Showing posts with label used. Show all posts
Showing posts with label used. Show all posts

खतरनाक हैं ‘फॉस्फोरस बम’ जो इजरायल ने लेबनान पर दागे; गला देता है हड्डियाँ, हर तरफ फैलती है आग: UN ने किया है बैन

                                            इजरायल का फॉस्फोरस बम धमाका ( फोटो साभार-abp)
इजरायल ने ईरान के साथ लेबनान पर भी हमले किए हैं। इस बीच दावा किया जा रहा है कि इजरायल ने दक्षिणी लेबनान के योहमोर शहर के रिहायशी इलाकों में व्हाइट फॉस्फोरस से बने बमों का इस्तेमाल किया। ये बम रिहायशी इलाकों में इस्तेमाल नहीं किए जा सकते, क्योंकि संयुक्त राष्ट्र संघ ने इस पर प्रतिबंध लगा रखा है।

ह्यूमन राइट्स वॉच के मुताबिक, इजरायल की सेना ने 3 मार्च 2026 को दक्षिणी लेबनान के योहमोर शहर में घरों के ऊपर सफेद फॉस्फोरस से बने गोला बारूद का इस्तेमाल किया।

ह्यूमन राइट्स वॉच ने आठ तस्वीरों को वेरिफाई करने और उसकी लोकेशन की पुष्टि करने के बाद कहा कि शहर के एक रिहायशी हिस्से में सफेद फॉस्फोरस से बने बम गिराए गए। स्थानीय सुरक्षाकर्मी उस इलाके में कम से कम दो घरों और एक कार में लगी आग पर काबू पाने की कोशिश कर रहे थे।

ह्यूमन राइट्स वॉच के एनालिसिस से पता चलता है कि आग शायद सफेद फॉस्फोरस लगे फेल्ट वेजेज की वजह से लगी होगी, क्योंकि घर और कार उस इलाके के बहुत पास थे जहाँ विस्फोट हुए थे। जिससे पता चलता है कि सफेद फॉस्फोरस का इस्तेमाल आम लोगों पर गैर-कानूनी तरीके से किया गया था।

ह्यूमन राइट्स वॉच में लेबनान के रिसर्चर रामजी कैस ने कहा, “इज़राइली सेना का रिहायशी इलाकों में सफेद फॉस्फोरस का गैर-कानूनी इस्तेमाल बहुत चिंताजनक है और इसके आम लोगों के लिए गंभीर नतीजे होंगे।” “सफेद फॉस्फोरस की वजह से मौत का आँकड़ा बढ़ सकता है और गंभीर चोटें लग सकती हैं, जिसका असर जिंदगी भर रह सकता है।”

गाजा-लेबनान पर 2023 में इस्तेमाल का दावा

मानवाधिकार संगठन के मुताबिक, रिहायशी इलाके में कम से कम दो गोले ऐसे तोप से दागे गए जिसकी तस्वीरों से साफ था कि इनमें सफेद फॉस्फोरस का इस्तेमाल किया गया था, क्योंकि इस गोले के हवा में फटने से धूएँ का पैटर्न एम825-सीरीज के 155 एमएम तोपखाने के गोले के फटने से बनने वाले उंगली के जोड़ के शेप से मिलता जुलता था। ये तोपखाना सफेद फॉस्फोरस के इस्तेमाल के लिए जाना जाता है।

3 मार्च की सुबह 5:27 बजे इजरायल के अरबी मिलिट्री प्रवक्ता अविचाय अद्राई ने एक आदेश जारी किया, जिसमें कहा गया था कि योहमोर और 50 दूसरे गाँवों और कस्बों के रहने वाले तुरंत अपने घर खाली कर दें और गाँवों से कम से कम 1000 मीटर दूर खुली जगह पर चले जाएँ। अद्राई ने उसी दिन दोपहर 12:12 बजे फिर लोगों को घरों से दूर जाने के लिए कहा। ह्यूमन राइट्स वॉच ने यह वेरिफाई नहीं किया है कि उस इलाके में लोग थे या व्हाइट फॉस्फोरस के इस्तेमाल की वजह से उनकी मौत हो गई या बुरी तरह घायल हुए।

