Showing posts with label #dalit. Show all posts
Showing posts with label #dalit. Show all posts

‘द वायर’ में सूरज येंगडे का ‘दलित पोर्न’ वाला लेख, संस्थापक-संपादक ने बताया ‘फर्जी’: वायरल स्क्रीनशॉट से छिड़ा विवाद

                      वायरल स्क्रीनशॉट में सूरज येंगड़े के जिस लेख का जिक्र है वह कभी पब्लिश ही नहीं हुआ
इस्लामी-वामपंथी पोर्टल ‘द वायर’ के नाम से एक कथित लेख का स्क्रीनशॉट सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। इस वायरल स्क्रीनशॉट में दावा किया गया है कि ‘बहुजन’ कंटेंट क्रिएटर्स को पोर्न इंडस्ट्री पर ‘कब्जा’ करने की वकालत की गई है जिसे लेखक सूरज येंगड़े ने ‘आखिरी किला’ बताया है।

वायरल स्क्रीनशॉट के अनुसार, दलित अधिकार कार्यकर्ता ने तर्क दिया है कि अंबेडकरवादी विचारधारा को फैलाने के लिए पोर्नोग्राफी जैसे ‘फ्रंटियर’ में भी प्रवेश करना जरूरी है और इसके लिए ब्राह्मण महिलाओं को निशाना बनाया जाना चाहिए। हालाँकि, यह स्क्रीनशॉट भले ही येंगड़े और ‘द वायर’ के सवर्ण विरोधी रुख के कारण भरोसेमंद लगता हो लेकिन यह पूरी तरह से फर्जी और व्यंग्य के रूप में बनाया गया है।

इस वायरल स्क्रीनशॉट में जिस लेख का जिक्र है वह कभी पब्लिश ही नहीं हुआ है। इस कथित लेख की हेडलाइन “The Case for Dalit ‘Porn’ – Why Bahujan Content Creators Must Conquer this Last Frontier” लिखी गई है।

वहीं, इसकी समरी में लिखा है, “हर विचारधारा को विस्तार के लिए पॉप-कल्चर के साधनों की जरूरत होती है। जहाँ अंबेडकरवादी विचारधारा के पास ऑटो-ट्यून गाने और रील्स जैसे माध्यम मौजूद हैं लेकिन हम पोर्नोग्राफी के क्षेत्र में पीछे हैं जो सबसे ज्यादा देखे जाने वाला कंटेंट है। भले ही यह सुनने में आपत्तिजनक लगे लेकिन बहुजन कंटेंट क्रिएटर्स को इस दिशा में काम करना चाहिए जैसे कि एक ब्राह्मण या यादव हाउस वाइफ को शौचालय साफ करने आए एक सफाईकर्मी के साथ सेक्स करते दिखाना।

ऑपइंडिया ने द वायर की वेबसाइट और उसके सोशल मीडिया हैंडल्स की जाँच की जिससे यह पता लगाया जा सके कि वायरल स्क्रीनशॉट में दिखाया गया लेख कभी प्रकाशित हुआ था, उसमें कोई बदलाव किया गया था या उसे हटाया गया था। पता चला कि सुरज येंगड़े द्वारा ऐसा कोई एंटी-ब्राह्मण लेख न तो लिखा गया था और न ही द वायर ने उसे प्रकाशित किया था। हमारी रिसर्च के अनुसार, वायरल स्क्रीनशॉट के फर्जी होने की पूरी संभावना है।

द वायर के संस्थापक संपादक सिद्धार्थ वरदराजन ने 27 मार्च को X (ट्विटर) पर एक पोस्ट कर इस मामले पर प्रतिक्रिया दी। उन्होंने ‘जातिवादी और हिंदुत्व से प्रभावित हिंदुओं’ को यह फर्जी स्क्रीनशॉट बनाने और फैलाने का जिम्मेदार बताया। उनका दावा है कि इन लोगों ने एक झूठी कहानी गढ़ी और उसे ‘सम्मानित स्कॉलर’ सुरज येंगड़े और द वायर से जोड़ने की कोशिश की।

फर्जी स्क्रीनशॉट लोगों को क्यों लगा असली?

भले ही सिद्धार्थ वरदराजन ने इस मामले में तुरंत ‘जातिवादी’ हिंदुओं और हिंदुत्व को जिम्मेदार ठहराया और सुरज येंगड़े को ‘सम्मानित स्कॉलर’ बताया लेकिन यह फर्जी स्क्रीनशॉट लोगों को इसलिए असली लगा क्योंकि यह येंगड़े की पहले से चली आ रही एंटी-ब्राह्मण बयानबाजी और द वायर की कथित एंटी-हिंदू लाइन के पैटर्न से मेल खाता हुआ दिखा।

येंगड़े ने पहले भी ‘ब्राह्मणिकल पैट्रियार्की’ जैसे विषयों पर कई लेख लिखे हैं जिनमें ब्राह्मण महिलाओं पर खास फोकस देखा गया है। उनके लेखों और सोशल मीडिया पोस्ट्स में अक्सर ऊँची जाति के हिंदुओं को इस बात के लिए निशाना बनाया जाता है कि वे ‘जाति शुद्धता’ के कारण अपनी बेटियों की शादी दलितों से नहीं करते। इसी तरह के पुराने बयानों और विचारों के कारण यह फर्जी स्क्रीनशॉट कई लोगों को पहली नजर में असली और भरोसेमंद लगा।

सुरज येंगड़े की एंटी-ब्राह्मण बयानबाजी केवल अकादमिक टिप्पणी तक सीमित नहीं है बल्कि यह कई बार खुले तौर पर महिलाओं के प्रति अपमानजनक और उन्हें वस्तु की तरह पेश करने वाली भाषा तक पहुँच जाती है जैसा कि उनके सोशल मीडिया पोस्ट्स में देखने को मिलता है। ऐसे ही एक पोस्ट में येंगड़े ने लिखा था, “ब्राह्मण लड़कियाँ दलित पुरुषों के लिए लालायित रहती हैं। मुझसे पूछो।”

 एक पोस्ट में सुरज येंगड़े ने एक ब्राह्मण की पोस्ट का जवाब देते हुए ब्राह्मण समुदाय से कहा कि वे अपनी बेटियों को दलितों को ‘दे दें’ जैसे वे कोई वस्तु हों। उन्होंने इसे इस तरह पेश किया मानो अपने ‘विशेषाधिकार’ (प्रिविलेज) को दलितों के साथ साझा करना चाहिए और इसके लिए महिलाओं को ऐसी चीज समझा जाए जिसे आपस में बाँटा जा सकता है।

येगड़े पर यह आरोप भी रहा है कि वो एंटी-ब्राह्मण बातों को आगे बढ़ाने के लिए हिंदू इतिहास और शास्त्रों को तोड़-मरोड़ कर पेश करता है।

ब्राह्मण महिलाओं को लेकर की गई आपत्तिजनक बातें और उन्हें वस्तु की तरह पेश करने के अलावा येंगड़े उनके प्रति साफ तौर पर नफरत भी दिखाता है। उसने उन्हें ‘ध्यान भटकाने का हथियार’ बताते हुए कहा कि उनके लिए उसे कोई सहानुभूति नहीं है।

इस तरह की जातीय बदले की सोच और अतिवादी कल्पनाओं के कारण पोर्न इंडस्ट्री को ‘आखिरी किला’ बताने जैसे दावे भी लोगों को सच लगने लगते हैं। कई मौकों पर कुछ दलित ‘सामाजिक न्याय’ कार्यकर्ताओं द्वारा ऊँची जाति की महिलाओं को मानो इतिहास का बदला लेने के प्रतीक या ट्रॉफी की तरह ‘हासिल’ करने की बात भी कही गई है।

भारत में कई ऐसे उदाहरण सामने आए हैं, जहाँ कुछ दलित कार्यकर्ताओं और एक्टिविस्ट ने खुले तौर पर सामान्य (जनरल) वर्ग की महिलाओं को वस्तु की तरह पेश किया है। सिर्फ राजनेता ही नहीं बल्कि कुछ IAS अधिकारियों तक के ऐसे बयान सामने आए हैं जिनमें यह कहा गया कि सामान्य वर्ग की महिलाएँ मानो कोई ट्रॉफी या वस्तु हैं जिन्हें ‘सामाजिक न्याय’ के एजेंडे को सफल बनाने के लिए दलितों के साथ शेयर किया जाना चाहिए।

साथ ही, पश्चिमी लिबरल विचारधारा के प्रभाव में जहाँ खाने, संगीत और साहित्य जैसी चीजों को भी गलत और सीमित श्रेणियों में बाँटने की प्रवृत्ति है, उसी तरह भारतीय लिबरल वर्ग के कुछ लोग भी इन विचारों को कॉपी-पेस्ट करके भारत में लागू करने की कोशिश कर रहे हैं। यह तरीका मूल रूप से गलत माना जाता है क्योंकि भारतीय सांस्कृतिक विविधता और उसके पहलू पश्चिमी समाज से अलग हैं और उसका विकास अलग परिस्थितियों में हुआ है। ऐसे में पश्चिमी ढाँचे में उन्हें फिट करने की कोशिश सही नहीं बैठती।

                                                    वाइस के एक आर्टिकल का स्क्रीनशॉट

दलित भोजन, दलित संगीत, दलित ‘देवता’, दलित परंपराएँ जैसे विषयों पर कई लेख और किताबें सामने आई हैं। इनमें कुछ भारतीय लेफ्ट-लिबरल समूह पश्चिम की ‘सोशल जस्टिस’ विचारधारा से प्रभावित होकर भारत के समाज और संस्कृति को दलित बनाम ऊँची जाति जैसे सीमित खाँचों में बाँटने की कोशिश करते हैं। कई बार ये चर्चाएँ अजीब तुलना और गलत दावों तक पहुँच जाती हैं।

                       पोर्न को ‘कलंक खत्म करने के हथियार’ के रूप में सही ठहराने वाले एक लेख का स्क्रीनशॉट

इन्हीं बहसों के धीरे-धीरे आम हो जाने की वजह से वह वायरल स्क्रीनशॉट भी लोगों को काफी हद तक सच जैसा लगा। व्यंग्य (सटायर) समाज में चल रही चीजों को हल्के-फुल्के अंदाज में दिखाने का एक तरीका होता है। यह तथ्य कि एक अलग ‘दलित पहचान’ की चीजों को वाम-उदारवादी ‘यौन स्वतंत्रता’ के सामान्य विचारों के साथ मिलाकर वह व्यंग्यात्मक स्क्रीनशॉट बनाया गया और वह कई लोगों को ‘सच’ लगा…यह अपने आप में भी एक तरह का व्यंग्य है।

बिहार : ‘पॉलिटिकल टूर’ पर राहुल गाँधी, दशरथ माँझी की मूर्ति को 2 बार पहनाई ‘एक हाथ’ से माला और देखा तक नहीं: माउंटेन मैन के परिवार से मिलना दलित प्रेम या सियासी मजबूरी?

