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वॉशिंगटन पोस्ट के फर्जी आर्टिकल से मोदी सरकार को घेरने में जुटी Deep State की गुलाम कांग्रेस, अडानी ग्रुप में LIC के निवेश को बना रही निशाना

                                                एलआईसी, अडानी ग्रुप, वॉशिंगटन पोस्ट, कॉन्ग्रेस
भारत 1947 में आज़ाद जरूर हुआ लेकिन गुलामी मानसिकता के पोषित नेता और कुछ पार्टियां अभी तक गुलामी मानसिकता से बाहर नहीं आयी। 2014 में मोदी सरकार आने के बाद से Deep State की गुलाम कांग्रेस और इसकी समर्थित पार्टियां देशभक्ति के ढोंग रच देश को गुलाम बनाने पर आमादा है। ये गुलामी मानसिकता वाले कभी आत्मनिर्भर बन भारत की आन, बान और शान को नहीं बनाना चाहते। 2014 के बाद जितने आंदोलन और धरने/प्रदर्शन हुए सभी भारत 
की आन, बान और शान के खिलाफ थे।   

कोई बाहरी देश विरोधी ताकतें तभी हरकत में आती है जब उनको बिकाऊ जयचन्द मिलते हैं। भारत को राहुल गाँधी नाम का ऐसा LoP मिला है जो अपने पद की गरिमा बनाए रखने की बजाए कलंकित करने का कोई मौका नहीं चूक रहा। जिस LoP को अपने देश की आर्थिक स्थिति और वर्तमान वस्तुस्थिति का ज्ञान न हो उसे LoP बने रहने का कोई हक़ नहीं बल्कि जनता को भी अपनी अक्ल का इस्तेमाल ऐसे लोगों को चुनाव में चारों खाने चित करें न कि वोट देकर देश पर बोझा थोपे। LoP को ऐसे शब्द बोलने जिस पर देश विश्वास कर सके। नाकि वह बोली बोले जो भारत विरोधी देश बोल रहे हों। 

वॉशिंगटन पोस्ट ने मोदी सरकार के खिलाफ एक और झूठी रिपोर्ट छापी। उसमें आरोप लगाया गया कि सरकार ने लाइफ इंश्योरेंस कॉर्पोरेशन यानी एलआईसी को गौतम अडानी की कंपनियों में जबरदस्ती निवेश करने को मजबूर किया। कांग्रेस पार्टी को लगा कि उसे मोदी सरकार पर हमला करने का सबसे बड़ा हथियार मिल गया है। वो इस आरोप को लेकर सरकार पर लगातार हमला कर रही है और एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर कई मीम्स पोस्ट कर रही है।

कांग्रेस के आधिकारिक हैंडल से कई ट्वीट आए। एक में मजाक उड़ाते हुए लिखा गया- ‘केवल 3,30,00,00,00,000 रुपए मात्र’ यानी सिर्फ 33,000 करोड़ रुपए। साथ में एक मीम था जिसमें प्रधानमंत्री मोदी गौतम अडानी को एलआईसी का बहुत बड़ा चेक सौंप रहे हैं। नीचे लिखा- ‘मोदी है तो मुमकिन है’। ऐसे ही कई मीम्स और ट्वीट्स कांग्रेस ने डाले।

हालाँकि एलआईसी ने इन सारे आरोपों को साफ-साफ खारिज कर दिया। उसने कहा कि उसके सारे निवेश, जिनमें अडानी पोर्ट्स एंड एसईजेड में 570 मिलियन डॉलर की हिस्सेदारी भी शामिल है, पूरी तरह से स्वतंत्र रूप से किए गए। ये निवेश क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों द्वारा AAA रेटिंग प्राप्त कंपनी में किया गया और पूरी जाँच-पड़ताल के बाद, पूरी ईमानदारी से हुआ।

वॉशिंगटन पोस्ट और कांग्रेस ने जो नुकसान का आरोप लगाया, वो गलत है। असल में एलआईसी को अडानी के निवेश से अच्छा-खासा मुनाफा हुआ है। खास बात ये है कि एलआईसी की रिलायंस में 6.9% हिस्सेदारी है जो करीब 1.3 लाख करोड़ रुपए की है और टाटा में 15.9% हिस्सेदारी है जो 82,800 करोड़ रुपए की है। ये अडानी से कहीं ज्यादा है, लेकिन कॉन्ग्रेस सिर्फ अडानी ग्रुप के निवेश पर ही हमला कर रही है।

जब कांग्रेस मोदी को एलआईसी का पैसा अडानी को देने का आरोप लगाकर मीम्स बना रही है, तो वो भूल गई कि उसकी अपनी सरकार ने एलआईसी के पैसे को कैसे इस्तेमाल किया था। यूपीए सरकार खासकर अपने दूसरे कार्यकाल में एलआईसी को सरकारी घाटा छुपाने और डिसइन्वेस्टमेंट टारगेट पूरा करने के लिए बेलआउट खरीदार की तरह यानी निजी एटीएस की तरह इस्तेमाल करती थी।

