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नेहरू ने किया कबाड़ा, पर सनातन का उपहास उड़ाने के लिए गढ़ दिया ‘हिन्दू रेट ऑफ ग्रोथ’

मोदी और नेहरू ( फोटो साभार-toi)
प्रधानमंत्री मोदी ने ‘हिन्दू रेट ऑफ ग्रोथ’ शब्दावली का इस्तेमाल कर गुलाम मानसिकता का परिचय देने वाले लोगों की क्लास लगाई है। हिन्दू सभ्यता और संस्कृति को कमतर दिखाने वाले लोगों ने इस शब्दावली का इस्तेमाल तब किया था, जब देश गरीबी की गर्त में था और 2-3 फीसदी ग्रोथ रेट पाने के लिए भी लालायित था।

1950 से तीन दशक का वह दौर, जब भारत में नेहरू जी के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस की सरकार थी और फिर उनकी बेटी इंदिरा ने देश की कमान लंबे अर्से तक संभाली। अर्थव्यवस्था के लिए इस्तेमाल होने वाले ग्रोथ रेट को हिन्दू सभ्यता और संस्कृति से जोड़ना दरअसल गुलामी मानसिकता को दर्शाता है। ऐसे लोगों को अब देश की प्रगति नहीं दिखती।

दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था की ग्रोथ रेट को अब ‘हिन्दू रेट ऑफ ग्रोथ’ नहीं कहते, बल्कि इन्हें हर बात पर सांप्रदायिकता दिखने लगी है। यानी देश तरक्की करे तो सरकार का हर काम ‘सांप्रदायिक’ हो गया और जब देश बदहाल था, तो इसके लिए हिन्दू सभ्यता और संस्कृति दोषी था।

पीएम ने साफ कहा है कि भारत की अर्थव्यवस्था को ‘हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ’ तब कहा गया जब भारत 2-3% की ग्रोथ के लिए तरस गया था। आज जब देश की अर्थव्यवस्था दुनिया में सबसे तेज गति से बढ़ रही है, लेकिन आज कोई इसे ‘हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ’ नहीं कहता है।

उन्होंने कहा कि किसी देश की इकोनॉमी ग्रोथ को वहाँ रहने वाले बहुसंख्यक लोगों की आस्था से जोड़ना गुलामी की मानसिकता का परिचायक था, क्योंकि इसके माध्यम से पूरे समाज को गरीब दिखाने की कोशिश की गई।

उन्होंने पूछा , “भारत आज दुनिया की सबसे तेज़ी से आगे बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था है…लेकिन क्या आज कोई इसे हिंदू रेट ऑफ़ ग्रोथ कहता है क्या?” उन्होंने कहा कि हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ’ शब्द का इस्तेमाल कर पूरे समाज और पूरी परंपरा को गरीबी का पर्याय बना दिया गया। ये साबित करने का प्रयास किया गया कि भारत की धीमी विकास दर का कारण हमारी हिंदू सभ्यता और हिंदू संस्कृति है। आज जो बुद्धिजीवी हर बात में सांप्रदायिकता ढूंढते हैं, उन्हें ‘हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ’ में ये नहीं दिखा?

पीएम मोदी ने आर्थिक विकास के ताजा आंकड़ों का जिक्र करते हुए कहा कि भारत दुनिया की सबसे तेज गति से आगे बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बन गया है। हाल ही जारी आंकड़ों के मुताबिक, मौजूदा वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में भारत की विकास दर 8.2 फीसदी रही है। ये काफी उत्साहित करने वाली है, जो चीन से भी ज्यादा है।

पीएम की भावना को बल देते हुए मशहूर वकील महेश जेठमलानी ने कहा कि दशकों से इस्तेमाल किया गया ‘हिन्दू ग्रोथ रेट’ दरअसल औपनिवेशक भारत का मजाक उड़ाने और भारतीय सभ्यता और संस्कृति को नीचा दिखाने के लिए किया गया। दरअसल सरकार की नीति की कमियों को सांस्कृतिक कमी के तौर पर पेश किया गया।

