अमित शाह का डीपफेक वीडियो हुआ था वायरल, अब तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी को समन केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह का एक डीपफेक वीडियो वायरल हुआ था, जिसके आधार पर कांग्रेस ने दावा किया था कि वो आरक्षण को खत्म करने की बातें कर रहे हैं। अब इस मामले में दिल्ली पुलिस ने FIR दर्ज करने के बाद तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी को समन भेजा है। रेवंत रेड्डी, दिसंबर 2023 से न सिर्फ CM हैं, बल्कि पिछले 3 वर्षों से पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष भी हैं। 54 वर्षीय रेवंत रेड्डी TDP 2017 में कांग्रेस में शामिल हुए थे और पार्टी ने उन्हें नेतृत्व देकर भरोसा जताया।
अब सोमवार (29 अप्रैल, 2024) को दिल्ली पुलिस ने उन्हें समन भेजा है। कहा गया है कि वो 1 मई को पेश होकर अपना बयान दर्ज कराएँ। साथ ही ये भी कहा गया है कि जाँच के लिए वो अपने फोन-लैपटॉप इत्यादि जैसे इलेक्ट्रॉनिक उपकरण भी साथ लेकर आएँ। ‘इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर’ की शिकायत पर दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने ये FIR दर्ज की है। तेलंगाना कांग्रेस ने सबसे पहले अमित शाह के वीडियो से छेड़छाड़ कर उनका झूठा बयान प्रकाशित किया था।
इस मामले में सिर्फ रेवंत रेड्डी ही नहीं, बल्कि 5 अन्य लोगों को भी समन भेजा गया है जिनमें कुछ कांग्रेस के नेता हैं। इन सभी ने अमित शाह के डॉक्टर्ड वीडियो को शेयर किया था। केंद्रीय गृह मंत्रालय और भारतीय जनता पार्टी ने भी इस मामले में शिकायत दर्ज कराई थी। आरोप लगाया गया है कि समाज में विभिन्न समुदायों में वैमनस्य फैलाने के उद्देश्य से ये वीडियो प्रसारित किया गया, जिससे कानून-व्यवस्था और सार्वजनिक शांति के भंग होने की आशंका है।
नूपुर शर्मा का भी इसी तरह डॉक्टर्ड वीडियो वायरल होने बाद ही 'सर तन से जुदा' गैंग को सक्रीय किया गया था। अगर नूपुर ने इस्लाम के विरुद्ध बोला था, तो उसी दिन या अगले दिन मुस्लिम कट्टरपंथी हरकत में आते, 10 दिन बाद क्यों? लेकिन 'नवभारत'चैनल के एंकर सुशांत सिन्हा के अलावा कट्टरपंथियों का गुलाम डरपोक सारा मीडिया नूपुर को ही कसूरवार मान बचता रहा। लेकिन बात गृह मंत्री अमित शाह की है, समन और गिरफ्तारियां की जा रही है। यदि यही कदम नुपुर के केस में उठाया होता, कोई 'सर तन से जुदा' गैंग किसी कन्हैया लाल तेली की जान लेने की हिम्मत नहीं करता। चलो देर आए दुरुस्त आए। लेकिन कार्यवाही ऐसी होनी चाहिए फिर कोई ऐसा घिनौना काम करने की हिम्मत न कर पाए।
Delhi Police summons Telangana CM Revanth Reddy in Amit Shah fake video case
रेवंत रेड्डी को दिल्ली पुलिस के IFSO (साइबर सेल) के समक्ष पेश होने के लिए कहा गया है। असल में अमित शाह ने आरोप लगाया था कि कांग्रेस सत्ता में आएगी तो SC, ST और OBC का आरक्षण छीन कर मुस्लिमों को दे देगी, जबकि कांग्रेस ने वीडियो को एडिट कर कुछ और ही झूठ दुष्प्रचारित करवा दिया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई बार कह चुके हैं कि वो पिछड़ों के आरक्षण की रक्षा करेंगे। वो कह चुके हैं कि आरक्षण कोई नहीं हटा सकता। इस मामले में पुलिस ने असम से रीतम सिंह नामक एक शख्स को गिरफ्तार भी किया है, जो असम में कांग्रेस का सोशल मीडिया देखता है।
संविधान की शपथ लेकर कभी आरक्षण तो कभी जातियों के नाम पर जनता को विभाजित करने वाली पार्टियां क्या वोट की हक़दार हैं? जब संविधान हमें एकजुट रहने की बात करता है, फिर ये कुर्सी ने भूखे नेता क्यों जनता में विभाजन कर संविधान का अपमान कर रहे हैं? ऐसे विभाजनकारी नेताओं और पार्टियों को वोट देने से अच्छा है, NOTA को वोट देना अधिक उचित है। कर्नाटक विधानसभा चुनाव से पहले अल्पसंख्यक आरक्षण का मुद्दा गरमाता जा रहा है। सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी ने मुस्लिमों को मिलने वाला अल्पसंख्यक आरक्षण रद्द कर दिया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी इस फैसले का समर्थन करते हुए कहा है कि धर्म के आधार पर आरक्षण देने का संविधान में कोई प्रावधान नहीं है। वहीं, कांग्रेस सत्ता में वापसी होने पर इस आरक्षण को बहाल करने की बात कर रही है।
कर्नाटक प्रदेश कांग्रेस कमेटी (KPCC) के अध्यक्ष डीके शिवकुमार ने अल्पसंख्यक आरक्षण रद्द करने को लेकर भाजपा द्वारा किए गए फैसले को असंवैधानिक करार दिया है। उन्होंने कहा है, “भाजपा सरकार सोचती है कि आरक्षण को संपत्ति की तरह बाँटा जा सकता है। लेकिन आरक्षण संपत्ति नहीं बल्कि अधिकार है। हम नहीं चाहते कि अल्पसंख्यक वर्ग का 4% आरक्षण खत्म हो और किसी बड़े समुदाय को दिया जाए। अल्पसंख्यक हमारे भाई हैं और हमारे परिवार के सदस्य हैं।”
डीके शिवकुमार ने दावा करते हुए कहा है कि भाजपा लिंगायत और वोक्कालिगा समुदाय को जो आरक्षण दे रही है, उसे इस समुदाय के लोगों ने ठुकरा दिया है। शिवकुमार ने एक और दावा करते हुए कहा कि अगले 45 दिनों में कांग्रेस कर्नाटक की सत्ता में होगी। इसके बाद कैबिनेट की पहली बैठक में ही अल्पसंख्यकों का आरक्षण बहाल कर दिया जाएगा।
कर्नाटक में एक सभा को संबोधित करते हुए केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा है कि भाजपा कभी भी तुष्टिकरण में विश्वास नहीं करती। इसलिए उसने आरक्षण व्यवस्था में बदलाव करने फैसला किया। बीजेपी ने अल्पसंख्यकों को दिया गया 4% आरक्षण समाप्त कर 2 प्रतिशत आरक्षण वोक्कालिगा और 2 प्रतिशत आरक्षण लिंगयत को दिया है। अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण संवैधानिक रूप से वैध नहीं है। संविधान में धर्म के आधार पर आरक्षण की कोई व्यवस्था नहीं है। कांग्रेस सरकार तुष्टिकरण की राजनीति के तहत अल्पसंख्यकों को आरक्षण दिया था।
कर्नाटक सरकार ने 24 मार्च 2023 को दो बड़े फैसले लिए। पहले फैसले के तहत सरकार ने अल्पसंख्यक कोटे के तहत मुस्लिमों को मिलने वाला 4% आरक्षण रदद् कर दिया। वहीं, दूसरा बड़ा फैसला यह है कि इसी 4% आरक्षण को सरकार ने वोक्कालिगा और लिंयागत समुदाय में बाँट दिया। इस तरह से अब शिक्षा और नौकरी में वोक्कालिगा और लिंगानुपात समुदाय को राज्य में 2-2% आरक्षण मिलेगा। वहीं, धार्मिक अल्पसंख्यकों को आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) की श्रेणी में रखा जाएगा।
