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क्या मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ वास्तव में "किसानों के खलनायक" हैं?

मनोज चतुर्वेदी "शास्त्री", समाचार संपादक, उगता भारत 

एक राष्ट्रीय समाचार पत्र की ख़बर के अनुसार सुश्री मायावती के शासनकाल में गोरखपुर मंडल की नौ चीनी मिलों को औने-पौने दाम में बेचा गया था।

उत्तर प्रदेश राज्य चीनी निगम लिमिटेड के अधीन प्रदेश की 21 चीनी मिलों को सुश्री मायावती सरकार के कार्यकाल में 2010-11 में बेचा गया था। इनमें से 10 मिलें उस समय चालू हालत में थीं, 11 मिलें बंद थीं।

सीएजी की रिपोर्ट में मिलों को गलत तरीके से औने-पौने दाम में बेचे जाने की पुष्टि भी हुई थी। हालांकि बसपा के बाद सत्ता में आई अखिलेश सरकार ने इस पर कोई कार्यवाही नहीं की थी।

मिलों की वर्तमान कीमत से 15 गुना कम कीमत पर इन्हें बेचा गया था। सर्किल रेट और स्टांप ड्यूटी की अनदेखी कर भी करोड़ों रुपये के राजस्व का नुकसान कराया गया था। साथ ही मिलों की मशीनों, आवासों, गोदामों का भी मनमाना रेट निर्धारित किया गया था। 

इसमें अमरोहा, चांदपुर, जरवल रोड, सिसवा बाजार, सहारनपुर, बुलंदशहर, बिजनौर, सकौती टाडा, रोहाना कला, खड्डा की चीनी मिलें चालू हालत में थी।

जबकि बरेली, हरदोई, बाराबंकी, शाहगंज, बैतालपुर, देवरिया, भटनी, घुघली, छितौनी, लक्ष्मीगंज और रामकोला की चीनी मिलें बंद थी। इनमें सिसवा बाजार और घुघली महराजगंज में थीं। खड्डा, छितौनी, लक्ष्मीगंज और रामकोला कुशीनगर तथा बैतालपुर, देवरिया व भटनी मिलें देवरिया में थीं। खड्डा चीनी मिल चालू हालत में थी।

7 जुलाई 2021 को पत्रिका.डॉटकाम में प्रकाशित एक ख़बर के अनुसार श्री योगी सरकार ने 4 साल में 45.44 लाख से अधिक गन्ना किसानों को 1 लाख 40 हजार करोड़ रुपये का भुगतान किया है। यह बसपा सरकार से दोगुना और सपा सरकार के मुकाबले डेढ़ गुना अधिक बताया जाता है। इस खबर के अनुसार बसपा सरकार में गन्‍ना किसानों को 55,000 करोड़ का कुल भुगतान किया गया था, जबकि सपा सरकार के पांच साल में गन्‍ना किसानों को 95,000 करोड़ रुपये का कुल भुगतान किया गया था। अखिलेश सरकार के कार्यकाल में गन्‍ना किसानों के 10659.42 करोड़ रुपये के बकाये का भुगतान भी योगी सरकार ने किसानों को किया है।

2007 से 2017 तक जितना कुल भुगतान किसानों को हुआ था उतना योगी सरकार ने सिर्फ 4 साल में कर दिया।

इस खबर के एक भाग में लेखक लिखता है कि पूर्ववर्ती सरकारों में एक के बाद एक बंद होती चीनी मिलों को योगी सरकार ने न सिर्फ दोबारा शुरू कराया गया बल्कि यूपी को देश में चीनी उत्‍पादन में नंबर वन बना दिया । राज्‍य सरकार ने तीन पेराई सत्रों एवं वर्तमान पेराई सत्र 2020-21 समेत यूपी में कुल 3,868 लाख टन से अधिक गन्ने की पेराई कर 427.30 लाख टन चीनी का रिकॉर्ड उत्पादन किया है । वर्ष 2017-18 से 31 जनवरी, 2021 तक 54 डिस्टिलरीज के माध्यम से प्रदेश में कुल 261.72 करोड़ लीटर एथनॉल का उत्पादन हुआ है। जो कि एक रिकार्ड है।

