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नेहरू ने किया कबाड़ा, पर सनातन का उपहास उड़ाने के लिए गढ़ दिया ‘हिन्दू रेट ऑफ ग्रोथ’

मोदी और नेहरू ( फोटो साभार-toi)
प्रधानमंत्री मोदी ने ‘हिन्दू रेट ऑफ ग्रोथ’ शब्दावली का इस्तेमाल कर गुलाम मानसिकता का परिचय देने वाले लोगों की क्लास लगाई है। हिन्दू सभ्यता और संस्कृति को कमतर दिखाने वाले लोगों ने इस शब्दावली का इस्तेमाल तब किया था, जब देश गरीबी की गर्त में था और 2-3 फीसदी ग्रोथ रेट पाने के लिए भी लालायित था।

1950 से तीन दशक का वह दौर, जब भारत में नेहरू जी के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस की सरकार थी और फिर उनकी बेटी इंदिरा ने देश की कमान लंबे अर्से तक संभाली। अर्थव्यवस्था के लिए इस्तेमाल होने वाले ग्रोथ रेट को हिन्दू सभ्यता और संस्कृति से जोड़ना दरअसल गुलामी मानसिकता को दर्शाता है। ऐसे लोगों को अब देश की प्रगति नहीं दिखती।

दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था की ग्रोथ रेट को अब ‘हिन्दू रेट ऑफ ग्रोथ’ नहीं कहते, बल्कि इन्हें हर बात पर सांप्रदायिकता दिखने लगी है। यानी देश तरक्की करे तो सरकार का हर काम ‘सांप्रदायिक’ हो गया और जब देश बदहाल था, तो इसके लिए हिन्दू सभ्यता और संस्कृति दोषी था।

पीएम ने साफ कहा है कि भारत की अर्थव्यवस्था को ‘हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ’ तब कहा गया जब भारत 2-3% की ग्रोथ के लिए तरस गया था। आज जब देश की अर्थव्यवस्था दुनिया में सबसे तेज गति से बढ़ रही है, लेकिन आज कोई इसे ‘हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ’ नहीं कहता है।

उन्होंने कहा कि किसी देश की इकोनॉमी ग्रोथ को वहाँ रहने वाले बहुसंख्यक लोगों की आस्था से जोड़ना गुलामी की मानसिकता का परिचायक था, क्योंकि इसके माध्यम से पूरे समाज को गरीब दिखाने की कोशिश की गई।

उन्होंने पूछा , “भारत आज दुनिया की सबसे तेज़ी से आगे बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था है…लेकिन क्या आज कोई इसे हिंदू रेट ऑफ़ ग्रोथ कहता है क्या?” उन्होंने कहा कि हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ’ शब्द का इस्तेमाल कर पूरे समाज और पूरी परंपरा को गरीबी का पर्याय बना दिया गया। ये साबित करने का प्रयास किया गया कि भारत की धीमी विकास दर का कारण हमारी हिंदू सभ्यता और हिंदू संस्कृति है। आज जो बुद्धिजीवी हर बात में सांप्रदायिकता ढूंढते हैं, उन्हें ‘हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ’ में ये नहीं दिखा?

पीएम मोदी ने आर्थिक विकास के ताजा आंकड़ों का जिक्र करते हुए कहा कि भारत दुनिया की सबसे तेज गति से आगे बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बन गया है। हाल ही जारी आंकड़ों के मुताबिक, मौजूदा वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में भारत की विकास दर 8.2 फीसदी रही है। ये काफी उत्साहित करने वाली है, जो चीन से भी ज्यादा है।

पीएम की भावना को बल देते हुए मशहूर वकील महेश जेठमलानी ने कहा कि दशकों से इस्तेमाल किया गया ‘हिन्दू ग्रोथ रेट’ दरअसल औपनिवेशक भारत का मजाक उड़ाने और भारतीय सभ्यता और संस्कृति को नीचा दिखाने के लिए किया गया। दरअसल सरकार की नीति की कमियों को सांस्कृतिक कमी के तौर पर पेश किया गया।

भारतीय संस्कृति का अपमान- महेश जेठमलानी

जेठमलानी ने एक्स पर ट्वीट किया, “प्रधानमंत्री मोदी ने दशकों पुराने तथाकथित ‘हिंदू विकास दर’ के कलंक को वही बताया जो यह हमेशा से था…। यह अर्थशास्त्र में लिपटा एक अपमान था, एक कहानी जो भारतीयों को यह विश्वास दिलाने के लिए डिज़ाइन की गई थी कि ठहराव हमारी नियति है…। पिछले 11 वर्षों ने हमने दिखाया है कि हम कैसे भारतीय खराब नीति और उधार के निराशावाद दौर से मुक्त हुए हैं और वैश्विक औसत से ज्यादा तेज गति से आगे बढ़ रहे हैं। यह हमारा स्वाभाविक रास्ता है।”

‘हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ’ क्या है?

भारत का 6000+ साल का शानदार सभ्यता का इतिहास रहा है और इस लंबे समय के दौरान, भारत गर्व से ग्लोबल इकॉनमी में सबसे ऊपर रहा है। इस बात को अमेरिकी इतिहासकार विल डुरंट की किताब ‘द केस फॉर इंडिया’ में बहुत अच्छे से दिखाया गया है।

सत्रहवीं सदी तक, भारत की GDP दुनिया की GDP की एक-तिहाई थी। इस्लामी हमलावरों की 800 साल की लूट भी इस महान देश के रिसोर्स को खत्म नहीं कर पाई। अंग्रेजों के आने के बाद ही असली दौलत का नुकसान शुरू हुआ, और भारत में साल दर साल लगातार अकाल पड़ने लगे।

हिंदू रेट ऑफ़ ग्रोथ शब्द 1978 में एक तथाकथित इकोनॉमिस्ट राज कृष्ण ने 1950 से 1980 के दशक तक 3.5 परसेंट GDP ग्रोथ रेट के लिए किया था। यह सोच अपने आप में गलत है क्योंकि इस समय और उसके बाद भी इकोनॉमी में हिंदुओं का मुख्य योगदान था।

भारत में सभी धर्मों के लोग रहते हैं, इकोनॉमिक प्लानर्स ने ग्रोथ का भार हिंदुओं पर डाल दिया और इसलिए ‘हिंदू रेट ऑफ़ ग्रोथ’ शब्द बना कि उन्होंने जो कुछ भी करने का दावा किया, उसके बावजूद ग्रोथ लगभग स्थिर थी और वह भी लगभग 3.5% पर। हिंदू कोई पॉलिसी मेकर नहीं थी ऐसे में अर्थव्यवस्था की विकास को हिन्दू से जोड़ना सरासर हिन्दू धर्म और संस्कृति का उपहास उड़ाना था

आजादी के बाद कई दशकों तक कॉन्ग्रेस की सरकार की नीतियाँ देश के विकास की रफ्तार तय कर रही थी। बुनियादी सुविधाओं की कमी, तेज गति से बढ़ रही जनसंख्या और गरीबी मुख्य दिक्कतें थी, इसकी जिम्मेदारी सरकार की थी, न कि भारत की सभ्यता और संस्कृति इसके लिए जिम्मेदार थी।

इसे ‘नेहरू रेट ऑफ ग्रोथ’ कहें, ना कि ‘हिन्दू रेट ऑफ ग्रोथ’

नेहरू भारत के पहले प्रधानमंत्री थे, वे 1964 तक इस पद पर रहे। देश की आर्थिक नीति नेहरू के नेतृत्व वाली सरकार ने ही तय की थी। इसलिए शुरुआती दशकों की आर्थिक ग्रोथ को ‘नेहरू रेट ऑफ ग्रोथ’ कहना ज्यादा सही है। नेहरू राज और इंदिरा राज के सालों के आर्थिक ग्रोथ को हिन्दू संस्कृति से जोड़ना सरासर गलत है।

नेहरू समाजवादी के समर्थक थे। उसके वक्त में सरकार होटल भी चलाती थी। बिड़ला और टाटा जैसे उद्योगपतियों को बिजनेस बढ़ाने के लिए उतनी आजादी नहीं दी गई। नेहरू की इस ‘सोच’ को ही ग्रोथ की धीमी रफ्तार के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।

नेहरू की इकोनॉमिक पॉलिसी इतनी गलत थीं कि देश लगभग हमेशा खाद्यान संकट से जुझता रहा। इतना ही नहीं, उनकी छोटी सोच ने उन्हें नदी के बांधों को ‘मॉडर्न इंडिया के मंदिर’ कहने पर मजबूर किया। नेहरू की पॉलिसी को फिर उनकी बेटी इंदिरा गांधी ने आगे बढ़ाया, जिन्होंने बैंकिंग, टेक्सटाइल, कोयला, स्टील, कॉपर जैसे सेक्टर्स का राष्ट्रीयकरण कर दिया। ये पूरा कार्यकाल ही ‘हिन्दू रेट ऑफ ग्रोथ’ कहलाया।

रघुराम राजन ने 2023 में कहा ‘हिन्दू रेट ऑफ ग्रोथ’

आरबीआई के पूर्व गर्वनर रघुराम राजन ने 2023 में ‘हिन्दू रेट ऑफ ग्रोथ’ शब्दावली का इस्तेमाल किया था। उन्होंने सरकार को चेतावनी दी थी कि कमजोर निवेश, उच्च ब्याज दर और धीमी वैश्विक विकास के कारण भारत ‘हिन्दू रेट ऑफ ग्रोथ’ के करीब है।

राजन ने कहा था कि नेशनल स्टैटिस्टिकल ऑफिस (NSO) द्वारा जारी नेशनल इनकम का अनुमान चिंताजनक है। 2023 के फ़ाइनेंशियल ईयर की तीसरी तिमाही (अक्टूबर-दिसंबर) में ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट (GDP) दूसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर) के 6.3% से घटकर 4.4% हो गई थी। पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में यह 13.2% थी।

उन्होंने कहा था कि भारत को कोविड से हुई आर्थिक मंदी से उबरने में कई साल लगेंगे, लेकिन भारत एक साल में ही अपनी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में कामयाब रहा। उन्होंने कभी माफ़ी नहीं माँगी।

उन्होंने आर्थिक विकास में मंदी के लिए ‘हिंदू ग्रोथ रेट’ शब्द का इस्तेमाल किया है। रघुराम राजन 2013 से 2016 तक RBI के गवर्नर थे। यह समय स्थिर फॉरेक्स रिज़र्व और कई दूसरे विवादों से भरा रहा। उनके पद से हटाए जाने के बाद, RBI का फॉरेक्स रिजर्व बढ़कर 600 बिलियन+ के ऑल-टाइम हाई पर पहुँच गया। राजन पिछले 5 सालों से लगातार भारत के लिए ‘गंभीर आर्थिक संकट’ की भविष्यवाणी करते हैं और मुँह की खाते हैं।

फिर भी ऐसे लोग भारत-विरोधी ‘हिन्दू रेट ऑफ ग्रोथ’ से चिपके हुए हैं। वे आंकड़ों का बचाव नहीं कर रहे हैं। वे एक ऐसे विश्वदृष्टि का बचाव कर रहे हैं जो एक आत्मविश्वासी, सुधारवादी, आत्मनिर्भर भारत को स्वीकार नहीं करना चाहता।

ये लोग देश की ‘आत्मा’ को नहीं जानते, अर्थव्यवस्था के विकास को गाँव के रास्ते पर बढ़ते नहीं पहचान पाते और सरकार की आलोचना विदेशी मापदंडों के आधार पर करते हैं। आज भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ रहा है।

