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‘अरब-तुर्क’ का ढोंग खत्म, अब पाणिनी-चाणक्य पर आया लालच: पहचान के संकट में फँसे पाकिस्तान ने शुरू किया भारत का हिंदू इतिहास चुराने का नया प्रोपेगेंडा

                  भारतीय सभ्यता और संस्कृति को पाकिस्तान अपना बताने में जुटा (फोटो साभार : ChatGPT)
भारत से नफरत करने के अलावा पाकिस्तान को अब एक नया चस्का लग गया है। वह प्राचीन भारत के इतिहास को अपना बताने में जुट गया है। यह वही इतिहास है जो पूरी तरह से हिंदू धर्म और संस्कृति से जुड़ा हुआ है। हैरानी की बात यह है कि पाकिस्तान का जन्म ही इस्लाम से पहले के इतिहास (यानी हिंदू अतीत) को पूरी तरह नकारने के आधार पर हुआ था।

लेकिन अब वही पाकिस्तानी सरकार अपने फायदे के लिए उसी अतीत को जबरन अपनाने की कोशिश कर रही है। ऐसा करके वह दुनिया में खुद को जायज साबित करना चाहती है। वह एक ऐसा इतिहास दिखाना चाहती है, जिसका असलियत में कोई वजूद ही नहीं है।

‘तुर्की खून’ से लेकर ‘चाणक्य हमारे पूर्वज’ तक: पहचान के संकट में फँसा पाकिस्तान; अब भारतीय इतिहास पर जता रहा झूठा हक

पाकिस्तान इन दिनों अपनी पहचान के सबसे बड़े संकट से गुजर रहा है। दशकों तक पाकिस्तानी खुद को अरब, तुर्क, फारसी या मध्य एशियाई देशों के वंशज बताते रहे। वे खुद को विदेशी और ‘शुद्ध’ मुस्लिम दिखाने की कोशिश करते थे।

साल 1977 से जनरल जिया-उल-हक का दौर शुरू हुआ। उनके शासनकाल में पाकिस्तान के इतिहास और संस्कृति को पूरी तरह बदलने का काम किया गया। जिया सरकार ने स्कूली किताबों (इस्लामियात और पाकिस्तान स्टडीज) के सिलेबस में बदलाव किए। इसका मकसद बच्चों के दिमाग में जबरन एक अरबी-इस्लामिक पहचान को बिठाना था।

असलियत यह है कि वहाँ के बहुसंख्यक मुसलमानों के पूर्वज हिंदू ही थे। लेकिन कट्टरपंथ के कारण वे अपने इसी हिंदू अतीत से नफरत करने लगे। उन्होंने उस इतिहास से अपना हर रिश्ता तोड़ने की पूरी कोशिश की। अब वही पाकिस्तान बिल्कुल अलग राग अलाप रहा है।

वह सिंधु घाटी सभ्यता, पाणिनी, चाणक्य और राजा पोरस पर अपना हक जता रहा है। वह इस पूरे इतिहास से ‘हिंदू’ शब्द को गायब कर देना चाहता है। ऐसा करके पाकिस्तान एक झूठी और बनावटी ‘प्राचीन पाकिस्तानी’ पहचान गढ़ने की हताश कोशिश कर रहा है।

पाकिस्तानी लोग सोशल मीडिया पर भी अजीबोगरीब और मजाकिया दावे कर रहे हैं। हाल ही में एक पाकिस्तानी एक्स (X) यूजर ने BBC हिंदी का एक वीडियो शेयर किया। इसमें एक पाकिस्तानी मुस्लिम प्रोफेसर संस्कृत पढ़ाते नजर आ रहे हैं। इस Video को शेयर करते हुए यूजर ने दावा कर दिया कि संस्कृत भारत की भाषा ही नहीं है। उसने लिखा कि पाणिनी ने संस्कृत को पाकिस्तान के गांधार में तैयार किया था। उसने यह बेतुका दावा भी किया कि भारतीय लोग संस्कृत और अंग्रेजी दोनों का गलत उच्चारण करते हैं।

गायत्री मंत्र न जानने वाले भी अब संस्कृत पर जता रहे हक: ‘साउथ एशिया’ के नाम पर भारत की हिंदू विरासत चुराने का नया खेल

पाकिस्तानी मुस्लिम बिना गलती किए गायत्री मंत्र का पाठ तक नहीं कर सकते। गूगल किए बिना तो उन्हें यह भी नहीं पता होगा कि यह मंत्र क्या है। इसके अलावा, इस्लाम से थोड़ा भी भटकने पर उन्हें ‘सर तन से जुदा’ होने का खौफ रहता है। लेकिन इसके बावजूद, एक पाकिस्तानी यूजर ने बड़े दुस्साहस के साथ दावा कर दिया कि संस्कृत भारत की भाषा नहीं है। उसका तर्क है कि पाणिनी ने संस्कृत को गांधार में तैयार किया था, जो अब उत्तर-पश्चिम पाकिस्तान में है।
इस तरह के दावों को देखकर किसी भी हिंदू या भारतीयों को एक साथ हँसी और गुस्सा दोनों आ सकते हैं। BBC के Video में दिख रहे प्रोफेसर डॉ राशिद शाहिद ने संस्कृत को ‘साउथ एशिया (दक्षिण एशिया) की साझी विरासत’ बताया है। भारतीय लोग अब बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि जब भी पाकिस्तानी- चाहे वे अच्छे इरादे वाले ही क्यों न दिखें, ‘साउथ एशिया’ शब्द का इस्तेमाल करते हैं, तो उसका असली मतलब क्या होता है।
साजिश बहुत सीधी है। इतिहास, संस्कृति या धर्म के लिहाज से जो कुछ भी हिंदू और भारतीय है, उस पर ‘साउथ एशिया’ का लेबल लगा दो। ऐसा करने के बाद, भारत और हिंदुओं से नफरत करने वाले पाकिस्तानी और कभी-कभी बांग्लादेशी मुस्लिम भी उस विरासत को आसानी से अपना बताकर हड़प लेते हैं।

‘पाणिनी को पाकिस्तानी’ बताने की बचकानी जिद: अष्टाध्यायी में लिखा था ‘भारत’ का नाम

पाकिस्तानी लोग आजकल प्राचीन भारत के इतिहास पर कुछ ज्यादा ही प्यार लुटा रहे हैं। लेकिन वे एक छोटी सी बात भूल जाते हैं। पाणिनी ने जब अपनी किताब ‘अष्टाध्यायी’ लिखी, उससे हजारों साल पहले ही संस्कृत में वेद लिखे जा चुके थे। शुरू में संस्कृत सिर्फ पूजा-पाठ और मंत्र बोलने की भाषा थी।

बाद में यह हिंदू धर्म और साहित्‍य की एक मजबूत भाषा बन गई। पाणिनी ने संस्कृत को नियम और सही ढांचा दिया, यह सच है। लेकिन सिर्फ इसलिए संस्कृत को पराया बता देना कि पाणिनी गांधार (जो अब पाकिस्तान में है) के रहने वाले थे, बिल्कुल बेवकूफी है। इंटरनेट पर एक पाकिस्तानी यूजर ने तो पाणिनी को ही पाकिस्तानी बता दिया।

पाकिस्तानी यूजर ने लिखा, “संस्कृत के सबसे महान ज्ञानी पाणिनी एक पाकिस्तानी थे। आज आप जिस संस्कृत पर इतराते हैं, उसे एक पाकिस्तानी ने ही ठीक किया था।” यह देखना वाकई मजेदार है कि जो पाकिस्तान अपने कानून के तहत किसी हिंदू को प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति बनने नहीं देता, वही आज एक हिंदू ब्राह्मण पाणिनी को अपना बताने के लिए मरा जा रहा है।

वह पाणिनी के नाम से ‘हिंदू’ और ‘भारतीय’ पहचान को गायब करना चाहता है। असल में पाकिस्तान की उम्र सिर्फ 78 साल है, इसलिए वह खुद को पुराना दिखाने के लिए ऐसी अजीब हरकतें कर रहा है। पाणिनी ने अपनी किताबों में भारत के कोने-कोने का जिक्र किया है। लेकिन पाकिस्तानियों की फूटी किस्मत देखिए, पाणिनी ने अपनी किसी भी किताब में ‘पाकिस्तान’ शब्द का नाम तक नहीं लिया।

पाणिनी ने उस समय के पूरे देश को ‘भारत’ कहा था। आज भी हमारा देश इसी नाम का इस्तेमाल करता है। सच तो यह है कि ‘भारत’ शब्द का पहला लिखित सबूत ही पाणिनी की किताब ‘अष्टाध्यायी’ के एक श्लोक ‘नद्व्यचःप्राच्यभरतेषु’ (4.2.113) में मिलता है। पाणिनी ने ‘पूर्वी भारत’ और ‘उत्तरी भारत’ की बात की थी, किसी ‘पूर्वी या उत्तरी पाकिस्तान’ की नहीं।

आपके मन में भी यह सवाल जरूर आया होगा कि क्या पाकिस्तानियों को खुद यह बात नहीं पता? वे अच्छी तरह जानते हैं कि ‘पाकिस्तान’ शब्द का कोई प्राचीन इतिहास नहीं है। यह नाम नया है। लेकिन सब कुछ जानते हुए भी वे इंटरनेट पर झूठ फैला रहे हैं।

जब पाकिस्तानी मुस्लिम सोशल मीडिया पर ‘पाणिनी एक पाकिस्तानी थे’ जैसा सफेद झूठ बेचते हैं, तो उनकी असलियत सामने लाना बहुत जरूरी हो जाता है। ऐसे में इतिहास के सही तथ्यों के साथ उनका थोड़ा मजाक उड़ाना और उन्हें आईना दिखाना बिल्कुल लाजिमी है।

त्रिपुंडधारी ब्राह्मण पाणिनी और चाणक्य को ‘पाकिस्तानी’ बताने की अजीब जिद

पाकिस्तानी यूजर ने पाणिनी का जो उदाहरण शेयर किया है, वह उनकी एक बहुत बड़ी कमजोरी को दिखाता है। पाकिस्तानी मुसलमानों की सोच में यही सबसे बड़ा खोट है। वे सोचते हैं कि आज के भूगोल के हिसाब से प्राचीन भारत के सभी ऐतिहासिक लोग, चाहे उनका धर्म कोई भी हो, ‘प्राचीन पाकिस्तानी’ बन जाते हैं।

माथे पर त्रिपुंड लगाने वाले एक हिंदू ब्राह्मण और संस्कृत के महाज्ञानी पाणिनी की मेज पर पाकिस्तान का ‘चांद-तारा’ वाला झंडा दिखाना बेहद अजीब और मजाकिया है। पाणिनी खुशनसीब थे कि वे उस दौर में पैदा हुए जब इस्लाम या पाकिस्तान जैसा कुछ था ही नहीं। पाकिस्तान खुद को ‘रियासत-ए-मदीना’ कहता है और काफिरों, खासकर मूर्तिपूजक हिंदुओं से नफरत करता है।

लेकिन चूंकि उनके पास जिहादी आतंकियों के अलावा अपना कोई ऐतिहासिक हीरो नहीं है, इसलिए वे प्राचीन भारत के हिंदुओं को जबरन ‘पाकिस्तानी’ बनाने में जुटे हैं। पाणिनी की लिखी ‘अष्टाध्यायी’ वेदों के छह अंगों (वेदांग) में से एक है। वेद हिंदू सनातन धर्म के सबसे पवित्र ग्रंथ हैं। इतिहास में इस्लामिक आक्रमणकारियों ने इन्हें पूरी तरह मिटाने और नष्ट करने की बहुत कोशिश की।