प्रदेश में लॉकडाउन के दौरान एक भी चीनी मिल बंद नहीं हुई। सभी 119 चीनी मिलें चलीं । प्रदेश में 45.44 लाख से अधिक गन्ना आपूर्तिकर्ता किसान हैं और लगभग 67 लाख किसान गन्ने की खेती से जुड़े हैं। आज देश में 47% चीनी का उत्पादन यूपी में हो रहा है और गन्ना सेक्टर का प्रदेश की जीडीपी में 8.45 प्रतिशत एवं कृषि क्षेत्र की जीडीपी में 20.18 प्रतिशत का योगदान है। (पत्रिका.डॉटकाम)

25 सालों में पहली बार 243 नई खांडसारी इकाइयों की स्थापना के लिए लाइसेंस जारी किये गए। जिनमें से 133 इकाइयां संचालित हो चुकी हैं। 

इसके बावजूद भी श्रीमान राकेश टिकैत सहित तमाम विपक्षी दल श्री योगी सरकार को "किसानों का खलनायक" बनाने पर तुले हुए हैं। किसानों की आड़ में श्री टिकैत बन्धु और तमाम विपक्ष अपनी डूबती हुई राजनीतिक नैया को पार लगाने में लगा है। कोई भी सच्चाई को सामने नहीं लाना चाहता है। जानबूझकर सरकार के खिलाफ किसानों के मन में ज़हर घोला जा रहा है। उधर किसान श्री राकेश टिकैत को "अन्ना हजारे" समझ बैठे हैं, उन्हें लगता है कि वह सत्य, न्याय और धर्म की रक्षा के लिए लड़ रहे हैं, जबकि सच इससे बिल्कुल परे है। श्री टिकैत बंधुओं की सारी लड़ाई उनके निजी स्वार्थ, राजनीतिक हित और अपनी पहचान बनाने तक सीमित है। इस आंदोलन से पहले उनकी वास्तविक राजनीतिक स्थिति यह थी कि वह दो बार चुनाव लड़े औऱ दोनों ही बार अपनी ज़मानत ज़ब्त करा बैठे। विपक्ष टिकैत का सहारा लेकर किसानों के कंधों पर रखकर बंदूक चला रहा है। उसको भी अपना उल्लू सीधा करना है।

बर्तमान में किसानों के नाम पर हो रही सारी लड़ाइयां और आंदोलन केवल और केवल सत्ता के लिए हैं, किसान तो केवल मोहरा बने हुए हैं। यह बात किसानों को समझनी ही होगी। 

उत्तर प्रदेश : किसान आएं स्वागत होगा, कानून के साथ खिलवाड़ करेंगे तो....क्योंकि ये दिल्ली नहीं लखनऊ है : योगी आदित्यनाथ, मुख्यमंत्री

हाल ही में भारतीय किसान यूनियन के नेता राकेश टिकैत ने कहा था कि दिल्ली की तरह हम लखनऊ का भी घेराव करेंगे, इस मसले पर अब उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रतिक्रिया दी है, योगी ने कहा, किसान आएं स्वागत होगा, अगर कानून से कोई खिलवाड़ करेगा तो दूसरी तरह स्वागत होगा, क्योंकि यह दिल्ली नहीं लखनऊ है, मुख्यमंत्री योगी ने यह बातें समाचार चैनल आजतक के कार्यक्रम ‘पंचायत’ में कही। 

दरअसल एंकर अंजना ओम कश्यप ने मुख्यमंत्री योगी से पूछा, राकेश टिकैत कह रहे हैं कि लखनऊ को दिल्ली बना देंगे, योगी ने इसका जवाब देते हुए कहा, हमें दिल्ली और लखनऊ में अंतर् महसूस करना होगा, लखनऊ प्रदेश की राजधानी है, दिल्ली देश की राजधानी है, हम सबका स्वागत करना जानते हैं, योगी ने कहा, किसान आएगा, किसान का स्वागत होगा। कानून के साथ कोई खिलवाड़ करेगा तो उस तरह से भी स्वागत होगा।

योगी ने कहा, जो कहते हैं हम लखनऊ को दिल्ली बना देंगे उन्हें अंतर् मालूम होगा कि लखनऊ उत्तर प्रदेश की राजधानी है, देश की राजधानी नहीं है, प्रदेश की राजधानी में किस प्रकार की कानून व्यवस्था रहती है, उनको जानकारी होनी चाहिए।