दुनिया की चौथी अर्थव्यवस्था 2023 तक तीसरी अर्थव्यवस्था बनने की राह पर है। ये न सिर्फ खुद बढ़ रहा है, बल्कि वैश्विक गति को भी आगे बढ़ा रहा है। दुनिया में भारत का महत्व दिन प्रति दिन बढ़ता जा रहा है। सरकार की नीति, उद्यमशीलता और सुधार लगातार देश को ऊँचाई दे रहे हैं। ये झूठा प्रचार नहीं बल्कि वह सच्चाई है, जिसे पूरी दुनिया मान रही है।

विदेशी मेहमान के आने पर देशद्रोही औकात दिखाने लगते हैं; मोदी सरकार को हिटलर बन इन सफ़ेदपोशियों पर हंटर चलाना होगा; Indigo का लाइसेंस रद्द हो #Boycott Indigo

                                                        इंडिगो और डीजीसीए (फोटो साभार - AI)
2014 में जब से भारत में मोदी सरकार सत्ता में आयी है किसी भी विदेशी मेहमान के आने पर #Toolkit के बिकाऊ देशद्रोही हरकत में आ जाते हैं। CAA विरोध से लेकर अब एयरलाइन्स द्वारा हुए उपद्रव प्रत्यक्ष प्रमाण है। विदेशी मेहमान के भारत आने पर 
#Toolkit के बिकाऊ देशद्रोही कोई नया मुद्दा लेकर देश का माहौल ख़राब करते हैं। इतना ही नहीं कुछ समय पहले कुछ विदेशी हमारी संसद प्रणाली देखने आये तो संसद में बैठे सफेदपोशी गुंडों ने संसद में कितना हंगामा किया था। और अब जॉर्जिया के कुछ मेहमान आये तो उनके सामने इन सफेदपोशी गुंडों ने हंगामा कर देश को कलंकित करने की कोशिश की।  Indigo पर सख्त कार्यवाही करनी होगी। इसको प्रतिबंधित करना होगा। जनता को भी Indigo एयरलाइन का बहिष्कार करना होगा। जिस समस्या पर  रूस के राष्ट्रपति पुतिन के आने पर उपद्रव किया क्या वह पुतिन के जाने के बाद नहीं किया जा सकता था? आखिर इन  #Toolkit के बिकाऊ देशद्रोहियों पर मोदी सरकार हिटलर बन कब हंटर चलाएगी? इन उपद्रवियों पर मोदी सरकार को हंटर चलाना होगा। सरकार को इन उपद्रवियों उग्र होना पड़ेगा। जो किसी विदेशी मेहमान के भारत में आने पर उपद्रवियों द्वारा उपद्रव करने से पहले हज़ार बार सोंचे। 

    

भारत की सबसे बड़ी कम लागत वाली एयरलाइन ‘इंडिगो’ पिछले चार दिनों से उड़ान संकट से जूझ रही है। शुक्रवार (5 दिसंबर 2025) को देशभर के कई प्रमुख हवाई अड्डों पर इंडिगो की उड़ानें रद्द होने की घटनाओं ने यात्री और अधिकारी दोनों को हैरान कर दिया।

दिल्ली के इंदिरा गाँधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से सभी घरेलू उड़ानों को आधी रात तक रद्द कर दिया गया, जबकि बेंगलुरु के केम्पेगौड़ा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से कम से कम 102 उड़ानें रद्द हुईं। यह स्थिति उस दिन आई, जब इंडिगो ने नागरिक उड्डयन महानिदेशालय (DGCA) को बताया कि 8 दिसंबर 2025 से उड़ानों को सीमित किया जाएगा ताकि उड़ान हो रही रुकावट को कम किया जा सके।

एयरलाइन ने चेतावनी दी कि अगले दो-तीन दिनों तक विलंब और रद्द होने वाली उड़ानों की स्थिति बनी रहेगी। हालाँकि, एयरलाइन ने यह भी कहा कि फरवरी 10, 2026 तक संचालन पूरी तरह से स्थिर होने की उम्मीद है। इस दौरान, इंडिगो ने नई फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन (FDTL) नियमों के तहत रात की उड़ानों में कमी के नियमों से छूट माँगी है। उसने कहा है कि अभी और फ्लाइट्स कैंसिल होंगी और सबकुछ सही होने में करीब 10 दिन का समय लग जाएगा।

वहीं, DGCA ने कहा है कि वो इस छूट पर विचार करेगी, लेकिन इसके लिए एयरलाइन को विस्तृत रोडमैप प्रस्तुत करना होगा। उसमें पायलट और क्रू की भर्ती, प्रशिक्षण, रोस्टर पुनर्गठन और सुरक्षा योजनाओं का विवरण होगा।

केंद्र सरकार ने इंडिगो की लगातार उड़ान रद्द होने की स्थिति में DGCA के नए FDTL नियमों को तुरंत रोक दिया है और मामले में उच्च-स्तरीय जाँच के आदेश दिए हैं। जाँच यह पता लगाएगी कि इंडिगो ने नए नियमों की तैयारी क्यों नहीं की और इतनी बड़ी अव्यवस्था कैसे हुई। मंत्रालय ने निर्देश दिए हैं कि उड़ान सेवाएँ जल्द सामान्य हों और जहाँ भी लापरवाही मिले, कार्रवाई की जाएगी।

घटना के बाद सरकार की प्रतिक्रिया

 देश भर में इंडिगो की बड़ी संख्या में उड़ानें रद्द होने और शेड्यूल बिगड़ने के बाद केंद्र सरकार ने बड़ा कदम उठाया है। नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने DGCA द्वारा लागू किए गए नए फ्लाइट ड्यूटी टाइम लिमिटेशन (FDTL) नियमों को तुरंत प्रभाव से रोक दिया है। मंत्रालय का कहना है कि यह फैसला यात्रियों की सुविधा को देखते हुए लिया गया है, ताकि समय पर यात्रा पर निर्भर बुजुर्गों, छात्रों और मरीजों को राहत मिल सके।

सरकार ने साफ कहा है कि FDTL आदेशों को रोका गया है, लेकिन सुरक्षा से जुड़ी किसी भी बात पर कोई समझौता नहीं किया गया है। मंत्रालय ने एयरलाइंस को निर्देश दिए हैं कि वे तुरंत ऐसे कदम उठाएँ, जिससे उड़ानें जल्द से जल्द सामान्य हो सकें और यात्रियों को काम से काम परेशानी हो।

इसी के साथ, इंडिगो में हुई भारी अव्यवस्था पर सरकार ने उच्च-स्तरीय जाँच के आदेश भी जारी कर दिए हैं। जाँच में यह पता लगाया जाएगा की आखिर इतनी बड़ी संख्या में फ्लाइट कैंसिल क्यों हुईं और इंडिगो ने DGCA के नए नियम लागू होने के बावजूद पर्याप्त तैयारी क्यों नहीं की। आरोप है कि जहाँ बाकी एयरलाइंस ने समय रहते नए क्रू और पायलटों की भर्ती की, वहीं इंडिगो ने भर्ती के बिना अपने ऑपरेशन लगातार बढ़ाए, जिसके कारण यात्रियों को भारी दिक्कतें झेलनी पड़ीं।

जाँच में इंडिगो के आंतरिक प्लानिंग, स्टाफ मैनेजमेंट और DGCA के नियमों को लागू करने की तैयारी की डीटेल से समीक्षा की जाएगी। सरकार ने कहा है कि जहाँ भी लापरवाही या जिम्मेदारी तय होगी, कार्रवाई की जाएगी, ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति दोबारा न पैदा हो।

मंत्रालय ने 24×7 कंट्रोल रूम भी बनाया है, ताकि स्थिति पर लगातार नजर रखी जा सके और यात्रियों की शिकायतों का तुरंत समाधान किया जा सके। सरकार ने उम्मीद जताई है कि अगले एक-दो दिनों में उड़ानें सामान्य होने लगेंगी और तीन दिनों के भीतर स्थिति पूरी तरह ठीक कर दी जाएगी।

क्या है समस्या का कारण ?

इस समस्या के पीछे मुख्य कारण DGCA के नए FDTL नियम हैं, जो पायलटों और उड़ान कर्मचारियों के लिए अधिक आराम करने और थकान को कम करने के उद्देश्य से बनाए गए हैं।

इन नियमों के तहत सात दिनों में पायलटों को 36 से 48 घंटे का आराम देना होगा, जिसके कारण लगातार काम करने वाले घंटे कम किए गए हैं। जुलाई और नवंबर 2025 में दो चरणों में लागू हुए इन नियमों के कारण इंडिगो ने अपनी उड़ान योजनाओं का सही अंदाज नहीं लगा सके।

एयरलाइन ने मान लिया कि उनके पास पर्याप्त पायलट और क्रू नहीं हैं, क्योंकि जिन पायलटों को पहले रोस्टर में ऑन ड्यूटी दिखाया गया था, उन्हें अब उड़ान भरने की अनुमति नहीं थी। इंडिगो सामान्य परिस्थितियों में हर दिन 2,200 से अधिक घरेलू और अंतरराष्ट्रीय उड़ानें संचालित करती है, जिनमें कई रात की उड़ानें शामिल हैं।

एयरलाइन ने यह भी माना कि FDTL नियमों के दूसरे चरण को लागू करते समय उनकी प्लानिंग और गिनती में गलती हो गई। असल में उन्हें जितने पायलट और क्रू की जरूरत थी, वह उनकी उम्मीद से ज़्यादा निकली।

अधिकारिक बयान और एयरलाइन की प्रतिक्रिया

इस पूरे परेशानी के दौरान इंडिगो ने कई बार यात्रियों और अधिकारियों से माफी माँगी है। एयरलाइन ने एक्स पर कहा कि पिछले दो दिनों में उनके नेटवर्क में काफी समस्याएँ देखने को मिला है और उन्होंने प्रभावित सभी यात्रियों से माफी माँगी।
इंडिगो के CEO पीटर एल्बर्स ने कर्मचारियों और यात्रियों से कहा कि सेवाओं और टाइम पर काम करने की व्यवस्था फिर से ठीक करना आसान नहीं होगा, लेकिन उनकी टीम सरकार और DGCA के सहयोग से स्थिति को सामान्य बनाने में पूरी मेहनत कर रही है।
एयरलाइन ने यह भी कहा कि 8 दिसंबर 2025 से उड़ानों की संख्या कम कर दी जाएगी ताकि व्यवधान कम हो सके और संचालन को स्थिर किया जा सके। DGCA ने एयरलाइन को निर्देश दिए हैं कि वह क्रू भर्ती और प्रशिक्षण, रोस्टर पुनर्गठन, सुरक्षा उपायों और तत्काल सुधारात्मक योजनाओं का विस्तृत रोडमैप प्रस्तुत करे।
इसके साथ ही एयरलाइन को हर 15 दिन में प्रगति रिपोर्ट देनी होगी। DGCA इस पूरे नेटवर्क पर कड़ी निगरानी रखेगी और यात्रियों की मदद सुनिश्चित करने के लिए एयरपोर्ट अथॉरिटीज को निर्देशित किया गया है।
DGCA (नागर विमानन महानिदेशालय) ने क्रू मेंबर्स को मिलने वाले साप्ताहिक अवकाश से जुड़ी अपनी पुरानी गाइडलाइन वापस ले ली है। यह फैसला ऐसे समय पर आया है, जब पायलट और क्रू की भारी कमी की वजह से IndiGo समेत कई एयरलाइनों के संचालन में बड़ा संकट उत्पन्न हो गया है और हजारों यात्री एयरपोर्ट पर फंसे हुए हैं।
नई अधिसूचना में DGCA ने कहा है कि मौजूदा ऑपरेशनल अव्यवस्था और एयरलाइनों से मिली शिकायतों को देखते हुए यह बदलाव किया गया है। अब पहले वाला नियम, जिसमें कहा गया था कि क्रू के साप्ताहिक आराम की जगह कोई छुट्टी नहीं लगाई जा सकती, तुरंत प्रभाव से हटा दिया गया है।
इस फैसले का मतलब यह है कि एयरलाइंस अब पायलटों और क्रू की कमी को देखते हुए शेड्यूल को थोड़ी छूट के साथ चला सकेंगी, ताकि उड़ानों का संचालन स्थिर रहे और अव्यवस्था कम हो सके। यह कदम मौजूदा संकट को संभालने के लिए तत्काल राहत देने जैसा माना जा रहा है।