भारतीय संस्कृति का अपमान- महेश जेठमलानी

जेठमलानी ने एक्स पर ट्वीट किया, “प्रधानमंत्री मोदी ने दशकों पुराने तथाकथित ‘हिंदू विकास दर’ के कलंक को वही बताया जो यह हमेशा से था…। यह अर्थशास्त्र में लिपटा एक अपमान था, एक कहानी जो भारतीयों को यह विश्वास दिलाने के लिए डिज़ाइन की गई थी कि ठहराव हमारी नियति है…। पिछले 11 वर्षों ने हमने दिखाया है कि हम कैसे भारतीय खराब नीति और उधार के निराशावाद दौर से मुक्त हुए हैं और वैश्विक औसत से ज्यादा तेज गति से आगे बढ़ रहे हैं। यह हमारा स्वाभाविक रास्ता है।”

‘हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ’ क्या है?

भारत का 6000+ साल का शानदार सभ्यता का इतिहास रहा है और इस लंबे समय के दौरान, भारत गर्व से ग्लोबल इकॉनमी में सबसे ऊपर रहा है। इस बात को अमेरिकी इतिहासकार विल डुरंट की किताब ‘द केस फॉर इंडिया’ में बहुत अच्छे से दिखाया गया है।

सत्रहवीं सदी तक, भारत की GDP दुनिया की GDP की एक-तिहाई थी। इस्लामी हमलावरों की 800 साल की लूट भी इस महान देश के रिसोर्स को खत्म नहीं कर पाई। अंग्रेजों के आने के बाद ही असली दौलत का नुकसान शुरू हुआ, और भारत में साल दर साल लगातार अकाल पड़ने लगे।

हिंदू रेट ऑफ़ ग्रोथ शब्द 1978 में एक तथाकथित इकोनॉमिस्ट राज कृष्ण ने 1950 से 1980 के दशक तक 3.5 परसेंट GDP ग्रोथ रेट के लिए किया था। यह सोच अपने आप में गलत है क्योंकि इस समय और उसके बाद भी इकोनॉमी में हिंदुओं का मुख्य योगदान था।

भारत में सभी धर्मों के लोग रहते हैं, इकोनॉमिक प्लानर्स ने ग्रोथ का भार हिंदुओं पर डाल दिया और इसलिए ‘हिंदू रेट ऑफ़ ग्रोथ’ शब्द बना कि उन्होंने जो कुछ भी करने का दावा किया, उसके बावजूद ग्रोथ लगभग स्थिर थी और वह भी लगभग 3.5% पर। हिंदू कोई पॉलिसी मेकर नहीं थी ऐसे में अर्थव्यवस्था की विकास को हिन्दू से जोड़ना सरासर हिन्दू धर्म और संस्कृति का उपहास उड़ाना था

आजादी के बाद कई दशकों तक कॉन्ग्रेस की सरकार की नीतियाँ देश के विकास की रफ्तार तय कर रही थी। बुनियादी सुविधाओं की कमी, तेज गति से बढ़ रही जनसंख्या और गरीबी मुख्य दिक्कतें थी, इसकी जिम्मेदारी सरकार की थी, न कि भारत की सभ्यता और संस्कृति इसके लिए जिम्मेदार थी।

इसे ‘नेहरू रेट ऑफ ग्रोथ’ कहें, ना कि ‘हिन्दू रेट ऑफ ग्रोथ’

नेहरू भारत के पहले प्रधानमंत्री थे, वे 1964 तक इस पद पर रहे। देश की आर्थिक नीति नेहरू के नेतृत्व वाली सरकार ने ही तय की थी। इसलिए शुरुआती दशकों की आर्थिक ग्रोथ को ‘नेहरू रेट ऑफ ग्रोथ’ कहना ज्यादा सही है। नेहरू राज और इंदिरा राज के सालों के आर्थिक ग्रोथ को हिन्दू संस्कृति से जोड़ना सरासर गलत है।