अब देखना यह है कि योगी के इस जवाब के बाद टिकैत और इसके समर्थक कांग्रेस, वामपंथी, आम आदमी पार्टी, समाजवादी आदि पार्टियां क्या रुख अपनाते हैं। वैसे योगी अक्सर कहते हैं कि मै एक हाथ में माला और एक हाथ में भाला रखता हूँ। दूसरे, मुख्यमंत्री योगी ने उत्तर प्रदेश को अराजकताओं और अपराध मुक्त करने का बीड़ा उठाया हुआ है। 

पिछले कृषि कानून के विरोध में लगभग आठ महीनें से कुछ किसान दिल्ली में कब्जा करके बैठे हैं, काफी लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है, अभी तक इन तथाकथित किसानों के खिलाफ दिल्ली पुलिस ने कोई ठोस एक्शन नहीं लिया है, किसान नेता राकेश टिकैत ने कहा था कि हमने जिस तरह से दिल्ली को घेर रखा है, वैसे ही उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ का भी घेराव करेंगे। लेकिन मुख्यमंत्री योगी ने संकेत दे दिया है कि लखनऊ का घेराव करना आसान नहीं है। 

किसान आंदोलन के राजनीतिज्ञ होने का प्रमाण 

किसान आंदोलनकारी आज तक यह नहीं समझ पाए कि इस आंदोलन को समर्थन देने वाले किसी भी नेता अथवा पार्टी को किसानों और कृषि कानूनों से सरोकार नहीं, वह तो केवल मोदी विरोध की लहर बनाने के लिए इनका इस्तेमाल कर रहे हैं। भाजपा को सत्ता से दूर करने बंगाल गए, बदले में क्या मिला, मुख्यमंत्री बनने के बाद मुख्यमंत्री ममता बनर्जी अब राकेश तो क्या किसी भी किसान नेता से बात करने में संकोच कर रही है, प्रमाण सबके सामने है। 

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी कुछ दिन पूर्व पांच दिनों से दिल्ली दौरे पर थीं और विपक्षी दलों के नेताओं से मुलाकात कर बीजेपी के खिलाफ मोर्चाबंदी की तैयारी में जुटी थीं। इस दौरान भारतीय किसान यूनियन (बीकेयू) के नेता राकेश टिकैत कार्यकर्ताओं के साथ ममता बनर्जी के आने का इंतजार कर रहे थे। उन्हें उम्मीद थी कि ममता बनर्जी धरना स्थल पर उनसे मुलाकात करेंगी, लेकिन उन्हें निराशा हाथ लगी। ममता बनर्जी दिल्ली की सीमाओं पर धरना दे रहे किसानों से मिले बिना ही पश्चिम बंगाल रवाना हो गईं।

जब राकेश टिकैत से ममता बनर्जी के नहीं आने के बारे में पूछा गया तो उन्होंने बहाना बनाते हुए कहा कि उन्हें ममता बनर्जी के आने की कोई जानकारी नहीं थी। अपना बचाव करते हुए राकेश टिकैत ने कहा कि  उन्हें मीडियाकर्मियों से उनके यहां आने की सूचना मिली थी। उन्होंने ममता को यहां आने का न्योता नहीं दिया था। सूत्रों के मुताबिक ममता बनर्जी किसान नेताओं से मिलने की इच्छुक नहीं थीं और ना ही उनके कार्यक्रम में ऐसा कोई प्लान था। लेकिन चर्चा थी कि शुक्रवार (30 जुलाई, 2021) को ममता यूपी गेट पहुंंचकर बीकेयू नेता राकेश टिकैत से मुलाकात कर सकती हैं।

अवलोकन करें:-

अय्याशजीवियों और देह व्यापार का अड्डा बना टिकरी बॉर्डर

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अय्याशजीवियों और देह व्यापार का अड्डा बना टिकरी बॉर्डर
मोदी विरोधियों के संरक्षण में चल रहे किसान आंदोलन की सच्चाई वैसे तो कई 