दोहरा घाटा था, डिसइन्वेस्टमेंट टारगेट पूरा नहीं हो रहे थे क्योंकि घाटे में चल रहे सरकारी उपक्रमों के शेयरों में मार्केट में कोई दिलचस्पी नहीं थी। वित्तीय घाटा बढ़ता जा रहा था। ऐसे में कांग्रेस की अगुवाई वाली सरकार ने बार-बार एलआईसी को मजबूर किया कि वो इन घाटे वाले PSU शेयरों को खरीद ले। पॉलिसीधारकों का पैसा सरकार की किताबें सजाने में लगाया गया। कम रिटर्न वाले निवेश करवाए गए, सिर्फ मनमाने डिसइन्वेस्टमेंट टारगेट पूरे करने के लिए।

आज जहाँ एलआईसी के निवेश पारदर्शी हैं और अच्छा मुनाफा दे रहे हैं, वहीं यूपीए ने एलआईसी को PSU डिसइन्वेस्टमेंट में जबरदस्ती शामिल कर घाटे में डाला। 2013 के इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, कई PSU शेयरों में एलआईसी को सरकार बचाने के लिए खरीदे थे, उनमें 3,000 करोड़ रुपए से ज्यादा का नुकसान हुआ।

यूपीए का डिसइन्वेस्टमेंट प्लान कागज पर तो बड़ा था, लेकिन प्राइवेट सेक्टर से खरीदार नहीं मिल रहे थे। अर्थव्यवस्था सुस्त थी, PSU शेयर महँगे या खराब परफॉर्म कर रहे थे। प्राइवेट निवेशक दूर भाग रहे थे। ऐसे में सरकार एलआईसी पर पूरी तरह निर्भर हो गई कि वो बाकी बचे शेयर उठा ले। नतीजा ये हुआ कि डिसइन्वेस्टमेंट टारगेट तो पूरे हो गए, लेकिन असल में ये प्राइवेटाइजेशन का दिखावा था। सरकार को राजस्व दिखाने और वित्तीय स्थिति सुधारने का रास्ता मिल गया।

यूपीए-2 (2009-2014) के दौरान एलआईसी ने कई बड़े ऑफर फॉर सेल (OFS) और फॉलो-ऑन पब्लिक ऑफर (FPO) में 40 से 70 प्रतिशत तक हिस्सा लिया। कुल मिलाकर 30,000 करोड़ रुपए से ज्यादा डाले गए, सिर्फ बिक्री बचाने के लिए।

एलआईसी कई मामलों में सबसे बड़ा निवेशक थी। मिसाल के तौर पर 2010 में NTPC के FPO में एलआईसी ने 49.48% हिस्सा लिया, यानी 8,200 करोड़ के इश्यू में से करीब 4,058 करोड़ रुपए। ये उस साल NMDC समेत 10,000 करोड़ से ज्यादा के प्रयास का हिस्सा था। उसी साल NMDC के FPO में एलआईसी ने 63.72% उठाया, यानी 9,900 करोड़ के माइनिंग स्टेक सेल में से करीब 6,310 करोड़ रुपए। कम बोली आने पर एलआईसी ने मुख्य एंकर की भूमिका निभाई। 2012 में NMDC के फॉलो-अप OFS में एलआईसी ने करीब 47% यानी 597 करोड़ के ऑफर में से 278 करोड़ रुपए के शेयर लिए, क्योंकि रिटेल निवेशक नहीं आए।

साल 2013 में ये सिलसिला और तेज हुआ। ONGC के 12,700 करोड़ के OFS में एलआईसी ने 96% यानी 12,179 करोड़ रुपए के शेयर लिए। ये तेल-गैस सेक्टर में सबसे बड़ा सिंगल खरीद था। SAIL के 1,500 करोड़ के OFS में एलआईसी ने 70.57% यानी करीब 1,058 करोड़ रुपए लिए, जिससे उसकी स्टील PSU में हिस्सेदारी करीब 9% हो गई।

फरवरी 2013 में NTPC के OFS में एलआईसी ने करीब 49% हिस्सा लिया, यानी 3,570 करोड़ के ऑफर में से 1,765 करोड़ रुपए। हिंदुस्तान कॉपर के 1,225 करोड़ के OFS में एलआईसी का हिस्सा करीब 44% था, यानी 608 करोड़ रुपए। आखिर में 2014 में BHEL के 2,685 करोड़ के ब्लॉक डील को एलआईसी ने पूरी तरह उठा लिया, 5.94% हिस्सेदारी ली और इंजीनियरिंग PSU में उसकी होल्डिंग 14.99% हो गई।