जनता की प्रतिक्रिया और व्यापक असर

इसका असर यात्रियों पर सबसे अधिक हुआ है। दिल्ली में अकेले शुक्रवार (5 दिसंबर 2025) को 220 से अधिक उड़ानें रद्द हुईं, बेंगलुरु में लगभग 100 और हैदराबाद में लगभग 90 उड़ानें रद्द हुईं।

यात्रियों ने सोशल मीडिया पर अपने अनुभव साझा किए, जिसमें लम्बी प्रतीक्षा, भोजन और पानी की कमी और सही जानकारी न मिलने जैसी समस्याओं का जिक्र था। कई यात्री 12 से अधिक घंटे तक हवाई अड्डों पर फंसे रहे।

इंडिगो ने यात्रियों को सलाह दी है कि वे उड़ान की स्थिति की जाँच करें, समय से पहले हवाई अड्डे पहुँचें और आवश्यक वस्तुएँ जैसे पानी, स्नैक्स और दवाइयाँ साथ रखें। इस दौरान पायलट संघों ने कहा कि एयरलाइन की प्लानिंग ठीक नहीं थी।

उनके हिसाब से यह पूरा सँकट इसलिए हुआ क्योंकि कंपनी ने समय पर लोगों की भर्ती नहीं की और स्टाफ को संभालने की रणनीति भी ठीक नहीं थी। एयरलाइन पायलट संघों का कहना है कि FDTL नियमों की तैयारी के दो साल का समय मिला, लेकिन एयरलाइन ने इसे सही तरीके से लागू नहीं किया। हालाँकि नियम सुरक्षा बढ़ाने के लिए बनाए गए हैं, लेकिन एयरलाइन के संचालन और बड़ी संख्या में उड़ानों के कारण समस्या इतनी बढ़ गई।

वेदों की ओर लौटो: आर्य समाज केवल एक संस्था नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा को जगाने वाली चेतना है- नरेंद्र मोदी

कांग्रेस और इसकी समर्पित पार्टियों ने जितना नुकसान सनातन धर्म का किया है शायद ही किसी ने किया हो। इन पार्टियों में हिन्दू भी चुपचाप हिन्दू होते हुए सनातन का अपमान बर्दाश्त कर रहे हैं। इन सनातन विरोधियों ने उस आर्य समाज को निगलने में कोई कसर नहीं छोड़ी। ये धरती और सनातन इतने अत्याचारों के बाद भी अगर जीवित है तो वह हमारे ऋषि-मुनियों की हज़ारों वर्षों की तपस्या के आशीर्वाद से है। इन कालनेमि पिशाचों को नहीं मालूम कि आज भी एक साधु लगभग 11/12 वर्षों से तपस्या कर रहा है। ज्योति जागृति संस्थान के संस्थापक आशुतोष महाराज। जिसे ढोंगी साबित करने के लिए यूपीए कार्यकाल में क्या-क्या प्रपंच किये गए लेकिन हमेशा औंधे मुंह जमीन पर गिरे। अदालतों से जो फटकार मिली वो अलग। 

आर्य समाज ऐसे ही नहीं स्थापित किया गया आर्य समाज हिन्दुओं के धार्मिक वेदों और उपनिषदों पर आधारित और केंद्रित है। जो नेता मुस्लिम वोटबैंक के आगे घुटने टेक अपने ही धर्म को अपमानित करे क्या वह हिन्दू कहलवाने योग्य हो सकता है? इन कालनेमि पिशाचों के पास बस एक ही काम है हिन्दुओं को जातियों में बांटों। इन कालनेमि पिशाचों को नहीं मालूम कि हज़ारों वर्ष तपस्या करने के बाद ऋषि-मुनियों ने वेद और उपनिषदों की रचना की है। क्या विश्व में किसी अन्य मजहब के मानने वालों को अपने मजहब की बुराई करते देखा है लेकिन ये कालनेमि पिशाच हिन्दू धर्म में ही मिलते हैं। जबकि उन मजहबों में बहुत कमियां हैं फिर भी अपने-अपने मजहब को सम्मान देते हैं। क्या इन पिशाचों का सामाजिक बहिष्कार करने का समय निकट है?  

सनातन धर्म को सम्मान देने में स्वामी दयानन्द द्वारा स्थापित आर्य समाज की है। ये आर्य समाज ही है जिसने और गायत्री मन्त्र का महत्व समझाया। मात्र एक शब्द नहीं यह एक शब्द में हमारे समस्त देवी-देवताओं का स्मरण करवाता है और यही स्थिति गायत्री मन्त्र की है। इतना ही नहीं यह मन्त्र कितना शक्तिशाली और मानव जीवन में प्रभावी है कोई और मन्त्र नहीं। प्रतिदिन सुबह उठकर कोई दिनचर्या करने से पहले इस मन्त्र के स्मरण करने से मनुष्य के जीवन पर ऐसा प्रभाव पड़ता जिसका उसको भी मालूम होता। इस मन्त्र को हर देवी-देवता द्वारा भी स्मरण किया जाता है। जिस किसी ने गायत्री मन्त्र की निष्पाप से सिद्धि कर ली वह अपना ही नहीं समाज को भी विसंगति से बचाने में सक्षम होता है। 

यदि हिन्दू प्रतिदिन अपने घर में गायत्री मन्त्र का जाप करते हवन करता है वह केवल अपना घर ही नहीं बल्कि अपने निवास ही नहीं बल्कि आसपास का वातावरण दोषमुक्त करता है। हवन अग्नि से निकलने वाला धुआं घर के कोने-कोने से दुरात्माओं को समाप्त करता है। इस मन्त्र की महिमा से देवी-देवता भी अछूते नहीं रहे।     

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने गुरुवार, 31 अक्टूबर को नई दिल्ली के रोहिणी में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय आर्य महासम्मेलन 2025 को संबोधित करते हुए कहा कि आर्य समाज केवल एक संस्था नहीं, बल्कि राष्ट्र की आत्मा को जगाने वाली चेतना है। आर्य समाज की 150 वर्षीय यात्रा को भारत की वैदिक पहचान और राष्ट्र पुनर्निर्माण की ताकत बताते हुए कहा कि स्वामी दयानंद सरस्वती के विचार आज भी भारत के विकास पथ के मार्गदर्शक हैं। महासम्मेलन को संबोधित करते उन्होंने कहा कि जब भी मैं आपके बीच आता हूं तो एक अनोखी ऊर्जा और दिव्य प्रेरणा मिलती है। यह स्वामी दयानंद जी का आशीर्वाद है।

कार्यक्रम में गुजरात और महाराष्ट्र के राज्यपाल आचार्य देवव्रत, दिल्ली की मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता, डीएवी कॉलेज मैनेजिंग कमेटी के अध्यक्ष पूनम सूरी, आर्य समाज के वरिष्ठ संत और दुनिया भर से आए प्रतिनिधि उपस्थित थे। सेमिनार के दौरान स्वामी दयानंद की स्मृति में विशेष स्मारक सिक्के का विमोचन भी किया गया। स्वामी दयानंद सरस्वती को याद करते हुए उन्होंने कहा कि वे ऐसे युगपुरुष थे जिन्होंने गुलामी के अंधकार में डूबे भारतीय समाज में आत्मविश्वास और आत्मसम्मान जगाया। समाज में फैले पाखंड, छुआछूत और कुरीतियों को खत्म करने का साहस उन्होंने ही दिखाया और पूरे समाज से आह्वान किया- “वेदों की ओर लौटो!”

प्रधानमंत्री मोदी ने स्वतंत्रता संग्राम में आर्य समाज की भूमिका का भी विशेष रूप से जिक्र किया। उन्होंने कहा कि लाला लाजपत राय, रामप्रसाद बिस्मिल जैसे अनेक क्रांतिकारी आर्य समाज से प्रेरित होकर आजादी की लड़ाई में कूद पड़े थे। लेकिन राजनीतिक कारणों से इतिहास में आर्य समाज के योगदान को वह सम्मान नहीं मिला, जिसके समाज का अधिकार था। उन्होंने आर्य समाज को एक ऐसी संस्था बताया जो हमेशा भारतीयता और राष्ट्रभक्ति के पक्ष में डटकर खड़ी रही।

प्रधानमंत्री ने कहा कि आर्य समाज ने नारी शिक्षा के क्षेत्र में सबसे बड़ा योगदान दिया। जब समाज में महिलाओं को घर तक सीमित माना जाता था, तब आर्य समाज ने लड़कियों के लिए स्कूल और महाविद्यालय खोले। इसी परंपरा का परिणाम है कि आज भारत दुनिया का सबसे बड़ा महिला STEM ग्रेजुएट्स वाला देश बन चुका है, और महिलाएं विज्ञान, रक्षा, अंतरिक्ष और कृषि के क्षेत्र में नेतृत्व कर रही हैं। उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू और राफेल उड़ाने वाली स्क्वाड्रन लीडर शिवांगी सिंह का उदाहरण दिया।

प्रधानमंत्री ने गुरुकुल परंपरा को जीवित रखने के लिए आर्य समाज की प्रशंसा की। उन्होंने कहा कि आज जब देश राष्ट्रीय शिक्षा नीति के माध्यम से शिक्षा को मूल्यों और भारतीय ज्ञान परंपरा से जोड़ रहा है, तब यह वही रास्ता है जिसे आर्य समाज ने कभी छोड़ा ही नहीं था।

अपने संबोधन में उन्होंने आर्य समाज से कुछ राष्ट्रीय अभियानों को आगे बढ़ाने का अनुरोध किया। इनमें ‘वोकल फॉर लोकल’ और स्वदेशी अभियान को मजबूत करना, ‘ज्ञान भारतम् मिशन’ के तहत प्राचीन भारतीय पांडुलिपियों को संरक्षित करना, श्रीअन्न और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देना, जल संरक्षण, वर्षा जल संचयन और ‘एक पेड़ माँ के नाम’ अभियान को जन आंदोलन में बदलने की अपील शामिल थी।

उन्होंने कहा कि आर्य समाज का ध्येयवाक्य “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” आज भारत की वैश्विक भूमिका का मार्ग भी बन रहा है। योग, स्वच्छ जीवनशैली और प्रकृति के साथ संतुलन जैसे सिद्धांत आज विश्व भर में स्वीकारे जा रहे हैं, और यह सब हमारी वैदिक जीवन पद्धति का हिस्सा है।

