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‘अखिलेश यादव को जूते से मारेंगे, ये सपा की चाल’: अतीक के बेटे के जनाजे में शामिल महिलाओं का फूटा गुस्सा, देखिए वीडियो

'योगी को वोट देंगे, अखिलेश-मायावती को मारेंगे जूते' (फोटो साभार: Rajadharm का यूट्यूब चैनल)
अतीक अहमद और उसके भाई की गोली मारकर हत्या कर दी गई। इससे पहले अतीक का बेटा असद भी पुलिस एनकाउंटर में मारा गया था। उसे अब दफनाया जा चुका है। लेकिन इस हत्या ने लगभग 50 वर्ष पुराने नागरवाला की रहस्मयी मौत की याद ताजा कर दी है, क्योकि चर्चा यह भी है कि योगी पुलिस के कंधे किसी और ने खेला खेल दिया। वर्ना जनाजे में आए लोगों का अखिलेश और मायावती पर नहीं फूटता? लेकिन इससे पहले उसके जनाजे में आईं महिलाओं का कहना है कि योगी ने जो किया है वह सही है। उन्होंने कहा कि अगर अगर अखिलेश यादव और मायावती वोट माँगने आएँगीं तो जूते से मारकर भगा दिया जाएगा।

दरअसल, ‘द राजधर्म’ नामक यूट्यूब चैनल ने असद अहमद के जनाजे में आई महिलाओं से बातचीत की है। इस बातचीत के दौरान शबनम नामक महिला ने कहा है कि अखिलेश यादव की चाल के चलते यह सब हुआ है। अखिलेश यादव ने मिट्टी में मिलाने के लिए उकसाया था। अखिलेश यादव मुसलिमों के वोट के लिए सब बोल रहे हैं। मुस्लिम बेवकूफ नहीं है कि उनको वोट देगा। अखिलेश यादव के कारण ही असद मारा गया है। कोई और कारण नहीं है। शबनम ने आगे है कि वह बाबाजी (योगी आदित्यनाथ) को वोट देंगी। लेकिन अखिलेश यादव और बहन जी (मायावती) को वोट नहीं देंगी। उन्हें जूते से मारकर भगाएँगी।

एक अन्य व्यक्ति ने कहा है कि वह गोरखपुर मठ में गए थे, तब योगी कुछ भी नहीं थे। योगी मुस्लिमों का पहले न्याय करते हैं। अखिलेश यादव ने सीएम योगी को ताव दिला दिया। हो सकता है कि इस सबके पीछे अखिलेश यादव का हाथ हो। उन्हें लगता है कि इसमें सपा की कोई चाल है। इसकी जाँच होनी चाहिए। जाँच में दूध का दूध पानी का पानी हो जाएगा। रजिया नामक महिला ने कहा है कि योगी बहुत अच्छे हैं, वह राशन देते हैं। गरीबों की मदद करते हैं। बच्चों की पढ़ाई के लिए पैसा देते हैं। सब करते हैं। वह कहीं से गलत नहीं है, उन्हें कहीं से भी गलत साबित नहीं किया जा सकता।

एक अन्य महिला ने एनकाउंटर को लेकर कहा है कि अखिलेश यादव ने कहीं न कहीं इस सब में एक खेल खेला है। इन लोगों को इस्तेमाल किया है। इसके बाद यह सब कर दिया। अखिलेश अगर इतने ही अच्छे होते तो वह योगी जी को भड़काते ही क्यों?


‘ममता बनर्जी की पैंटी में आग, मायावती आदमी जैसी’: गंदी बातों का ‘वीर’ है ये कॉमेडियन, सेक्स का ‘दास’

वीर दास (साभार: हिंदुस्तान टाइम्स)
कुछ दिन पहले अमेरिका के जॉन एफ केनेडी सेंटर में खड़े होकर कथित कॉमेडियन वीर दास ने अपने वनलाइनर्स से जमकर भारत विरोधी प्रोपगेंडा फैलाया था। 7 मिनट तक उसने देश की पत्रकारिता, यहाँ की राजनीति, नारी की इज्जत, प्रधानमंत्री मोदी, लखीमपुर खीरी जैसे स्थानीय मुद्दे सब पर सवाल खड़े किए। उसकी वीडियो के सामने आने के बाद भारत में कई जगह उसके विरुद्ध शिकायतें हुईं और लोगों ने भारत का अपमान करने के आरोप में उसे सजा देने की माँग की।

देश में ऐसे भी लोग हैं, जो देश और नारी का अपमान करने पर उसके बचाव में आ तो गए हैं, लेकिन यह भूल रहे हैं कि पूर्व में ममता बनर्जी और मायावती पर अभद्र कॉमेडी कर नेताओं का भी अपमान कर चूका है। 

इन सबके अलावा सोशल मीडिया पर उसके कुछ पुराने पोस्ट और ट्वीट सोशल मीडिया पर सामने आए जिसने दर्शाया कि वो वीर दास जो भारत को बलात्कारियों का देश बताता है वो असल में खुद महिलाओं पर भद्दी टिप्पणियाँ करने से कभी गुरेज नहीं करता। उसने न किसी की माँ को उलटा बोलने पर शर्म आती है, न महिलाओं के अंगों पर।

वीर दास ने साल 2010 से ही सोशल मीडिया पर अपनी गंदे विचार पोस्ट करने शुरू कर दिए थे। खबर में जोड़े गए ट्वीट्स में देख सकते हैं कि महिलाओं की छाती से लेकर ममता बनर्जी की पैंटी तक पर वीर दास ने कैसे भद्दी कॉमेडी की हुई है।

उसकी कॉमेडी की एक वीडियो है जिसमें उसने यूपी की पूर्व मुख्यमंत्री और दलित नेता मायावती को मर्दों जैसा बताया। उनकी आवाज को पेंगुइन जैसा कहा।

इतना ही नहीं वीर दास के मन में बुजुर्ग महिलाओं के प्रति कितनी इज्जत है इसका मालूम भी उनके ट्वीट से चलता है जिसमें उसने लिखा है कि उसकी 17 घंटे काम करने के बाद उसकी आँख दादी माँ की छाती जैसी हो गई है।

उसका एक ट्वीट एयरपोर्ट पर घोषणा करने वाली महिला के लिए भी है। जिसमें उसने लिखा, “मैं चाहता हूँ कि कोई एयरपोर्ट पर अनाउंसमेंट करने वाली महिला के साथ सेक्स करना शुरू करे और बीच में रुक जाए ताकि वो बोल सके- कृपया ध्यान दीजिए।”

दिलचस्प बात ये है कि देश की आम महिलाओं से लेकर प्रतिष्ठित पदों पर रहने वाली महिलाओं को लेकर भद्दी राय देने वाले वीर दास आज भारत के लिबरल धड़े में सबसे मशहूर हैं। खुलकर उनकी देशविरोधी कविता पर उनको समर्थन दिया जा रहा है और केवल वीर दास ही नहीं…ऐसे तमाम कॉमेडियन हैं जिनकी भाषा हमेशा भारत विरोधी और महिला विरोधी नोटिस की गई।