जिस तरह से ममता बनर्जी ने किसान नेताओं की अनदेखी की है, उससे लगता है कि ममता बनर्जी को किसान आंदोलन की सच्चाई पता है। यह आंदोलन सिर्फ पंजाब और उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव को देखते हुए जारी रखा गया है। इसके बाद इसका कोई अस्तित्व नहीं है। पश्चिम बंगाल में चुनाव खत्म हो चुका है और 2024 के आम चुनाव में काफी वक्त है। ऐसे में ममता बनर्जी ने राकेश टिकैत और अन्य किसान नेताओं को ज्यादा भाव देना उचित नहीं समझा। हालांकि मीडिया के जरिए किसानों से मिलने की खबर फैलाकर राजनीतिक संदेश देने में कामयाब रही, लेकिन राकेश टिकैत इंतजार करते रह गए। 

पहले किसानों के नाम पर खालिस्तानी एजेंडा इंप्लीमेंट किया जा रहा था

और अब किसान के नाम पर जाती के सम्मान का कार्ड खेला जा रहा है,

मुझे नहीं पता आपमें से कितनों को मुजफ्फरनगर वाला जाट नरसंहार याद है या नहीं, किंतु मुझे भली प्रकार याद है,

तब देश में कांग्रेस की सरकार थी चौधरी अजीत सिंह कांग्रेस के सहयोगी थे और सरकार में सम्मिलित भी थे , तब शांतिदूतों द्वारा एक जाट लड़की से छेड़खानी का विरोध करने पर लड़की के दोनों भाइयों को शांतिदूतों की भीड़ द्वारा दौड़ाकर चक्की के पाटों से कुचलकर मारा गया था, दोनों लड़कों की स्थिति ऐसी थी कि चेहरा तक पहचानना संभव नहीं था,

तब प्रदेश में समाजवादी सरकार थी आजम खान की तूती बोला करती थी,

तब जाटों द्वारा एक महापंचायत का आवाहन किया गया और उस आह्वान पर महापंचायत में सम्मिलित होने के बाद वहां  से लौटते समय शांतिदूतों की भीड़ द्वारा घात लगाकर जाटों पर आक्रमण कर दिया गया और उनका नरसंहार हुआ, शव नहर में फेंक दिए गए, कहते हैं कि अभी तक 18 लोग का कोई आता पता नहीं चला है, 

और तब जब इसका विरोध किया गया तब समाजवादी सरकार ने पुलिसिया कार्यवाही और झूठे मुकदमों द्वारा दमन पीड़ित जाट समुदाय का ही किया, उस घटना का नेटेरिव कुछ ऐसा बनाया गया जैसे पीड़ित जाट ही आक्रमणकारी रहे हो और हत्यारा समुदाय ही पीड़ित हो,

उस घटना के बाद कई बडे नेता  सब मुजफ्फरनगर पहुंचे थे, किंतु आपको जानकर आश्चर्य होगा कि वह सब जाटों से मिलने नहीं केवल शांतिदूत समुदाय से मिलने गए थे, और उन्हीं को राहत पैकेज व् सहानुभूति देकर वापस लौट गए,

जाटों ने सोचा कि उनके नेता चौधरी अजीत सिंह तो कांग्रेस के साथ सत्ता में है और अजीत सिंह के सुपुत्र जयंत चौधरी तब सांसद हुआ करते थे, तब जाटों ने चौधरी अजीत सिंह जयंत चौधरी टिकैत परिवार सब का आव्हान किया, आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इनमें से कोई भी उस समय जाटों के संग खड़ा होने नहीं आया दंगे चलते रहे पीड़ित जाट अपने नेता चौधरी अजीत सिंह को फोन मिलाते रहे परंतु उन्होंने तो मुजफ्फरनगर का दौरा करना तक उचित नहीं समझा,

और तब केवल एक पार्टी और उसके स्थानीय नेता थे जो जाटों के संग उनका समर्थन कर रहे थे व् उनकी आवाज मीडिया में उठाई, और जमीन पर उतरे, उनके नाम थे संजीव बालियान, संगीत सोम, सुरेश राणा , हालांकि इसकी कीमत इन लोगों ने अपने ऊपर नेशनल सिक्योरिटी एक्ट झेलकर चुकाई परंतु यह नहीं भूलना चाहिए कि वह भाजपा और उसके नेता ही थे जो उस समय जाटों के साथ खड़े हुए थे, ना की चौधरी अजीत सिंह या जयंत चौधरी या टिकैत परिवार जो आज गणतंत्र दिवस पर अंजाम दिए अपने कुकर्मों को ढकने के लिए जाति का कार्ड खेलने बैठे हैं।