अंत में, प्रधानमंत्री ने कहा कि स्वामी दयानंद सरस्वती ने जो मशाल जलाई थी, उसे आर्य समाज ने 150 वर्षों से प्रज्वलित रखा हुआ है। अब हमारा दायित्व है कि राष्ट्र निर्माण के इस कार्य को और आगे बढ़ाएँ। उन्होंने सभी उपस्थित लोगों को कार्यक्रम की सफलता के लिए शुभकामनाएं दीं और कहा, “आइए, भारतीयता को और उजागर करें, राष्ट्र निर्माण को और मजबूत करें। नमस्कार।”

मोदी और मुसद्दिक: ईरान 1951 और भारत 2024—क्या इनमें कोई समानता है? भारत को ईरान बनाने से बचाने के लिए Deep State और Toolkit की कठपुतली बने विपक्ष, आन्दोलनजीवियों और बिकाऊ मीडिया से सतर्क रहने की जरुरत है

भारत को विश्व गुरु बनाने
में व्यस्त मोदी 
ईरान के कुशल प्रशासक मुसद्दिक
1951 तक खुशहाल रहने वाला ईरान आज अपनी बर्बादी खुद देख रहा है। 
आज ईरान की जो हालत हो रही है, उसका जिम्मेदार इजराइल नहीं बल्कि ईरान के ही बिकाऊ नेता, मीडिया और जनता ही है। इतिहास सिर्फ पढ़ने के लिए नहीं बल्कि उससे शिक्षा लेने के लिए होता है। अगर इतिहास से कुछ नहीं सीखा तो चाहे व्यक्ति जितना भी विद्वान क्यों न हो किसी अनपढ़ से कम नहीं।  

आज भारत को ऐसा यशस्वी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी मिला है जो भारत को आत्मनिर्भर बना रहा है, लेकिन गुलामी मानसिकता वाले विरोध करने का कोई मौका नहीं झोड़ रहे। दुःख इस बात का है जिन मुद्दों पर विरोध करना चाहिए उन सभी पर आज तक किसी का मुंह नहीं खुलता। आज भारतवासी बताएं जिन लोगों के कारण गुलामी की बेड़ियाँ टूटी उनमे से कितनों इतिहास पढ़ाया जाता है। जो धार्मिक स्थलों को विवादित बना दे उससे उम्मीद की भी नहीं जा सकती।  

भारत जब भी गुलाम हुआ जयचन्दों और मीर ज़ाफरों द्वारा गद्दारी करने के कारण हुआ। भारत का अस्तित्व तो मिटाने में असफल रहे, लेकिन गुलाम बनाने में सफल हो गए। भारत में आज लगभग वही स्थिति Deep State और Toolkit के हाथों कठपुतली बना विपक्ष, मीडिया और आन्दोलनजीवियों द्वारा हो रही है। मुग़ल आक्रांताओं से पहले खुशहाल भारत को जयचन्दों लालच ने बदहाल कर दिया। लेकिन उनका आज कोई नामलेवा नहीं।

देखिए एक मित्र द्वारा भेजा गया लेख, मुझे नहीं मालूम कहाँ से इसे निकाला लेकिन इस लेख पर हर देशवासी को आत्ममंथन करना चाहिए:-

क्या आपने कभी सोचा है कि ईरानी लोग अमेरिका को "शैतानों की भूमि" क्यों कहते हैं?

कभी ईरान के तेल पर ब्रिटेन का वर्चस्व था। ईरान के तेल उत्पादन का 84% हिस्सा इंग्लैंड को जाता था, और केवल 16% ही ईरान को मिलता था।

1951 में, एक सच्चे देशभक्त मोहम्मद मुसद्दिक ईरान के प्रधानमंत्री बने। वे नहीं चाहते थे कि ईरान की तेल संपदा पर विदेशी कंपनियों का कब्जा रहे।

15 मार्च 1951 को मुसद्दिक ने ईरानी संसद में तेल उद्योग के राष्ट्रीयकरण का विधेयक पेश किया, जो भारी बहुमत से पारित हुआ। टाइम मैगज़ीन ने उन्हें 1951 का "मैन ऑफ द ईयर" घोषित किया!

लेकिन इस फैसले से ब्रिटेन को भारी नुकसान हुआ। उन्होंने मुसद्दिक को हटाने के कई प्रयास किए — रिश्वत, हत्या की कोशिश, सैन्य तख्तापलट — पर मुसद्दिक की दूरदर्शिता और लोकप्रियता के कारण सब विफल रहे।

जब ब्रिटेन असफल हुआ, तो उसने अमेरिका से मदद मांगी। CIA ने मुसद्दिक को हटाने के लिए 1 मिलियन डॉलर (लगभग 4,250 मिलियन रियाल) स्वीकृत किए।

योजना थी: जनता में असंतोष फैलाना, मीडिया और धार्मिक नेताओं को खरीदना, और अंततः संसद के भ्रष्ट सांसदों के माध्यम से उनकी सरकार को गिराना।

631 मिलियन रियाल पत्रकारों, संपादकों और मौलवियों को दिए गए ताकि वे मुसद्दिक के खिलाफ माहौल बना सकें।

हजारों लोगों को फर्जी प्रदर्शन के लिए भुगतान किया गया। प्रमुख वैश्विक मीडिया भी अमेरिका का समर्थन करने लगा। व्यक्तिगत कार्टूनों से शुरू हुई आलोचना, बिल्कुल वैसी ही जैसे आज भारत में मोदी के निजी जीवन पर हमले होते हैं।

मुसद्दिक को तानाशाह कहा गया। जब उन्हें अहसास हुआ कि संसद के जरिए उनकी सरकार को गिराया जाएगा, तो उन्होंने संसद भंग कर दी। अमेरिका ने ईरान के शाह पर दबाव बनाया कि वे मुसद्दिक को प्रधानमंत्री पद से हटाएं।

210 मिलियन रियाल की रिश्वत से फर्जी दंगे करवाए गए, और शाह की वापसी के बाद मुसद्दिक ने आत्मसमर्पण कर दिया। उन्हें जेल में डाला गया और फिर जीवन भर नजरबंद रखा गया।

इसके बाद ईरान के तेल का 40% अमेरिका और 40% इंग्लैंड को दे दिया गया, बाकी 20% अन्य यूरोपीय देशों को।

फिर कट्टरपंथी खुमैनी सत्ता में आए, और आम ईरानी की हालत और खराब हो गई।

मुसद्दिक का अपराध क्या था?

सिर्फ इतना कि वे चाहते थे कि विदेशी नहीं, बल्कि देश की अपनी कंपनियां तेल और अन्य संसाधनों पर नियंत्रण रखें। अगर मुसद्दिक का साथ दिया गया होता, तो 1955 से पहले ही ईरान एक संपूर्ण लोकतांत्रिक राष्ट्र बन सकता था। लेकिन पत्रकारों, संपादकों, सांसदों और प्रदर्शनकारियों ने चंद पैसों में देश का भविष्य बेच दिया।

उसी समय ईरान की जनता ने महसूस किया कि अमेरिका ने उनकी सरकार को गिराने में गहरी भूमिका निभाई थी — और तभी से अमेरिका को "शैतानों की भूमि" कहा जाने लगा।

अब सोचिए — ईरान के असली दुश्मन कौन थे?

वे थे — बिके हुए पत्रकार, संपादक, सांसद और आंदोलनकारी। अगर ये बिकते नहीं, और लोग मुसद्दिक के साथ खड़े रहते तो अमेरिका की चालें कभी सफल नहीं होतीं।

आज भारत भी एक ऐसे ही मोड़ पर खड़ा है।

यह दुर्भाग्य है कि आम जनता को षड्यंत्र तब तक समझ में नहीं आते जब तक उनके साथ अत्याचार नहीं होने लगते। नकली मुद्दे, फर्जी आंदोलन, गलत आंकड़े, जातियों को आपस में लड़वाना, अल्पसंख्यकों को भड़काना, और कम्युनिस्ट लॉबी का राष्ट्र विरोधी ताकतों को समर्थन देना ये सब एक गहरी साजिश का हिस्सा हैं, जिसका मकसद भारत को फिर से विदेशी नियंत्रण में लाना है।

अब समय है कि हम सजग बनें और बिकाऊ मीडिया के झूठे प्रचार का शिकार न बनें।

हर देशभक्त को वर्तमान नेतृत्व पर विश्वास करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मजबूती से खड़ा होना चाहिए। अन्यथा, ईरान जैसी तबाही भारत में भी हो सकती है।

आज दुनिया की कई खुफिया एजेंसियाँ भारतीय राजनेताओं को अपने एजेंट बनाने की कोशिश कर रही हैं, ताकि किसी भी तरह मोदी सरकार को हटाया जा सके।

हमारा भाग्य हमारे हाथ में है बस समय रहते समझना होगा।

"न्यूयॉर्क टाइम्स" ने मुसद्दिक को तानाशाह कहा था। आज वही "टाइम मैगज़ीन" मोदी को "डिवाइडर इन चीफ" कहती है।

क्या ये सब संयोग है? नहीं, ये एक रणनीति है। 

केजरीवाल की करीबी AAP की मुख्य राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रियंका कक्कड़ हो रही हैं ट्रोल; संदीप दीक्षित ने किया आतिशी पर 10 करोड़ रूपए का मान-हानि का मुकदमा

कहते है बकरे की माँ कब तक खैर मनाएगी। यह बात अरविन्द केजरीवाल पर पूरी तरह से लागू हो रही है। क्योकि जिसने शुरू से hit and run की नीति अपनाकर जनता को गुमराह कर सत्ता हथियाई आज वही नीति केजरीवाल और उसकी पार्टी पर टूट पड़ी है। जिस कांग्रेस की तत्कालीन मुख्यमंत्री शीला दीक्षित को जेल भेजने का लॉलीपॉप देकर कांग्रेस से सत्ता छीनी आज वही कांग्रेस उसी केजरीवाल और उसकी पार्टी को घोर संकट में डाल चुकी है। उसी बौखलाहट में हर जगह कहते फिरते हैं कि कांग्रेस बीजेपी की B Team है। 

मुख्यमंत्री आतिशी अपने सूत्रों के हवाले से कहती है कि संदीप दीक्षित बीजेपी के पैसे से चुनाव लड़ रहे हैं। अब चर्चा है कि उसी संदीप ने आतिशी पर 10 करोड़ रूपए का मान-हानि का मुकदमा दर्ज कर दिया है। सवाल यह है कि क्या आतिशी भी केजरीवाल की तरह यू टर्न लेकर माफ़ी मांगेंगी या संदीप मानहानि की रकम लेकर रहेंगे?

    
दूसरे, जब नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने है, इनके खर्चे, खाने पीने से लेकर कपड़ों और इतना ही नहीं जब मोदी की माताश्री दिल्ली आयीं थी उस तक के खर्चे की RTI डाली गयी थी। लेकिन सभी में एक ही जवाब मिला हमें नहीं मालूम प्रधानमंत्री अपनी जेब से खर्चा करते हैं। मोदी ने केजरीवाल की तरह सरकारी धन का दुरूपयोग नहीं किया। कहते हैं कि माँ से मिले मकान को अपने किसी भाई या बहन को देने की बजाए गुजरात सरकार को दे दिया। अपने खर्चे से ख़रीदे कपड़ों की नीलामी से आए धन को सरकारी खजाने में दे देते हैं। आखिर मोदी विरोधी कितना नीचे गिरेंगे?     