                           दशरथ माँझी, माल्यार्पण करते राहुल गाँधी (फोटो साभार: X_ANI/Prabhat Khabar)
राहुल गाँधी इन दिनों बिहार के राजनीतिक पर्यटन पर निकले हैं। गया पहुँचे, दशरथ माँझी के गाँव गए, उनकी मूर्ति पर माला चढ़ाई, परिवार से मिले और पूरे तामझाम के साथ दलित प्रेम का ढोंग रचाया। इस पूरे तामझाम का मकसद था – ‘दलित प्रेम’ का प्रदर्शन। लेकिन जो हुआ, उसने सियासत की पोल खोल दी।

दशरथ माँझी को पहनाई माला, लेकिन ढंग से देखा तक नहीं

दरअसल, गयाजी जिले के गहलौर गाँव में राहुल गाँधी दशरथ माँझी मेमोरियल पहुँचे। वहाँ माउंटेन मैन की मूर्ति पर माला चढ़ाई। लेकिन जिस तरह से उन्होंने ये किया, वो देखकर किसी का भी मन खट्टा हो जाए। दो बार माला चढ़ाई, लेकिन नजरें मूर्ति की तरफ उठी तक नहीं।

राहुल गाँधी ने एक हाथ से, तिरछे होकर जैसे जबरदस्ती कोई काम कर रहा हो, इसी तरह से इस ‘काम’ को निपटाया। चेहरे के हाव-भाव, मूर्ति की ओर नजरें और माला पहनाने का अंदाज – सब कुछ साफ बता रहा था कि राहुल गाँधी के लिए यह श्रद्धा नहीं, मजबूरी थी। एक हाथ से तिरछी माला, बिना नजरें मिलाए जल्दी-जल्दी दो बार माला चढ़ाना और आगे बढ़ जाना।

लोग भी तंज कस रहे हैं कि राहुल बाबा को माला चढ़ाने में भी मेहनत नहीं करनी। शायद सोच रहे होंगे कि बस फोटो खिंच जाए, बाकी तो जनता वैसे ही वोट दे देगी।

कौन थे दशरथ माँझी, जिनके घर सियासत चमकाने पहुँचे राहुल गाँधी

दशरथ माँझी, जिन्हें माउंटेन मैन कहा जाता है, उन्होंने 22 साल तक पहाड़ काटकर रास्ता बनाया। आज दशरथ माँझी का नाम है, तो वो राहुल गाँधी के ही परिवार, खानदान, पार्टी की वजह से। क्योंकि दशरथ माँझी की पत्नी फाल्गुनी की मौत जिस अव्यवस्था के कारण 1959 में हुई, वो उस समय की कांग्रेस सरकार की देन थी। 1960 से 1982 तक माँझी ने अकेले दम पर पहाड़ काटा, लेकिन कॉन्ग्रेस की सरकारें सोती रहीं।

इससे पहले भी भारत देश और बिहार की राजनीति पर कांग्रेस का ही वर्चस्व था और उसके बाद भी कांग्रेस का लंबे समय तक राज रहा, लेकिन विकास कार्यों की जगह कांग्रेस पार्टी ने आम जनता की तकलीफों और परेशानियों के प्रति मुँह मोड़े रखा। न कोई सड़क बनी, न अस्पताल, न कोई मदद मिली। माँझी ने अपनी मेहनत से जो रास्ता बनाया, उसकी सुध लेने में कांग्रेस को 22 साल लगे नहीं, बल्कि कभी सुध ली ही नहीं। आज राहुल गाँधी उन्हीं दशरथ माँझी के परिवार से मिल रहे हैं और महानता का बखान कर रहे हैं।

दलितों की अनदेखी का लंबा इतिहास

कांग्रेस का इतिहास देखें तो दलितों और गरीबों की अनदेखी की कहानियाँ भरी पड़ी हैं। दशरथ माँझी के समय से लेकर बाद तक, कांग्रेस ने बिहार में लंबा राज किया। लेकिन क्या बदला? गाँवों में सड़कें नहीं, अस्पताल नहीं, स्कूल नहीं। माँझी जैसे लोग अपनी जान जोखिम में डालकर पहाड़ काटते रहे और कांग्रेस की सरकारें कुर्सी की राजनीति में मस्त रहीं। बाद में जब लालू यादव और राबड़ी देवी की सरकारें आईं, जो कांग्रेस की सहयोगी थीं, तब भी माँझी की कोई सुध नहीं ली गई। 15 साल तक लालू-राबड़ी ने बिहार को जंगलराज में धकेला, लेकिन माँझी जैसे लोगों के लिए कुछ नहीं किया।

वो तो भला हो नीतीश कुमार और बीजेपी की जोड़ी का, जिन्होंने माँझी के बनाए रास्ते को पक्का करवाया। नीतीश ने माँझी को सम्मान दिया, उनके नाम पर सड़क बनवाई और पद्मश्री के लिए उनका नाम भेजा। यही नहीं, मृत्यु के बाद राजकीय सम्मान के साथ विदाई भी दी। लेकिन राहुल गाँधी आज माँझी के गाँव में जाकर उनकी महानता का बखान कर रहे हैं। अरे भाई, अगर तुम्हारी पार्टी ने उस समय थोड़ा सा ध्यान दिया होता, तो शायद माँझी को 22 साल तक हथौड़े-छेनी से पहाड़ तोड़ने की जरूरत ही न पड़ती।

माँझी का परिवार और कांग्रेस की टिकट की सियासत

अब बात करते हैं माँझी के परिवार की। दशरथ माँझी के बेटे भगीरथ माँझी कॉन्ग्रेस में शामिल हो चुके हैं। परिवार अब कांग्रेस से विधानसभा चुनाव का टिकट माँग रहा है। ये वही परिवार है, जिसे कांग्रेस ने दशरथ माँझी के जीते-जी कभी पूछा तक नहीं। माँझी 2007 तक जिंदा रहे, लेकिन कांग्रेस ने उनकी सुध लेने की जहमत नहीं उठाई। अब जब बिहार में विधानसभा चुनाव नजदीक हैं, राहुल गाँधी को माँझी का गाँव याद आ गया। भगीरथ माँझी का हाथ पकड़कर फोटो खिंचवाए, वीडियो बनवाए और सोशल मीडिया पर वायरल करवाया। लेकिन सवाल ये है कि क्या ये सब दलितों के लिए सच्चा प्रेम है, या फिर वोटों की खातिर किया गया नाटक?

कांग्रेस की चाल समझने की जरूरत है। दरअसल, कांग्रेस ने बिहार में पूरी लीडरशिप ही दलितों के इर्द-गिर्द रखी है। प्रदेश में पार्टी की कमान राजेश राम को सौंपी है। वो दरभंगा पहुँचे, तो भी बिना अनुमति ही आँबेडकर हॉस्टल में घुस गए और दलित छात्रों से संवाद करने लगे। पटना पहुँचे तो फुले फिल्म देखने लगे। राजगीर पहुँचे, तो दलितों-आदिवासियों के साथ संवाद कार्यक्रम किया।

और अब माउंटेन मैन के घर जाकर, माला चढ़ाकर वो इसी कड़ी को आगे बढ़ा रहे हैं। शायद, वो माँझी के परिवार को विधानसभा चुनाव का टिकट भी दे दें, ताकि खुद को दलितों का मसीहा साबित कर सकें… लेकिन जनता सब समझती है। अगर कांग्रेस को दलितों की इतनी ही फिक्र थी, तो 22 साल तक माँझी को क्यों भूल गए? 27 साल बाद उनकी मौत के बाद भी क्यों नहीं सुध ली? अब जब वोटों की जरूरत पड़ी, तो माला चढ़ाने और फोटो खिंचवाने का ड्रामा शुरू हो गया।

गाँधी परिवार का दलित विरोधी इतिहास

गाँधी परिवार का दलितों के प्रति रवैया हमेशा से सवालों के घेरे में रहा है। इंदिरा गाँधी के समय बाबू जगजीवन राम को प्रधानमंत्री बनने से रोका गया, सिर्फ इसलिए क्योंकि वो दलित थे। इतना ही नहीं, उनके बेटे का सेक्स स्कैंडल इंदिरा ने अपनी बहू के अखबार में छपवाया, ताकि जगजीवन राम की छवि खराब हो। ये है गाँधी परिवार का दलित प्रेम? आज राहुल गाँधी बिहार में दलितों के घर जा रहे हैं, लेकिन उनका मन वहाँ है ही नहीं। माला चढ़ाते वक्त उनका चेहरा देख लीजिए, लगता है जैसे कोई जबरदस्ती करवा रहा हो।

राहुल गाँधी का ये बिहार दौरा उनका पाँचवाँ दौरा है पिछले पाँच महीनों में। पहले दरभंगा, पटना, समस्तीपुर, पश्चिम चंपारण और अब गया, राजगीर, बोधगया। हर जगह वही ड्रामा – माला चढ़ाओ, फोटो खिंचवाओ और सोशल मीडिया पर वायरल करवाओ। राजगीर में जरासंध स्मारक गए, बाबासाहेब आंबेडकर की मूर्ति पर माला चढ़ाई और फिर अति पिछड़े समाज के लोगों से मुलाकात की। लेकिन ये सब कितना सच्चा है? अगर दलितों और पिछड़ों की इतनी ही चिंता थी, तो कांग्रेस ने अपने 60 साल के शासन में उनके लिए क्या किया? बीजेपी भी यही आरोप लगा रही है।