तन्मय भट्ट का ट्वीट देखिए। एक छोटी बच्ची को लेकर ये राय रखते हैं कि अगर वो उनके सामने नंगी आ जाए तो उनके दिमाग में चलेगा…”हा हा- मैं तुम्हारे b***s देख लिए।” संजय राजौरा भी एक कॉमेडियन ही हैं जिनपर एक युवती ने यौन शोषण का आरोप लगाया था और बताया था कि कैसे संजय ने अपने दोस्तों के सामने शेखी बघारते हुए उन्हें शर्मिंदा किया था।

अवलोकन करें:-

‘भारत में सुबह नारी को पूजते हैं, रात में करते हैं गैंगरेप’ : कॉमेडी के नाम पर वीर दास ने अमेरिका

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‘भारत में सुबह नारी को पूजते हैं, रात में करते हैं गैंगरेप’ : कॉमेडी के नाम पर वीर दास ने अमेरिका
भारत के विरुद्ध बोलकर लिबरल गिरोह 

क्या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ वास्तव में "किसानों के खलनायक" हैं?

मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री", समाचार संपादक, उगता भारत 

एक राष्ट्रीय समाचार पत्र की ख़बर के अनुसार सुश्री मायावती के शासनकाल में गोरखपुर मंडल की नौ चीनी मिलों को औने-पौने दाम में बेचा गया था।

उत्तर प्रदेश राज्य चीनी निगम लिमिटेड के अधीन प्रदेश की 21 चीनी मिलों को सुश्री मायावती सरकार के कार्यकाल में 2010-11 में बेचा गया था। इनमें से 10 मिलें उस समय चालू हालत में थीं, 11 मिलें बंद थीं।

सीएजी की रिपोर्ट में मिलों को गलत तरीके से औने-पौने दाम में बेचे जाने की पुष्टि भी हुई थी। हालांकि बसपा के बाद सत्ता में आई अखिलेश सरकार ने इस पर कोई कार्यवाही नहीं की थी।

मिलों की वर्तमान कीमत से 15 गुना कम कीमत पर इन्हें बेचा गया था। सर्किल रेट और स्टांप ड्यूटी की अनदेखी कर भी करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान कराया गया था। साथ ही मिलों की मशीनों, आवासों, गोदामों का भी मनमाना रेट निर्धारित किया गया था। 

इसमें अमरोहा, चांदपुर, जरवल रोड, सिसवा बाजार, सहारनपुर, बुलंदशहर, बिजनौर, सकौती टाडा, रोहाना कला, खड्डा की चीनी मिलें चालू हालत में थी।

जबकि बरेली, हरदोई, बाराबंकी, शाहगंज, बैतालपुर, देवरिया, भटनी, घुघली, छितौनी, लक्ष्मीगंज और रामकोला की चीनी मिलें बंद थी। इनमें सिसवा बाजार और घुघली महराजगंज में थीं। खड्डा, छितौनी, लक्ष्मीगंज और रामकोला कुशीनगर तथा बैतालपुर, देवरिया व भटनी मिलें देवरिया में थीं। खड्डा चीनी मिल चालू हालत में थी।

7 जुलाई 2021 को पत्रिका.डॉटकाम में प्रकाशित एक ख़बर के अनुसार श्री योगी सरकार ने 4 साल में 45.44 लाख से अधिक गन्ना किसानों को 1 लाख 40 हजार करोड़ रुपये का भुगतान किया है। यह बसपा सरकार से दोगुना और सपा सरकार के मुकाबले डेढ़ गुना अधिक बताया जाता है। इस खबर के अनुसार बसपा सरकार में गन्‍ना किसानों को 55,000 करोड़ का कुल भुगतान किया गया था, जबकि सपा सरकार के पांच साल में गन्‍ना किसानों को 95,000 करोड़ रुपये का कुल भुगतान किया गया था। अखिलेश सरकार के कार्यकाल में गन्‍ना किसानों के 10659.42 करोड़ रुपये के बकाये का भुगतान भी योगी सरकार ने किसानों को किया है।

2007 से 2017 तक जितना कुल भुगतान किसानों को हुआ था उतना योगी सरकार ने सिर्फ 4 साल में कर दिया।

इस खबर के एक भाग में लेखक लिखता है कि पूर्ववर्ती सरकारों में एक के बाद एक बंद होती चीनी मिलों को योगी सरकार ने न सिर्फ दोबारा शुरू कराया गया बल्कि यूपी को देश में चीनी उत्‍पादन में नंबर वन बना दिया । राज्‍य सरकार ने तीन पेराई सत्रों एवं वर्तमान पेराई सत्र 2020-21 समेत यूपी में कुल 3,868 लाख टन से अधिक गन्ने की पेराई कर 427.30 लाख टन चीनी का रिकॉर्ड उत्पादन किया है । वर्ष 2017-18 से 31 जनवरी, 2021 तक 54 डिस्टिलरीज के माध्यम से प्रदेश में कुल 261.72 करोड़ लीटर एथनॉल का उत्पादन हुआ है। जो कि एक रिकार्ड है।

प्रदेश में लॉकडाउन के दौरान एक भी चीनी मिल बंद नहीं हुई। सभी 119 चीनी मिलें चलीं । प्रदेश में 45.44 लाख से अधिक गन्ना आपूर्तिकर्ता किसान हैं और लगभग 67 लाख किसान गन्ने की खेती से जुड़े हैं। आज देश में 47% चीनी का उत्पादन यूपी में हो रहा है और गन्ना सेक्टर का प्रदेश की जीडीपी में 8.45 प्रतिशत एवं कृषि क्षेत्र की जीडीपी में 20.18 प्रतिशत का योगदान है। (पत्रिका.डॉटकाम)

25 सालों में पहली बार 243 नई खांडसारी इकाइयों की स्थापना के लिए लाइसेंस जारी किये गए। जिनमें से 133 इकाइयां संचालित हो चुकी हैं। 

इसके बावजूद भी श्रीमान राकेश टिकैत सहित तमाम विपक्षी दल श्री योगी सरकार को "किसानों का खलनायक" बनाने पर तुले हुए हैं। किसानों की आड़ में श्री टिकैत बन्धु और तमाम विपक्ष अपनी डूबती हुई राजनीतिक नैया को पार लगाने में लगा है। कोई भी सच्चाई को सामने नहीं लाना चाहता है। जानबूझकर सरकार के खिलाफ किसानों के मन में ज़हर घोला जा रहा है। उधर किसान श्री राकेश टिकैत को "अन्ना हजारे" समझ बैठे हैं, उन्हें लगता है कि वह सत्य, न्याय और धर्म की रक्षा के लिए लड़ रहे हैं, जबकि सच इससे बिल्कुल परे है। श्री टिकैत बंधुओं की सारी लड़ाई उनके निजी स्वार्थ, राजनीतिक हित और अपनी पहचान बनाने तक सीमित है। इस आंदोलन से पहले उनकी वास्तविक राजनीतिक स्थिति यह थी कि वह दो बार चुनाव लड़े औऱ दोनों ही बार अपनी ज़मानत ज़ब्त करा बैठे। विपक्ष टिकैत का सहारा लेकर किसानों के कंधों पर रखकर बंदूक चला रहा है। उसको भी अपना उल्लू सीधा करना है।