देश में आर्थिक आधार पर आरक्षण को लेकर चर्चा होती रही है। अब इसी मुद्दे को लेकर ‘करणी सेना’ ने मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल के जंबूरी मैदान में आंदोलन शुरू किया है। आर्थिक आधार पर आरक्षण सहित 21 माँगों को लेकर ‘करणी सेना’ के मुखिया जीवन सिंह शेरपुर सहित 5 लोग भूख हड़ताल पर बैठ गए हैं। आंदोलन कर रहे लोगों का कहना है कि माँगे पूरी होने तक आंदोलन जारी रहेगा।
मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, 8 जनवरी, 2023 को करणी सेना ने भोपाल के जंबूरी मैदान में आर्थिक आधार पर आरक्षण को लेकर बड़ा विरोध प्रदर्शन शुरू किया है। इससे पहले करणी सेना ने माँगे पूरी नहीं होने पर विधानसभा घेराव की चेतावनी दी थी। हालाँकि, प्रशासनिक अधिकारियों द्वारा बातचीत के लिए समय माँगे जाने के बाद विधानसभा घेराव को टाल दिया गया है। लेकिन, चेतावनी मिलने के बाद से विधानसभा की सुरक्षा बढ़ा दी गई है।
इस आंदोलन को लेकर ‘करणी सेना’ के मुखिया जीवन सिंह का कहना है कि भूख हड़ताल पर सिर्फ 5 लोग बैठेंगे। उन्होंने आंदोलन में आए लोगों से हिंसा न करने की अपील करते हुए कहा है कि जिसे जाना हो वह खुशी से जा सकता है, लेकिन कहीं भी तोड़फोड़ और उद्दंडता नहीं होनी चाहिए।
उन्होंने यह भी कहा है कि माँगे पूरी करने के लिए 4 बजे तक का समय दिया गया था। लेकिन इसके लिए सरकार ने समय माँगा है। फिलहाल, अनशन शुरू कर रहे हैं। सब लोग यहीं बैठेंगे। जब तक माँगे पूरी नहीं होंगी, मैदान नहीं छोड़ेंगे। यदि माँगे नहीं मानी गईं तो राजनीति में उतरने से भी परहेज नहीं होगा। इस आंदोलन को सवर्णों और पिछड़ा वर्ग का साथ भी मिल रहा है। व्यवस्था में सुधार के लिए यह आंदोलन कर रहे हैं।
इस प्रदर्शन में शामिल होने के लिए मध्य प्रदेश के अलावा राजस्थान, हरियाणा छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र से करणी सेना के कार्यकर्ता पहुँचे हैं। इस दौरान, प्रदर्शनकारी ‘माई के लाल’ और ‘जय भवानी’ के नारे लगाने के साथ ही हनुमान चालीसा का पाठ करते नजर आए।
डॉ वेदप्रताप वैदिक का 'उगता भारत' में प्रकाशित लेख बहुत ही सार्थक सिद्ध हो रहा है। जिस पार्टी एवं नेता को देखो डॉ भीमराव आंबेडकर का अंधभक्त दिखाई दे रहा है, लेकिन डॉ आंबेडकर ने अनुसूचित जाति, जनजाति के आरक्षण के लिए केवल 10 वर्ष मांगे थे, परन्तु दुरूपयोग होते देख इसे समाप्त करने की मांग भी की थी, जिसे आज तक कोई पार्टी समाप्त करने का साहस नहीं कर पायी। नितरोज इसका दुरूपयोग कर छद्दम सेकुलरिज्म की भांति छद्दम डॉ आंबेडकर भक्त बन रहे हैं, जिस पर डॉ वैदिक ने बहुत ही निर्भीकता से विश्लेषण किया है। प्रस्तुत है हूबहू उनका लेख:-
पिछले कई दिनों से संसद का काम-काज ठप्प है। सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच ठनी हुई है। विपक्ष के दर्जन भर से भी ज्यादा दल मोदी सरकार के विरुद्ध एकजुट होने में लगे हुए हैं। लेकिन मोदी सरकार ने क्या दांव मारा है कि सारा विपक्ष खुशी-खुशी कतारबद्ध हो गया है। अब फर्क करना ही मुश्किल है कि भारत की संसद में कौन सत्तापक्ष है और कौन विपक्ष है ? कौनसा ऐसा मामला है, जिसने दोनों के बीच यह अपूर्व संगति बिठा दी है? वह मामला है— देश के सामाजिक और आर्थिक पिछड़े वर्ग की जनगणना का! पक्ष और विपक्ष दोनों उस 127 वें संविधान के समर्थन में हाथ खड़े कर रहे हैं, जो राज्यों को अधिकार देगा कि वे अपने-अपने पिछड़ों की जन-गणना करवाएं। यह संशोधन सर्वोच्च न्यायालय के उस फैसले को रद्द कर देगा, जिसमें उसने राज्यों को उक्त जन-गणना के अधिकार से वंचित कर दिया था। अदालत का कहना था कि शिक्षण संस्थाओं और सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने का अधिकार सिर्फ केंद्र सरकार को ही है। केंद्र की मेादी सरकार ने सोनिया-मनमोहन सरकार के नक्शे-कदम पर चलते हुए जातीय जनगणना पर रोक लगा दी थी लेकिन अब वह क्या करेगी ? अब वह जातीय जनगणना करवाने के लिए भी तैयार हो जाएगी। जैसा कि मैं हमेशा कहता आया हूँ कि हमारे सभी नेता वोट और नोट के गुलाम हैं। यह प्रांतीय जन-गणना इसका साक्षात प्रमाण है।
सभी दल चाहते हैं कि देश की पिछड़ी जातियों के वोट उन्हें थोक में मिल जाएं। इसीलिए वे संविधान का भी कचूमर निकालने पर उतारु हो गए हैं। संविधान कहता है कि ‘‘सामाजिक और आर्थिक पिछड़ा वर्ग’’ लेकिन हमारे नेता जातियों को ही वर्ग का जामा पहना देते हैं। क्या जाति और वर्ग में कोई फर्क नहीं है ? यदि सरकारी रेवड़ियाँ आपको थोक में ही बांटनी है तो आप जन-गणना क्यों करवा रहे हैं ? जब आप गणना कर ही रहे हैं तो हर आदमी से आप उसकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति क्यों नहीं पूछते? आपको एकदम ठीक-ठीक आंकड़े मिलेंगे। उन आँकड़ों के आधार पर आप उन करोड़ों लोगों को शिक्षा और चिकित्सा मुफ्त उपलब्ध करवाइए लेकिन उन्हें आप कुछ सौ नौकरियों का लालच देकर उनकी जातियों के करोड़ों वोट पटाना चाहते हैं। इससे बड़ी राजनीतिक बेईमानी और क्या हो सकती है? देश के किसी भी नेता या पार्टी में इतना नैतिक साहस नहीं है कि वह इस सामूहिक बेइमानी के खिलाफ मुँह खोले। अब यह मांग भी उठेगी कि आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से कहीं ज्यादा हो।(साभार : उगता भारत)
प्रतीकात्मक केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख में सरकारी नौकरियाँ स्थानीय लोगों के लिए आरक्षित होंगी। इसकी घोषणा लद्दाख प्रशासन के श्रम और रोजगार विभाग ने 7 जून 2021 को की। रिपोर्ट के अनुसार, लद्दाख प्रशासन ने स्थानीय लोगों के लिए 100% नौकरियों को आरक्षित करते हुए लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश रोजगार (अधीनस्थ) सेवा भर्ती नियम, 2021 को अधिनियमित किया है।
लेह के सूचना एवं जनसंपर्क विभाग के ट्वीट में कहा गया है, “लद्दाख ने केंद्र शासित प्रदेश रोजगार (अधीनस्थ) सेवा भर्ती नियम 2021 तैयार किया है। नौकरियाँ विशेष रूप से स्थानीय लोगों के लिए आरक्षित होंगी।” एसओ 282 (ई) दिनांक 21.01.2020 द्वारा प्रवर्तित इस नियम को उपराज्यपाल आरके माथुर ने बनाया है। राजपत्र में जारी होने के साथ ही यह कानून लागू हो जाएगा।