आम आदमी पार्टी- AAP की मुख्य राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रियंका कक्कड़ सोशल मीडिया पर जमकर ट्रोल हो रही हैं। असल में सोशल मीडिया पर वायरल एक वीडियो ने लोगों को उन्हें ट्रोल करने का मौका दे दिया है। इस वीडियो में दिख रहा है कि दिल्ली के पूर्व सीएम अरविंद केजरीवाल की करीबी AAP की मुख्य राष्ट्रीय प्रवक्ता कह रही हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पास 5000 करोड़ रुपये के कपड़े हैं। 5 हजार, पांच लाख, यहां तक की 5 करोड़ तक की बात पर लोग कुछ सोच भी सकते थे, लेकिन 5 हजार करोड़ की बात लोगों को हजम नहीं हो रही हैं। लोग AAP प्रवक्ता पर तंज कर रहे हैं।

फ्रांस में भारत के खिलाफ ज़हर उगलने वाले प्रोफेसर क्रिस्टोफ जैफरलॉट से मिले राहुल गाँधी, हिन्दू संगठनों को बताता है ‘हिंसक’

राहुल गाँधी के साथ क्रिस्टोफ जैफरलॉट (फोटो साभार: X/ @INCIndia)
कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गाँधी यूरोप दौरे पर हैं। इस बीच उन्होंने 8 सितंबर को पेरिस की एक यूनिवर्सिटी में छात्रों को संबोधित किया। इस दौरान लेखक और कॉलमिस्ट क्रिस्टोफ जैफरलॉट उनके साथ मंच पर नजर आया। क्रिस्टोफ जैफरलॉट भारत और हिंदुओं के खिलाफ नफरत उगलने के लिए कुख्यात रहा है। राहुल के इस कार्यक्रम की फोटो कांग्रेस के ऑफिशियल सोशल मीडिया अकाउंट्स से शेयर की गई थीं।
अब प्रश्न यह है संविधान की शपथ लेने वाले राहुल भारत विरोधियों से क्यों मिल रहे हैं? क्या संविधान देश विरोधियों से साठगांठ की इजाजत देता है? दूसरे, यह कि चीन से किए गुप्त समझौते का कब संज्ञान लिया जाएगा? यदि इसी तरह कोई गुप्त समझौता बीजेपी ने किया होता, सड़क से लेकर संसद तक हंगामा किया जा होता, संसद की कार्यवाही बाधित की जा रही होती। क्या देश को उस गुप्त समझौते की जानकारी नहीं लेनी चाहिए? आखिर केंद्र सरकार उस गुप्त समझौते पर क्यों चुप है? क्या देश विरोधियों से मिलने वाला कोई भी नेता और उसकी पार्टी वोट की हक़दार है? 

भारत विरोधी बयानों को लेकर अक्सर विवादों में रहने वाले राहुल गाँधी के साथ मंच पर नजर आया क्रिस्टोफ जैफरलॉट का भारत के खिलाफ लिखने का लंबा इतिहास रहा है। वह आमतौर पर केंद्र की भाजपा सरकार और उसके नेतृत्वकर्ता प्रधानमंत्री मोदी पर हमला करता रहा है।

हिंदू संगठनों का विरोध

क्रिस्टोफ जैफरलॉट ने नागरिकता संशोधन कानून (CAA) को भारत की धर्मनिरपेक्ष भावना के खिलाफ करार दिया था। उसने CAA की तुलना इजरायल और वहाँ के यहूदियों से तुलना करते हुए कहा था, “इस तरह का दृष्टिकोण जातीय और धार्मिक आधार पर किसी भी देश की दृष्टि को दर्शाता है। जहाँ बहुसंख्यक आबादी के अलावा बाकी सभी दोयम दर्जे की जिंदगी जीने को मजबूर होते हैं। यह इजरायल की तरह है, जहाँ यहूदी बहुतायत में हैं।”
दिलचस्प बात यह है कि अल्पसंख्यकों को (मुस्लिमों को छोड़ कर) नागरिकता देने के भारतीय कानून में जैफरलॉट को समस्या तो नजर आती है। लेकिन, भारत के 3 पड़ोसी इस्लामी मुल्कों में अल्पसंख्यकों खासतौर से हिंदुओं की दयनीय स्थिति दिखाई नहीं देती।
क्रिस्टोफ जैफरलॉट हिंदुओं में आत्मसम्मान की कमी होने और भाजपा नेताओं पर मुस्लिम जनसंख्या विस्फोट का ‘झूठ’ फैलाने का भी आरोप लगाता रहा है। उसे यह नहीं दिखता कि भारत में मुस्लिम आबादी 20 करोड़ की दहलीज पर खड़ी है। वहीं पड़ोसी मुल्कों में हिंदू शून्य की ओर जाते दिखाई दे रहे हैं। यही नहीं, वह भारत विभाजन के लिए अंग्रेजों को तो जिम्मेदार ठहराता है। लेकिन, इस्लामिक चरमपंथियों और मुस्लिम लीग जैसे कट्टरपंथी संगठनों के नापाक इरादों का जिक्र करना भूल जाता है।
राहुल गाँधी ने व्यक्ति के साथ मंच साझा किया वह भारत के खिलाफ युद्ध छेड़ने की कोशिश करते और निर्दोष लोगों की हत्या करने वाले आतंकियों को दोषी नहीं ठहराता। बल्कि वह यह कहता है कि भारत में 1993 से लेकर 2008 तक जो आतंकी हमले हुए उसका फायदा भाजपा को मिला। वह कहता है कि भाजपा ने भय की राजनीति कर चुनाव जीता है। क्रिस्टोफ जैफरलॉट को दुनिया के सबसे बड़े स्वयंसेवी संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के खुद को ‘संघ परिवार’ कहने से भी समस्या है।
जैफरलॉट ने राष्ट्रवादी संगठन ‘बजरंग दल’ पर हिंसा करने, चर्च और मुस्लिमों के साथ मारपीट करने का आरोप लगाया। वह हिंदुओं द्वारा किए गए किसी पलटवार का हर बार जिक्र करता है। लेकिन, इस्लामी कट्टरपंथियों द्वारा आए दिन हिंदुओं के साथ हो रही हिंसा और मिशनरी चर्च के माध्यम से हिंदुओं के खिलाफ रची जा रही साजिशों पर चुप्पी साध लेता है।

मोदी पर हमला

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में साल 2014 और 2019 में केंद्र में भाजपा सरकार सत्ता में है। इस बात में कोई दो राय नहीं है कि पीएम मोदी के केंद्र की सत्ता में आने से पहले और बाद में विरोधियों की संख्या में बड़ा इजाफा हुआ है। इनमें से एक नाम क्रिस्टोफ जैफरलॉट का भी है। भाजपा की लगातार जीत पर अपनी निराशा व्यक्त करते हुए उसने ‘मोदीज इंडिया: हिंदू नेशनलिज्म एंड द राइज ऑफ एथनिक डेमोक्रेसी’ नामक अपनी पुस्तक में लिखा है, “पिछले दो दशकों में नरेंद्र मोदी की वजह से हिंदू राष्ट्रवाद को एक तरह के राष्ट्रीय लोकप्रियता के साथ जोड़ा गया है। इससे चुनावों में पहले गुजरात में और फिर भारत में बड़े पैमाने पर सफलता मिली है।”
उसने अपनी इस किताब में भारतीय जनता पार्टी पर विकास का वादा करने के साथ ही जातीय-धार्मिक आधार पर मतदाताओं का ध्रुवीकरण कर देश की जनता को बहकाने का आरोप लगाया। हालाँकि, जैफरलॉट ने अपनी किताब में पीएम मोदी की लोक-कल्याणकारी, विकासवादी और महत्वाकांक्षी योजनाओं डिजिटल इंडिया, जन धन योजना, आयुष्मान भारत, प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना, प्रधानमंत्री आवास योजना का जिक्र नहीं किया। क्योंकि सच्चाई यह है कि देश की जनता अब किसी बहकावे की जगह विकास के नाम पर वोट देती है।
क्रिस्टोफ जैफरलॉट ने दावा किया है कि उसने पीएम मोदी को लेकर भारतीयों का इंटरव्यू किया है। इस इंटरव्यू के आधार पर उसने लिखा है, “मोदी सरकार ने भारत को लोकतंत्र के एक नए रूप में बदल दिया है। यह एक तरह का जातीय लोकतंत्र है, जिसमें बहुसंख्यक समुदाय के साथ देश में समानता का व्यवहार होता है। लेकिन मुस्लिम और ईसाइयों को दोयम दर्ज के नागरिकों की तरह ट्रीट किया जाता है।” जैफरलॉट ने दावे तो बड़े-बड़े किए हैं। लेकिन, भारत के अन्य विरोधियों की तरह उसके पास भी इस दावे की पुष्टि के लिए कोई सबूत नहीं है। इसके अलावा, अनुच्छेद-370 को लेकर सुनवाई में देरी के लिए उसने भारत की न्यायपालिका पर लांछन लगाते हुए सुप्रीम कोर्ट पर भी हमला बोला।

डिसमेंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व इंवेट

साल 2021 में आयोजित ‘डिसमेंटलिंग ग्लोबल हिंदुत्व इंवेट’ में क्रिस्टोफ जैफरलॉट को बतौर वक्ता आमंत्रित किया गया था। इस कार्यक्रम का उद्देश्य हिंदुत्व के खिलाफ लड़ना और हिंदू धर्म को टारगेट करना था। जैफरलॉट ने इस कार्यक्रम में बोलते हुए राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और हिंदुत्व हमला किया था।

एक देश एक चुनाव’ समय की आवश्यकता

डॉ राकेश कुमार आर्य, मुख्य संपादक, उगता भारत, गाज़ियाबाद  

'एक देश एक चुनाव' के विचार की आवश्यकता बहुत समय से अनुभव की जा रही थी। यदि प्रशासनिक स्तर पर दृष्टिपात किया जाए तो पता चलता है कि हर छठे महीने कोई ना कोई चुनाव देश में होता रहता है। इससे सरकारी तंत्र का दुरुपयोग होता है। धन भी अधिक खर्च होता है । इसके अतिरिक्त पूरा प्रशासनिक तंत्र चुनाव के कार्यों में लगे रहने के कारण चुनावी तंत्र बनकर रह जाता है। जिला मुख्यालय और तहसील स्तर पर  किसान लोग अपने आवश्यक कामों के लिए भटकते रहते हैं और प्रशासन किसी न किसी चुनाव की तैयारी में लगा रहता है।  इससे राजस्व विभाग में लंबित वाद लटके रह जाते हैं और किसानों को तथा वादकारियों के लिए सस्ता और सुलभ न्याय एक दिवास्वप्न बनकर रह गया है । ऐसे में 'एक देश एक चुनाव' समय की आवश्यकता है।

लेकिन जनता को गुमराह करने वाले नेता और पार्टियां इसका विरोध कर रही हैं। उसका कारण भी है, क्योकि आए दिन होने वाले चुनावों की आड़ में इनकी भरने वाली तिजोरियों पर ग्रहण लग जाएगा। नेता जनता को महंगाई एवं बेरोजगारी आदि से गुमराह जरूर करते हैं, लेकिन यह नहीं बताते कि नितरोज होने वाले चुनावों में उद्योगपतियों द्वारा धन देने की भरपाई वह चीजों की कीमत बढ़ाकर करते हैं। संविधान की दुहाई देने वाले अपने स्वार्थ में यह भूल रहे हैं कि एक देश एक चुनाव से देश की अर्थव्यवस्था पर कितना बोझ कम होगा। परन्तु एक देश एक चुनाव का विरोध करने वाले कभी किसी निगम पार्षद से लेकर सांसद तक को मिलने वाली पेंशन का विरोध करने का साहस नहीं करते। जिस दिन ये पेंशन बंद हो जाएगी, देश को हर महीने करोड़ों की बचत होगी, जो देश के अन्य विकास कार्यों में मदद करेगा। दूसरे, देश में थोक के भाव में बनी पार्टियां भी बढ़ती महंगाई का एक कारण है, इसकी गहराई एवं सच्चाई को भी समझना होगा। यह वह कटु सच्चाई है,जिसे एक देश एक चुनाव विरोधी नहीं बताएंगे।  

