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‘अंबेडकर अंग्रेजों के एजेंट थे’: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट के वकील अनिल मिश्रा की टिप्पणी पर बवाल, राष्ट्रद्रोह समेत कई धाराओं में FIR; खुद गिरफ्तारी देने पहुँचे SP ऑफिस

डॉ भीमराव अंबेडकर पर विवादित टिप्पणी से बवाल, बसपा और अहीरवार समाज सड़कों पर, एडवोकेट अनिल मिश्रा पर राष्ट्रद्रोह समेत गंभीर धाराओं में FIR दर्ज (साभार: NDTV)
मध्य प्रदेश के ग्वालियर के अशोकनगर में डॉ भीमराव अंबेडकर के खिलाफ कथित अभद्र टिप्पणी को लेकर विरोध बढ़ गया है। मंगलवार (7 अक्टूबर 2025) को बहुजन समाज पार्टी (बसपा) और अहिरवार समाज संगठन ने अलग-अलग समय पर कलेक्ट्रेट पहुँचकर अपना विरोध दर्ज कराया और ज्ञापन सौंपे हैं।

दोनों संगठनों ने एडवोकेट अनिल मिश्रा के खिलाफ गंभीर धाराओं में FIR दर्ज कर कठोर कार्रवाई की माँग की। बसपा के ज्ञापन में कहा गया कि अनिल मिश्रा ने ‘आचरण ग्वालियर पर लाइव’ नामक सोशल मीडिया कार्यक्रम में डॉ अंबेडकर के बारे में निंदनीय, अमर्यादित और भड़काऊ टिप्पणी की। बसपा ने इसे संविधान प्रेमियों की आस्था पर आघात और राष्ट्र के खिलाफ साजिश बताया।

पार्टी ने कहा कि डॉ अंबेडकर न केवल भारत रत्न और संविधान निर्माता हैं, बल्कि करोड़ों वंचितों के मसीहा भी हैं। इसलिए उनके खिलाफ की गई टिप्पणी संविधान और लोकतंत्र दोनों का अपमान है। बसपा ने माँग की कि अनिल मिश्रा पर राष्ट्रद्रोह और धार्मिक वैमनस्य फैलाने जैसी धाराओं में मामला दर्ज कर कड़ी कार्रवाई की जाए।

वहीं, अहिरवार समाज संघ ने भी राज्यपाल के नाम ज्ञापन सौंपा। संगठन ने कहा कि डॉ अंबेडकर ने अपना जीवन समता, न्याय और सामाजिक समरसता के लिए समर्पित किया था  और अनिल मिश्रा की टिप्पणी अपमानजनक होने के साथ-साथ समाज में वैमनस्य फैलाने का प्रयास है।

दोनों संगठनों ने प्रशासन से अपील की कि वह संविधान और डॉ अंबेडकर के सम्मान की रक्षा सुनिश्चित करे और ऐसी टिप्पणी करने वालों के खिलाफ तुरंत और सख्त कार्रवाई करे।

क्या है पूरा मामला?

ग्वालियर हाई कोर्ट बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष अनिल मिश्रा पर डॉ भीमराव अंबेडकर के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी और फोटो शेयर करने का आरोप है। दरअसल रविवार (5 अक्टूबर 2025) की सुबह क्राइम ब्रांच की सोशल मीडिया मॉनिटरिंग टीम को एक व्हाट्सएप ग्रुप में डॉ अंबेडकर से जुड़ी विवादित वीडियो और फोटो मिली।

जाँच में पता चला कि यह पोस्ट अनिल मिश्रा के मोबाइल नंबर से अपलोड की गई थी। वीडियो में अंबेडकर के प्रति अपमानजनक शब्दों का प्रयोग किया गया था और उनके फोटो में छेड़छाड़ की गई थी। पोस्ट में उन्होंने डॉ भीमराव अंबेडकर पर तीखा हमला किया और लिखा, “अंबेडकर अंग्रेजों के एजेंट थे उनका बनाया संविधान देश के लिए घातक है, इसे जलाना चाहिए।” यह पोस्ट कुछ ही घंटों में वायरल हो गई।

पहले भी मिश्रा कई बार विवादित बयान दे चुके हैं, लेकिन इस बार मामला संविधान निर्माता पर था, इसलिए मामला गंभीर हो गया। भीम आर्मी और अन्य दलित संगठनों ने चेतावनी दी कि अगर पुलिस ने कार्रवाई नहीं की, तो वे सड़कों पर उतरेंगे। BSP और अहिरवार समाज संगठन ने कलेक्टर को ज्ञापन देकर मिश्रा के खिलाफ सख्त कार्रवाई की माँग की।