अधिसूचना के खंड 11 में कहा गया है, “कोई भी व्यक्ति सेवा में नियुक्ति के लिए तब तक योग्य नहीं होगा, जब तक कि वह व्यक्ति केंद्र शासित प्रदेश लद्दाख का निवासी न हो।” इसके अलावा, नई अधिसूचना में जोर दिया गया है कि जम्मू-कश्मीर रोजगार (अधीनस्थ) सेवा संवर्ग में पहले से ही नियुक्त व्यक्ति, जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम 2019 की धारा 89 (2) के अनुसार सेवा के गठन के बाद से नियुक्त माना जाएगा। लद्दाख के लोग लंबे समय से इसकी माँग कर रहे थे।
इस मामले पर लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद-कारगिल के मुख्य कार्यकारी पार्षद फिरोज अहमद खान ने बताया, “लगभग दो साल पहले हुए जम्मू-कश्मीर के विभाजन के बाद से यह हमारी माँग थी। यह स्वागत योग्य कदम है। वर्तमान में इस केंद्र शासित प्रदेश के अंतर्गत आने वाली भूमि दो निर्वाचित परिषदों, लेह और कारगिल के अंतर्गत आती हैं।” उन्होंने बताया कि लद्दाख स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषद-कारगिल (LAHDC) भी नई भर्तियों में ऊपरी आयु सीमा में छूट और स्थानीय शासन के लिए नियम बनाने की माँग करेगी।
भाजपा ने अपने घोषणा-पत्र में अनुच्छेद 370 जो जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देता था को निरस्त करने का वादा किया था। 5 अगस्त 2019 को भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने अपना वादा पूरा किया। जम्मू और कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम के तहत राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों, लद्दाख और जम्मू एवं कश्मीर में विभाजित कर दिया गया। यह निर्णय 31 अक्टूबर 2019 से प्रभावी हुआ था।
एसटी आरक्षण की माँग के कारण राजस्थान का एक बड़ा हिस्सा जल रहा है। क्या उदयपुर और डूंगरपुर में आगजनी के पीछे वही आदिवासी-ईसाई नेक्सस है, जो झारखण्ड में पत्थलगड़ी को अंजाम देता है और पालघर में साधुओं की हत्या करता है? राजस्थान में चल रहे दंगे व आगजनी को रोकने में विफल गहलोत सरकार अब आदिवासी क्षेत्रों के लोगों को बातचीत के टेबल पर लाना चाहती है, लेकिन क्या मिशनरियों का आदिवासी-ईसाई गठजोड़ ऐसा होने देगा? देश की तथाकथित सेक्युलर मीडिया का एक बार फिर दोगलापन सामने आया है। शिक्षक भर्ती में अनारक्षित पद को एसटी अभ्यार्थियों से भरने की मांग को लेकर राजस्थान के डूंगरपुर में हिंसा थमने का नाम ही नहीं ले रही है लेकिन देश तथाकथित सेक्लुयर मीडिया इसे दिखाने और छापने के बजाय विपक्षी पार्टियों द्वारा प्रयोजित किसानों के प्रदर्शन में व्यस्त है। कांग्रेस शासित राज्य राजस्थान में बड़े पैमाने पर हिंसा के बावजूद तथाकथित सेक्युलर मीडिया इसे नहीं दिखा रहा है और इसे लेकर सोशल मीडिया पर इसको लेकर कई प्रकार के सवाल उठाए जा रहे हैं।
राजस्थान में अध्यापक पात्रता परीक्षा को लेकर चल रहा विरोध-प्रदर्शन इतना उग्र हो गया है कि अब अशोक गहलोत की सरकार केंद्र से ‘रैपिड एक्शन फोर्स (RAF)’ की माँग कर रही है। इस विरोध-प्रदर्शन से राजस्थान का उदयपुर और डूंगरपुर सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। राज्य के पूरे दक्षिणी हिस्से की क़ानून-व्यवस्था एक तरह से राज्य सरकार के नियंत्रण से बाहर चली गई है।
डूंगरपुर में गोली लगने के कारण शनिवार (सितम्बर 26, 2020) की शाम एक व्यक्ति की मौत भी हो गई। साथ ही कई घायल भी हुए। इस प्रदर्शन में न सिर्फ सम्पत्तियों को नुकसान पहुँचाया गया, बल्कि कई वाहनों को भी फूँक दिया गया। पुलिस ने कहा है कि उसे रबर की गोलियाँ दागनी पड़ीं। राज्य के पुलिस महानिरीक्षक एमएल लाठड़ को सीएम ने डूंगरपुर भेजा है। सीएम लगातार लोगों से शांति-व्यवस्था बनाए रखने की अपील कर रहे हैं।
राज्यपाल कालराज मिश्र की भी पूरे घटनाक्रम पर नजर है और उन्होंने मुख्यमंत्री से फोन पर बात कर स्थिति के बारे में जाना। गुरुवार की शाम को ये प्रदर्शन तब उग्र हो गया, जब युवाओं ने पुलिस के साथ संघर्ष किया। पुलिस दल पर पथराव के साथ-साथ पुलिस के वाहनों को भी आग के हवाले कर दिया गया था। जनप्रतिनिधियों ने भी आंदोलनकारी युवाओं के साथ बैठकें की, लेकिन इसका कोई परिणाम निकल नहीं पाया।
प्रदर्शनकारियों की माँग है कि तृतीय श्रेणी शिक्षक भर्ती परीक्षा-2018 में जनजाति बहुल (एसटी) क्षेत्र में रिक्त रहे सामान्य वर्ग के 1167 पदों को जनजाति वर्ग (एसटी) के अभ्यर्थियों से ही भरा जाए और इस पर एससी, ओबीसी या सामन्य वर्ग के अभ्यर्थियों की भर्ती न होने पाए। सोशल मीडिया से भी भड़काऊ वीडियो जारी कर राजस्थान सरकार को चुनौती दी जा रही है। जंगलों और पहाड़ियों के कारण पुलिस प्रदर्शनकारियों से निपटने में असफल रही है।
हालत इतने बेकाबू हो गए कि शनिवार की रात राज्य सरकार को कई वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को हेलीकॉप्टर से डूंगरपुर भेजने के लिए मजबूर होना पड़ा। हालाँकि, सीएम कह रहे हैं कि उनकी सरकार प्रदेश के हर वर्ग के हितों की रक्षा के लिए संकल्पबद्ध है तथा समाज के किसी भी वर्ग की कानून-सम्मत व न्यायोचित माँगों पर विचार करने या संवाद के लिए हर समय तैयार है। उन्होंने टीएसपी क्षेत्र के विद्यार्थियों एवं युवाओं से अपील की है कि वे हिंसा को छोड़े और सरकार के समक्ष अपनी बात रखने के लिए आगे आएँ।
ट्विटर यूजर राकेश गोस्वामी ने लिखा कि दक्षिण राजस्थान 3 दिनों से जल रहा है। 4 जिलों में इंटरनेट को निलंबित कर धारा 144 लगा दिया गया है। कई वाहनों को आग लगा दी गई है, संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया है। मामले की गंभीरता को देखते हुए कंट्रोल रूम में 7 आईपीएस अधिकारी कैंप कर रहा हैं फिर भी कोई राष्ट्रीय आक्रोश नहीं हैं।
अभिषेक नामक ट्विटर हैंडल से भी लिखा गया है कि वास्तविक विरोध राजस्थान में हो रहा है जहां आदिवासी कांग्रेस सरकार के खिलाफ हैं। 4 जिलों में 1 व्यक्ति की मौत के साथ धारा 144 लागू कर इंटरनेट को निलंबित कर दिया गया है, लेकिन क्योंकि यह कांगेस शासित है इसलिए मीडिया द्वारा ब्लैक आउट किया गया है।
Actual protest is happening in Rajasthan where tribals are up against Cong govt.