हालाँकि, समय से परे मौजूद इन वेदों को खत्म करना नामुमकिन है। भारतीय हिंदू हस्तियों को जबरन पाकिस्तानी बताने का यह मजाक यहीं नहीं रुका। अब वे महान राजनीतिक रणनीतिकार और चंद्रगुप्त मौर्य के गुरु, आचार्य चाणक्य के पीछे भी पड़ गए हैं। इसी सिलसिले में एक पाकिस्तानी एक्स (X) यूजर ने लिखा, “महान चाणक्य ने पाकिस्तान की तक्षशिला यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की थी। वहाँ मिले ज्ञान ने ही उन्हें इतिहास का सबसे बड़ा रणनीतिकार बनाया, जिससे उन्होंने चंद्रगुप्त मौर्य को मौर्य साम्राज्य खड़ा करने में मदद की। आज भी उनके विचार राजनीति और शासन को प्रभावित करते हैं।”

अब कुछ पाकिस्तानी यूजर इस हद तक नासमझी दिखा रहे हैं कि वे ईसा पूर्व चौथी सदी की ‘तक्षशिला’ को ‘पाकिस्तानी यूनिवर्सिटी’ बता रहे हैं, जबकि उस दौर में न तो इस्लाम मजहब था और न ही पाकिस्तान नाम का कोई मुल्क।

हद तो तब हो गई जब इंटरनेट पर एक यूजर ने बिना किसी ऐतिहासिक सबूत के पंजाब के महान राजा पोरस (राजा पुरुषोत्तम) को जबरन एक बौद्ध राजा घोषित कर दिया और सोशल मीडिया पर इस सफेद झूठ को सच साबित करने की बचकानी जिद पर अड़ गया।

राजा पुरुषोत्तम (राजा पोरस) एक महान प्राचीन भारतीय राजा थे। उन्होंने झेलम (वितस्ता) और चिनाब (असीकनी) नदियों के बीच के इलाके पर राज किया था। उन्होंने ईसा पूर्व 326 में झेलम नदी के किनारे सिकंदर के बढ़ते कदमों को रोक दिया था। हालाँकि राजा पोरस के धर्म को लेकर बहुत ज्यादा विवरण नहीं मिलते। लेकिन सभी इतिहासकार मानते हैं कि वे वैदिक धर्म यानि हिंदू धर्म के अनुयायी थे।

गंगा घाटी से नफरत और पाकिस्तान का अधूरा ज्ञान

भारत के गंगा मैदानी इलाके से नफरत करने वाले पाकिस्तानियों ने तुरंत राजा पोरस को ‘बौद्ध’ घोषित कर दिया। वे यह भूल गए कि बौद्ध धर्म की शुरुआत भी भारत के इसी पूर्वी गंगा मैदान (बिहार-यूपी) से हुई थी। वे इस बात को नहीं जानते या जानबूझकर नजरअंदाज करते हैं कि बौद्ध धर्म सम्राट अशोक के काल के बाद ही उत्तर-पश्चिम (आज के पाकिस्तान वाले इलाके) में ठीक से फैला था। लेकिन पाकिस्तानी तो मनगढ़ंत प्रोपेगेंडा चलाने में माहिर हैं। उनके लिए इतिहास के तथ्य मायने नहीं रखते, बल्कि उनका झूठा नैरेटिव सबसे ऊपर रहता है।
सोशल मीडिया पर ऐसे झूठे दावों की बाढ़ आई हुई है। पाकिस्तान की प्रोपेगेंडा विंग (ISPR) के बॉट्स मिलकर एक सोची-समझी साजिश चला रहे हैं। इनका मकसद प्राचीन भारत के हिंदू इतिहास को चुराकर एक नकली ‘प्राचीन पाकिस्तान’ की विरासत तैयार करना है। खुद को दूसरों से बेहतर दिखाने के लिए पाकिस्तानी अब एक नया पैंतरा अपना रहे हैं। वे ‘सिंधु घाटी बनाम गंगा घाटी’ का एक फर्जी विवाद पैदा कर रहे हैं।
वे गंगा घाटी के इतिहास और संस्कृति को सिंधु घाटी से कमतर या घटिया दिखाने की कोशिश में जुटे हैं। वे जानबूझकर ‘हम बेहतर और तुम खराब’ की सोच फैला रहे हैं। ऐसा करके वे सिंधु घाटी सभ्यता पर अपना झूठा हक जताना चाहते हैं। इस साजिश के जरिए वे ‘अखंड प्राचीन भारत’ के ऐतिहासिक और भौगोलिक वजूद को ही मिटाना चाहते हैं। इस दिशा में उनका पहला कदम भारतीय उपमहाद्वीप (Indian Subcontinent) की जगह जबरन ‘साउथ एशिया’ शब्द को बढ़ावा देना था।

इतिहास को अपनाने से लेकर चुराने तक का खेल: पाकिस्तान ने सिंधु घाटी सभ्यता पर क्यों बढ़ा लालच?

यह बेहद अजीब और चौंकाने वाला है। साल 1947 में पाकिस्तान ‘द्वि-राष्ट्र सिद्धांत’ (टू-नेशन थ्योरी) के आधार पर बना था। तब कहा गया था कि हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग देश हैं और वे कभी साथ नहीं रह सकते। लेकिन आज वही पाकिस्तानी लोग प्राचीन भारत के हिंदुओं और उनके महान कामों पर अपना हक जताने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। उनका तर्क है कि ये हस्तियाँ जिस जगह पैदा हुईं या जहाँ उन्होंने काम किया, वह इलाका अब आधुनिक पाकिस्तान में आता है, इसलिए वे ‘प्राचीन पाकिस्तानी’ थे।
आइए कुछ सच बिल्कुल साफ-साफ समझ लेते हैं। यह सच है कि सिंधु घाटी सभ्यता (सिंधु-सरस्वती सभ्यता) के कुछ बड़े मुख्य हिस्से जैसे हड़प्पा और मोहनजोदड़ो आज के पाकिस्तान में हैं। तक्षशिला और पाणिनी का जन्मस्थान (अटक का शालातुला) भी वहीं है। लेकिन कड़वा सच यह है कि पाकिस्तान इन ऐतिहासिक जगहों की ठीक से देखभाल नहीं करता है। इसके उलट, भारत में सिंधु घाटी सभ्यता की 2,000 से ज्यादा जगहें हैं और भारत सरकार उन्हें बहुत अच्छे से संभालकर रखती है। एक मजेदार तथ्य यह भी है कि इस प्राचीन सभ्यता की लगभग 60% जगहें आज के भारत में ही मौजूद हैं।

भारतीय लोगों या भारत सरकार ने इस भौगोलिक सच से कभी इनकार नहीं किया है। लेकिन पाकिस्तानियों की चालाकी यह है कि वे इन जगहों को जबरन एक नकली ‘प्राचीन पाकिस्तान’ के रूप में दिखाने की कोशिश कर रहे हैं। पाकिस्तानी लोग अक्सर ऐसे इतिहासकारों का सहारा लेते हैं जो कट्टरपंथी सोच के हैं। वे इन लोगों की मदद से सिंधु घाटी सभ्यता से हिंदू धर्म के गहरे जुड़ाव को पूरी तरह मिटाना चाहते हैं।

पाकिस्तान का अकेला मकसद यही है कि किसी भी तरह भारत को उसकी पुरानी जड़ों से अलग कर दिया जाए। वे यह साबित करना चाहते हैं कि भारत की सभ्यता कहीं और से उधार ली गई है, ताकि भारतीयों के मन में अपनी संस्कृति को लेकर हीनभावना पैदा हो सके। इसी साल (2026) मई में भारत के संस्कृति मंत्रालय ने हमारी अटूट सभ्यता का एक बड़ा सबूत दुनिया के सामने रखा।

मंत्रालय ने ‘पशुपति सील’ (मोहर) का जिक्र किया। यह मोहर अखंड भारत के समय मोहनजोदड़ो में मिली थी। पत्थर से बनी यह मोहर करीब 4,300 साल पुरानी है। इसमें एक योगी की मूर्ति है जो योग मुद्रा (मूलबंधासन) में बैठी है। इसे भगवान शिव का ‘पशुपति’ रूप माना जाता है, जिनके चारों तरफ जानवर मौजूद हैं।

संस्कृति मंत्रालय ने साफ शब्दों में कहा, “भले ही ये प्राचीन जगहें आज की नई सीमाओं के पार चली गई हों, लेकिन भारत आज भी इस विरासत का असली और जिंदा रखवाला है। पशुपति सील में दिखने वाली योग मुद्रा, भगवान शिव का प्रतीक और आध्यात्मिक सोच आज भी भारत के मंदिरों, रोज की पूजा-पाठ और योग परंपराओं में पूरी तरह जिंदा है। वैदिक काल से लेकर आज के आधुनिक भारत तक, हमारी सभ्यता की यह कड़ी कभी नहीं टूटी। यह हमारे विचारों, रीति-रिवाजों और हमारी आत्मा में गहराई से बसी हुई है।”

भारत के संस्कृति मंत्रालय के बयान के तुरंत बाद, देश-विदेश का एक खास वामपंथी और कट्टरपंथी बुद्धिजीवियों का गुट (कैबाल) मैदान में कूद पड़ा। इस पूरे गैंग का एक ही मकसद था, किसी भी तरह सिंधु घाटी सभ्यता से वैदिक हिंदू धर्म के जुड़ाव को पूरी तरह नकार दिया जाए।

भारत से नफरत करने वाली और क्रूर मुगल शासक औरंगजेब की प्रशंसक ऑड्रे ट्रुशके ने इस मामले पर सोशल मीडिया पर जहर उगला। उसने लिखा, “यह भगवान शिव की मूर्ति नहीं है। इसकी जगह यह एक यूरेशियन देवता (पशुओं के भगवान) को दिखाने वाले प्रोटो-एलामाइट प्रतीकों से प्रभावित कोई आकृति हो सकती है।”

इस वामपंथी गुट ने इतिहास के स्थापित सच को झुठलाने के लिए तुरंत अपनी पूरी ताकत झोंक दी। वे यह मानने को बिल्कुल तैयार नहीं हैं कि मोहनजोदड़ो में मिली पशुपति सील का संबंध सीधे तौर पर सनातन धर्म और भगवान शिव से है।

इतिहासकार जॉन मार्शल को भी नकारने लगा पाकिस्तान: वामपंथियों के सहारे भारत विरोधी प्रोपेगेंडा

ऑड्रे ट्रुशके के इसी बेतुके दावे का सहारा लेकर कई पाकिस्तानी यूजर्स भारत के संस्कृति मंत्रालय के पोस्ट पर आकर रोना रोने लगे। वे ब्रिटिश इतिहासकार सर जॉन मार्शल को भी गलत बताने लगे। जॉन मार्शल ने साल 1931 में अपनी किताब ‘मोहनजो-दड़ो एंड द इंडस सिविलाइजेशन’ में साफ लिखा था कि पशुपति सील असल में ऐतिहासिक भगवान शिव का ही शुरुआती रूप है।

