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जॉर्ज सोरोस की फंडिंग वाली RSF ने ‘ऑपइंडिया’ को बनाया निशाना, ‘प्रेस की आजादी’ के नाम पर प्रोपेगेंडा: विदेशी फेक न्यूज फैक्ट्रियों के निशाने पर भारत की राष्ट्रवादी आवाज

                                                                                           प्रतिकात्मक तस्वीर ( फोटो साभार-chatgpt)
जॉर्ज सोरोस जितना पैसा भारत को अस्थिर करने में बर्बाद कर रहा है अगर यही पैसा गरीबों पर खर्च करता इतिहास में स्वर्णमयी अक्षरों में नाम लिखा जाता, लेकिन सोरोस देशों को अस्थिर करने में अपनी शान समझ रहा है। जब भारतीय नेताओं को फंडिंग कर उसको उतनी मदद नहीं मिल रही तो राष्ट्रवादी पत्रकारिता को निशाने पर ले रहा है। जिसे देख लगता है बुढ़ापे में अपनी दुर्गति करवाकर ही दुनिया से जाएगा। आखिर 
हिंदू राष्ट्रवादी न्यूज़ आउटलेट OpIndia को क्यों निशाने पर लिया जा रहा है? अगर RSF ने राष्ट्रवादी पत्रकारिता पर हमला करना बंद नहीं किया इसके बहुत भयंकर अंजाम होंगे।   

2025 के आखिर में अचानक एक मोड़ आया, जब RSF ने भारत के हिंदू राष्ट्रवादी न्यूज़ आउटलेट OpIndia को अपनी सालाना ‘प्रेस फ्रीडम प्रिडेटर्स’ लिस्ट में एलन मस्क और अडानी ग्रुप जैसे ग्लोबल कॉर्पोरेट दिग्गजों के साथ शामिल किया। इस की वजह से RSF की न्यूट्रैलिटी और पॉलिटिकल एजेंडा पर बड़े पैमाने पर चर्चा हुई। OpIndia राष्ट्रवादी और सॉवरेन नैरेटिव का एक घोर समर्थक है।

कई लोगों ने OpIndia को शामिल करने को राष्ट्रवादी आवाजों को बदनाम करने की बड़ी योजना के रूप में देख रहे हैं। यह लिस्टिंग RSF की पिछली रिपोर्टों की वजह से हुआ है। इनमें राष्ट्रवादियों को प्रेस की आजादी के लिए खतरा बताया गया था और मोदी सरकार के दौरान मीडिया के माहौल की आलोचना की गई थी।

UK की टेलीग्राफ ने बताया कि कैसे RSF ने दुनिया को भारत के डेमोक्रेटिक माहौल और प्रेस लैंडस्केप को बताया। इसमें दुनिया भर में आलोचना के साथ अलग-अलग भारतीय मीडिया और कॉर्पोरेट हस्तियों के गठबंधन को हाईलाइट किया गया।

यह रिसर्च RSF के फाइनेंसिंग सोर्स को ट्रैक करके इसकी जाँच करती है। इनमें से ज्यादातर पश्चिमी सरकारी संगठनों और शासन परिवर्तन से जुड़े फाउंडेशन हैं। जैसे- US कांग्रेस द्वारा फंडेड नेशनल एंडोमेंट फॉर डेमोक्रेसी (NED)।

यह बेलिंगकैट (Bellingcat) जैसे जाँच संगठनों के साथ RSF के कनेक्शन की भी जाँच करता है। स्टडी से पता चलता है कि RSF स्वतंत्र पत्रकारिता का निष्पक्ष संरक्षक नहीं है, बल्कि भारत की संप्रभुता और लोकतंत्र पर दुनिया भर में चल रही वैचारिक लड़ाई को हवा देता है।

RSF: इमेज बनाम इकोसिस्टम

RSF द्वारा पब्लिश वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स (WPFI) की चर्चा पश्चिमी सरकारों, मल्टीलेटरल संगठनों और लेगेसी मीडिया द्वारा किया जाता है। RSF खुद को एक इंटरनेशनल NGO के रूप में पेश करता है, जो दुनिया भर में प्रेस फ्रीडम का बचाव करता है।

यह इंडेक्स बिना किसी जानकारी के, सोच-समझकर किए गए सर्वे पर निर्भर करता है। इसमें जवाब देने वालों का नाम नहीं बताया जाता और कैटेगरी के हिसाब से स्कोरिंग नहीं होती। भारत के ऑफिशियल पॉलिसी थिंक टैंक नीति आयोग ने भी इसकी जानकारी दी है।

 भारत और दूसरी जगहों के आलोचकों के मुताबिक, ऐसा इंडेक्स एक न्यूट्रल असेसमेंट के बजाय एक जियोपॉलिटिकल टूल बनने का खतरा रहता है। यह एक सब्जेक्टिव सवालों के जवाबों पर आधारित होता है।

असल में RSF देशों के नैरेटिव अक्सर पश्चिमी ह्यूमन राइट्स ऑर्गनाइज़ेशन और उनसे जुड़े मीडिया की बातों को दिखाते हैं। खासकर जब बात भारत, हंगरी और दूसरे देशों की आती है, जिन्हें ‘इलीबरल’ या ‘नेशनलिस्ट’ माना जाता है। कॉर्पोरेट कंसोलिडेशन, इंटेलिजेंस लीक और सर्विलांस स्कैंडल जैसी पश्चिमी स्ट्रक्चरल समस्याओं को आम तौर पर छोटी-मोटी गड़बड़ियाँ बताया जाता है। RSF अक्सर भारत के हिंदू राष्ट्रवाद को जर्नलिज़्म के लिए खतरा बताते हैं।

फंडिंग: पश्चिमी सरकारें, NED और शासन बदलने वाली समाज सेवा

RSF को पश्चिमी सरकारों और डेमोक्रेसी को बढ़ावा देने वाले संगठनों से मदद मिलती है। OpIndia-CSDS डॉक्यूमेंट में बताई गई रिसर्च बताती है कि RSF को इनसे फंडिंग मिली है:

  1. फ्रांस की सरकारी एजेंसियां, जिनमें फ्रेंच डेवलपमेंट एजेंसी (AFD), विदेश मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय, गृह मंत्रालय, संस्कृति मंत्रालय और बेयूक्स शहर शामिल हैं।
  2. यूरोपियन कमीशन का यूरोपियन इंस्ट्रूमेंट फॉर डेमोक्रेसी एंड ह्यूमन राइट्स (EIDHR)।
  3. इसी तरह के यूरोप के मदद करने वाले संगठन, जैसे स्वीडिश इंटरनेशनल डेवलपमेंट एजेंसी (SIDA)।
  4. नेशनल एंडोमेंट फॉर डेमोक्रेसी (NED), जिसे US कांग्रेस से फंड मिलता है। यह संगठन स्पष्ट तौर पर बताता है कि यह डेमोक्रेसी को बढ़ावा देता है। इसे मुख्य रूप से US सरकार का सपोर्ट है।
फोर्ड फाउंडेशन जैसे बड़े US फाउंडेशन, जिनका भारत में पॉलिटिकल एक्शन और लॉबिंग को सपोर्ट करने का लंबा और विवादित इतिहास रहा है। इसमें वे संगठन भी शामिल हैं, जिन पर बाद में फाइनेंशियल गड़बड़ियों और भारत विरोधी कैंपेन के आरोप लगे, वे भी RSF से जुड़े हैं। ऑपइंडिया पेपर में बताई गई इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग के मुताबिक, RSF ने US-EU के रिजीम चेंज इनिशिएटिव्स के टारगेटेड सरकारों, जैसे वेनेजुएला के खिलाफ लगातार सख्त रुख अपनाया है। उन देशों में US फंडेड ऑर्गनाइजेशन्स और अमीरों के मालिकाना हक वाले विपक्षी मीडिया को सपोर्ट किया है।
यह डोनर प्रोफाइल साफ तौर पर RSF को जाने-माने ‘डेमोक्रेसी प्रमोशन’ नेटवर्क में रखती है। NGOs, मीडिया इनिशिएटिव्स, इंडेक्स और लॉबिंग कैंपेन जो वेस्टर्न जियोपॉलिटिकल पसंद के खिलाफ सरकारों में ‘अथॉरिटेरियनिज्म’ को खास तौर पर हाईलाइट करते हैं, जिनमें से भारत भी एक है। उन्हें वेस्टर्न सरकारों और उनसे जुड़े इंस्टीट्यूशन्स द्वारा फंड दिया जाता है।

वर्ल्ड प्रेस फ्रीडम इंडेक्स का विवादास्पद तरीका

RSF के इंडेक्स की तीन मुख्य समस्याएँ हैं – ओपेसिटी, सब्जेक्टिविटी और सेलेक्टिव एम्फेसिस, जो कई इंडियन और इंटरनेशनल समीक्षा पर आधारित हैं।
ओपेसिटी: यह ऑडिट करना मुश्किल है कि भारत के लिए खास स्कोर कैसे बनाए गए? वैसी ही स्थिति वाले देशों से कैसे की जाए, क्योंकि RSF सवाल के हिसाब से स्कोर या अपने जवाब देने वालों की पहचान और इंस्टीट्यूशनल लोकेशन नहीं बताता है।
सब्जेक्टिविटी: इंडेक्स सोच पर आधारित है। ‘एक्सपर्ट्स’ ‘ओनरशिप प्रेशर’, ‘हेट कैंपेन’, और ‘सेल्फ-सेंसरशिप’ जैसे मुद्दों पर सर्वे पूरा करते हैं। एक्सपर्ट्स का यह ग्रुप ज़्यादातर लिबरल-प्रोग्रेसिव, वेस्टर्न सोच वाले होते हैं। खासकर कंजर्वेटिव या नेशनलिस्ट सरकारों के विरोध में इनकी राय होती है।
सिलेक्टिव : आलोचकों का कहना है कि जहाँ भारत जैसे देशों को ‘हिंदू नेशनलिस्ट प्रेशर’ और सोशल मीडिया ट्रोलिंग जैसे नैरेटिव की वजह से कड़ी सज़ा मिलती है, वहीं गंभीर स्ट्रक्चरल दिक्कतों वाले वेस्टर्न डेमोक्रेसी में मीडिया ओनरशिप, सिक्योरिटी कानूनों का अग्रेसिव इस्तेमाल और इंटेलिजेंस मिलीभगत काफी ज्यादा है।
भारत सरकार के एक डिस्कशन पेपर के मुताबिक, RSF का तरीका पॉलिसी बेंचमार्क के तौर पर काफ़ी नहीं है, क्योंकि इसमें ‘प्रेस की आज़ादी की आम सहमति वाली परिभाषा की कमी है।’ ‘सैंपल साइज बहुत कम है,’ ‘पैरामीटर्स का नॉन-ट्रांसपेरेंट वेटिंग है।’
इनको देखते हुए ऑपइंडिया ने इंडेक्स को ‘ग्लोबल लेफ्ट की कहानी को फैलाने के लिए बनाया गया एक बायस्ड टूल’ बताया है। दरअसल RSF का पुराना डेटा बताता है कि कॉन्ग्रेस के सालों में भारत का मीडिया माहौल गिरा, लेकिन यह बहस मोदी सरकार के कार्यकाल पर ज्यादा हमला करती है।

RSF और भारत: राष्ट्रवादी राजनीति के खिलाफ मनगढ़ंत बातें बनाना

RSF की भारत फैक्ट शीट और प्रेस रिलीज में अक्सर एक तय टेम्पलेट को हाईलाइट किया जाता है। ‘हिंदू राष्ट्रवादी भीड़,’ ‘मोदी समर्थक,’ ‘भक्त’ और ‘राइट-विंग इकोसिस्टम’ को पत्रकारों के सामने आने वाले मुख्य खतरों के तौर पर हाईलाइट किया जाता है।
स्थानीय या राष्ट्रवादी बैकग्राउंड के पत्रकारों के खिलाफ हिंसा को ज़्यादातर उन घटनाओं और कहानियों के पक्ष में नजरअंदाज कर दिया जाता है, जिन्हें अंग्रेजी भाषा की लिबरल साइटों के एक खास ग्रुप द्वारा मजबूत किया जाता है। इनमें से कई पश्चिमी फाउंडेशन से जुड़ी हैं।
लगभग ‘कब्जा किए गए मीडिया’ की इमेज के साथ मेल न खाने के बावजूद, भारत के मीडिया में स्ट्रक्चरल वैरायटी, हजारों पत्रकारों, सैकड़ों चैनलों और कई बड़े प्लेटफॉर्म पर मोदी सरकार की तीखी आलोचना वाली कवरेज इन्हें कम दिखता है।
CSDS-लोकनीति की ‘इंडियन मीडिया, ट्रेंड्स और पैटर्न’ पर रिपोर्ट को OpIndia ने अपने रिसर्च में शामिल किया है। भारतीय मीडिया की आज़ादी के बारे में RSF नकारात्मक वर्णन करता है। इसमें यह दावा किया जाता है कि ज्यादातर पत्रकारों का मानना ​​है कि मीडिया आउटलेट सत्ताधारी BJP को सपोर्ट करते हैं। हालाँकि, सर्वे के नतीजे, जैसे कि ‘85% महिला पत्रकारों को मेंटल हेल्थ की दिक्कतें’ थीं और 1.4 बिलियन की आबादी वाले देश में से 206 पत्रकारों के एक छोटे से सैंपल से लिए गए थे।
OpIndia के अनुसार, ग्लोबल इंडेक्स भारत की बुराई करता है, एक घरेलू विदेशी फंडेड थिंक टैंक इंडेक्स पर आधारित है और फिर ‘मीडिया में लोकतंत्र की कमी’ के तौर पर पेश करता है। यह फीडबैक लूप RSF की सब्जेक्टिव स्टोरी और CSDS के कम डेटा की वजह से होता है।
RSF OpIndia को एक ‘हिंदू राष्ट्रवादी वेबसाइट’ बताता है जो सरकार की आलोचना करने वाले पत्रकारों को ‘बदनाम’ करती है। ये तकनीक या विचारधारा पर की गई आपत्ति को प्रेस की आजादी से जोड़कर देखती है। यह एक स्ट्रैटेजी है, जिसमें इंडेक्स को चुनौती देने वालों को पत्रकारिता का दुश्मन बताया जाता है, जिससे असल में असली मुद्दा कहीं खो जाता है।