इससे पहले साल 2023 में ह्यूमन राइट्स वॉच ने इजरायल पर गाजा और लेबनान में सैन्य अभियान के दौरान सफेद फॉस्फोरस के इस्तेमाल का आरोप लगाया था। ह्यूमन राइट्स वॉच ने अक्टूबर 2023 और मई 2024 के बीच दक्षिणी लेबनान के बॉर्डर वाले गाँवों में इजराइली सेना के सफेद फॉस्फोरस के बड़े पैमाने पर इस्तेमाल के सबूत पेश किए थे। इस हमले में बड़े पैमाने पर जान-माल की क्षति हुई थी और आम लोगों बड़ी संख्या में घायल हुए और उन्हें बेघर होना पड़ा।तब इजरायली सिक्योरिटी फोर्सेज ने इन आरोपों का खंडन किया था।

क्या है सफेद फॉस्फोरस

सफेद फॉस्फोरस एक केमिकल अत्यधिक ज्वलनशील पदार्थ है। यह हवा में खुद ही तेजी से जल उठता है। ऑक्सीजन के संपर्क में आने पर इसका तापमान 815 डिग्री तक सेल्सियस तक पहुँच जाता है यानी यह 815 डिग्री तक गर्मी पैदा करता है। यह तब तक जलता रहता है, जब तक यह पूरी तरह खत्म न हो जाए। इसलिए जब तोप के गोले, बम और रॉकेट में इस्तेमाल किया जाता है, तो बम के फटते ही ये ऑक्सीजन के संपर्क में आ जाता है और तेजी से जलता है।

इससे आसपास के घरों, खेतों और लोगों के झुलसने की आशंका ज्यादा होती है। दरअसल ये स्किन को झुलसा कर शरीर के खून में मिल जाता है और अंगों को नुकसान पहुँचा सकता है। कई अंग काम करना बंद कर देती हैं और पैरालाइज होने का खतरा होता है। अगर फॉस्फोरस का अंश मात्र भी शरीर में रह गया है और वह भाग हवा के संपर्क में आ गया, तो फिर से झुलसा सकता है। फॉस्फोरस बम से लगी आग पानी से नहीं बुझती, बल्कि इस पर रेत आदि का इस्तेमाल किया जाता है।

प्रतिबंधित है सफेद फॉस्फोरस से बने बम का इस्तेमाल करना

इंटरनेशनल मानवाधिकार कानून के तहत, आबादी वाले इलाकों में सफेद फॉस्फोरस का इस्तेमाल धुआँ पैदा करने, रोशनी करने या टारगेट तक पहुँचने के दौरान बंकरों और इमारतों को जलाना, मिलिट्री के लोगों और सामान को छिपाना, निशान बनाना, सिग्नल देना या सीधे हमला करना शामिल है। लेकिन इसका इस्तेमाल रिहायशी इलाकों में नहीं किया जा सकता यानी यह सुनिश्चित करना होता है कि इसके इस्तेमाल से आम लोगों को नुकसान नहीं होगा।

संयुक्त राष्ट्र संघ ने ‘दी कन्वेंशन ऑन सर्टन कन्वेंशनल वेपन्स’यानी सीसीडब्लू में खास तरह के हथियारों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाया गया है। इसमें कई युद्ध सामग्रियों के बारे में बताया गया है, जिसका सिर्फ सैन्य उद्देश्यों के लिए सीमित मात्रा में इस्तेमाल किया जा सकता है। इन्हें आम लोगों पर कभी भी इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। हालाँकि, संयुक्त राष्ट्र के इन शर्तों को इजरायल नहीं मानता। उसने इस प्रस्ताव पर साइन भी नहीं किए हैं।

ममता बनर्जी के ‘दखल’ से चर्चा में आया 49 साल पुराना किस्सा : CBI का छापा, सोनिया का पास्ता मेकर और इंदिरा गाँधी

                                   बंगाल मुख्यमंत्री की दखल से चर्चा में आया इंदिरा गाँधी वाला किस्सा
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कॉन्ग्रेस के चुनावी प्रबंधन का काम देखने वाली I-PAC कंपनी पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) के छापे के दौरान जो ड्रामा हुआ, उसे ऑन टीवी हर किसी ने देखा। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद कंपनी के मालिक के घर पहुँची और जरूरी फाइलें, लैपटॉप और अन्य दस्तावेज लेकर निकल गईं। उनका यह रवैया देख हर कोई हैरान रह गया कि मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए ऐसा कैसे किया जा सकता है।