राहुल गाँधी का बिहार दौरा और दशरथ माँझी के गाँव जाना, एक सोचा-समझा सियासी ड्रामा है। माला चढ़ाने का ढोंग, परिवार से मिलने का नाटक और सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो – ये सब वोटों की खातिर है। कांग्रेस का इतिहास रहा है दलितों और गरीबों की अनदेखी का। दशरथ माँझी ने 22 साल तक पहाड़ काटा, लेकिन कांग्रेस की सरकारों ने उनकी सुध नहीं ली क्योंकि कॉन्ग्रेस का इतिहास रहा है वादे करने का, नारे देने का… लेकिन काम करने का नहीं। आज राहुल गाँधी माँझी के गाँव जाकर उनकी महानता का बखान कर रहे हैं, लेकिन सच्चाई ये है कि माँझी को वो सम्मान नहीं मिला, जो उन्हें कांग्रेस के राज में मिलना चाहिए था।

दिल्ली विश्वविद्यालय में दलित छात्रा के जवाब से राहुल गाँधी की किरकिरी, Video वायरल


कांग्रेस पार्टी के नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी एक बार फिर अपने बयान को लेकर विवादों में आ गए हैं। ताजा प्रकरण एक हिंदू दलित छात्रा से जुड़ा हुआ है जिसके जवाब ने राहुल को ट्रोल कर दिया।

दिल्ली विश्वविद्यालय में मंगलवार (27 मई 2025) को राहुल गाँधी छात्र संगठन को लोगों से चर्चा कर रहे थे। छात्रों के बीच राहुल अपनी पार्टी और खुद को मसीहा साबित करने में लगे हुए थे। उन्होंने कहा, “हमने तेलंगाना राज्य में दिए गए कॉन्ट्रैक्ट की सूची मँगाई। उसे चेक किया तो पाया कि कोई भी कॉन्ट्रैक्ट दलितों, पिछड़ों या आदिवासियों को नहीं दिया जा रहा है। ऐसे में आप लोग राजनीति कैसे करेंगे या राजनीति में कैसे आएंगे?”

राहुल गाँधी की बात छात्रा बड़े ध्यान से सुन रही थी। राहुल की बात खत्म होने के तुरंत बाद उसने पलटवार कर दिया। किसी लाग लपेट के उसने राहुल गाँधी से कह दिया, “हम राजनीति कर भी नहीं रहे सर, राजनीति में यूज (इस्तेमाल) हो रहे हैं।”

छात्रा की इस बात से राहुल ने बात पलटते हुए कहा कि वो दूसरी बात है। हालाँकि इतने में ही उनकी अच्छी खासी किरकिरी हो चुकी थी।

दिल्ली :जामिया में सफाईकर्मियों को वाल्मीकि जयंती मनाने की नहीं मिली अनुमति: रजिस्ट्रार नसीम पर जातिसूचक गाली देने का भी मामला; सनातन विरोधी विपक्ष के मजबूत होते ही हिन्दू त्योहारों पर मुस्लिम कट्टरपंथियों का कहर

                                                 जामिया वाल्मीकि जयंती (साभार: X/subhi_karma)
2024 चुनावों में सनातन पर होते हमलों से हिन्दुओं ने आंखें नहीं खोली, जिस कारण सनातन विरोधियों को वोट अपने ही त्योहारों पर अंकुश का सामना करना पड़ रहा है। मुसलमान बीजेपी को हराने एकजुट वोट कर सकता है, लेकिन बेशर्म हिन्दू महंगाई, बेरोजगारी और जातपात के मकड़जाल में फंसा रहता है। अभी भी समय है हिन्दुओं एकजुट हो जाओ वरना वह दिन अब ज्यादा दूर नहीं जब तुम्हे घरों में पूजा करने पर भी किसी अनहोनी सामना करना पड़ सकता है। अगर मुसलमानों के त्योहारों पर हिन्दुओं ने ऐसा उपद्रव किया होता जितने भी गंगा-जमुनी तहजीब जैसा भ्रमित नारा लगाने वालों ने आसमान सिर पर उठा लिया होता।     

दिल्ली स्थित जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय ने वाल्मीकि जयंती मनाने वाले सफाई कर्मचारियों को परिसर में घुसने से रोक दिया। इससे विवाद गहरा गया है। इससे पहले विश्वविद्यालय प्रशासन ने हिंदू विद्यार्थियों को दीवाली मनाने से रोक दिया था। इसके बाद पुलिस ने बुधवार (23 अक्टूबर 2024) को करीब आधा दर्ज छात्रों को हिरासत में लिया था।

दरअसल, बुधवार (23 अक्टूबर 2024) की सुबह सफाई कर्मचारी वाल्मीकि जयंती मनाने जा रहे थे, लेकिन यूनिवर्सिटी के गार्ड ने उन्हें अंदर नहीं जाने दिया। उन्होंने बताया कि महर्षि वाल्मीकि जयंती पिछले 6 साल से विश्वविद्यालय परिसर में मनाई जा रही है, लेकिन इस बार इजाजत नहीं दी गई। उन्होंने पूछा कि इस बार विश्वविद्यालय प्रशासन ने ऐसा क्यों किया।

 सफाई कर्मचारियों का कहना है कि कार्यक्रम आयोजित करने की अनुमति विश्वविद्यालय प्रशासन और दिल्ली पुलिस से ली गई थी। सफाई कर्मचारी जब महर्षि वाल्मीकि की प्रतिमा लेकर विश्वविद्यालय परिसर में जाने लगे तो गेट पर गार्ड ने उन्हें रोक दिया। सफाई कर्मियों का आरोप है कि उनसे कहा गया कि मूर्ति यूनिवर्सिटी के अंदर ले जाने की इजाजत नहीं है।

दूसरी तरफ, विश्वविद्यालय के गार्ड ने कहा कि मूर्ति काफी बड़ी थी। इस वजह से वह परिसर में नहीं जा सकती थी। इसके बाद सरिता विहार से भाजपा पार्षद के पति मनीष चौधरी ने जामिया यूनिवर्सिटी पहुँचकर उसके मुख्य गेट के सामने महर्षि वाल्मीकि की मूर्ति की पूजा की और जयंती मनाई। इस दौरान जामिया यूनिवर्सिटी के सफाई कर्मी भी मौजूद रहे।

एक सफाई कर्मचारी ने रिपब्लिक भारत को बताया, “गार्ड ने कहा कि विश्वविद्यालय परिसर में मूर्ति में ला सकते। फोटो लेकर आओ और जयंती मनाओ।” उस व्यक्ति ने कहा कि उसने हर जरूरी विभाग से इस आयोजन के लिए अनुमति ले रखी थी। इसके बावजूद उन्हें अंदर नहीं जाने दिया गया। वहीं, एक अन्य व्यक्ति ने कहा कि रजिस्ट्रार नसीम हैदर ने मना किया था कि मूर्ति नहीं जाएगी।

उस व्यक्ति ने गाली देने का भी आरोप लगाया। उस व्यक्ति ने कहा, “जब हम वाल्मीकि के रूप में उनके (विश्वविद्यालय के अधिकारियों) घर जाकर काम करें, तब तो कई दिक्कत नहीं है। जीते-जागते आदमी से उन्हें दिक्कत नहीं है, लेकिन एक मूर्ति से उन्हें दिक्कत है।” वाल्मीकि समाज के लोगों ने कहा कि यह पूजा सिर्फ एक घंटे के लिए होना था, फिर भी उन्हें रोक दिया गया।

विश्वविद्यालय में ऐडहॉक के तौर पर काम करने वाले राजेश वाल्मीकि ने न्यूज नेशन को बताया कि विश्वविद्यालय में उनके समाज के करीब 200-250 कर्मचारी हैं। उन्होंने बताया कि वे जामिया में लगभग 20 साल से काम कर रहे हैं। राजेश का कहना है कि परिसर में काम करने वाले वे तीसरी पीढ़ी के लोग हैं, फिर भी गेट पर एक व्यक्ति ने उनसे आई कार्ड दिखाने की माँग की।

वाल्मीकि समाज के लोगों ने कहा कि उनकी मूर्ति को बाहर रखवा करके उनकी आस्था पर चोट की गई है। उन्होंने कहा कि इस तरह का बर्ताव उनके साथ पहले कभी नहीं किया गया था। पिछले 6 साल में यह पहली बार है, जब उनकी आस्था को चोट पहुँचाई गई। विश्वविद्यालय प्रशासन के इस कट्टरपंथी रूख से वाल्मीकि समाज के लोग काफी आक्रोशित नजर आए।

ST-SC समाज के लोगों के साथ यहाँ होता है भेदभाव

ये पहली बार नहीं है कि दलित समाज के इन सफाई कर्मियों के साथ जामिया विश्वविद्यालय प्रशासन ने इस तरह का दुर्व्यवहार किया है। इससे पहले जामिया के प्रोफेसर एवं तत्कालीन रजिस्ट्रार नाज़िम हुसैन अल जाफ़री, तत्कालीन डिप्टी रजिस्ट्रार (अब रजिस्ट्रार) मोहम्मद नसीम हैदर और प्रोफेसर शाहिद तसलीम के खिलाफ़ दलित कर्मचारी को जातिसूचक गाली देने पर एससी/एसटी एक्ट में दर्ज किया गया था।
जुलाई 2024 में एक मीटिंग के दौरान अल जाफरी ने सहायक रामनिवास सेकहा था, “तुम निचली जाति के हो, तुम भंगी हो और तुम्हें ऐसे ही रहना चाहिए। तुम्हारे जैसे लोगों को आरक्षण के आधार पर नौकरी मिलती है, लेकिन फिर भी उन्हें अपनी जगह का पता नहीं होता। यह मत भूलो कि जामिया एक मुस्लिम विश्वविद्यालय है और तुम्हारी नौकरी हमारी दया पर निर्भर है।”
रामनिवास ने तत्कालीन रजिस्ट्रार नाजिम हुसैन अल जाफरी पर इस्लाम में धर्मांतरण करने का दबाव डालने का भी आरोप लगाया था। उन्होंने कहा था, डॉक्टर नाजिम हुसैन अल जाफरी ने मुझसे कहा था- ईमान ले आओ, सब ठीक कर दूँगा। तेरे बच्चों का भी करियर बना दूंगा। क्या पाखंड में घुसा है।” यहाँ ईमान लाने से मतलब मुस्लिम बनने से है। इस तरह उन्होंने हिंदू धर्म को पाखंडी बता दिया था।
इसी तरह दलित समाज से आने वाले हरेंद्र कुमार जामिया यूनिवर्सिटी के अधीन आने वाली जामिया मिडिल स्कूल में गेस्ट टीचर थे। उन्होंने आरोप लगाया था कि दलित होने की वजह से स्कूल के हेडमास्टर मोहम्मद मुर्सलीन उन्हें हमेशा अपमानित और प्रताड़ित करते रहते थे। इसके बाद साल 2018 में उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया।