नेहरू समाजवादी के समर्थक थे। उसके वक्त में सरकार होटल भी चलाती थी। बिड़ला और टाटा जैसे उद्योगपतियों को बिजनेस बढ़ाने के लिए उतनी आजादी नहीं दी गई। नेहरू की इस ‘सोच’ को ही ग्रोथ की धीमी रफ्तार के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।

नेहरू की इकोनॉमिक पॉलिसी इतनी गलत थीं कि देश लगभग हमेशा खाद्यान संकट से जुझता रहा। इतना ही नहीं, उनकी छोटी सोच ने उन्हें नदी के बांधों को ‘मॉडर्न इंडिया के मंदिर’ कहने पर मजबूर किया। नेहरू की पॉलिसी को फिर उनकी बेटी इंदिरा गांधी ने आगे बढ़ाया, जिन्होंने बैंकिंग, टेक्सटाइल, कोयला, स्टील, कॉपर जैसे सेक्टर्स का राष्ट्रीयकरण कर दिया। ये पूरा कार्यकाल ही ‘हिन्दू रेट ऑफ ग्रोथ’ कहलाया।

रघुराम राजन ने 2023 में कहा ‘हिन्दू रेट ऑफ ग्रोथ’

आरबीआई के पूर्व गर्वनर रघुराम राजन ने 2023 में ‘हिन्दू रेट ऑफ ग्रोथ’ शब्दावली का इस्तेमाल किया था। उन्होंने सरकार को चेतावनी दी थी कि कमजोर निवेश, उच्च ब्याज दर और धीमी वैश्विक विकास के कारण भारत ‘हिन्दू रेट ऑफ ग्रोथ’ के करीब है।

राजन ने कहा था कि नेशनल स्टैटिस्टिकल ऑफिस (NSO) द्वारा जारी नेशनल इनकम का अनुमान चिंताजनक है। 2023 के फ़ाइनेंशियल ईयर की तीसरी तिमाही (अक्टूबर-दिसंबर) में ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट (GDP) दूसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर) के 6.3% से घटकर 4.4% हो गई थी। पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में यह 13.2% थी।

उन्होंने कहा था कि भारत को कोविड से हुई आर्थिक मंदी से उबरने में कई साल लगेंगे, लेकिन भारत एक साल में ही अपनी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में कामयाब रहा। उन्होंने कभी माफ़ी नहीं माँगी।

उन्होंने आर्थिक विकास में मंदी के लिए ‘हिंदू ग्रोथ रेट’ शब्द का इस्तेमाल किया है। रघुराम राजन 2013 से 2016 तक RBI के गवर्नर थे। यह समय स्थिर फॉरेक्स रिज़र्व और कई दूसरे विवादों से भरा रहा। उनके पद से हटाए जाने के बाद, RBI का फॉरेक्स रिजर्व बढ़कर 600 बिलियन+ के ऑल-टाइम हाई पर पहुँच गया। राजन पिछले 5 सालों से लगातार भारत के लिए ‘गंभीर आर्थिक संकट’ की भविष्यवाणी करते हैं और मुँह की खाते हैं।

फिर भी ऐसे लोग भारत-विरोधी ‘हिन्दू रेट ऑफ ग्रोथ’ से चिपके हुए हैं। वे आंकड़ों का बचाव नहीं कर रहे हैं। वे एक ऐसे विश्वदृष्टि का बचाव कर रहे हैं जो एक आत्मविश्वासी, सुधारवादी, आत्मनिर्भर भारत को स्वीकार नहीं करना चाहता।

ये लोग देश की ‘आत्मा’ को नहीं जानते, अर्थव्यवस्था के विकास को गाँव के रास्ते पर बढ़ते नहीं पहचान पाते और सरकार की आलोचना विदेशी मापदंडों के आधार पर करते हैं। आज भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ रहा है।

