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गंगा में हड्डी ही तो फेंकी है, हिंदू तो अस्थियाँ बहाते हैं… लेफ्ट-लिबरल गैंग कर रहा मुस्लिम युवकों की घृणा का बचाव, कांग्रेसी बता रहे ‘इफ्तार’

 
वाराणसी में 14 मुसलमानो को भ्रम हो गया कि उत्तर प्रदेश में सपा और कांग्रेस सत्ता में आ गई और यह दोगले गंगा जैसी पवित्र नदी में मंदिरों के बीच नाव पर मटन और चिकन के साथ रोजा इफ्तार की पार्टी किये और गंगा नदी में ही इन्होंने हड्डियां और मांस के टुकड़े फेके और इनका दुःसाहस देखीये कि उन्होंने उसका बाकायदा वीडियो भी बनाया।
इन सभी 14 मुसलमानो को गिरफ्तार कर लिया गया है,आज अगर उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी सत्ता में होती तो इन सभी 14 मुसलमानो को अखिलेश यादव यश भारती पुरस्कार से सम्मानित करते क्योंकि समाजवादी पार्टी के स्थानीय नेता और कांग्रेस के बड़े नेता अजय राय उनके समर्थन में खड़े हो गए।
                 गंगा नदी में नाव पर इफ्तार पार्टी करने वाले मुस्लिमों के बचाव में उतर कांग्रेस का क्या एजेंडा
उत्तर प्रदेश के वाराणसी जिले से गंगा नदी में नॉनवेज बिरयानी खाकर इफ्तार पार्टी करते नाव पर सवार कुछ मुस्लिम युवकों का वीडियो सामने आया। वीडियो पर संज्ञान लेते हुए बीजेपी के महानगर युवा अध्यक्ष रजत जायसवाल ने FIR दर्ज करवाई। पुलिस ने कार्रवाई करते हुए 14 लोगों को गिरफ्तार किया। अब इस घटना पर कांग्रेस और लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम इन मुस्लिम लोगों का बचाव करने पर उतर गया है।
कांग्रेसियों को सनातन धर्म में पवित्र माने जाने वाली गंगा नदी में नॉनवेज बिरयानी का सेवन करना गलत नहीं लगा। उल्टा सनातनियों की आस्था पर सवाल करना शुरू कर दिया। कांग्रेस नेता सुप्रिया श्रीनेत का सवाल है कि आखिर इन मुस्लिम लोगों ने कौन-सा कानून तोड़ा है? वह पूछती हैं कि इनका पाप क्या है? और यह पूछते हुए वह समाज पर सवाल खड़े करती हैं कि आज के समय में समाज किस ओर जा रहा है?
क्योंकि वे आरोपित मुस्लिमों के असली पाप को अपने पोस्ट में खुद ही छिपा लेती हैं। उनकी जानकारी में यह सिर्फ एक इफ्तार पार्टी थी, जिसे रमजान के महीने में हर मुस्लिम को करने का मजहबी हक है। लेकिन वह इस तथ्य को छिपाती हैं कि वह पवित्र गंगा नदी में नॉनवेज खा रहे थे और यह भी कि उन्होंने चबाई हुई हड्डियाँ तक माँ गंगा के पवित्र जल में फेंकीं। और यह कृत्य बिंदू माधव के धरहरा मंदिर के ठीक सामने किया गया।
इफ्तार पार्टी बताकर इसे सही ठहराने वाली कांग्रेस किस मदरसे की दीन दे रही है, क्योंकि मौलवी तो खुद इसे गलत ठहरा रहे हैं। वाराणसी के ही अंजुमन इन्तेजामिया मसाजिद के संयुक्त सचिव एसएम यासीन ने इसकी निंदा की है। उन्होंने कहा कि इफ्तार एक शुद्ध धार्मिक कार्य है, कोई पिकनिक नहीं है। उन्होंने यह भी साफ कहा कि इफ्तार के बाद तुरंत मगरिब की नमाज जरूरी है।
कांग्रेस तथ्यों को आसानी से छिपाना जानती है, क्योंकि इससे उन मुस्लिम लोगों की सच्चाई सामने आती है कि उन्होंने ऐसा जानबूझ कर किया था। शायद यह कांग्रेस के लिए सेकुलरिज्म दिखाने का तरीका हो सकता है। लेकिन यही कांग्रेस दिल्ली के उत्तम नगर में हिंदू युवक तरुन की हत्या पर सवाल नहीं करती, तब नहीं पूछती कि उसका पाप क्या था? तब पूछा नहीं जाता कि होली पर सिर्फ एक गुब्बारा फेंकने पर क्यों मुस्लिमों की भावनाएँ आहत हो जाती हैं? इन मामलों में देश को कट्टर मजहबी मानसिकता की ओर बढ़ते देखे जाने पर सवाल नहीं किए जाते हैं।