ये अलग-अलग निवेश नहीं थे, बल्कि एक पैटर्न था। एलआईसी की खरीदारी से यूपीए को हर साल 40,000 करोड़ का टारगेट पूरा करने में मदद मिली, जबकि ग्लोबल निवेशक मुँह फेर चुके थे। अडानी की हाई-ग्रोथ कंपनियों के उलट इनमें से कई PSU खराब परफॉर्म कर रहे थे, जिससे एलआईसी के कोष की वैल्यू घटी।

सिर्फ डिसइन्वेस्टमेंट ही नहीं, यूपीए ने एलआईसी का और भी बुरा इस्तेमाल किया। वित्तीय घाटा छुपाने के लिए। 2011-12 में घाटा जीडीपी का 6.5% तक पहुँच गया। कर्ज महँगा हो रहा था, बॉन्ड मार्केट सरकार के कागजात नहीं ले रहा था। ऐसे में सरकार ने एलआईसी को ‘कैप्टिव फंड सोर्स’ बना दिया। लंबी अवधि के बॉन्ड खरीदने को कहा, घाटे में चल रहे बैंकों को रिकैपिटलाइज करने को एयर इंडिया और BSNL जैसे घाटे वाले PSU में पूँजी डालने को मजबूर किया।

यूपीए-2 के आखिरी सालों में एलआईसी ने कई PSU बैंकों को बचाया जो ऊँचे NPA से जूझ रहे थे। इक्विटी और बॉन्ड में निवेश किया। यूपीए सरकार द्वारा जारी हजारों करोड़ के ऑयल बॉन्ड एलआईसी ने ही खरीदे। ये ऑयल बॉन्ड भविष्य के बजट पर बोझ थे।

ये नहीं कि एनडीए सरकार में एलआईसी PSU शेयर बिल्कुल नहीं खरीदती। खरीदती है लेकिन वो रेगुलर निवेश होते हैं, बेलआउट नहीं। प्राइवेट इक्विटी और बॉन्ड में निवेश अडानी ग्रुप समेत भी रेगुलर निवेश का हिस्सा हैं, ताकि फंड पर रिटर्न मिले।

साथ ही एलआईसी की रणनीति है कि अच्छे स्टॉक्स जब गिरे हों, तब खरीदो और कीमत बढ़ने पर बेचो। ये स्टॉक मार्केट के लिए उल्टा लग सकता है, लेकिन एलआईसी की कंजर्वेटिव निवेश नीति के लिए ये बिल्कुल फिट बैठता है। यही वजह है कि हिंडेनबर्ग के आरोपों के बाद अडानी स्टॉक्स गिरे तो एलआईसी ने खरीदा और बाद में कीमत बढ़ने पर बेचकर मुनाफा कमाया।

व्हाइट हाउस का काला सच: डेड नहीं सबसे तेज है भारत की Economy, ट्रंप टैरिफ बेअसर

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प जिस तरह धमकी दे रहे हैं, शायद भूल रहे हैं कि ये उनके दोस्त नरेंद्र मोदी का भारत है, जिसने झुकना और धमकियों की कभी परवाह नहीं की। बल्कि उन्हें अपनी सफलता की सीढ़ी बनाता है। ट्रम्प ने समझा कि जिस ईयू, जापान और कई अन्य देशों को डराया शायद भारत भी धौंस में आ जाने का भ्रम है। और जिस तरह तारीख पर तारीख दे रहा है वह ट्रम्प को अपना स्थान दिखा रहा है। जो अमेरिका के लिए घातक साबित होने वाला है।  
भारत-पाकिस्तान के बीच सीजफायर का झूठ बार-बार दोहराने वाले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के झूठों की फेहरिस्त लंबी होती चली जा रही है। इसी दिशा में अब ट्रंप ने भारतीय इकोनॉमी को ही डेड बता दिया है, जबकि वास्तविकता यह है कि भारत की विकास दर दुनियाभर में सबसे तेज हैं। यहां तक कि अमेरिकी रेटिंग एजेंसियों खुद भारत की तेज बढ़ती इकोनॉमी का लोहा मान रही हैं। लेकिन झूठ पर झूठ बोले जा रहे ट्रंप को टैरिफ के सिवाय कुछ दिखाई ही नहीं दे रहा है। वैसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने भारत पर 25 प्रतिशत टैरिफ को 7 दिन के लिए टाल दिया है। ये आज से लागू होना था, जो अब 7 अगस्त से लागू होगा। हालांकि ट्रैड डील में इस टैरिफ के कम होने की बात कही जा रही है, लेकिन अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों का मानना है कि इस टैरिफ का भारत की अर्थव्यवस्था पर कोई ज्यादा असर होने वाला नहीं है। अंतरराष्ट्रीय ब्रोकरेज फर्म गोल्डमैन सैश, नोमुरा और बार्कलेज ने अपनी-अपनी रिपोर्ट में ट्रंप टैरिफ से भारत की जीडीपी में केवल 0.3 प्रतिशत की गिरावट आने का अनुमान लगाया है। नोमुरा का मानना है कि टैरिफ का भारत पर कम असर होगा और इससे विकास दर में मात्र 0.2 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है।