बर्तमान में किसानों के नाम पर हो रही सारी लड़ाइयां और आंदोलन केवल और केवल सत्ता के लिए हैं, किसान तो केवल मोहरा बने हुए हैं। यह बात किसानों को समझनी ही होगी। 

सोनिया गाँधी से चरणजीत सिंह चन्नी को सीएम पद से हटाने की माँग : राष्ट्रीय महिला आयोग अध्यक्षा रेखा शर्मा

संविधान का जितना अधिक मजाक हमारे राजनीतिक दल बना रहे हैं, उसे देख लगता है, संविधान केवल शांतिप्रिय लोगों के लिए है, इन सियासतखोरों के लिए नहीं। जब संविधान सबको बराबरी का अधिकार देता हैं फिर आधार पर जात-पात की गन्दी सियासत खेल खेलकर चुनाव में जनता के धन का दुरूपयोग किया जा रहा है। जातों पर आधारित इतनी पार्टियां हैं, फिर भी उनका उत्थान नहीं हुआ, विपरीत इसके नेताओं का जरूर उत्थान हो गया। आरक्षण भी और चुनाव में भी आरक्षण, क्या है ये सब तमाशा? 
कैप्टन अमरिंदर सिंह के इस्तीफे के बाद जब कांग्रेस ने पंजाब में मुख्यमंत्री के तौर पर चरणजीत सिंह चन्नी को चुना तो इसे चुनावों से पहले शिअद-बसपा के दलित कार्ड की हवा निकालने के तौर पर देखा गया। लेकिन, दलित संगठनों ने इस फैसले को कांग्रेस का ‘चुनावी स्टंट’ बता नकार दिया है। दूसरी तरफ ‘मीटू’ (#MeToo) के आरोप भी चन्नी और कांग्रेस दोनों की मुसीबत बढ़ाते दिख रहे हैं। राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष रेखा शर्मा ने इसे उठाते हुए सोनिया गाँधी से उन्हें मुख्यमंत्री पद से हटाने की माँग की है।

कांग्रेस का ‘चुनावी स्टंट’ बता दलित संगठनों ने दुत्कारा

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक चरणजीत सिंह चन्नी को चुनने के कांग्रेस के फैसले की आलोचना करते हुए दलित यूनियनों ने कहा कि पार्टी एक तीर से दो निशाना साधने कर रही है, क्योंकि चन्नी दलित और सिख दोनों हैं। दलित यूनियनों का मानना है कि अगले साल राज्य में चुनाव होने से पहले बँटे हुए दलित वोट को एक ब्लॉक में मजबूत करने के लिए कांग्रेस ने यह रणनीति चली है।

पंजाब खेत मजदूर यूनियन के अध्यक्ष जोरा सिंह नसराली ने इस पर आक्रोश व्यक्त करते हुए कहा, “यह महज एक चुनावी स्टंट है। चन्नी दलित होने के साथ-साथ सिख भी हैं। पंजाब में अगले चार से पाँच महीने में चुनाव होंगे और चुनाव से 40 दिन पहले आचार संहिता लागू कर दी जाएगी। तो नया चेहरा क्या कर सकता है? वह कहेंगे कि मैं अभी नया हूँ और चीजों को समझने की कोशिश कर रहा हूँ।”

मंडी बोर्ड के महासचिव तरसेम सिंह सेवेवाला ने कहा, “जब तक नीतियाँ नहीं बदली जातीं, तब तक एक दलित सीएम या जाट सिख सीएम को कोई फर्क नहीं पड़ेगा। अब हम नए चुने गए सीएम को अपने सांझा मोर्चा के साथ 23 सितंबर की बैठक की अध्यक्षता करने के लिए कहेंगे। यह उनके लिए लिटमस टेस्ट होगा और बताएगा कि वह दलितों का कितना ध्यान रखते हैं। हालाँकि, पंजाब में पहले से ही 34 निर्वाचित दलित विधायक हैं। इससे हमारी हालत पर क्या फर्क पड़ा है? दलित को मुख्यमंत्री बनाना हमारे वोट बैंक को निशाना बनाना है। हर राजनीतिक दल हमें निशाना बना रहा है, कांग्रेस भी।”

चुनावी हथकण्डा : मायावती 

दलित नेता और बहुजन समाज पार्टी की प्रमुख मायावती ने भी चुनाव से ठीक पहले चन्नी को पंजाब के नए मुख्यमंत्री के रूप में शामिल करने के लिए कांग्रेस की आलोचना की है। उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री ने इसे आगामी पंजाब विधानसभा चुनावों के लिए कांग्रेस का चुनावी हथकंडा बताया।

मायावती ने कहा, “मुझे मीडिया के माध्यम से भी पता चला है कि पंजाब का अगला विधानसभा चुनाव एक गैर-दलित के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। इसका मतलब यह हुआ कि कांग्रेस को अभी भी दलितों पर पूरा भरोसा नहीं है। पंजाब में शिरोमणि अकाली दल-बसपा गठबंधन से भी कांग्रेस  डरी हुई है।”

दलित वोट-बैंक राजनीति खेलने के लिए कांग्रेस पार्टी की आलोचना करते हुए, पंजाब के मजदूर मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष भगवंत समो ने कहा, “शिरोमणि अकाली दल ने दलित वोट बैंक को देखते हुए बहुजन समाज पार्टी के साथ गठबंधन किया था। उन्होंने यह भी घोषणा की थी कि वे दलित को डिप्टी सीएम बनाएँगे। AAP ने भी इसी तरह की घोषणा की थी। भाजपा ने भी घोषणा की कि वे दलित को मुख्यमंत्री बनाएँगे। इसलिए, कांग्रेस ने अपने आंतरिक कलह को निपटाने के लिए कुछ महीनों के लिए दलित सीएम बनाया है। वे यह संदेश देने की कोशिश कर रहे हैं कि जहाँ अन्य दल घोषणा कर रहे हैं वे पहले ही दलित सीएम बना चुके हैं। यह दलित वोट बैंक की राजनीति है। अगर चन्नी इतने चिंतित थे, तो क्या वे कभी किसी ऐसे धरने पर गए जहाँ दलित विरोध कर रहे हैं? यह हमारे लिए शायद ही मायने रखता है कि सीएम कौन है।”

वहीं जमीं प्रपति संघर्ष समिति के एक सक्रिय सदस्य गुरमुख सिंह ने कहा, “2015 में, चन्नी ने संगरूर जिले के हमारे गाँव घ्राचोन का दौरा किया था, जहाँ दलित वार्षिक पट्टे पर खेती के लिए पंचायती भूमि का अपना हिस्सा पाने के लिए विरोध कर रहे थे। उन्होंने हमें आश्वासन दिया था कि अगर कांग्रेस की सरकार बनती है तो वह हमें 5,000 रुपए प्रति एकड़ के हिसाब से जमीन देंगे। लेकिन जब कांग्रेस सत्ता में आई तो उन्होंने इस मुद्दे पर कभी बात नहीं की। अब हम उनके चमकौर साहिब आवास पर जाकर उनसे पूछेंगे कि वह अब सीएम के रूप में क्या कर सकते हैं। सच्चाई जल्द ही सामने आ जाएगी।”

