैचारिक रूप से ‘जायज’ (Justify) ठहराने की कोशिश की।

अपनी एक पुस्तक में ममदानी ने पाकिस्तान के निर्माण को ‘धार्मिक एकता की जरूरत‘ के रूप में चित्रित किया। आलोचकों के अनुसार, उन्होंने जिन्ना और इस्लामी उलेमा के विभाजनकारी व चरमपंथी रवैये पर पर्दा डालने की कोशिश की, यहाँ तक कि विभाजन के दौरान हिंदुओं के नरसंहार को भी वैचारिक रूप से हल्का दिखाने का प्रयास किया।

महमूद ममदानी ने यह दावा भी किया कि इस्लाम में ‘राष्ट्रवाद’ की अवधारणा नहीं है, बल्कि यह एक ‘उम्माह’ (एक वैश्विक मुस्लिम समुदाय) है, जिसे सीमाओं में नहीं बाँटा जा सकता। कई आलोचकों और भारतीय बुद्धिजीवियों का मानना है कि यह विचार परोक्ष रूप से ‘गजवा-ए-हिंद’ (संपूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप को इस्लाम के अधीन लाने की चरमपंथी भविष्यवाणी) जैसी घातक और अतिवादी सोच को बढ़ावा देता है।

भारतीय बुद्धिजीवियों और इतिहासकारों का एक वर्ग यह मानता है कि महमूद ममदानी ने अपने लेखन में इस्लामी हिंसा और आतंक को वैचारिक रूप से सही ठहराने का प्रयास किया, जो अब उनके बेटे जोहरान ममदानी की विवादास्पद राजनीति में भी दिखाई देता है।

भारतीय-अमेरिकी समुदाय में आक्रोश और ममदानी के एजेंडे पर सवाल

जोहरान ममदानी की जीत के बाद न्यूयॉर्क सिटी में भारतीय-अमेरिकी और हिंदू समुदाय के बड़े वर्ग ने उनके विभाजनकारी बयानों पर गहरा रोष व्यक्त किया है। सिख समुदाय के नेता और मानवाधिकार वकील जसप्रीत सिंह ने ममदानी की कड़ी आलोचना करते हुए कहा, “हमारे शहर में नफरत के लिए कोई जगह नहीं है… लेकिन जोहरान अपने मंच का इस्तेमाल हिंदू विरोधी बयानबाजी को बढ़ावा देने और हमें धर्म के आधार पर विभाजित करने के लिए कर रहे हैं।”

न्यूयॉर्क के कई हिंदू संगठनों ने ममदानी के बयानों को ‘धार्मिक घृणा का एजेंडा’ बताते हुए उनके इस्तीफे की माँग की है। समुदाय का कहना है कि हिंदुओं को ‘फासीवाद’ से जोड़ना और अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल करना बेहद आपत्तिजनक है।

राजनीतिक विश्लेषकों और आलोचकों का मानना है कि ममदानी की राजनीति ‘प्रगतिशील’ टैग के पीछे छिपी हुई एक खतरनाक विचारधारा को दर्शाती है। विश्लेषकों के अनुसार, ममदानी की ‘समाजवादी और प्रगतिशील’ छवि के पीछे उनका असली मकसद कट्टरपंथी राजनीति को वैध बनाना है। वह हिंदू धर्म को ‘फासीवाद’ और भारत को ‘धार्मिक तानाशाही’ बताकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर देश की छवि खराब करने में सक्रिय रूप से जुटे हैं।

जोहरान ममदानी का न्यूयॉर्क का मेयर बनना केवल एक राजनीतिक जीत नहीं है। जिस तरह से ममदानी ने बार-बार हिंदू धर्म, भारत और मोदी सरकार पर झूठे, अपमानजनक और भ्रामक आरोप लगाए हैं, उससे यह साफ है कि उनकी राजनीति घृणा और भ्रम फैलाने पर आधारित है। जब उनके अब्बू महमूद ममदानी के लेखन में भी इस्लामी आतंक समर्थक झुकाव दिखता है, तो यह परिवार एक विचारधारात्मक खतरे का प्रतीक बन जाता है, जहाँ ‘प्रगतिशीलता’ के नाम पर भारत और हिंदुओं के खिलाफ नफरत को जायज ठहराया जा रहा है।

मीरा नायर के बेटे के ‘इस्लाम’ से अमेरिका ही भयभीत, मजहब नहीं, भारत में ममदानी की ‘मूर्खता’ पर हो रही बात: लिबरल एजेंडे के लिए देश को बदनाम करना बंद करो निधि राजदान

न्यूयॉर्क के मेयर चुनावों से चर्चा में आए जोहरान ममदानी को लिबरल और वामपंथी हर तरह से मीडिया में हीरो दिखाने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे लोगों में एक नाम निधि राजदान का भी है। निधि ने हाल में एक्स (पहले ट्विटर) पर जोहरान ममदानी के लिए लिखे एक विचार को शेयर किया। इसमें उन्होंने जोहरान ममदानी की प्रशंसा के बहाने भारत को बदनाम करने का कुत्सित प्रयास किया।

यह वही निधि राजदान हैं जो कभी NDTV में कम करती थीं। फिर इन्होंने ऐलान किया था कि वह अब हार्वर्ड विश्वविद्यालय पढ़ाने जा रही हैं। बाद में पता चला था कि उन्हें इस संबंध में एक फर्जी मेल आया था और राजदान स्वयं एक फिशिंग अटैक का शिकार हो गईं थी। इससे उनकी काफी जगहंसाई हुई थी।

निधि राजदान ने क्या कहा?