जामिया के नए VC मजहर आसिफ पर भी दलित महिला को प्रताड़ित करने का आरोप

जामिया मिलिया इस्लामिया के नए कुलपति के रूप में प्रोफेसर मज़हर आसिफ को नियुक्त किया गया है। इससे पहले वे जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) में प्रोफेसर के पद पर नियुक्त थे। आसिफ पर अनुसूचित जनजाति (ST) समुदाय की महिला कर्मचारी रीना के साथ क्रूर जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न का आरोप है। इस मामले की दिल्ली हाईकोर्ट में सुनवाई भी हुई। 
मज़हर आसिफ़ को जामिया नया कुलपति बनाए जाने से आहत होकर महिला कर्मचारी रीना ने 14 अक्टूबर 2024 को विरोध में एक पत्र लिखा। उन्होंने कहा कि आसिफ पर जातिवादी रवैया अपनाकर एक महिला का करियर तबाह करने का आरोप है। ऐसे लोगों को कुलपति नहीं बनाया जाना चाहिए।
दरअसल, 2019-2020 के दौरान JNU में Associate Dean के रूप में मज़हर आसिफ़ ने ST समाज की रीना के करियर को तबाह करने की कोशिश की थी। आरोप है कि आसिफ़ ने रीना को जानबूझकर कम ग्रेड दिए, उनकी पदोन्नति को अवरुद्ध किया और उनकी जगह अयोग्य जूनियर उम्मीदवारों को तरजीह दी। 
इसके बाद रीना ने दिल्ली हाई कोर्ट और राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग का दरवाजा खटखटाया। उनकी शिकायत के बाद उनके प्रदर्शन के मूल्यांकन की स्वतंत्र रूप से समीक्षा की गई। पहले उन्हें सिर्फ 5.5 ग्रेड दिए गए थे। स्वतंत्र समीक्षा के बाद यह ग्रेड बढ़कर 8.66 हो गया। इस तरह प्रोफेसर मज़हर आसिफ़ पर रीना के लगाए आरोप हद तक सही साबित हुए।

दीवाली मनाने पर भी किया गया था बवाल

इससे पहले 22 अक्टूबर 2024 की रात को जामिया में दीपोत्सव मना रहे छात्रों के साथ बुरा बर्ताव किया गया था। उनकी बनाई रंगोली को मिटा दिया गया था और दीपों को तोड़ दिया गया था। इस्लामी कट्टरपंथियों वाली सोच रखने वाले मुस्लिम छात्रों के एक गुट ने ‘अल्लाह-हू-अकबर’ और ‘नारा-ए-तकबीर’ के नारे लगाकर माहौल बिगाड़ दिया था।
पैरों से दीये तोड़ने और रंगोलियों को मिटाने के बाद दोनों गुटों में झड़प हो गई थी। बताया जा रहा था कि इस झड़प में कई लोग घायल भी हो गए थे और उन्हें अस्पताल ले जाया गया था। इसके बाद अगले दिन यानी 23 अक्टूबर को हिंदू छात्र दोबारा से दीवाली मनाने के लिए इकट्ठा हुए, लेकिन पुलिस ने उन्हें गेट पर ही रोक दिया था और कुछ छात्रों को हिरासत में ले लिया था।
दरअसल, यह पहली बार नहीं है कि विश्वविद्यालय का इस तरह का कट्टरपंथी रूख सामने आया है। वाल्मीकि जयंती मनाने से रोकने और दीपवाली पर दीये तोड़ने एवं रंगोली मिटाने से पहले भी जामिया का कट्टरपंथी सोच सामने आ चुका है। यहाँ CAA और NRC के विरोध में व्यापक विरोध प्रदर्शन किए गए थे। दिल्ली दंगों में यहाँ के कई कट्टरपंथी छात्रों का भी नाम आया था।

चंद्रशेखर आज़ाद 'रावण' और रोहिणी घावरी के चैट्स हो गए थे वायरल

‘भीम आर्मी’ के संस्थापक चंद्रशेखर आज़ाद ‘रावण’ के साथ अपने पुराने रिश्ते को लेकर स्विट्जरलैंड में Ph.D कर रहीं वाल्मीकि समाज की रोहिणी घावरी चर्चा में हैं। अब उन्होंने उत्तर प्रदेश के नगीना लोकसभा क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे चंद्रशेखर आज़ाद ‘रावण’ का एक वीडियो शेयर किया है, जो इन दोनों के वीडियो कॉल के दौरान का है। इसमें वो रोता हुआ दिख रहा है। मूल रूप से मध्य प्रदेश के इंदौर की रहने वाली रोहिणी का कहना है कि झूठे आँसू दिखा कर और अपनी शादी छिपा कर ‘रावण’ कई मासूम लड़कियों का जीवन बर्बाद कर चुका है।

रोहिणी घावरी और चंद्रशेखर आज़ाद ‘रावण’ के चैट्स हुए थे वायरल

चंद्रशेखर आज़ाद ‘रावण’ के कैरेक्टर को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। रोहिणी घावरी के साथ उसकी तस्वीरें भी सामने आई थीं, जिनमें दोनों मास्क लगाए दिख रहे हैं और एक-दूसरे के काफी करीब नजर आ रहे हैं। एक चैट स्क्रीनशॉट में चंद्रशेखर ने अपनी उदास तस्वीर भेजते हुए रोहिणी को लिखा था, “मुझे गर्व है आप पर। आप सम्मान की हकदार हो। आप इनका अधूरा सपना ज़रूर पूरा करोगे। मैं लगभग हार मान चुका हूँ।” एक अन्य स्क्रीनशॉट भी चैट का वायरल हुआ था।

इसमें चंद्रशेखर ने लिखा है, “सच कहा आपने, इसीलिए मुझे छोड़ देना चाहिए आपको। ये ही तो कह रही हो आप। समाज भी मेरा साथ नहीं दे रहा, मुझे भी समाज को छोड़ देना चाहिए।” घावरी ने इस पर जवाब दिया था, “मैं बिना कमिटमेंट के नहीं रह सकती। मेरी भी सेल्फ-रेस्पेक्ट है। ख्याल रखना अपना, हेल्थ चेकअप कराते रहना। बाय।” इस पर ‘रावण’ ने लिखा था, “अब जो भी होगा उसके लिए आप भी जिम्मेदार होंगी – हार या जीत ज़िंदगी में।”
तब रोहिणी ने ये भी बताया था कि उनकी हँसती-खेलती ज़िंदगी में आकर एक व्यक्ति ने रात-रात भर अपने तकलीफ-संघर्ष की कहानियाँ सुनाई और ये एहसास कराया कि उसे कभी प्यार नहीं मिला, आंदोलन को सफल बनाने के लिए उसे रोहिणी जैसी बुद्धिजीवी महिला की आवश्यकता है। घावरी ने बताया था कि उसने हमेशा साथ रहने का वादा किया था, लोगों के मना करने के बावजूद उन्होंने सब दाँव पर लगा कर चंद्रशेखर का साथ दिया। हालाँकि, रोहिणी कहती हैं कि उन्हें धोखा मिला, बीच रास्ते में उन्हें छोड़ कर वो चला गया और विदेश में इस हादसे ने उन्हें तोड़ दिया।
रोहिणी घावरी इसे अपने जीवन का सबसे दर्दनाक हादसा बताते हुए कहती हैं कि इसने उन्हें बुरी तरह तोड़ कर रख दिया। उलटे लोग उन्हें भी गंदा बोलते रहे, और वो समाज का नेता बना रहा। संयुक्त राष्ट्र के मंच पर भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकीं रोहिणी घावरी और चंद्रशेखर आज़ाद ‘रावण’ पहले एक-दूसरे के ट्वीट्स को रीट्वीट भी करते थे, लेकिन 5 नवंबर, 2023 में अंतिम बार ऐसा हुआ था। उलटे रोहिणी घावरी को ही सोशल मीडिया पर ‘भीम आर्मी’ समर्थकों ने खरी-खोटी सुनाई थी।

अब रोहिणी घावरी ने जारी किया चंद्रशेखर आज़ाद ‘रावण’ का वीडियो

इस वीडियो को जारी करते हुए रोहिणी घावरी ने कहा कि उन्होंने झूठे आँसू दिखा-दिखा कर उन्हें उन पर विश्वास करने के लिए मजबूर कर दिया। बकौल रोहिणी, ये उनकी गलती है कि ‘रावण’ को उन्होंने सच्चा आंदोलनकारी इंसान मान कर उनके साथ खड़ी हो गईं। रोहिणी का आरोप है कि चंद्रशेखर ने उस समाज के सामने उन्हें झूठा साबित कर दिया, जिसके लिए वो विदेश में रह कर भी सोचती हैं। उनका कहना है कि उन्होंने सच्ची लड़की होने की सज़ा भुगती, अकेले रह कर जिस मानसिक पीड़ा से उन्होंने खुद को सँभाला उसके बारे में वो ही समझती हैं।
उन्होंने इस वीडियो के साथ लिखा, “अब कभी जीवन में किसी मर्द पर भरोसा नहीं कर पाऊँगी इसलिए शादी रिश्ते जैसी चीज़ो से बहुत दूर हो चुकी हूँ। अब मेरा बचा हुआ जीवन देश और समाज को समर्पित। मैं झूठे आरोप झेल झेल के थक गई हूँ अब जब भी कुछ अच्छा करती हूँ लोग मेरा चीरहरण करना शुरू कर देते है। एक लड़की होने की खूब सज़ा मिल रही है मुझे। जैसे पूरा समाज बेवक़ूफ़ बन रहा है में भी बन गई। मैंने तो पूरी ईमानदारी से दूसरे देश में रहकर भी साथ निभाया था यही सोच के त्याग था की समाज के लिए दोनों मिलकर कुछ अच्छा करेंगे।”