यह पहली बार नहीं है जब किसी बड़े राजनीतिक नाम ने जाँच एजेंसियों से बचने के लिए असामान्य कदम उठाए हों। इतिहास में ऐसा एक बड़ा उदाहरण 1977 का है जिसका जिक्र कैथरीन फ्रैंक की किताब- इंदिरा- द लाइन ऑफ इंदिरा नेहरू में पढ़ने को मिलता है।

                             फ्रैंक कैथरीन की किताब, जिसमें घटना का जिक्र है (फोटो साभार: अमेजन)

जब इंदिरा गाँधी के घर पड़ी CBI की रेड

ये वो समय था जब 1977 में आपातकाल के बाद जाँच के लिए शाह आयोग का गठन किया गया। आयोग का उद्देश्य इमरजेंसी के दौरान हुई ज्यादतियों और दुरुपयोग की जाँच करना था। आयोग ने इंदिरा गाँधी को कई बार पूछताछ के लिए बुलाया, लेकिन वह हर बार अपने वकील फ्रैंक एंथनी की सलाह पर आयोग के समक्ष पेश होने से इनकार करती रहीं और इसे असंवैधानिक और गैरकानूनी भी ठहरा दिया।

एक तरफ इंदिरा गाँधी लगातार शाह कमीशन से बचने की कोशिशों में लगी हुईं थीं। दूसरी तरफ जाँच एजेंसियों की पड़ताल शुरू थी। किताब में लिखे अंश के अनुसार, 3 अक्तूबर 1977 का दिन आया। उनके घर 12 विलिंगडन क्रेसेंट पर सीबीआई की रेड पड़ी। उनके बेटे संजय और बहू मेनका लॉन पर बैडमिंटन खेल रहे थे। दो सीबीआई अधिकारी उन्हें गिरफ्तार करने आए और इंदिरा गाँधी से कहा कि वे हिरासत में ली जाती हैं। हालाँकि, इंदिरा ने ऐसा होने की उम्मीद लगाई हुई थी और शायद इससे निपटने की उनकी रणनीति भी तैयार थी।

सीबीआई अधिकारियों से उस समय इंदिरा गाँधी ने पैकिंग के लिए समय माँगा और घर के भीतर चली गईं। करीबन 5 घंटे वह घर में रहीं और शाम के 8 बजे वह सफेद साड़ी (हरी बॉर्डर वाली) पहनकर भीड़ के आगे आईं। बताया जाता है कि इन पाँच घंटों में इंदिरा गाँधी ने घर के भीतर बहुत कुछ किया। उन्होंने अपने समर्थकों को बुलाया, प्रेस को सूचित किया, परिजनों से बात की और सामान बाँधा, जिसमें सबसे हैरान करने वाली चीज थी सोनिया गाँधी का एक पास्ता मेकर।

                                                 कैथरीन फ्रैंक की किताब में लिखे अंश का स्क्रीनशॉट

किताब में एक अफवाह के तौर पर ही सही, लेकिन ये बताया गया है इंदिरा गाँधी के सामान में उस समय पास्ता मेकर मिलने की कोई वजह नहीं थी सिवाय इसके कि उन्होंने इससे उन दस्तावेजों को नष्ट किया जो उनके लिए समस्या बन सकते थें।

                                           कैथरीन फ्रैंक की किताब में लिखे अंश का स्क्रीनशॉट

इसके बाद क्या सब हुआ ये इतिहास में दर्ज है। इंदिरा गाँधी ने तब इस गिरफ्तारी को अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए भुनाया। बाद में सुनवाई हुई। मजिस्ट्रेट कोर्ट ने ठोस सबूत न मिलने पर उन्हें रिहा कर दिया। और ये चर्चा कभी नहीं हुई कि वो कागज क्या थे जिन्हें इंदिरा गाँधी ने पास्ता मेकर में डालकर काट दिया।