दर्ज हुई FIR और एडवोकेट मिश्रा ने दी सफाई

6 अक्टूबर 2025 की शाम ग्वालियर क्राइम ब्रांच ने कई शिकायतों के आधार पर मिश्रा के खिलाफ FIR दर्ज की। उन पर IPC की धारा 153A (समुदायों में नफरत फैलाना), 295A (धार्मिक भावनाएँ आहत करना), 505(2) (शांति भंग करने वाले बयान) और IT एक्ट की धारा 66A के तहत केस दर्ज किया गया।

FIR में कहा गया कि मिश्रा की पोस्ट अंबेडकर की छवि खराब करने और समाज में तनाव फैलाने वाली है। पुलिस ने उन्हें नोटिस जारी कर अपना पक्ष बताने को कहा। लेकिन मिश्रा ने खुद ही सामने आकर बयान दिया कि वे बेगुनाह हैं। उन्होंने कहा, “मैंने कोई गलत बात नहीं कही, मैं सिर्फ इतिहास की सच्चाई बता रहा था।” उन्होंने सवाल उठाया, “हिंदू देवी-देवताओं पर टिप्पणियाँ करने वालों पर पुलिस चुप क्यों है?”

7 अक्टूबर 2025 की सुबह असली ड्रामा शुरू हुआ। अनिल मिश्रा अपने समर्थक वकीलों और ‘रक्षक मोर्चा’ के सदस्यों के साथ ग्वालियर SP ऑफिस पहुँचे। हाथों में तख्तियाँ लेकर नारे लगाए, “मुझे गिरफ्तार करो, मैं खुद आ गया हूँ।” मीडिया से बात करते हुए उन्होंने कहा, “मैं अंबेडकर के विरोध में रहूँगा, ये विदेशी जातंकवादी नहीं सुधरेंगे।”

SP ऑफिस में हंगामा मच गया। समर्थक नारे लगाने लगे ‘अनिल भाई को छोड़ो, नहीं तो हाईकोर्ट बंद’ लेकिन SP प्रतीक ठाकुर ने साफ कहा कि अभी जाँच चल रही है और गिरफ्तारी का समय नहीं आया। उन्होंने मिश्रा को फिर से नोटिस थमाया और पूछताछ के लिए थाने बुलाया। मिश्रा अपने समर्थकों के साथ नारे लगाते हुए लौटे, “अगर जेल जाना है तो जेल जाएँगे।”

परशुराम सेना ने दी विरोधियों को चुनौती

एक तरफ जहाँ भीम आर्मी, आजाद समाज पार्टी और कई एससी, एसटी, ओबीसी संगठनों ने मिश्रा के बयान का विरोध किया है। वहीं इसी बीच, भिंड जिले की परशुराम सेना ने अनिल मिश्रा के समर्थन में खुलकर मैदान में उतरने की घोषणा की है।

सेना के जिला अध्यक्ष देवेश शर्मा ने कहा, “जो लोग जूते की माला पहनाने जैसी बातें कर रहे हैं, उनमें दम है तो 15 अक्टूबर 2025 को ग्वालियर आकर दिखाएँ।” उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि परशुराम सेना वहाँ बड़ी संख्या में मौजूद रहेगी और किसी भी तरह की बदसलूकी का जवाब दिया जाएगा।

शर्मा ने कहा कि सवर्ण समाज शांत है, लेकिन अगर मर्यादा लांघी गई तो जवाब देना भी जानता है। विवाद बढ़ने के बाद प्रशासन सतर्क हो गया है। पुलिस ने सोशल मीडिया पर निगरानी बढ़ा दी है और दोनों पक्षों से शांति बनाए रखने की अपील की है।

अम्बेडकर विवाद को भुनाने में अरविन्द केजरीवाल, दिल्ली चुनाव से पहले किया ‘अम्बेडकर सम्मान स्कॉलरशिप योजना’ का ऐलान; केंद्र सरकार ऐसी ही योजनाएँ पहले ही चला रही है

डॉ भीमराव अम्बेडकर को लेकर चल रहे राजनीतिक बवाल का फायदा उठाने का प्रयास आम आदमी पार्टी (AAP) ने किया है। भाजपा और कांग्रेस के बीच डॉ अम्बेडकर के सम्मान को लेकर जारी बहस के बीच केजरीवाल ने उनके नाम पर एक योजना चालू करने का ऐलान किया है। यह योजना दलित छात्रों के लिए लाई गई है।

शनिवार (21 दिसम्बर, 2024) को दिल्ली में अरविन्द केजरीवाल ने इस योजना की जानकारी दी। केजरीवाल यहाँ ‘डॉक्टर अंबेडकर सम्मान स्कॉलरशिप’ का ऐलान किया, जिसका फायदा दलित बच्चों को दिया जाएगा। केजरीवाल ने कहा है कि यह योजना उन दलित बच्चों को फायदा देगी जो विदेश जाकर पढ़ना चाहते हैं। उन बच्चों को दिल्ली सरकार स्कॉलरशिप देगी।