स्विट्जरलैंड में Ph.D कर रही दलित रोहिणी घावरी

रोहिणी घावरी वाल्मीकि समाज से आती हैं और खुद को दलितों का ठेकेदार बताने वाले कुछ नेताओं द्वारा ब्राह्मणों के प्रति घृणा फैलाए जाने से ताल्लुक नहीं रखती। उलटा उन्होंने बताया है कि वो वाल्मीकि समाज से आती हैं और ब्राह्मणों का उनके जीवन में बहुत योगदान है। उन्होंने बताया कि उनके शिक्षक शर्मा सर ने उन्हें 1 करोड़ रुपए की स्कॉलरशिप की जानकारी दी। स्विट्जरलैंड में जिस आभा ने उनका साथ दिया, वहाँ रहना सिखाया वो भी ब्राह्मण हैं।
रोहिणी घावरी संयुक्त राष्ट्र (UN) में भी संबोधन दे चुकी हैं। उन्होंने बताया था कि वहाँ भी जाने के लिए उनके एक पंडित अंकल ने उनका मार्गदर्शन किया। इसीलिए, वो कहती हैं कि वो ब्राह्मणों को गाली देकर एहसानफरामोशी नहीं कर सकतीं। बता दें कि वो UN में राम मंदिर को लेकर पाकिस्तान को खरी-खरी सुना चुकी हैं। उन्होंने ‘जय श्री राम’ का उद्घोष करते हुए कहा था कि दुनिया के हर हिन्दू के लिए राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा वाला दिन ऐतिहासिक है।
अवलोकन करें:-
जेनेवा में रह रही रोहिणी घावरी शिक्षा के प्रति जागरूकता फैलाने के साथ-साथ दलित समाज के लिए भी आवाज़ उठाती रहती हैं। वो बाबासाहब भीमराव आंबेडकर में श्रद्धा रखती हैं। भारत सरकार से उन्हें 1 करोड़ रुपए की स्कॉलरशिप प्राप्त हुई। रोहिणी घावरी ने भारत के ठेकेदारों की पोल खोलते हुए UN में बताया था कि भारत के प्रधानमंत्री OBC समाज से आते हैं, वहाँ के दलित ऑक्सफ़ोर्ड-हार्वर्ड में सरकारी सहायता से पढ़ते हैं, इसके बावजूद विदेशी संस्थाएँ भारत को गलत रूप में पेश करती हैं।

हल्द्वानी : दलित-दलित रोने वाली भीम आर्मी दलितों को पीटने वालों का केस वापस लेने की माँग पर अड़ी, वाल्मीकि-सोनकर परिवारों की बजाए मुस्लिमों के लिए माँगा मुआवजा

हल्द्वानी में दलितों को पीटने के आरोपित दंगाइयों का केस वापस लेने पर अड़ी 'भीम आर्मी' (चित्र साभार- X/@DrRituSingh_)
उत्तराखंड के हल्द्वानी में 8 फरवरी 2024 को हिंसा भड़क गई थी। पुलिस और नगर निगम स्टाफ के खिलाफ भड़की यह हिंसा अतिक्रमण हटाने के दौरान हुई थी। अब तक 58 दंगाइयों की गिरफ्तारी हो चुकी जबकि बाकियों की धरपकड़ के प्रयासों के साथ कुर्की जैसी कानूनी प्रक्रियाएँ जारी हैं। विगत 10 दिनों में प्रशासन के प्रयासों से हालात तेजी से सामान्य होते जा रहे हैं। हालाँकि इस बीच कुछ समूह और गिरोह अस्थिरता फ़ैलाने की फ़िराक में लगे हैं।

जहाँ 2 दिन पहले एक कथित फैक्ट फाइंडिंग कमेटी ने जा कर भ्रामक रिपोर्ट तैयार की तो वहीं अब ‘भीम आर्मी’ भी हिंसा पीड़ित मुस्लिमों से न मिलने देने पर प्रशासन के खिलाफ नाराजगी जता रही है। सबसे खास बात तो यह है कि दलितों के हितों के नाम पर राजनीति कर रही भीम आर्मी नगर निगम के उन दलित स्टाफ के घर नहीं जा रही जिन्हे हिंसक भीड़ ने बेरहमी से मारा है।

मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक शनिवार (17 फरवरी, 2024) को ‘भीम आर्मी’ का 60 सदस्यीय प्रतिनिध मंडल वनभूलपुरा के मुस्लिमों से मिलने निकला। इस प्रतिनिधि मंडल में राष्ट्रीय अध्यक्ष मनजीत नौटियाल के अलावा सोनू लाठी आदि मौजूद थे। प्रतिनिधि मंडल को उत्तराखंड पुलिस ने वनभूलपुरा क्षेत्र से काफी पहले ही हाईवे पर रोक दिया। प्रशासन ने प्रभावित क्षेत्र में कर्फ्यू लागू होने की जानकारी दी और हालत सामान्य करने में उनसे सहयोग की अपील की। हालाँकि प्रतिनिधि मंडल ने प्रशासन की बात नहीं मानी। तब प्रशासन ने इस समूह को थोड़े समय तक एहतियातन थाने में रोका और बाद में वापस लौटा दिया।

भीम आर्मी के अन्य सदस्य इस बात को ले कर सोशल मीडिया पर काफी नाराजगी जाहिर कर रहे हैं। वापस लौटाए जाने से भड़के मनजीत नौटियाल ने अपनी माँगों के न माने जाने पर आंदोलन तक का ऐलान कर दिया। उनकी माँगों में बेगुनाह मुस्लिमों के मुकदमे वापस लेना और वनभूलपुरा के पीड़ितों को मुआवजे के तौर पर 60 लाख रुपए देना शामिल है। ‘भीम आर्मी’ राष्ट्रीय अध्यक्ष यह भी चाहते हैं कि नैनीताल प्रशासन ध्वस्त किए गए अवैध मदरसे और मस्जिद के लिए फिर से जमीन दिलाए।

दंगाइयों के हमले में सबसे अधिक दलित ही पीड़ित

हल्द्वानी हिंसा में सबसे अधिक नुकसान पुलिस और नगर निगम के कर्मचारियों को उठाना पड़ा है। ऑपइंडिया की ग्राउंड रिपोर्ट में यह बात निकल कर सामने आई थी कि हिंसा के शिकार नगर निगम के अधिकतर स्टाफ अनुसूचित जाति (SC) वर्ग से हैं। इनमें से मनोज और मिथुन वाल्मीकि के अलावा सागर सोनकर ने तो ऑपइंडिया से बात करते हुए हिंसक भीड़ की करतूत बताई थी। मनोज, मिथुन और सागर के हाथों और पैरों में फैक्चर तब हैं जिसका इलाज सरकार करवा रही है। इन सभी ने बताया कि उस दिन दंगाइयों ने उन्हें मार कर जिन्दा जलाने के लिए रास्ते में कँटीले तार तक बिछा कर रखे हुए थे।
वहीं SC वर्ग से ही आने वाले कॉन्ग्रेस नेता गब्बर वाल्मीकि ने भी माना कि वनभूलपुरा की हिंसक भीड़ ने कानून को तोडा था। गब्बर वाल्मीकि ने दंगाइयों पर कड़ी कार्रवाई की भी माँग प्रशासन से की थी। इन सभी के अलावा वनभूलपुरा से निकली हिंसक भीड़ जिस रिहायशी बस्ती गांधीनगर में घुसना चाह रही थी, वहाँ भी अधिकतर परिवार दलित समुदाय के ही हैं। इन परिवारों के तमाम सदस्य दंगाइयों के हमले में पुलिसकर्मियों, नगर निगम स्टाफ और अपने खुद के परिवार की रक्षा करते हुए घायल हुए हैं।
घायलों में अनुसूचित जाति के अमरदीप सोनकर को गंभीर चोटें आईं हैं और वो अभी तक बिस्तर पर ही हैं। उनके अलावा मनीष सोनकर का सिर फट गया, ऋतिक सोनकर के चेहरे पर कई घाव लगे और आर्यन सोनकर का हाथ टूट गया है। इन सभी के अलावा गाँधीनगर की SC वर्ग की महिलाओं ने हमें बताया कि आज भी उनके मन में हिंसक भीड़ का उन्मादी रूप घूमता है। यह सारा मोहल्ला पुलिस के साथ अपनी खुद की रक्षा के लिए एकजुट हो गया था। इसी मोहल्ले पर न सिर्फ गोलियाँ चलाई गईं बल्कि पत्थरों के साथ पेट्रोल बम भी फेंके गए थे।
घायलों की जानकारी ऑपइंडिया सहित कई अन्य मीडिया संस्थानों पर प्रकाशित की गई है। हालाँकि भीम आर्मी का प्रतिनिधि मंडल वनभूलपुरा क्षेत्र में रहने वाले मुस्लिमों के लिए संघर्ष कर रहा है। अभी तक उनके माँग पत्र में दलित वर्ग से आने वाले नगर निगम के स्टाफ व इसी वर्ग के गाँधीनगर के घायलों के लिए कोई स्थान नहीं दिया गया है।

‘हैदराबाद में 1.4 करोड़ हिंदुओं की हड्डियाँ मिलेंगी’: रजाकारों की धमकी पर डॉ अंबेडकर ने दलितों को कहा- इस्लाम की ओर नहीं जाना, मुस्लिम लीग के मुस्लिमों पर विश्वास नुकसानदेह

निजाम उस्मान अली और डॉक्टर अंबेडकर (साभार: न्यूज18/एबीपी)
आज 17 सितंबर है यानी ‘हैदराबाद मुक्ति दिवस’। आज ही के दिन 1948 में निजाम के चंगुल से निकालकर हैदराबाद का भारत में विलय किया गया था। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह हैदराबाद में स्थित परेड ग्राउंड में गए और निजाम की सेना और रजाकारों (निजाम के शासन के सशस्त्र समर्थक) के खिलाफ लड़ने वाले सैनिकों को श्रद्धांजलि दी।

15 अगस्त 1947 में देश को आजादी मिलने के बाद भी निजाम हैदराबाद को एक स्वतंत्र मुल्क बनाने की कोशिश में था। आखिरकार हैदराबाद के निजाम हैदराबाद के निजाम मीर उस्मान अली खान ने 3 जून 1947 को फरमान जारी कर हैदराबाद को आजाद मुल्क घोषित कर दिया था।

जब हैदराबाद को भारत में मिलाने की बातचीत चल रही थी, तब हैदराबाद के निजाम मीर उस्मान अली खान ने भारत में विलय के आग्रह को खारिज कर दिया था। उसे रजाकारों के नेता कासिम रिजवी ने भरोसा दिया था कि हैदराबाद को मिलाने के लिए भारत किसी तरह की सैनिक कार्रवाई करता है तो उसके नेतृत्व में रजाकार भारती सेना का मुकाबला करेंगे।

