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जॉर्ज सोरोस की फंडिंग वाली RSF ने ‘ऑपइंडिया’ को बनाया निशाना, ‘प्रेस की आजादी’ के नाम पर प्रोपेगेंडा: विदेशी फेक न्यूज फैक्ट्रियों के निशाने पर भारत की राष्ट्रवादी आवाज

                                                                                           प्रतिकात्मक तस्वीर ( फोटो साभार-chatgpt)
जॉर्ज सोरोस जितना पैसा भारत को अस्थिर करने में बर्बाद कर रहा है अगर यही पैसा गरीबों पर खर्च करता इतिहास में स्वर्णमयी अक्षरों में नाम लिखा जाता, लेकिन सोरोस देशों को अस्थिर करने में अपनी शान समझ रहा है। जब भारतीय नेताओं को फंडिंग कर उसको उतनी मदद नहीं मिल रही तो राष्ट्रवादी पत्रकारिता को निशाने पर ले रहा है। जिसे देख लगता है बुढ़ापे में अपनी दुर्गति करवाकर ही दुनिया से जाएगा। आखिर 
हिंदू राष्ट्रवादी न्यूज़ आउटलेट OpIndia को क्यों निशाने पर लिया जा रहा है? अगर RSF ने राष्ट्रवादी पत्रकारिता पर हमला करना बंद नहीं किया इसके बहुत भयंकर अंजाम होंगे।   

2025 के आखिर में अचानक एक मोड़ आया, जब RSF ने भारत के हिंदू राष्ट्रवादी न्यूज़ आउटलेट OpIndia को अपनी सालाना ‘प्रेस फ्रीडम प्रिडेटर्स’ लिस्ट में एलन मस्क और अडानी ग्रुप जैसे ग्लोबल कॉर्पोरेट दिग्गजों के साथ शामिल किया। इस की वजह से RSF की न्यूट्रैलिटी और पॉलिटिकल एजेंडा पर बड़े पैमाने पर चर्चा हुई। OpIndia राष्ट्रवादी और सॉवरेन नैरेटिव का एक घोर समर्थक है।

कई लोगों ने OpIndia को शामिल करने को राष्ट्रवादी आवाजों को बदनाम करने की बड़ी योजना के रूप में देख रहे हैं। यह लिस्टिंग RSF की पिछली रिपोर्टों की वजह से हुआ है। इनमें राष्ट्रवादियों को प्रेस की आजादी के लिए खतरा बताया गया था और मोदी सरकार के दौरान मीडिया के माहौल की आलोचना की गई थी।

UK की टेलीग्राफ ने बताया कि कैसे RSF ने दुनिया को भारत के डेमोक्रेटिक माहौल और प्रेस लैंडस्केप को बताया। इसमें दुनिया भर में आलोचना के साथ अलग-अलग भारतीय मीडिया और कॉर्पोरेट हस्तियों के गठबंधन को हाईलाइट किया गया।

यह रिसर्च RSF के फाइनेंसिंग सोर्स को ट्रैक करके इसकी जाँच करती है। इनमें से ज्यादातर पश्चिमी सरकारी संगठनों और शासन परिवर्तन से जुड़े फाउंडेशन हैं। जैसे- US कांग्रेस द्वारा फंडेड नेशनल एंडोमेंट फॉर डेमोक्रेसी (NED)।

यह बेलिंगकैट (Bellingcat) जैसे जाँच संगठनों के साथ RSF के कनेक्शन की भी जाँच करता है। स्टडी से पता चलता है कि RSF स्वतंत्र पत्रकारिता का निष्पक्ष संरक्षक नहीं है, बल्कि भारत की संप्रभुता और लोकतंत्र पर दुनिया भर में चल रही वैचारिक लड़ाई को हवा देता है।

RSF: इमेज बनाम इकोसिस्टम

RSF द्वारा पब्लिश वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स (WPFI) की चर्चा पश्चिमी सरकारों, मल्टीलेटरल संगठनों और लेगेसी मीडिया द्वारा किया जाता है। RSF खुद को एक इंटरनेशनल NGO के रूप में पेश करता है, जो दुनिया भर में प्रेस फ्रीडम का बचाव करता है।

यह इंडेक्स बिना किसी जानकारी के, सोच-समझकर किए गए सर्वे पर निर्भर करता है। इसमें जवाब देने वालों का नाम नहीं बताया जाता और कैटेगरी के हिसाब से स्कोरिंग नहीं होती। भारत के ऑफिशियल पॉलिसी थिंक टैंक नीति आयोग ने भी इसकी जानकारी दी है।

 भारत और दूसरी जगहों के आलोचकों के मुताबिक, ऐसा इंडेक्स एक न्यूट्रल असेसमेंट के बजाय एक जियोपॉलिटिकल टूल बनने का खतरा रहता है। यह एक सब्जेक्टिव सवालों के जवाबों पर आधारित होता है।

असल में RSF देशों के नैरेटिव अक्सर पश्चिमी ह्यूमन राइट्स ऑर्गनाइज़ेशन और उनसे जुड़े मीडिया की बातों को दिखाते हैं। खासकर जब बात भारत, हंगरी और दूसरे देशों की आती है, जिन्हें ‘इलीबरल’ या ‘नेशनलिस्ट’ माना जाता है। कॉर्पोरेट कंसोलिडेशन, इंटेलिजेंस लीक और सर्विलांस स्कैंडल जैसी पश्चिमी स्ट्रक्चरल समस्याओं को आम तौर पर छोटी-मोटी गड़बड़ियाँ बताया जाता है। RSF अक्सर भारत के हिंदू राष्ट्रवाद को जर्नलिज़्म के लिए खतरा बताते हैं।

फंडिंग: पश्चिमी सरकारें, NED और शासन बदलने वाली समाज सेवा

RSF को पश्चिमी सरकारों और डेमोक्रेसी को बढ़ावा देने वाले संगठनों से मदद मिलती है। OpIndia-CSDS डॉक्यूमेंट में बताई गई रिसर्च बताती है कि RSF को इनसे फंडिंग मिली है:

  1. फ्रांस की सरकारी एजेंसियां, जिनमें फ्रेंच डेवलपमेंट एजेंसी (AFD), विदेश मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय, गृह मंत्रालय, संस्कृति मंत्रालय और बेयूक्स शहर शामिल हैं।
  2. यूरोपियन कमीशन का यूरोपियन इंस्ट्रूमेंट फॉर डेमोक्रेसी एंड ह्यूमन राइट्स (EIDHR)।
  3. इसी तरह के यूरोप के मदद करने वाले संगठन, जैसे स्वीडिश इंटरनेशनल डेवलपमेंट एजेंसी (SIDA)।
  4. नेशनल एंडोमेंट फॉर डेमोक्रेसी (NED), जिसे US कांग्रेस से फंड मिलता है। यह संगठन स्पष्ट तौर पर बताता है कि यह डेमोक्रेसी को बढ़ावा देता है। इसे मुख्य रूप से US सरकार का सपोर्ट है।
फोर्ड फाउंडेशन जैसे बड़े US फाउंडेशन, जिनका भारत में पॉलिटिकल एक्शन और लॉबिंग को सपोर्ट करने का लंबा और विवादित इतिहास रहा है। इसमें वे संगठन भी शामिल हैं, जिन पर बाद में फाइनेंशियल गड़बड़ियों और भारत विरोधी कैंपेन के आरोप लगे, वे भी RSF से जुड़े हैं। ऑपइंडिया पेपर में बताई गई इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग के मुताबिक, RSF ने US-EU के रिजीम चेंज इनिशिएटिव्स के टारगेटेड सरकारों, जैसे वेनेजुएला के खिलाफ लगातार सख्त रुख अपनाया है। उन देशों में US फंडेड ऑर्गनाइजेशन्स और अमीरों के मालिकाना हक वाले विपक्षी मीडिया को सपोर्ट किया है।
यह डोनर प्रोफाइल साफ तौर पर RSF को जाने-माने ‘डेमोक्रेसी प्रमोशन’ नेटवर्क में रखती है। NGOs, मीडिया इनिशिएटिव्स, इंडेक्स और लॉबिंग कैंपेन जो वेस्टर्न जियोपॉलिटिकल पसंद के खिलाफ सरकारों में ‘अथॉरिटेरियनिज्म’ को खास तौर पर हाईलाइट करते हैं, जिनमें से भारत भी एक है। उन्हें वेस्टर्न सरकारों और उनसे जुड़े इंस्टीट्यूशन्स द्वारा फंड दिया जाता है।

वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स का विवादास्पद तरीका

RSF के इंडेक्स की तीन मुख्य समस्याएँ हैं – ओपेसिटी, सब्जेक्टिविटी और सेलेक्टिव एम्फेसिस, जो कई इंडियन और इंटरनेशनल समीक्षा पर आधारित हैं।
ओपेसिटी: यह ऑडिट करना मुश्किल है कि भारत के लिए खास स्कोर कैसे बनाए गए? वैसी ही स्थिति वाले देशों से कैसे की जाए, क्योंकि RSF सवाल के हिसाब से स्कोर या अपने जवाब देने वालों की पहचान और इंस्टीट्यूशनल लोकेशन नहीं बताता है।
सब्जेक्टिविटी: इंडेक्स सोच पर आधारित है। ‘एक्सपर्ट्स’ ‘ओनरशिप प्रेशर’, ‘हेट कैंपेन’, और ‘सेल्फ-सेंसरशिप’ जैसे मुद्दों पर सर्वे पूरा करते हैं। एक्सपर्ट्स का यह ग्रुप ज़्यादातर लिबरल-प्रोग्रेसिव, वेस्टर्न सोच वाले होते हैं। खासकर कंजर्वेटिव या नेशनलिस्ट सरकारों के विरोध में इनकी राय होती है।
सिलेक्टिव : आलोचकों का कहना है कि जहाँ भारत जैसे देशों को ‘हिंदू नेशनलिस्ट प्रेशर’ और सोशल मीडिया ट्रोलिंग जैसे नैरेटिव की वजह से कड़ी सज़ा मिलती है, वहीं गंभीर स्ट्रक्चरल दिक्कतों वाले वेस्टर्न डेमोक्रेसी में मीडिया ओनरशिप, सिक्योरिटी कानूनों का अग्रेसिव इस्तेमाल और इंटेलिजेंस मिलीभगत काफी ज्यादा है।
भारत सरकार के एक डिस्कशन पेपर के मुताबिक, RSF का तरीका पॉलिसी बेंचमार्क के तौर पर काफ़ी नहीं है, क्योंकि इसमें ‘प्रेस की आज़ादी की आम सहमति वाली परिभाषा की कमी है।’ ‘सैंपल साइज बहुत कम है,’ ‘पैरामीटर्स का नॉन-ट्रांसपेरेंट वेटिंग है।’
इनको देखते हुए ऑपइंडिया ने इंडेक्स को ‘ग्लोबल लेफ्ट की कहानी को फैलाने के लिए बनाया गया एक बायस्ड टूल’ बताया है। दरअसल RSF का पुराना डेटा बताता है कि कॉन्ग्रेस के सालों में भारत का मीडिया माहौल गिरा, लेकिन यह बहस मोदी सरकार के कार्यकाल पर ज्यादा हमला करती है।

RSF और भारत: राष्ट्रवादी राजनीति के खिलाफ मनगढ़ंत बातें बनाना

RSF की भारत फैक्ट शीट और प्रेस रिलीज में अक्सर एक तय टेम्पलेट को हाईलाइट किया जाता है। ‘हिंदू राष्ट्रवादी भीड़,’ ‘मोदी समर्थक,’ ‘भक्त’ और ‘राइट-विंग इकोसिस्टम’ को पत्रकारों के सामने आने वाले मुख्य खतरों के तौर पर हाईलाइट किया जाता है।
स्थानीय या राष्ट्रवादी बैकग्राउंड के पत्रकारों के खिलाफ हिंसा को ज़्यादातर उन घटनाओं और कहानियों के पक्ष में नजरअंदाज कर दिया जाता है, जिन्हें अंग्रेजी भाषा की लिबरल साइटों के एक खास ग्रुप द्वारा मजबूत किया जाता है। इनमें से कई पश्चिमी फाउंडेशन से जुड़ी हैं।
लगभग ‘कब्जा किए गए मीडिया’ की इमेज के साथ मेल न खाने के बावजूद, भारत के मीडिया में स्ट्रक्चरल वैरायटी, हजारों पत्रकारों, सैकड़ों चैनलों और कई बड़े प्लेटफॉर्म पर मोदी सरकार की तीखी आलोचना वाली कवरेज इन्हें कम दिखता है।
CSDS-लोकनीति की ‘इंडियन मीडिया, ट्रेंड्स और पैटर्न’ पर रिपोर्ट को OpIndia ने अपने रिसर्च में शामिल किया है। भारतीय मीडिया की आज़ादी के बारे में RSF नकारात्मक वर्णन करता है। इसमें यह दावा किया जाता है कि ज्यादातर पत्रकारों का मानना ​​है कि मीडिया आउटलेट सत्ताधारी BJP को सपोर्ट करते हैं। हालाँकि, सर्वे के नतीजे, जैसे कि ‘85% महिला पत्रकारों को मेंटल हेल्थ की दिक्कतें’ थीं और 1.4 बिलियन की आबादी वाले देश में से 206 पत्रकारों के एक छोटे से सैंपल से लिए गए थे।
OpIndia के अनुसार, ग्लोबल इंडेक्स भारत की बुराई करता है, एक घरेलू विदेशी फंडेड थिंक टैंक इंडेक्स पर आधारित है और फिर ‘मीडिया में लोकतंत्र की कमी’ के तौर पर पेश करता है। यह फीडबैक लूप RSF की सब्जेक्टिव स्टोरी और CSDS के कम डेटा की वजह से होता है।
RSF OpIndia को एक ‘हिंदू राष्ट्रवादी वेबसाइट’ बताता है जो सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों को ‘बदनाम’ करती है। ये तकनीक या विचारधारा पर की गई आपत्ति को प्रेस की आजादी से जोड़कर देखती है। यह एक स्ट्रैटेजी है, जिसमें इंडेक्स को चुनौती देने वालों को पत्रकारिता का दुश्मन बताया जाता है, जिससे असल में असली मुद्दा कहीं खो जाता है।

बेलिंगकैट: OSINT, NED का पैसा और इंटेलिजेंस शैडो

नीदरलैंड्स का एक ‘ओपन सोर्स इन्वेस्टिगेशन’ ग्रुप माना जाता है बेलिंगकैट। इसकी रूस, सीरिया जैसे देशों में काम करने को लेकर वेस्टर्न मीडिया ने तारीफ़ की है। यह OpIndia-CSDS स्टडी में बताए गए नेटवर्क का एक ज़रूरी हिस्सा है।
पब्लिक रिकॉर्ड के मुताबिक, बेलिंगकैट को नेशनल एंडोमेंट फॉर डेमोक्रेसी (NED) से डोनेशन मिला है। यह एक US कॉन्ग्रेस फंडिंग संगठन है, जिसे खास तौर पर उन संगठन की मदद के लिए बनाया गया है, जो विदेशों में US के हितों को बढ़ावा देते हैं। इसके अलावा, इसे कई पश्चिमी सरकार से जुड़े संस्थानों से फंडिंग मिलती है। खासकर यूरोपियन और ब्रिटिश सोर्स से।
यहाँ तक ​​कि इनके प्रति हमदर्दी रखने वाले सोर्स भी मानते हैं कि इस तरह की फंडिंग अक्सर उन स्टडीज़ को बढ़ावा देने के लिए दी जाती है, जो पश्चिम की विदेश नीति के हिसाब से हों, जैसे- रूस में सेना की मूवमेंट को ट्रैक करना या सीरिया में केमिकल हथियारों के आरोप। ये आरोप आसानी से NATO की बातों से मेल खाते हैं।
इसलिए, क्रिटिकल ऑब्ज़र्वर NED को US विदेश नीति के लिए एक ‘फ्रंट’ मानते हैं, जिसे खुले तौर पर वही करने के लिए बनाया गया था, जो CIA कभी चुपके से करती थी। बेलिंगकैट उस इकोसिस्टम का हिस्सा है, जो पश्चिमी स्ट्रेटेजिक मैसेजिंग के लिए फायदेमंद जानकारी के फ्लो को बढ़ाता और ढोता है। बेलिंगकैट पर रूसी सरकार और दूसरों ने सीधे तौर पर पश्चिमी इंटेलिजेंस का पिछलग्गू होने का आरोप लगाया है। इन देशों ने ऐसे उदाहरण भी दिए हैं।
ग्लोबल इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म नेटवर्क (GIJN), OCCRP, फॉरबिडन स्टोरीज, इंटरन्यूज, ICIJ, DRFLab, फ्रीडम हाउस, NED, और दूसरे संगठन जिन्हें पश्चिमी सरकारों, सोरोस के ओपन सोसाइटी फाउंडेशन, ओमिडयार नेटवर्क, फोर्ड फाउंडेशन और इसी तरह के दूसरे लोगों से फंडिंग मिलती है।
ये सभी जानकारी OpIndia–CSDS पेपर में शामिल हैं। विदेशी फंडेड स्टोरी को ‘इंडिपेंडेंट इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म’ की आड़ में चलाया जाता है। इसकी वजह ये भी है कि उनमें से कई भारतीय मीडिया आउटलेट्स और एक्टिविस्ट्स के साथ मिलकर काम किया गया होता है, जो मोदी सरकार और हिंदुत्व के सख्त खिलाफ हैं।
इस तरह, बेलिंगकैट उस बड़े इकोसिस्टम के लिए एक मॉडल का काम करता है। यह एक ऑफिशियली मान्यता प्राप्त गैर सरकारी संगठन है। यह काफी हद तक वेस्टर्न सिक्योरिटी और फॉरेन पॉलिसी एजेंडा के हिसाब से है। इसे अक्सर वही वेस्टर्न मीडिया आउटलेट्स निष्पक्ष जानकारी वाले सोर्स के तौर पर पेश करते हैं। साथ ही इसे फंड करते हैं।