#Metoo का आरोप 

चन्नी पर ‘मीटू’ को लेकर आरोप लग चुका है जिसे लेकर वह कह चुके हैं कि यह तत्कालीन मुख्यमंत्री की शह पर किया गया था। उन्होंने कहा था कि उन्हें इसलिए निशाना बनाया जा रहा था क्योंकि उन्होंने राज्य में दलित मुद्दों को उठाया था। हालाँकि शिरोमणि अकाली दल (SAD) ने दलित कार्ड खेलने का आरोप लगाते हुए उनके इस्तीफे की माँग की थी।

इस मामले पर राष्ट्रीय महिला आयोग की अध्यक्ष ने ANI से बात करते हुए कहा है, “2018 में मीटू आंदोलन के दौरान उनके (चरणजीत सिंह चन्नी) के खिलाफ आरोप लगाए गए थे। राज्य महिला आयोग ने मामले का स्वत: संज्ञान लिया था और अध्यक्ष उन्हें हटाने की माँग को लेकर धरने पर बैठ गई थीं, लेकिन कुछ नहीं हुआ।”

उन्होंने कहा, “आज उन्हें एक महिला के नेतृत्व वाली पार्टी ने पंजाब का मुख्यमंत्री बनाया है। यह विश्वासघात है। यह महिला सुरक्षा के लिए खतरा है। उनके खिलाफ जाँच होनी चाहिए। वह सीएम बनने लायक नहीं है। मैं सोनिया गाँधी से उन्हें सीएम पद से हटाने का आग्रह करती हूँ।”

मामला 2018 का है और चन्नी पर आरोप लगा था कि उन्होंने एक महिला आईएएस अधिकारी को आपत्तिजनक मैसेज भेजा था। तब इस मामले ने खासा तूल पकड़ा था। हालाँकि महिला अधिकारी ने उस समय शिकायत दर्ज नहीं की थी और अमरिंदर सिंह ने भी कहा था कि मामला सुलझा लिया गया है। 18 मई 2021 को पंजाब महिला आयोग की चीफ मनीषा गुलाटी ने इस मामले को लेकर राज्य सरकार को नोटिस भेजा था। अब एक बार फिर से ट्विटर पर अरेस्ट चन्नी ट्रेंड कर रहा है।

राजस्थान : अलवर में 16 साल की दलित लड़की के साथ 3 बार किया गैंगरेप, लेकिन राहुल,प्रियंका, केजरीवाल, अखिलेश, मायावती और रावन सब खामोश

                                             प्रतीकात्मक 
भाजपा शासित राज्यों में किसी भी बलात्कार में जाति और मजहब देख सियासत का स्वांग करने वाले कांग्रेस शासित राज्य में दलितों पर होते अत्याचारों और उनकी महिलाओं के होने वाले बलात्कारों पर क्यों खामोश रहते हैं? क्या कांग्रेस शासित राज्य में दलितों का कोई आत्मसम्मान नहीं? आखिर ये सियासतखोर अपनी गन्दी और ओछी सियासत कब छोड़ेंगे?
राजस्थान के अलवर में नाबालिग लड़की से गैंगरेप किए जाने की खबर आई है। आरोप है कि तालीम ओर आमीन खान ने 3 बार छात्रा के साथ सामूहिक बलात्कार किया। ये घटना बड़ोदा मेव क्षेत्र के रौणपुर का बास गाँव की है। 16 वर्षीय दलित नाबालिग लड़की 10वीं कक्षा की छात्र है। तालीम और आमीन खान ने न सिर्फ उसके साथ गैंगरेप किया, बल्कि इस पूरी वारदात का अश्लील वीडियो भी शूट कर लिया।

ये दोनों बार-बार धमकी देते थे कि अगर किशोरी ने उनकी बात नहीं मानी तो वो इस आपत्तिजनक वीडियो को सोशल मीडिया पर वायरल कर देंगे। बड़ोदा मेव थाने में पीड़िता के पिता द्वारा दर्ज कराई गई FIR के अनुसार, इसी वीडियो के सहारे ब्लैकमेल कर के उनकी बेटी के साथ 3 बार गैंगरेप किया गया। पीड़िता अलवर के एक हॉस्टल में रह कर पढ़ाई करती है। आरोपित उसके गाँव के पड़ोसी ही हैं और पहले से ही दोस्ती के लिए दबाव बना रहे थे।

‘नवभारत टाइम्स’ की खबर के अनुसार, 2 फरवरी, 2021 को दोनों ने छात्रा का पीछा किया। घर से सरकारी स्कूल जाते समय रास्ते में घेर कर उस पर दोस्ती के लिए दबाव बनाया गया। जब वो इनकार करती रही तो पेय पदार्थ में नशा मिला कर उसे जबरन पिला दिया। इसके बाद बेहोशी की हालत में दोनों आरोपित पीड़िता को पास के एक खेत में लेकर गए। वहाँ उसका अश्लील वीडियो क्लिप शूट किया गया।

होश में आने पर धमकाया गया कि वो किसी से कुछ नहीं बताए। युवकों ने कहा कि अगर वीडियो वायरल हुआ तो तेरे ही घर वाले तुझे जान से मार डालेंगे। इसके बाद इसी वीडियो के सहारे उसका गैंगरेप करते रहे। साथ ही ब्लैकमेल कर के रुपए भी ऐंठ लिए। ‘ई-मित्र’ के जरिए उन्होंने बालिका से साढ़े 7 हजार रुपए निकलवा कर रख लिए। ब्लैकमेलिंग के डर से पीड़िता ने इस बारे में किसी को कुछ नहीं बताया।

हालाँकि, घर की ही एक महिला को इसकी भनक लगी तो राज़ खुला। इसके बाद शनिवार (7 अगस्त, 2021) को पिता ने थाने में FIR दर्ज करवाई। पुलिस ने दो युवकों के साथ-साथ उनके दो अन्य साथियों इदु व विजेंद्र के खिलाफ मामला दर्ज कर के उनकी तलाश में दबिश देना शुरू कर दिया है। थानाधिकारी चंद्रशेखर ने मीडिया को बताया कि अनुसंधान शुरू है। विपक्ष ने इस मामले में लेकर राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार को घेरा है।

‘हिन्दुओं को नापसंद करने के चलते मुसलमानों के पाले में खड़े होना बड़ी भूल होगी’ – डॉ भीमराव आंबेडकर