भारतीय नेतृत्व को डराने के लिए कासिम के नेतृत्व में क्रूर रजाकारों और निजाम के सैनिकों ने राज्य के हिंदुओं पर जुल्म ढाना शुरू कर दिया। इतना ही नहीं, कासिम रिजवी ने धमकी दे डाली कि अगर भारत ने उस पर किसी तरह सैनिक कार्रवाई करने की कोशिश की तो उसे 1.40 करोड़ हिंदुओं की हड्डियों एवं राख के अलावा कुछ नहीं मिलेगा। वीपी मेनन ने अपनी किताब ‘द इंटीग्रेशन ऑफ स्टेट्स’ में इसका जिक्र किया है।

रजाकारों के अत्याचारों को देखतेे हुए तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने 13 सितंबर 1948 को ऑपरेशन पोलो शुरू किया और 17 सितंबर को हैदराबाद को भारत में मिला लिया। पाँच दिनों की कार्रवाई में 1373 रजाकार और हैदराबाद रियासत के 807 जवान मारे गए। वहीं, भारतीय सेना के 66 जवान भी वीरगति को प्राप्त हो गए।

अंत में निजाम और कट्टरपंथी मुस्लिमों के संगठन रजाकारों ने सरेंडर कर दिया। इसके बाद रिजवी को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया और मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन पर प्रतिबंध लगा दिया गया। लगभग एक दशक तक जेल में रखने के बाद कासिम रिजवी को इस शर्त पर रिहा कर दिया गया कि वह 48 घंटों में पाकिस्तान चला जाएगा। रिजवी को पाकिस्तान ने अपने शरण दे दी थी।

हैदराबाद मुक्ति आंदोलन को लेकर डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने अपने स्पष्ट विचार रखे थे। उन्होंने कहा था कि निजाम के अत्याचारी शासन में रहने वाले लोगों ने निजाम के खिलाफ के बड़े आंदोलन को शुरू किया। इसमें कई हीरो ने अपने बलिदान दिए। डॉक्टर अंबेडकर के अलावा, शेड्यूल कास्ट फेडरेशन ने भी निजाम का खुलकर विरोध किया था।

उस समय फेडरेशन के प्रदेश अध्यक्ष भाऊसाहेब मोरे ने दलित समुदाय को लेकर निजाम के खिलाफ पम्फलेट बाँटा था। उसमें कहा गया था, निजाम को उखाड़ फेंका जाना चाहिए और उसकी जगह एक लोकतांत्रिक सरकार बनाई जानी चाहिए। यह अंबेडकर के हर अनुयायी की नीति होनी चाहिए। दलितों को रजाकारों के साथ भी शामिल नहीं होना चाहिए।” यहाँ तक कि दलित नेता मोरे ने दलितों को मुस्लिम इलाके में भी जाने से मना किया था।

डॉक्टर अंबेडकर ने भी हैदराबाद के दलितों से अपील की थी। उन्होंने कहा था, “मैं एक ही बात कहना चाहता हूँ कि पाकिस्तान, निजाम और मुस्लिम लीग के मुस्लिमों पर विश्वास करना दलित समुदाय को नुकसान पहुँचाएगा। पाकिस्तान या हैदराबाद के दलितों को इस्लाम की ओर नहीं जाना चाहिए। उनका प्राथमिक उद्देश्य अपनी जीवन की सुरक्षा करना होनी चाहिए है।”

डॉक्टर अंबेडकर ने कहा कि हैदराबाद के दलित समुदाय को निजाम को स्वीकार नहीं करना चाहिए। डॉक्टर अंबेडकर ने आगे कहा था, “हमें भारत विरोधियों का साथ देकर अपने समुदाय के मुँह पर कालिख नहीं पोतना चाहिए।” डॉक्टर अंबेडकर के इस बयान का जिक्र धनंजय कीर ने अपनी पुस्तक ‘बायोग्राफी ऑफ डॉक्टर बाबासाहेब अंबेडकर’ में किया है।

निजाम के खिलाफ डॉक्टर अंबेडकर ने पहली रैली 30 दिसंबर 1938 को कन्नड़ जिले के मक्रणपुर में आयोजित की गई थी। औरंगाबाद की इसी रैली में भाऊसाहब मोरे ने डॉक्टर अंबेडकर के पहले ‘जय भीम’ का नारा दिया था। इस रैली ने हैदराबाद मुक्ति आंदोलन में बड़ी भूमिका निभाई थी।

दरअसल, निजाम दलितों पर जुल्म की सीमा पार कर चुका था। निजाम का शासन हिंदुओं के प्रति अत्याचार के कुख्यात हो चुका था और उसके शासन को लेकर लोगों को विद्रोह पनपने लगा था। इसके कारण निजाम ने शेड्यूल कास्ट फेडरेशन के कई नेताओं की हत्या करवा दी। इसके विरोध में दलित नेताओं के समर्थन में डॉक्टर भीमराव अंबेडकर भी आए।

दलितों पर अत्याचार और उनके धर्मांतरण से बाबा साहेब को ठेस पहुँची। निजाम के शासन के अंतर्गत आने वाले मराठवाड़ा में दलितों की हालत और भी बदतर थी। दलितों के साथ बड़े पैमाने पर भेदभाव होता था और उन्हें शिक्षा से भी वंचित रखा गया था। डॉक्टर अंबेडकर और सरदार पटेल के प्रयास मराठवाड़ा निजाम के चंगुल से मुक्त हो गया। इसके बाद वहाँ बड़े पैमाने पर स्कूल-कॉलेज खुले।

ये वही मराठवड़ा है जिसकी मुक्ति का विरोध असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM के नेता करते है। मराठवाड़ा मुक्ति दिवस पर AIMIM के सांसद तिरंगा फहराने के कार्यक्रम से भी अनुपस्थित रहे। यह वही AIMIM है, जो रजाकारों की MIM से संबंधित है और ओवैसी के पूर्वज इससे जुड़े थे। इस तरह दलितों से अंतर्मन से घृणा करने वाले राजनीति के लिए ‘जय भीम जय मीम’ की बात कर रहे हैं।


महाराष्ट्र : ‘मुस्लिम प्रेमिका और घरवालों ने जबरन खतना कर वसूले 11 लाख रूपए’: दलित युवक पर इस्लाम अपनाने का दबाव, AIMIM सांसद जलील पर भी आरोप

                                        दीपक सोनवणे और उनके साथी (फोटो साभार: सोशल मीडिया)
"Love Jehad" की शुरुआत 80 दशक में केरल से हुई थी, तब किसी भी पार्टी ने तुष्टिकरण के चलते इसे गंभीरता से नहीं लिया और जनता को 'गंगा-जमुना तहजीब' और संविधान की दुहाई देकर गुमराह किया जाता रहा है। जहाँ तक हिन्दू-मुस्लिम नारों की बात है, किसी में मुस्लिम ठेकेदारों से पूछने का साहस नहीं की हिन्दुओं को जातियों के नाम पर बाँटने से पहले बताओं क्या तुम एक हो, हिन्दुओं में कोई भी जाति हो एक ही मंदिर में जाते हैं और अंतिम संस्कार भी एक ही शमशान घाट पर होता है, जबकि मुस्लिम समाज में स्थिति एकदम विपरीत है। शिया हो, सुन्नी हो, बेरलवी, अहमदी, अथवा वहाबी आदि अनेकों जातियां है जो अपनी अपनी मस्जिदों नमाज पढ़ सकते हैं, शादी कर सकते हैं,और अपने अपने कब्रिस्तानों में मुर्दा दफना सकते हैं, किसी में इसके विरुद्ध जाने अथवा इस अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाने का साहस नहीं।  

नवंबर 18 को News18 पर अमिश देवगन के शो "आर पार" पर मौलानाओं का दोगलापन उस समय सामने जब शोएब जमई ने मुग़ल बाबर को हिन्दुस्थान का जीजा बताने पर चर्चा में शामिल सुभिहि  खान ने जवाब देते अपने पति का नाम लेकर कहा कि इस हिसाब से 'मेरे पति तुम्हारे जीजा है', तुरंत शो में शामिल तीनो तथाकथित मुसलमानो ने कहा 'हम तुम्हे मुसलमान ही नहीं मानते।' इस  मुद्दे पर बहस बहुत गरमा गयी। हिन्दू-मुस्लिम भाई-भाई की बात भी बेकार साबित। केवल इन्ही शब्दों ने उन मौलानाओं को बेनकाब भी कर दिया जो टीवी पर आकर चाशनी में डूबी बातें करते हैं, लेकिन टीवी से बाहर कहीं अधिक जहरीले हैं। हर देशप्रेमी हिन्दू-मुसलमान को ऐसे मौलानाओं से दूरी बनाकर रखनी चाहिए। सरकार को ऐसे दोगलों की गंभीरता से जाँच करवानी चाहिए। बातें और काम इनके हिसाब से होता रहे तो सेकुलरिज्म वरना फिरकापरस्ती तो है ही, क्यों दोगलों? हिन्दू से शादी कर सुभिहि क्यों मुसलमान नहीं? अब इसे तुम्हारा दोगलापन न कहा जाए तो क्या कहा जाए। 

टीवी पर चर्चाओं में ऐसे दोगले मौलानाओं को बेनकाब करने एक्स-मुस्लिमों को भी बुलाया जाए, जैसे News Nation अपने शो 'इस्लाम क्या कहता है' में बुलाते हैं। मौलाना या तो पसीना पोंछते नज़र आते हैं या चर्चा छोड़कर जाते देखे जाते हैं। 