RSF का सीरियाई मीडिया प्रोजेक्ट्स और नैरेटिव

ऑपइंडिया रिपोर्ट में सीरिया केस स्टडी दिखाती है कि कैसे RSF जैसे संगठन विवादित क्षेत्रों में वेस्टर्न देशों के साथ मिलकर काम करते हैं। दस्तावेज के मुताबिक, कैनाल फ्रांस इंटरनेशनल (CFI), एक फ्रेंच मीडिया-सपोर्ट संगठन है, जिसे फ्रेंच फॉरेन मिनिस्ट्री का सपोर्ट है।
यह रेडियो रोज़ाना को फंडिंग देता है। यह एक सीरियाई चैनल है, जिसे RSF ने ‘इंडिपेंडेंट’ बताया। डेनमार्क, स्वीडन और नॉर्वे की सरकारें इंटरनेशनल मीडिया सपोर्ट के लिए फंडिंग देती हैं। RSF खुद दूसरे वेस्टर्न डोनर्स के साथ मिलकर फंडिंग करता है।
रेडियो रोज़ाना ने आरा पैसिस इनिशिएटिव के ‘सीरियाज़ा’ नैरेटिव प्रोजेक्ट के साथ मिलकर काम किया है। इसे खास तौर पर इटैलियन फॉरेन मिनिस्ट्री ने फंड किया था और इटैलियन सरकार और प्रेसिडेंसी के समर्थन में ऑपरेट किया गया था।
सीरिया में और उसके बारे में लोगों की राय को प्रभावित करने के लिए ‘नैरेटिव’ और ‘स्टोरीटेलिंग’ बनाने का जिक्र प्रोजेक्ट में किया गया है।
जब इसे पूरा देखा जाए, तो यह एक मॉडल दिखाता है। पश्चिमी सरकारें RSF और CFI जैसे बिचौलियों के जरिए मीडिया आउटलेट्स को फाइनेंस करती हैं, फिर उन पत्रकारों के लिए कंटेंट और ‘कैपेसिटी बिल्डिंग’ करती हैं, जिनका काम उनके नेरेटिव से मेल खाता है।
आम तौर पर इसमें ‘टारगेट की गई सरकार’ और ‘तानाशाह शासक’ होते हैं, जबकि पश्चिमी देशों के समर्थन वाली विपक्षी ताकतें डेमोक्रेट होती हैं।
ऐसे देशों में RSF ‘प्रेस की आज़ादी’ की घोषणा करता है, तो वह असल में उन जानकारियों का मूल्यांकन कर रहा होता है, जहाँ डोनर का हित हो।

भारत में काम करने वाला नेटवर्क: CSDS, KAS, RSF और GIJN

OpIndia रिसर्च से पता चलता है कि RSF का भारत के एक बड़ा नेटवर्क है। ये कई संस्थानों को फंडिंग करती है और उसकी पार्टनर है या विचारधारा को शेयर करती हैं।
*पेपर में कहा गया है कि दिल्ली का थिंक टैंक कहलाने वाला CSDS और उसका प्रोग्राम अक्सर पश्चिमी संगठनों और सरकार से जुड़े डोनर्स के साथ मिलकर ‘हिंदू बहुसंख्यकवाद,’ दलित-मुस्लिम जुड़ाव और जाति विभाजन की बातों को सिस्टमैटिक तरीके से बढ़ाता है।
*कोनराड एडेनॉयर स्टिफ्टंग (KAS) एक जर्मन फाउंडेशन है जो CDU से राजनीतिक तौर पर जुड़ा हुआ है। यह लगभग पूरी तरह से जर्मन पब्लिक फंड से स्पॉन्सर है और इसने 2016 से CSDS को ₹2.6 करोड़ से ज़्यादा की ‘सहायता’ दी। यह एक खास ‘मीडिया प्रोग्राम एशिया’ भी चलाता है जो युवाओं और इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज़्म पर केन्द्रित है।
*’अनकवरिंग एशिया’ इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज़्म कॉन्फ्रेंस के स्पॉन्सर GIJN, OCCRP, फोर्ड फाउंडेशन, ओपन सोसाइटी फाउंडेशन, ओक फाउंडेशन समेत कई थे। इसमें शामिल होने वाले भारतीय लोगों में वे पत्रकार और मीडिया आउटलेट थे, जो लगातार मोदी सरकार और हिंदुत्व की बुराई करते रहे हैं।
स्टडी के मुताबिक, RSF इस वेब के लिए एक अच्छा सोर्स है। इंटरनेशनल इन्वेस्टिगेटिव नेटवर्क एक-दूसरे के काम को क्रॉस-प्रमोट करते हैं। इंटरनेशनल डोनर्स इनकी फंडिंग के लिए एक ही पूल का इस्तेमाल करते हैं। CSDS इंडियन मीडिया के पतन पर RSF का रेफरेंस देता है, और RSF वेस्टर्न-फंडेड इंडियन आउटलेट्स के नैरेटिव्स पर निर्भर रहता है।
इनका एक छोटा सा सर्किट है, जिसमें वेस्टर्न-फंडेड संगठन प्रश्नावली तैयार करते हैं। स्टोरी गढ़ते हैं, डेटा को एनालाइज करते हैं, और फिर एक-दूसरे को रैंकिंग और रिवॉर्ड देते हैं। इनका इस्तेमाल घरेलू पॉलिटिकल डिस्कशन और इंटरनेशनल डिप्लोमेसी दोनों में हथियार के तौर पर किया जाता है।

नैरेटिव इम्पैक्ट: नेशनलिस्ट इंडिया को गलत साबित करना

मुद्दा यह नहीं है कि RSF इंडिया की आलोचना करता है, बल्कि यह लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को कमज़ोर करता है। इसके लिए वह मुश्किल मीडिया इकोसिस्टम को ‘साहसी लिबरल जर्नलिस्ट्स’ और ‘अथॉरिटेरियन हिंदू नेशनलिस्ट्स’ के बीच एक मोरैलिटी प्ले में बदल देता है।
यह उन जर्नलिस्ट्स के खिलाफ धमकियों और हिंसा के कामों को नजरअंदाज करता है या उसे कम करके आँकता है, जिन्हें राष्ट्रवादी, हिंदुत्व समर्थक या ग्लोबल लिबरल नैरेटिव्स की आलोचना करने वाला माना जाता है।
इसे वही वेस्टर्न मीडिया भी बढ़ावा देता है। किसान आंदोलन, CAA, कश्मीर और ‘ अल्पसंख्यकों पर ज़ुल्म’ जैसे टॉपिक पर भारत की आलोचना करता है और अक्सर RSF, फ्रीडम हाउस और ऐसे ही दूसरे इंडेक्स को आधार बनाकर ‘लोकतंत्र कमजोर’ होने की दुहाई देता है।
यह सिर्फ एक चर्चा नहीं है, जैसा कि OpIndia-CSDS रिपोर्ट में बताया गया है। जब इंडेक्स दिखाते हैं कि भारत तानाशाही की ओर बढ़ रहा है, तो इसे सही ठहराना आसान हो जाता है।
1.भारतीय कानूनों और नीतियों का विरोध करने वाले एक्टिविस्ट नेटवर्क और गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) के लिए विदेशी फंडिंग में बढ़ोतरी।
2.इंटरनेशनल फोरम पर, डिप्लोमैटिक दबाव और ‘नाम लेकर शर्मिंदा करना’।
3.भारत की इंटरनेशनल इमेज को जानबूझकर कमजोर करने की कोशिशें, खासकर तब जब नई दिल्ली रूस, चीन, क्लाइमेट या व्यापार के मुद्दे पर अलग स्टेंड लेती है और पश्चिमी देशों के रुख को चुनौती देती है। US-EU अलायंस के संबंध में स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी का दावा करती है।
दूसरे शब्दों में कहें तो, भारत पर RSF की कवरेज असल में एक ‘जियोपॉलिटिकल’ टूल है। यह भारत को एक कट्टर, गैर-उदारवादी , बहुसंख्यक देश के रूप में दिखाने की कोशिश करता है, जिसे लगातार पश्चिमी गाइडेंस और ‘सिविल सोसाइटी करेक्शन’ की जरूरत है।
जब इन बातों को एक चश्मे से देखा जाता है, तो एक अलग पैटर्न नजर आता है। पश्चिमी सरकारी संस्थाएँ और NED जैसे US-स्टाइल डेमोक्रेसी को बढ़ावा देने वाले संगठन और शासन परिवर्तन से जुड़े बड़े फाउंडेशन RSF की ज्यादातर फंडिंग को बढ़ावा देते हैं।
OpIndia–CSDS स्टडी RSF को एक बड़े नेटवर्क में रखती है, जिसमें CSDS, KAS, IDRC, सोरोस से जुड़े फ़ाउंडेशन, और भारतीय एक्टिविस्ट या पत्रकार ग्रुप शामिल हैं। ये सभी संगठन एक ही लक्ष्य के लिए काम कर रहे हैं, जो है हिंदू पहचान, भारतीय लोकतंत्र और राष्ट्रवादी राजनीति के बारे में लगातार खराब खबरें फैलाना।
एक राष्ट्रवादी भारतीय नजरिए से, RSF प्रेस की आज़ादी का एक निष्पक्ष रखवाला कम और एक ट्रांसनेशनल स्टोरी फैलाने वाले सिस्टम का एक जरूरी हिस्सा है। इसके रिसोर्स, पार्टनरशिप और प्रोडक्ट लगातार भारत की चुनी हुई सरकार और सभ्यता के खिलाफ काम करते हैं।

क्या राहुल की न्यूजलॉन्ड्री और ThinkTank ही कांग्रेस को तबाह-बर्बाद करने की कमर कस चुकी है? राहुल गाँधी ने ‘वोट चोरी’ के प्रेजेंटेशन में दिखाई न्यूजलॉन्ड्री की प्रोपेगेंडा रिपोर्ट, लिखने वाले हिंदू-विरोधी विशाल वैभव और सुमेधा मित्तल