14 अक्टूबर 1956 को नागपुर स्थित दीक्षाभूमि में बाबा साहब डॉ. भीम राव आंबेडकर ने विधिवत बौद्ध धर्म स्वीकार किया। इसी दिन महाराष्ट्र के चंद्रपुर में आंबेडकर ने सामूहिक धर्म परिवर्तन का एक कार्यक्रम भी किया और अपने 385000 अनुयायियों को 22 प्रतिज्ञाएँ दिलवाईं, जिनका सार ये था कि बौद्ध धर्म अपनाने के बाद किसी हिंदू देवी देवता और उनकी पूजा में विश्वास नहीं किया जाएगा। हिंदू धर्म के कर्मकांड नहीं होंगे और ब्राह्मणों से किसी किस्म की कोई पूजा अर्चना नहीं करवाई जाएगी। 

इसके अलावा उन्होंने मनुष्य की समानता और नैतिकता को अपनाने संबंधी प्रतिज्ञा ली थी, मगर आज के ‘नवबौद्ध’ उनके मूल्यों से कोसों दूर हैं। आंबेडकर के नाम पर राजनीतिक रोटियाँ सेंकने वाले ‘नवबौद्धों’ में समानता और अहिंसा का कोई रूप नजर नहीं आता। हाल ही में उत्तर प्रदेश के हाथरस में हुई घटना को लेकर भीम आर्मी के प्रमुख चंद्रशेखर आजाद उर्फ ‘रावण’ का हंगामा सबने देखा।

जय भीम-जय मीम गिरोह ने इस्लाम पर बाबा साहब के विचारों को पढ़ा भी है क्या?

गौर करने वाली बात यह है कि ‘जय भीम जय मीम’ का नारा देने वाले ‘नवबौद्ध’ रावण के लिए बाकी किसी और जाति की तो छोड़िए, दलित भी एक समान नहीं हैं। वो दलितों को भी एक नजर से नहीं देखते हैं। ऐसा इसलिए क्योंकि हाथरस में हुई घटना को लेकर ‘रावण’ की नौटंकी तो हम सबने देखी, लेकिन क्या उसी राज्य के बलरामपुर में एक और दलित लड़की के साथ हुए बलात्कार पर रावण का बयान, ट्वीट या विरोध प्रदर्शन देखने को मिला। नहीं न… क्योंकि यहाँ आरोपित ‘मीम’ थे और हाथरस में आरोपित ठाकुर थे।

इसलिए हाथरस पर ‘संवेदनाओं’ और ‘एकजुटता’ को बोरियों में भर-भर कर उड़ेला गया, लेकिन वही बोरियाँ बलरामपुर की दलित पीड़िता के लिए खाली हो जाती है। खुद को आंबेडकर का अनुयायी बताने वाले ‘नवबौद्ध’ यहाँ पर इसलिए चुप हो जाते हैं, ताकि उनका ‘जय भीम जय मीम’ वाला संतुलन बना रहे और मुस्लिम तुष्टीकरण होता रहे।

राजस्थान में भी दलितों पर हो रहे अत्याचारों पर 'जय भीम जय मीम' का नारा देने वाले खामोश रहते हैं, क्योंकि वहां भी आरोपी 'जय मीम' ही होने के साथ-साथ कांग्रेस की सरकार है। अभी लगभग तीन दिन पूर्व ही वेतन मांगने पर शराब के ठेकेदार ने दलित को डीप फ्रीजर में जिन्दा मार दिया, किसी भी दलित प्रेमी की आवाज़ तक नहीं निकली और ना ही किसी मीडिया की।  

इसी तरह दिल्ली विश्वविद्यालय के 18 वर्षीय दलित छात्र राहुल की मुस्लिम लड़की के साथ प्रेम प्रसंग होने की वजह से मोहम्मद अफरोज और मोहम्मद राज ने अपने तीन अन्य साथियों के साथ मिलकर उस पर बर्बरतापूर्वक हमला किया। राहुल घायल अवस्था में ही अस्पताल पहुँचा जहाँ इलाज के दौरान उसकी मौत हो गई।

बलरामपुर और दिल्ली के आदर्श नगर की घटना ने दलित हितैषी कथित बुद्धिजीवियों को नंगा ही नहीं किया बल्कि उदित राज, मायावती और चंद्रशेखर जैसे कथित दलित हितैषी नेताओं की भी पोल खोल कर रख दी है। वे मौन हैं क्योंकि इस मामले में आरोपित न तो सवर्ण हैं और न ही बीजेपी से उनका कोई वास्ता। जय भीम-जय मीम के नाम पर दलितों के साथ होने वाले छलावे को यह मामला बेनकाब करता है। इसलिए सबने चुप्पी साध रखी है।

इन घटनाओं पर इनकी प्रतिक्रियाओं का अंतर यह भी बताता है कि कैसे मौकापरस्त गिरोह हमारे सामने किसी भी मामले को अपने एजेंडे के अनुसार पेश करता है। अपने नजरिए को ही अंतिम सत्य बताकर हम पर थोपने की कोशिश करता है। हाथरस मामले पर जिस सक्रियता से राणा अय्यूब जैसे कट्टरपंथी, दलित विचारक और उनके हितैषी बन बैठे थे, वह सभी इन घटनाओं पर मौन हो गए।

न किसी ने इस वाकये की निंदा की और न ही दलितों के भविष्य को लेकर अपनी चिंता जाहिर की। कारण शायद सिर्फ़ एक ही था कि हाथरस में आरोपित सवर्ण निकल आया था, जो इनके एजेंडे के लिए फिट था और दिल्ली में आरोपित मुस्लिम थे, इसलिए ये इनकी राजनीति के लिए फिट नहीं बैठता है।

बाबा साहब ने इस बारे में चेताया था

देश में उथल-पुथल मचा रहे वामपंथियों और बात-बात पर हर किसी को सहिष्णुता का पाठ पढ़ाने वाले यह बताएँ कि क्या किसी ने बाबा साहब को उस शिद्दत से पढ़ा भी है, उनके विचार समझने की कोशिश भी की है, जो कि आज के भारत के निर्माण में जरूरी भी है और समसामयिक भी। बाबा साहब अस्पृश्यता एवं जन्माधारित विशेषाधिकारों पर चल रही समाज व्यवस्था के कट्टर विरोधी थे।

उन्होंने हिन्दू समाज रचना के विविध पहलुओं का गंभीर चिन्तन करने के साथ भारत में मुस्लिम राजनीति का भी विस्तृत अध्ययन किया था। डॉ. आंबेडकर ने भारत पर मुसलमानों के क्रूर तथा रक्तरंजित आक्रमणों का गहराई से अध्ययन किया था। उन चाटुकारों तथा दिशाभ्रमित वामपंथी इतिहासकारों को फटकारते हुए उन्होंने लिखा है, “यह कहना गलत है कि ये सभी आक्रमणकारी केवल लूट या विजय के उद्देश्य से आए थे।”

बाबा साहब आंबेडकर ने अनेक उदाहरण देते हुए बताया कि इनका उद्देश्य हिन्दुओं में मूर्ति पूजा तथा बहुदेववाद को नष्ट कर भारत में इस्लाम की स्थापना करना था। इस संदर्भ में उन्होंने कुतुबुद्दीन ऐबक, अलाउद्दीन खिलजी, फिरोज तुगलक, शाहजहाँ, औरंगजेब और महमूद गजनवी की विस्तार से चर्चा की है। उन्होंने बताया कि हिन्दू मंदिरों को तोड़कर उस पर मस्जिद बनाए गए। बाबा साहब दलितों की जितनी दूरी ब्राह्मणों से रखने के पक्ष में थे, उससे कहीं ज्यादा दूरी वो दलितों को इस्लाम से रखने के पक्ष में थे। 