आज जब मीडिया में ममता बनर्जी से जुड़ी खबरें आई है तो ये किस्सा और भी प्रांसगिक हो गया कि कैसे इंदिरा गाँधी ने चालाकी से न केवल 5 घंटे में अपने लिए समर्थन बटोरा बल्कि अपने खिलाफ रखें सबूतों को भी नष्ट कर दिया। ये सच है कि उस समय इंदिरा के पक्ष में जैसे लोग आए 1978 में उन्हें उसका सीधा फायदा हुआ, मगर बंगाल में स्थिति ऐसी नहीं देखने को मिल रही। लोग ममता बनर्जी की हरकत पर सवाल खड़ा कर रहे हैं। ईडी उनकी हरकत के खिलाफ हाई कोर्ट चला गया है। वहीं बंगाल सीएम ने भी इस मामले में अधिकारियों के विरुद्ध शिकायत दी है। देखना यही है कि इस घटना को बंगाल की जनता कैसे लेगी?

तेलंगाना के मुख्यमंत्री या गली छाप नेता! राहुल के करीबी रेवंत रेड्डी ने विधानसभा में दी गंदी गालियां


आज कांग्रेस ने मोदी-योगी-अमित विरोध में इतना नीचे गिर गयी है कि गाली-गलोच पर उतर आयी है। क्या मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी द्वारा विधानसभा में गालियां देना साबित करता है कि कांग्रेस एक राजनीतिक पार्टी नहीं गली-छाप पार्टी बन गयी है?     

राजनीति में वैचारिक मतभेद होना आम बात है, लेकिन जब संवैधानिक कुर्सी पर बैठा व्यक्ति ‘गली-छाप’ भाषा पर उतर आए, तो समझ लीजिए कि लोकतंत्र खतरे में है। तेलंगाना के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने विधानसभा जैसी पवित्र जगह पर जो किया, उसे सुनकर आप माथा पकड़ लेंगे। राहुल गांधी के करीबी माने जाने वाले मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने सदन के भीतर मर्यादा की सारी सीमाएं लांघते हुए विपक्षी नेताओं को सरेआम गंदी गालियां दीं।

शनिवार, 3 दिसंबर को विधानसभा सत्र के दौरान जब चर्चा नीति और विकास पर होनी चाहिए थी, तब सीएम रेवंत रेड्डी बीआरएस (BRS) नेताओं केटीआर और हरीश राव पर इस कदर भड़के कि उन्होंने अपनी भाषा का स्तर सड़क छाप बना लिया। मुख्यमंत्री ने ‘भ*#वा’ जैसे अपशब्दों का इस्तेमाल किया। सवाल यह उठता है कि क्या एक मुख्यमंत्री को इस तरह की धमकी और गाली-गलौज शोभा देती है?

हैरानी की बात सिर्फ सीएम की गाली नहीं थी, बल्कि सदन का नजारा और भी विचित्र था। जब रेवंत रेड्डी पद की गरिमा को पैरों तले रौंद रहे थे, तब सामने बैठे एआईएमआईएम (AIMIM) विधायक अकबरुद्दीन ओवैसी मुस्कुरा रहे थे। सदन में गाली-गलौज और उस पर ये हंसी… क्या हमारा लोकतंत्र अब इसी दिशा में आगे बढ़ रहा है?

रेवंत रेड्डी का यह बर्ताव सिर्फ विपक्षी नेताओं का अपमान नहीं है, बल्कि यह तेलंगाना की उस जनता का भी अपमान है जिसने उन्हें चुनकर इस सम्मानित पद पर बिठाया है। मुख्यमंत्री पद की एक गरिमा होती है, लेकिन रेवंत रेड्डी ने दिखा दिया कि सत्ता के नशे में वह मर्यादा की हर दीवार गिराने को तैयार हैं।

सीएम रेवंत रेड्डी का यह वीडियो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हो रहा है और लोग पूछ रहे हैं कि क्या राहुल गांधी अपने मुख्यमंत्रियों को यही संस्कार सिखा रहे हैं? एक तरफ कांग्रेस ‘मोहब्बत की दुकान’ खोलने का दावा करती है, तो दूसरी तरफ उनके मुख्यमंत्री सरेआम गुंडागर्दी वाली भाषा बोल रहे हैं। आप भी देखिए सोशल मीडिया पर लोग क्या कह रहे हैं…