केजरीवाल ने कहा कि विदेशों में दलित बच्चों की पढ़ाई के साथ ही उनके आने-जाने का भी खर्च भी दिल्ली सरकार उठाएगी। यह योजना उन बच्चों पर भी लागू होगी, जिनके माता-पिता सरकारी सेवा में हैं। हालाँकि, केजरीवाल ने यह नहीं बताया कि यह योजना कब से चालू होगी और इसका फायदा कैसे लिया जा सकेगा।

केजरीवाल ने यह ऐलान ऐसे समय में किया है जब भाजपा डॉ अम्बेडकर के अपमान को लेकर कांग्रेस पर हमलावर है और इतिहास के पन्नों से लगातार चौंकाने वाली जानकारियाँ सामने रख रही है। वहीं कांग्रेस गृह मंत्री अमित शाह पर डॉ अम्बेडकर का अपमान करने का आरोप लगा रही है। तमाम हैंडल्स ने उनका एक आधा-अधूरा क्लिप भी वायरल किया है।

केजरीवाल का यह ऐलान दिल्ली में दलित वोटरों में दायरा बढ़ाने और आगामी विधानसभा चुनाव में फायदा लेने के कदम के तौर पर देखा जा रहा है। अधिकांश शहरी जनसंख्या वाली दिल्ली में लगभग 20% वोटर दलित हैं और वह विधानसभा चुनाव में बड़ा रोल निभाते हैं। AAP को इससे पहले विधानसभा चुनावों में दलितों का अच्छा ख़ासा वोट मिला है।

बीते कुछ समय में राज कुमार आनंद जैसे दलित चेहरों ने AAP छोड़ी है। अब केजरीवाल फिर से यह दिखाना चाहते हैं कि वह दिल्ली में दलितों के हितैषी हैं और उनका वोट बटोरना चाहते हैं। राज कुमार आनंद ने इस्तीफ़ा देने के समय दिल्ली सरकार को दलित विरोधी करार दिया था। यह योजना आगामी चुनावों में कितना असर डालेगी, यह परिणाम देखकर पता चलेगा।

जिस तरह की योजना का ऐलान केजरीवाल ने किया है, केंद्र सरकार ऐसी ही योजनाएँ पहले ही चलाती है। इसके तहत पिछले कुछ वर्षों में सैकड़ों दलित छात्र विदेश पढ़ने जा चुके हैं।

जब नेहरू ने डॉ. आंबेडकर को उनके ही पीए से हरवा दिया था चुनाव! कांग्रेस ने हर मोड़ पर बाबा साहेब का करती रही है अपमान; दलित समर्पित पार्टियां क्यों नहीं कांग्रेस से पूछती?


कांग्रेस पार्टी दलित समुदाय के समर्थन के लिए 9 अप्रैल 2018 को उपवास पर बैठी। खुद राहुल गांधी ने भी दो घंटे का सांकेतिक अनशन किया। जाहिर है राहुल गांधी इस बहाने राहुल गांधी खुद को दलितों की चिंता करने वाला स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं। कांग्रेस पार्टी एक राजनैतिक दल है और उसे ऐसा करने का पूरा हक भी है, परन्तु दलितों को ये नहीं भूलना चाहिए कि कांग्रेस पार्टी ने हमेशा दलितों को दबाकर ही नहीं रखा बल्कि आजादी के छह दशक तक उनका दमन किया है, दबाकर रखा है।

अमित शाह के जिस बयान पर कांग्रेस कहर बड़पा रही है और समस्त INDI गठबंधन भी इसके होने दुष्परिणामों को समझे बिना एक गुलाम की तरह पिछलग्गू बने हुए हैं। वीर सावरकर को जिस तरह ब्रिटिश दलाल कहकर अपमानित किया जाता है, ठीक उसी तरह नेहरू ने आंबेडकर को भी अपमानित किया था। समस्त महाराष्ट्रियनों को कांग्रेस को सावरकर द्वारा ब्रिटिश सरकार से माफीनामा मांगने की मांग करनी चाहिए। लेकिन समस्त महाराष्ट्र इस गंभीर आरोप पर खामोश बैठा है। 

हकीकत यह है कि जिस किसी ने भी नेहरू से लेकर वर्तमान कांग्रेस तक कांग्रेस की नीतियों का विरोध किया, कांग्रेस के इकोसिस्टम ने मुस्लिम विरोधी और जनविरोधी कहकर बदनाम किया। वीर सावरकर, डॉ भीमराव आंबेडकर, तत्कालीन भारतीय जनसंघ वर्तमान भारतीय जनता पार्टी और आरएसएस आदि इसके ज्वलंत उदाहरण है।     