दुनिया की चौथी अर्थव्यवस्था 2023 तक तीसरी अर्थव्यवस्था बनने की राह पर है। ये न सिर्फ खुद बढ़ रहा है, बल्कि वैश्विक गति को भी आगे बढ़ा रहा है। दुनिया में भारत का महत्व दिन प्रति दिन बढ़ता जा रहा है। सरकार की नीति, उद्यमशीलता और सुधार लगातार देश को ऊँचाई दे रहे हैं। ये झूठा प्रचार नहीं बल्कि वह सच्चाई है, जिसे पूरी दुनिया मान रही है।

सेना के अपमान पर सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गाँधी को लताड़ा, न्यायपालिका पर झुंड बना कर INDI गठबंधन टूटा: प्रियंका बोलीं- जज नहीं करेंगे तय

                          प्रियंका गाँधी ने राहुल गाँधी का बचाव करते हुए सुप्रीम कोर्ट पर उठाए हैं सवाल
सेना पर आपत्तिजनक बयान मामले में राहुल गाँधी को सुप्रीम कोर्ट ने फटकारा है। इसके बाद कांग्रेस अब सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ ही खड़ी हो गई है। कांग्रेस सांसद प्रियंका गाँधी ने न्यायपालिका को घेरने का प्रयास किया है। उन्होंने एक तरह से यह इशारा कर दिया है कि जज राहुल गाँधी पर टिप्पणी नहीं कर सकते हैं। कांग्रेस के साथ ही बाक़ी विपक्षी दल भी सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ लामबंद हैं।

आखिरकार INDI गठबंधन ने अपने औकात दिखा ही दी कि उन्हें देश नहीं अपनी कुर्सी प्यारी है। और उस कुर्सी तक पहुँचने के लिए किसी को भी नीचा दिखा जनता को पागल बनाते रहेंगे? INDI गठबंधन में क्या राहुल से यह पूछने की हिम्मत है कि आखिर चीन के साथ क्या MoU किया है? इस मुद्दे पर लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को संसद में राहुल से इस MoU के बारे में सख्ती पूछना चाहिए।  

प्रियंका गाँधी ने क्या कहा?

प्रियंका गाँधी ने मंगलवार (5 अगस्त,2025) को संसद परिसर में पत्रकारों से बातचीत करते हुए कहा, “सुप्रीम कोर्ट के जजों का पूरा सम्मान रखते हुए मैं ये कहना चाहती हूँ कि वे यह तय नहीं करेंगे कि सच्चा भारतीय कौन है।”
उन्होंने आगे कहा, “विपक्ष के नेता के नाते सरकार से सवाल पूछना उनका (राहुल गाँधी) कर्तव्य है। मेरे भाई कभी भी सेना के खिलाफ नहीं बोलेंगे, वह उनके प्रति बहुत सम्मान रखते हैं। उनकी बातों का गलत मतलब निकाला गया।”

INDI ब्लॉक ने भी सुप्रीम कोर्ट का किया अपमान

कांग्रेस की सोशल मीडिया प्रमुख सुप्रिया श्रीनेत ने एक X पोस्ट में लिखा, “आज सुबह इंडी गठबंधन के नेताओं की बैठक में सर्वोच्च न्यायालय के एक वर्तमान न्यायाधीश द्वारा राहुल गाँधी जी पर की गई टिप्पणी पर चर्चा हुई।”
श्रीनेत ने आगे लिखा, “इंडी गठबंधन के सभी घटक दल इस बात से सहमत हैं कि वर्तमान न्यायाधीश ने एक ऐसी टिप्पणी की है जो राजनीतिक दलों के लोकतांत्रिक अधिकारों के विरुद्ध है। राष्ट्रीय हित के मुद्दों पर टिप्पणी करना राजनीतिक दलों, विशेषकर नेता प्रतिपक्ष का दायित्व है।”
वरिष्ठ कांग्रेस नेता अजय माकन ने भी सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पर सवाल उठाए हैं। माकन ने एक X पोस्ट में लिखा, “राहुल गाँधी जी और कांग्रेस पार्टी लगातार चीन के मुद्दे पर सरकार से सवाल पूछ रही है, यह हमारा राष्ट्रीय कर्तव्य है… राहुल गाँधी की आवाज़ दबाने की हर कोशिश, सरकार की विफलताओं और उनके डर को उजागर करती है। ओ माई लार्ड।”

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा था?