खैर, पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के नेतृत्व में 'एक देश एक चुनाव' पर विचार हेतु केंद्र सरकार ने एक समिति बनाई है। पूर्व राष्ट्पति अपनी न्याय संगत कार्य शैली के लिए जाने जाते हैं।  इस समय देश को एकाग्रचित होकर अपने भविष्य पर ध्यान केंद्रित कर आगे बढ़ने की आवश्यकता है। यह ठीक है कि लोकतंत्र में कई प्रकार के विरोधाभास होते हैं और कई विरोधी बातों के लिए स्थान खाली बना रहता है। लोकतंत्र की इस दुर्बलता को हथियार बनाकर केवल यह राग अलापा जाता रहना कि हमको तो विरोध ही करना है, किसी भी दृष्टिकोण से उचित नहीं कहा जा सकता। 

यदि हम देश में आधार कार्ड एक सा बना सकते हैं ,'एक देश एक टैक्स' की व्यवस्था को सफलतापूर्वक लागू कर सकते हैं तो ऐसे ही सुधारों के दृष्टिकोण से ' एक देश एक चुनाव' के विचार को देखना चाहिए। हम सभी यह भी भली- भांति जानते हैं कि देश में 'एक नेशन एक राशन' की व्यवस्था को भी देश के कई राज्यों ने अपना कर सही ढंग से लागू कर दिया है। इससे जन सामान्य को काफी सुविधा अनुभव हुई है। वैसे भी हमारा अंतिम लक्ष्य जनसाधारण को सुविधा संपन्न करना ही होता है। लोकतंत्र तो सुविधा देने के लिए ही जाना जाता है। 

देश की एकता और अखंडता को बनाए रखकर देश के सामाजिक परिवेश में समरूपता स्थापित करने के लिए सारे देश के बुद्धिजीवी लोग समान नागरिक संहिता को भी लागू करने पर अपना गंभीर विचार व्यक्त कर रहे हैं। हमारे देश के संविधान निर्माताओं ने तो संविधान निर्माण के समय ही इसका संकल्प ले लिया था। सरकार को आज इस पर भी गंभीरता दिखानी चाहिए और आगामी लोकसभा चुनावों से पहले देश में समान नागरिक संहिता लागू की जानी चाहिए।

देश में हजारों करोड़ रूपया आम चुनावों पर खर्च होता है। इसके अतिरिक्त जब-जब किसी प्रदेश के चुनाव आते हैं तो प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री तथा अन्य प्रमुख नेताओं को उन चुनावों में अपनी अपनी पार्टी को जिताने के लिए हवाई यात्राएं करनी पड़ती हैं । जिसके लिए मोटा पैसा खर्च किया जाता है। अंतिम रूप से इन सब का प्रभाव देश के विकास कार्यों पर पड़ता है। 'एक देश एक चुनाव' से हम इस झंझट से मुक्ति पा सकते हैं और वर्तमान में चल रही महंगी चुनावी प्रक्रिया के दृष्टिगत बहुत कम खर्चे में सारे देश के चुनाव एक साथ हो सकते हैं।

 यदि इस बात पर विचार किया जाए कि देश का विपक्ष देश में 'एक देश एक चुनाव' के विचार से सहमत क्यों नहीं है ? तो इसका उत्तर यह है कि वह जिस प्रकार अब 'इंडिया' नाम के गठबंधन को तैयार कर रहा है, 'एक देश एक चुनाव' की स्थिति लागू होते ही इस गठबंधन के टूटने की प्रबल संभावनाएं बन जाएंगी। क्योंकि राज्य स्तरीय राजनीतिक दल किसी भी कीमत पर अपनी पार्टी की मुख्यमंत्री पद की दावेदारी को किसी गठबंधन के नाम पर बलि नहीं चढ़ाएंगे। यदि बात उत्तर प्रदेश  की करें तो यहां अखिलेश यादव अपने आप को भावी मुख्यमंत्री के रूप में देख रहे हैं। वे यह कदापि नहीं चाहेंगे कि अपने गढ़ में किसी गठबंधन के नाम पर कांग्रेस या किसी भी राजनीतिक दल को वे लाभ पहुंचा दें। ऐसा ही प्रत्येक प्रांत में है। तब इन सब 'इंडिया' वालों के सामने सरकार के प्रयास की आलोचना करने के अतिरिक्त कोई अन्य विकल्प नहीं है।

 माना कि अपने चुनावी घोषणा पत्रों में देर से 'एक देश एक चुनाव' की प्रक्रिया की वकालत कर रही भाजपा 'एक देश एक चुनाव' के विचार से तात्कालिक लाभ ले सकती है, पर हम आप जैसे लोगों को किसी भी राजनीतिक गुणा भाग में पड़े बिना देश के हित पर विचार करना चाहिए। हमारा मानना है कि इस समय देश का हित इसी में है कि 'एक देश एक चुनाव' की प्रक्रिया को यथाशीघ्र पूर्ण कर इसे सही ढंग से लागू कर दिया जाए। इस प्रकार की प्रक्रिया को लागू करने का एक लाभ यह भी होगा कि अधिक से अधिक लोग चुनाव में भाग ले सकेंगे। क्योंकि जितना छोटा चुनाव होता है, उतना ही अधिक लोग चुनाव में भाग लेने के लिए बाहर निकलते हैं। लोकसभा चुनाव में लोगों की बढ़ती उदासीनता का एक कारण यह है कि उसमें खड़े होने वाले प्रत्याशियों में लोगों की रुचि घटती जा रही है। उनसे अधिक रुचि लोगों को अपने विधायक पद के उम्मीदवार में होती है और उससे भी अधिक रुचि ग्राम प्रधान के चुनाव में खड़े होने वाले अपने प्रत्याशी के लिए होती है। यदि यह सब चुनाव एक साथ होंगे तो अपनी-अपनी रुचि के लोगों को वोट देने के बहाने मतदान केंद्र पर लोगों का जाना अनिवार्य सा हो जाएगा।

 2023 के इस वर्ष में राजस्थान, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, तेलंगाना, जम्मू–कश्मीर, त्रिपुरा, मेघालय, नागालैंड और मिजोरम समेत देश के दस राज्यों में विधानसभा चुनाव या तो संपन्न हो चुके हैं या अभी होने हैं। इस प्रकार के चुनावों का देश के समय ,धन ,ऊर्जा ,स्वास्थ्य और व्यवस्था सभी पर विपरीत प्रभाव पड़ता है। इस संदर्भ में हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि देश के पहले आम चुनावों से लेकर अगले पंद्रह सालों तक, 1952, 1957, 1962, 1967 में चार बार लोकसभा चुनाव हुए और हर बार राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव भी इनके साथ-साथ ही संपन्न हुए। 1968 से यह प्रक्रिया परिवर्तित होने लगी। 1971 में जब लोकसभा के चुनाव उसके निर्धारित कार्यकाल 1972 से पहले कराए गए तो उस समय भी यह एक देश एक चुनाव की प्रक्रिया बाधित हुई। अब पिछले 25 वर्ष से देश में इस बात को लेकर फिर गहरा चिंतन चल रहा है कि एक देश एक चुनाव की प्रक्रिया को यथाशीघ्र लागू किया जाए। यदि 'एक देश एक चुनाव' की प्रक्रिया 1952 के चुनावों की भांति देश में मजबूती के साथ स्थापित रहती तो बहुत संभव था कि देश में क्षेत्रीय दलों का अस्तित्व नहीं होता। माना कि लोकतंत्र में अनेक दलों को चुनावों के समय अपना भाग्य आजमाइश करने का अवसर मिलता है जो उनका संवैधानिक अधिकार भी है, पर छोटे-छोटे राजनीतिक दलों से देश की एकता और अखंडता को भी खतरा पैदा होता है । क्योंकि इस प्रकार के राजनीतिक दल अपनी संकीर्ण मानसिकता का परिचय देते हुए क्षेत्रवाद को प्रोत्साहित करते हैं।

(लेखक सुविख्यात इतिहासकार और भारत को समझो अभियान समिति के राष्ट्रीय प्रणेता हैं।) 

भारत की छवि धूमिल करने देश में राहुल गांधी, विदेश में जार्ज सोरोस

2014 में केंद्र में नरेंद्र मोदी सरकार बनने के बाद से होने वाले धरनों और प्रदर्शनों की पृष्ठभूमि को देखने पर एक बात प्रमुखता से उभर कर आती कि जब-जब भारत में कोई विदेशी मेहमान या चुनाव आता है, जॉर्ज सोरोस के भीख पर अराजक तत्व हरकत में आ जाते हैं। सोरोस जिसने भारत से मोदी सरकार को हटाने के लिए 1000 करोड़ रूपए खर्च करने की घोषणा पहले ही कर चुके हैं और उसी खैरात पर टूलकिट किसी न किसी मुद्दे को उछाल जनता को भ्रमित करने सड़क पर उतर आती है। चर्चा यह भी है कि ये टूलकिट इतना नासमझ है कि सोरोस टूलकिट पर 1 रूपए खर्च कर 10 रूपए की कमाई कर रहा है। चर्चा में दम इसलिए नज़र आता है कि कोई व्यापारी बिना किसी स्वार्थ के फूटी कौड़ी खर्च करता। 

यह भी चर्चा है कि 2024 में तीसरी बार मोदी सरकार बनने के बाद सबसे बड़ा झटका भारतीय विपक्ष और टूलकिट से ज्यादा सोरोस को होने वाला है। राजनीतिक पंडितों का यह भी मानना है कि तीसरी बार मोदी सरकार बनते ही सोरोस पतन की राह पर आ जाएगा। जिसकी प्रतीक्षा में विश्व की समस्त राजनीतिक पार्टियों को होने के कारण सबकी निगाह भारत पर है। विश्व के कई देशों में सरकारें गिराने में माहिर सोरोस भारत में भी अपनी गन्दी साज़िश को अंजाम देने की कोशिश कर रहा है। सोरोस देश में अस्थिरता लाने के लिए शेयर मार्केट पर चोट मारता है, और शेयर कीमत कम होने पर उन्हें खरीद लेता है, जिसे टूलकिट समझ नहीं पाता, वह तो बस खैरात पर राल टपकाये रहता है।     
अमेरिकी शॉर्ट सेलिंग फर्म हिंडनबर्ग ने 24 जनवरी को 2023 को रिपोर्ट जारी कर अडानी ग्रुप की कंपनियों को ओवरवैल्यूड बताया था और अकाउंट्स में हेरफेर का आरोप लगाया था। और अब देश में हो रहे जी-20 से पहले हिंडनबर्ग का दूसरा संस्करण 31 अगस्त 2023 को ‘ऑर्गेनाइजड क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट’ (OCCRP) द्वारा लाया गया। इसके वर्तमान संपादक आनंद मंगनाले हैं जो चीनी प्रचार आउटलेट न्यूज़क्लिक से जुड़े रहे हैं। इससे इसकी साजिश को समझा जा सकता है। हिंडनबर्ग की रिपोर्ट केवल मोदी सरकार की छवि खराब करने के लिए नहीं लाई गई थी बल्कि भारत में विकास की रफ्तार को रोकने का एक षडयंत्र था। OCCRP की रिपोर्ट भी उसी षडयंत्र का एक हिस्सा है। वे भारत में उद्योगों को ध्वस्त करना चाहते हैं, वे देश के छोटे निवेशकों के विश्वास को तोड़ना चाहते हैं, वे विदेशी निवेशकों के भारत में विश्वास को डिगाना चाहते हैं। लेकिन वे अपने मकसद में पिछली बार की तरह ही नाकामयाब होंगे।

ये नया भारत है, झुकना नहीं जनता
वे भूल गए, ये नया भारत है। आज देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी है जिन पर देश की जनता अटूट विश्वास करती है। हिंडनबर्ग की रिपोर्ट के बाद शेयर बाजार में छोटे निवेशकों को कुछ नुकसान भी पहुंचा लेकिन पीएम मोदी पर उनका भरोसा कायम रहा। अब इससे तिलमिलाए राहुल गांधी, लेफ्ट लिबरल गैंग और अमेरिकी अरबपति जार्ज सोरोस ने जी-20 की बैठक से पहले फिर से अडानी का जिन्न बोतल से निकाला है। पीएम मोदी के देश के समग्र विकास के संकल्प की वजह से विपक्षी पार्टियों को कोई मुद्दा नहीं मिल रहा है इसीलिए वे ले-देकर अडानी मामले पर आ जाते हैं। क्या वजह है कि देश में लेफ्ट लिबरल और राहुल गांधी और विदेश में जार्ज सोरोस की फंडिंग से चलने वाली संस्थाएं लगातार अडानी मुद्दा उठाकर देश को विकास की पटरी से उतारना चाहती हैं। आखिर इनके बीच क्या संबंध है?