दरअसल ये वही कांग्रेस पार्टी है जिस पार्टी ने सोनिया गाँधी को अध्यक्ष बनाने के लिए परिवार गुलामों ने दलित नेता सीताराम केसरी को पार्टी ऑफिस से बाहर फेंक दिया था। इस दौरान उनकी धोती भी खुल गयी थी। वर्तमान अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की केसरी से ज्यादा दुर्गति हो रही है, जिसे एक गुलाम की तरह बर्दास्त कर रहे हैं। यानि अपनी मर्जी से जो अध्यक्ष कोई निर्णय न ले सके ऐसे अध्यक्ष से क्या फायदा? कांग्रेस ने कभी किसी दलित समुदाय को प्रधानमंत्री पद के लायक समझा है। ये वही कांग्रेस पार्टी है जिसने जवाहर लाल नेहरू के सामने बाबा साहेब आंबेडकर को छोटा दिखाने की हर कोशिश की। ये वही कांग्रेस पार्टी है जिसने जगजीवन राम को योग्यता के बावजूद प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया। ये वही कांग्रेस पार्टी है जिसमें कोई दलित आज तक अध्यक्ष नहीं बना है।

नेहरू ने धारा 370 पर नहीं मानी बाबा साहेब की बात
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 370 जिसमें कश्मीर को कई विशेष अधिकार प्राप्त हैं उनके खिलाफ बाबा साहेब ने काफी मुखर होकर अपने विचार रखे थे। हालांकि पंडित नेहरू ने बाबा साहब की एक नहीं चलने दी और देश पर धारा 370 जबरन थोप दिया। बाबा साहेब के विचारों को इस तरह से खारिज कर कांग्रेस ने देश के नाम एक ऐसी समस्या कर दी जो किसी भी हालत में नहीं होनी चाहिए थी। गौरतलब है कि जिस दिन यह अनुच्छेद बहस के लिए आया उस दिन बाबा साहब ने इस बहस में हिस्सा नहीं लिया ना ही उन्होंने इस अनुच्छेद से संबंधित किसी भी सवाल का जवाब दिया।

बाबा साहेब को दलितों के दायरे में समेटने की कोशिश
बाबा साहब आंबेडकर युग पुरुष थे, दूर द्रष्टा थे, लेकिन कांग्रेस पार्टी ने हमेशा उन्हें दलित नेता कहकर एक दायरे में समेटने की कोशिश की। कांग्रेस पार्टी ने लगातार बाबा साहेब को अपमानित करने का भी काम किया है। कांग्रेस की ये कोशिश रही है कि उनका कद किसी नेहरू-गांधी परिवार के समकक्ष भी खड़ा नहीं हो पाए। बाबा साहेब को भारत रत्न नहीं दिया जाना कांग्रेस की इसी कुत्सित सोच का नतीजा थी।

बाबा साहेब के देहांत के 34 वर्षों बाद मिला भारत रत्न
बाबा साहेब भीमराव रामजी का देहांत 1956 में ही हो गया था, लेकिन तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने बाबा साहेब को भारत रत्न देने से इनकार कर दिया था। फिर इंदिरा गांधी ने भी इन्हें भारत रत्न नहीं दिया। राजीव गांधी ने भी बाबा साहेब को उनका वाजिब सम्मान नहीं दिया। गौरतलब है कि भारत रत्न दिए जाने की बार-बार उठने वाली मांग को भी कांग्रेस पार्टी लगातार खारिज करती रही। हालांकि 1990 में भारतीय जनता पार्टी द्वारा समर्थित राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार ने सुब्रमण्यम स्वामी की पहल पर बाबा साहेब को भारत रत्न से सम्मानित किया।

बाबा साहेब का नहीं बनाया कोई राष्ट्रीय स्मारक

कांग्रेस ने बाबा साहेब की विद्वता और अस्मिता को हमेशा नीचा दिखाने का काम किया है। पंडित नेहरू तो विशेष तौर पर डॉ आंबेडकर को अपना प्रतिद्वंद्वी मानते थे। यही कारण था कि कांग्रेस ने बाबा साहेब के देहांत के बाद भी कोई राष्ट्रीय स्मारक नहीं बनने दिया। दूसरी ओर भाजपा के शासन काल में बाबा साहेब आंबेडकर को उचित सम्मान दिया गया। हालांकि भाजपा की सरकार ने उनके जन्म स्थान महू में बाबा साहेब का राष्ट्रीय स्मारक बनवाया। इसके साथ ही नरेन्द्र मोदी देश के पहले प्रधानमंत्री बने जिन्होंने महू जाकर बाबा साहेब को श्रद्धांजलि दी।