सिंधु घाटी सभ्यता के कई बड़े और मुख्य हिस्से जैसे कालीबंगा (राजस्थान), बनावली और राखीगढ़ी (हरियाणा), धोलावीरा और लोथल (गुजरात) आज के भारत में मौजूद हैं। ये सभी जगहें घग्गर-हकरा नदी तंत्र, यानी पौराणिक सरस्वती नदी के किनारे बसी हुई थीं। इससे साफ पता चलता है कि इस पूरी सभ्यता के विकास में एक बहुत बड़ी नदी का सहारा था। यही वजह है कि इतिहासकार इसे ‘सिंधु-सरस्वती सभ्यता’ भी कहते हैं।

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) के पूर्व महानिदेशक और मशहूर पुरातत्वविद् ब्रज बासी लाल (BB लाल) ने भी एक अहम बात बताई थी। उन्होंने सबूतों के साथ कहा था कि हड़प्पा संस्कृति की ज्यादातर जगहें सिंधु नदी के पास नहीं, बल्कि सरस्वती नदी के रास्ते पर बसी थीं। इससे साबित होता है कि सरस्वती नदी ही इस सभ्यता का मुख्य केंद्र थी। इसके अलावा, राजस्थान के कालीबंगा में हुई खुदाई के दौरान प्राचीन वैदिक यज्ञ वेदियाँ, हवन कुंड और यूप (यज्ञ स्तंभ) मिले हैं। ये चीजें साफ इशारा करती हैं कि वैदिक संस्कृति और सिंधु घाटी सभ्यता के बीच एक अटूट धार्मिक और सांस्कृतिक रिश्ता था।

भारत और विदेशों के कुछ पक्षपाती इतिहासकारों ने जानबूझकर सरस्वती नदी को ‘काल्पनिक’ (एक मिथक) बताकर खारिज कर दिया। पुख्ता रिसर्च और नई खोजों के बावजूद उन्होंने ऐसा किया। उनका एकमात्र मकसद हिंदू धर्मग्रंथों, खासकर वेदों को ऐतिहासिक रूप से सच्चा और भरोसेमंद मानने से रोकना था।

इतिहासकारों के इस पक्षपात का पूरा फायदा पाकिस्तान उठा रहा है। कुछ पाकिस्तानी हर कीमत पर तथ्यों को झुठलाने में लगे हैं। वे सिंधु-सरस्वती सभ्यता के अवशेषों में साफ दिखने वाली हिंदू और वैदिक संस्कृति की कड़ियों को तोड़ना चाहते हैं। हालाँकि, वैज्ञानिक खोजों ने उनका झूठ पकड़ लिया है। हाल ही में राजस्थान के डीग जिले के बहज गाँव में जमीन से 23 मीटर नीचे एक प्राचीन नदी का रास्ता (पैलियोचैनल) दबा हुआ मिला है, जो इस सभ्यता के सच को साबित करता है।

बात सिर्फ ‘पाकिस्तान’ नाम की नहीं है। साल 1947 से पहले दुनिया के नक्शे पर पाकिस्तान नाम का कोई राजनीतिक वजूद था ही नहीं। इसलिए, ‘प्राचीन पाकिस्तान’ जैसी किसी भी चीज के होने का तो सवाल ही नहीं उठता। इसके लिए सही शब्द सिर्फ ‘प्राचीन भारत’ या प्राचीन अखंड भारत का इतिहास ही है। भारतीय इतिहासकार आज के पाकिस्तान में मौजूद सिंधु घाटी सभ्यता के हिस्सों को प्राचीन भारतीय इतिहास का ही भाग मानते हैं। पाकिस्तान चाहे कितना भी मनगढ़ंत प्रोपेगेंडा कर ले, या एक ही झूठ को बार-बार सच बताने की हिटलर के मंत्री गोएबल्स जैसी चालें चल ले, इतिहास का सच कभी नहीं बदलेगा।

सिर्फ 93 साल पुराना है ‘पाकिस्तान’ शब्द का इतिहास

भले ही द्वि-राष्ट्र सिद्धांत (टू-नेशन थ्योरी) की जड़ें 19वीं सदी में सर सैयद अहमद खान के विचारों में मिलती हैं, जिन्होंने मुसलमानों के लिए अलग मुल्क की वकालत की थी। लेकिन ‘पाकिस्तान’ शब्द पहली बार साल 1933 में चौधरी रहमत अली खान ने गढ़ा था। उन्होंने इस नाम को पाँच इलाकों को मिलाकर एक शॉर्ट फॉर्म (अक्रोनिम) के रूप में बनाया था। इसमें ‘P’ का मतलब पंजाब, ‘A’ का अफगानिया (खैबर पख्तूनख्वा), ‘K’ का कश्मीर, ‘S’ का सिंध और ‘tan’ का मतलब बलूचिस्तान था।

आज के पाकिस्तानी तर्क देते हैं कि चूंकि पाकिस्तान के नाम में इन पाँचों क्षेत्रों के नाम शामिल थे, इसलिए इन इलाकों का ‘प्राचीन’ इतिहास स्वाभाविक रूप से पाकिस्तान का ही है। ऐसा कहते हुए वे बड़ी चालाकी से इस सच को छुपा जाते हैं कि चौधरी रहमत अली का पाकिस्तान किसी धर्मनिरपेक्ष देश की सोच नहीं था। वे तो केवल और केवल मुसलमानों के लिए एक अलग, स्वतंत्र और संप्रभु मुल्क बनाना चाहते थे।

पिछले 70 से ज्यादा सालों से पाकिस्तान के स्कूलों के सिलेबस, वहाँ के नेताओं के भाषणों, मीडिया और यहाँ तक कि मनोरंजन उद्योग में भी हमेशा इस्लामिक आक्रमणों का गुणगान किया गया। वहाँ की आम मुस्लिम जनता को झूठा दिलासा दिया गया कि वे तुर्क, अरब या अन्य ‘लड़ाकू नस्लों’ के वंशज हैं और उनका हिंदुओं से कोई लेना-देना नहीं है। जबकि असलियत यह है कि एक अदद DNA टेस्ट ही उन्हें उनके इस ‘असहज’ कर देने वाले सच से रूबरू करा सकता है कि उनके पूर्वज हिंदू ही थे। वे आज भी 8वीं शताब्दी में मोहम्मद बिन कासिम द्वारा सिंध पर किए गए हमले को पाकिस्तानी मुसलमानों के लिए एक महान और जश्न मनाने वाला ऐतिहासिक पल बताते हैं।

असल में, पाकिस्तान के स्कूलों की इतिहास की किताबों और वहाँ के देशभक्ति के गानों में हिंदू राजाओं को हमेशा विलेन की तरह दिखाया जाता है। ‘आओ बच्चों सैर कराएँ तुमको पाकिस्तान की’ जैसे मशहूर गानों में सिंध के हिंदू राजा दाहिर की छवि को बेहद खराब करके पेश किया गया है। इसके उलट, वे मोहम्मद बिन कासिम के क्रूर हमले को पाकिस्तान के इतिहास की एक शानदार शुरुआत बताते हैं। वे ऐसा दिखाते हैं जैसे बिन कासिम के आने से ही वहाँ सभ्यता की शुरुआत हुई थी।

पाकिस्तानी सरकार और वहाँ की आम जनता हिंदुओं से नफरत के चलते मोहम्मद घोरी और सोमनाथ मंदिर को तोड़ने वाले ‘बुतशिकन’ (मूर्तियाँ तोड़ने वाले) महमूद गजनवी जैसे जिहादी हमलावरों का खूब गुणगान करती है। हिंदुओं के प्रति यह नफरत उनकी धार्मिक और राजनीतिक सोच में बहुत गहराई तक धँसी हुई है। यही वजह है कि मुसलमानों के लिए एक अलग मुल्क (पाकिस्तान) लेने, वहाँ के हिंदू अल्पसंख्यकों को प्रताड़ित करने और अनगिनत मंदिरों को तोड़ने के बाद भी उनकी नफरत शांत नहीं हुई है। वे आज भी उस हिंदू धर्म से नफरत करते हैं, जिसे कभी उनके खुद के पूर्वज मानते थे।

पाकिस्तान का दोहरापन देखिए, एक तरफ तो वे पाणिनी, आचार्य चाणक्य और राजा पोरस जैसी प्राचीन हिंदू सनातन हस्तियों पर अपना हक जताते हैं। दूसरी तरफ, वे अपनी मिसाइलों के नाम गजनवी, घोरी और अब्दाली जैसे क्रूर इस्लामिक आक्रमणकारियों के नाम पर रखते हैं। ये वही हमलावर थे जिन्होंने भारतीय जमीनों को बेरहमी से लूटा और उजाड़ा। उन्होंने उस इलाके की धन-दौलत भी लूटी जो आज पाकिस्तान का हिस्सा है। इन लुटेरों ने आज के भारतीयों और पाकिस्तानियों के सांझे हिंदू, बौद्ध, सिख और जैन पूर्वजों पर भयंकर जुल्म ढाए थे, उनका कत्लेआम किया था।

आखिर पाकिस्तानी मुसलमान बिना उसकी ‘हिंदू पहचान’ को स्वीकार किए अपने पुराने हिंदू इतिहास को अपना कैसे कह सकते हैं? विदेशी हमलावरों के खिलाफ भारत की रक्षा करने वाले राजा पोरस (राजा पुरुषोत्तम) उनके हीरो कैसे हो सकते हैं? खासकर तब, जब उनके असली हीरो घोरी और गजनवी जैसे विदेशी इस्लामिक हमलावर हैं, जिन्होंने उनके ही हिंदू पूर्वजों पर जुल्म ढाए थे।

लंबे समय तक पाकिस्तानियों ने अपने इस्लाम-पूर्व के इतिहास को छोटा दिखाया और उसे नकारा। वे खुद को समाज में ऊँचा दिखाने के लिए झूठा दावा करते रहे कि वे अरब, तुर्क या फारसी नस्ल के हैं। वे यह मानने से भागते रहे कि उनके पूर्वज हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख थे। आज भी कई पाकिस्तानी खुद को ‘मुस्लिम राजपूत’ कहते हैं, क्योंकि उनके पूर्वज हिंदू क्षत्रिय राजपूत थे। लेकिन सोचने वाली बात यह है कि बिना कुलदेवी की पूजा के कोई राजपूत कैसे हो सकता है?