ट्रंप के ट्रैप में ना फंसना भारत की एक बड़ी सफलता
जीटीआरआइ ने कहा कि अमेरिका और भारत के बीच अभी भी समझौता हो सकता है, लेकिन यह केवल उचित शर्तों पर ही होगा। इसमें भारत के हित भी समाहित होंगे। फिललहाल तो भारत डोनाल्ड ट्रंप के एकतरफा समझौते के जाल से दूर निकल आया है, जो कि वैश्विक परिदृश्य में एक बड़ी सफलता है। ब्रिटेन, ईयू, जापान, इंडोनेशिया और वियतनाम ट्रेड डील के बावजूद अब उच्च टैरिफ का सामना कर रहे हैं और बदले में अमरीका को व्यापक रियायतें भी देंगे। इसमें अमरीकी कृषि उत्पादों पर शून्य टैरिफ, बड़े पैमाने पर निवेश के वादे और अमरीकी तेल, गैस व हथियारों की खरीद शामिल है। भारत ने ऐसी कोई रियायत नहीं दी है।

ट्रंप का झूठ बोलने का रिकॉर्ड, अमेरिकी अखबारों ने लिस्ट छापी

अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप झूठ बोलने, अपनी बात से मुकरने और यू-टर्न लेने के लिए जाने जाते हैं। ट्रंप ने भारत-पाक युद्ध रुकवाने का 26 बार दावा किया है। लेकिन, भारत सरकार तीसरे पक्ष की भूमिका से साफ-साफ इनकार कर चुकी है। लेकिन ट्रंप हैं कि झूठ पर झूठ बोले जा रहे हैं। इससे पहले, न्यूयॉर्क टाइम्स और वॉशिंगटन पोस्ट समेत अमेरिका के तमाम अखबार ट्रंप के झूठ की फेहरिस्त प्रकाशित कर चुके हैं। भारत पर 25 प्रतिशत टैरिफ के बाद वॉशिंगटन में ट्रंप ने कहा कि भारत-रूस दोनों अपनी डेड इकोनॉमी के साथ डूब जाएं, मुझे फर्क नहीं पड़ता। भारत की नीतियां अमेरिका के लिए नुकसानदायक हैं।

अमेरिकी रेटिंग एजेंसियों ने भारतीय इकोनॉमी को बताया सबसे सशक्त
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप जिस इकोनॉमी को डेड बता रहे हैं, उसी भारत की इकोनॉमी को अमेरिकी एजेंसियां ही सबसे तेज और सशक्त बता रही हैं। लेकिन ट्रंप ने जानबूझकर इस और से आंखें मूंदकर एक और झूठ गढ़ दिया है। पिछले माह में ही भारत की इकोनॉमी को दुनिया की आर्थिक नब्ज टटोलने वाली 3 शीर्ष अमेरिकी रेटिंग एजेंसियों एसएंडपी ग्लोबल, गोल्डमैन सेक व मॉर्गन स्टेनली ने सबसे सशक्त बताया था। हाल में आईएमएफ ने भी कहा है कि भारतीय इकोनॉमी सबसे तेजी से बढ़ रही है और 2025-26 में 6.4% दर से बढ़ेगी। जबकि अमेरिकी ग्रोथ रेट 2.9% है। वहीं, एपल जैसी शीर्ष अमेरिकी कंपनियां भारत में निवेश बढ़ा रही हैं।

भारत की अर्थव्यवस्था घरेलू मांग पर टिकी होने से असर सीमित रहेगा
भारत से जाने वाले सामानों पर सात अगस्त से 25 प्रतिशत टैरिफ लगाने का ऐलान अमेरिका ने किया है। इससे भारत और अमरीका के बीच व्यापारिक रिश्तों में तनाव की स्थिति है। हालांकि विशेषज्ञों के मुताबिक भारत की आर्थिक विकास दर, निर्यात और कंपनियों की कमाई पर टैरिफ का ज्यादा असर पड़ने वाला नहीं है। अंतरराष्ट्रीय ब्रोकरेज फर्म गोल्डमैन सैश, नोमुरा और बार्कलेज ने अपनी-अपनी रिपोर्ट में ट्रंप टैरिफ से भारत की जीडीपी में 0.3 प्रतिशत की गिरावट आने का अनुमान लगाया है। नोमुरा का मानना है कि टैरिफ का भारत पर कम असर होगा और इससे विकास दर में 0.2 प्रतिशत तक गिरावट आ सकती है। बार्कलेज और गोल्डमैन सैश का मानना है कि भारत की अर्थव्यवस्था घरेलू मांग पर टिकी होने से असर सीमित रहेगा।