1 person dead, section 144 imposed in 4 districts, internet suspended
But because it is Cong ruled, blacked out by media
Instead media searching for protests against farm bill, but nobody came out
Agreed that left and Congi biased media is not reporting. What about right wing media? What stops them from reporting it and taking it to a larger scale? Had this been in UP or Gujrat, the likes of Rajdeep and NDTV would have gone on for hours peddling propaganda.
नवभारत टाइम्स डॉट कॉमके मुताबिक कांकरा डूंगरी से शुरू हुआ उपद्रव खेरवाड़ा तक पहुंच गया है। प्रदर्शनकारियों की ओर से मचाये गए उत्पात के बाद पुलिस ने भी तीन राउंड फायरिंग के साथ आंसू गैस छोड़ी, इसके बाद मामला कुछ शांत हुआ, लेकिन रात एक बजे प्रदर्शनकारी एक बार फिर उग्र हो गए। बताया जा रहा है कि इस घटना में एक व्यक्ति की सीने में गोली लगने से मौत हो गई, जबकि एक घायल हो गया। खबर के मुताबिक इस मामले में प्रशासन की ओर से चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। डूंगरपुर के जिला कलेक्टर की मानें, तो इस हिंसा में झारखंड से आए विशेष विचारधारा वाले गुट ने हिंसा भड़काई है। लिहाजा अब सरकार ने भी स्थिति को नियंत्रित करने के लिए अपने चार ऑफिसर्स को भेजा है, जिनमें डीजी क्राइम एमएल लाठर, एसीबी के एडीजी दिनेश एमएन, जयपुर कमिश्नर आनंद श्रीवास्तव और जयपुर ग्रामीण एसपी शंकरदत्त शर्मा शामिल हैं।
कांग्रेस शासित राज्य राजस्थान में हिस्सा की तस्वीरें-
जनजाति क्षेत्र विकास मंत्री अर्जुन बामणिया और उदयपुर से पूर्व सांसद रघुवीर मीणा को सीएम गहलोत ने कई अन्य जनप्रतिनिधियों के साथ उदयपुर भेजा, जहाँ उनकी विरोध-प्रदर्शन कर रहे युवाओं के साथ लगभग 3 घंटे तक बैठक हुई। पूर्व-सांसदों और वर्तमान विधायकों के अलावा कॉन्ग्रेसी जनप्रतिनिधियों के साथ कुछ वकील भी मौजूद थे। भारतीय ट्राइबल पार्टी के विधायक राजकुमार रोत ने पुलिस-प्रशासन को ही कोसा है।
उन्होंने कहा कि भले ही आंदोलन की शुरुआत युवाओं ने की हों, लेकिन उनके पास सूचनाएँ हैं कि पुलिस ने स्थानीय ग्रामीणों को निशाना बनाया और उन्हें गिरफ्तार किया, जिससे ये विरोध-प्रदर्शन और ज्यादा उग्र हो गया। उन्होंने कहा कि अब ये मामला ग्रामीण बनाम पुलिस-प्रशासन का हो गया है। एनएच 7-8 पर वाहनों को जलाया गया। एक युवक की मौत पर पुलिस का कहना है कि गोली कहाँ से चली, उसे कुछ नहीं पता।
पिछले 2 दिनों में ही 20 से ज्यादा गाड़ियों को आग के हवाले किया गया है। पेट्रोल पंप और एक होटल में लूटपाट की भी खबर आई है। पुलिस का कहना है कि डूंगरपुर के एसपी का भी वाहन नहीं बख्शा गया। 35 पुलिसकर्मियों के घायल होने की सूचना है, जिसके बाद क़रीब 30 लोगों को वहाँ गिरफ्तार किया गया। क़रीब 25 किलोमीटर तक राजमार्ग पर आवागमन पूरी तरह ठप्प हो चुका है।
उदयपुर रेंज की आईजी विनीता ठाकुर ने कहा है कि क्षेत्र में अतिरिक्त पुलिस बल की तैनाती की गई है, ताकि स्थिति को नियंत्रित किया जा सके। इंटरनेट बंद कर दिया गया है। खेरवाड़ा और ऋषभदेव में भी विरोध-प्रदर्शन जारी है। टोल प्लाजा को भी जलाने का प्रयास किया गया। क़रीब 20 किलोमीटर तक प्रदर्शनकारियों द्वारा पत्थर बिछाए जाने के बाद उदयपुर-अहमदाबाद हाइवे 3 दिनों से जाम है।
वहीं राजस्थान पुलिस का कहना है कि झारखण्ड से आए विशेष विचारधारा के गुट ने हिंसा भड़काई है। पुलिस का कहना है कि जहाँ कुछ लोग हिंसा भड़का कर चले गए हैं, वहीं कुछ अभी भी आसपास के गाँवों में छिपे हुए हैं। झारखण्ड में फ़िलहाल हेमंत सोरेन के नेतृत्व में जो सकरार चल रही है, उसमें कॉन्ग्रेस भी भागीदार है। राज्य में कॉन्ग्रेस के 4 मंत्री हैं, जो वित्त, कृषि, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास जैसे मंत्रालय सँभाल रहे हैं। फिर भी कॉन्ग्रेस अपने में भी ब्लेम-गेम खेल रही है।
प्रदेश भाजपा ने भी पुलिस के बयान का समर्थन किया है। प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनियाँ ने कहा कि आशंका पहले लग रही थी, अब प्रशासन ने भी पुष्टि कर दी है कि ये बाहरी तत्व कौन हैं? उन्होंने कहा कि ये लोग झारखंड से आए, कुछ चले गए, कुछ अभी भी छुपे हैं, जो हमेशा से हमारे आदिवासी क्षेत्रों में शांति और सद्भाव को बिगाड़ने का कुत्सित प्रयास कर रहे हैं। उन्होंने आशा जताई कि ये लोग सफल नहीं होंगे, लेकिन साथ ही चेताया कि उनको जल्द बेनकाब किया जाना चाहिए।
मेवाड़ क्षेत्र को नक्सलियों का अड्डा बनाने की साजिश चल रही है और इस कार्य में झारखण्ड के पत्थलगड़ी आंदोलन से जुड़े लोगों की भागीदारी है। पत्थलगड़ी ईसाई-आदिवासी नेक्सस का एक ऐसा उदाहरण है, जो देश का क़ानून नहीं मानता। लोगों ने दबे जुबान से बताया कि राजस्थान के कुछ स्थानीय जनप्रतिनिधि भी इस खेल में शामिल हैं, भले ही वो किसी भी पार्टी के हों।
एक प्राध्यापक अभ्यर्थी ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि राज्य लोक सेवा आयोग ने प्राध्यापक भर्ती में सामान्य वर्ग के छात्रों के साथ अन्याय किया है, और ऐसे कई उदाहरण हैं, जिन्हें छिपाने के लिए ये सब किया जा रहा है। उसने कहा कि राज्य में 5000 पदों के लिए 2018 में विज्ञप्ति निकाली निकली थी और EWS आरक्षण की घोषणा के बाद प्रक्रियाधीन नियुक्तियों में 14% अतिरिक्त पद सृजित करने की घोषणा हुई थी, लेकिन बिना 700 पद बढ़ाए ही दोगुने अभ्यर्थियों को बुला लिया गया।
जहाँ एक तरफ मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ढिंढोरा पीट रहे हैं कि उनकी सरकार ने पार्टी के चुनावी घोषणा-पत्र में 501 घोषणाओं में से 252 को पूरा कर दिया है और राहुल गाँधी सोशल मीडिया पर ‘प्रदर्शनकारी किसानों’ के समर्थन में लगे हुए हैं, कॉन्ग्रेस को इस सवाल का जवाब देना होगा कि दक्षिणी राजस्थान में चल रहे उग्र हिंसक प्रदर्शन को रोकने में, युवाओं को समझाने में एवं बाहरी तत्वों को चिह्नित कर उन पर कार्रवाई करने में उसकी सरकार नाकाम क्यों रही है?