जैसे ‘मुस्लिम राजपूत’ शब्द अपने आप में ही उल्टा और बेतुका है, ठीक वैसे ही ‘प्राचीन पाकिस्तान’ कहना भी पूरी तरह से बेतुका और मजाक है।

पाकिस्तान के इस्लामिक जनरलों ने वहाँ की मुस्लिम बहुसंख्यक आबादी को कट्टर बनाने के लिए हर मुमकिन पैंतरा चला। उन्होंने देश का पूरी तरह इस्लामीकरण कर दिया। वहीं दूसरी तरफ, हिंदू और बाकी गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यकों का जबरन धर्म परिवर्तन कराया गया।

सालों से पाकिस्तानी मुसलमान उस संस्कृति से दूरी बनाते आए हैं जिसे वे हिकारत से ‘हिंदूआना संस्कृति’ कहते हैं। स्कूल की किताबों से लेकर, नेताओं के भाषणों और टीवी सीरियलों तक, पाकिस्तान का एक बड़ा हिस्सा हर उस चीज को ‘हिंदूआना’ कहकर खारिज कर देता है जो इस्लामिक नहीं है। उनकी नजर में जो इस्लामिक नहीं, वो खराब है।

साड़ी पर पाबंदी से लेकर ‘ताजमहल’ पर दावे तक: अपनी पहचान के संकट से जूझ रहा पाकिस्तान

मजेदार बात यह है कि हाल के सालों में पाकिस्तानियों ने ‘साड़ी’ को फिर से अपनाना शुरू कर दिया है। साड़ी एक ऐसा हिंदू पहनावा है जिसे भारत के धार्मिक बँटवारे से बहुत पहले से महिलाएँ पहनती आ रही हैं। लेकिन जिया-उल-हक के तानाशाही शासन के दौरान पाकिस्तान में साड़ियों पर एक अघोषित पाबंदी लगा दी गई थी। उस समय मुस्लिम महिलाओं को साड़ी पहनने से रोका जाता था, क्योंकि इसे विशुद्ध रूप से भारतीय और हिंदू संस्कृति से जुड़ा पहनावा माना जाता था।

ये वही पाकिस्तानी हैं जो भारत के ‘ताजमहल’ पर भी अपना हक जताता है। उनका तर्क है कि मुसलमान होने के नाते वे मुगलों की ‘विरासत’ के असली वारिस या रखवाले हैं। उनमें से बहुत से लोग तो आज भी इसी मुगालते में जीते हैं कि उनके पूर्वज मुगल थे। इसी वजह से वे सोशल मीडिया पर ‘हमने हिंदुओं पर 800 साल राज किया है’ जैसा बेहद झूठा और हास्यास्पद दावा करते फिरते हैं।

पाकिस्तानी लोग आज दोहरी चाल चल रहे हैं। वे भौगोलिक आँकड़ों को तोड़-मरोड़कर प्राचीन भारत के महान हिंदुओं पर अपना हक जताना चाहते हैं। साथ ही, वे मध्यकालीन भारत के क्रूर इस्लामिक लुटेरों का भी गुणगान करते हैं ताकि वे अपनी जबरन थोपी गई मुस्लिम पहचान को सही ठहरा सकें। यह सब कुछ वे सिर्फ इसलिए कर रहे हैं ताकि दुनिया के सामने पाकिस्तान को एक ‘ऐतिहासिक सभ्यता वाला देश’ (सिविलाइजेशनल स्टेट) साबित कर सकें।

पाकिस्तान ने यह पैंतरा असल में इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ ईरान की किताब से सीखा है। ईरान के मुल्ला शासन ने शुरुआती तीन दशकों तक अपने प्राचीन राजा सायरस (Cyrus) को कभी याद नहीं किया। लेकिन जब उनके देश पर वजूद का संकट मंडराने लगा, तो उन्हें अचानक अपनी इस्लाम से पहले की प्राचीन विरासत याद आ गई और वे उसका गुणगान करने लगे। आज पाकिस्तान भी ठीक उसी तरह अपने वजूद के संकट से बचने के लिए भारत के प्राचीन इतिहास को चुराने की कोशिश कर रहा है।

यह बात और भी ज्यादा मजेदार हो जाती है जब भारतीय हिंदू पूरी दुनिया के सामने प्राचीन भारतीय सभ्यता के असली रखवाले होने का दावा करते हैं। इस पर पाकिस्तानी मुसलमान अचानक भड़क जाते हैं और गुस्सा दिखाने लगते हैं। भारत का यह दावा पूरी तरह सही है, चाहे उस प्राचीन सभ्यता के अवशेष आज की किसी भी भौगोलिक सीमा के अंदर क्यों न आते हों।

अचानक पाकिस्तान को संस्कृत, पाणिनी, सिंधु घाटी सभ्यता और वैदिक सनातन सभ्यता से जुड़ी हर चीज से प्यार हो गया है। वे इसे गले लगाना चाहते हैं। लेकिन वे भूल जाते हैं कि यह भारत के हिंदू ही हैं और कुछ हद तक पाकिस्तान और बांग्लादेश के बचे हुए हिंदू, जिन्होंने इस भाषा, सभ्यता, धर्म, संस्कृति और ग्रंथों की परंपरा को हजारों साल से जिंदा रखा है। हिंदुओं के लिए संस्कृत एक ‘देवभाषा’ यानी देवताओं की भाषा है। हिंदू शुरू से भारत को अपनी मातृभूमि मानकर पूजते आए हैं, जबकि इस्लाम में ऐसी कोई सोच मौजूद ही नहीं है।

अगर सिर्फ आज के भूगोल या जमीन के टुकड़े के आधार पर ही इतिहास के हर हीरो या जगह पर हक जताया जा सकता है, तो पाकिस्तानियों को सबसे पहले अपने हिंदू पूर्वजों को स्वीकार करना चाहिए। उन्हें गजनवी और घोरी जैसे क्रूर लुटेरों की तारीफ करना तुरंत बंद कर देना चाहिए, जिन्होंने उनके ही हिंदू पूर्वजों पर जुल्म किए और उन्हें जबरन मुसलमान बनाया। इस सोच का आखिरी और स्वाभाविक नतीजा तो यही होगा कि वे अपनी ऐतिहासिक गलती को सुधारें और वापस अपने मूल हिंदू धर्म में लौट आएँ।

प्राचीन भारतीय इतिहास पर हिंदुओं का यह दावा भाषा, पवित्र ग्रंथों, दर्शन और पुरातत्व के मजबूत सबूतों पर टिका है। यह एक ऐसी अटूट सभ्यता है जो हजारों सालों से लगातार चली आ रही है। यह इतिहास सिर्फ आज के भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इसका विस्तार दूर अफगानिस्तान तक फैला हुआ है।

आतंक की छवि सुधारने और वजूद बचाने के लिए पाकिस्तान की नई चाल

पाकिस्तान इस समय जो कुछ भी कर रहा है, वह इतिहास का एक चुनिंदा इस्तेमाल है। वह सिर्फ राष्ट्रीय गर्व के लिए इस्लाम से पहले के इतिहास को एक हथियार की तरह इस्तेमाल कर रहा है। लेकिन वह अपनी उस बुनियादी सोच को नहीं छोड़ रहा जो नफरत भरे द्वि-राष्ट्र सिद्धांत (टू-नेशन थ्योरी) पर टिकी है। इसी सोच के तहत बँटवारे को सही ठहराने के लिए कभी हिंदू इतिहास को पूरी तरह नकार दिया गया था।

पिछले कुछ दशकों में पाकिस्तान ने दुनिया भर में इस्लामिक आतंकवाद के गढ़ के रूप में बदनामी कमाई है। आप किसी भी जिहादी आतंकी संगठन का नाम लीजिए, उसका पाकिस्तान से कनेक्शन अपने आप सामने आ जाएगा। पाकिस्तान के सरकारी संरक्षण में चलने वाले इस आतंकवाद ने देश की छवि को पूरी दुनिया में बर्बाद कर दिया है। अब अपनी इस साख को सुधारने के लिए यह इस्लामिक देश मोहनजोदड़ो, तक्षशिला और सिंधु घाटी सभ्यता का सहारा ले रहा है। वह इनके जरिए दुनिया में अपनी ‘सॉफ्ट पावर’ बढ़ाना चाहता है, राष्ट्रीय गर्व दिखाना चाहता है और विदेशी पर्यटकों को लुभाना चाहता है।

‘प्राचीन पाकिस्तान’ का यह पूरा मनगढ़ंत नाटक सिर्फ इसलिए रचा जा रहा है ताकि एक कड़वे सच का मुकाबला किया जा सके। दुनिया भर में यह माना जाता है कि ‘पाकिस्तान एक अप्राकृतिक और बनावटी देश है।’ इसी हकीकत को झुठलाने के लिए वे भारत के प्राचीन इतिहास को अपना बता रहे हैं।

आज पाकिस्तान के भीतर ही बलूच, पश्तून, सिंधी और कई अन्य जातीय समूह पंजाब के दबदबे वाले पाकिस्तान से आजादी माँग रहे हैं। देश अंदर से पूरी तरह टूट रहा है। ऐसे में कट्टर इस्लामिक नैरेटिव या खुद को ‘शुद्ध अरबी खून’ बताने वाले झूठे दावे भी देश को एक रखने में नाकाम साबित हो रहे हैं। यही वजह है कि अब वे अपनी एकता बनाए रखने के लिए प्राचीन भारत के इतिहास को चुराने की कोशिश कर रहे हैं।

वसंत पंचमी से माँ सरस्वती का नाम हटाने वाला मुल्क कैसे बनेगा सेक्युलर?

जिस मुल्क की सत्ता आसिम मुनीर जैसे मदरसा-छाप जनरल के हाथों में हो, जो हर भाषण में पाकिस्तानियों को द्वि-राष्ट्र सिद्धांत (टू-नेशन थ्योरी) न भूलने की नसीहत देता है, वहाँ बदलाव की उम्मीद करना ही बेकार है। वहाँ इतिहास या संस्कृति को इस्लाम से अलग दिखाने की कोई भी कोशिश सिर्फ दिखावा, भ्रष्ट और स्वार्थ से भरी हुई है।

इसी साल (2026) फरवरी में जब पूरी दुनिया के हिंदुओं ने पतंगबाजी का त्योहार ‘वसंत पंचमी’ मनाया, तो पाकिस्तान ने भी इस त्योहार को ‘बसंत’ के नाम से दोबारा शुरू किया। वहाँ के नेताओं ने इसे दुनिया के सामने आजादी और सहनशीलता के सबूत के रूप में पेश किया। लेकिन कट्टरपंथियों के डर या अपनी खुद की खराब सोच की वजह से उन्होंने इस त्योहार से हिंदू धर्म और माँ सरस्वती की पूजा को पूरी तरह अलग कर दिया। उन्होंने वसंत पंचमी को सिर्फ एक ‘सांस्कृतिक’ या ‘क्षेत्रीय’ त्योहार बताकर पेश किया।

इस साल की शुरुआत में पाकिस्तान की पंजाब सरकार ने लाहौर के कुछ इलाकों के पुराने हिंदू और सिख नाम वापस रखने का प्रस्ताव दिया था। इसके तहत ‘इस्लामपुरा’ का नाम बदलकर फिर से ‘कृष्ण नगर’ और ‘बाबरी मस्जिद चौक’ का नाम ‘जैन मंदिर चौक‘ किया जाना था। इस फैसले पर वहाँ की सरकार और सोशल मीडिया पर कई पाकिस्तानी ढिंढोरा पीटने लगे। वे कहने लगे कि ‘एक तरफ भारत सांप्रदायिकता में डूब रहा है, तो दूसरी तरफ पाकिस्तान धर्मनिरपेक्षता और सहनशीलता की मिसाल बन रहा है।’ लेकिन जैसे ही इस्लामिक चरमपंथी संगठनों ने इसका थोड़ा सा भी विरोध किया, सरकार तुरंत डरकर पीछे हट गई।

जो मुल्क अपने शहरों के हिंदू इतिहास से जुड़े पुराने नाम तक वापस रखने की हिम्मत नहीं जुटा सका, वह आज प्राचीन भारत के पूरे हिंदू इतिहास पर अपना हक जताना चाहता है। यह पाकिस्तान के खोखले दावों और उनकी लाचारी को पूरी तरह बेनकाब करता है।

ऑपरेशन सिंदूर में पिटने के बाद अब प्रोपेगेंडा के सहारे भारत को घेरने की फिराक में पाकिस्तान