ट्रंप ने कुछ देशों पर ज्यादा टैरिफ का दबाव बनाकर लिया है यू-टर्न
गोल्डमैन सैश का कहना है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने यह फैसला इसलिए लिया है क्योंकि भारत ने रूस से ऊर्जा और रक्षा के सौदे किए हैं, जिससे अमरीका नाराज है। नोमुरा की रिपोर्ट में कहा गया है कि अमरीका की नाराजगी सिर्फ व्यापार घाटे की वजह से नहीं है, बल्कि उसे भारत की रूस पर बढ़ती निर्भरता भी चिंता में डाल रही है। वहीं, बार्कलेज का मानना है कि यह फैसला अमरीका की ओर से ट्रेड डील हासिल करने की रणनीति का हिस्सा है। अमेरिकी राष्ट्रपति पहले भी कुछ देशों पर ज्यादा टैरिफ का दबाव बनाकर बाद में इसे कम कर चुके हैं। क्योंकि उनके लिए अपनी ही कही किसी भी बात पर यू-टर्न लेना मामूली बात है।

भारत मांसाहारी गाय का दूध किसी भी कीमत पर नहीं लेगा
भारत और अमेरिका के बीच फरवरी में ट्रेड डील पर बातचीत शुरू हुई थी। यानी 6 महीने हो चुके हैं, लेकिन दोनों देश अभी तक किसी भी नतीजे पर नहीं पहुंच पाए हैं। दरअसल, भारत में ज्यादातर लोग शुद्ध शाकाहारी दूध उत्पाद चाहते हैं, जबकि अमेरिका में कुछ डेयरी उत्पादों में जानवरों की हड्डियों से बने एंजाइम (जैसे रैनेट) का इस्तेमाल होता है। भारत ऐसी मांसाहारी गायों के दूध और उसने बने प्रोडक्ट को किसी भी कीमत पर लेने को तैयार नहीं है। इसके पीछे किसानों के हित के अलावा धार्मिक वजहें भी हैं। इसके अलावा भारत अपने छोटे और मंझोले उद्योगों (MSME) को लेकर ज्यादा सावधानी बरत रहा है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा दूध उत्पादक देश है और इस सेक्टर में करोड़ों छोटे किसान लगे हुए हैं। अगर अमेरिकी डेयरी उत्पाद भारत में आएंगे, तो वे स्थानीय किसानों को भारी नुकसान पहुंचा सकते हैं। इसके अलावा, धार्मिक भावना भी जुड़ी हुई है। इसलिए भारत की शर्त है कि कोई भी डेयरी उत्पाद तभी भारत में बिक सकता है जब वह यह प्रमाणित करे कि वह पूरी तरह शाकाहारी स्रोत से बना हो।

ईयू, जापान और कई अन्य देशों ने ट्रंप के दबाव में बात मानी
दरअसल, अब इस बात का खुलासा हो चुका है कि अमरीकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप अक्सर व्यापार के मामले में देशों को धमकाने के लिए ऊंचा टैरिफ लगाते हैं, फिर अपनी मर्जी के मुताबिक ट्रेड डील करते हैं। ईयू, जापान और कई अन्य देशों ने ट्रंप के दबाव में आकर उनकी बात मान ली थी। ट्रंप का टैक्स लगाने का तरीका दिखाता है कि वे व्यापार को राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन पीएम मोदी के दूरदर्शी विजन के चलते भारत ने अपने हितों को बचाने का फैसला किया है। भारत के मामले में ट्रंप का यह तरीका अभी सफल नहीं हो पाया। क्योंकि भारत दबाव में आने के बजाय अपनी बात पर कायम रहा। नई दिल्ली ने तो साफ-साफ संदेश दे दिया कि सरकार राष्ट्रीय हितों की रक्षा के लिए सभी आवश्यक कदम उठाएगी। थिंक टैंक जीटीआरआइ ने कहा है कि 25 प्रतिशत टैरिफ के बावजूद भारत की स्थिति अमरीका के साथ ट्रेड डील करने वाले देशों से बेहतर हो सकती है। भारत के भाव न देने के बाद राष्ट्रपति ट्रंप का रुख नरम पड़ता दिखाई दे रहा है। 25 प्रतिशत टैरिफ और अतिरिक्त जुर्माने की घोषणा के बाद ट्रंप के तेवर कुछ ही घंटे में ढीले पड़ गए। अब उन्होंने पीएम मोदी की दोस्ती का हवाला देते हुए भारत के साथ बातचीत जारी रखने की बात कही है।