बेलिंगकैट: OSINT, NED का पैसा और इंटेलिजेंस शैडो

नीदरलैंड्स का एक ‘ओपन सोर्स इन्वेस्टिगेशन’ ग्रुप माना जाता है बेलिंगकैट। इसकी रूस, सीरिया जैसे देशों में काम करने को लेकर वेस्टर्न मीडिया ने तारीफ़ की है। यह OpIndia-CSDS स्टडी में बताए गए नेटवर्क का एक ज़रूरी हिस्सा है।
पब्लिक रिकॉर्ड के मुताबिक, बेलिंगकैट को नेशनल एंडोमेंट फॉर डेमोक्रेसी (NED) से डोनेशन मिला है। यह एक US कॉन्ग्रेस फंडिंग संगठन है, जिसे खास तौर पर उन संगठन की मदद के लिए बनाया गया है, जो विदेशों में US के हितों को बढ़ावा देते हैं। इसके अलावा, इसे कई पश्चिमी सरकार से जुड़े संस्थानों से फंडिंग मिलती है। खासकर यूरोपियन और ब्रिटिश सोर्स से।
यहाँ तक ​​कि इनके प्रति हमदर्दी रखने वाले सोर्स भी मानते हैं कि इस तरह की फंडिंग अक्सर उन स्टडीज़ को बढ़ावा देने के लिए दी जाती है, जो पश्चिम की विदेश नीति के हिसाब से हों, जैसे- रूस में सेना की मूवमेंट को ट्रैक करना या सीरिया में केमिकल हथियारों के आरोप। ये आरोप आसानी से NATO की बातों से मेल खाते हैं।
इसलिए, क्रिटिकल ऑब्ज़र्वर NED को US विदेश नीति के लिए एक ‘फ्रंट’ मानते हैं, जिसे खुले तौर पर वही करने के लिए बनाया गया था, जो CIA कभी चुपके से करती थी। बेलिंगकैट उस इकोसिस्टम का हिस्सा है, जो पश्चिमी स्ट्रेटेजिक मैसेजिंग के लिए फायदेमंद जानकारी के फ्लो को बढ़ाता और ढोता है। बेलिंगकैट पर रूसी सरकार और दूसरों ने सीधे तौर पर पश्चिमी इंटेलिजेंस का पिछलग्गू होने का आरोप लगाया है। इन देशों ने ऐसे उदाहरण भी दिए हैं।
ग्लोबल इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म नेटवर्क (GIJN), OCCRP, फॉरबिडन स्टोरीज, इंटरन्यूज, ICIJ, DRFLab, फ्रीडम हाउस, NED, और दूसरे संगठन जिन्हें पश्चिमी सरकारों, सोरोस के ओपन सोसाइटी फाउंडेशन, ओमिडयार नेटवर्क, फोर्ड फाउंडेशन और इसी तरह के दूसरे लोगों से फंडिंग मिलती है।
ये सभी जानकारी OpIndia–CSDS पेपर में शामिल हैं। विदेशी फंडेड स्टोरी को ‘इंडिपेंडेंट इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज्म’ की आड़ में चलाया जाता है। इसकी वजह ये भी है कि उनमें से कई भारतीय मीडिया आउटलेट्स और एक्टिविस्ट्स के साथ मिलकर काम किया गया होता है, जो मोदी सरकार और हिंदुत्व के सख्त खिलाफ हैं।
इस तरह, बेलिंगकैट उस बड़े इकोसिस्टम के लिए एक मॉडल का काम करता है। यह एक ऑफिशियली मान्यता प्राप्त गैर सरकारी संगठन है। यह काफी हद तक वेस्टर्न सिक्योरिटी और फॉरेन पॉलिसी एजेंडा के हिसाब से है। इसे अक्सर वही वेस्टर्न मीडिया आउटलेट्स निष्पक्ष जानकारी वाले सोर्स के तौर पर पेश करते हैं। साथ ही इसे फंड करते हैं।

RSF का सीरियाई मीडिया प्रोजेक्ट्स और नैरेटिव

ऑपइंडिया रिपोर्ट में सीरिया केस स्टडी दिखाती है कि कैसे RSF जैसे संगठन विवादित क्षेत्रों में वेस्टर्न देशों के साथ मिलकर काम करते हैं। दस्तावेज के मुताबिक, कैनाल फ्रांस इंटरनेशनल (CFI), एक फ्रेंच मीडिया-सपोर्ट संगठन है, जिसे फ्रेंच फॉरेन मिनिस्ट्री का सपोर्ट है।
यह रेडियो रोज़ाना को फंडिंग देता है। यह एक सीरियाई चैनल है, जिसे RSF ने ‘इंडिपेंडेंट’ बताया। डेनमार्क, स्वीडन और नॉर्वे की सरकारें इंटरनेशनल मीडिया सपोर्ट के लिए फंडिंग देती हैं। RSF खुद दूसरे वेस्टर्न डोनर्स के साथ मिलकर फंडिंग करता है।
रेडियो रोज़ाना ने आरा पैसिस इनिशिएटिव के ‘सीरियाज़ा’ नैरेटिव प्रोजेक्ट के साथ मिलकर काम किया है। इसे खास तौर पर इटैलियन फॉरेन मिनिस्ट्री ने फंड किया था और इटैलियन सरकार और प्रेसिडेंसी के समर्थन में ऑपरेट किया गया था।
सीरिया में और उसके बारे में लोगों की राय को प्रभावित करने के लिए ‘नैरेटिव’ और ‘स्टोरीटेलिंग’ बनाने का जिक्र प्रोजेक्ट में किया गया है।
जब इसे पूरा देखा जाए, तो यह एक मॉडल दिखाता है। पश्चिमी सरकारें RSF और CFI जैसे बिचौलियों के जरिए मीडिया आउटलेट्स को फाइनेंस करती हैं, फिर उन पत्रकारों के लिए कंटेंट और ‘कैपेसिटी बिल्डिंग’ करती हैं, जिनका काम उनके नेरेटिव से मेल खाता है।
आम तौर पर इसमें ‘टारगेट की गई सरकार’ और ‘तानाशाह शासक’ होते हैं, जबकि पश्चिमी देशों के समर्थन वाली विपक्षी ताकतें डेमोक्रेट होती हैं।
ऐसे देशों में RSF ‘प्रेस की आज़ादी’ की घोषणा करता है, तो वह असल में उन जानकारियों का मूल्यांकन कर रहा होता है, जहाँ डोनर का हित हो।