सितम्बर 24 को राजस्थान में हिंसा भड़कने के बावजूद इसके अगले ही दिन अशोक गहलोत किसानों के मुद्दे पर प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रहे थे। वो राजग सरकार द्वारा ‘बनाए गए हालत’ को पूरे देश के किसानों के ‘सड़कों पर आने’ के लिए जिम्मेदार ठहरा रहे थे। राजस्थान प्रदेश कॉन्ग्रेस के सभी प्रमुख पदाधिकारी वहाँ मौजूद थे। जयपुर में प्रेस कॉन्फ्रेंस चलती रही, उधर उदयपुर और डूंगरपुर जलता रहा।
राजस्थान ही नहीं, बल्कि अन्य राज्यों से भी लोगों के आकर स्थानीय युवाओं को भड़काने की बातें पुलिस-प्रशासन ने कही है। सड़क पर शराब की बोतलों से भरे एक ट्रक तक को लूट लिया गया। हालाँकि, कई एसटी अभ्यर्थी कह रहे हैं कि ये उनका काम नहीं है, वो हिंसा नहीं कर सकते। कहा गया है कि बगल के गुजरात के आदिवासी क्षेत्रों से भी कुछ भड़काऊ लोग आए हैं। सरकार अब अपनी अक्षमता का पूरा ठीकरा बाहरी राज्यों पर फोड़ने के लिए तैयार है।
ऐसी कोई घटना हो और उस पर राजनीति न हो, ये तो हो ही नहीं सकता। नेता प्रतिपक्ष गुलाबचंद कटारिया ने जब इसके लिए कॉन्ग्रेस सरकार को पूरी तरह फेल करार दिया तो कॉन्ग्रेस की राष्ट्रीय कार्यसमिति के सदस्य एवं पूर्व सांसद रघुवीर मीणा ने हिंसक प्रदर्शनों के लिए भाजपा तथा भारतीय ट्राइबल पार्टी (BTP) के नेताओं को जिम्मेदार ठहरा डाला। जैसा कि हमने बताया, BTP इसके लिए पुलिस को दोषी ठहरा रही है।
उदयपुर-अहमदाबाद हाईवे पर उपद्रवियों का कब्जा है..होटल-मकान फूंके जा रहे हैं...एक मौत हो गई है...यह गुस्से का मासूम इज़हार नहीं है..पूरी प्लानिंग दिख रही है....हालात बिगड़ रहे हैं लेकिन बीस दिनों से उदयपुर का पुलिस-प्रशासन यही कह रहा है...स्थिति नियंत्रण में है..!!! pic.twitter.com/kSJdtJobdC
टीवी न्यूज चैनलों ने स्वयं ही न्यूज सेंसर कर दी। काग्रेंस पार्टी का कितना ख्याल रखते हैं। बीजेपी सत्ता में होती तब ये बहना, का भाई पप्पू, चैनल वाले सीएम की खाल खींच रहे होते। काग्रेंस शासित राज्यों का कोई विरुद्ध समाचार न्यूज चैनल पर नही आता। ☹️
ऐसा नहीं है कि प्रदर्शनकारियों द्वारा जो माँगें उठाई जा रही हैं, उन्हें लेकर वो कोर्ट नहीं गए थे। हाईकोर्ट पहले ही उनकी याचिका रद्द कर चुका है। इसके बाद कांकरी डूंगरी में एसटी अभ्यर्थी धरने पर बैठे थे, जो अब खुद के इस आगजनी का हिस्सा न होने की बातें कर रहे हैं। उनका कहना है कि ये काम ‘उत्पाती आदिवासियों’ का है। शिक्षा मंत्री गोविन्द सिंह डोटासरा ने शांति की अपील करते हुए कहा कि बहकावे में आकर ऐसी हरकतें की जा रही हैं।
नेता प्रतिपक्ष कटारिया का कहना है कि चूँकि इन माँगों को माने जाने में ही क़ानूनी अड़चनें हैं, गहलोत सरकार को अभ्यर्थियों को इसके बारे में अच्छी तरह समझाना चाहिए, जिसमें वो विफल रहे हैं। उन्होंने कहा कि निर्दोष पिसे जा रहे हैं, परेशान हो रहे हैं। उन्होंने इस बात पर आश्चर्य जताया कि सारे वरिष्ठ अधिकारियों की मौजूदगी में ही 200 आंदोलनकारियों ने इतना नुकसान कर दिया।
उन्होंने क़ानून-व्यवस्था के लिए सख्ती की ज़रूरत पड़ने पर वो भी करने की अपील की है और छात्रों को समझाया है कि आगजनी करने से किसी समस्या का समाधान नहीं होता। उन्होंने भी गुजरात, झारखण्ड और मध्य प्रदेश के भड़काऊ लोगों को यहाँ आकर स्थिति बिगाड़ने के लिए जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि इनमें अधिकतर ‘कन्वर्टेड आदिवासी’ शामिल हैं, जो ईसाई मिशनरियों के चक्कर में आकर धर्मान्तरण कर चुके हैं।
भाजपा ये समझाने में लगी हुई है कि अनुसूचित जनजाति वर्ग के क्षेत्रों में इसी वर्ग को नौकरी के लिए ज्यादा आरक्षण देने का फैसला भैरों सिंह शेखावत के मुख्यमंत्रित्व काल में ही हुआ था और वसुंधरा राजे ने इसे आगे बढ़ाया। इससे कई युवाओं की नौकरी लगी। भाजपा ने इस बात से निराशा जताई है कि आज ये नौकरीपेशा लोग भी अपने समुदाय के इन युवाओं को समझा नहीं पा रहे। भाजपा इस मामले में फ़िलहाल फूँक-फूँक कर क़दम रख रही है।(एजेंसीज इनपुट्स सहित)
राजस्थान LDC भर्ती परीक्षा 2018 को लेकर विवाद बढ़ता ही जा रहा है। इस भर्ती परीक्षा के फाइनल रिजल्ट के बाद से ही आयोग पर गड़बड़ी के आरोप लग रहे हैं। उम्मीदवारों का आरोप है कि राजस्थान कर्मचारी चयन आयोग ने दस्तावेज सत्यापन के बाद जनरल और OBC वर्ग के पदों की संख्या घटा दी। उम्मीदवारों का कहना है कि डॉक्यूमेंट वेरिफिकेशन के समय अधीनस्थ विभाग में OBC की 2093 और जनरल की 5303 सीटें थी, लेकिन अंतिम परिणाम में OBC श्रेणी से 227 काटें काटकर 1866 कर दी गईं, जबकि जनरल श्रेणी से 360 सीटों की कटौती करके 4943 कर दी गई। इस तरह OBC और जनरल श्रेणी के कुल 587 सीटों की कटौती की गई है। इसका खुलासा RTI के जरिए हुआ। नियुक्ति का अंतिम परिणाम जारी होने के बाद जहाँ ओबीसी का आरक्षण 21 फीसदी से घटकर 17 फीसदी रह गया तो वहीं जनरल का आरक्षण भी 50 फीसदी से घटकर 46 फीसदी रह गया। इसके अलावा बाकी तीनों वर्गों को आरक्षण का पूरा लाभ दिया गया है। ऐसे में राज्य के बेरोजगार युवा गुहार लगा रहे हैं कि OBC और जनरल के इन 587 बेरोजगारों को भी इंसाफ मिले। बेरोजगारों का कहना है कि बोर्ड की गलती का खामियाजा प्रदेश के 587 बेरोजगारों को भुगतना पड़ रहा है। नियुक्ति प्रक्रिया से बाहर हुए इन 587 बेरोजगारों ने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, शिक्षा मंत्री गोविन्द सिंह डोटासरा और राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड तक गुहार लगाई है, लेकिन अभी तक भी कोई रास्ता नहीं निकल पाया है। चयनित उम्मीदवारों की नियुक्ति प्रक्रिया तेज होने के बाद इन बेरोजगारों की चिंताएँ भी बढ़ने लगी हैं। उम्मीदवारों ने मुख्यमंत्री तक से लगाई गुहार उम्मीदवारों ने अपनी शिकायत बोर्ड के समझ रखी, लेकिन