साभार: ‘पाकिस्तान और द पार्टीशन ऑफ़ इंडिया’
आंबेडकर इस्लाम में महिलाओं की स्थिति को लेकर चिंतित थे। वो बहु विवाह प्रथा के खिलाफ थे। आंबेडकर बहु विवाह प्रथा को महिला मुद्दों के साथ जोड़कर देखते थे। वो मानते थे कि इससे स्त्रियों को कष्ट होता है। उनका मानना था कि इस प्रथा में उनका शोषण और दमन होता है। हिन्दू समाज में जितनी कुरीतियाँ हैं, वो सभी मुस्लिमों में हैं ही, साथ ही कुछ ज्यादा भी हैं। मुस्लिम महिलाओं के ‘पर्दा’ प्रथा पर आंबेडकर ने कड़ा प्रहार करते हुए इसकी आलोचना की थी। उनका इशारा बुर्का और हिजाब जैसी चीजों को लेकर था। इन चीजों की आज भी जब बात होती है तो घूँघट को कुरीति बताने वाले लोग चुप हो जाते हैं।

इस्लाम में भाईचारा है, लेकिन कहाँ तक?

डॉ आंबेडकर ने साफ-साफ बताया, “मुसलमानों के लिए हिन्दू काफ़िर हैं, और एक काफ़िर सम्मान के योग्य नहीं है। वह निम्न कुल में जन्मा होता है, और उसकी कोई सामाजिक स्थिति नहीं होती। इस्लाम विश्व को दो भागों में बाँटता है, जिन्हें वे दारुल-इस्लाम तथा दारुल हरब मानते हैं। जिस देश में मुस्लिम शासक है, वह दारुल इस्लाम की श्रेणी में आता है। और जिस किसी देश में जहाँ मुसलमान रहते हैं परन्तु उनका राज नहीं है, वह दारुल-हरब होगा। इसके अनुसार उनके लिए भारत दारुल हरब है। इस तरह वे मानव मात्र में और भाईचारे में बिल्कुल भरोसा नहीं रखते हैं। यह साबित करने के लिए और सबूत देने की आवश्यकता नहीं है कि मुसलमान हिन्दू सरकार के शासन को स्वीकार नहीं करेंगे।”
इसके अलावा उन्होंने जिहाद पर चर्चा करते हुए कहा था कि हिजरत के अलावा मुस्लिम कानून की एक और निषेधाज्ञा जिहाद है, जिसके तहत हर मुसलमान शासक का यह कर्तव्य हो जाता है कि इस्लाम के शासन का तब तक विस्तार करता रहे, जब तक सारी दुनिया मुसलमानों के नियंत्रण में नहीं आ जाती। ऐसे कई उदाहरण भी हैं कि उन्होंने जिहाद की घोषणा करने में संकोच नहीं किया। इस्लामी सिद्धान्तों के अनुसार मुसलमानों द्वारा जिहाद की घोषणा करना न्यायसंगत है। वे जिहाद की घोषणा ही नहीं कर सकते, बल्कि उसकी सफलता के लिए विदेशी मुस्लिम शक्ति की मदद भी ले सकते हैं, और यदि विदेशी मुस्लिम शक्ति जिहाद की घोषणा करना चाहती है तो उसकी सफलता के लिए सहायता दे सकते हैं।
साभार:
‘पाकिस्तान और द पार्टीशन ऑफ़ इंडिया’

सिर्फ इस्लाम मानने वालों तक सीमित है भाईचारा

आंबेडकर के शब्दों में इस्लाम का भ्रातृत्व सिद्धांत मानव जाति का भ्रातृत्व नहीं है। यह मुसलमानों तक सीमित भाईचारा है। समुदाय के बाहर वालों के लिए उनके पास शत्रुता व तिरस्कार के सिवाय कुछ भी नहीं है। उनके अनुसार इस्लाम एक सच्चे मुसलमान को कभी भी भारत को अपनी मातृभूमि मानने की स्वीकृति नहीं देगा। मुसलमानों की भारत को दारुल इस्लाम बनाने की महत्वाकांक्षा हमेशा रही है। डा. अम्बेडकर ने स्पष्ट शब्दों में लिखा था, “इस्लाम में राष्ट्रवाद का कोई चिंतन नहीं है। इस्लाम में राष्ट्रवाद की अवधारणा ही नहीं है। वह राष्ट्रवाद को तोड़ने वाला मजहब है।”

आखिर क्यों बाबा साहब बौद्ध धर्म की ओर ही गए

आंबेडकर ने इस्लाम और ईसाइयत को विदेशी मजहब माना। वह धर्म के बिना जीवन का अस्तित्व नहीं मानते थे, लेकिन धर्म भी उनको भारतीय संस्कृति के अनुकूल स्वीकार्य था। इसी वजह से उन्होंने ईसाइयों और इस्लाम के मौलवियों का आग्रह ठुकरा कर बौद्ध धर्म अपनाया क्योंकि बौद्ध भारत की संस्कृति से निकला एक धर्म है।

साभार: ‘पाकिस्तान और द पार्टीशन ऑफ़ इंडिया’
बाबा साहब के विचारों को समझने की जरूरत

1945 में डॉ. आंबेडकर की पुस्तक “थाट्स ऑन पाकिस्तान” प्रकाशित हुई, जिसने उनके प्रखर देशभक्त विचारों से अवगत कराया। भारत की राजनीतिक एकता को मूर्तरुप देने का जैसा शानदार कार्य सरदार पटेल ने अंजाम दिया, उसी कोटि का कार्य राष्ट्र की सामाजिक एकता को शक्तिशाली बनाते हुए बाबा साहब डॉक्टर आंबेडकर ने किया।

लेकिन दुखद है कि अलगाववाद की नीति अपनाने वाले भारत में ही रहने वाले कई लोग और वामपंथी ताकतें हमेशा इस देश को और इस एकता को खंडित करने में जुटे रहे हैं। कोरोना महामारी के बीच भी उनके यह प्रयास जारी हैं। जरूरी है कि बाबा साहब को ही नहीं उनके विचारों को भी व्यापक तरीके से तरजीह देते हुए उसे समझा जाए, अपनाया जाए।

उल्लेखनीय है कि बौद्ध धर्म को अहिंसा और प्रेम का प्रतीक माना जाता है। सम्राट अशोक ने भी शस्त्र त्याग कर बौद्ध धर्म की शिक्षा-दीक्षा ली थी। लेकिन उसी बौद्ध धर्म और आंबेडकर के नाम पर राजनीतिक रोटियाँ सेंकने वाले आज के ‘नवबौद्ध’ की सेना हिंसा और लोगों को भड़काने के अलावा कुछ नहीं करती है। चाहे वो हालिया हाथरस मामला हो या फिर सीएए के नाम पर दंगा भड़काने का। दलित परिवार को पीटने का आरोप हो या फिर स्वास्थ्यकर्मी पर हमला करने का। इन सभी कृत्यों में भीम आर्मी के नेता, कार्यकर्ता आगे रहते हैं।