राहुल गाँधी 'वोट चोरी' प्रोपेगेंडा
सनातन के गुरु स्वामी विवेकानन्द का कहना था कि हर बुराई में अच्छाई छिपी होती है। इस कड़वे सच को कोई झुठला नहीं सकता। "विनाश काले विपरीत बुद्धि" LoP बने राहुल गाँधी जिस तरह Newslaundry और जॉर्ज सोरोस के पटकथा पर काम कर रहे हैं, निश्चितरूप से कांग्रेस की पतन की बहुत तेजी से बढ़ रही है। वैसे कांग्रेस के पतन की भविष्यवाणी 7 नवम्बर 1966 को पार्लियामेंट स्ट्रीट पर आचार्य कृपालु महाराज कर दी गयी थी। जब गो-हत्या का विरोध कर रहे निहत्ते साधु समाज से खून की होली खेलते हुए पूरी पार्लियामेंट स्ट्रीट साधुओं की लाशों और लहू से पट गयी थी। तब आचार्य कृपालु जी ने हुंकार भरी थी कि "इन्दिरा तेरी पार्टी को बर्बाद करने हिमालय से आधुनिक ड्रेस में एक तपस्वी आएगा", इस बात को मेरी आयु के सियासत से लेकर पत्रकारिता से जुड़े लोग भूले नहीं होंगे। परिणाम सामने है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के विरोध में कांग्रेस और विपक्ष देश विरोध कर अपने पतन की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं।  
इतना ही नहीं, तब एक महान आत्मा यानि श्रद्धेय साधु ने पार्लियामेंट स्ट्रीट पर ही भूख हड़ताल कर अपने प्राण दे दिए, लेकिन कांग्रेस गुलाम किसी भी मीडिया ने इस दुखद समाचार को प्रकाशित नहीं किया। खैर, कांग्रेस के पतन की पटकथा 1966 में ही पार्लियामेंट स्ट्रीट पर लिख दी गयी थी।      

कांग्रेस पार्टी चुनाव आयोग पर बेबुनियाद ‘वोट चोरी’ के आरोप लगाकर उसे ‘मुद्दा’ बनाने की कोशिश करती है, जबकि उसके समर्थक प्रोपेगेंडा चैनल अपने राजनीतिक आकाओं के दावों को ‘विश्वसनीय’ बताते हुए झूठे तथ्यों का प्रचार-प्रसार करते हैं।

पत्रकार विजय पटेल ने इस सांठगांठ को उजागर करते हुए सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर हाल ही में पोस्ट डाला है। इसमें बताया गया है कि कैसे राहुल गाँधी और कांग्रेस का ‘वोट चोरी‘ प्रचार अभियान भारत की लोकतांत्रिक संस्थाओं को कमजोर कर रहा है और हिन्दू विरोधियों के हाथों में इसकी डोर है।

कांग्रेस सांसद राहुल गाँधी की 7 अगस्त को हुई प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिखाई गई ‘वोट चोरी’ पावरपॉइंट प्रेजेंटेशन पहले ही सवालों के घेरे में आ चुकी है, लेकिन हालिया खुलासे चुनावी धोखाधड़ी के उनके दावों को और कमजोर कर देते हैं। गाँधी को न केवल ‘वोट चोरी’ प्रेजेंटेशन के कारण, बल्कि वामपंथी प्रचारक न्यूज़लॉन्ड्री में प्रकाशित हिटजॉब्स पर उनकी निर्भरता के कारण भी आलोचना का सामना करना पड़ रहा है।

ये प्रोपेगैंडा लेख कट्टर हिंदू-विरोधी लोगों द्वारा लिखे गए हैं। इनमें से एक की पहचान विशाल वैभव के रूप में हुई है। ये लोग चुनाव आयोग के खिलाफ साजिश कर रहे हैं।

विवादास्पद पीपीटी के चौथे पेज पर, राहुल गाँधी ने दावा किया, “महाराष्ट्र के नतीजों ने बड़े पैमाने पर वोट चोरी के हमारे संदेह की पुष्टि की है।” पीपीटी में न्यूज़लॉन्ड्री की एक रिपोर्ट का हवाला दिया गया है। विशाल वैभव और सुमेधा मित्तल द्वारा लिखी गई इस रिपोर्ट का शीर्षक है, “नए मतदाताओं की बाढ़? कामठी का अजीबोगरीब मामला, जहाँ महाराष्ट्र भाजपा प्रमुख जीते।”

चुनाव आयोग की ईमानदारी पर सवाल उठाने के लिए न्यूज़लॉन्ड्री के प्रचार लेखों का सहारा लेना, उनके ‘वोट चोरी’ के दावों की विश्वसनीयता को दर्शाता है। हालाँकि यह बात सामने आई है कि न्यूज़लॉन्ड्री के पत्रकार विशाल वैभव हिंदू विरोधी हैं, जो वैचारिक मतभेदों को लेकर हिंदू समर्थक सोशल मीडिया यूजर्स पर ‘गौमूत्र’, ‘cowf&kers’ और ‘D%kless Hindutva’ जैसे तंज कसते हैं।

न्यूज़लॉन्ड्री पर ऑथर पेज के अनुसार, विशाल वैभव आईआईटी-दिल्ली में भौतिकी के पूर्व प्रोफेसर हैं। हालाँकि एक्स अकाउंट ‘@panchagavyag’, जो पहले ‘@vvaibhav_iid’ था, अब मौजूद नहीं है। इसमें हिंदू-विरोधी पोस्ट के स्क्रीनशॉट ऑनलाइन दिख जाएँगे।

शायद, न्यूज़लॉन्ड्री के प्रोपेगैंडा फैक्ट्री का हिस्सा बनने के लिए हिंदुओं को ‘गाली देना’ अनिवार्य पात्रता है। राहुल गाँधी ने अपनी वोट चोरी वाले पीपीटी में जिस न्यूज़लॉन्ड्री रिपोर्टर की सह-लेखिका सुमेधा मित्तल की बात की, अब उसके बारे में बात करते हैं। उसका कांग्रेस पार्टी से पुराना नाता रहा है। सुमेधा मित्तल के लिंक्डइन पेज के अनुसार, उन्होंने कुछ समय के लिए सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (CPR) नामक एक थिंक टैंक में काम किया था। इस थिंक टैंक की ऑनर और संचालक विवादास्पद कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर की बेटी यामिनी अय्यर है।

ऑपइंडिया ने पहले बताया था कि कैसे सीपीआर विदेशी फंडिंग मानदंडों के उल्लंघन के लिए जाँच के घेरे में रहा है और केंद्र सरकार ने इसका लाइसेंस निलंबित कर दिया था। सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च पर सितंबर 2022 में आयकर छापे पड़े थे। जुलाई 2023 में अय्यर के सीपीआर को टैक्स छूट मिलना भी बंद हो गया।

मित्तल इंडियास्पेंड (IndiaSpend) पोर्टल के साथ काम कर चुके हैं। इंडियास्पेंड कांग्रेस पार्टी की वैचारिक विचारधारा से सबसे ज़्यादा जुड़ा हुआ है। इसके अलावा, कांग्रेस पार्टी के डेटा एनालिटिक्स विभाग के प्रमुख प्रवीण चक्रवर्ती इंडियास्पेंड के संस्थापक ट्रस्टी हैं। हालाँकि, इंडियास्पेंड की वेबसाइट में उनका नाम नहीं है। ऑपइंडिया ने कई मौकों पर इंडियास्पेंड के हिंदू-विरोधी और भारत-विरोधी झूठों का पर्दाफ़ाश किया है। इंडियास्पेंड ने पहले भी अपने डेटाबेस में मुस्लिम पीड़ितों की संख्या बढ़ाने के लिए तथ्यों को गलत तरीके से पेश किया। कई मामलों में ऐसा देखा गया है।

न्यूज़लॉन्ड्री की वरिष्ठ रिपोर्टर सुमेधा मित्तल ने द वायर और द कारवां जैसे भाजपा-विरोधी और इस्लाम-समर्थक प्रोपोगेंडा आउटलेट्स में भी काम किया है।

दिलचस्प बात यह है कि नवंबर 2021 से सितंबर 2022 के बीच, सुमेधा मित्तल ने मोदी विरोधी और कुख्यात शासन विरोधी जॉर्ज सोरोस की क्राइम एंड करप्शन रिपोर्टिंग प्रोजेक्ट (OCCRP) में काम किया। OCCRP को अमेरिकी विदेश विभाग और अब भंग हो चुकी अमेरिकी अंतर्राष्ट्रीय विकास एजेंसी (USAID) से भारी मात्रा में धन प्राप्त हुआ। OCCRP को जॉर्ज सोरोस के ओपन सोसाइटी फ़ाउंडेशन (OSF), फ़ोर्ड फ़ाउंडेशन और रॉकफ़ेलर ब्रदर्स फ़ाउंडेशन जैसी संस्थाओं से आर्थिक मदद मिलती है।

यह भी ध्यान देने योग्य है कि OCCRP ने व्यवसायी गौतम अडानी और सेबी के खिलाफ़ हिटजॉब्स प्रकाशित किए थे। OCCRP भारतीय लोकतंत्र को कमज़ोर करने के लिए बार-बार दुष्प्रचार भी करता रहा है। भारत में ‘वोट चोरी’, म्यांमार में डेटा संकलन, झूठ और भ्रामक सूचनाओं को ‘ज़बरदस्त’ खुलासे के रूप में प्रस्तुत किया गया

कांग्रेस पार्टी राहुल गाँधी की ‘वोट चोरी’ पीपीटी के साथ एक बड़ा राजनीतिक तूफान खड़ा करने की कोशिश कर रही थी। इस बीच से बात सामने आयी कि ये दस्तावेज म्यांमार में तैयार किए गए थे। ‘वोट चोरी’ वेबसाइट पर अपलोड की गई पीडीएफ फाइलों के मेटाडेटा विश्लेषण से पता चला कि राहुल गाँधी की प्रस्तुति के तीनों संस्करण म्यांमार मानक समय (एमएमटी) में बनाए गए हैं। कांग्रेस नेताओं और आईटी सेल ने इन आरोपों को हालाँकि खारिज किया, लेकिन संतोषजनक जवाब नहीं दे पाए।