रोचक बात यह है कि दिल्ली पुलिस में जाट समुदाय की संख्या सर्वाधिक है और दिल्ली पुलिस के उन्ही पुलिस कर्मियों पर इसी टिकैत ने लोगों को बुलवाकर उन्हें भड़काकर हमले करवाये थे, जिसका परिणाम है कि 400 दिल्ली पुलिसकर्मी घायल बेड पर पड़े हैं, यानी कि स्वयं जाटों पर हमला करवाने वाला आज उसी जाट समुदाय का कार्ड खेलकर स्वयं को उस कद के नेता के रूप में स्थापित करना चाहता है जो करने हेतु वह आज तक प्रयासरत था

तस्वीर पाकिस्तान की, प्रियंका गाँधी ने उत्तर प्रदेश की बता शेयर की

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आर.बी.एल.निगम, वरिष्ठ पत्रकार 
लगता है भाई-बहन राहुल गाँधी और राहुल गाँधी एक दूसरे के पर्यायवाची हैं। राहुल वही बोलते हैं, जो पाकिस्तान बोलता है और राहुल की बहन पाकिस्तान की तस्वीरों को भारत के उत्तर प्रदेश की बताकर जनता को भ्रमित कर, कांग्रेस को पाताललोक में ले जाने में प्रयत्नशील है। 
प्रियंका को सक्रीय राजनीति लाने के लिए क्या-क्या प्रपंच रचे। साक्षात इन्दिरा गाँधी से तुलना की जा रही थी, परन्तु हुआ क्या, खोदा पहाड़, निकला चूहा, वो भी मरा हुआ।  
कांग्रेस पार्टी की राष्ट्रीय महासचिव प्रियंका गाँधी ने पाकिस्तान की फोटो का प्रयोग कर के झूठ फैलाया है। किसानों के मुद्दे पर योगी सरकार को घेरने के चक्कर में प्रियंका ने पाकिस्तान के किसानों की फोटो शेयर कर दी। बाद में फजीहत होने पर प्रियंका गाँधी ने अपनी ट्वीट डिलीट कर ली और सारे फोटो भी डिलीट कर लिए। इसके बाद प्रियंका गाँधी ने दोबारा एक विडियो शेयर किया और उसके माध्यम से किसानों के मुद्दे पर उत्तर प्रदेश की भाजपा सरकार की आलोचना की।
ओलावृष्टि से किसानों को हुए नुकसान की बात करते हुए प्रियंका गाँधी ने लिखा कि भारी बारिश और ओले पड़ने की वजह से उत्तर प्रदेश में तमाम स्थानों पर किसानों की फ़सलें बर्बाद हो गईं। उन्होंने लिखा कि उन किसानों का दर्द सुना जाना चाहिए। उन्होंने दावा किया कि कई किसानों की तो 80% तक फसल बर्बाद हो गई है। उन्होंने यूपी सरकार पर कोरे दावे करने का आरोप लगाते हुए सलाह दी कि नुकसान का पूरा आकलन कर किसानों को पूरा मुआवजा दिया जाना चाहिए।
इस ट्वीट के साथ उन्होंने कई फोटो शेयर किए जिनमें से एक पाकिस्तान की थी। यानी, पाकिस्तान के किसानों की फोटो शेयर कर के उत्तर प्रदेश के किसानों का दर्द बयाँ करने का दावा किया और योगी सरकार को घेरा भी:

प्रियंका गाँधी ने जो फोटो शेयर की, वो अप्रैल 17, 2019 को ‘शुहदा ऑफ पाकिस्तान आर्मी’ नामक पेज द्वारा शेयर की गई थी। इसे फेसबुक पर शेयर करते हुए पाकिस्तानी पेज ने लिखा था कि किसान भाइयों के लिए दुआ करें। अब एक साल बाद पाकिस्तान के किसानों की उसी फोटो को ओलावृष्टि प्रभावित यूपी का किसान बताते हुए प्रियंका गाँधी ने योगी सरकार की आलोचना की। फजीहत होने के बाद उन्होंने अपनी ट्वीट को डिलीट कर लिया है।
प्रियंका गाँधी की इस हरकत के बाद सोशल मीडिया पर लोगों ने उनकी जम कर आलोचना की। लोगों ने प्रियंका गाँधी के प्रोपेगेंडा को बेनकाब करते हुए मजाकिया अंदाज़ में लिखा कि देखो प्रियंका को किसानों की कितनी चिंता है। हालाँकि, कांग्रेस नेताओं के लिए ऐसी हरकतें नई नहीं है और वो पहले भी इस तरह से झूठ फैलाते रहे हैं।