दुनिया में आठवें नंबर पर पहुँचा भारत का टूरिज्म: फ्रांस-जर्मनी को छोड़ा पीछे, मोदी और सरकार की कोशिशें ला रही रंग, 19+ लाख करोड़ रूपए हुई कमाई

                            लक्षदीप में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (फोटो साभार: X/Narendramodi_in)
भारत ने विश्व पर्यटन की दुनिया में एक नया कीर्तिमान स्थापित किया है। विश्व यात्रा और पर्यटन परिषद (डब्ल्यूटीटीसी) की ताजा रिपोर्ट के अनुसार, 2024-25 में भारत दुनिया की आठवीं सबसे बड़ी पर्यटन अर्थव्यवस्था बन गया है। देश की पर्यटन से होने वाली कमाई 231.6 अरब अमेरिकी डॉलर (लगभग 19.4 लाख करोड़ रुपये) तक पहुँच गई है।

रिपोर्ट्स के मुताबिक, पिछले साल भारत 10वें स्थान पर था, लेकिन इस बार दो पायदान की छलांग लगाकर जापान और फ्रांस जैसे देशों को पीछे छोड़ दिया। अमेरिका पहले स्थान पर है 2,360 अरब डॉलर के साथ, उसके बाद चीन, जर्मनी, जापान, ब्रिटेन, फ्रांस और मैक्सिको हैं। यह कोई छोटी उपलब्धि नहीं है। इसके पीछे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारत सरकार की दूरदर्शी नीतियों, मेहनत और लगातार प्रयासों का बड़ा हाथ है।

पिछले एक दशक से पहले भारत की पर्यटन अर्थव्यवस्था की स्थिति ज्यादा मजबूत नहीं थी। 2013 में डब्ल्यूटीटीसी की रिपोर्ट के अनुसार, पर्यटन की विकास दर 6-7 प्रतिशत के आसपास थी, लेकिन वैश्विक रैंकिंग में भारत 24वें स्थान या उससे नीचे था। विदेशी पर्यटकों की संख्या 2013 में लगभग 6.97 मिलियन थी, जो 2019 तक बढ़कर 10.93 मिलियन हो गई। जीडीपी में योगदान 5-6 प्रतिशत था।

इन सबके पीछे कई समस्याएँ भी थीं, जैसे – एयरपोर्ट कम थे (2014 में सिर्फ 74), सड़कें खराब, होटल की कमी और जटिल वीजा प्रक्रिया।

इन सबके बीच 2020 में कोविड-19 महामारी ने पर्यटन उद्योग को और बड़ा झटका दिया। विदेशी पर्यटकों की संख्या घटकर 2.74 मिलियन रह गई, और जीडीपी में योगदान 4 प्रतिशत तक गिर गया। होटल, टूर ऑपरेटर, गाइड्स, और छोटे-मोटे दुकानदार सब परेशान थे। लेकिन इसके बाद जो हुआ, वह भारत की मेहनत और जज्बे की मिसाल है।

कोविड के बाद तेज रिकवरी हुई। 2023 में विदेशी पर्यटक 9.52 मिलियन पहुँच गए, जो 2019 के 87 प्रतिशत के बराबर था। घरेलू पर्यटन भी बढ़ा – 2023 में 2.5 अरब से ज्यादा घरेलू यात्राएँ हुईं। यह सब सरकार की नीतियों से हुआ।

दरअसल, यह सफलता सालों की मेहनत का परिणाम है। 2014 से पर्यटन को प्राथमिकता दी गई। बजट आवंटन 2014 में 500 करोड़ रुपये था, जो अब 2,400 करोड़ से ज्यादा हो गया है। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार द्वारा साल 2002 में चलाए गए ‘अतुल्य भारत’ अभियान को और मजबूत किया गया। सोशल मीडिया, फिल्मों और व्लॉग्स के जरिए प्रमोशन बढ़ा। ट्रैवल कंटेंट ने भारत को वैश्विक स्तर पर चमकाया।

इसके अलावा स्वदेश दर्शन योजना 2014-15 में शुरू हुई, जिसमें थीम-आधारित पर्यटन सर्किट विकसित किए गए, जैसे बौद्ध सर्किट, रामायण सर्किट, वन्यजीव सर्किट। लेकिन शुरुआत में यह कई राज्यों में फैली हुई थी, इसलिए प्रभाव कम पड़ा। 2022 में स्वदेश दर्शन 2.0 लॉन्च हुई, जो एक-एक जगह पर केंद्रित है। इसमें सतत पर्यटन पर जोर – पर्यावरण को नुकसान न पहुँचे, स्थानीय अर्थव्यवस्था मजबूत हो। पायलट प्रोजेक्ट में ओरछा (मध्य प्रदेश), गाँडीकोटा (आंध्र प्रदेश), बोधगया (बिहार) जैसी सात जगहें शामिल हैं।