जहाँ तक हिन्दू-मुस्लिम के बीच शादी की बात है, ऐसे अनेक किस्से हैं जहाँ शादी से पहले या बाद में धर्म परिवर्तन की बात ही नहीं हुई। केवल एक उदाहरण देता हूँ: जनाब राईस अहमद साहब का, जो सिनेमा घरों पर फिल्मों के परदे बनाते थे, हिन्दू लड़की से प्यार हो गया, अपनी प्रेमिका पत्नी का धर्म नहीं छुड़वाया, एक छत के नीचे नमाज भी हो रही है और पूजा भी, चार बच्चे हुए दो के नाम हिन्दू और दो के मुस्लिम। और मजे की बात, 1975/76 में बहुचर्चित फिल्म आयी "जय संतोषी माँ", उस फिल्म के परदे बनाने का ठेका उन्ही को मिला था। जिस सिनेमा हॉल पर यह फिल्म का प्रदर्शन हो रहा होता था, वहां सिनेमा घर के बाहर हार-फूल बिकते थे, लोग स्क्रीन पर हार-फूल ही नहीं, पैसे भी चढ़ाते थे। हर शो में हाल में लाइन मैन और सफाई कर्मचारियों को कम से कम 30 रूपए की कमाई होती थी। खैर, जनाब राईस साहब ने अपनी हिन्दू पत्नी के कहने पर एक बहुत ही खूबसूरत मंदिर बनाया जो एक होने की वजह से एक ही सिनेमा घर पर रखा जा सकता था। फिल्म वितरक ने माँगा नहीं दिया, पिताश्री एम बी एल निगम ने माँगा नहीं दिया स्पष्ट शब्दों में कहा यह मंदिर घर जाएगा, इसे अपनी पत्नी के कहने पर बनाया है। कई बार मेरे निवास स्थान पर भी आए। दरिया गंज में उनका स्टूडियो था। ये होता है प्रेम और जो आजकल चल रहा है इसे हिन्दुओं को अपने मकड़जाल में फ़ांस इस्लामीकरण करना। खैर, देखिये मौलानाओं का दोगलापन। वीडियो:

 

श्रद्धा वॉकर की हत्या (Shraddha Walker Murder Case) से पूरा देश सन्न है। इसी बीच शुक्रवार (18 नवंबर 2022) को एक ऐसा मामला सामने आया, जिसमें पीड़ित एक दलित लड़का है। मुस्लिम प्रेमिका होने के कारण इस युवक को तरह-तरह की प्रताड़ना दी जा रही है। इसमें उसकी प्रेमिका का भी हाथ है। इस मामले में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM के एक नेता का नाम भी सामने आया है।

दलित युवक दीपक सोनवणे महाराष्ट्र के संभाजीनगर में स्थित मराठवाड़ा प्रौद्योगिकी संस्थान (MIT) में पढ़ाई करता है। यहाँ उसकी एक मुस्लिम लड़की सना फरहीन शाहमीर शेख से दोस्ती हुई, जो बाद में प्रेम संबंधों में बदल गई। अब दीपक को सना के परिवार से लगातार प्रताड़ना मिल रही है और उससे जबरन वसूली की जा रही है। यहाँ तक कि उसका जबरन खतना भी कर दिया गया।

दीपक सोनवणे ने संभाजीनगर में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपना दर्द साझा किया। दीपक ने बताया कि उसकी मुस्लिम प्रेमिका के परिवार में इस्लामवादियों को इस मामले में हर कदम पर प्रभावशाली स्थानीय सांसद इम्तियाज जलील का लगातार समर्थन मिल रहा है। इम्तियाज जलील AIMIM का सांसद हैं।

दीपक सोनवणे ने अपनी गर्लफ्रेंड सना फरहीन शाहमीर शेख के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई है। पुलिस आयुक्त, संभाजीनगर को संबोधित शिकायत में शाहमीर शमशुद्दीन शेख, ख्वाजा सैय्यद, शबाना बेगम शेख, साजिया सदफ शाहमीर शेख, AIMIM के सांसद इम्तियाज जलील और उनके अंगरक्षकों के नाम हैं।

कॉलेज में शुरू हुआ लव अफेयर

दीपक सोनवणे ने संभाजीनगर के मराठवाड़ा प्रौद्योगिकी संस्थान से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है। सना उसकी सहपाठी थी। दोनों पहले दोस्त बने और फिर दोनों के बीच प्यार हो गया। दीपक सोनवणे ने अपनी शिकायत में कहा, “सना शेख और मैं एमआईटी कॉलेज में साल 2018 से हम सहपाठी थे। सना और मैं परिचित हो गए। उसके बाद हमारा यह प्रेम प्रसंग हुआ। सना ने मुझे शादी का लालच दिया और कहा, ‘मैं तुमसे शादी करना चाहता हूँ। तुम इस्लाम कबूल कर लो। नमाज पढ़ो, कुरान पढ़ो’।”
दीपक सोनवणे ने अपनी शिकायत में आगे लिखा, “मैंने उसे माता-पिता (अब्बू शाहमीर शमशुद्दीन शेख और अम्मी शबाना बेगम शेख) से यह बात कही। उन्होंने मुझे आश्वासन दिया कि वे अपनी बेटी को ठीक से समझाएँगे और मुझे चिंता नहीं करनी चाहिए।”

प्रताड़ना की हुई शुरुआत

दीपक सोनवणे ने बताया कि उन्हें किस तरह की यातनाओं से होकर गुजरना पड़ा। उन्होंने कहा, “मार्च 2021 में उसके अम्मी-अब्बू, चाचा और बहन ने मुझे गुलमंडी इलाके में मिलने के लिए बुलाया। जब मैं वहाँ गया तो उन्होंने मुझे अपनी बाइक वहीं खड़ी करने को कहा और कहा कि ‘हम सभी को कहीं बाहर जाने की जरूरत है। जैसे ही मैंने उन्हें मना किया, ख्वाजा सैय्यद और शाहमीर शेख मुझे जबरन अपने घर ले गए। वहां उन्होंने मुझे कमरे में बंद कर दिया।”
दीपक सोनवणे ने आगे बताया, “शाहमीर शेख और ख्वाजा सैय्यद ने मेरे कपड़े उतार दिए। शबाना बेगम और साजिया सदफ ने मेरे हाथ-पैर बाँधकर मेरे मुँह में कपड़ा डाल दिया। इसके बाद शाहमीर शेख ने मेरे शरीर पर पेशाब कर दिया। इसका वीडियो सना और शाहमीर शेख के मोबाइल पर शूट किया गया था। इसके बाद उन्होंने मुझे इस्लाम में धर्मांतरित करने का दबाव बनाने के लिए पीटना शुरू कर दिया।”

जबरन कराया खतना

दीपक सोनवणे ने आगे कहा, “उसके बाद सना और उसकी माँ एवं बहन मुझे सिटी चौक थाने के पीछे की गली में एक अस्पताल ले गए और कहा कि हम यहाँ तुम्हें मुस्लिम बनने के लिए लाए हैं। हम यहाँ तुम्हारा खतना करा रहे हैं। अगर आप यहाँ किसी से कुछ कहोगे तो हम तुम्हारा वीडियो वायरल कर देंगे और समाज में तुम्हें बदनाम करेंगे।”
दीपक ने बताया कि इस दौरान आरोपितों ने उसे और उसके परिवार को मारने की धमकी भी दी। दीपक ने आगे कहा, “हम तुम्हें और तुम्हारे परिवार को भी मार डालेंगे। उनकी बात सुनकर मैं बहुत डरा हुआ था, क्योंकि मेरी और मेरे परिवार की जान खतरे में थी। अगर मेरा वीडियो वायरल हुआ तो मैं बदनाम हो जाऊँगा।”
दीपक ने आगे बताया, “उन्होंने इसका फायदा उठाया और मेरा खतना कार दिया। इसके बाद मुझसे कहा कि तुम अब एक सच्चे मुसलमान हो। अगर तुमने किसी को बताया कि क्या हुआ है तो याद रखना, तुम्हें इसका पछतावा होगा। इसके बाद वे लोग मुझे वापस गुलमंडी ले आए। मैं वहाँ से अपने घर आया और फिर मैंने सना से दूर रहने का फैसला कर लिया।”

11 लाख रुपए भी वसूले गए

दीपक के खिलाफ प्रताड़ना यहीं नहीं रूका। उससे लगातार वसूली की जाती रही। उन्होंने अपनी शिकायत में कहा, “सना और उसकी माँ मेरे घर आए और पैसे की माँग करते हुए धमकी दी कि हम दीपक का वीडियो वायरल करेंगे। दीपक के खिलाफ गंभीर मामला दर्ज करेंगे और उसकी जिंदगी बर्बाद कर देंगे। मैंने उसे समय-समय पर 7 लाख रुपए नकद और 4 लाख रुपए ऑनलाइन दिए। मैंने कुल 11 लाख रुपए भेजे, लेकिन उन्होंने मुझसे 25 लाख रुपए की माँग की। इसके बाद मैंने उन्हें मना कर दिया, क्योंकि उस समय मेरे पास पैसे नहीं थे।”
उन्होंने आगे कहा, “तब सना ने मेरे खिलाफ 29-09-2021 को एमआईडीसी सिडको थाने में शिकायत दर्ज कराई। IPC की धारा 354 के तहत मामला दर्ज कराया है। मामला दर्ज करने के बाद सना ने मुझे फोन किया और कहा कि मैंने तुमसे कहा था। तुमने मेरी बात नहीं मानी। मेरे अम्मी-अब्बू तुम्हारे खिलाफ मामला दर्ज कराया है, लेकिन मैं सँभाल लूँगी। उसके बाद 19-12-2021 को मैं सना और उसके माता-पिता से जिला सत्र न्यायालय में मिला और उस समय उन्होंने कहा कि 25 लाख दो या इस्लाम स्वीकार करो, फिर हम केस वापस ले लेंगे।”

जाकिर नाइक का वीडियो दिखाया, जातिसूचक गालियाँ दीं

दीपक सोनवणे ने अपनी शिकायत में आगे कहा, “12-08-2022 को सना शाहमीर शेख और ख्वाजा सैय्यद ने मुझे क्लाउड कैंपस में आने के लिए मजबूर किया। वहाँ उन्होंने मुझे एक प्रोजेक्टर पर मुस्लिम धर्मगुरु जाकिर नाइक के वीडियो दिखाए और मुझे नमाज अदा करने के लिए मजबूर किया।”
दीपक ने कहा, “अगर मैं उनका विरोध करता तो वे मुझे पीटते और जातिसूचक गालियाँ देते। उन्होंने कहा कि तुम महार जाति के हो। महार जाति नीची जाति है। तुम लोग गंदगी खाने वाले लोग हो। तुम महार नहीं, बल्कि वेश्या समुदाय से हो। वे निचले स्तर पर जाकर मुझे जातिवादी अपमान किया।”