भारत में काम करने वाला नेटवर्क: CSDS, KAS, RSF और GIJN

OpIndia रिसर्च से पता चलता है कि RSF का भारत के एक बड़ा नेटवर्क है। ये कई संस्थानों को फंडिंग करती है और उसकी पार्टनर है या विचारधारा को शेयर करती हैं।
*पेपर में कहा गया है कि दिल्ली का थिंक टैंक कहलाने वाला CSDS और उसका प्रोग्राम अक्सर पश्चिमी संगठनों और सरकार से जुड़े डोनर्स के साथ मिलकर ‘हिंदू बहुसंख्यकवाद,’ दलित-मुस्लिम जुड़ाव और जाति विभाजन की बातों को सिस्टमैटिक तरीके से बढ़ाता है।
*कोनराड एडेनॉयर स्टिफ्टंग (KAS) एक जर्मन फाउंडेशन है जो CDU से राजनीतिक तौर पर जुड़ा हुआ है। यह लगभग पूरी तरह से जर्मन पब्लिक फंड से स्पॉन्सर है और इसने 2016 से CSDS को ₹2.6 करोड़ से ज़्यादा की ‘सहायता’ दी। यह एक खास ‘मीडिया प्रोग्राम एशिया’ भी चलाता है जो युवाओं और इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज़्म पर केन्द्रित है।
*’अनकवरिंग एशिया’ इन्वेस्टिगेटिव जर्नलिज़्म कॉन्फ्रेंस के स्पॉन्सर GIJN, OCCRP, फोर्ड फाउंडेशन, ओपन सोसाइटी फाउंडेशन, ओक फाउंडेशन समेत कई थे। इसमें शामिल होने वाले भारतीय लोगों में वे पत्रकार और मीडिया आउटलेट थे, जो लगातार मोदी सरकार और हिंदुत्व की बुराई करते रहे हैं।
स्टडी के मुताबिक, RSF इस वेब के लिए एक अच्छा सोर्स है। इंटरनेशनल इन्वेस्टिगेटिव नेटवर्क एक-दूसरे के काम को क्रॉस-प्रमोट करते हैं। इंटरनेशनल डोनर्स इनकी फंडिंग के लिए एक ही पूल का इस्तेमाल करते हैं। CSDS इंडियन मीडिया के पतन पर RSF का रेफरेंस देता है, और RSF वेस्टर्न-फंडेड इंडियन आउटलेट्स के नैरेटिव्स पर निर्भर रहता है।
इनका एक छोटा सा सर्किट है, जिसमें वेस्टर्न-फंडेड संगठन प्रश्नावली तैयार करते हैं। स्टोरी गढ़ते हैं, डेटा को एनालाइज करते हैं, और फिर एक-दूसरे को रैंकिंग और रिवॉर्ड देते हैं। इनका इस्तेमाल घरेलू पॉलिटिकल डिस्कशन और इंटरनेशनल डिप्लोमेसी दोनों में हथियार के तौर पर किया जाता है।

नैरेटिव इम्पैक्ट: नेशनलिस्ट इंडिया को गलत साबित करना

मुद्दा यह नहीं है कि RSF इंडिया की आलोचना करता है, बल्कि यह लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार को कमज़ोर करता है। इसके लिए वह मुश्किल मीडिया इकोसिस्टम को ‘साहसी लिबरल जर्नलिस्ट्स’ और ‘अथॉरिटेरियन हिंदू नेशनलिस्ट्स’ के बीच एक मोरैलिटी प्ले में बदल देता है।
यह उन जर्नलिस्ट्स के खिलाफ धमकियों और हिंसा के कामों को नजरअंदाज करता है या उसे कम करके आँकता है, जिन्हें राष्ट्रवादी, हिंदुत्व समर्थक या ग्लोबल लिबरल नैरेटिव्स की आलोचना करने वाला माना जाता है।
इसे वही वेस्टर्न मीडिया भी बढ़ावा देता है। किसान आंदोलन, CAA, कश्मीर और ‘ अल्पसंख्यकों पर ज़ुल्म’ जैसे टॉपिक पर भारत की आलोचना करता है और अक्सर RSF, फ्रीडम हाउस और ऐसे ही दूसरे इंडेक्स को आधार बनाकर ‘लोकतंत्र कमजोर’ होने की दुहाई देता है।
यह सिर्फ एक चर्चा नहीं है, जैसा कि OpIndia-CSDS रिपोर्ट में बताया गया है। जब इंडेक्स दिखाते हैं कि भारत तानाशाही की ओर बढ़ रहा है, तो इसे सही ठहराना आसान हो जाता है।
1.भारतीय कानूनों और नीतियों का विरोध करने वाले एक्टिविस्ट नेटवर्क और गैर-सरकारी संगठनों (NGOs) के लिए विदेशी फंडिंग में बढ़ोतरी।
2.इंटरनेशनल फोरम पर, डिप्लोमैटिक दबाव और ‘नाम लेकर शर्मिंदा करना’।
3.भारत की इंटरनेशनल इमेज को जानबूझकर कमजोर करने की कोशिशें, खासकर तब जब नई दिल्ली रूस, चीन, क्लाइमेट या व्यापार के मुद्दे पर अलग स्टेंड लेती है और पश्चिमी देशों के रुख को चुनौती देती है। US-EU अलायंस के संबंध में स्ट्रेटेजिक ऑटोनॉमी का दावा करती है।
दूसरे शब्दों में कहें तो, भारत पर RSF की कवरेज असल में एक ‘जियोपॉलिटिकल’ टूल है। यह भारत को एक कट्टर, गैर-उदारवादी , बहुसंख्यक देश के रूप में दिखाने की कोशिश करता है, जिसे लगातार पश्चिमी गाइडेंस और ‘सिविल सोसाइटी करेक्शन’ की जरूरत है।
जब इन बातों को एक चश्मे से देखा जाता है, तो एक अलग पैटर्न नजर आता है। पश्चिमी सरकारी संस्थाएँ और NED जैसे US-स्टाइल डेमोक्रेसी को बढ़ावा देने वाले संगठन और शासन परिवर्तन से जुड़े बड़े फाउंडेशन RSF की ज्यादातर फंडिंग को बढ़ावा देते हैं।
OpIndia–CSDS स्टडी RSF को एक बड़े नेटवर्क में रखती है, जिसमें CSDS, KAS, IDRC, सोरोस से जुड़े फ़ाउंडेशन, और भारतीय एक्टिविस्ट या पत्रकार ग्रुप शामिल हैं। ये सभी संगठन एक ही लक्ष्य के लिए काम कर रहे हैं, जो है हिंदू पहचान, भारतीय लोकतंत्र और राष्ट्रवादी राजनीति के बारे में लगातार खराब खबरें फैलाना।
एक राष्ट्रवादी भारतीय नजरिए से, RSF प्रेस की आज़ादी का एक निष्पक्ष रखवाला कम और एक ट्रांसनेशनल स्टोरी फैलाने वाले सिस्टम का एक जरूरी हिस्सा है। इसके रिसोर्स, पार्टनरशिप और प्रोडक्ट लगातार भारत की चुनी हुई सरकार और सभ्यता के खिलाफ काम करते हैं।