बोर्ड ने इस पर कोई ऐक्शन नहीं लिया। इतना ही नहीं मुख्यमंत्री तक को पत्र भेजा गया, लेकिन वहाँ भी इनकी सुनवाई न हो सकी। ऐसे में अब ये उम्मीदवार दर-दर भटक रहे हैं। रोज ट्विटर पर सीएम, आयोग और नेताओं को टैग कर ट्वीट कर रहे हैं, लेकिन उनकी इस समस्या पर कोई खास ध्यान नहीं दे रहा है। राजस्थान बेरोजगार एकीकृत महासंघ के प्रदेश संयोजक उपेन यादव का कहना है कि सरकार से माँग है कि चयनित अभ्यर्थियों को जल्द से जल्द नियुक्ति देने के साथ कम किए गए पदों को वापस जोड़कर एक और लिस्ट जारी की जाए। नेताओं ने उठाया मुद्दा राजस्थान LDC भर्ती में लग रहे आरोपों के बाद इस मुद्दे को राजस्थान के कई नेताओं ने भी उठाया। सांसद किरोड़ी लाल मीणा जो कि राजस्थान सरकार में कैबिनट मंत्री रह चुके हैं, उन्होंने इस मुद्दे को उठाया। इसके अलावा राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के हनुमान बेनीवाल और बीजेपी नेता राजेंद्र राठौर ने इस मामले को लेकर सरकार को घेरा है। क्या है मामला? राजस्थान अधीनस्थ एवं मंत्रालयिक सेवा चयन बोर्ड, जयपुर ने लिपिक ग्रेड-2 और जूनियर असिस्टेंट की भर्ती के लिए 16 अप्रैल 2018 को विज्ञापन जारी किया था। उस विज्ञापन के मुताबिक स्टेट सेक्रेट्रिएट के लिए 329 सीट, राजस्थान लोक सेवा आयोग में 9 सीट और अधीनस्थ विभागों की 10917 सीटों के लिए आवेदन माँगे गए थे। तीनों को मिलाकर कुल 11255 पदों पर भर्तियाँ होनी थी। लेकिन इसके बाद प्री परीक्षा से पहले आयोग ने पदों की संख्या बढ़ा दी और इसके संबंध में 1 मार्च 2019 को एक नोटिस जारी किया गया।
श्री @ashokgehlot51 जी LDC 2018 भर्ती में राजस्थान कर्मचारी चयन बोर्ड द्वारा आरक्षण व सीटो को लेकर जो धांधली हुई है उस पर आपको व्यक्तिगत बयान देकर सुधार करवाने की जरूरत है,राज्य का युवा जिम्मेदारो के ऐसे कृत्य से निराश है !@RajCMO#LDC2018_SCAM#LDC2018_Reservation_Scam
1 मार्च 2019 के नोटिफिकेशन के अनुसार कुल पदों की संख्या 12456 हो गई, जिसमें RPSC के 35 सचिवालय के 329 और अधीनस्थ विभाग के 12092 पद थे। इसके बाद राजस्थान सरकार की अधिसूचना के अनुसार MBC वर्ग के 4% पद अतिरिक्त बढ़ाए गए और कुल पदों की संख्या 12906 हो गई। नॉन-टीएसपी के 562 पदों का हिसाब भी बोर्ड ने किसी दस्तावेज के जरिए अभी तक नहीं दिया है।
LDC 2018 भर्ती में OBC के 227 और General के 360 पदों को मिलाकर 587 पदों की कटौती की है यह सारी की सारी कटौती सिर्फ ओबीसी और जनरल वर्ग से की गई है 2 साल की कठिन मेहनत के बाद परिणाम के अंतिम समय में आरक्षण के साथ छेड़छाड़ करके इस तरह कटौती असंवैधानिक है@SachinPilot@vishvendrabtp
LDC भर्ती में दस्तावेज सत्यापन के समय अधीनस्थ विभाग में सामान्य वर्ग की 5303 और OBC वर्ग की 2093 सीटें थीं तो अंतिम परिणाम में ये 4943 और 1866 कैसे रह गईं? चयन बोर्ड ARD और कार्मिक विभाग ने OBC,जनरल की 587 सीटों मैं हेरफेर कर दिया@ashokgehlot51@RajCMO#LDC2018_Reservation_Scam
उम्मीदवारों का कहना है कि विडंबना यह है कि अभी तक बोर्ड ने नोटिस में कहीं नहीं बताया है कि कितने पदों पर LDC 2018 भर्ती की गई है और कितने अभ्यर्थियों को चयनित किया गया है और कितने पद MBC के अतिरिक्त सर्जित किए गए हैं। एलडीसी भर्ती के परिणाम के नोटिस को जब बोर्ड द्वारा जारी पिछली 6-7 भर्तियों से तुलना करें तो इसमें साफ-साफ नजर आता है कि पदों में घोटाला किया गया है और पारदर्शिता बिल्कुल नहीं है, कुछ छुपाया जा रहा है। बोर्ड द्वारा पदों की संख्या के बारे में किसी भी तरह की जानकारी नहीं दी जा रही है। मुकेश नाम के एक उम्मीदवार ने लिखा, ”LDC 2018 भर्ती में OBC के 227 और General के 360 पदों को मिलाकर 587 पदों की कटौती की है। यह सारी की सारी कटौती सिर्फ ओबीसी और जनरल वर्ग से की गई है। 2 साल की कठिन मेहनत के बाद परिणाम के अंतिम समय में आरक्षण के साथ छेड़छाड़ करके इस तरह कटौती असंवैधानिक है।” एक उम्मीदवार लक्ष्मी ने लिखा, ”इतिहास में पहली बार किसी भर्ती के कुल पदों की संख्या नहीं बताई गई, मेरिट लिस्ट जारी नहीं की, वर्ग-वार और विभाग-वार रिक्त पदों की जानकारी नहीं दी लेकिन चुपके से काउंसलिंग करवा ली। भर्ती से संबंधित अधिकारी इस घोटाले को दबा रहे।” सचिन नाम के एक उम्मीदवार ने ट्वीट कर लिखा, “LDC भर्ती में दस्तावेज सत्यापन के समय अधीनस्थ विभाग में सामान्य वर्ग की 5303 और OBC वर्ग की 2093 सीटें थीं तो अंतिम परिणाम में ये 4943 और 1866 कैसे रह गईं? चयन बोर्ड ARD और कार्मिक विभाग ने OBC,जनरल की 587 सीटों में हेरफेर कर दिया।”
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 2014 में 56 इंच सीने वाले नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने पर लोगों की अपेक्षा थी, कि देश से आरक्षण रूपी नाग का फन कुचल दिया जाएगा, लेकिन हो रहा एकदम विपरीत। देश के अन्य प्रधानमंत्रियों की भाँति 56 इंच चौड़ा सीना भी आरक्षण रूपी नाग का पुजारी बन गया। सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण देने के लिए संविधान में जो संशोधन किए गए हैं, वर्तमान सरकार ने आने वाली सरकारों के लिए जी का जंजाल बना दिया है। वास्तव में आरक्षण प्रतिभाशाली युवाओं के भविष्य को अन्धकारमय बना रखा है। अवलोकन करें:--
THE purpose of implementing the reservations in Independent India was to…