ये सारे सोची-समझी कोशिशें, खासकर सिंधु घाटी सभ्यता पर हक जताना और ‘प्राचीन पाकिस्तान’ का हौव्वा खड़ा करना, असल में सिंधु जल समझौते (IWT) से जुड़े हुए हैं। पिछले साल पहलगाम में पाकिस्तान समर्थित इस्लामिक आतंकी हमले के जवाब में भारत सरकार ने इस सिंधु जल समझौते को फिलहाल ठंडे बस्ते में डाल दिया है।

इस समझौते को बचाने के लिए पाकिस्तान दुनिया के हर अंतरराष्ट्रीय मंच का दरवाजा खटखटा चुका है। उसने भारत को ‘युद्ध’ की धमकियाँ तक दीं और फिर भारत से इस समझौते को दोबारा शुरू करने की भीख भी माँगी। लेकिन मोदी सरकार ने बिल्कुल साफ कर दिया है कि जब तक पाकिस्तान भारत के खिलाफ इस्लामिक आतंकवाद को बढ़ावा देना और जिहादियों को पालना पूरी तरह बंद नहीं करता, तब तक यह समझौता रद्दी के डिब्बे में ही रहेगा।

पाकिस्तानी नेतृत्व अच्छे से जानता है कि वे सैन्य ताकत के दम पर भारत को कभी नहीं हरा सकते। खासकर ‘ऑपरेशन सिंदूर‘ में भारत से बुरी तरह पिटने के बाद वे सीधे मुकाबले की हिम्मत नहीं खो चुके हैं। इसलिए अब पाकिस्तान अपने सबसे पुराने और पसंदीदा हथियार यानी ‘प्रोपेगेंडा और नैरेटिव’ के खेल पर उतर आया है।

यह असल में दुनिया के सामने रोना रोने और भारत के खिलाफ दूसरे देशों का समर्थन जुटाने की एक लंबी प्लानिंग है। पाकिस्तान भविष्य में वैश्विक मंचों पर यह तर्क देना चाहता है कि सिंधु नदी का सीधा संबंध सिंधु घाटी सभ्यता से है। चूंकि सिंधु घाटी सभ्यता पाकिस्तान की ऐतिहासिक विरासत है, इसलिए भारत का उसे इस नदी के पानी से महरुम करना कानूनी और नैतिक रूप से बिल्कुल गलत है। इसी झूठे नैरेटिव को सेट करने के लिए वे आज इतिहास चुराने की कोशिश कर रहे हैं।

‘अगर पाकिस्तानी इस्लाम छोड़ेंगे तो वे भारतीय बन जाएँगे’: पहचान के सबसे बड़े संकट से जूझ रहा पड़ोसी मुल्क

अगर पाकिस्तान पूरी तरह से अपनी इस्लामिक कट्टरपंथी सोच और घमंड को छोड़ दे, तो वह ‘इस्लामिक रिपब्लिक ऑफ पाकिस्तान’ नहीं रह जाएगा। तब उसे भारत के हिंदू इतिहास को चुराने की कोई जरूरत नहीं पड़ेगी, बल्कि वह सीधे अपनी पुरानी हिंदू जड़ों में वापस लौट आएगा। आज प्राचीन सभ्यता की इस अटूट कड़ी और पाकिस्तान के बीच केवल एक ही दीवार खड़ी है और वह है उनकी जबरन थोपी गई इस्लामिक पहचान।

लेकिन पाकिस्तान का जिहादी सैन्य नेतृत्व वहाँ की आम जनता को कभी भी अपने इस्लाम-पूर्व के इतिहास और असली पहचान को अपनाने नहीं देगा। इसके पीछे एक मशहूर कहावत है, “अगर तुर्क लोग इस्लाम छोड़ दें, तब भी वे तुर्क ही रहेंगे; अगर अरब लोग इस्लाम छोड़ दें, तब भी वे अरब ही रहेंगे; लेकिन अगर पाकिस्तानी इस्लाम छोड़ देंगे, तो वे वापस भारतीय बन जाएँगे।”

यही वजह है कि पाकिस्तानी लोग आज भी उसी जिहादी इस्लामिक सोच से चिपके हुए हैं, जिसने कभी उनके इस इलाके के हिंदू इतिहास को मिटाने और उसे विलेन दिखाने का काम किया था। लेकिन अब वे अपनी ही बात से पलटकर उसी इतिहास का चुनिंदा हिस्सा चुराने की कोशिश कर रहे हैं।

पाकिस्तानी समाज का दोहरापन यहीं नहीं रुकता। वे अपनी शादियों में हिंदू रीति-रिवाजों की नकल करते हैं और भारत के क्लासिकल डांस फॉर्म्स को भी अपनाते हैं। इसके बाद वे पूरे भारतीय उपमहाद्वीप (Indian Subcontinent) के हिंदू इतिहास को ‘साउथ एशिया’ का नाम देकर नया रूप देना चाहते हैं। हकीकत यह है कि केवल 78 साल पुराने इस मुल्क (पाकिस्तान) का अपना खुद का इतिहास और संस्कृति सिर्फ इस्लामिक आतंकवाद, कज़िन-मैरिज (भाई-बहनों में शादी) पर बने टीवी सीरियलों और जिहादी मानसिकता के इर्द-गिर्द ही सिमट कर रह गई है।(साभार) 

राजस्थान : पुष्कर मेले का इतिहास भगवान ब्रह्मा से जुड़ा है; निर्जन रेगिस्तान में आस्था, लोक-संस्कृति और व्यापार का संगम


राजस्थान के अजमेर जिले में स्थित पुष्कर शहर साल के ग्यारह महीने शांत और सूना रहता है। लेकिन जैसे ही कार्तिक महीने की पूर्णिमा(जो इस वर्ष नवंबर 5 को है) आती है, यह छोटा-सा कस्बा दुनिया के सबसे बड़े पशु मेले के कारण जीवंत हो उठता है। इस साल भी यह प्रसिद्ध मेला 30 अक्टूबर से 5 नवंबर 2025 तक आयोजित हो रहा है, जिसे पुष्कर मेले के नाम से जाना जाता है। यह मेला धार्मिक महत्व, पशुओं के व्यापार, रंगा-रंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों और पर्यटन का एक अद्भुत संगम है। गुजरात के पड़ोसी राज्य होने के कारण, गुजराती पर्यटक भी बड़ी संख्या में यहाँ पहुँचकर इस पशु मेले का आनंद लेते हैं।

वह इलाका जो साल भर वीरान/खाली रहता है, कार्तिक पूर्णिमा के नजदीक आते ही रंग-बिरंगे तंबुओं, ऊँटों की घंटियों की आवाज और हजारों पर्यटकों की भीड़ से गुलजार हो जाता है। पुष्कर का यह मेला दुनिया का सबसे बड़ा पशु मेला है, जहाँ ऊँटों की कई बेहतरीन नस्लें देखने को मिलती हैं। पशु व्यापार के साथ-साथ, इस मेले का महत्व राजस्थान की लोक-संस्कृति में भी बहुत ऊँचा माना जाता है। यहाँ राजस्थान की समृद्ध विरासत का शानदार प्रदर्शन होता है।

पुष्कर सरोवर: ‘पंच सरोवर’ में से एक

हिंदू धर्म में पुष्कर सरोवर को एक अत्यंत विशिष्ट स्थान प्राप्त है, इसे पाँच पवित्र सरोवरों यानी ‘पंच सरोवर‘ में से एक माना जाता है। ये पाँच पवित्र सरोवर हैं- मानसरोवर (तिब्बत), गुजरात के बिंदु सरोवर (सिद्धपुर), नारायण सरोवर (कच्छ), पंपा सरोवर (कर्नाटक) और राजस्थान का पुष्कर सरोवर। इसी धार्मिक महत्व के कारण पुष्कर को ‘तीर्थराज’ भी कहा जाता है। ऐसी मान्यता है कि यहाँ कार्तिक पूर्णिमा के दिन इसके घाटों पर एक बार स्नान करने से व्यक्ति को हजारों यज्ञों के बराबर पुण्य फल प्राप्त होता है।

यह विशाल और रंगा-रंग मेला मुख्य रूप से इसी पवित्र झील के किनारे और उससे सटे हुए 85 हेक्टेयर के एक विशाल मैदान में आयोजित होता है। यहाँ जब ठंडी रेगिस्तानी हवा चलती है, तो हरे-लाल मंदिरों और रंगीन तंबुओं के बीच एक जादुई और मनमोहक माहौल बन जाता है। मेले में आने वाले पर्यटक और श्रद्धालु एक ही जगह पर कई तरह के अनुभव लेते हैं। वे न केवल सरोवर में स्नान करके धार्मिक अनुष्ठान और मंदिरों के दर्शन करते हैं, बल्कि दुनिया के सबसे बड़े ऊँट मेले का रोमांच भी महसूस करते हैं। यह स्थान आस्था, व्यापार और संस्कृति का एक अनूठा संगम प्रस्तुत करता है।

भगवान ब्रह्मा और विश्वामित्र से जुड़ी पौराणिक कथाएँ

पुष्कर नाम की उत्पत्ति संस्कृत के दो शब्दों से हुई है। ‘पुष्प’ (कमल) और ‘कर’ (हाथ)। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, इस स्थान का गहरा संबंध भगवान ब्रह्मा से है। पद्म पुराण में वर्णित है कि जब वज्रनाभ नामक राक्षस देवताओं के बच्चों को मारकर आतंक फैला रहा था, तब उसका वध करने के लिए ब्रह्मा जी ने अपने हाथ से एक कमल फेंका। उस कमल की तीन पंखुड़ियाँ धरती पर गिरीं, जिनसे ज्येष्ठ, मध्य और कनिष्ठा नाम के तीन पुष्कर सरोवरों का निर्माण हुआ।

इसके बाद ब्रह्मा जी ने यहाँ एक यज्ञ शुरू किया, लेकिन शुभ मुहूर्त पर उनकी पत्नी देवी सावित्री (सरस्वती) देरी से पहुँचीं। मुहूर्त चूकने से बचने के लिए, ब्रह्मा जी ने गायत्री से विवाह करके उनके साथ यज्ञ पूरा किया। इससे क्रोधित होकर, देवी सावित्री ने ब्रह्मा जी को श्राप दिया कि उनकी पूजा केवल पुष्कर में ही होगी। यही कारण है कि दुनिया में ब्रह्मा जी का एकमात्र मुख्य मंदिर यहीं पर स्थित है, जिसका पुन:निर्माण 14वीं शताब्दी में महाराणा मोकलजी द्वारा करवाया गया था।

विश्वामित्र और पुष्कर की महत्ता

पुष्कर का इतिहास केवल ब्रह्मा जी तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह स्थान महर्षि विश्वामित्र की कथा से भी जुड़ा हुआ है। रामायण के अनुसार, महर्षि विश्वामित्र ने इसी स्थान पर हजारों वर्षों तक कठोर तपस्या की थी। उनकी इस तपस्या से प्रसन्न होकर ब्रह्मा जी ने उन्हें राजर्षि से ब्रह्मर्षि का पद प्रदान किया। हालाँकि, अप्सरा मेनका ने इसी सरोवर में स्नान करके उनकी तपस्या भंग की थी। अंततः, यह भी माना जाता है कि विश्वामित्र जी ने ही यहाँ ब्रह्मा मंदिर का निर्माण करवाया था। रामायण के सर्ग 62 के 28वें श्लोक में पुष्कर की महिमा का उल्लेख मिलता है, जिसमें विश्वामित्र द्वारा यहाँ तपस्या करने की बात कही गई है। इस धार्मिक महत्व को दर्शाने वाला विश्वामित्र आश्रम भी इसी क्षेत्र में स्थित है।