आंध्र प्रदेश : ‘100 करोड़ लोगों ने खाया बीफ वाला लड्डू, मजा आ गया’: तिरुपति के प्रसाद पर कांग्रेस समर्थक ने हिंदुओं का उड़ाया मजाक, कहा- अब दूसरे की प्लेट में मत झाँकना

                                                    तिरुपति लड्डू (फोटो साभार: द कम्यून)
आखिर की आड़ में सनातन पर हमला करने वालों के धर्म की जाँच करने का समय आ गया है? आंध्र प्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री जगनमोहन रेड्डी के पिता YS Rajshekhar Reddy ने क्या कांग्रेस में रहते ईसाई धर्म अपना लिया था? गूगल पर इनके धर्म की जाँच करने पर निम्न जानकारी प्राप्त हुई :

वाई एस जगन्मोहन रेड्डी యెదుగూరి సందింటి జగన్మోహన్ రెడ్డి
संबंधवाई एस राजशेखर रेड्डी (पिता)
बच्चे2 पुत्रियाँ
निवासविशाखपट्णम, आन्ध्रप्रदेश, भारत, हैदराबाद, तेलंगाना, भारत बेंगलूरु, कर्नाटका, भारत
धर्मईसाई
शायद यही कारण है कि इतने प्रतिष्ठित मंदिर तिरुपति बाला जी प्रसाद को मछली का तेल, बीफ  और पोर्क की चर्बी मिलाने का जो घिनौना अपराध किया है, जिसका हर पार्टी को विरोध करना चाहिए और पूर्व मुख्यमंत्री जगनमोहन, प्रसाद को दूषित करने वालों के विरुद्ध सख्त कार्यवाही करने के लिए वर्तमान मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू पर बिना किसी देरी से सभी सनातन विरोधी दोषियों पर सख्त कार्यवाही करने के लिए दबाव बनाना चाहिए, क्योकि रिपोर्ट में लिखा है- घी में सोयाबीन, सूरजमुखी, जैतून, रेपसीड, अलसी, गेहूं के बीज, मक्का के बीज, कपास के बीज, नारियल, पाम कर्नेल फैट और पाम ऑयल के अलावा बीफ टैलो, लार्ड और मछली का तेल आदि है।        

तिरुपति मंदिर के पवित्र प्रसाद लड्डू में जानवरों की चर्बी मिली होने की बात सामने आने के बाद कथिततौर पर कॉन्ग्रेस समर्थक व सोशल मीडिया के पोस्टों से जाहिर होते हिंदू विरोधी, पीयूष मानुष ने हिंदुओं का मजाक उड़ाया है। पीयूष ने अपनी वीडियो में कहा कि 100 करोड़ लोग तिरुपति गए होंगे, क्या उन्हें बीफ पसंद आया।

पीयूष ने अपने एक्स हैंडल पर वीडियो शेयर करते हुए हिंदुओं का मजाक उड़ाया। उन्होंने कहा, “क्या तुमको अच्छे लड्डू मिले?… इतने दिनों तक तुम दूसरों की प्लेट देखते रहे कि कहीं वो बीफ तो नहीं खा रहे, तुमने उनके टिफिन चेक किए, उनके रेफ्रिजरेटर भी चेक किए, उन्हें मार भी डाला। अब कम से कम 100 करोड़ लोग तिरुपति गए होंगे। उन्हें लड्डू मिले होंगे। क्या हुआ? अब तुमको बीफ अच्छा लगा? मजा आया? तुम्हारा काम हो गया। कम से कम अब दूसरे की प्लेट तो मत देखिए। जाओ अपना काम करो। पेरुमल ने खुद आपको अच्छे लड्डू दिए हैं।”

पीयूष की ये वीडियो ऐसे समय में सामने आई है जब हाल में प्रदेश सीएम चंद्रबाबू नायडू ने तिरुपति के लड्डू में इस्तेमाल होने वाले घी की गुणवत्ता को लेकर खुलासा किया और जाँच रिपोर्ट से पता चला कि उसमें मछली का तेल, सूअर की चर्बी और बीफ आदि है। इस जानकारी के सामने आते ही बवाल शुरू हो गया।

हिंदुओं ने सोशल मीडिया पर विरोध करते हुए कहना शुरू किया कि जो कोई भी इस घृणित पाप का भागीदार था उन्हें भगवान वेंकटेश्वर कभी माफ नहीं करेंगे। सरकार से अपराधियों के विरुद्ध कार्रवाई की माँग की गई। कहा गया कि ये मामला साफ तौर पर हिंदू घृणा से जुड़ा है। हिंदुओं की आस्था को जानबूझकर ठेस पहुँचाया गया है।

केंद्रीय मंत्री और भाजपा के राष्ट्रीय महासचिव बंदी संजय ने कहा, “तिरुमाला के लड्डू को बहुत ही ‘पवित्र प्रसाद’ माना जाता है, इसे दूषित करना अक्षम्य पाप है… पिछली सरकार के कार्यकाल में, अन्य धर्मों के कुछ लोगों को टीटीडी (तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम) बोर्ड में शामिल किया गया था… इसलिए ऐसी घटना हुई। मैं आंध्र प्रदेश सरकार से तुरंत जाँच करने और सख्त कार्रवाई करने का अनुरोध करता हूँ।”