चुनाव आयोग की ईमानदारी पर संदेह जताने के लिए कांग्रेस ने न्यूज़लॉन्ड्री के लेखों का सहारा लेना, अपने आप में उनके ‘वोट चोरी’ के दावों की विश्वसनीयता पर संदेह पैदा करता है। हालाँकि, यह सामने आया है कि न्यूज़लॉन्ड्री के लेखक, विशाल वैभव, एक कट्टर हिंदू विरोधी रहे हैं, जो वैचारिक मतभेदों को लेकर हिंदू समर्थक सोशल मीडिया उपयोगकर्ताओं पर ‘गौमूत्र’, ‘गाय-बकरियों’ और ‘गधा हिंदुत्व’ जैसे व्यंग्य करते रहते हैं। न्यूज़लॉन्ड्री पर उनके लेखक पृष्ठ के अनुसार, विशाल वैभव आईआईटी-दिल्ली में भौतिकी के पूर्व प्रोफेसर हैं। हालाँकि X अकाउंट ‘@panchagavyag’, जो पहले ‘@vvaibhav_iid’ था, अब “मौजूद नहीं है”, लेकिन उनके बेहद विक्षिप्त और हिंदू-विरोधी पोस्ट के स्क्रीनशॉट ऑनलाइन सामने आए हैं।

राहुल गाँधी द्वारा अपने वोट चोरी पीपीटी में उद्धृत न्यूज़लॉन्ड्री रिपोर्ट्स की सह-लेखिका सुमेधा मित्तल की बात करें तो उनका न केवल एक वैचारिक पूर्वाग्रह है, बल्कि कांग्रेस पार्टी से उनका पुराना संबंध भी है।

सुमेधा मित्तल के लिंक्डइन पेज के अनुसार, उन्होंने कुछ समय के लिए सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (सीपीआर) नामक एक थिंक टैंक में काम किया था। इस थिंक टैंक का स्वामित्व और संचालन विवादास्पद कांग्रेस नेता मणिशंकर अय्यर की बेटी यामिनी अय्यर के पास है। सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च सितंबर 2022 में आयकर छापों का विषय रहा है। जुलाई 2023 में अय्यर के थिंक टैंक की कर छूट की स्थिति भी रद्द कर दी गई थी। मित्तल ने द वायर और द कारवां जैसे भाजपा विरोधी और इस्लाम समर्थक प्रचार आउटलेट में भी योगदान दिया है।

राहुल गाँधी की वोट चोरी के दस्तावेजों का म्यांमार में तैयार किया जाना आश्चर्यजनक नहीं है, क्योंकि उनका करियर विदेशी ताकतों की संलिप्तता से जुड़े विवादों में घिरा रहा है। चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के साथ समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर, रहस्यमयी विदेश यात्राएँ, विदेशी अधिकारियों के साथ गुप्त बैठकें, कज़ाकिस्तान, रूस और इंडोनेशिया के रोबोट द्वारा संचालित सोशल मीडिया प्रभाव अभियान, और भारत के आंतरिक मामलों में विदेशी हस्तक्षेप का आह्वान किया जाना, इसकी पुष्टि करते हैं।

22 पेज वाली वोट चोरी की इस पीपीटी में कांग्रेस पार्टी ‘हम हारे नहीं हैं, हमें हरा दिया गया है’ साबित करने की कोशिश करती रही। हालाँकि ऑपइंडिया ने बताया है कि कैसे चुनाव आयोग ने हर आरोप का खंडन किया, चाहे वह मतदाता पंजीकरण और मतदान प्रतिशत में वृद्धि हो, चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में गड़बड़ी हो, मतदान प्रक्रिया के सीसीटीवी फुटेज को नष्ट करना हो या राहुल गाँधी द्वारा लगाए गए डिजिटल मतदाता सूची को साझा करने से चुनाव आयोग का साफ इनकार हो।

दस्तावेज़ के पेज 8 पर, गाँधी ने यह आरोप लगाया है कि चुनाव आयोग कर्नाटक के महादेवपुरा निर्वाचन क्षेत्र के आँकड़ों को छिपा रहा है ताकि ‘वोट चोरी’ का पता नहीं चल पाए, लेकिन उनकी टीम ने बड़ी मेहनत से इसकी जाँच की है। हालाँकि, चुनाव आयोग के इस पेज में 30 एंट्री हैं और महादेवपुरा में मतदाताओं की कुल संख्या लगभग 6 लाख है। इसका सीधा अर्थ यह है कि गाँधी के दावों के विपरीत, लाखों नहीं, बल्कि केवल 20,000 पेज की जाँच की आवश्यकता थी। जाहिर है, आँकड़ों पर आधारित प्रचार में भी, कांग्रेस मेलोड्रामा का तड़का लगाना नहीं भूली।

यह दस्तावेज चुनिंदा मामलों से जुड़ा है, जिसमें प्रबंधन या तकनीकी समस्याएँ शामिल थीं और उन्हें ‘वोट चोरी’ के सबूत के रूप में पेश किया गया। कांग्रेस का मुस्लिम तुष्टिकरण और हिंदुओं की उपेक्षा का इतिहास रहा है। देश की सबसे पुरानी पार्टी अब सरासर झूठ और वैचारिक रूप से पक्षपातपूर्ण प्रचार करने वालों पर निर्भर है और तुच्छ राजनीतिक फायदे के लिए भारत के लोकतंत्र को कमजोर करने की कोशिश कर रही है।

सोरोस के हाथ बिकाऊ विपक्ष वोट चोरी पर कर रहा उपद्रव; CSDS का ट्वीट, राहुल का वोट चोरी राग और विपक्षी नैरेटिव- क्या यह महज संयोग है! उठ रही है कार्रवाई की मांग


2014 में केंद्र में मोदी सरकार बनते ही सारा विपक्ष INDI गंठबंधन भारत विरोधी विदेशियों के हाथ बिकाऊ या कहें देशभक्त बन फिरने वाले हकीकत में गुलाम बन देश में उपद्रव कर जनता को गुमराह करते आ रहे हैं। पहले भी कई बार लिखा जा चुका है कि 
INDI गंठबंधन International भिखारी है। भारत विरोधियों से मिली भीख पर देश में उपद्रव करते रहते हैं। अब जब संजय कुमार ने गलत आंकड़े देकर इतने दिन संसद भंग करवाकर रोज कर करोड़ों रूपए बर्बाद कर उपद्रव करने के आरोप पर केंद्र सरकार ही नहीं चुनाव आयोग को सख्त कानूनी कार्यवाही करनी चाहिए। दूसरे, निचली अदालत से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक को भारतीय का चोला ओढे इन जयचन्दों पर भी सख्ती से पेश आना चाहिए। वोट विश्लेषण में सिर्फ हिन्दुओं की जाति आधारित बखान किया जा जाता है लेकिन मुस्लिमों का नहीं कि अंसारी, शिया, सुन्नी, पठान, अहमदिया आदि अन्य मुस्लिम जातियों ने किस पार्टी को वोट दिया? यानि इन जयचन्दों को असली मकसद हिन्दुओं को ही जातियों में बाँटने की हिम्मत कर सकते हैं, लेकिन 
INDI गंठबंधन में किसी ने भी माँ का दूध नहीं पिया जो मुसलमानों का जाति आधारित विश्लेषण कर सके।  
      

 

 

चुनावी सर्वे और एग्जिट पोल के लिए चर्चित संस्था Centre for the Study of Developing Societies (CSDS- सीएसडीएस) एक बार फिर विवादों में है। मामला तब शुरू हुआ जब सीएसडीएस के प्रमुख संजय कुमार ने महाराष्ट्र चुनाव को लेकर चुनाव आयोग पर सवाल उठाते हुए एक ट्वीट किया, जिसे बाद में डिलीट कर दिया। लेकिन तब तक राहुल गांधी की कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने उसी ट्वीट को आधार बनाकर ‘वोट चोरी’ का नैरेटिव गढ़ दिया था। अब उसी नैरेटिव के आधार पर तमाम विपक्षी दल संसद से लेकर सड़क तक चुनाव आयोग के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी तो संसद से लेकर प्रेस कॉन्फ्रेंस और अब बिहार में वोटर अधिकार यात्रा तक चुनाव आयोग पर जमकर हमला बोल रहे हैं। राहुल चुनाव आयोग पर लगातार पक्षपाती रवैये का आरोप लगा रहे हैं। हाल ही में एक घंटे से ज्यादा चली प्रेस कॉन्फ्रेंस में उन्होंने प्रेजेंटेशन के जरिए दावा किया कि बीजेपी के लिए वोट ट्रांसफर कराए गए। आयोग पर वोट चोरी का आरोप लगाते हुए उन्होंने यहां तक कहा कि उनकी सरकार बनने पर आयोग से जुड़े लोगों से निपट लिया जाएगा।

दरअसल में सीएसडीएस ने कुछ दिन पहले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट डाल चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर सवाल उठाए थे। यह ट्वीट कुछ ही घंटों में वायरल हो गया। कांग्रेस और आप समेत कई विपक्षी नेताओं ने इस पोस्ट को जमकर शेयर किया और कहा कि “ईवीएम से वोट चुराए गए हैं”। लेकिन हैरानी की बात ये रही कि जब बवाल बढ़ा, तो संजय कुमार ने चुपचाप वह ट्वीट डिलीट कर दिया। सवाल उठता है अगर ट्वीट में दम था तो हटाया क्यों गया? और अगर वह तथ्यहीन था, तो फिर उसे जारी ही क्यों किया था? क्या संजय कुमार ने वो ट्वीट कांग्रेस को राजनीतिक फायदा पहुंचाने के लिए पोस्ट किया था?