बाबा साहेब को कांग्रेस ने दो बार चुनाव हरवाया
कांग्रेस नहीं चाहती थी कि वे दलितों के नेतृत्वकर्ता के तौर पर प्रचारित हो। यही कारण था कि कांग्रेस ने उन्हें दो बार लोकसभा चुनावों में हरवाने की साजिश रची थी।  गौरतलब है कि बाबा साहेब ने आजादी के बाद 1952 में हुए पहले आम चुनाव में अनुसूचित जाति संघ के टिकट पर उत्तरी मुंबई से चुनाव लड़ा था, लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। उन्हें कांग्रेस पार्टी के उम्मीदवार नारायण काजोलोलर ने हराया था। 1954 में भंडारा में हुए लोकसभा उप चुनाव एक बार फिर अम्बेडकर लोकसभा का चुनाव लड़े, लेकिन इस बार भी अम्बेडकर की बुरी तरह हार हुई।

संसद कक्ष में नहीं लगने दी बाबा साहेब की तस्वीर
कांग्रेस का दलित विरोधी चरित्र हमेशा उजागर होता रहा है। विशेषकर बाबा साहेब का अपमान करने को लेकर कांग्रेस पार्टी कुछ अधिक ही उत्सुक रहती थी। आप खुद सोच सकते हैं जिस व्यक्ति को संविधान निर्माता कहा जाता है उन्हीं की कोई तस्वीर संसद के केंद्रीय कक्ष में नहीं थी। कांग्रेस ने दीवार पर जगह नहीं होने का हवाला देकर तस्वीर लगाने की मांग को हमेशा खारिज किया। 1989 में जब भारतीय जनता पार्टी की समर्थित राष्ट्रीय मोर्चा सरकार बनी तो पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी ने पहल कर संसद के केंद्रीय कक्ष में बाबा साहेब का चित्र शामिल कराया।

डॉ. आंबेडकर अपने ही पीए से क्यों हार गए थे चुनाव?

संविधान लागू होने के बाद साल 1951-1952 में देश में पहला लोकसभा चुनाव हुआ इसमें बाबा साहब बुरी तरह से हार गए थे. बाबा साहब को उन्हीं के पीए नारायण काजरोलकर ने हराया था और उनकी यह चुनावी हार लंबे समय तक चर्चा में रही थी. एक बार फिर डॉ. आंबेडकर बहस का विषय बन गए हैं। आइए इसी बहाने जान लेते हैं बाबा साहब की चुनावी हार का वह किस्सा

मतभेद के कारण कांग्रेस से दे दिया था इस्तीफा

दरअसल, आजादी के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू की अगुवाई में देश में बनी पहली अंतरिम सरकार में बाबा साहब विधि और न्यायमंत्री बनाए गए थे उनके नेतृत्व में बना संविधान लागू हो चुका है हालांकि, बाद में कई मुद्दों पर उनका कांग्रेस से नीतिगत मतभेद हो गया इसके कारण उन्होंने 27 सितंबर 1951 को पंडित जवाहरलाल नेहरू को एक पत्र लिखकर मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया इसके बाद साल 1942 में खुद के गठित शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन यानी अनुसूचित जाति संघ को नए सिरे से मजबूत करने में लग गए इस संगठन को स्वतंत्रता संघर्ष की व्यस्तताओं के कारण वह ठीक से खड़ा नहीं कर पाए थे

आम चुनाव में खुद के बनाए संगठन से मैदान में उतरे

इसी बीच, आम चुनाव की घोषणा हो गई जिसके लिए मतदान 1951 से लेकर 1952 तक हुए. डॉ. भीमराव आंबेडकर ने पहले आम चुनाव में शेड्यूल्ड कास्ट्स फेडरेशन के बैनर के तले लोकसभा चुनाव में 35 प्रत्याशी खड़े किए इसमें उनके दो ही प्रत्याशी जीत हासिल कर सके इस चुनाव में डॉ. भीमराव आंबेडकर खुद भी लड़े पर जब नतीजे आए तो काफी चौंकाने वाले थे वह चुनाव हार गए थे

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यह वह दौर था जब डॉ. भीमराव आंबेडकर की पहचान देश भर में अनुसूचित जातियों के लिए काम करने वाले कद्दावर नेता के रूप में थी डॉक्टर भीमराव आंबेडकर ने उत्तरी मुंबई सीट से चुनाव लड़ने का मन बनाया तो कांग्रेस ने उनके मुकाबले में उन्हीं के पीए नारायण एस काजरोलकर को मैदान में उतार दिया था वह भी पिछड़े वर्ग से थे. इसके अलावा इस सीट से कम्युनिस्ट पार्टी और हिंदू महासभा ने भी अपना-अपना प्रत्याशी खड़ा किया था