अवलोकन करें :-

आंध्र प्रदेश : लैब रिपोर्ट ने किया कन्फर्म : जिस घी से बनता था तिरुपति का मशहूर लड्डू, उसमें मिला


गुजरात स्थित राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड की “पशुधन एवं खाद्य विश्लेषण एवं अध्ययन केंद्र” (सीएएलएफ) प्रयोगशाला की रिपोर्ट के अनुसार, प्रसाद तैयार करने के लिए इस्तेमाल होने वाले घी में जानवर की चर्बी थी। रिपोर्ट में लिखा था- घी में सोयाबीन, सूरजमुखी, जैतून, रेपसीड, अलसी, गेहू के बीज, मक्का के बीज, कपास के बीज, नारियल, पाम कर्नेल फैट और पाम ऑयल के अलावा बीफ टैलो, लार्ड और मछली का तेल आदि है।

‘देश विरोधी है भारत का इलीट क्लास’ ; बदनाम की जा रही भारत की छवि : ऑस्ट्रेलिया के प्रोफेसर ने लिबरल गिरोह को धोया, उतर गया राजदीप का चेहरा

                                                            ऑस्ट्रेलियाई प्रोफेसर बेबोनेस (फोटो साभार: आजतक)
यूनिवर्सिटी ऑफ सिडनी के एसोसिएट प्रोफेसर सोशियोलॉजिस्ट सैल्वाटोर बेबोनेस ने कहा है भारत का बुद्धिजीवी वर्ग मोदी और भाजपा विरोधी के साथ-साथ देश विरोधी भी है। उन्होंने कहा कि भारत को फासीवादी दर्शाने के पीछे भारत का बुद्धिजीवी वर्ग और ग्लोबल मीडिया है। उन्होंने कहा कि वैश्विक मीडिया और दुनिया के पास के पास भारत के बारे में सही जानकारी नहीं है।

इंडिया टुडे के वरिष्ठ पत्रकार राजदीप सरदेसाई द्वारा देशभक्ति को लेकर पूछे गए सवाल पर प्रोफेसर बेबोेनेस ने कहा कि भारत में सांप्रदायिक हिंसा की खूब बातें होती हैं, खासकर उत्तर प्रदेश के बारे में। उन्होंने कहा कि रवांडा और बुरुंडी में भी उतनी ही सांप्रदायिक हिंसा हुई है, जितनी यूपी में हुई है। उन्होंने कहा कि इन सांप्रदायिक घटनाओं में यूपी का नाम जोर-शोर से लिया जाता है।

प्रोफेसर बेबोनेस ने कहा कि जो स्थिति बिहार की है, वही स्थिति कॉन्गो की है, लेकिन बिहार की बात ज्यादा होती है। उन्होंने कहा कि भारत को लेकर एक छवि गढ़ ली गई है, जो कि बेहद खतरनाक बात है। उन्होंने कहा कि गलत जानकारी के आधार पर भारत की छवि प्रभावित करने की कोशिश की जाती है।

हंगर इंडेक्स में भारत की स्थिति को लेकर प्रोफेसर बेबोेनेस ने कहा कि यह गलत तरीके से तैयार किया गया है। दरअसल, इन रैंकिंग्स को सर्वे के आधार पर तैयार किया जाता है। उन्होंने कहा कि अब सवाल ये है कि ये सर्वे किन लोगों पर किए जाते हैं। इनमें बुद्धिजीवी वर्ग के लोग, विदेश और भारत के छात्र, एनजीओ और मानवाधिकार संगठनों से जुड़े लोग होते हैं। इन रैंकिंग्स में भारत को गलत आँका जाता है।

इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में शामिल होने के लिए भारत पहली बार आए प्रोफेसर बेबोनेस ने कहा कि भारत दुनिया का सबसे बड़ा और सफल लोकतंत्र है। उन्होंने कहा कि भारत ने उपनिवेशवाद से निकल कर पर ग्लोबल स्तर पर खुद को साबित किया है।

मोदी को अपशब्द बोलकर गुजरात में चुनाव जीतना संभव नहीं

जैसाकि सर्वविदित यह कि समय परिवर्तनशील है। वो समय गया जब शेख जी फाख्ता उड़ाते थे। मुख्यमंत्री से लेकर अब प्रधानमंत्री बने नरेंद्र मोदी को अगर मोदी को गाली देकर चुनाव जीतना आसान है, उनसे बड़ा मुर्ख अथवा पागल दुनियां के परदे पर नहीं मिलेगा। बन्दे ने केवल अपने निर्वाचन क्षेत्र नहीं, बल्कि पुरे गुजरात के लिए काम किया। 

गोधरा दंगे पर आज भी मोदी को मुस्लिम कट्टरपंथियों के साथ-साथ सेक्युलरिस्ट्स अपमानित करते हैं, लेकिन उन दंगों ने मोदी के चरित्र को चमकाया है। चमकने का कारण है। ऐसा नहीं 2002 से पहले गुजरात में दंगे नहीं हुए, बहुत हुए, लेकिन यही एक ऐसा दंगा ऐसा था, जो गिनती के दिन चला और कसूरवार ही नपे, बेकसूर नहीं। अक्सर देश में हुए आतंकवादी हमलों में इस्लामिक आतंकवादियों को संरक्षण देने बेकसूर हिन्दू, साधु और साध्वियों को जेल में डाल "हिन्दू आतंकवाद" और "भगवा आतंकवाद" के नाम पर भारत ही नहीं विश्व को गुमराह किया जाता था। परन्तु गोधरा कांड में ऐसा नहीं हुआ, मोदी ने केवल दंगाइयों को ही पकड़ा, जिन्होंने साबरमती ट्रेन में 59 रामभक्तों को जिन्दा जलाया था, जिस कारण गुजरात में दंगे हुए। 
गुजरात विधानसभा चुनाव के लिए अभी तारीख का ऐलान नहीं किया गया है, लेकिन सियासी आरोप-प्रत्यारोप का दौर शुरू हो चुका है। गुजरात के सियासी रण में उतरी आम आदमी पार्टी के नेताओं ने बदजुबानी में सबको पीछे छोड़ दिया है। प्रदेश अध्यक्ष गोपाल इटालिया ने तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर निशाना साधने में सरी हदें पर कर दीं। ऐसे में एबीपी न्यूज़ के लिए सी-वोटर ने गुजरात और हिमाचल दोनों राज्यों का साप्ताहिक चुनावी सर्वे किया है। 
सर्वे में सवाल किया गया कि क्या  प्रधानमंत्री मोदी को अपशब्द बोलकर गुजरात में चुनाव जीतना संभव है? इस सवाल के जनता ने चौंकाने वाले जवाब दिए हैं।