देश को बदनाम करने के लिए जी-20 से पहले OCCRP रिपोर्ट
अडानी के खिलाफ OCCRP की रिपोर्ट देश में जी-20 की बैठक से करीब एक हफ्ते पहले 31 अगस्त 2023 को जारी की गई और मीडिया की सुर्खियां बनीं। ओसीसीआरपी की रिपोर्ट में दावा किया गया कि कि गौतम अडानी ग्रुप द्वारा शेयरों के साथ गड़बड़ी का मामला हुआ है। OCCRP की रिपोर्ट के मुताबिक, अडानी ग्रुप ने गुपचुप तरीकों से खुद अपने शेयर्स खरीद कर के स्टॉक एक्सचेंज में लाखों डॉलर का निवेश कर रखा है। OCCRP के वर्तमान संपादक आनंद मंगनाले हैं जो चीनी प्रचार आउटलेट न्यूज़क्लिक से जुड़े रहे हैं। OCCRP को जार्ज सोरोस के OSF और फोर्ड फाउंडेशन द्वारा वित्त पोषित किया जाता है। ऐसे आरोपों का अडानी ग्रुप द्वारा अपने मीडिया स्टेटमेंट में खंडन किया गया है।

OCCRP की रिपोर्ट के लेखक आनंद मंगनाले और रवि नायर
OCCRP की रिपोर्ट के लेखक आनंद मंगनाले और रवि नायर हैं। आनंद मंगनाले चीनी प्रचार आउटलेट न्यूज़क्लिक से जुड़े रहे हैं। रवि नायर ने राफेल पर प्रजंय गुहा ठाकुरता के साथ मिलकर एक किताब लिखी है! इन्हीं लोगों का समूह हिंडनबर्ग रिपोर्ट और बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री लेकर आया था। इन दोनों ही रिपोर्ट को सोशल मीडिया पर शेयर करने के लिए टीएमसी सांसद महुआ मोइत्रा काफी सक्रिय थी। वजह जानना चाहते हैं?हिंडनबर्ग रिसर्च के मालिक नाथन एंडरसन और ANSON group के मालिक मोएज कसम के बीच क्या संबंध है यह जानने के लिए इस रिपोर्ट को पढ़िए- क्या अडानी समूह पर हिंडनबर्ग रिपोर्ट में एन्सन फंड शामिल थे? मोएज कसम एक एनजीओ चलाते हैं जिसमें उनकी पत्नी एनजीओ की सह-संस्थापक हैं। Moez Kassam की पत्नी, Marissa Kassam 2013 से पहले JP Morgan के साथ काम कर रही थीं! Marissa Kassam जेपी मॉर्गन चेस के साथ उसी अवधि में काम कर रही थी जब महुआ मोइत्रा जेपी मॉर्गन चेज़ की उपाध्यक्ष थीं! इससे साफ होता है कि महुआ मोइत्रा हिंडनबर्ग रिपोर्ट को साझा करने के लिए इतनी लालायित क्यों थी।

अडानी समूह ने कहा- भारतीय संस्थानों की स्वतंत्रता, अखंडता पर हमला
इसी बीच अडानी समूह ने ऑर्गेनाइडज़्ड क्राइम एंड करप्शन रिपर्टिंग प्रोजेक्ट (OCCRP) द्वारा लगाए गए छिपे विदेशी निवेशकों के ‘दोबारा थोपे गए’ आरोपों को कड़ाई से अस्वीकार किया है। अडानी ग्रुप ने एक मीडिया स्टेटमेंट में कहा कि हम अडानी ग्रुप पर लगाए गए ऐसे आरोपों को अस्वीकार करते हैं। इस आशय की खबरें जो प्रकाशित हुई, वो हिंडनबर्ग रिपोर्ट के लिए विदेशी मीडिया के एक वर्ग द्वारा समर्थित एक कोशिश है, जो कि अप्रत्याशित है। अडानी समूह ने इससे पहले हिंडनबर्ग के दावों को खारिज करते हुए इसे ‘भारत पर सुनियोजित हमला’ बताया था। इसने कहा कि फर्म की रिपोर्ट ‘भारतीय संस्थानों की स्वतंत्रता, अखंडता और गुणवत्ता’ पर हमला थी। अडानी समूह ने कहा कि ऐसी खबरें हिंडनबर्ग की नाकारा रिपोर्ट को दोबारा हवा देने के लिए विदेशी मीडिया के एक वर्ग के समर्थन से जॉर्ज सोरोस-फंडेड OCCRP की एक और कोशिश है।

‘द गार्डियन’ ने अडानी को पीएम मोदी का करीबी बताकर प्रोपेगेंडा फैलाया
जॉर्ज सोरोस-फंडेड OCCRP ने पीएम मोदी की छवि को बदनाम करने के लिए एक प्रोपेगेंडा फैलाया और जॉर्ज सोरोस-फंडेड मीडिया को एक टूलकिट मिल गया। ‘द गार्डियन’ की खबर से समझा जा सकता है कि वे किस तरह इस मुद्दे को पीएम मोदी से जोड़कर हवा देना चाहते हैं। ‘द गार्डियन’ की खबर की शुरुआत देखिए- ”नए खुलासा किए गए दस्तावेजों से पता चलता है कि देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के करीबी संबंधों वाले एक अरबपति भारतीय परिवार ने गुप्त रूप से अपने स्वयं के शेयर खरीदकर भारतीय शेयर बाजार में सैकड़ों मिलियन डॉलर का निवेश किया।” इस तरह उनका एक ही मकसद है “मोदी और अडानी कनेक्शन” का प्रोपेगेंडा फैलाना। लेकिन यह समझ से परे है कि अगर अडानी समूह पर रिपोर्ट है तो इसमें पीएम मोदी का नाम क्यों जोड़ा जा रहा? इससे साबित होता है उनकी मंशा कुछ और ही और यह सब एक षडयंत्र के तहत किया जा रहा।

ED का खुलासा- हिंडनबर्ग रिपोर्ट से पहले कंपनियों ने कमा लिए अरबों रुपये
अडानी पर हिंडनबर्ग की रिपोर्ट आई थी तब हिंडनबर्ग ने यह स्वीकार किया था कि वह शेयर बाजार में शार्ट सेलिंग करती है। यानि हिंडनबर्ग रिपोर्ट का दो मकसद था। पहला- भारत और पीएम मोदी की छवि खराब करना और दूसरा शार्ट सेलिंग के जरिये अरबों रुपये कमाना और उन रुपयों को लोकसभा चुनाव 2024 से पहले पीएम मोदी के खिलाफ प्रोपेगेंडा फैलाने में इस्तेमाल करना। अब प्रवर्तन निदेशालय (ED ) की रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि हिंडनबर्ग रिपोर्ट से पहले 12 कंपनियों ने अरबों रुपये कमा लिए। रिपोर्ट में कहा गया है कि हिंडनबर्ग रिसर्च की रिपोर्ट आने से दो-तीन दिन पहले ही कुछ FPI (Foreign portfolio investment) ने शॉर्ट पोजीशन ली थी। उनके बेनिफिशियल ऑनरशिप का पता लगाने के लिए उनकी जांच की जा रही है। इनमें से अधिकांश यूनिट्स ने कभी भी अडानी के शेयरों की डील नहीं की थी और कुछ पहली बार ट्रेड कर रहे थे।

कंपनियों ने चंद महीनों में हजारों करोड़ कमाए
ED की रिपोर्ट के अनुसार, एक कंपनी जुलाई 2020 में आधिकारिक रूप से शुरू हुई। सितंबर 2021 तक कंपनी कोई बिज़नेस नहीं कर रही थी और सितंबर 2021 से मार्च 2022 तक सिर्फ 6 महीने में इस कंपनी का कारोबार 31 हजार करोड़ रुपये का हो गया, जिससे कंपनी ने 1,100 करोड़ रुपये की कमाई की। इसी तरह एक और फाइनेंशियल सर्विसेज देने वाले ग्रुप ने 122 करोड़ रुपये कमाए। ये ग्रुप भारत में एक कंपनी की तरह काम करता है, जबकि एक और फॉरेन इन्वेस्टर कंपनी ने 9 हजार 700 करोड़ रुपये कमाए।

12 कंपनियों ने शॉर्ट सेलिंग से कमाए करोड़ों रुपये
केमैन आइलैंड्स वाली इन्वेस्टर कंपनी, अडानी के शेयर्स की शॉर्ट सेलिंग से फायदा कमाने वाली 12 कंपनियों में से एक है। इस कंपनी का मालिकाना हक़ रखने वाली कंपनी को अंदरूनी शेयर ट्रेडिंग (इनसाइडर ट्रेडिंग) का दोषी पाया गया था। इसने अमेरिका में 14 हजार 880 करोड़ रुपये से ज्यादा का जुर्माना भी दिया था। केमैन आइलैंड्स वाली कंपनी ने 20 जनवरी को अडानी ग्रुप के शेयर्स में शॉर्ट पोजिशन ली और 23 जनवरी को इसे और बढ़ा दिया। वहीं मॉरीशस वाली कंपनी ने पहली बार 10 जनवरी को शॉर्ट पोजिशन ली थी।

राहुल गांधी की व्हाइट हाउस में गुप्त बैठक! मोदी को सत्ता से हटाने के लिए 2024 चुनाव के लिए क्या बनी सीक्रेट रणनीति?