नेहरू ने किया कबाड़ा, पर सनातन का उपहास उड़ाने के लिए गढ़ दिया ‘हिन्दू रेट ऑफ ग्रोथ’

मोदी और नेहरू ( फोटो साभार-toi)
प्रधानमंत्री मोदी ने ‘हिन्दू रेट ऑफ ग्रोथ’ शब्दावली का इस्तेमाल कर गुलाम मानसिकता का परिचय देने वाले लोगों की क्लास लगाई है। हिन्दू सभ्यता और संस्कृति को कमतर दिखाने वाले लोगों ने इस शब्दावली का इस्तेमाल तब किया था, जब देश गरीबी की गर्त में था और 2-3 फीसदी ग्रोथ रेट पाने के लिए भी लालायित था।

1950 से तीन दशक का वह दौर, जब भारत में नेहरू जी के नेतृत्व में कॉन्ग्रेस की सरकार थी और फिर उनकी बेटी इंदिरा ने देश की कमान लंबे अर्से तक संभाली। अर्थव्यवस्था के लिए इस्तेमाल होने वाले ग्रोथ रेट को हिन्दू सभ्यता और संस्कृति से जोड़ना दरअसल गुलामी मानसिकता को दर्शाता है। ऐसे लोगों को अब देश की प्रगति नहीं दिखती।

दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था की ग्रोथ रेट को अब ‘हिन्दू रेट ऑफ ग्रोथ’ नहीं कहते, बल्कि इन्हें हर बात पर सांप्रदायिकता दिखने लगी है। यानी देश तरक्की करे तो सरकार का हर काम ‘सांप्रदायिक’ हो गया और जब देश बदहाल था, तो इसके लिए हिन्दू सभ्यता और संस्कृति दोषी था।

पीएम ने साफ कहा है कि भारत की अर्थव्यवस्था को ‘हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ’ तब कहा गया जब भारत 2-3% की ग्रोथ के लिए तरस गया था। आज जब देश की अर्थव्यवस्था दुनिया में सबसे तेज गति से बढ़ रही है, लेकिन आज कोई इसे ‘हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ’ नहीं कहता है।

उन्होंने कहा कि किसी देश की इकोनॉमी ग्रोथ को वहाँ रहने वाले बहुसंख्यक लोगों की आस्था से जोड़ना गुलामी की मानसिकता का परिचायक था, क्योंकि इसके माध्यम से पूरे समाज को गरीब दिखाने की कोशिश की गई।

उन्होंने पूछा , “भारत आज दुनिया की सबसे तेज़ी से आगे बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था है…लेकिन क्या आज कोई इसे हिंदू रेट ऑफ़ ग्रोथ कहता है क्या?” उन्होंने कहा कि हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ’ शब्द का इस्तेमाल कर पूरे समाज और पूरी परंपरा को गरीबी का पर्याय बना दिया गया। ये साबित करने का प्रयास किया गया कि भारत की धीमी विकास दर का कारण हमारी हिंदू सभ्यता और हिंदू संस्कृति है। आज जो बुद्धिजीवी हर बात में सांप्रदायिकता ढूंढते हैं, उन्हें ‘हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ’ में ये नहीं दिखा?

पीएम मोदी ने आर्थिक विकास के ताजा आंकड़ों का जिक्र करते हुए कहा कि भारत दुनिया की सबसे तेज गति से आगे बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था बन गया है। हाल ही जारी आंकड़ों के मुताबिक, मौजूदा वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में भारत की विकास दर 8.2 फीसदी रही है। ये काफी उत्साहित करने वाली है, जो चीन से भी ज्यादा है।

पीएम की भावना को बल देते हुए मशहूर वकील महेश जेठमलानी ने कहा कि दशकों से इस्तेमाल किया गया ‘हिन्दू ग्रोथ रेट’ दरअसल औपनिवेशक भारत का मजाक उड़ाने और भारतीय सभ्यता और संस्कृति को नीचा दिखाने के लिए किया गया। दरअसल सरकार की नीति की कमियों को सांस्कृतिक कमी के तौर पर पेश किया गया।