सुप्रीम कोर्ट में सोमवार(4 अगस्त) को जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस एजी मसीह की बेंच ने राहुल गाँधी की याचिका पर सुनवाई की थी। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान राहुल गाँधी के वकील अभिषेक मनु सिंघवी से कहा था, “आपको कैसे पता चला कि चीन ने 2000 वर्ग किलोमीटर भारतीय ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया है? क्या आप वहाँ थे?
कोर्ट ने आगे कहा, “आपके पास कोई विश्वसनीय जानकारी है? आप बिना किसी सबूत के ये बयान क्यों दे रहे हैं…अगर आप सच्चे भारतीय होते, तो ये सब नहीं कहते।”
सिंघवी ने कोर्ट में कहा कि अगर वह प्रेस में छपी ये बातें नहीं कह सकते तो वह विपक्ष के नेता नहीं हो सकते। तो इस पर जस्टिस दत्ता ने पूछा, “आपको जो कुछ भी कहना है, संसद में क्यों नहीं कहते? आपको सोशल मीडिया पोस्ट में ऐसा क्यों कहना पड़ता है?”

क्या था मामला?

यह मामला लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गाँधी की चीन पर भारत के कब्जे और भारतीय सैनिकों के चीनी सैनिकों द्वारा ‘पीटे जाने’ की टिप्पणी से जुड़ा था। उन्होंने कहा था, “लोग भारत जोड़ो यात्रा, अशोक गहलोत और सचिन पायलट वगैरह के बारे में तो पूछेंगे ही। लेकिन चीन द्वारा 2000 वर्ग किलोमीटर भारतीय ज़मीन पर कब्ज़ा करने, 20 भारतीय सैनिकों को पीटने और अरुणाचल प्रदेश में हमारे सैनिकों की पिटाई के बारे में एक भी सवाल नहीं पूछेंगे।”

राहुल के इस बयान के बाद सीमा सड़क संगठन के एक अधिकारी ने उनके खिलाफ केस दर्ज कराया था। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस मामले में केस दर्ज करने से मना कर दिया था जिसके बाद राहुल गाँधी ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था

पीएम मोदी ने भी किया SC की टिप्पणी का जिक्र

रिपोर्ट्स के मुताबिक, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एनडीए की संसदीय दल की बैठक को संबोधित करते हुए सुप्रीम कोर्ट की राहुल गाँधी पर की गई टिप्पणी की जिक्र किया है। पीएम मोदी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट द्वारा कल लगाई गई फटकार से बड़ी कोई फटकार नहीं हो सकती है।

उन्होंने कहा, “हम क्या कहें, जब सुप्रीम कोर्ट ने ही कह दिया… ये तो पत्थर मारना ही नहीं, ये ‘आ बैल मुझे मार’ वाली स्थिति है।”

जो लड़की/औरत नहीं उसको भी मिले माहवारी पर छुट्टी: मनोज झा LGBTQIA पर हुए स्खलित, स्मृति ईरानी ने ‘पीरियड के प्रचार’ पर धो डाला

माहवारी के नाम पर कार्यस्थलों पर महिलाओं को पेड छुट्टी मिले या नहीं… ये इन दिनों बहस का मुद्दा है। केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने हाल में ऐसे किसी भी विचार का विरोध किया था। अब एक साक्षात्कार में उन्होंने बताया है कि वो नहीं चाहतीं कि कार्यस्थलों पर महिलाओं को भेद-भाव महसूस करना पड़े इसलिए उन्होंने इस नीति को लाने का विरोध किया था।