कांग्रेस नेता राहुल गांधी के अमेरिकी दौरे को लेकर एक अहम खुलासा हुआ है। राहुल गांधी ने अमेरिका यात्रा के दौरान व्हाइट हाउस में गुप्त बैठक की। वे न तो भारत में विपक्ष के नेता हैं और न ही किसी संवैधानिक पद पर हैं। अब तो वह सांसद भी नहीं हैं। ऐसे में राहुल गांधी किस हैसियत से व्हाइट हाउस पहुंचे, यह अपने आप में बड़ा सवाल है। राहुल की इस बैठक न केवल व्हाइट हाउस ने बल्कि कांग्रेस पार्टी ने भी गुप्त रखा है जो कि संदेह पैदा करता है। अमेरिका की ऐसी क्या मजबूरी है कि एक सजायाफ्ता, अयोग्य सांसद से बैठक उसे जरूरी लगा? इस बैठक में राहुल अमेरिकी विदेश विभाग में दक्षिण एशिया के सहायक विदेश मंत्री डोनाल्ड लू सहित वरिष्ठ अमेरिकी अफसरों से मुलाकात की। पाकिस्तान के पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की सरकार जब गिरी थी तब उन्होंने डोनाल्ड लू को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया था। इसे देखते हुए यह प्रतीत होता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सत्ता से बेदखल करने के लिए जो अंतर्राष्ट्रीय साजिशें रची जा रही हैं, कहीं राहुल गांधी भी उसका हिस्सा तो नहीं हैं?

राहुल गांधी की व्हाइट हाउस बैठक भारत में सत्ता परिवर्तन के लिए?
बताया जा रहा है कि राहुल गांधी 2 जून को व्हाइट हाउस गए थे। इस दौरान उन्होंने भारत और अमेरिका संबंधों पर तफसील से चर्चा की। इस दौरान राहुल गांधी ने रूस-यूक्रेन युद्ध पर हिंदुस्तान के स्टैंड को लेकर भी बातचीत की। राहुल के व्हाइट हाऊस में गुप्त बैठक का यह एक पहलू है जबकि दूसरा पहलू कुछ और ही है। अब दूसरे पहलू का खुलासा हुआ है। हालांकि इस बैठक के पीछे उनकी क्या मंशा थी और आखिर उन्होंने इसे गुप्त क्यों रखा। यह बड़े सवाल खड़ी करती है, यह चौंकाने वाली है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि किसके बुलावे पर व्हाइट हाऊस गए थे राहुल? वहां किससे मुलाकात हुई और क्या बातें हुईं? क्या इस बैठक का मुख्य उद्देश्य भारत में सत्ता परिवर्तन रहा?

राहुल-डोनाल्ड लू मुलाकात को गुप्त क्यों रखा गया?
राहुल गांधी अपने अमेरिकी दौरे के दौरान व्हाइट भी गए और वहां उन्होंने अमेरिकी विदेश विभाग में दक्षिण एशिया के सहायक विदेश मंत्री डोनाल्ड लू सहित वरिष्ठ अमेरिकी अफसरों से मुलाकात की थी। उनकी इस मुलाकात को गुप्त रखा गया था। उनके इस कथित व्हाइट हाउस दौरे पर न तो बाइडेन प्रशासन और न ही कांग्रेस पार्टी की ओर से कोई स्टेटमेंट जारी किया गया है। सवाल यही उठता है इस मुलाकात को गुप्त क्यों रखा गया?

राहुल गांधी 2024 में व्हाइट हाउस के उम्मीदवार होंगे?
इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, राहुल गांधी ने चुपके से व्हाइट हाउस का दौरा किया और अमेरिकी अधिकारियों से मुलाकात की। इसका मतलब है कि व्हाइट हाउस भारत में शासन परिवर्तन अभियान चला रहा है। इसे इस रूप में समझा जा सकता है कि राहुल गांधी 2024 के चुनाव के लिए व्हाइट हाउस के उम्मीदवार हो सकते हैं। और इसमें उनकी मदद के लिए CIA, डीप स्टेट, मीडिया, टेक दिग्गज, जार्ज सोरोस द्वारा वित्तपोषित NGO भारतीय चुनावों में हस्तक्षेप करेंगे। सवाल यह भी है कि जैसे कांग्रेस पार्टी ने चीन की कम्युनिस्ट पार्टी से जिस तरह गुप्त समझौता किया जिसका विवरण आज तक सामने नहीं आ पाया। क्या अमेरिका में राहुल ने कुछ इसी तरह का गुप्त समझौता तो नहीं किया। अमेरिका का समर्थन हासिल करने के बदले राहुल ने उन्हें क्या आश्वासन दिया है?

विदेश नीति को लेकर लेख में राहुल की प्रशंसा
‘इकोनॉमिक टाइम्स’ में सीमा सिरोही द्वारा लिखे गए लेख में राहुल गांधी की जमकर प्रशंसा की गई है। साथ ही बताया गया है कि विदेशी नीतियों के मामले में अब वो परिपक्व हो गए हैं और एक रणनीतिक साझेदार के रूप में अमेरिका की महत्ता समझते हैं। प्रवासी भारतीय समुदाय में उत्साह भरने के लिए भी इस लेख में राहुल की प्रशंसा की गई है। जब ट्विटर पर ‘हिन्दू एक्शन’ पेज ने राहुल गांधी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का आलोचक बताया तो वो कहने लगीं कि पीएम मोदी को प्रतिदिन साष्टांग प्रणाम न करने वालों को उनका आलोचक बता दिया जाता है। हालांकि, सीमा सिरोही ने माना कि राहुल गांधी द्वारा इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग को सेक्युलर बताया जाना ठीक नहीं था।

राहुल गांधी ने अमेरिका में बोले कई सफेद झूठ, भारत को नीचा दिखाया
राहुल गांधी ने अमेरिका में भारत को नीचा दिखाने वाले कई ऐसे बयान दिए जो विवादस्पद रहे। डीआरडीओ की खुफिया जानकारी को विदेशी एजेंसियों के साथ साझा करने वाले पत्रकार विवेक रघुवंशी का अपरोक्ष समर्थन किया। इसी बहाने भारत में प्रेस की स्वतंत्रता पर सवाल खड़ा किया। उन्होंने मुस्लिम लीग को धर्मनिरपेक्ष करार दिया। सनातन संस्कृति का अपमान किया। प्रवासी भारतीयों से कहा कि भारत वापस आएं और लोकतंत्र के साथ संविधान की रक्षा करें। पीएम मोदी का अपमान किया। मुसलमानों को खुश करने के लिए उनकी तुलना दलितों से की। राहुल ने कहा कि उनकी भारत जोड़ो यात्रा रोकने की कोशिश की गई। जबकि वह बेखौफ कन्याकुमारी से कश्मीर तक भारत विरोधी तत्वों से मिलते रहे। राहुल ने कहा कि भारत में राजनीति करना अब आसान नहीं है और एजेंसियों का दुरुपयोग हो रहा है। यहां राहुल से पूछा जाना चाहिए कि अगर राजनीति करना आसान नहीं तो फिर वह हिमाचल प्रदेश और कर्नाटक का चुनाव कैसे जीते? राहुल ने एक और सफेद झूठ बोला कि ‘मैं पहला ऐसा व्यक्ति, जिसे मानहानि मामले में इतनी बड़ी सजा मिली।’ जबकि उनसे पहले कई सांसदों के दोष सिद्ध होने पर संसद सदस्यता जा चुकी है। कुछ लोग भारत से इतनी नफरत करते हैं कि कुछ भी बोलते हैं, सारी दुनिया देखती है भारत को विश्व गुरु की तरह, पर कुछ लोग आंखों पर पट्टी बांध लेते हैं जिससे उन्हें कुछ नजर नहीं आताl

भारत में अमेरिका मिशन के डिप्टी चीफ रह चुके हैं डोनाल्ड लू
डोनाल्ड लू फॉरेन सर्विस ऑफिसर हैं, जिनके पास अमेरिकी सरकार के लिए काम करने का 30 साल से ज्यादा का अनुभव है। वह भारत में 2010 से लेकर 2013 तक अमेरिका मिशन के डिप्टी चीफ रह चुके हैं। डोनाल्ड दक्षिण और मध्य एशिया के मामलों पर विदेश विभाग में सबसे टॉप राजनयिक हैं। वह किर्गिस्तान और अल्बानिया के पूर्व राजदूत भी रह चुके हैं। डोनाल्ड ने भारत में दो अलग-अलग मौकों पर अमेरिकी दूतावास में अपनी सेवाएं भी दी हैं।

इमरान खान ने सरकार गिरने के लिए डोनाल्ड लू को दोषी ठहराया था
पाकिस्तान के पूर्व पीएम इमरान खान ने भी अपनी सरकार गिरने के लिए डोनाल्ड लू को दोषी ठहराया था। इमरान खान ने यह साफ तौर पर कहा था कि अमेरिकी डिप्लोमैट डोनाल्ड लू हमारी सरकार गिराने की साजिश में शामिल था। बाइडेन प्रशासन ने डोनाल्ड लू मध्य और दक्षिण एशियाई देशों अमेरिकी एजेंडा लागू करने का दायित्व सौंपा है।

भारत तरक्की की राह पर, अमेरिका और डीप स्टेट घबराया
राहुल गांधी की व्हाइट हाउस में अमेरिकी अधिकारियों की मुलाकात और इसे गुप्त रखने से यह बात साफ हो जाती है कि यह भारत में शासन परिवर्तन एजेंडा का एक हिस्सा है। इससे यह भी पता चलता है कि बीजेपी सरकार भारत में सही काम कर रही है। हम तेजी से आगे बढ़े हैं और पश्चिम नहीं चाहता कि इस क्षेत्र में एक और चीन उनके हाथ आए। मोदी सरकार ने वैक्सीन युद्ध जीत लिया है, अंतर्राष्ट्रीय व्यापार रुपये में शुरू हो रहा है, रूस से थोक तेल खरीद, स्वतंत्र विदेश नीति, विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में तेजी आ रही है। ऐसे में डीप स्टेट एजेंडा भारत में चल नहीं पा रहा है और उनकी दाल नहीं गल रही है। ऐसे में उन्हें कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी में उम्मीद दिखी जो भारत को नीचा दिखा सकते हैं। लाएंगे और उन्हें अमेरिका का समर्थन करने के लिए मजबूर करेंगे और भारत को हमेशा एक और चीन होने से नियंत्रित करेंगे।

राहुल गांधी को भारत का जेलेंस्की बनाना चाहता था डीप स्टेट!
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने हाल के समय में चीन का जिक्र बार-बार किया था। चीन भारत में घुसपैठ कर रहा है। चीनी सैनिक भारतीय जवानों को पीट रहे हैं। चीन में काफी सद्भावना है। इस तरह के न जाने कितने ही बयान हैं। लेकिन ब्रिटेन के दौरे के दौरान उनके जुबान से वह बात भी निकल गई जिसका उन्हें सब्जबाग दिखाया गया था। उन्होंने कहा- जैसा रूस ने यूक्रेन में किया, वही भारत के खिलाफ दोहरा सकता है चीन। दरअसल पश्चिमी देशों के डीप स्टेट (दुनिया को अपने हिसाब से चलाने वाले) और अमेरिकी अरबपति जार्ज सोरोस ने मई 2022 में राहुल गांधी के मेकओवर और पीएम उम्मीदवार बनाने की पटकथा तैयार की गई थी। उस वक्त राहुल भी ब्रिटेन के दौरे पर थे। उसी वक्त यह तय हुआ था कि जिस तरह यूक्रेन में आंदोलन खड़ा कर जेलेंस्की को प्रधानमंत्री बनाया गया उसी तरह 2024 में पीएम मोदी के खिलाफ आंदोलन खड़ा कर राहुल की ताजपोशी करवाई जाएगी। अब इसी कड़ी के तहत राहुल गांधी ने अमेरिका में गुप्त बैठक की है। अब देखने वाली बात यह होगी कि पीएम मोदी को दिल में बसा चुकी जनता इन तिकड़मों का किस तरह जवाब देती है।