                               साभार : 'पाकिस्तान और द पार्टीशन ऑफ़ इंडिया'

आज के भीमवादी और कांग्रेस उसी नागरिकता संशोधन कानून का विरोध कर रहे हैं, जो बाबा साहब आंबेडकर का बहुप्रतीक्षित सपना था। एनडीए सरकार ने बाबा साहब आंबेडकर के एक लंबे समय से लंबित सपने को पूरा किया है, जिसकी अनुभूति वह अपने जीवनकाल में महसूस नहीं कर सके। सीएए पारित होने के साथ ही भीम आर्मी पार्टी और कांग्रेस समेत कई विरोधी दल एवं देश के बड़े वर्ग ने इस कानून का उग्र विरोध किया।

साभार: ‘पाकिस्तान और द पार्टीशन ऑफ़ इंडिया’
उनका कहना था कि यह डॉ. भीमराव आंबेडकर द्वारा बनाए गए संविधान के खिलाफ है, क्योंकि यह धर्मनिरपेक्षता और समानता का उल्लंघन करता है। ऐसी स्थिति में गौर करने वाली बात है कि यदि आज आंबेडकर जीवित होते तो इस अधिनियम पर उनकी क्या प्रतिक्रिया होती? 

दरअसल 1947 में देश के बँटवारे के बाद पाकिस्तान में हिन्दू और दूसरे अल्पसंख्यकों के साथ कैसा व्यवहार होगा, यह दूरदृष्टा एवं मनीषी डॉ. आंबेडकर को उसी वक्त पूर्वाभास हो गया था। बाबा साहब आंबेडकर ने अपनी किताब ‘पाकिस्तान और द पार्टीशन ऑफ़ इंडिया’ में विभाजन के कई महत्वपूर्ण अनछुए सवाल उठाए हैं। डॉ. आंबेडकर ने कहा था जब तक पाकिस्तान से एक-एक हिन्दू भारत वापस नहीं आ जाएगा तब तक विभाजन की प्रक्रिया शायद समाप्त नहीं होगी।

तो क्या आंबेडकर जानते थे कि जो गरीब पिछड़े, अनुसूचित जाति के हिन्दू पाकिस्तान में रह गए हैं वह इस्लामिक पाकिस्तान से एक दिन वापस जरूर भारत में शरण लेंगे? बाबा साहब को शायद इस बात का भान था कि जिन्ना ने भारत-पाकिस्तान का विभाजन कराते वक्त भले ही यह कहा हो पाकिस्तान इस्लामिक मुल्क न होकर धर्मनिरपेक्ष मुल्क होगा। लेकिन शायद ही उसके बातों पर किसी को भरोसा रहा हो और बाबा साहब की आशंका इस बात की तस्दीक भी करती है।

उन्होंने सभी दलितों को भी, जो पाकिस्तान में फँस गए थे, कहा था कि मुसलमानों या मुस्लिम लीग पर भरोसा करना उनके लिए घातक होगा। उनको किसी भी तरीके से भारत आ जाना चाहिए। उन्होंने तब सिर्फ पाकिस्तान ही नहीं, बल्कि निजाम के राज हैदराबाद में रह रहे दलितों को भी चेतावनी देते हुए कहा था कि उच्चवर्गीय हिंदुओं को नापसंद करने के चलते मुसलमानों के पाले में खड़े होना एक बड़ी भूल होगी। कॉन्ग्रेस पार्टी और पंडित जवाहर लाल नेहरू की मुस्लिम तुष्टिकरण नीति को लेकर उन्होंने कहा था कि वह पागलपन की हद तक मुस्लिमों के साथ हैं और अनुसूचित जातियों के लिए उनके हृदय में कोई स्थान नहीं है।

अब सोचने वाली बात है कि जिस मुस्लिम के लिए आंबेडकर ने दलितों को इतना ज्यादा चेताया था, आज भीमवादी उसी मुस्लिम के साथ गठजोड़ बनाकर घूम रहे हैं। क्या यही है उनका आंबेडकर वाला भारत? डॉ. आंबेडकर के बयानों को देखने के बाद तो यह कहना बिल्कुल भी गलत नहीं होगा कि दलित-मुस्लिम गठबंधन बनाने की कोशिश करने वाला कोई भी नेता या पार्टी आंबेडकर की विरासत के साथ धोखा कर रही है।

खुद को ‘दलितों का मसीहा’ कहने वाली मायावती और भीम आर्मी प्रमुख चंद्रशेखर उर्फ रावण भी सीएए के विरोध में और मुस्लिम के गले में हाथ डाले बैठे हैं। कारण वही वोट बैंक। अब इनके जैसे नेता भी जब डॉ. आंबेडकर का हवाला देकर इस कानून का विरोध कर रहे हैं तो उन्हें पता होना चाहिए कि यदि डॉ. आंबेडकर का वश चलता तो वह देश के बँटवारे के वक्त ही इस समस्या को खत्म कर देते और ओवैसी जैसे नेता पाकिस्तान में होते, क्योंकि डॉ. आंबेडकर के लिए वोट बैंक नहीं, बल्कि देश महत्वपूर्ण था।

बाबा साहब का नाम बेच कर अपनी राजनीतिक फसल काटने वाले दलितों के तथाकथित हितैषियों ने यदि कभी मन से बाबा साहब के विचारों को पढ़ा और समझा होता तो ‘जय भीम-जय मीम’ गठजोड़ की बात ही नहीं करते। इनकी मानें तो मुगल आततायियों ने भारत में केवल ब्राह्मण-ठाकुर और अगड़ी जाति वाले लोगों को ही चुन-चुन कर मारा। उनकी यातनाओं के शिकार केवल और केवल अगड़ी जाति की बेटियाँ और महिलाएँ हुईं। 

मुगलों ने तो जैसे अनुसूचित जातियों के लोगों को गोद में खिलाया हो, मुगलों ने सदैव ही दलित महिलाओं का सम्मान किया हो, शायद यही वजह है जो आजकल के ‘नवबौद्ध’ जिनका वास्तविक ‘बौद्ध धर्म’ के विचारों से कोई सरोकार नहीं होता वो उसी मुगल के वंशजों को अपना हितैषी और हिन्दू धर्मावलंबियों को अपना दुश्मन समझते हैं। 

आए दिन किसी भी मंच पर भारतीय संविधान लहराते हुए पहुँच जाने वाले और अपनी हर दो पंक्ति में तीन बार बाबा साहब का नाम लेने वाले दलितों के स्वयंभू नेता कभी भी मुस्लिमों के प्रति बाबा साहब के विचारों का ज़िक्र तक नहीं करते। वो विभाजन और पाकिस्तान निर्माण पर बात करना भी नहीं चाहते। सम्भवतः उन्हें इस बारे में ज्यादा ज्ञान ना हो या फिर वो इस बारे के बात करके अपनी राजनीतिक दुकान बंद नहीं करवाना चाहते।