दूध का कारोबार करने वाले काजरोलकर राजनीति में नौसिखिए थे

नारायण काजरोलकर दूध का कारोबार करते थे और राजनीति में वह नौसिखिए नेता थे इसके बावजूद पंडित जवाहर लाल नेहरू की लहर पहले चुनाव में इतनी तगड़ी थी कि नारायण काजरोलकर जीत गए थे इस चुनाव में डॉ. भीमराव आंबेडकर को 1,23,576 वोट मिले थे और वह चौथे स्थान पर थे वहीं, 1,37,950 वोट पाकर काजरोलकर चुनाव जीते थे इसके बाद साल 1954 में बंडारा लोकसभा के लिए उप चुनाव हुआ था इसमें भी डॉ. भीमराव आबंडेकर खड़े हुए पर एक बार फिर उन्हें कांग्रेस से हार का समाना करना पड़ा था

डॉ. आंबेडकर को करना पड़ा था हार का सामना

वास्तव में पहले आम चुनाव के वक्त देश में कांग्रेस की जबरदस्त लहर थी. देश नया-नया आजाद हुआ था और पंडित जवाहरलाल नेहरू जनता की नजरों में हीरो थे कहा जाता है कि तब अगर पंडित नेहरू के नाम पर बिजली के खंभे को भी चुनाव में खड़ा कर दिया जाता तो वह भी जीत जाता ऐसा ही कुछ वास्तव में हुआ जब पहले लोकसभा चुनाव के लिए मतगणना के बाद नतीजा आया कांग्रेस को बड़ी आसानी से स्पष्ट बहुमत हासिल हुआ

‘हैदराबाद में 1.4 करोड़ हिंदुओं की हड्डियाँ मिलेंगी’: रजाकारों की धमकी पर डॉ अंबेडकर ने दलितों को कहा- इस्लाम की ओर नहीं जाना, मुस्लिम लीग के मुस्लिमों पर विश्वास नुकसानदेह

निजाम उस्मान अली और डॉक्टर अंबेडकर (साभार: न्यूज18/एबीपी)
आज 17 सितंबर है यानी ‘हैदराबाद मुक्ति दिवस’। आज ही के दिन 1948 में निजाम के चंगुल से निकालकर हैदराबाद का भारत में विलय किया गया था। केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह हैदराबाद में स्थित परेड ग्राउंड में गए और निजाम की सेना और रजाकारों (निजाम के शासन के सशस्त्र समर्थक) के खिलाफ लड़ने वाले सैनिकों को श्रद्धांजलि दी।

15 अगस्त 1947 में देश को आजादी मिलने के बाद भी निजाम हैदराबाद को एक स्वतंत्र मुल्क बनाने की कोशिश में था। आखिरकार हैदराबाद के निजाम हैदराबाद के निजाम मीर उस्मान अली खान ने 3 जून 1947 को फरमान जारी कर हैदराबाद को आजाद मुल्क घोषित कर दिया था।

जब हैदराबाद को भारत में मिलाने की बातचीत चल रही थी, तब हैदराबाद के निजाम मीर उस्मान अली खान ने भारत में विलय के आग्रह को खारिज कर दिया था। उसे रजाकारों के नेता कासिम रिजवी ने भरोसा दिया था कि हैदराबाद को मिलाने के लिए भारत किसी तरह की सैनिक कार्रवाई करता है तो उसके नेतृत्व में रजाकार भारती सेना का मुकाबला करेंगे।

भारतीय नेतृत्व को डराने के लिए कासिम के नेतृत्व में क्रूर रजाकारों और निजाम के सैनिकों ने राज्य के हिंदुओं पर जुल्म ढाना शुरू कर दिया। इतना ही नहीं, कासिम रिजवी ने धमकी दे डाली कि अगर भारत ने उस पर किसी तरह सैनिक कार्रवाई करने की कोशिश की तो उसे 1.40 करोड़ हिंदुओं की हड्डियों एवं राख के अलावा कुछ नहीं मिलेगा। वीपी मेनन ने अपनी किताब ‘द इंटीग्रेशन ऑफ स्टेट्स’ में इसका जिक्र किया है।

रजाकारों के अत्याचारों को देखतेे हुए तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल ने 13 सितंबर 1948 को ऑपरेशन पोलो शुरू किया और 17 सितंबर को हैदराबाद को भारत में मिला लिया। पाँच दिनों की कार्रवाई में 1373 रजाकार और हैदराबाद रियासत के 807 जवान मारे गए। वहीं, भारतीय सेना के 66 जवान भी वीरगति को प्राप्त हो गए।