पुष्कर मेले की 150 वर्ष पुरानी परंपरा

पुष्कर मेले का इतिहास 18वीं शताब्दी जितना पुराना है, जब मराठा शासन के दौरान यह व्यापार मार्गों का एक प्रमुख केंद्र बन चुका था। हालाँकि, मेले को आधिकारिक पहचान ब्रिटिश शासनकाल में मिली, जब इसका पहला आधिकारिक आयोजन 1869 में किया गया था।

1900 के दशक की शुरुआत में, यहाँ के राजपूत राजाओं ने इस आयोजन में घोड़े और ऊँटों की दौड़ को शामिल करना शुरू कर दिया। स्वतंत्रता के बाद, 1950 के दशक के बाद राजस्थान सरकार ने इसमें सांस्कृतिक कार्यक्रमों को जोड़ा, जिससे मेले का महत्व तेजी बढ़ता चला गया। इसकी वैश्विक महत्ता को देखते हुए, यूनेस्को ने 2005 में इसे ‘अमूर्त सांस्कृतिक विरासत’ के रूप में मान्यता दी।

भले ही पहला सरकारी मेला 1869 में आयोजित हुआ हो, लेकिन राजस्थान की लोक संस्कृति और लोक कथाओं के अनुसार, यह मेला दशकों से यहाँ तक कि सदियों से, पुष्कर के रेगिस्तान में आयोजित होता आ रहा है। यह प्राचीन परंपरा आज भी जीवंत है और हर साल इस मेले में 2 लाख से 5 लाख तक पर्यटक शामिल होते हैं।

विश्व का सबसे बड़ा पशु मेला और उसका आकर्षण

पुष्कर मेले का मुख्य आकर्षण यहाँ होने वाला पशु व्यापार है, जिसे दुनिया का सबसे बड़ा ऊँट मेला भी कहा जाता है। इस मेले में 30,000 से 50,000 तक ऊँट, घोड़े, गाय और बैल इकट्ठा होते हैं। यहाँ व्यापारी अपने ऊँटों को रंग-बिरंगे कपड़ों, घंटियों और गहनों से खूब सजाते हैं, जिनकी कीमत ₹20,000 से लेकर ₹5 लाख तक पहुँच जाती है। हालाँकि, नागौर का रामदेव पशु मेला भी भारत में प्रसिद्ध है, लेकिन धार्मिक और सांस्कृतिक मेल के कारण पुष्कर मेला बिल्कुल अनूठा बन जाता है।

मेले में हर दिन विभिन्न प्रतियोगिताओं और आयोजनों की धूम रहती है। जहाँ पशुओं की प्रतियोगिताओं में ऊँट दौड़, सबसे सुंदर ऊँट और ऊँट दुहने की प्रतियोगिता आकर्षण का केंद्र होती हैं, वहीं मनुष्यों के लिए भी कई मजेदार खेल आयोजित किए जाते हैं। पहले दिन मांडणा प्रतियोगिता, स्कूल नृत्य और ‘चक दे राजस्थान’ फुटबॉल मैच होता है। अगले दिनों में लंगड़ी टाँग, गिल्ली डंडा, कबड्डी, मटका दौड़, सबसे लंबी मूँछ और पगड़ी बाँधने की प्रतियोगिताएँ शामिल रहती हैं। इन सबके अलावा, शाम होते ही कालबेलिया नृत्य, लोक गीत और रामायण के मंचन जैसे सांस्कृतिक कार्यक्रमों से रातें रंगीन हो जाती हैं।

वेदों की ओर लौटो: आर्य समाज केवल एक संस्था नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा को जगाने वाली चेतना है- नरेंद्र मोदी

कांग्रेस और इसकी समर्पित पार्टियों ने जितना नुकसान सनातन धर्म का किया है शायद ही किसी ने किया हो। इन पार्टियों में हिन्दू भी चुपचाप हिन्दू होते हुए सनातन का अपमान बर्दाश्त कर रहे हैं। इन सनातन विरोधियों ने उस आर्य समाज को निगलने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ये धरती और सनातन इतने अत्याचारों के बाद भी अगर जीवित है तो वह हमारे ऋषि-मुनियों की हज़ारों वर्षों की तपस्या के आशीर्वाद से है। इन कालनेमि पिशाचों को नहीं मालूम कि आज भी एक साधु लगभग 11/12 वर्षों से तपस्या कर रहा है। ज्योति जागृति संस्थान के संस्थापक आशुतोष महाराज। जिसे ढोंगी साबित करने के लिए यूपीए कार्यकाल में क्या-क्या प्रपंच किये गए लेकिन हमेशा औंधे मुंह जमीन पर गिरे। अदालतों से जो फटकार मिली वो अलग। 

आर्य समाज ऐसे ही नहीं स्थापित किया गया आर्य समाज हिन्दुओं के धार्मिक वेदों और उपनिषदों पर आधारित और केंद्रित है। जो नेता मुस्लिम वोटबैंक के आगे घुटने टेक अपने ही धर्म को अपमानित करे क्या वह हिन्दू कहलवाने योग्य हो सकता है? इन कालनेमि पिशाचों के पास बस एक ही काम है हिन्दुओं को जातियों में बांटों। इन कालनेमि पिशाचों को नहीं मालूम कि हज़ारों वर्ष तपस्या करने के बाद ऋषि-मुनियों ने वेद और उपनिषदों की रचना की है। क्या विश्व में किसी अन्य मजहब के मानने वालों को अपने मजहब की बुराई करते देखा है लेकिन ये कालनेमि पिशाच हिन्दू धर्म में ही मिलते हैं। जबकि उन मजहबों में बहुत कमियां हैं फिर भी अपने-अपने मजहब को सम्मान देते हैं। क्या इन पिशाचों का सामाजिक बहिष्कार करने का समय निकट है?  

सनातन धर्म को सम्मान देने में स्वामी दयानन्द द्वारा स्थापित आर्य समाज की है। ये आर्य समाज ही है जिसने और गायत्री मन्त्र का महत्व समझाया। मात्र एक शब्द नहीं यह एक शब्द में हमारे समस्त देवी-देवताओं का स्मरण करवाता है और यही स्थिति गायत्री मन्त्र की है। इतना ही नहीं यह मन्त्र कितना शक्तिशाली और मानव जीवन में प्रभावी है कोई और मन्त्र नहीं। प्रतिदिन सुबह उठकर कोई दिनचर्या करने से पहले इस मन्त्र के स्मरण करने से मनुष्य के जीवन पर ऐसा प्रभाव पड़ता जिसका उसको भी मालूम होता। इस मन्त्र को हर देवी-देवता द्वारा भी स्मरण किया जाता है। जिस किसी ने गायत्री मन्त्र की निष्पाप से सिद्धि कर ली वह अपना ही नहीं समाज को भी विसंगति से बचाने में सक्षम होता है। 

यदि हिन्दू प्रतिदिन अपने घर में गायत्री मन्त्र का जाप करते हवन करता है वह केवल अपना घर ही नहीं बल्कि अपने निवास ही नहीं बल्कि आसपास का वातावरण दोषमुक्त करता है। हवन अग्नि से निकलने वाला धुआं घर के कोने-कोने से दुरात्माओं को समाप्त करता है। इस मन्त्र की महिमा से देवी-देवता भी अछूते नहीं रहे।     

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार, 31 अक्टूबर को नई दिल्ली के रोहिणी में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय आर्य महासम्मेलन 2025 को संबोधित करते हुए कहा कि आर्य समाज केवल एक संस्था नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा को जगाने वाली चेतना है। आर्य समाज की 150 वर्षीय यात्रा को भारत की वैदिक पहचान और राष्ट्र पुनर्निर्माण की ताकत बताते हुए कहा कि स्वामी दयानंद सरस्वती के विचार आज भी भारत के विकास पथ के मार्गदर्शक हैं। महासम्मेलन को संबोधित करते उन्होंने कहा कि जब भी मैं आपके बीच आता हूं तो एक अनोखी ऊर्जा और दिव्य प्रेरणा मिलती है। यह स्वामी दयानंद जी का आशीर्वाद है।

कार्यक्रम में गुजरात और महाराष्ट्र के राज्यपाल आचार्य देवव्रत, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, डीएवी कॉलेज मैनेजिंग कमेटी के अध्यक्ष पूनम सूरी, आर्य समाज के वरिष्ठ संत और दुनिया भर से आए प्रतिनिधि उपस्थित थे। सेमिनार के दौरान स्वामी दयानंद की स्मृति में विशेष स्मारक सिक्के का विमोचन भी किया गया। स्वामी दयानंद सरस्वती को याद करते हुए उन्होंने कहा कि वे ऐसे युगपुरुष थे जिन्होंने गुलामी के अंधकार में डूबे भारतीय समाज में आत्मविश्वास और आत्मसम्मान जगाया। समाज में फैले पाखंड, छुआछूत और कुरीतियों को खत्म करने का साहस उन्होंने ही दिखाया और पूरे समाज से आह्वान किया- “वेदों की ओर लौटो!”

प्रधानमंत्री मोदी ने स्वतंत्रता संग्राम में आर्य समाज की भूमिका का भी विशेष रूप से जिक्र किया। उन्होंने कहा कि लाला लाजपत राय, रामप्रसाद बिस्मिल जैसे अनेक क्रांतिकारी आर्य समाज से प्रेरित होकर आजादी की लड़ाई में कूद पड़े थे। लेकिन राजनीतिक कारणों से इतिहास में आर्य समाज के योगदान को वह सम्मान नहीं मिला, जिसके समाज का अधिकार था। उन्होंने आर्य समाज को एक ऐसी संस्था बताया जो हमेशा भारतीयता और राष्ट्रभक्ति के पक्ष में डटकर खड़ी रही।

प्रधानमंत्री ने कहा कि आर्य समाज ने नारी शिक्षा के क्षेत्र में सबसे बड़ा योगदान दिया। जब समाज में महिलाओं को घर तक सीमित माना जाता था, तब आर्य समाज ने लड़कियों के लिए स्कूल और महाविद्यालय खोले। इसी परंपरा का परिणाम है कि आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा महिला STEM ग्रेजुएट्स वाला देश बन चुका है, और महिलाएं विज्ञान, रक्षा, अंतरिक्ष और कृषि के क्षेत्र में नेतृत्व कर रही हैं। उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और राफेल उड़ाने वाली स्क्वाड्रन लीडर शिवांगी सिंह का उदाहरण दिया।

प्रधानमंत्री ने गुरुकुल परंपरा को जीवित रखने के लिए आर्य समाज की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि आज जब देश राष्ट्रीय शिक्षा नीति के माध्यम से शिक्षा को मूल्यों और भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़ रहा है, तब यह वही रास्ता है जिसे आर्य समाज ने कभी छोड़ा ही नहीं था।

अपने संबोधन में उन्होंने आर्य समाज से कुछ राष्ट्रीय अभियानों को आगे बढ़ाने का अनुरोध किया। इनमें ‘वोकल फॉर लोकल’ और स्वदेशी अभियान को मजबूत करना, ‘ज्ञान भारतम् मिशन’ के तहत प्राचीन भारतीय पांडुलिपियों को संरक्षित करना, श्रीअन्न और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना, जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन और ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान को जन आंदोलन में बदलने की अपील शामिल थी।