गंगा में हड्डियाँ फेंकना अपराध नहीं, और अस्थियाँ विसर्जित करने पर सवाल

लेकिन वाराणसी के इस मामले को लेकर सनातन लोगों की आस्था क्यों आहत हुई? इस पर कांग्रेस इकोसिस्टम धड़ल्ले से सवाल कर रहा है। बिना यह जाने कि सनातन में गंगा नदी और बनारस के घाटों की क्या मान्यताएँ हैं। ऐसे ही इस्लामी कट्टरपंथी विचारधारा के वसीम अकरम त्यागी की भी परेशानी सुप्रिया श्रीनेत जैसी ही है। वही भी पूछ रहे हैं कि गिरफ्तार किए गए मुस्लिम लोगों का अपराध क्या है? इतना ही नहीं वे गंगा नदी की पवित्रता पर भी सवाल उठा रहे हैं।
वसीम अकरम का कहना है, “अपराध क्या है? नाव में चिकन बिरयानी खाना या गंगा में हड्डी फेंकना? अब सवाल यह है कि यह अपराध कैसे है? अगर यह अपराध है तो फिर इसी गंगा में अस्थियाँ विसर्जित की जाती हैं! तब तो वो भी अपराध है? इसी गंगा के तट पर जगह-जगह शमशान घाट हैं, जली अधजली लाशें उसमें बहा दी जाती हैं, तब तो वह भी अपराध है? इसी गंगा में जाने कितने ऐसे जीव हैं जो मांसाहारी हैं, तब उनका गंगा में रहना ही अपराध है? सरकार गंगा से उन तमाम जीवों को बाहर निकालेगी?”
यह व्यक्ति गंगा नदी में हड्डी फेंकने पर पूछता है कि अपराध क्या है? और इसी हवाले से गंगा में अस्थियाँ विसर्जित करना इसे अपराध लगने लगता है। इतना ही नहीं गंगा के पास शमशान घाट से लेकर नदी में जीवों से भी इसे परेशानी होने लगती है। सिर्फ इसीलिए क्योंकि इसके मुस्लिम भाइयों के कृत्य पर पुलिस ने संज्ञान लिया, जो कि जानबूझ कर धार्मिक भावनाओं को उकसाने के लिए किया गया था। शायद इसे अस्थियाँ बहाने और हड्डियाँ फेंकने में कोई अंतर नजर नहीं आता।