आगामी लोकसभा चुनाव (Lok sabha elections 2019) को देखते हुए जाट भी आरक्षण की मांग को लेकर सामने आ गए हैं। जाट आरक्षण को लेकर दिल्ली में जाटों ने प्रेस वार्ता कर कहा, 'सरकारों ने जाटों को आरक्षण के मामले पर भ्रमित किया है, इसलिए सरकार के विरोध में प्रचार-प्रसार किया जाएगा। उन्होंने धमकी भरे लहजे में कहा कि वे जींद जाकर लोगों को कहेंगे कि जो आरक्षण की बात करेगा, सिर्फ उस नेता को ही वोट दें, या फिर नोटा (NOTA) का बटन दबा दें। जाट आरक्षण बचाओ महा आंदोलन की तरफ से कई राज्यों के जाट नेताओं ने इसका ऐलान किया। उन्होंने आरोप लगाया कि हरियाणा की मौजूदा सरकार ने जाट समाज को ठगने का काम किया है। आर्थिक आधार पर सवर्ण गरीबों को 10 फीसदी आरक्षण दिए जाने के सवाल पर जाटों ने कहा कि जब सरकार सबका साथ सबका विकास की बात करती है तो उनकी मांग को क्यों नहीं पूरा किया जा रहा है। ऑल इंडिया जाट आरक्षण बचाओ आंदोलन के चीफ कॉर्डिनेटर धर्मवीर चौधरी ने कहा कि हरियाणा और केंद्र की मौजूदा सरकार ने जाटों को ठगने का काम किया है। हम जाट समाज से अनुरोध करेंगे कि वे केवल आरक्षण दिलाने वाले नेताओं को ही वोट दें नहीं तो नोटा दबा दें। हाल में मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में हुए विधानसभा चुनावों में SC\ST एक्ट से नाराज राजपूतों ने भारी संख्या में नोटा का बटन दबा दिया था। ऐसे में जाट समाज की ओर से भी अगर लोकसभा चुनाव में नोटा का बटन दबाया जाता है तो यह सभी राजनीतिक दलों के लिए नुकसानदायक साबित हो सकता है।
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार सवर्ण आरक्षण पर बीएसपी प्रमुख मायावती ने कहा, उनकी पार्टी आरक्षण पर संविधान संशोधन बिल का समर्थन करेगी। साथ ही उन्होंने कहा, ये मोदी सरकार का छलावा है। सरकार ने पहले ये फैसला क्यों नहीं लिया। मायावती ने कहा, बीएसपी चीफ ने एएनआई से कहा, लोकसभा चुनाव से पहले लिया गया ये फैसला हमें सही नीयत से लिया गया फैसला नहीं लगता है। चुनावी स्टंट लगता है। राजनीतिक छलावा लगता है। अच्छा होता अगर बीजेपी अपना कार्यकाल खत्म होने से ठीक पहले नहीं बल्कि और पहले ले लेती। केंद्रीय कैबिनेट ने आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णो को सरकारी नौकरियों और शैक्षिक संस्थानों में 10% आरक्षण देने को जनवरी 7 को मंजूरी दे दी। सूत्रों ने बताया कि कैबिनेट ने ईसाइयों व मुस्लिमों सहित 'अनारक्षित श्रेणी' के लोगों को नौकरियों व शिक्षा में 10% आरक्षण देने का फैसला लिया। इसका फायदा 8 लाख रुपए वार्षिक आय सीमा और करीब 5 एकड़ भूमि की जोत वाले गरीब सवर्णो को मिलेगा।View image on Twitter
BSP chief Mayawati to ANI: Lok Sabha chunaav se pehle liya gaya ye faisla humein sahi niyat se liya gaya faisla nahi lagta hai, chunavi stunt lagta hai, rajnitik chalaava lagta hai, acha hota agar BJP apna karyakaal khatam hone se thik pehle nahi balki aur pehle le leti.
सूत्रों के मुताबिक प्रस्तावित कदम अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के मौजूदा 50% आरक्षण में दिक्कत नहीं पैदा करेगा। सूत्रों के अनुसार, 'इस कोटा में किसी भी आरक्षण के प्रावधान के तहत नहीं आने वाले वर्गो जैसे ब्राह्मण, बनिया, ठाकुर, जाट, गुज्जर, मुस्लिम और ईसाई शामिल होंगे।' कांग्रेस ने आरक्षण की मंजूरी देने के पीछे के इरादे पर सवाल उठाया और जानना चाहा कि नौकरियां कहां हैं। कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने कहा कि इस फैसले के पीछे का इरादा जनता का वास्तव में कल्याण करने के बदले राजनीति ज्यादा है। नेता समाज समझता है की जनता पागल और मुर्ख है। लेकिन सवर्ण इतना मुर्ख नहीं, जितना समझा जा रहा है। मतदान में NOTA का प्रयोग पहले से अधिक होगा, क्योकि केवल10% आरक्षण देकर जिस आग को बुझाने का प्रयास किया गया है, वह और अधिक भड़केगी। देखिए आयकर की क्या सीमा है, और 8 लाख वार्षिक आय वालों को आरक्षण? है ना कितना हास्यप्रद? अभी सम्पन्न हुए राज्यों में मिली हार से सरकार इतनी विचलित हो गयी है की उचित अथवा अनुचित का चिंतन करने का भी समय नहीं। लोकसभा चुनावों से पहले सरकार का बड़ा दांव, गरीब सवर्णों को 10% आरक्षण देने का प्रस्ताव लोकसभा चुनाव में अब 100 दिन से भी कम बचे हैं। ऐसे में केंद्र सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया है। कैबिनेट ने सामान्य श्रेणी में आर्थिक रूप से पिछड़ों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण को मंजूरी दे दी है। सामान्य श्रेणी में आर्थिक रूप से पिछड़ों के लिए कोटा मौजूदा 50 प्रतिशत आरक्षण से ऊपर और अधिक होगा। सरकार आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए कोटा पर संविधान संशोधन विधेयक कल संसद में ला सकती है। ऐसे में आरक्षण का कोटा 50% से बढ़कर 60% हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार 50% से अधिक आरक्षण नहीं किया जा सकता। अभी तक 22.5% अनुसूचित जाति (दलित) और अनुसूचित जनजाति (आदिवासी) के छात्रों के लिए आरक्षित हैं (अनुसूचित जातियों के लिए 15%, अनुसूचित जनजातियों के लिए 7.5%), ओबीसी के लिए अतिरिक्त 27% आरक्षण को शामिल करके आरक्षण का यह प्रतिशत 49.5% है। अवलोकन करें:--
आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार आरक्षण नाग इतना भयंकर और खतरनाक है, जिसने…
मोदी सरकार का यह फैसला 2019 के लोकसभा चुनावों में उसके लिए गेमचेंजर साबित हो सकता है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों में मिली भाजपा की हार की एक वजह एससी-एसटी एक्ट के खिलाफ सवर्णों की नाराजगी भी बताई जा रही है। समझा जाता है कि सरकार आरक्षण का मरहम लगा गरीब सवर्णों को अपने पाले में करने का दांव खेला है। भाजपा सांसद एवं दलित नेता उदित राज ने गरीब सवर्णों को आरक्षण देने के सरकार के फैसले का स्वागत किया है।
आरक्षण नाग इतना भयंकर और खतरनाक है, जिसने 56 इंच सीने को भी डस लिया। विश्व में भारत ही शायद एकमात्र देश है, सम्भव है मेरा ज्ञान अपरिपक्व हो, जहाँ आरक्षण और जातियों को आधार बनाकर चुनाव लड़े जाते हैं। समझ नहीं आता भारत से आरक्षण की आग कब बुझेगी?