सी-वोटर के सर्वे में 61 प्रतिशत लोगों का मानना है कि प्रधानमंत्री मोदी को अपशब्द बोलकर गुजरात में चुनाव जीतना संभव नहीं है, जबकि 39 प्रतिशत लोगों ने कहा कि हां, प्रधानमंत्री मोदी को अपशब्द बोलकर गुजरात में चुनाव जीतना संभव है। सर्वे में गुजरात के 1425 और हिमाचल प्रदेश के 1,361 लोगों की राय ली गई। सर्वे में मार्जिन ऑफ एरर प्लस माइनस 3 से प्लस माइनस 5 प्रतिशत है।

इससे पहले 12 से 14 अक्टूबर,2022 के बीच C-Voter ने गुजरात चुनाव को लेकर एक और सर्वे किया था। इसमें प्रधानमंत्री मोदी के लिए आम आदमी पार्टी नेता गोपाल इटालिया द्वारा कथित तौर पर आपत्तिजनक टिप्पणी किए जाने के बाद पार्टी को कितना नुकसान हो सकता है, इस पर लोगों की राय ली गई थी। इस सर्वे में गुजरात के 1 हजार 337 लोगों से राय ली गई थी। इस सवाल के जवाब में 58 प्रतिशत लोगों ने अपने जवाब में कहा- ‘हां, AAP ने प्रधानमंत्री के लिए अपशब्द का इस्तेमाल करके सेल्फ गोल किया है’। वहीं इस सवाल पर 42 प्रतिशत लोगों का मानना था कि इससे आम आदमी पार्टी ने कोई सेल्फ गोल नहीं किया है।

आम आदमी पार्टी इस बार बीजेपी के गढ़ में सेंध मारने के पूरे-पूरे चक्कर में है। जहां, अरविंद केजरीवाल स्वयं को योगी राज श्री कृष्णजी के रूप में दर्शा रहे हैं, वहीं वो बीजेपी को वह ‘कंस’ का रूप देने को तत्पर हैं। साथ ही साथ, जिस प्रकार से गोपाल इटालिया ने कुंठित शब्द, ‘नीच’ का प्रयोग और इसके अलावा प्रधानमंत्री मोदी की मां का अपमान किया, उससे गुजराती जनता में काफी रोष है। लोगों का कहना है कि इसके लिए आप नेता गोपाल इटालिया को जनता माफ नहीं करेगी।

गौरतलब है कि गुजरात चुनाव में जब विरोधी दलों की दाल नहीं गल रही है तो वे अब गाली देने के स्तर तक नीचे गिर गए हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के करीबी और गुजरात AAP के अध्यक्ष गोपाल इटालिया उस वीडियो पर बुरी तरह घिर गए हैं, जिसमें वह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को ‘नीच किस्म का आदमी’ बताते हुए अपमानजनक शब्दों का इस्तेमाल किया था। वीडियो वायरल होने के बाद भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इसे पीएम मोदी के लिए जातिसूचक गाली करार दिया। इससे गुजरात एवं देश की जनता खासी नाराज हो गई। इसके बाद गोपाल इटालिया ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की। हालांकि इसमें उन्होंने पीएम मोदी से माफी नहीं मांगी और जाति से लेकर गांव के होने तक की अजब दलीलें दीं। 

मोदी एक नीच शख्स: गुजरात आप प्रमुख

इस वीडियो में गोपाल इटालिया को कहते हुए सुना जा सकता है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘नीच’ व्यक्ति हैं। मैं पुष्टि नहीं कर सकता लेकिन मैं आपसे पूछना चाहता हूं कि क्या देश का कोई पूर्व प्रधान मंत्री है जिसने वोट डालने के लिए इतनी नौटंकी की है? यह ‘नीच’ किस्म का शख्स यहां रोड शो कर रहा है। और वह दिखा रहा है कि मैं इस देश को कैसे C… बना रहा हूं। आप मेरे कहने का अर्थ को बेहतर ढंग से समझते हैं। वह डिजिटल इंडिया के बारे में बात करते हैं और वोट डालने के लिए दिल्ली से गुजरात जाते हैं। इस तरह वह देश को AAP के C… बना रहे हैं। तो, यह ‘नीच’ प्रकार का व्यक्ति देश को यह संदेश दे रहा है कि वह इस देश को कैसे C… बना रहा है।

2017 में मणिशंकर अय्यर ने भी कहा था नीच

यह पहली बार नहीं है जब किसी विपक्षी नेता ने पीएम नरेंद्र मोदी के लिए ‘नीच’ का इस्तेमाल किया है। 2017 में कांग्रेस के दिग्गज नेता मणिशंकर अय्यर ने पीएम मोदी को नीच आदमी कहा था। जिसे उन्होंने 2019 के चुनावों से पहले भी दोहरया था। उस वक्त भारत की जनता ने पीएम मोदी को ऐतिहासिक फैसला सुनाकर अय्यर को करारा जवाब दिया था। अब नरेंद्र मोदी के खिलाफ गोपाल इटालिया की इस ‘नीच’ टिप्पणी पर गुजरात के लोग माकूल जवाब देंगे।

मेरे सिर्फ शब्द खराब, इनके तो करम खराब : केजरीवाल का मोदी पर हमला

न्यूज18 की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में प्रधान सचिव राजेंद्र कुमार के आवास पर छापे मारने पर 2015 में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा था कि राजेंद्र तो बहाना है केजरीवाल उनका निशाना है। उन्होंने कहा कि मेरे तो सिर्फ शब्द खराब थे, लेकिन इनके तो कर्म ही खराब हैं।

मोदी देशद्रोही हैः केजरीवाल

इससे पहले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने कहा था कि मोदी देशद्रोही है, मोदी ने आतंकवादियों के साथ सेटिंग कर रखी है। यही नहीं, केजरीवाल ने पीएम मोदी को कायर, मनोरोगी, पाकिस्तान से हाथ मिलाने जैसे आक्रामक और उत्तेजक शब्दों का प्रयोग कर भड़काऊ बयानबाजी से नफरत फैलाने और समाज में शांति भंग करने की कोशिश की है।