क्या है गंगा नदी से जुड़ी हिंदुओं की आस्था? अस्थियों और हड्डियों में फर्क

वाराणसी के इस मामले में मुस्लिमों के इफ्तार पार्टी की करने से कोई दिक्कत नहीं है, समस्या यहाँ गंगा नदी में मांस खाने से है। जिसे वह इफ्तार पार्टी के नाम पर खा रहे हैं। गंगा नदी को हिंदू धर्म में सबसे पवित्र नदी मानी जाती है, जिसे देवी के रूप में पूजा जाता है। यह पापों का नाश करने वाली, मोक्ष प्रदान करने वाली और जीवन का आधार है।
वेद, पुराण, रामायण और महाभारत में गंगा को देवनदी कहा गया है। राजा भागीरथ की तपस्या से भगवान शिव ने गंगा को स्वर्ग से धरती पर उतारा, ताकि सगर के 60,000 पुत्रों को मोक्ष मिले। गंगा स्नान से पाप धुलते हैं और पुण्य प्राप्ति होती है। सनातन धर्म में गंगा नदी का जल पूजा-अर्चना, अभिषेक और शुद्धिकरण में जरूरी है। कुंभ मेला जैसा उत्सव गंगा तट पर होते हैं। इसे जीवनदायिनी माँ गंगा कहा जाता है।
बात है गंगा नदी में अस्थियाँ विसर्जित करने की तो, गरुण पुराण के अनुसार, दाह संस्कार के बाद अस्थियाँ गंगा में विसर्जित करने से मृत आत्मा को मोक्ष, स्वर्ग या ब्रह्मलोक मिलता है। गंगा स्वर्ग से आई होने से पितरों की आत्मा मुक्त हो जाती है, पुनर्जन्म चक्र टूटता है।
गंगा नदी को लेकर हिंदू धर्म में ये सिर्फ कुछ मान्यताएँ हैं, ऐसी कई कथाएँ हैं जो गंगा नदी को लेकर प्रचलित हैं। जिन पर हिंदू धर्म टिका हुआ है। इन्हीं मान्यताओं के कारण हिंदू धर्म की भावनाओं का आहत होना संभव है। यहाँ हड्डियाँ फेंकने और अस्थियाँ बहाने का फर्क भी साफ हो जाता है। यही वजह है कि वाराणसी के मामले में मुस्लिमों द्वारा जानबूझ कर की गई नॉनवेज इफ्तार पार्टी से धार्मिक भावनाएँ होती हैं।

हिंदू सहिष्णु हो सकता है, लेकिन मुस्लिमों की तरह हिंसा के बजाए कानूनी कार्रवाई करना जानता है

गंगा नदी के प्रति हिंदुओं की आस्था को लेकर भारत का हर नागरिक वाखिफ है। शायद मुस्लिम इसे ज्यादा ठीक ढंग से समझते हैं। तभी जानबूझ कर इफ्तार पार्टी करने के लिए गंगा नदी पहुँच जाते हैं। यह सांप्रदायिक हिंसा भड़काने जैसा कृत्य नहीं तो और क्या है? क्या कभी किसी हिंदू को मस्जिद में हनुमान चालीसा पढ़ते देखा गया, नहीं। लेकिन आए दिन मंदिर के पास मांस के टुकड़े फेंक दिए जाते हैं।
यह जानबूझ कर नहीं, तो और किसलिए किया गया हो सकता है। जो कांग्रेस और लेफ्ट-लिबरल इकोसिस्टम सवाल पूछ रहा है कि वाराणसी के मामले में मुस्लिमों का क्या अपराध था? उनकी सेकुलर चादर सिर्फ हिंदुओं पर आकर ढक जाती है, जबकि मुस्लिमों को सेकुलरिज्म सिखाने के लिए उनकी चादर फट जाती है। क्योंकि सब जानते हैं कि हिंदू धर्म सहिष्णु है, वह मुस्लिमों की तरह अल्लाह के अपमान पर किसी का सर तन से जुदा नहीं करता।
वह कानूनी कार्रवाई करना जानता है, जैसा कि वाराणसी के मामले में हुआ भी। संविधान के तहत पहले पुलिस से शिकायत हुई और कानूनी प्रक्रिया के तहत गिरफ्तारी की गई। वह धर्म के नाम पर हिंसा फैलाना नहीं जानते हैं। बावजूद इन कांग्रेसी औऱ लेफ्ट लिबरल इकोसिस्म को देश की हालत सिर्फ इन मामलों में याद आती है, वही मुस्लिमों की कट्टरपंथ के नाम पर हिंसा पर चुप्पी साध लेते हैं। और मामूली इफ्तार पार्टी करने के लिए धार्मिक स्वतंत्रता की बात करते हैं।

बिहार : 8 साल के बच्चे को मिला गंगा में तैरता ‘श्रीराम’ लिखा पत्थर : दर्शन करने उमड़े लोग