नेता समाज समझता है की जनता पागल और मुर्ख है। लेकिन सवर्ण इतना मुर्ख नहीं, जितना समझा जा रहा है। मतदान में NOTA का प्रयोग पहले से अधिक होगा, क्योकि केवल10% आरक्षण देकर जिस आग को बुझाने का प्रयास किया गया है, वह और अधिक भड़केगी। देखिए आयकर की क्या सीमा है, और 8 लाख वार्षिक आय वालों को आरक्षण? है ना कितना हास्यप्रद? अभी सम्पन्न हुए राज्यों में मिली हार से सरकार इतनी विचलित हो गयी है की उचित अथवा अनुचित का चिंतन करने का भी समय नहीं।
लोकसभा चुनावों से पहले सरकार का बड़ा दांव, गरीब सवर्णों को 10% आरक्षण देने का प्रस्ताव लोकसभा चुनाव में अब 100 दिन से भी कम बचे हैं। ऐसे में केंद्र सरकार ने एक बड़ा फैसला लिया है। कैबिनेट ने सामान्य श्रेणी में आर्थिक रूप से पिछड़ों के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण को मंजूरी दे दी है। सामान्य श्रेणी में आर्थिक रूप से पिछड़ों के लिए कोटा मौजूदा 50 प्रतिशत आरक्षण से ऊपर और अधिक होगा। सरकार आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए कोटा पर संविधान संशोधन विधेयक कल संसद में ला सकती है। ऐसे में आरक्षण का कोटा 50% से बढ़कर 60% हो सकता है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार 50% से अधिक आरक्षण नहीं किया जा सकता। अभी तक 22.5% अनुसूचित जाति (दलित) और अनुसूचित जनजाति (आदिवासी) के छात्रों के लिए आरक्षित हैं (अनुसूचित जातियों के लिए 15%, अनुसूचित जनजातियों के लिए 7.5%), ओबीसी के लिए अतिरिक्त 27% आरक्षण को शामिल करके आरक्षण का यह प्रतिशत 49.5% है। मोदी सरकार का यह फैसला 2019 के लोकसभा चुनावों में उसके लिए गेमचेंजर साबित हो सकता है। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ विधानसभा चुनावों में मिली भाजपा की हार की एक वजह एससी-एसटी एक्ट के खिलाफ सवर्णों की नाराजगी भी बताई जा रही है। समझा जाता है कि सरकार आरक्षण का मरहम लगा गरीब सवर्णों को अपने पाले में करने का दांव खेला है। भाजपा सांसद एवं दलित नेता उदित राज ने गरीब सवर्णों को आरक्षण देने के सरकार के फैसले का स्वागत किया है। जानें आखिर सवर्णों में किसे-किसे ये आरक्षण मिल सकता है:
जिसकी सलाना इनकम 8 लाख रुपए या इससे कम है
जिसके पास 5 एकड़ या उससे कम खेती जमीन है
जिसका 1000 वर्ग फुट से कम जमीन पर मकान है
कस्बों में 200 गज जमीन वालों को, शहरों में 100 गज जमीन वालों को
राजपूत, भूमिहार, बनिया, जाट, गुर्जर को इस श्रेणी में आरक्षण मिलेगा
आरक्षण शिक्षा (सरकार या प्राइवेट), सार्वजनिक रोजगार में इसका लाभ मिलेगा
इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में संशोधन होगा
आरक्षण आर्थिक रूप से पिछड़े ऐसे गरीब लोगों को दिया जाएगा जिन्हें अभी आरक्षण का फायदा नहीं मिल रहा है
लोकसभा चुनाव से पहले केंद्र की मोदी सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। केंद्रीय कैबिनेट में फैसला किया है कि आर्थिक रूप से पिछड़े सवर्णों को 10 प्रतिशत आरक्षण दिया जाएगा। इस आरक्षण की खास बात यह है कि यह 50 फीसदी आरक्षण की सीमा के ऊपर होगा और इसके लिए मंगलवार को संविधान संशोधन लाया जाएगा। ध्यान देने वाली बात यह कि मंगलवार को ही शीतकालीन सत्र का आखिरी दिन है। इस मामले पर तमाम राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं आनी शुरू हो गई हैं।
See last two tweets re reservation 4forwards? Qs—did u nt think of this for 4 yrs 8 mths? so obviously thought of as election gimmick 3mths b4 model code! (3) u know u cannot exceed 50% maxima so it is done only to posture tht u tried unctal thing (4) do u hv majority 4ctal am?
कैबिनेट के इस प्रस्ताव पर कांग्रेस की तरफ से पहली प्रतिक्रिया वरिष्ठ नेता और सुप्रीम कोर्ट के वकील अभिषेक मनु सिंघवी की आई है। सिंघवी ने कहा, 'सरकार ने गरीब सवर्णों को आरक्षण देने का फैसला किया है। आपने इसके लिए 4 साल 8 महीने का इंजार किया? तो यह निश्चित रूप से एक चुनावी छलावा है वो भी ऐसे समय में जब आचार संहिता लगने में केवल 3 महीने बचे हैं। आप जानते हैं कि आप सीमा को अधिकतम 50 फीसदी ही बढ़ा सकते हैं।' भाजपा नेता और केंद्रीय मंत्री शिव प्रताप शुक्ला ने कहा, 'केंद्र सरकार का यह कदम सराहनीय है। इसकी मांग काफी लंबे समय से चल रही थी। यह सवर्णों के लिए एक ऐतिहासिक कदम है।' भाजपा सांसद और दलित नेता उदित राज ने कहा कि सरकार का यह कदम सराहनीय है। वहीं दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा, 'चुनाव के पहले भाजपा सरकार संसद में संविधान संशोधन करे। हम सरकार का साथ देंगे। नहीं तो साफ़ हो जाएगा कि ये मात्र भाजपा का चुनाव के पहले का स्टंट है।' शिवसेना ने भी इस पर बड़ा बयान देते हुए कहा कि वह इस बिल का समर्थन करेगी। शिवसेना सांसद अनिल देसाई ने कहा, 'हम इस बिल का पूरा समर्थन करते हैं। यह बाल ठाकरे का विचार था कि आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को भी आरक्षण मिले।' पाटीदारों को आरक्षण की मांग को लेकर आंदोलन करने वाले हार्दिक पटेल ने कहा, 'मोदी सरकार ने चुनाव से पहले एक लॉलीपॉप दिया है।' एआईएएम नेता असदउद्दीन ओवैसी ने ट्वीट कर प्रतिक्रिया देते हुए कहा, 'दलितों के साथ ऐतिहासिक अन्याय को सही करना आरक्षण का मतलब है। गरीबी उन्मूलन के लिए कोई भी विभिन्न योजनाएं चला सकता है लेकिन आरक्षण न्याय के लिए है। संविधान आर्थिक आधार पर आरक्षण की अनुमति नहीं देता है।' आरजेडी नेता और बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने कहा कि भारत सरकार को पहले जातिगण जनगणना के आंकड़े सामने लाने चाहिए जिससे पता चल सकेगा कि कौन सी जातियां क्या काम करती हैं। सीपीआई के डी राजा ने सुप्रीम कोर्ट ने पहले से आरक्षण पर एक कैप लगाई है, राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश से भाजपा को जो रिपोर्ट्स मिल रही थी उसके आधार पर भाजपा ने यह फैसला लिया है। लोकसभा चुनाव में विधानसभा चुनाव की भरपाई करने के लिए यह कदम उठाया गया है।View image on Twitter
Harish Rawat,Congress on 10% reservation approved by Cabinet for economically weaker upper castes: 'Bohot der kar di meherbaan aate aate', that also when elections are around the corner. No matter what they do, what 'jumlas' they give, nothing is going to save this Govt
कांग्रेस नेता और उत्तराखंड के पूर्व मुख्यमंत्री हरीश रावत ने कहा, 'बहुत देर कर मेहरबॉं आते-आते। वो भी तब, जब चुनाव नजदीक है। सरकार कुछ भी कर ले, कोई भी फैसला इनको नहीं बचा सकता। एनसीपी ने सशर्त समर्थन देने का ऐलान किया है, एनसीपी नेता नवाब मलिक ने कहा, 'हम बिल का समर्थन करेंगे लेकिन शर्त ये है कि सरकार में संशोधन लाए।' जिनको पहले से आरक्षण मिला हुआ है उनको दिया जा रहा है। भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय ने कहा, 'इसकी आवश्यकता पहले से थी, गरीब और सवर्णों को आरक्षण मिल रहा है मेरी नजर में यह सरकार का क्रांतिकारी कदम है।'