ऑपरेशन ग्रीन को मंजूरी : अब टमाटर, प्याज और आलू के दाम साल भर रहेंगे एक जैसे

Farmerकेंद्र सरकार ने आम चुनावों से पहले किसानों के लिए ऑपरेशन ग्रीन योजना को मंजूरी दी है। इसे खेती की दशा और दिशा सुधाने के लिए अहम माना जा रहा है। सरकार ऑपरेशन ग्रीन के तहत ऐसा उपाय करने जा रही है, जिससे आलू और टमाटर के दाम पूरे साल एक समान रहेंगे। इस मामले में केंद्रीय मंत्री हरसिमरत कौर बादल के नेतृत्‍व में खाद्य प्रसंस्‍करण उद्योग मंत्रालय की एक बैठक हुई, जहां इस योजना को मंजूरी दी गई।
नेफेड पर होगी जिम्मेदारी
सरकार ने बजट 2018-19 में ऑपरेशन ग्रीन का जिक्र किया था। उस दौरान कहा गया था कि 500 करोड़ रुपए की लागत से इसका निर्माण किया जाएगा। ऑपरेशन ग्रीन को दो चरणों में लागू किया जाएगा। पहले चरण में आलू, टमाटर और प्याज के दाम का एक समान बनाए रखने की जिम्मेदारी नेफेड एजेंसी पर होगी। यह एक शार्ट टर्म प्रॉसेस होगा। इसमें एजेंसी इन फसलों के उत्पादन, ढ़ुलाई और भंडारण का काम करेगी। इसके लिए सरकार के खाद्य प्रसंस्करण की उद्योग मंत्रालय की ओर से 50 फीसदी सब्सिडी दी जाएगी। हालांकि इसके लिए योजना 50 करोड़ रुपए से ज्यादा की होनी चाहिए। 
Farmer
एफपीओ और उनके केंद्रों की क्षमता बढ़ाने पर होगा जोर
सरकार दूसरे चरण में लांग टर्म के लिए प्याज और टमाटर के दाम एक समान रखने की योजनाओं पर काम किया जाएगा। इसमें किसान उत्‍पादक संगठन (एफपीओ) और उनके केंद्रों की क्षमता को बढ़ाया जाएगा। साथ ही बेहतर उत्पादन सुविधाएं दी जाएंगी। फसल तैयार होने के बाद उसका उचित प्रसंस्‍करण किया जाएगा। इसके अलावा टमाटर, प्‍याज और आलू फसलों की मांग और आपूर्ति प्रबंधन के लिए ई-प्‍लेटफॉर्म का निर्माण और प्रबंधन पर जोर दिया जाएगा। 
इस योजना से विभिन्न किसान उत्पादन संगठन, कृषि प्रोसेसिंग यूनि और कृषि प्रबंधन संस्थाओं को बढ़ावा दिया जाएगा। 
सरकार किसानों की बढ़ाना चाहती है आमदनी 
योजना का उद्देश्य किसानों की आय बढ़ाना है। बता दें कि सरकार ने वर्ष 2022 तक किसानों की आय को दोगुना करने का ऐलान किया है। इसके तहत 22,000 कृषि मंडियों का निर्माण किया जाएगा। इस मंडियों के निर्माण से किसानों की बाजार तर पहुंच आसाना हो जाएगी। इसके लिए सरकार 470 ऑनलाइन कृषि सेवा केंद्र शुरु करेगी। 
किसानों तक सूचना पहुंचाने पर होगा जोर
इस तरह सरकार टॉप प्रोसेसिंग को बढ़ावा देगी और इसके जरिए आलू, टमाटर प्याज के उत्पादन को बढ़ाएगी। इसके लिए सरकार आकृतिक आपदाओं से निपटने की योजना बनाएंगी और जलवायु संबंधी जानकारी किसानों तक पहुंचाएगी।