उन्होंने कहा कि आर्य समाज का ध्येयवाक्य “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” आज भारत की वैश्विक भूमिका का मार्ग भी बन रहा है। योग, स्वच्छ जीवनशैली और प्रकृति के साथ संतुलन जैसे सिद्धांत आज विश्व भर में स्वीकारे जा रहे हैं, और यह सब हमारी वैदिक जीवन पद्धति का हिस्सा है।

अंत में, प्रधानमंत्री ने कहा कि स्वामी दयानंद सरस्वती ने जो मशाल जलाई थी, उसे आर्य समाज ने 150 वर्षों से प्रज्वलित रखा हुआ है। अब हमारा दायित्व है कि राष्ट्र निर्माण के इस कार्य को और आगे बढ़ाएँ। उन्होंने सभी उपस्थित लोगों को कार्यक्रम की सफलता के लिए शुभकामनाएं दीं और कहा, “आइए, भारतीयता को और उजागर करें, राष्ट्र निर्माण को और मजबूत करें। नमस्कार।”

एक नरेंद्र(स्वामी विवेकानन्द) ने 1893 में शिकागो में भरी थी हुंकार, 2025 में दूसरे नरेंद्र(मोदी) ने हुंकार भर "सिन्दूर" को बारूद बना आतंकियों और उनके समर्थकों को दिया करारा जवाब


प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज, गुरुवार 22 मई को राजस्थान में बीकानेर के पालना में एक विशाल जनसभा को संबोधित किया। यह मात्र एक सम्बोधन नहीं बल्कि सिन्दूर और सनातन विरोधियों को उसी भाषा में जवाब दिया। पीछे इतिहास में जाने पर जब स्वामी विवेकानन्द की हिन्दुत्व विषय को लेकर शिकागो में भरी हुंकार को याद करवा दिया। स्वामी विवेकानन्द की हुंकार से समस्त विश्व भयभीत हो गया था। यही कारण है कि सनातन विरोधियों ने स्वामी के चरित्र को तुष्टिकरण ने दबा दिया। गाज़ियों(मुग़ल) के नक़्शे कदम पर चलने वालों को क्या मालूम कि एक भारतीय नारी के जीवन में सिन्दूर का क्या महत्व है। 

गाज़ियों से लेकर 2014 चुनावों से पहले तक जिस तरह सनातन विरोधी सिन्दूर को सिर्फ एक श्रृंगार मानते थे लेकिन इसका महत्व नहीं। उनको नहीं मालूम जब वही श्रृंगार वाला सिन्दूर बारूद बनता है तो सिन्दूर मिटाने वाले का सर्वनाश निश्चित है। प्रमाण सबके सामने है कि जिन गाज़ियों को मुग़ल बादशाह बता देश को गुमराह कर रखा था भारत को छोड़ उनके अपने देश में कोई उनका नामलेवा तक नहीं। 

ऑपरेशन सिंदूर के बाद पहली बार किसी जनसभा को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने पाकिस्तान पर जमकर निशाना साधा। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि ‘पाकिस्तान एक बात भूल गया कि अब मां भारती का सेवक मोदी यहां सीना तानकर खड़ा है। मोदी का दिमाग ठंडा है, ठंडा रहता है, लेकिन मोदी का लहू गरम होता है। अब तो मोदी की नसों में लहू नहीं, गरम सिंदूर बह रहा है। अब भारत ने दो टूक साफ कर दिया है कि हर आतंकी हमले की पाकिस्तान को भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। ये कीमत पाकिस्तान की सेना चुकाएगी, पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था चुकाएगी।’

 प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि ’22 अप्रैल को आतंकवादियों ने धर्म पूछकर हमारी बहनों की मांग का सिंदूर उजाड़ दिया था। वो गोलियां पहलगाम में चली थी, लेकिन उन गोलियों से 140 करोड़ देशवासियों के सीना छलनी हुआ था। इसके बाद हर देशवासी ने एकजुट होकर संकल्प लिया था कि आतंकवादियों को मिट्टी में मिला देंगे। उन्हें कल्पना से भी बड़ी सजा देंगे। आज आपके आशीर्वाद से, देश की सेना के शौर्य से, हम सब उस प्रण पर खरे उतरे हैं। हमारी सरकार ने तीनों सेनाओं को खुली छूट दी… तीनों सेनाओं ने मिलकर ऐसा चक्रव्यूह रचा कि पाकिस्तान को घुटने टेकने के लिए मजबूर कर दिया। 22 तारीख के हमले के जवाब में हमने 22 मिनट में आतंकियों के 9 सबसे बड़े ठिकाने तबाह कर दिए। दुनिया ने और देश के दुश्मनों ने भी देख लिया कि जब सिंदूर बारुद बन जाता है तो नतीजा क्या होता है।’

प्रधानमंत्री ने कहा कि ‘एयर स्ट्राइक के बाद मैं जब चुरू आया था, तो मैंने कहा था – “सौगंध मुझे इस मिट्टी की, मैं देश नहीं मिटने दूंगा, मैं देश नहीं झुकने दूंगा।” आज मैं राजस्थान की धरती से देशवासियों से बड़ी नम्रता से कहना चाहता हूं कि को सिंदूर मिटाने निकले थे, उन्हें मिट्टी में मिलाया है। जो हिंदुस्तान का लहू बहाते थे, आज कतरे-कतरे का हिसाब चुकाया है। जो सोच चुके थे कि भारत चुप रहेगा, आज वो घरों में दुबके पड़े हैं। जो अपने हथियारों पर घमंड करते थे, आज वो मलबे के ढेर में दबे हुए हैं।’

बीकानेर की जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि ‘ये शोध-प्रतिशोध का खेल नहीं, ये न्याय का नया स्वरूप है। ये न्याय का नया स्वरूप है, ये ऑपरेशन सिंदूर है। ये सिर्फ अक्रोश नहीं है, ये समग्र भारत के रौद्र रूप है, ये भारत का नया स्वरूप है। पहले घर में घुसकर किया था वार, अब सीधा सीने पर किया प्रहार है।’

प्रधानमंत्री मोदी ने जोर देकर कहा कि ‘पाकिस्तान ने अगर आतंकियों को एक्सपोर्ट करना जारी रखा… तो उसको पाई-पाई के लिए मोहताज होना होगा। पाकिस्तान को भारत के हक का पानी नहीं मिलेगा। भारतीयों के खून से खेलना, पाकिस्तान को अब महंगा पड़ेगा। ये भारत का संकल्प है और दुनिया की कोई ताकत हमें इस संकल्प से डिगा नहीं सकती हैं।’

प्रधानमंत्री ने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर ने आतंकवाद से निपटने के तीन सूत्र तय कर दिए हैं। पहला भारत पर आतंकी हमला हुआ तो करारा जवाब मिलेगा। समय हमारी सेनाएं तय करेंगी, तरीका भी हमारी सेनाएं तय करेंगी और शर्तें भी हमारी होंगी। दूसरा एटम बम की गीदड़ भभकियों से भारत डरने वाला नहीं है। तीसरा हम आतंक के आकाओं और आतंक की सरपरस्त सरकार को अलग-अलग नहीं देखेंगे। उन्हें एक ही मानेंगे। पाकिस्तान का ये स्टेट और नॉन-स्टेट एक्टर वाला खेल अब नहीं चलेगा।’

पवित्र नाग वासुकी मंदिर प्रयागराज में चमत्कार देखकर औरंगजेब भी हो गया था बेहोश

सुश्री रंजना सिंह 
पुराणों में पवित्र नाग वासुकी मंदिर का नाम भी पाया जाता है जैसा कि मत्स्य पुराण में उल्लेख किया गया है, कहा जाता है कि मंदिर प्रतिष्ठान से वासुकी तालाब तक और आगे उस क्षेत्र में है जो नागों का निवास माना जाता है नाग वासुकी मंदिर, प्रयागराज के दारागंज क्षेत्र में पवित्र गंगा नदी के तट पर स्थित है..!!

कैसे प्रयाग आये नाग वासुकी

पद्म पुराण के पाताल खंड व श्रीमद्भागवत में नाग वासुकी व इस मंदिर का विस्तृत उल्लेख मिलता है। कथा के अनुसार, समुद्र मंथन में देवताओं व असुरों ने नागवासुकी को सुमेरु पर्वत में लपेटकर उनका प्रयोग रस्सा के तौर पर किया था। मंथन के चलते नागवासुकी के शरीर में काफी रगड़ हुई थी और जब मंथन समाप्त हुआ तो उनके शरीर में जलन होने लगी। जलन को दूर करने के लिए वासुकी मंद्राचल पर्वत चले गए, लेकिन उनके शरीर की जलन खत्म नहीं हुई। तब नाग वासुकी ने भगवान विष्णु से अपनी पीड़ा के बारे में बताया और जलन खत्म करने का उपाय पूछा। भगवान विष्णु ने नागवासुकी को बताया कि वह प्रयाग चले जाएं वहां सरस्वती नदी का अमृत जल का पान करें और वही विश्राम करें, इससे उनकी सारी पीड़ा है खत्म हो जाएगी।

कैसा है स्वरूप

मंदिर के गर्भगृह में नाग-नागिन की स्पर्शधारी प्रतिमा है, जिसे नागवासुकी के रूप में पूजा जाता है। मान्यता है कि परमपिता ब्रह्मा के मानसपुत्रों ने नागवासुकी को मूर्ति के रूप में यहां स्थापित किया हैं। यहां मौजूद पत्थर 10 वीं सदी से भी प्राचीन बताये जाते हैं। मंदिर परिसर मे गणेश व पार्वती, भीष्म पितामह की शर-शय्या पर लेट हुई प्रतिमा व भगवान शिव की भी मूर्ति स्थापित है।

इस मंदिर में नागों के राजा वासुकी नाग विराजमान हैं। इस मंदिर की महिमा का बखान सिर्फ इस बात से लगाया जा सकता है कि प्रयागराज आने वाले हर श्रद्धालु और तीर्थयात्री की यात्रा तब तक पूरी नहीं होती जब तक की वह नागवासुकी का दर्शन न कर ले।

जब औरंगजेब भी बेहोश हो गया था

मुगलकाल में जब हिंदू धर्म स्थलों को पूरी तरह से तहस-नहस किया जा रहा था। उस समय नागवासुकी मंदिर को भी तोड़ने का प्रयास किया गया था। लेकिन, जब इसमें मुगल सैनिक सफल नहीं हुए और इसकी ख्याति मुगल शासक औरंगजेब तक पहुंची। तो वह खुद प्रयाग आया और उसने नागवासुकी मंदिर तोड़ने के लिए चढ़ाई कर दी। मंदिर के पुजारी बताते हैं कि औरंगजेब गंगा तट की ओर से मंदिर में पहुंचा और अपनी तलवार निकालकर जैसे ही नागवासुकी की मूर्ति पर वार किया, अचानक नागवासुकी का दिव्य स्वरूप प्रकट हो गया। उनके विकराल और भयंकर स्वरूप को देखकर औरंगजेब कांपने लगा और डर कर बेहोश हो गया।