अंत में निजाम और कट्टरपंथी मुस्लिमों के संगठन रजाकारों ने सरेंडर कर दिया। इसके बाद रिजवी को गिरफ्तार कर जेल में डाल दिया गया और मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन पर प्रतिबंध लगा दिया गया। लगभग एक दशक तक जेल में रखने के बाद कासिम रिजवी को इस शर्त पर रिहा कर दिया गया कि वह 48 घंटों में पाकिस्तान चला जाएगा। रिजवी को पाकिस्तान ने अपने शरण दे दी थी।

हैदराबाद मुक्ति आंदोलन को लेकर डॉक्टर भीमराव अंबेडकर ने अपने स्पष्ट विचार रखे थे। उन्होंने कहा था कि निजाम के अत्याचारी शासन में रहने वाले लोगों ने निजाम के खिलाफ के बड़े आंदोलन को शुरू किया। इसमें कई हीरो ने अपने बलिदान दिए। डॉक्टर अंबेडकर के अलावा, शेड्यूल कास्ट फेडरेशन ने भी निजाम का खुलकर विरोध किया था।

उस समय फेडरेशन के प्रदेश अध्यक्ष भाऊसाहेब मोरे ने दलित समुदाय को लेकर निजाम के खिलाफ पम्फलेट बाँटा था। उसमें कहा गया था, निजाम को उखाड़ फेंका जाना चाहिए और उसकी जगह एक लोकतांत्रिक सरकार बनाई जानी चाहिए। यह अंबेडकर के हर अनुयायी की नीति होनी चाहिए। दलितों को रजाकारों के साथ भी शामिल नहीं होना चाहिए।” यहाँ तक कि दलित नेता मोरे ने दलितों को मुस्लिम इलाके में भी जाने से मना किया था।

डॉक्टर अंबेडकर ने भी हैदराबाद के दलितों से अपील की थी। उन्होंने कहा था, “मैं एक ही बात कहना चाहता हूँ कि पाकिस्तान, निजाम और मुस्लिम लीग के मुस्लिमों पर विश्वास करना दलित समुदाय को नुकसान पहुँचाएगा। पाकिस्तान या हैदराबाद के दलितों को इस्लाम की ओर नहीं जाना चाहिए। उनका प्राथमिक उद्देश्य अपनी जीवन की सुरक्षा करना होनी चाहिए है।”

डॉक्टर अंबेडकर ने कहा कि हैदराबाद के दलित समुदाय को निजाम को स्वीकार नहीं करना चाहिए। डॉक्टर अंबेडकर ने आगे कहा था, “हमें भारत विरोधियों का साथ देकर अपने समुदाय के मुँह पर कालिख नहीं पोतना चाहिए।” डॉक्टर अंबेडकर के इस बयान का जिक्र धनंजय कीर ने अपनी पुस्तक ‘बायोग्राफी ऑफ डॉक्टर बाबासाहेब अंबेडकर’ में किया है।

निजाम के खिलाफ डॉक्टर अंबेडकर ने पहली रैली 30 दिसंबर 1938 को कन्नड़ जिले के मक्रणपुर में आयोजित की गई थी। औरंगाबाद की इसी रैली में भाऊसाहब मोरे ने डॉक्टर अंबेडकर के पहले ‘जय भीम’ का नारा दिया था। इस रैली ने हैदराबाद मुक्ति आंदोलन में बड़ी भूमिका निभाई थी।

दरअसल, निजाम दलितों पर जुल्म की सीमा पार कर चुका था। निजाम का शासन हिंदुओं के प्रति अत्याचार के कुख्यात हो चुका था और उसके शासन को लेकर लोगों को विद्रोह पनपने लगा था। इसके कारण निजाम ने शेड्यूल कास्ट फेडरेशन के कई नेताओं की हत्या करवा दी। इसके विरोध में दलित नेताओं के समर्थन में डॉक्टर भीमराव अंबेडकर भी आए।

दलितों पर अत्याचार और उनके धर्मांतरण से बाबा साहेब को ठेस पहुँची। निजाम के शासन के अंतर्गत आने वाले मराठवाड़ा में दलितों की हालत और भी बदतर थी। दलितों के साथ बड़े पैमाने पर भेदभाव होता था और उन्हें शिक्षा से भी वंचित रखा गया था। डॉक्टर अंबेडकर और सरदार पटेल के प्रयास मराठवाड़ा निजाम के चंगुल से मुक्त हो गया। इसके बाद वहाँ बड़े पैमाने पर स्कूल-कॉलेज खुले।

ये वही मराठवड़ा है जिसकी मुक्ति का विरोध असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी AIMIM के नेता करते है। मराठवाड़ा मुक्ति दिवस पर AIMIM के सांसद तिरंगा फहराने के कार्यक्रम से भी अनुपस्थित रहे। यह वही AIMIM है, जो रजाकारों की MIM से संबंधित है और ओवैसी के पूर्वज इससे जुड़े थे। इस तरह दलितों से अंतर्मन से घृणा करने वाले राजनीति के लिए ‘जय भीम जय मीम’ की बात कर रहे हैं।