पोस्ट में निधि राजदान ने गल्फ न्यूज पर लिखे अपने एक लेख को साझा किया। निधि राजदान ने इसमें कहा कि जोहरान ममदानी पर अमेरिका में चर्चा का कारण उनकी विचारधारा है जबकि भारत में ममदानी को लेकर होने वाली बात उनके मजहब तक केन्द्रित है। राजदान ने दावा किया कि कई लोग उसे पाकिस्तान से जोड़ रहे हैं।

राजदान ने लिखा है कि ममदानी से दक्षिणपंथी इसलिए इतनी नफरत करते हैं क्योंकि वह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के आलोचक हैं और इजरायली प्रधानमंत्री नेतन्याहू की गाजा पर कार्रवाई का विरोध कर चुके हैं।

अपने लेख में उन्होंने ममदानी के वादों की तुलना आम आदमी पार्टी के वादों से की और ये दिखाया कि वो कितनी कल्याणकारी योजनाओं के साथ आगे बढ़ रहा है। आगे ममदानी ने कहा कि भारत में सिर्फ ममदानी का मजहब देखा जा रहा है जबकि अमेरिका में उनके विचार क्रान्ति ला सकते हैं।

निधि राजदान ने यह दावा किया कि ममदानी की बढ़ती लोकप्रियता से उनके विरोधी रिपब्लिकन तो क्या, उनकी पार्टी के ही डेमोक्रेट भी डरे हुए हैं। निधि राजदान ने इसी को आधार बनाते हुए यह ज्ञान दिया कि भारतीयों को इसी तरह सीख लेनी चाहिए और ममदानी के मजहब पर बात नहीं होनी चाहिए।

अमेरिका में ममदानी का मजहब ही चर्चा में

दिलचस्प बात ये है कि भारत को कोसने के चक्कर में निधि राजदान ने अमेरिका से आने वाली जोहरान ममदानी से जुड़ी खबरों पर आँख मूँद ली है। चूँकि अगर गौर से देखती तो उन्हें ये पता चलता कि भारत से कहीं अधिक जोहरान ममदानी के मजहब को लेकर उतना नहीं उछाला गया जितना अमेरिका में इसे लेकर बातें हो रही हैं।

अमेरिकी खुलेआम उनके इस्लाम से जुड़ाव को लेकर सवाल उठा रहे हैं। लोग पूछ रहे हैं कि 24 साल पहले मुस्लिमों के समूह ने 2753 लोगों को 9/11 पर मार गिराया था और अब एक मुस्लिम न्यूयॉर्क सिटी चलाएगा?

अमेरिका में उनके बयानों को देखते हुए उन्हें इस्लामिक समर्थक नेता के तौर पर माना जाने लगा है। लोग उन पर खुलेआम नस्लीय टिप्पणियाँ कर रहे हैं। नवंबर में न्यूयॉर्क का मेयर चुन लिया जाएगा। इसे देखते हुए ममदानी को अमेरिका में 9/11 घटना की याद दिलाई जा रही है। लोग कह रहे हैं कि आतंकियों ने 2753 लोगों को मार दिया था। अब ऐसा ही ‘मुस्लिम सोशलिस्ट’ न्यूयॉर्क का मेयर बनने की दौड़ में है। यहाँ तक कि डोनल्ड ट्रंप जूनियर भी कह रहे हैं कि ‘न्यूयॉर्क शहर ढह जाएगा।’

रिपब्लिकन सांसद एंडी ओगल्स ने यहाँ तक कह दी है कि जोहरान ममदानी की नागरिकता रद्द कर दी जानी चाहिए। ममदानी को ‘छोटा मुहम्मद’ कहकर संबोधित किया जा रहा है। उन्होंने एक्स पर लिखा है, ”जोहरान ‘लिटिल मुहम्मद’ ममदानी यहूदी विरोधी, समाजवादी और कम्युनिस्ट है, वह बेहतरीन सिटी न्यूयॉर्क को बर्बाद कर देगा। उसे वापस भेज देना चाहिए। इसीलिए मैं नागरिकता छीनने की प्रक्रिया शुरू करने की माँग कर रहा हूँ।”

लोग यहाँ तक कह रहे हैं कि अगर न्यूयॉर्क मेयर का चुनाव जोहरान ममदानी जीतते हैं तो न्यूयॉर्क को पहला ‘मुस्लिम मेयर’ मिल जाएगा। यहाँ तक कि खुद ममदानी से स्वीकार किया है कि अमेरिका में मुस्लिम होने की वजह से कई तरह के हमलों का उन्हें सामना करना पड़ा है।