एक और महत्वपूर्ण योजना है प्रसाद (तीर्थयात्रा पुनरुद्धार और आध्यात्मिक विरासत संवर्धन अभियान)। यह धार्मिक स्थलों को सुधारने के लिए है। जैसे – काशी विश्वनाथ कॉरिडोर, अयोध्या का विकास, केदारनाथ का पुनर्निर्माण। इनसे धार्मिक पर्यटन बढ़ा और रोजगार मिला। 2024 तक प्रसाद के तहत 73 परियोजनाओं पर काम हुआ, जिसमें 1,400 करोड़ रुपये खर्च हुए। बुनियादी ढाँचे में बदलाव जबरदस्त है।

साल 2014 से 2025 तक राष्ट्रीय राजमार्ग 91,000 किलोमीटर से बढ़कर 1.46 लाख किलोमीटर हो गए। रेल विद्युतीकरण 98 प्रतिशत पहुँच गया। बंदरगाह क्षमता दोगुनी हुई। उड़ान योजना से 88 एयरपोर्ट चालू हुए, छोटे शहरों में उड़ानें बढ़ीं। वंदे भारत ट्रेनों से आरामदायक और तेज यात्रा संभव हुई। होटलों में निवेश बढ़ा – 2024 में 3,295 करोड़ रुपये के 40 प्रोजेक्ट मंजूर हुए, 23 राज्यों में प्रतिष्ठित पर्यटन केंद्र बनाने के लिए।

वीजा नीति आसान हुई। ई-वीजा अब 167 देशों के लिए उपलब्ध है, ऑनलाइन आवेदन से विदेशी पर्यटक बढ़े। चिकित्सा पर्यटन को प्रोत्साहन – भारत की सस्ती और गुणवत्ता वाली चिकित्सा सुविधाएँ, जैसे आयुर्वेद और योग, ने लाखों विदेशी रोगियों को आकर्षित किया। 2024 में विदेशी पर्यटकों ने 3.10 लाख करोड़ रुपये खर्च किए, जो 2019 से ज्यादा है। सौंदर्यीकरण प्रयास भी बड़े हैं। स्वच्छ भारत अभियान से जगहें साफ हुईं – ताजमहल के आसपास सफाई, गंगा घाटों का सुधार। यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों की संख्या 43 हो गई, दुनिया में छठा स्थान। प्राकृतिक, सांस्कृतिक और एडवेंचर पर्यटन पर फोकस – हिमालय, समुद्र तट, वन्यजीव।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने व्यक्तिगत रूप से कई जगहों को बढ़ावा दिया। उनका मानना है कि पर्यटन से रोजगार बढ़ता है और संस्कृति फैलती है। 2024 में लक्षद्वीप का दौरा किया और सोशल मीडिया पर तस्वीरें-वीडियो साझा किए। कहा, “लक्षद्वीप की सुंदरता देखिए, यह मालदीव से कम नहीं।”

इसका प्रभाव? लक्षद्वीप में पर्यटकों की संख्या दोगुनी हो गई – 2023 में एक लाख से कम, 2024 में दो लाख से ज्यादा। उड़ानें 88 प्रतिशत बढ़ीं। एक्स पर उनके पोस्ट ने लाखों को आकर्षित किया।

काशी विश्वनाथ कॉरिडोर का उद्घाटन भी मोदी ने किया। इसका प्रभाव ये हुआ कि वाराणसी में पर्यटक 2014 के पाँच करोड़ से बढ़कर 2022 में 7.2 करोड़ हो गए। कॉरिडोर में 10 करोड़ विजिटर्स आए, दैनिक 1.5-2 लाख भक्त। होटल बुकिंग दोगुनी हुई।

गुजरात में स्टैच्यू ऑफ यूनिटी को दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति बताकर प्रमोट किया। अब वहाँ सालाना 50 लाख पर्यटक आते हैं, स्थानीय अर्थव्यवस्था को मजबूती मिली।

कश्मीर का प्रचार करते हुए पीएम मोदी ने अनुच्छेद 370 हटने के बाद कहा, “कश्मीर स्वर्ग है, घूमिए।” इसके बाद फिल्मों की शूटिंग बढ़ी, पर्यटक बढ़े। 2024 में कश्मीर में दो करोड़ से ज्यादा पर्यटक आए। मणिपुर, पूर्वोत्तर की जगहों को भी बढ़ावा दिया, जैसे लोकटक झील। अकेले पूर्वोत्तर में पर्यटन 30 प्रतिशत बढ़ गया।