AIMIM सांसद जलील कर रहा मदद

संभाजीनगर मुस्लिम बहुल सीट है। AIMIM नेता इम्तियाज जलील इस सीट से लोकसभा सांसद हैं। मुस्लिम सांसद स्थानीय मुस्लिमों के प्रति नरम रुख अपनाने के लिए जाने जाते हैं। इस मामले में उनका नाम इस्लामवादियों के प्रमुख संरक्षक के तौर पर सामने आया है। दिलचस्प बात यह है कि जलील ने दलित जाति के लोगों के सहारे अपनी सीट जीती है, लेकिन अब उन पर एक दलित व्यक्ति को प्रताड़ित करने वाले इस्लामवादियों को बचाने का आरोप लगाया गया है।
दीपक सोनवणे ने अपनी शिकायत में आगे कहा है, “20-08-2022 को दोपहर 2.00 बजे नामित व्यक्तियों ने मुझे पैठण गेट के पास एक कार में अपने साथ बैठने के लिए मजबूर किया और मुझे सत्यविष्णु अस्पताल रोड पर ‘क्लाउड कैंपस’ के पास ले गए। रोजाबाग इलाके में सांसद इम्तियाज जलील का घर है। वहाँ सांसद इम्तियाज जलील की मौजूदगी में उन्होंने मुझे एक हॉल में बंद कर दिया।”
दीपक ने बताया, “उसके बाद उनके अंगरक्षकों ने मेरे साथ मारपीट की और नामजद लोगों ने रुपए छीन लिए। मेरी ओर से 1,50,000 नकद, एक लैपटॉप और एक प्लस कंपनी का मोबाइल फोन। मुझे वहां पीटा गया, उन्होंने मुझे जान से मारने की धमकी दी और पैसे की माँग की। इसके साथ ही मुझे जातिवादी गालियाँ दीं। यह सब पिछले दो साल से चल रहा है।”
दीपक ने बताया कि इन सबकी शिकायतें उन्होंने पुलिस से कीं। उन्होंने सीपी कार्यालय को कई शिकायतें भेजी, लेकिन किसी ने उनकी शिकायत को गंभीरता से नहीं लिया। दीपक सोनवणे और उनके साथियों ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कहा, “क्या सीपी ऑफिस से ही कोई लिंक है? यह किसके इशारे पर किया गया?”

राजस्थान : प्रदेश में दलितों पर अमानवीयता अब सहन नहीं होती : पानाचंद मेघवाल, कांग्रेस विधायक

राजस्थान की कांग्रेसी गहलोत सरकार में दलितों पर अत्याचार का मुद्दा गर्मा गया है। जालोर जिले में स्कूल टीचर की निर्ममता से की पिटाई से हुई नौ साल के दलित मासूम छात्र की ‘हत्या’ का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। सत्ताधारी पार्टी के बारां के अटरू से विधायक पानाचंद मेघवाल ने दलितों पर हो रहे लगातार अत्याचार और मुख्यमंत्री अशोक गहलोत की इस पर चुप्पी से आहत होकर सीएम को अपना इस्तीफा ही भेज दिया है। अपनी सरकार को कठघरे में खड़ा करते हुए उन्होंने अपने पत्र में साफ लिखा है कि आजादी के 75 साल बाद भी राजस्थान में दलित और वंचित वर्ग पर लगातार अत्याचार हो रहे हैं। अपने ही विधायक के आरोपों के बाद कांग्रेस में खलबली है। दूसरी ओर बीजेपी प्रदेश महामंत्री व रामगंजमंडी से विधायक मदन दिलावर ने वीडियो बयान जारी कर प्रदेश की कांग्रेस सरकार पर निशाना साधा है।

नौ साल के दलित छात्र की बेहद निर्ममता के पिटाई, बीजेपी ने कहा-यह मौत नहीं हत्या है
राजस्थान सरकार द्वारा लापरवाह रवैया अख्तियार करने के कारण सरकारी स्कूलों में आए दिन बच्चों के साथ मारपीट की घटनाएं सामने आती रही हैं। कई बार मासूम बच्चों की छोटी सी बात पर इतनी पिटाई की जाती है कि उनकी हड्डी तक टूट जाती है। इस बार तो जालौर में अत्याचार की सारी हदें ही पार कर दी गईं। जालोर जिले में स्कूल टीचर की निर्ममता से की पिटाई से नौ साल के दलित मासूम छात्र की मौत ही हो गई। बीजेपी विधायक मदन दिलावर ने कहा एक दलित बच्चे की पीट-पीटकर हत्या कर दी गई और यह सरकार संवेदनहीन और अनुसूचित जाति के लोगों की दुश्मन बनी हुई है।

आज राजस्थान में दलित समाज जितने अत्याचार झेल रहा है उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता
राजस्थान में दलितों पर अत्याचार का यह कोई पहला मामला नहीं है। दलित महिलाओं के साथ दुष्कर्म, दलितों से मारपीट और हत्या के कई मामले प्रदेश के थाने में दर्ज हैं। यहां तक कि कई बार तो दलित समाज के दूल्हों को घोड़ी तक पर नहीं बैठने दिया जाता है। दलितों के खिलाफ प्रदेश के इसी सिस्टम को कटघरे में खड़ा करते हुए दलित कांग्रेस विधायक पानाचंद मेघवाल ने यह लिखित इस्तीफा सीएम को भेजा है। पानाचंद ने कहना है कि ऐसी घटनाओं से मेरा मन काफी आहत है। मेरा समाज आज जिस प्रकार की यातनाएं झेल रहा है। उसका दर्द शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता।

अत्याचार से आहत होकर अंतरआत्मा की आवाज सुनकर दे रहा हूं इस्तीफा-मेघवाल
जालोर में दलित छात्र के साथ मारपीट के बाद उसकी मौत की घटना से आहत हुए दलित विधायक पानाचंद मेघवाल ने कहा कि जब हम हमारे समाज के अधिकारों की रक्षा करने और उन्हें न्याय दिलवाने में नाकाम होने लगे तो हमें पद पर रहने का कोई अधिकार नहीं है। एमएलए ने लिखा’ ‘मैं अपनी अंतरआत्मा की आवाज पर विधायक पद से इस्तीफा देता हूं।’ उन्होंने सीएम से कहा, ‘विधायक पद से मेरा इस्तीफा स्वीकार करें, ताकि मैं बिना पद के ही समाज के वंचित और शोषित वर्ग की सेवा कर सकूं।’

दलितों पर अत्याचार के मामलों में जानबूझकर FR लगा दी जाती है
विधायक पानाचंद मेघवाल ने त्यागपत्र लिखकर अपनी ही पार्टी की सरकार पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एमएलए ने अपने त्यागपत्र में यह लिखते हुए सीएम को चेताया कि दलितों पर अत्याचार के ज्यादातर मामलों में FR लगा दी जाती है। कई बार ऐसे मामलों को जब मैंने विधानसभा में उठाए, उसके बावजूद भी पुलिस प्रशासन हरकत में नहीं आया। बता दें कि मुख्यमंत्री को त्यागपत्र भेजने वाले बारां-अटरू विधानसभा के विधायक पानाचंद मेघवाल खनन मंत्री प्रमोद जैन भाया गुट से आते हैं।

गहलोत सरकार ने राहत देने के नाम पर पीड़ित परिवार के साथ घिनौना मजाक किया
जालौर के सुराणा गांव टीचर की पिटाई से दलित बच्चे की मौत का मामला तूल पकड़ता जा रहा है। बीजेपी प्रदेश महामंत्री व रामगंजमंडी से विधायक मदन दिलावर ने वीडियो बयान जारी कर प्रदेश की कांग्रेस सरकार पर निशाना साधा है। दिलावर ने कहा सुराणा गांव में एक प्राइवेट स्कूल के अध्यापक ने एक छोटे बच्चे की पीट-पीटकर हत्या कर दी और यह सरकार संवेदनहीन है। यानी सरकार अनुसूचित जाति के लोगों की दुश्मन बनी हुई है। दिलावर ने कहा कि सरकार ने राहत देने के नाम पर पीड़ित परिवार के साथ घिनौना मजाक किया है। 8 लाख 25 हजार तो इंट्रो सिटी में किसी का मर्डर हो जाता है, तो मिलता ही है। 5 लाख चिरंजीव योजना में मिलता है। 13 लाख 25 हजार तो वैसे भी होते हैं। प्रदेश सरकार ने क्या दिया? झुनझुना पकड़ा दिया गरीब परिवार को जानकारी नहीं इसलिए बेवकूफ बना रहे हैं।

कांग्रेस दलितों की दुश्मन, महिलाओं से रेप होते हैं तो ये बलात्कारियों के साथ हो जाते हैं- दिलावर
सरकार ने नियमों से हटकर कोई भी राहत नहीं दी। इसका सीधा-सीधा अर्थ है यदि कोई बड़े आदमी का बेटा मरता है, या किसी हस्ती के साथ ये घटना होती तो शायद 25-50 लाख तक दे देते लेकिन वह गरीब का बेटा, अनुसूचित जाति का बेटा है। उसकी हत्या हुई है इसलिए सरकार ने झुनझुना पकड़ा दिया। उन्होंने कहा कि इसीलिए अनुसूचित जाति के लोगों से कहना चाहता हूं ये ऊपर से लेकर नीचे तक कांग्रेस हमारी दुश्मन है। और हमारी हत्या करवाने के बावजूद भी हमारा मजाक बनाती है। हमको नासमझ समझती है। हम सब जानते हैं। अनुसूचित जाति की महिलाओं व बच्चों के साथ रेप होते हैं, तो ये उन बलात्कारियों के साथ खड़े हो जाते हैं।

गहलोत सरकार में कहीं घोड़ी पर चढ़ने तो कहीं मूंछ रखने पर दलितों पर घोर यातनाएं
अपने त्याग पत्र में विधायक पानाचंद मेघवाल ने लिखा कि प्रदेश में दलित और वंचितों को मटकी से पानी पीने के नाम पर तो कहीं घोड़ी पर चढ़ने और मूंछ रखने पर घोर यातनाएं देकर मौत के घाट उतारा जा रहा है। जांच के नाम पर फाइलों को इधर से उधर घुमाकर न्यायिक प्रक्रिया को अटकाया जा रहा है। पिछले कुछ सालों से दलितों पर अत्याचार की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। ऐसा प्रतीत हो रहा है कि बाबा साहेब डॉ भीमराव अम्बेडकर ने संविधान में दलितों और वंचितों के लिए जिस समानता के अधिकार का प्रावधान किया था, उसकी रक्षा करने वाला कोई नहीं है।