अमेरिका में यहूदी विरोधी बयान को लेकर कई लोगों ने कहा है कि न्यूयॉर्क में यहूदी विरोध नहीं चलेगा। वहीं गाजा हमला, ईरान हमले को लेकर इजरायल की आलोचना करने के ममदानी के तरीके पर सवाल उठाए हैं।

ममदानी ने एक सवाल के जवाब में कहा था कि अगर उन्हें न्यूयॉर्क के मेयर के रूप में इजरायल के पीएम बेंजामिन नेतन्याहू का स्वागत करना पड़ा तो वे क्या करेंगे? इसके जवाब में ममदानी ने कहा था कि वो नेतन्याहू को गिरफ्तार कर लेंगे। ममदानी के बयानों की अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने कड़ी आलोचना की थी और यहाँ तक कहा था कि अगर ममदानी यूयॉर्क के मेयर बनते हैं तो वे फंड रोक देंगे।

ममदानी का इतिहास भारत विरोध से भरा

अमेरिका में सोशल मीडिया इन सब खबरों से पटा पड़ा है। लेकिन भारत में सोशल मीडिया से लेकर ममदानी के बयानों पर बात हुई है। ममदानी के भारत विरोधी और पीएम मोदी के खिलाफ दिये गए बयानों की न सिर्फ भारत में आलोचना हुई, बल्कि उनके निर्वाचन क्षेत्र न्यूयॉर्क में रहने वाले भारतीय अमेरिकी समुदाय के करीब 2 लाख से अधिक लोगों ने ममदानी की आलोचना की थी।

ममरानी ने 2002 के गुजरात दंगों को लेकर पीएम मोदी को लगातार निशाना बनाया है। ममदानी ने पीएम मोदी को ‘युद्ध अपराधी’ और ‘मुसलमानों के नरसंहार’ करने वाला तक बताया है। इस दौरान सिर्फ पीएम मोदी पर हमला नहीं किया गया, बल्कि हिंदू धर्म और संस्कृति को भी निशाना बनाने की कोशिश की गई है।

ममदानी ने एक फोरम में पीएम मोदी की तुलना इजरायल के पीएम बेंजामिन नेतन्याहू से की और दोनों को ‘युद्ध अपराधी’ करार दे दिया था।

भारत में ममदानी की ‘सोच’ पर चल रही चर्चा

भारत में ममदानी को लेकर जब भी बात हुई है तो उसके विचारों और बयानों को ही आधार बनाया गया है ना कि उसके मजहब को निशाना बनाया गया है। फिल्ममेकर मीरा नायर के बेटे ममदानी के विचारों की आलोचना ऑपइंडिया ने भी की है। ऑपइंडिया ने पीएम मोदी को फासिस्ट कहने और और भारत विरोधी खासकर हिन्दुओं के खिलाफ जहर उगलने पर उसकी आलोचना की थी ना कि उसके मजहब को निशाना बनाया था।
भारत में ममदानी की आलोचना का केंद्र उसके वादे भी रहे हैं। ममदानी अपने चुनाव में न्यूयॉर्क के भीतर राशन की दुकानें खुलवाने, फ्री बस चलवाने, किराए बढ़ाने पर रोक लगाने और टैक्स बढ़ाने के वादे कर रहे हैं। भारत में आलोचना हो रही है कि यह आइडिया सालों पहले भारत में आजमाए जा चुके हैं और फेल भी हुए हैं। ममदानी लेकिन अब उन्हीं कथित समाजवादी आइडिया को अमेरिका भीतर नई पैकिंग में बेच रहे हैं। इसकी भारत में काफी आलोचना हुई थी।

भारतीयों नहीं, निधि राजदान की नीयत में खोट

बात दरअसल ये है कि निधि राजदान जैसे लिबरल पत्रकार किसी दूसरे लिबरल की आलोचना स्वीकार करने में सक्षम नहीं हैं। भले ही इसके लिए उन्हें भारत को ही नीचा क्यों ना दिखाना पड़े। निधि राजदान अगर असल बात पकड़ पातीं तो उन्हें पता चलता कि भारत में बिल्कुल पिन पॉइंट तरीके से ममदानी की आलोचना हुई है। यदि भारत में आलोचना का अकेला एक आधार किसी नेता का मुस्लिम होना होता तो भारतीय दिन रात फिर सऊदी अरब के प्रधानमंत्री या UAE के नेताओं की आलोचना करते रहते।
भारतीयों ने शायद ही कभी इन नेताओं की आलोचना की हो। यहाँ तक कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री शाहबाज शरीफ की भी आलोचना का केंद्र उसकी भारत विरोधी हरकतें और बयान होते हैं ना कि उसका मुस्लिम होना। ऐसे में यह कहना कि भारतीयों की आलोचना का दायरा सिर्फ मजहब तक रहता है एकदम आधारहीन और खुद की सतही सोच का नतीजा है। अच्छा होगा कि निधि राजदान थोड़ा असलियत को समझतीं और खुद आलोचना करते समय यह बौद्धिक जुगाली ना करके ढंग की बात कहतीं।