नागवासुकि मंदिर में शेषनाग और वासुकीनाग की मूर्तियां हैं। यह मंदिर अनोखा है क्योंकि यहां के देवता नाग वासुकी हैं और इनकी पत्थर की मूर्ति मंदिर के बीच में स्थित है। नागवासुकी मंदिर की काफी पौराणिक मान्यताएं भी है। इस मंदिर के बारे में ऐसी पौराणिक मान्यता है कि यहां आकर पूजा करने से काल सर्प दोष हमेशा के लिए खत्म हो जाते है। गंगा तट पर स्थित प्राचीन नागवासुकी मंदिर सदियों से आस्था का केंद्र रहा है। श्रावण मास में तो शिवालयों की तरह नागवासुकी मंदिर में रुद्राभिषेक, महाभिषेक व काल सर्पदोष की शांति का अनुष्ठान चलता है

महाकाल आपकी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करें,

जय महाकाल

हिन्दू संस्कृति : पति की दीर्घायु हेतु वट वृक्ष की पूजा

वट सावित्री व्रत का पूजन 19जून को विधि-विधान से होगा। इस दिन सुहागिनें 16 श्रृंगार करके बरगद के पेड़ की पूजा कर फेरें लगाती हैं ताकि उनके पति दीर्घायु हों । प्यार, श्रद्धा और समर्पण का यह भाव इस देश में सच्चे और पवित्र प्रेम की कहानी कहता है। ये तो छद्दम धर्म-निरपेक्षों दूसरे अर्थों में कहा जाये तो "वर्तमान के जयचंद" का बस चला नहीं, वरना ये सनातन विरोधी करवाचौथ की तरह इस त्यौहार पर भी कीजड़ फेंकने से बाज़ नहीं आते। आज आधुनिकता के नाम पर सनातनी परम्परा को छोड़ पश्चिमी सभ्यता के त्यौहार जैसे Mothers' Day, Fathers' Day, Sisters' Day, Brothers'Day आदि मनाने में खुश होते हैं, जबकि हमारे सनातनी में एक से बढ़कर एक ऐसे त्यौहार हैं, जिनमें माता-पिता, भाई-बहन, मित्रता आदि का भाव देखने को मिलता है, जिसकी विश्व में कहीं कोई तुलना नहीं। खैर, अब कल 19 जून को सुहागिन महिलाओं द्वारा मंगलकारी त्यौहार पर विचार करते हैं। जिसकी महानता करवाचौथ से काम नहीं। यह वह व्रत है, जो हमें शिक्षा देता है कि कैसे एक सुहागिन सावित्री यमराज देवता को उसका सुहाग वापस करने के लिए विवश कर देती है। इसलिए महान है वट वृक्ष पूजा का त्यौहार।  
सनातन धर्म के धार्मिक ग्रंथों में कई ऐसे व्रत त्योहारों का उल्लेख मिलता है जिन्हें करना सौभाग्य माना जाता है. इन्हीं में से एक है वट सावित्री व्रत। इस व्रत का हिंदू धर्म में विशेष महत्व है इस व्रत में सुहागिन महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र की कामना करते हुए बरगद के वृक्ष की पूजा करती हैं पूजा के दौरान बरगद के पेड़ में कच्चा सूत लपेटने की परंपरा भी है धार्मिक मान्यताओं के अनुसार प्रलय के अंत में भगवान कृष्ण भी वट वृक्ष के पत्ते पर प्रकट हुए थे इसके अलावा इस दिन शनि जयंती और ज्येष्ठ अमावस्या भी पड़ रही है इस वर्ष वट सावित्री व्रत पर ग्रहों की स्थिति बेहद खास होने वाली है इस दिन शनिदेव अपनी स्वयं की राशि कुंभ में विराजमान होंगे. जिससे शश योग का निर्माण होगा ऐसे में इस दिन शनि देव की पूजा करने से शुभ फलों की प्राप्ति की जा सकती है

वट वृक्ष बरगद को जल चढ़ाना केवल एक प्रथा नहीं बल्कि सुख शांति तरक्की का माध्यम है। प्रश्न यह भी होता है कि वट वृक्ष बरगद ही क्यों? सनातन धर्म में अन्य दूसरे वृक्षों में पीपल और
वट वृक्ष बरगद को सबसे पवित्र एवं दीर्घ आयु वाले वृक्ष हैं। इन दोनों ही वृक्षों में परमपिता विष्णु का वास होता है। इसी कारण वट वृक्ष बरगद को ही पूजा जाता है। इन वृक्षों की महानता का वर्णन वेद और पुराणों में भी किया गया है।
ऐसी मान्यता है कि इसी दिन देवी सावित्री ने यमराज के फंदे से अपने पति सत्यवान के प्राणों की रक्षा की थी। सनातन परंपरा में वट सावित्री पूजा स्त्रियों का महत्वपूर्ण पर्व है, जिसे करने से हमेशा अखंड सौभाग्यवती रहने का आशीष प्राप्त होता है।
कथाओं में उल्लेख है कि जब यमराज सत्यवान के प्राण लेकर जाने लगे तब सावित्री भी यमराज के पीछे-पीछे चलने लगी। यमराज ने सावित्री को ऐसा करने से रोकने के लिए तीन वरदान दिये। एक वरदान में सावित्री ने मांगा कि वह सौ पुत्रों की माता बने। यमराज ने ऐसा ही होगा कह दिया। इसके बाद सावित्री ने यमराज से कहा कि मैं पतिव्रता स्त्री हूं और बिना पति के संतान कैसे संभव है।
सावित्री की बात सुनकर यमराज को अपनी भूल समझ में आ गयी कि,वह गलती से सत्यवान के प्राण वापस करने का वरदान दे चुके हैं।
जब सावित्री पति के प्राण को यमराज के फंदे से छुड़ाने के लिए यमराज के पीछे जा रही थी उस समय वट वृक्ष ने सत्यवान के शव की देख-रेख की थी। पति के प्राण लेकर वापस लौटने पर सावित्री ने वट वृक्ष का आभार व्यक्त करने के लिए उसकी परिक्रमा की इसलिए वट सावित्री व्रत में वृक्ष की परिक्रमा का भी नियम है।
सुहागन स्त्रियां वट सावित्री व्रत के दिन सोलह श्रृंगार करके सिंदूर, रोली, फूल, अक्षत, चना, आम फल और मिठाई से वट वृक्ष की पूजा कर सावित्री, सत्यवान और यमराज की कथा श्रवण कर पूजा करें। ब्राह्मण देव को दक्षिणा आदि सामग्री दान करें।
वट वृक्ष की जड़ को दूध और जल से सींचें। इसके बाद कच्चे सूत को हल्दी में रंगकर वट वृक्ष में लपेटते हुए कम से कम तीन बार, 5 बार, 8 बार, 11 बार, 21 बार, 51, 108 जितनी परिक्रमा कर सके करें। पूजा के बाद वटवृक्ष से सावित्री और यमराज से पति की लंबी आयु एवं संतान हेतु प्रार्थना करें।
बरगद की पूजा
ज्येष्ठ कृष्ण अमावस्या तिथि के दिन वटवृक्ष की पूजा का विधान है। शास्त्रों में कहा गया है कि इस दिन
वटवृक्ष की पूजा से सौभाग्य एवं स्थायी धन और
सुख-शांति की प्राप्ति होती है।
बरगद के पेड़ को वट का वृक्ष कहा जाता है।
पुराणों में यह स्पष्ट लिखा गया है कि वटवृक्ष की
जड़ों में ब्रह्माजी, तने में विष्णुजी और डालियों
एवं पत्तों में शिव का वास है। इसके नीचे बैठकर
पूजन, व्रत कथा कहने और सुनने से मनोकामना पूरी होती है।
हिन्दू धर्मानुसार 5 वटवृक्षों का महत्व अधिक
अक्षयवट, पंचवट, वंशीवट, गयावट और सिद्धवट
इनकी प्राचीनता के बारे में कोई नहीं जानता। संसार में उक्त 5 वटों को पवित्र वट की श्रेणी में रखा गया है।
प्रयाग में अक्षयवट,
नासिक में पंचवट,
वृंदावन में वंशीवट,
गया में गयावट
और
उज्जैन में पवित्र सिद्धवट है।
जहाँ प्रत्येक चौदस अमावस्या के पहले वाली तिथि को पित्रो को दूध अर्पित किया जाता है।
मानस से-
तहं पुनि संभु समुझिपन आसन।
बैठे वटतर, करि कमलासन।।
भावार्थ- अर्थात कई सगुण साधकों, ऋषियों यहां तक
कि देवताओं ने भी वटवृक्ष में भगवान विष्णु की उपस्थिति के दर्शन किए हैं।

वट और पीपल के वृक्ष पहले बहुत लगाये जाते थे, ये धर्म से जुड़ा हुआ वृक्ष है, लेकिन आज वर्तमान के लिए यह वृक्ष अति आवश्यक है। क्या आप जानते हैं कि वर्तमान में पड़ रहे सूखे, अत्यधिक गर्मी और प्रदूषण की वजह क्या है?
आज प्रदूषण के नाम पर जनता को गुमराह किया जा रहा है। वास्तव में बरगद और पीपल के वृक्षों की कमी होना।
विकास के नाम पर इस प्रकार के बड़े पेड़ों को काटना, इनके नए पेड़ नहीं लगाना, इन पेड़ों के संरक्षण, संवर्धन में कमी।।
आप को लगेगा अजीब बकवास है किन्तु यही अटल सत्य है.. .।
पीपल, बरगद और नीम के पेडों को सरकारी स्तर पर लगाना बन्द कर दिया गया है।
पीपल कार्बन डाई ऑक्साइड को 100% सोख लेता है, बरगद़ 80% और नीम 75 %
हमने इन पेड़ों से दूरी बना लिया तथा इसके बदले यूकेलिप्टस को लगाना शुरू कर दिया जो जमीन को जल विहीन कर देता है।
अब जब वायुमण्डल में रिफ्रेशर ही नही रहेगा तो गर्मी तो बढ़ेगी ही और जब गर्मी बढ़ेगी तो जल भाप बनकर उड़ेगा ही ।
हर 500 मीटर की दूरी पर एक बरगद का, पीपल का पेड़ लगाये तो आने वाले कुछ साल भर बाद प्रदूषण मुक्त हिन्दुस्तान होगा।
वैसे आपको एक और जानकारी दे दी जाए, बरगद और पीपल के पत्ते का फलक अधिक और डंठल पतला होता है जिसकी वजह से शांत मौसम में भी पत्ते हिलते रहते हैं और स्वच्छ ऑक्सीजन देते रहते हैं। वैसे भी बरगद और पीपल को वृक्षों का राजा कहते है।
इसकी वंदना में एक श्लोक देखिए-
मूलम् ब्रह्मा, त्वचा विष्णु,सखा शंकरमेवच।
पत्रे-पत्रेका सर्वदेवानाम,वृक्षराज नमस्तुते।
भावार्थ तो समझ ही गए होंगे।
अब करने योग्य कार्य
इन जीवनदायी पेड़ों को ज्यादा से ज्यादा लगायें तथा यूकेलिप्टस पर बैन लगाया जाये इसके साथ नीम और आम के पौधे भी लगाएं । हर शहरों में ऐसा नियम बनाया जाये की हर घर के आसपास पेड़ जरूर लगाना है, जैसे वाटर हार्वेस्टिंग को जरूरी नियम बनाया गया है वैसे ही हर घर में वृक्ष का नियम भी होना चाहिए।
जिसके घर में ये बड़े पेड़ लगाने की जग़ह न हो वह तुलसी जी का पौधा जरूर लगाये*