पीएम मोदी और भारत सरकार ने विदेश यात्राओं में भी भारत को प्रमोट किया। जी20 शिखर सम्मेलन में दिल्ली और वाराणसी दिखाए। योग दिवस को वैश्विक बनाया, जो स्वास्थ्य पर्यटन बढ़ाता है। एक्स पर पोस्ट्स, जैसे क्रोएशिया, साइप्रस, कुवैत के दौरे भारत की जगहों से जोड़ते हैं।

चिकित्सा और सांस्कृतिक पर्यटन: भारत की सस्ती और गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सुविधाएँ विदेशी पर्यटकों को खींच रही हैं। आयुर्वेद, योग, और मॉडर्न मेडिसिन ने भारत को मेडिकल टूरिज्म का हब बनाया। 2024 में लाखों विदेशी मरीज भारत आए। इसके अलावा, यूनेस्को विश्व धरोहर स्थलों की संख्या 43 हो गई, जो दुनिया में छठा स्थान है। प्राकृतिक सुंदरता (हिमालय, गोवा के समुद्र तट), सांस्कृतिक धरोहर (अजंता-एलोरा, ताजमहल), और एडवेंचर टूरिज्म (राफ्टिंग, ट्रेकिंग) ने भी पर्यटकों को आकर्षित किया।

कुल मिलाकर पीएम मोदी के प्रचार से घरेलू पर्यटन 95 प्रतिशत बढ़ा, जीडीपी में योगदान 6.6 प्रतिशत पहुँच गया, यानी 21 लाख करोड़ रुपये। 2024 में अंतरराष्ट्रीय पर्यटकों का खर्च रिकॉर्ड 3.1 ट्रिलियन रुपये (36.8 अरब डॉलर) रहा, 2019 से नौ प्रतिशत ज्यादा। घरेलू खर्च 15.5 लाख करोड़ रुपये, 2019 से 22 प्रतिशत अधिक। डब्ल्यूटीटीसी का अनुमान है कि 2025 में यह 3.2 लाख करोड़ रुपये तक पहुँचेगा।

यह रिपोर्ट कोई आकस्मिक परिणाम नहीं है। 2014 से नीतिगत बदलाव – निजी निवेश को प्रोत्साहन, सार्वजनिक-निजी भागीदारी मॉडल। कोविड में टीकाकरण तेज किया, रिकवरी में मदद मिली। डब्ल्यूटीटीसी कहता है कि 2034 तक भारत दुनिया में चौथे नंबर पर पहुँच जाएगा। अर्थव्यवस्था में 42 लाख करोड़ रुपये का योगदान होगा और करीब 6.4 करोड़ नौकरियाँ सृजित होंगी।

भारत में पर्यटन के क्षेत्र में अब भी काफी चुनौतियाँ

डब्ल्यूटीटीसी की सीईओ जूलिया सिम्पसन कहती हैं, “भारत में सब कुछ है, लेकिन बेहतर प्रचार चाहिए।” ओवरटूरिज्म से बचना भी जरूरी है, जैसे गोवा में अक्सर ओवर-टूरिज्म की वजह से कई तरह की दिक्कतें सामने आने लगी हैं।
भविष्य में सरकार 2047 तक तीन ट्रिलियन डॉलर की पर्यटन अर्थव्यवस्था का लक्ष्य रखती है। डिजिटल पर्यटन – ऐप्स, वर्चुअल टूर्स। ग्रामीण पर्यटन से गाँवों में रोजगार बढ़ेगा। इसके लिए सरकार ने अभी से तैयारियाँ शुरू कर दी है। इसके लिए सरकार ने बजट 2025 में 20,000 करोड़ रुपये पर्यटन विकास के लिए आवंटित किया। वहीं, 23 राज्यों में 3,300 करोड़ की परियोजनाएँ चल रही हैं, जिसमें सड़कें, एयरपोर्ट, डिजिटल एकीकरण शामिल हैं।
भारत का टॉप 10 में पहुँचना कोई छोटी बात नहीं है। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दूरदर्शिता, सरकार की नीतियों और स्थानीय लोगों की मेहनत का नतीजा है। पर्यटन सिर्फ पैसे की बात नहीं है; यह देश की संस्कृति, इतिहास, और विविधता को दुनिया तक ले जाने का जरिया है।
काशी के घाटों से लेकर लक्षद्वीप के समुद्र तटों तक भारत हर कोने में खूबसूरत है। अगर हम इसे सही तरीके से प्रमोट करें, पर्यावरण का ध्यान रखें और बुनियादी ढाँचे को और मजबूत करें, तो वह दिन दूर नहीं जब भारत दुनिया की टॉप 5 पर्यटन अर्थव्यवस्थाओं में शुमार होगा। यह क्षण हर भारतीय के लिए गर्व की बात है। आइए, अपने देश की इस खूबसूरती को और चमकाएँ और दुनिया को बुलाएँ – ‘आइए, भारत देखिए!’