अब जब सीएसडीएस प्रमुख ने ट्वीट डिलीट कर दिया है, तब लोग सोशल मीडिया पर उनपर कांग्रेस के साथ राजनीतिक मिलीभगत कर देश को अराजकता में झोंकने का आरोप लगा रहे हैं। सोशल मीडिया पर कई लोग कह रहे हैं कि यह सब एक सोची-समझी रणनीति थी। पहले CSDS की ‘रिसर्च’ के नाम पर नैरेटिव गढ़ो, फिर विपक्ष के जरिए उसे विस्तार दो। सोशल मीडिया पर संजय कुमार को जमकर लताड़ लग रही है। लोग सरकार से सीएसडीएस के खिलाफ कार्रवाई की मांग कर रहे हैं।

इस पूरे विवाद पर बीजेपी आईटी सेल प्रमुख अमित मालवीय ने सीधा हमला करते हुए कहा कि सीएसडीएस एक शोध संस्थान नहीं, बल्कि एजेंडा चलाने वाली संस्था है, जिसका मकसद समाज में जातीय दरारें फैलाकर राजनीतिक लाभ पहुंचाना है। सीएसडीएस का पूरा ध्यान हिंदू समाज की जातियों को बांटकर ओबीसी, दलित, सवर्ण जैसे वर्गों के वोट पैटर्न को उजागर करने पर रहता है, जबकि मुस्लिम समाज की भीतरी जातीय संरचना पर यह संस्था संपूर्ण चुप्पी साध लेती है।

उन्होंने आरोप लगाया कि CSDS को वर्षों से फोर्ड फाउंडेशन, आईडीआरसी और अन्य विदेशी एजेंसियों से फंडिंग मिलती रही है, जिनका इतिहास भारत में सामाजिक विघटन को बढ़ावा देने से जुड़ा रहा है। इसके अलावा, उन्होंने ये भी आरोप लगाया कि सीएसडीएस के सर्वे वैज्ञानिक पद्धति पर आधारित नहीं होते, फिर भी इन्हें “डेटा एनालिसिस” बताकर बड़े-बड़े मीडिया हाउसेज में छापा जाता है। बीते कुछ वर्षों में कई बार ऐसा हुआ है कि सीएसडीएस द्वारा चुनाव पूर्व या बाद में जारी किए गए अनुमान और विश्लेषण हकीकत से कोसों दूर निकले। लेकिन हर बार गलती मानने की बजाय यह कहा गया कि “राजनीतिक हवा आखिरी वक्त पर बदल गई।”

यह सिर्फ अनुमान की गलती नहीं है, बल्कि एक सुनियोजित एजेंडा है। “नतीजे जब कांग्रेस के पक्ष में हों, तो प्रचार करो; जब ना हों, तो ईवीएम और आयोग पर शक पैदा करो।”

अवलोकन करें:-

Fake Data देने वाले ने मांगी माफ़ी, राहुल कब मांगेगे? जो कल कह रहे थे- चुनाव आयोग ने पैर पर मारी कुल्हाड़
Fake Data देने वाले ने मांगी माफ़ी, राहुल कब मांगेगे? जो कल कह रहे थे- चुनाव आयोग ने पैर पर मारी कुल्हाड़
 

सीएसडीएस के पूर्व सहयोगी योगेंद्र यादव और वर्तमान प्रमुख संजय कुमार दोनों पर कांग्रेस के प्रति झुकाव के आरोप लग चुके हैं। अब जब CSDS का ट्वीट खुद विपक्षी रणनीति का हिस्सा बनता दिख रहा है, तो देश को यह जानने का हक है कि क्या ‘शोध’ की आड़ में समाज को तोड़ने का खेल खेला जा रहा है?

सोरोस से भीख आते ही आन्दोलनजीवी हरकत में : राहुल गाँधी-तेजस्वी यादव ने बिहार पर शुरू किया प्रोपेगेंडा, अब योगेंद्र यादव से लेकर ADR तक सारे ‘आंदोलनजीवी’ भी एक्टिव: जॉर्ज सोरोस के पैसों से चलता है ‘भारत को बदनाम करो’ का धंधा

                                                                                                                        साभार: Mint & FT
बिहार में होने वाले चुनावों में चुनाव आयोग द्वारा मतदाता को update करना क्या गलत है? दरअसल ये सब रोना इसलिए हो रहा है कि वोटर लिस्ट में डाले गए घुसपैठियों के वोट खोने से INDI गठबंधन के पेट में इतनी जबरदस्त मरोड़ होने लगी जो इन्हे रोटी खाना तो दूर सोने भी नहीं दे रही। घुसपैठियों को तो 
INDI गठबंधन अपना सरपरस्त मानता है, उसके लिए तो उल्टे भी खड़े होने को तैयार रहते हैं। कोई इनसे पूछे कि दुनिया में कोई एक देश बता दो जहाँ घुसपैठियों को वोट देने का अधिकार है। 

जॉर्ज सोरोस जो दुनिया में सरकारें गिराने में बदनाम है, उसकी मिली भीख पर विपक्ष उपद्रव कर रहा है। फिर कहते हैं संविधान की रक्षा करने इसे हाथ में लेकर चलते हैं। जब गली-कूचे से लेकर देश का हर शीर्ष नेता तक जानता है कि 2014 से लेकर वर्तमान बिहार उपद्रव INDI गठबंधन भीख में मिले धन की वजह से होते हैं, फिर क्यों नहीं हाथ में लठ लेकर इन आन्दोलनजीवियों से निपटा जाता। LoP राहुल ने इस पद की गरिमा को गटर में फेंक दिया है। 

दिल्ली में सत्ता परिवर्तन होते ही विधवा पेंशन घोटाला सामने आ गया। लानत तो उन 60,000 सुहागनों को है जिन्होंने टके की खातिर अपने जीवित सुहाग के रहते विधवा हो गयीं। विवाह के समय जब औरत की मांग में भरवा रही होती है, सामने अग्नि के आगे प्रार्थना करती है कि इसी तरह सिन्दूर भरी मांग चिता में भेजना। ऐसी लानत औरतों के DNA पर ही शंका होती है। यानि सियासतखोरों के इस गंदे खेल में जनता भी साथ देती है।           

बिहार में जल्द ही चुनाव होने वाले हैं। इसके लिए चुनाव आयोग ने अपनी तैयारियाँ चालू कर दी हैं। इसी कड़ी में चुनाव आयोग मतदाता सूची को सही कर रहा है। इस कदम का राहुल गाँधी, तेजस्वी यादव और पप्पू यादव समेत कई नेताओं ने विरोध करना चालू कर दिया है।

मतदाता सूची से अपात्र और अवैध लोगों को हटाने के फैसले को यह पूरा गुट ऐसे पेश कर रहा है जैसे यह उनके वोट काटने की साजिश हो। इस खेल में अब आंदोलनजीवी और चन्दाजीवी गैंग भी कूद गया है। उसने इस मामले को कोर्ट तक पहुँचा दिया है।

चुनावी प्रकिया को सुप्रीम कोर्ट में RJD, कॉन्ग्रेस, TMC की महुआ मोइत्रा और NGO एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स(ADR), पीपुल्स यूनियन फॉर सिविल लिबर्टीज और योगेन्द्र यादव जैसे आंदोलनजीवी लेकर पहुँचे हैं। उन्होंने इस प्रक्रिया को रोकने की माँग की है।

इस संबंध में दायर याचिकाओं की सुनवाई 10 जुलाई, 2025 को होनी है। बिहार चुनाव से पहले मतदाताओं के नाम जोड़ने और हटाने से जुड़ी इस प्रक्रिया को मुद्दा बनाने की शुरुआत राहुल गाँधी और तेजस्वी यादव जैसे विपक्षी नेताओं ने की थी।

NRC-CAA जैसा प्रोपेगेंडा खड़ा करने का हो रहा प्रयास

विपक्षी नेताओं के प्रोपेगेंडा को आगे ले जाने का बीड़ा अब इन संस्थाओं ने उठाया है। इनमें NGO, आंदोलनजीवी और एक्टिविस्ट टाइप जमात शामिल है। यह सब तब हो रहा है जब चुनाव आयोग इस मामले पर सभी शंकाएँ दूर कर चुका है और प्रक्रिया अभी भी सुचारू ढंग से चल रही है।

चुनाव आयोग ने मतदाताओं को अपने दस्तावेज देने के लिए 25 जुलाई, 2025 तक का समय भी दे रखा है। इसके लिए मतदाताओं को जागरूक भी किया जा चुका है। चुनाव आयोग ने खुद बताया है कि वह अब तक 2.88 करोड़ से अधिक मतदाताओं का सत्यापन कर चुका है। यह बिहार में कुल मतदाताओं का 38% है।

इस सबके बावजूद भी पूरी प्रक्रिया को कोर्ट में ले जाना दिखा रहा है कि इस पर विपक्ष और NGO-आंदोलनजीवी गैंग NRC-CAA जैसा बवाल खड़ा करना चाहते हैं। इसे भी मुस्लिम विरोधी कदम करार दिए जाने का प्रयास किया जा रहा है ताकि मजहबी आधार पर ध्रुवीकरण किया जा सके।