                              बिहार में बच्चे को मिला श्रीराम लिखा तैरने वाला पत्थर (फोटो साभार: आज तक)
बिहार के भागलपुर में गंगा नदी में एक बच्चे को तैरने वाला पत्थर मिला है। इस पत्थर पर ‘श्रीराम’ लिखा हुआ है। बच्चे के परिजन इसे रामायण काल से जोड़ रहे हैं। यह पत्थर पूरे इलाके में चर्चा का विषय बन गया है। लोग इसकी पूजा करने के लिए बच्चे के घर पर पहुँच रहे हैं।

मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, खंजरपुर निवासी विजय कुमार पासवान के आठ साल के बेटे ब्रिगेडियर पासवान को धोबी घाट के पास यह पत्थर तैरते हुआ दिखा। वह इसे उठाकर वह अपने घर ले आया। अब श्रीराम लिखा हुआ यह पत्थर लोगों की आस्था का केंद्र बन गया है। इसे देखने और इसकी पूजा-अर्चना करने के लिए बड़ी संख्या में लोग पासवान के घर पहुँच रहे हैं। कोई उसे प्रणाम कर रहा है, तो कोई इसे भगवान श्रीराम का आशीर्वाद समझ रहा है।

बच्चे ब्रिगेडियर पासवान का कहना है कि जब वह दियारा जा रहा था, तभी उसने धोबी घाट के पास इस पत्थर को तैरता देखा। उसने इसे बहुत डूबोने का प्रयास किया, लेकिन यह नहीं डूबा। इस पर श्रीराम लिखा हुआ है। यह पत्थर रामायण काल का बताया जा रहा है। यह वही पत्थर लग रहा है, जिसका इस्तेमाल रामसेतु बनाने में हुआ था। बच्चे के पिता विजय कुमार पासवान ने बताया कि जब बेटा इस पत्थर को घर लेकर आया, तो हम लोगों ने उसे पानी में डाला। लेकिन यह पत्थर पानी में डूबा नहीं, बल्कि तैरने लगा। उस पत्थर पर श्रीराम लिखे होने के कारण लोग इसे पूजने के लिए पहुँच रहे हैं।

वहीं, वैज्ञानिकों की माने तो यह पत्थर एक स्पंज के समान होता है। यह खुरदरा होता है। इसमें बहुत सारे छिद्र होते हैं। इस पत्थर में हवा भरे होने के कारण इसका घनत्व पानी से कम होता है, जिसकी वजह से यह पानी में तैरता है। हालाँकि, अभी इसकी जाँच को लेकर आर्कियोलॉजी या सरकारी विभाग से कोई टीम नहीं पहुँची है।

पहले भी मिल चुका है श्रीराम लिखा हुआ पत्थर

यह पहली बार नहीं है, जब किसी बच्चे को श्रीराम लिखा हुआ पानी में तैरने वाला पत्थर मिला हो। इससे पहले उत्तर प्रदेश के मैनपुरी में भी इस तरह ​का मामला सामने आ चुका है। अगस्त 2022 में कुछ बच्चों को ईशान नदी में राम नाम का पत्थर तैरता हुआ मिला था।
बच्चे उस पत्थर को अपने गाँव उठा लाए। ग्रामीण इसे चमत्कारी पत्थर मानकर उसकी पूजा-अर्चना करने लगे। गाँव के प्रधान ने जब पत्थर का वजन कराया, तो यह 5 किलो 700 ग्राम का निकला। इसके बाद यहाँ के लोगों ने इस पत्थर को गाँव के मंदिर में रखने और उसकी पूजा करने का फैसला लिया था।

गंगा के पानी में नहीं मिला कोरोना का कोई भी अंश, लाशों पर की गई थी राजनीति: CSIR-IITR की 120 पेज के रिसर्च नतीजे

         गंगा नदी के सैम्पल्स में कोरोना वायरस के कोई ट्रेस नहीं मिले (प्रतीकात्मक चित्र साभार: India Today)
2021 के पहले हाफ में कोरोना महामारी जब अपने उच्च-स्तर पर थी, उस दौरान उत्तर प्रदेश में गंगा नदी में बहती लाशों की तस्वीरें शेयर कर के दावा किया गया था कि कोरोना के कारण मौतें छिपाने के लिए मृतकों की लाशों को फेंक दिया गया है। राज्य की मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की सरकार को बदनाम करने के लिए भी मीडिया में प्रोपेगंडा चलाया गया। अब ‘वैज्ञानिक एवं औद्योगिक अनुसंधान परिषद (CSIR)’ एवं ‘ इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ टॉक्सिकोलॉजी रिसर्च (IITR)’ के वैज्ञानिकों की एक समीति ने गंगा नदी के सैम्पल्स की जाँच की है।