मोदी एक बेशर्म तानाशाहः केजरीवाल

न्यूज18 की रिपोर्ट के अनुसार, केजरीवाल ने 2017 में आयकर विभाग द्वारा आम आदमी पार्टी (आप) का रजिस्ट्रेशन रद्द करने के लिए कहे जाने के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक बेशर्म तानाशाह करार दिया। आयकर विभाग ने पार्टी को मिलने वाले चंदे के बारे में झूठी और गलत ऑडिट रिपोर्ट दाखिल करने की वजह से निर्वाचन आयोग से आप का राजनीतिक दल के रूप में रजिस्ट्रेशन रद्द करने को कहा है।

मोदी के कारण भारत को दुनिया में होना पड़ा शर्मिंदा : संजय सिंह 

पंजाब केसरी की रिपोर्ट के अनुसार, केजरीवाल के करीबी और आम आदमी पार्टी (AAP) के वरिष्ठ नेता संजय सिंह ने कहा कि भाजपा की नफरत की राजनीति के कारण भारत का सिर शर्म से झुक गया है। संजय सिंह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भारत की अंतर्राष्ट्रीय बेइज्जती कराई है। भाजपा के कामों और नफरत की राजनीति के कारण भारत का सिर शर्म से झुक गया है। आजादी के 75 वर्षों में आज तक किसी प्रधानमंत्री ने भारत को इतना अपमानित नहीं किया और भारत का सिर इस तरीके से दुनिया के सामने नहीं झुकाया जितना मोदी ने झुकाने का काम किया है।

भयानक साजिश – प्रशांत किशोर और मोहता बानो द्वारा!

उगता भारत ब्यूरो 
विपक्ष बहुत ही भयावह साजिश पर काम कर रहा है।

पूरी तरह से जानते हुए, वे 2024 के लोकसभा चुनाव में मोदी और बीजेपी को नहीं हरा सकते हैं, और अच्छी तरह से जानते हुए, अगर वे हार गए तो उनके दिन गिने जाएंगे, वे बहुत ही भयावह साजिश पर काम कर रहे हैं।

यदि विपक्ष भाजपा और मोदी को हराने के लिए संयुक्त ताकत नहीं लगा सकता है, और अपना खुद का पीएम नहीं रख सकता है, तो उन्होंने कार्रवाई की दूसरी पंक्ति पर काम करना शुरू कर दिया है।

पीएम पद नहीं तो राष्ट्रपति पद क्यों नहीं?

विपक्ष राष्ट्रपति चुनाव के लिए अपने उम्मीदवार के रूप में सभी दलों द्वारा समर्थित एक बहुत वरिष्ठ, अच्छी तरह से समर्थन करने के लिए अपनी संयुक्त ताकत लगा रहा है।

एक बार जब उन्हें अपना राष्ट्रपति मिल जाता है, तो वही सरकार के पूरे कामकाज में एक विस्तार ला सकता है।

राष्ट्रपति लोकसभा और राजसभा द्वारा पारित प्रत्येक विधेयक को रोक कर वापस भेज देंगे।

वह सचमुच सभी सरकारी कामकाज को तब तक बंद कर देगा, जब तक कि सरकार झुक न जाए और अपने घुटनों पर न आ जाए।

और सरकार को उन सभी फैसलों को उलटने के लिए मजबूर करें जो विपक्ष के अनुकूल नहीं हैं।

राष्ट्रपति पूरी तरह से सरकारी तंत्र को रोककर भ्रष्ट मंत्रियों के खिलाफ सभी मामलों को छोड़ने के लिए सरकार के साथ बातचीत करेंगे।

और सरकार को सीएए, नागरिकता अधिनियम, 370 आदि को वापस लेने के लिए मजबूर करें, जो विपक्ष के प्रतिकूल हैं।

सभी विपक्षी दलों द्वारा सर्वसम्मति से समर्थन किए जाने वाले आम उम्मीदवार शरद पवार हैं। शरद पवार अध्यक्ष पद के लिए कमर कस रहे हैं.

और ममता बनर्जी के सीधे मार्गदर्शन और देखरेख में मास्टर रणनीतिकार प्रशांत किशोर को काम पर रखा गया है।

डब्ल्यूबी चुनावों में उनकी हालिया शानदार सफलता के बाद, संयुक्त विपक्ष उन्हें देने के लिए देख रहा है।

वर्तमान में विधानसभा की सीटें विपक्ष के पक्ष में हैं।

पश्चिम बंगाल में हाल की जीत के साथ, पैमाने विपक्ष के पक्ष में झुक गया है ताकि वे अपना खुद का राष्ट्रपति चुन सकें।

बीजेपी के लिए सिर्फ यूपी चुनाव में अच्छी संख्या में सीटें मिलने की उम्मीद है.

अगर उन्हें यूपी में प्रचंड बहुमत मिलता है, तो उनके पास अपनी पसंद का राष्ट्रपति पाने के लिए पर्याप्त संख्या है।

यदि उन्हें यूपी में वांछित सीटें नहीं मिलती हैं, तो उनके पास एक संयुक्त विपक्ष के खिलाफ बहुत कठिन समय होगा, जिसे कांग्रेस, एनसीपी, शिवसेना, अखिलेश यादव की समाजवादी पार्टी, लालूज राजद, ममता बनर्जी, केजरीवाल की आप, अकाली दल का समर्थन प्राप्त होगा। , DMK, CPI, CPM, चंद्रबाबू के तेलगु देशम और अन्य सभी लालू पंजू।

विपक्षी शासित राज्यों में एमएलसी के मजबूत आधार के साथ, विपक्ष के पास अपनी पसंद का राष्ट्रपति चुने जाने का अच्छा मौका है।

उम्मीद है कि उड़ीसा के बीजू पटनायक विपक्ष में शामिल नहीं होंगे और राष्ट्रपति चुनाव में भाजपा का समर्थन कर सकते हैं। इंतजार करना और देखना।

भाजपा को अगले कुछ महीनों में बहुत सावधान रहना होगा, छोटे क्षेत्रीय दलों से हर संभव समर्थन हासिल करने के लिए ताकि राज्य, विधानसभा में उनकी ताकत यूपी सीटों के साथ या बिना संयुक्त विपक्ष को हराने के लिए पर्याप्त हो।

यदि भाजपा राष्ट्रपति पद की दौड़ हार जाती है, तो 2024 के लोकसभा चुनावों में 400 सीटों और प्रचंड जीत के साथ भी उन्हें सरकार चलाने में मदद नहीं मिलेगी, अगर उनके पास अपना राष्ट्रपति नहीं है।

देश के लिए बहुत ही भयावह दौर आने वाला है।

और यह सब जानते हुए, विपक्ष अपने समर्थित उम्मीदवार को भारत के अगले राष्ट्रपति के रूप में चुने जाने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रहा है।

सभी भारतीय पात्र मतदाताओं के साथ साझा करें!

भगवान इन से भारत की रक्षा करें!(साभार)