NGO-आंदोलनजीवी बस मुखौटा भर

इस काम के लिए यह NGO और आंदोलनजीवी गैंग मुखौटा बना है। सुप्रीम कोर्ट में याचिका ले जाने वाले यह गैंग पहले भी चुनावी प्रक्रिया पर अड़ंगे लगाते रहे हैं और इनका इतिहास मोदी सरकार के विरोध का रहा है। इस मामले में याचिका लगाने वाला एक NGO तो जॉर्ज सोरोस से फंडिंग लेता है।

सुप्रीम कोर्ट में बिहार में चुनाव आयोग के कदमों के खिलाफ याचिका लगाने वाला ADR इससे पहले चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर भी अड़ंगा लगा चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए मोदी सरकार से कानून बनाने को कहा था, जब तक क़ानून ना बने, तब तक एक समिति बनाई थी, जिसमे प्रधानमंत्री और नेता विपक्ष को रखा था।

इस समिति में CJI भी रखे गए थे। यह व्यवस्था तब तक ही चलनी थी जब तक सरकार कानून ना बना दे। मोदी सरकार ने इस पर कानून बनाया था और CJI को इसमें नहीं रखा था। इसके खिलाफ ADR याचिका लेकर पहुँच गया था। गौरतलब है कि यह कानून और सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले चुनाव आयुक्त की नियुक्ति पूरी तरह से सरकार के पास थी।

इसकी मदद भी प्रशांत भूषण जैसे वकील करते आए हैं, जिनका काम ही एजेंडा चलाना है। प्रशांत भूषण पर दिल्ली दंगों से पहले हुई बैठक आयोजित करने का आरोप है। प्रशांत भूषण लगातार देश विरोध में खड़े देखे जाते हैं।

जॉर्ज सोरोस से है याचिका डालने वाले NGO का लिंक

बिहार में चुनाव आयोग की प्रक्रिया के खिलाफ याचिका डालने वाले NGO का लिंक जॉर्ज सोरोस से भी है। ADR असल में एक ऐसा NGO है जिसके पास FCRA लाइसेंस है। इसने लगातार मोदी सरकार को निशाने पर लिया है।

ADR को चुनावी और ‘राजनीतिक सुधार’ और ‘चुनावी निगरानी’ के लिए फोर्ड फाउंडेशन, गूगल, हिवोस और ओमदियार नेटवर्क से बड़ी मात्रा में धन प्राप्त होता है। हिवोस संगठन जॉर्ज सोरोस के ओपन सोसाइटी फाउंडेशन से जुड़ा हुआ है और विभिन्न सरकारों से पैसा पाता है।

HIVOS की 2018 की वार्षिक रिपोर्ट में बताया गया है कि यह डच विदेश मंत्रालय, ग्लोबल फंड, स्वीडिश इंटरनेशनल डेवलपमेंट एड, मिलेनियम चैलेंज अकाउंट, द स्विस एजेंसी फॉर डेवलपमेंट एंड कोऑपरेशन, अमेरिकी विदेश मंत्रालय और बाकी जगहों से पैसा लेता है।

इसी रिपोर्ट में बताया गया है कि कि उसकी कमाई के प्रमुख जरिए में फोर्ड फाउंडेशन भी था। ADR सीधे तौर पर फोर्ड फाउंडेशन और ओमदियार नेटवर्क से पैसे लेता रहा है। उसने
2016-2017 में फोर्ड फाउंडेशन से ₹70 लाख और और ओमदियार नेटवर्क से ₹2 करोड़ मिले हैं।

इसके अलावा वर्ष 2017-18 ने ADR को फोर्ड फाउंडेशन से ₹2 करोड़ मिले हैं। 2018-19 में भी ADR को फोर्ड फाउंडेशन से ₹60 लाख से अधिक मिला। वित्त वर्ष 2020-21 में भी ADR को ओमदियार नेटवर्क से ₹1.13 करोड़ मिले।

ADR को पैसा देने वाले उस द वायर को भी पैसा देते हैं जो फर्जी खबरें गढ़ता है। अब यही ADR बिहार चुनाव के मामले में कूद गया है और एक कहानी गढ़ना चाह रहा है। जॉर्ज सोरोस से जुड़े संगठन से पैसा लेता था। यही जॉर्ज सोरोस भारत में मोदी सरकार को कमजोर करने की बात कर रहा था।

जहाँ एक ओर ADR कोर्ट में इस मामले को फँसा रही है तो वहीं राहुल गाँधी 9 जुलाई, 2025 को चुनाव आयोग की प्रक्रिया के विरुद्ध बिहार जा रहे हैं।

भाजपा यह भी आरोप लगा चुका है कि सोनिया गाँधी का लिंक भी उस संस्थान से है जो जॉर्ज सोरोस से फंडिंग लेता है। जॉर्ज सोरोस का लम्बे समय से प्रयास भारत में अस्थिरता पैदा करने का रहा है। इस बार उसने यह दाँव बिहार चुनाव पर लगाया है। बिहार इसलिए क्योंकि यहाँ के चुनाव देश की राजनीति पर असर डालते हैं।

क्या बिहार में हार का विपक्ष ने खोज लिया बहाना?

बिहार में यदि NDA चुनाव हारती है तो इसका असर सीधे तौर पर केन्द्र सरकार पर पड़ेगा। केन्द्र सरकार में JDU बड़ी सहयोगी। चुनावी लिस्ट को लेकर हो रही हुआ-हुआ उससे ही संबधित दिखाई पड़ती है। ADR, योगेन्द्र यादव जैसे एक्टिविस्ट और राहुल गाँधी मतदाता लिस्ट का मुद्दा तब उठा रहे हैं जब चुनाव आयोग सब जानकारियाँ स्पष्ट कर चुका है।

राहुल गाँधी इससे पहले महाराष्ट्र चुनाव पर भी भ्रम की स्थिति बनाने का प्रयास कर चुके हैं। राहुल गाँधी ने यह प्रयास तब चालू किए हैं जब उनको विश्वास हो गया है कि मृतप्राय हो चुकी उनकी पार्टी सीधे तौर पर भाजपा से मुकाबला नहीं कर सकती। अब उन्होंने चुनाव और चुनावी प्रक्रिया को निशाना बनाना चालू किया है।

बिहार में वोटर लिस्ट का विरोध करना उसी कड़ी का हिस्सा है। पहले राहुल गाँधी का चुनावी रोना सिर्फ EVM मशीनों तक सीमित था, लेकिन अब यह बढ़ कर वोटर लिस्ट और कुछ दिनों में इससे भी आगे पहुँचेगा, ऐसा लगता है।

कांग्रेस MP गौरव गोगोई की अंग्रेज बीवी का ISI कनेक्शन? असम मुख्यमंत्री की पोस्ट से छिड़ी बहस, दावा- जो लेते हैं जॉर्ज सोरोस से पैसा उनसे भी जुड़ा है कांग्रेस सांसद का NGO

                             असम मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमाने बिना नाम लिए गौरव गोगोई पर प्रश्न उठाए 
असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा ने कांग्रेस नेता गौरव गोगोई पर बड़ा हमला किया है। उन्होंने कांग्रेस सांसद का नाम लिए बिना उनकी पत्नी की नागरिकता और उनके ISI से सम्बन्धों के आरोप लेकर भी बात की है। उन्होंने इससे उठे प्रश्नों का जवाब माँगा है।

एक्स(पहले ट्विटर) पर असम मुख्यमंत्री ने लिखा, “ISI से संबंधों के आरोप, युवाओं के ब्रेनवॉश और उनको पाकिस्तानी दूतावास में कट्टरपंथी बनाने समेत पिछले 12 साल से भारतीय नागरिकता ना लेने पर उठे सवालों का जवाब दिया जाना चाहिए। इसके अलावा, धर्मांतरण कार्टेल से जुड़ा होना और देश की सुरक्षा को अस्थिर करने के लिए जॉर्ज सोरोस समेत पैसा लेना ऐसी चिंताएँ हैं, जिन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता है।”

जहाँ हिमंत बिस्वा सरमा ने किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन यह साफ है कि वह कांग्रेस सांसद गौरव गोगोई और उनकी पत्नी एलिजाबेथ कोलबर्न के बारे में बात कर रहे थे। दोनों की शादी 2013 में हुई थी। 12 साल बाद भी कोलबर्न ने अपना ब्रिटिश पासपोर्ट बरकरार रखा है। उन्होंने भारत की नागरिकता नहीं ली है।

हिमंत बिस्वा सरमा ने यह भी सवाल उठाया कि एक सांसद की पत्नी को इतने लंबे समय तक विदेशी नागरिकता बनाए रखने की अनुमति क्यों दी गई है? जबकि राजनयिकों के लिए एक अलग नियम है। उन्होंने IFS अधिकारियों की विदेशी नागरिक से शादी को लेकर नियम पर बात की। इसके तहत उन्हें अनुमति लेनी होती है और उनके साथी को 6 महीने में नागरिकता लेनी होती है।

गोगोई की पत्नी एलिजाबेथ वर्तमान में ऑक्सफोर्ड पॉलिसी मैनेजमेंट के लिए काम कर रही हैं, जो जलवायु मुद्दों पर काम करता है। वह दिल्ली में क्लाइमेट एंड डेवलपमेंट नॉलेज नेटवर्क (CDKN) में प्रोजेक्ट मैनेजर के तौर पर भी काम करती हैं।