CSIR और IITR के वैज्ञानिकों द्वारा जब गंगा नदी के इन सैम्पल्स की जाँच की गई, तो इसमें कोरोना वायरस का कोई ट्रेस नहीं मिला। पानी के इन सैम्पल्स को 2020 में ही उत्तर प्रदेश और बिहार के गंगा नदी से लिया गया था, जिसकी जाँच के नतीजे अब आए हैं। 120 पेज की इस रिसर्च स्टडी के आधार पर ‘द न्यू इंडियन’ ने अपनी खबर में बताया है कि 13 लोकेशंस से लिए गए गंगा नदी के पानी ने इन सैम्पल्स का RT-PCR टेस्ट के जरिए परीक्षण किया गया।

इसी माध्यम से मानवों में भी कोरोना वायरस के लक्षणों का परीक्षण किया जाता है। वैज्ञानिकों ने उन जगहों से कुल 132 सैम्पल्स एकत्रित किए थे, जहाँ लाशें तैरने की बातें कही गई थीं। ये सारे के सारे सैम्पल्स कोरोना नेगेटिव टेस्ट किए गए हैं। ये सैम्पल्स, कनौज, उन्नाव, कानपुर, प्रयागराज, मिर्जापुर, वाराणसी, बक्सर, हमीरपुर, गाजीपुर, बलिया, पटना, सारण और भोजपुर में गंगा नदी से लिए गए थे। पश्चिमी मीडिया ने इन लाशों को कोरोना के कारण हुई मौतें बताया था।

 CSIR-IITR के डायरेक्टर एसके बारीक ने ‘द नई इंडियन’ को बताया कि गंगा नदी के अंदर कोविड-19 के सैम्पल्स मौजूद ही नहीं थे। उन्होंने बताया कि ये परीक्षण पर्याप्त संख्या में सैम्पल साइज और कड़ी वैज्ञानिक प्रक्रिया के बाद तय किए गए हैं। उन्होंने बताया कि जिस SOP से 3.5 लाख सैम्पल्स उनलोगों ने टेस्ट किए गए, वही प्रक्रिया इस बार भी अपनाई गई। उन्होंने बताया कि पानी में कोरोना वायरस मिला ही नहीं। ये सैम्पलिंग मई-जून 2021 में की गई थी।

इन नतीजों के आने के बाद भाजपा ने भी दुराग्रह पूर्ण दुष्प्रचार पर निशाना साधा है। प्रदेश प्रवक्ता राकेश त्रिपाठी ने कहा कि डिस्टर्बेंस पैदा करने और लोगों को भड़काने के लिए ये कुचक्र रचा गया था। उन्होंने इसे ‘राहुल गाँधी के नेतृत्व वाले कॉन्ग्रेस टूलकिट गैंग’ की साजिश बताते हुए कहा कि उन्होंने पहले लॉकडाउन पर सवाल उठाए, बाद में लॉकडाउन की वकालत की। उन्होंने याद दिलाया कि कैसे सपा ने लोगों को वैक्सीन न लेने के लिए भड़काया और इसे भाजपा की वैक्सीन बताया।

राकेश त्रिपाठी ने कहा, “लाशों के ऊपर राजनीति इसीलिए खेली गई, ताकि लाशों की तस्वीरें दिखा कर डर का माहौल पैदा किया जा सके और भाजपा को बदनाम किया जा सके। 2022 में होने वाले विधानसभा चुनाव को देखते हुए ऐसा किया गया। महाराष्ट्र और केरल में यूपी से ज्यादा मौतें हुईं, लेकिन वहाँ को लेकर कुछ नहीं कहा गया। अब पश्चिमी मीडिया और विपक्षी दलों को इसका जवाब देना होगा।” जबकि वैज्ञानिक अध्ययन के नतीजों में कुछ अलग ही बात सामने आई है।