संविधान का कचूमर निकालते वोट और नोट के गुलाम हमारे सभी नेता : डॉ वेदप्रताप वैदिक , वरिष्ठ पत्रकार

डॉ वेदप्रताप वैदिक का 'उगता भारत' में प्रकाशित लेख बहुत ही सार्थक सिद्ध हो रहा है। जिस पार्टी एवं  नेता को देखो डॉ भीमराव आंबेडकर का अंधभक्त दिखाई दे रहा है, लेकिन डॉ आंबेडकर ने अनुसूचित जाति, जनजाति के आरक्षण के लिए केवल 10 वर्ष मांगे थे, परन्तु दुरूपयोग होते देख इसे समाप्त करने की मांग भी की थी, जिसे आज तक कोई पार्टी समाप्त करने का साहस नहीं कर पायी। नितरोज इसका दुरूपयोग कर छद्दम सेकुलरिज्म की भांति छद्दम डॉ आंबेडकर भक्त बन रहे हैं, जिस पर डॉ वैदिक ने बहुत ही निर्भीकता से विश्लेषण किया है। प्रस्तुत है हूबहू उनका लेख:- 

पिछले कई दिनों से संसद का काम-काज ठप्प है। सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच ठनी हुई है। विपक्ष के दर्जन भर से भी ज्यादा दल मोदी सरकार के विरुद्ध एकजुट होने में लगे हुए हैं। लेकिन मोदी सरकार ने क्या दांव मारा है कि सारा विपक्ष खुशी-खुशी कतारबद्ध हो गया है। अब फर्क करना ही मुश्किल है कि भारत की संसद में कौन सत्तापक्ष है और कौन विपक्ष है ? कौनसा ऐसा मामला है, जिसने दोनों के बीच यह अपूर्व संगति बिठा दी है? वह मामला है— देश के सामाजिक और आर्थिक पिछड़े वर्ग की जनगणना का! पक्ष और विपक्ष दोनों उस 127 वें संविधान के समर्थन में हाथ खड़े कर रहे हैं, जो राज्यों को अधिकार देगा कि वे अपने-अपने पिछड़ों की जन-गणना करवाएं। यह संशोधन सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले को रद्द कर देगा, जिसमें उसने राज्यों को उक्त जन-गणना के अधिकार से वंचित कर दिया था। अदालत का कहना था कि शिक्षण संस्थाओं और सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने का अधिकार सिर्फ केंद्र सरकार को ही है। केंद्र की मेादी सरकार ने सोनिया-मनमोहन सरकार के नक्शे-कदम पर चलते हुए जातीय जनगणना पर रोक लगा दी थी लेकिन अब वह क्या करेगी ? अब वह जातीय जनगणना करवाने के लिए भी तैयार हो जाएगी। जैसा कि मैं हमेशा कहता आया हूँ कि हमारे सभी नेता वोट और नोट के गुलाम हैं। यह प्रांतीय जन-गणना इसका साक्षात प्रमाण है। 

सभी दल चाहते हैं कि देश की पिछड़ी जातियों के वोट उन्हें थोक में मिल जाएं। इसीलिए वे संविधान का भी कचूमर निकालने पर उतारु हो गए हैं। संविधान कहता है कि ‘‘सामाजिक और आर्थिक पिछड़ा वर्ग’’ लेकिन हमारे नेता जातियों को ही वर्ग का जामा पहना देते हैं। क्या जाति और वर्ग में कोई फर्क नहीं है ? यदि सरकारी रेवड़ियाँ आपको थोक में ही बांटनी है तो आप जन-गणना क्यों करवा रहे हैं ? जब आप गणना कर ही रहे हैं तो हर आदमी से आप उसकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति क्यों नहीं पूछते? आपको एकदम ठीक-ठीक आंकड़े मिलेंगे। उन आँकड़ों के आधार पर आप उन करोड़ों लोगों को शिक्षा और चिकित्सा मुफ्त उपलब्ध करवाइए लेकिन उन्हें आप कुछ सौ नौकरियों का लालच देकर उनकी जातियों के करोड़ों वोट पटाना चाहते हैं। इससे बड़ी राजनीतिक बेईमानी और क्या हो सकती है? देश के किसी भी नेता या पार्टी में इतना नैतिक साहस नहीं है कि वह इस सामूहिक बेइमानी के खिलाफ मुँह खोले। अब यह मांग भी उठेगी कि आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से कहीं ज्यादा हो।(साभार : उगता भारत)