याद दिला दें कि ईरानी ने माहवारी पर पेड लीव के मुद्दे पर कहा था कि ये कोई दिव्यांग होने जैसा नहीं है कि इसके लिए अलग से पेड लीव दी जाए।

अब उन्होंने समाचार एजेंसी एएनआई से बात करते हुए कहा है कि वो इस मुद्दे पर और भी बहुत बोल सकती थीं, लेकिन जिन्होंने (राजद सांसद मनोज झा) सवाल किए थे उनका मकसद महिलाओं की परेशानियों का समाधान ढूँढना नहीं था। ईरानी ने इंटरव्यू में बताया कि संसद में उन्होंने जो कुछ भी बोला वो निजी अनुभव झेलने के बाद बोला ताकि और किसी महिला के साथ भेदभाव न हो।

उन्होंने कहा कि अगर ऐसी नीति आ जाती है तो एक महिला को अपनी लीव के लिए पहले अपने बॉस और एचआर को बताना होगा कि उसके पीरियड्स हैं इसलिए छुट्टी चाहिए। ईरानी पूछती हैं कि आखिर महिलाओं को क्यों फोर्स किया जा रहा है कि वो अपने पीरियड के दिनों को प्रचार करें? क्यों आखिर आपको नौकरी देने वाले को आपके पीरियड्स की जानकारी क्यों होनी चाहिए? वह कहती हैं कि क्या कोई इस बात की कल्पना कर सकता है कि महिलाओं को कितना ज्यादा भेदभाव झेलना पड़ेगा। उन्हें काम करने में कितनी बाधाएँ आएँगी।

माहवारी के दौरान महिलाओं को छुट्टी देने का मुद्दा पिछले दिनों संसद में राजद सांसद मनोज झा ने उठाया था। उन्होंने केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी ने जो सवाल किए उनकी लिस्ट आप नीचे देख सकते हैं।

झा को शायद नहीं मालूम कि कई महिलाएं तो माहवारी के बारे में अपने पति तक को पता नहीं होने देती, और सार्वजनिक करने की बात कर रहे हैं। कैसी मानसिकता हो गयी है हमारे नेताओं की सोंच? जिन मुद्दों पर संसद में चर्चा करनी चाहिए उन पर करते नहीं, फालतू के मुद्दों पर संसद का समय बर्बाद करने संसद पहुँच जाते हैं। 

यहाँ पूछा गया है कि क्या सरकार मेंस्ट्रुअल हाइजीन पॉलिसी लाने के विचार में है? अगर है जो विवरण दे ; क्या उस नीति में LGBTQIA कम्युनिटी के लोगों के मेंस्ट्रुअल हाइजिन के लिए भी प्रावधान हैं? क्या सरकार इस मुद्दे से जुड़े अभियान स्कूल-कॉलेजों में चला रही है? अगर है तो विवरण है और नहीं है तो कारण दें।

संसद में मुद्दे को उठाने के बाद मनोज झा ने कहा था कि लालू सरकार में 1992-93 में बिहार में ये लीव देने का प्रावधान बिहार में लाया गया था। जिसे ईरानी ने इंटरव्यू के दौरान फर्जी दावा बताया और कहा कि किसी प्राइवेट सेक्टर में ऐसा रूल नहीं चालू हुआ।

इसके अलावा उन्होंने मुख्य रूप से उस तीसरे प्रश्न को उठाया जिसमें मनोझ झा ने LGBTQIA समुदाय का जिक्र किया था। उन्होंने कहा, “झा जी ने मौखिक उत्तरों के लिए प्रश्नों की सूची में मुझसे LGBTQIA प्लस समुदाय के लिए मासिक धर्म स्वच्छता के उपायों के बारे में पूछा। अब मुझे बताएँ, LGBTQIA समुदाय जिसके लिए माननीय सदस्य प्रतिक्रिया चाहते थे, किस समलैंगिक पुरुष को गर्भाशय के बिना मासिक धर्म होता है?”