असम के मुख्यमंत्री उन पर सोशल मीडिया पर लगाए गए आरोपों का जिक्र कर रहे थे। इन आरोपों के अनुसार, एलिजाबेथ अली तौकीर शेख के जरिए ISI से जुड़ी हैं, जो CDKN के एशिया का डायरेक्टर है। उसने पाकिस्तान योजना आयोग में भी काम किया है। एलिजाबेथ ने पाकिस्तान में तौकीर शेख के साथ मिलकर काम किया।

गौरव गोगोई के NGO पर FCRA उल्लंघन का आरोप

इससे पहले गौरव गोगोई ने मोदी सरकार पर आरोप लगाया था कि मणिपुर में अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए भाजपा जॉर्ज सोरोस और उनके ओपन सोसाइटी फाउंडेशन का मुद्दा उठा रही है। दिलचस्प बात यह है कि गौरव गोगोई के सोरोस से पैसे लेने वाले संगठनों से संबंध हैं।
गौरव गोगोई फार्म 2 फूड के नाम के NGO के संस्थापक हैं। जोरहाट में स्थित इस NGO का सहयोगी नेशनल फाउंडेशन ऑफ़ इंडिया(NFI) है। यह संगठन जॉर्ज सोरोस और अन्य डीप स्टेट से पैसा लेता है। NFI ने जॉर्ज सोरोस के ओपन सोसाइटी फाउंडेशन, फोर्ड फाउंडेशन, ओमिडयार नेटवर्क और रॉकफेलर फाउंडेशन को फंड देने वालों के रूप में बताया है।
ये सभी संगठन भारत सहित दुनिया भर में राष्ट्रवादी सरकारों के खिलाफ काम करने वाले डीप स्टेट के एसेट के रूप में जाने जाते हैं। उन्होंने कई भारत विरोधी अभियानों को बढ़ावा दिया है। इसके अलावा, फार्म 2 फूड को FCRA लाइसेंस नहीं मिला हुआ है। ऐसे में यह विदेशी चन्दा नहीं ले सकता।
इसके बावजूद, यह NGO विदेशी संगठनों के साथ काम कर रहा है, जिससे सवाल उठता है कि क्या समूह FCRA कानूनों का प्रावधानों का उल्लंघन कर रहा है। फार्म 2 फूड ने स्विस रे फाउंडेशन को भी अपने सहयोगी के तौर पर दिखाया है। स्विस रे द्वारा संचालित फाउंडेशन जलवायु और स्वास्थ्य क्षेत्रों पर काम करता है।
इसकी वेबसाइट बताती है कि यह अन्य सहायता के अलावा अपने भागीदारों को फंड भी देता है। फार्म 2 फूड की 2022-23 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, इसे उस वर्ष ₹1 लाख 80 हजार का डोनेशन और 14 लाख 74 हजार रूपए का चन्दा मिला। हालाँकि, इसमें पैसा देने वालों का नाम नहीं है। इसलिए, यह पता नहीं लगाया जा सकता कि इसे सीधे तौर पर कोई विदेशी फंडिंग मिली है या नहीं।

राजीव गाँधी फाउंडेशन-सैम पित्रोदा को USAID से मिला पैसा; भारत को तोड़ने के लिए जॉर्ज सोरोस को मिले 5000 करोड़ रूपए?ऑपइंडिया ने जो सच बताया, संसद में उसी तूफान में घिरा गाँधी परिवार

                                                    USAID के जॉर्ज सोरोस और कॉन्ग्रेस से क्या लिंक
डोनाल्ड ट्रम्प की वापसी Deep State और Tool kit के लिए अभिशाप बनकर आयी है। ये वही Deep State और Tool kit है जिसने ट्रम्प को पिछला चुनाव हरवाया था। ये ही गैंग भारत में खूब हरकत में रहा। भारत और अमेरिका चुनावों में लगने वाले नारे भी एक ही थे। भारत में नरेंद्र मोदी तो अमेरिका में ट्रम्प ने इन्हे चारों खाने चित ही नहीं बल्कि ट्रम्प नितरोज इस गैंग को नेस्ताबूत कर रहे हैं। भारत में जो आए दिन हंगामे होते थे इसी गैंग की फंडिंग से होते थे। विपक्ष ने भारत को बहुत नीचा दिखाया।   
पिछली संसद में जितना शोर-शराबा देखा इस समय चल रही संसद में नहीं के बराबर, क्यों? क्योकि हंगामा करने के लिए नोट कौन देगा? Deep State और Tool kit से मिलने वाली भीख देश में धरने, प्रदर्शन और दंगे हुए। देखिए दिल्ली चुनाव ऐसा चुनाव है जिसमे विपक्ष ने EVM को नहीं कोसा।      
जब से अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने USAID पर ताला लगाया है लगातार इसकी करतूतें बाहर आ रही है। भारत विरोधी ताकतों को यूनाइटेड स्टेट्स एजेंसी फॉर इंटरनेशनल डेवलपमेंट (USAID) से हुई फंडिंग का मामला 10 फरवरी 2025 को लोकसभा में बीजेपी सांसद निशिकांत दुबे ने उठाया।

ट्विटर/एक्स पर एक पोस्ट में उन्होंने कहा है, “आजादी से लेकर अब तक कांग्रेस ने सिर्फ देश को तोड़ने का काम किया है। राजीव गाँधी फाउंडेशन सहित कई NGO ने USAID से पैसे लेकर देश विरोधी तत्वों को फायदा पहुँचाया। विपक्ष देश तोड़ना चाहता है।” इसके साथ ही उन्होंने लोकसभा की कार्रवाई का एक वीडियो भी शेयर किया है, जिसमें वे इससे जुड़े सवाल उठा रहे हैं।

ये सवाल क्या हैं इन्हें नीचे पढ़ा जा सकता है-

“USAID ने ओपन सोसायटी फाउंडेशन के जॉर्ज सोरोस को 5000 करोड़ रुपया भारत को तोड़ने के लिए दिया या नहीं दिया?”

“USAID ने राजीव गाँधी फाउंडेशन चैरिटेबल ट्रस्ट को पैसा दिया कि नहीं दिया?”

“ओवरसीज कांग्रेस के जो अध्यक्ष हैं सैम पित्रौदा उनको USAID ने पैसा दिया या नहीं दिया?”

“बांग्लादेश में मोहम्मद युनूस, जिन्होंने वहाँ के लोकतंत्र को बर्बाद किया, उसके साथ गाँधी परिवार के साथ क्या संबंध हैं?”

“राजीव गाँधी फाउंडेशन में जो विजय महाजन है, उनकी संस्था को USAID पैसा दे रही है या नहीं दे रही है? कांग्रेस ने उसे राजीव गाँधी फाउंडेशन में देश के टुकड़े रखने के लिए रखा है या नहीं रखा है?

“ग्रामीण विकास ट्रस्ट जो कि जातिगत जनगणना की बात करता है यूएस उसको पैसा देता है कि नहीं देता है?”

“तालिबान को यूएसएड ने पैसा दिया कि नहीं दिया?”

“नेपाल में जो नास्तिकता के लिए मूवमेंट चला उसके लिए यूएसएड ने पैसा दिया कि नहीं दिया?”

“सामंता पावर से आपकी मुलाकात हुई कि नहीं हुई?”

“फलाह-ए-पाकिस्तान, एल खिदमत जैसे आतंकी संगठनों को यूएसएड ने पैसा दिया कि नहीं दिया?”

“वक्फ एक्ट को जो जकात फाउंडेशन चला रहा है जिसको कांग्रेस सपोर्ट करती है उसको यूएसएड ने पैसा दिया कि नहीं दिया?”

USAID को लेकर ऑपइंडिया की रिपोर्ट

जिस यूएसएड को लेकर भाजपा सांसद द्वारा सवाल खड़े किए गए हैं उसे लेकर ऑपइंडिया लगातार रिपोर्ट कर रहा है। हम आपको पहले की रिपोर्टों में बता चुके हैं कि कैसे इस यूएसएड ने अमेरिकी करदाताओं के करोड़ों रुपए आतंकवादियों को पोसने वाले संगठनों को देने में और धर्मांतरण को बढ़ावा देने वाली संस्थाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए खर्च किया। नेपाल में नास्तिकता का मूवमेंट चलाना हो या देश-विदेश में LGBTQ के एक्टिविज्म को बढ़ाना हो… इन सब पर यूएसएड ने खुलकर डॉलर उड़ाए।
कहने को ये संगठन मानव भलाई की दिशा में काम करता है लेकिन हकीकत यह है कि इनका फायदा अफगानिस्तान में बैठे तालिबान, पाकिस्तान में बैठे लश्कर-ए-तैयबा, फलाह-ए-पाकिस्तान और गाजा में बैठे हमास जैसे आतंकी संगठनों को भी हुआ है।
अवलोकन करें:-
दिल्ली चुनाव में EVM बदनाम नहीं हुई क्योकि आकाओं पर ट्रम्प ने डाल दी नकेल; चर्च, जिहादी, नक्सली, NGO…
इसके अलावा यूएसएड का संबंध कांग्रेस से, गाँधी परिवार के करीबी सैम पित्रौदा से और जॉर्ज सोरोस से कैसे है इसे भी ऑपइंडिया अपनी रिपोर्ट में बता चुका है। 2024 में भी हमने ये खुलासा किया था कि सैम पित्रौदा की एनजीओ को USAID से फंड आता था। आज इसी मामले को निशिकांत दुबे ने फिर से उठाकर ताजा कर दिया है।