खुद को बौद्ध धर्मावलंबी बताना और ‘नमो बुद्धाय’ का नारा देने के पीछे उनकी एक ही मनसा नजर आती है वो है हिन्दू धर्म व ब्राह्मण-क्षत्रिय एवं अगड़ी जातियों से घृणा। इस घृणा के खेल में वो इतने आगे निकल गए कि आज पूरा विश्व जिस इस्लामिक आतंकवाद से त्रस्त है, उसके हितैषी बनने में भी इन्हें कोई गुरेज नहीं। बौद्ध धर्म के मूल समानता व अहिंसावादी विचारों, जिसका जिक्र डॉ. आंबेडकर ने भी किया था, उसको ही अपना आदर्श मान कर यदि ये आगे बढ़ते तो शायद समाज मे आज इतनी वैमनस्यता नहीं होती, किन्तु अपने राजनीतिक हित को साधने हेतु ये उससे कोशों दूर निकल चुके हैं। आंबेडकर को इन्होंने ‘एक हिन्दू से बौद्ध में धर्मांतरित व्यक्ति’ के अलावा कुछ समझा ही नहीं।

मौजूदा परिपेक्ष्य में देखें तो उत्तर प्रदेश, बिहार, हरियाणा, तमिलनाडु और कई राज्यों में दलितों पर हुए अत्याचार, जिसमें आरोपित ‘मीम’ हो, उन विभत्स घटनाओं में भी आधुनिक दलित हितैषियों को साँप सूँघ जाता है, इनके मुँह से संवेदना के दो शब्द भी नहीं निकलते। वहीं आरोपित यदि अगड़ी जाति का हो तो इनके लिए सामाजिक वैमनस्यता फैलाने, दंगे भड़काने और अपनी राजनैतिक ज़मीन तैयार करने का एक सुनहरा मौका बन जाता है।

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हाथरस कांड में नक्सल कनेक्शन सामने आना, राजनैतिक गिद्धों द्वारा मामले को तूल देना और नक्सली भाभी का भीम आर्मी से कनेक्शन सामने आना इस बात को दर्शाता है कि बाबा साहब के नाम पर राजनीतिक फसल काटने वाले लोग इस क्रम में इतने नीचे गिर चुके हैं कि आज के परिपेक्ष्य में डॉ. आंबेडकर के विचारों का इनसे कोई सरोकार नहीं। आज ‘जय भीम-जय मीम’ का नारा लगाने वाले शायद इस बात से वाकिफ नहीं हैं कि बाबा साहब मजहबी कट्टरता और पाकिस्तान को जन्म देने वाले ‘द्विराष्ट्रवाद’ के विचार के कितने बड़े विरोधी थे।

शाहीन बाग में गोली चलाने वाले युवक का मायावती ‘कनेक्शन-2017

शाहीन बाग
शाहीन बाग में गोली चलाने वाले कपिल ने किया था मायावती के लिए प्रचार
शाहीन बाग में दिनदहाड़े गोली चलाने वाले कपिल ने यूपी विधानसभा चुनावों में मायावती की पार्टी के लिए चुनाव प्रचार किया था। इस बात का खुलासा सुरक्षा ऐंजेसियों ने युवक की फेसबुक प्रोफाइल से स्क्रीन शॉट्स लेकर किया है।
आरोपित युवक की फेसबुक प्रोफाइल से पता चला कि युवक ने यूपी के 2017 में हुए विधानसभा चुनावों में बहुजन समाज पार्टी के लिए जमकर प्रचार किया था। उसने प्रचार के साथ-साथ फेसबुक पर मायावती की तारीफ में फोटो के साथ कई सारे पोस्ट भी किए थे। एक फेसबुक पोस्ट में युवक ने ‘जय भीम’ का नारा देते हुए बसपा अध्यक्ष मायावती का फोटो भी पोस्ट किया था, जिसमें सीपी सिंह नाम के व्यक्ति को टैग किया गया था। वहीं दूसरी पोस्ट में मायावती की एक रैली के फोटो पोस्ट किया गया था तो एक तीसरी फेसबुक पोस्ट में मायावती को सबसे अधिक सीटें दिखाने वाले एग्जिट पोल की तस्वीर को पोस्ट किया गया था।


फेसबुक पोस्ट को देखकर साफ़ प्रतीत होता है कि कपिल मायावती का बड़ा प्रशंसक है, जिसने मायावती के समर्थन में यूपी के विधानसभा चुनावों में जमकर प्रचार किया था। हालाँकि पेंच यह भी है कि जून 2017 से ही आरोपित युवक कपिल का फेसबुक अकाउंट बंद है। अब इसे लेकर पुलिस लगातार उससे पूछताछ कर रही है और पुलिस को उम्मीद है कि युवक से कुछ और अहम जानकारियाँ मिल सकती हैं।
दरअसल पिछले 51 दिनों से दिल्ली के शाहीन बाग में सीएए के ख़िलाफ़ चल रहे विरोध-प्रदर्शन की आड़ में उपद्रव के बीच बीते शुक्रवार को एक युवक ने अचानक से पहुँचकर दो राउँड गोली चला दी थी, जिसके बाद वहाँ सुरक्षा में तैनात पुलिसकर्मियों ने तत्काल गिरफ्तार कर लिया था। गिरफ्तारी के दौरान युवक ने ‘जय श्री राम’ के भी नार लगाए थे। इस दौरान युवक ने कहा था कि महीनों से लोग बिना इजाजत के रोड को जाम कर धरने पर बैठे हैं, जिससे आम राहगीरों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
नोएडा क्षेत्र के दल्लूपुरा का रहने वाला युवक कपिल ने देशी पिस्तौल से दो राउँड फायर किए थे, जिसे पुलिस ने तत्काल गिरफ्तार कर लिया था। पुलिस ने मौके से दो कारतूस के खाली खोके भी बरामद किए थे। वहीं इस घटना को लेकर खुफिया एजेंसियाँ भी सतर्क हो गई हैं। इसके बाद से दिल्ली पुलिस लगातार आरोपित युवक से पूछताछ कर रही है। आपको बता दें कि देश में CAA के नाम पर विरोध-प्रदर्शन की आड़ में हो रहे उपद्रव और उसके बीच हो रही बयानबाजी से आहत होकर बीते दिनों एक नाबालिग युवक ने भी जामिया इलाके में गोली चला दी थी।
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राघव अवस्थी, शांतनु गुप्ता, राहुल कँवल इंडिया टुडे के पत्रकार राहुल कँवल ने 29 जनवरी को अपना प्राइम टाइम शाहीन बाग स.....
वहीं 51 दिनों से धरने के चलते बंद रोड से परेशान लोगों ने रविवार(फरवरी 1) को सड़क खुलवाने के लिए विरोध प्रदर्शन किया। इस दौरान दिल्ली पुलिस ने बैरिकेडिंग करके लोगों की भीड़ को शाहीन बाग धरने की ओर जाने से रोक दिया। इस दौरान बड़ी संख्या में पुलिस फोर्स तैनात रहा।