भारतीय संस्कृति का अपमान- महेश जेठमलानी

जेठमलानी ने एक्स पर ट्वीट किया, “प्रधानमंत्री मोदी ने दशकों पुराने तथाकथित ‘हिंदू विकास दर’ के कलंक को वही बताया जो यह हमेशा से था…। यह अर्थशास्त्र में लिपटा एक अपमान था, एक कहानी जो भारतीयों को यह विश्वास दिलाने के लिए डिज़ाइन की गई थी कि ठहराव हमारी नियति है…। पिछले 11 वर्षों ने हमने दिखाया है कि हम कैसे भारतीय खराब नीति और उधार के निराशावाद दौर से मुक्त हुए हैं और वैश्विक औसत से ज्यादा तेज गति से आगे बढ़ रहे हैं। यह हमारा स्वाभाविक रास्ता है।”

‘हिंदू रेट ऑफ ग्रोथ’ क्या है?

भारत का 6000+ साल का शानदार सभ्यता का इतिहास रहा है और इस लंबे समय के दौरान, भारत गर्व से ग्लोबल इकॉनमी में सबसे ऊपर रहा है। इस बात को अमेरिकी इतिहासकार विल डुरंट की किताब ‘द केस फॉर इंडिया’ में बहुत अच्छे से दिखाया गया है।

सत्रहवीं सदी तक, भारत की GDP दुनिया की GDP की एक-तिहाई थी। इस्लामी हमलावरों की 800 साल की लूट भी इस महान देश के रिसोर्स को खत्म नहीं कर पाई। अंग्रेजों के आने के बाद ही असली दौलत का नुकसान शुरू हुआ, और भारत में साल दर साल लगातार अकाल पड़ने लगे।

हिंदू रेट ऑफ़ ग्रोथ शब्द 1978 में एक तथाकथित इकोनॉमिस्ट राज कृष्ण ने 1950 से 1980 के दशक तक 3.5 परसेंट GDP ग्रोथ रेट के लिए किया था। यह सोच अपने आप में गलत है क्योंकि इस समय और उसके बाद भी इकोनॉमी में हिंदुओं का मुख्य योगदान था।

भारत में सभी धर्मों के लोग रहते हैं, इकोनॉमिक प्लानर्स ने ग्रोथ का भार हिंदुओं पर डाल दिया और इसलिए ‘हिंदू रेट ऑफ़ ग्रोथ’ शब्द बना कि उन्होंने जो कुछ भी करने का दावा किया, उसके बावजूद ग्रोथ लगभग स्थिर थी और वह भी लगभग 3.5% पर। हिंदू कोई पॉलिसी मेकर नहीं थी ऐसे में अर्थव्यवस्था की विकास को हिन्दू से जोड़ना सरासर हिन्दू धर्म और संस्कृति का उपहास उड़ाना था

आजादी के बाद कई दशकों तक कॉन्ग्रेस की सरकार की नीतियाँ देश के विकास की रफ्तार तय कर रही थी। बुनियादी सुविधाओं की कमी, तेज गति से बढ़ रही जनसंख्या और गरीबी मुख्य दिक्कतें थी, इसकी जिम्मेदारी सरकार की थी, न कि भारत की सभ्यता और संस्कृति इसके लिए जिम्मेदार थी।

इसे ‘नेहरू रेट ऑफ ग्रोथ’ कहें, ना कि ‘हिन्दू रेट ऑफ ग्रोथ’

नेहरू भारत के पहले प्रधानमंत्री थे, वे 1964 तक इस पद पर रहे। देश की आर्थिक नीति नेहरू के नेतृत्व वाली सरकार ने ही तय की थी। इसलिए शुरुआती दशकों की आर्थिक ग्रोथ को ‘नेहरू रेट ऑफ ग्रोथ’ कहना ज्यादा सही है। नेहरू राज और इंदिरा राज के सालों के आर्थिक ग्रोथ को हिन्दू संस्कृति से जोड़ना सरासर गलत है।

नेहरू समाजवादी के समर्थक थे। उसके वक्त में सरकार होटल भी चलाती थी। बिड़ला और टाटा जैसे उद्योगपतियों को बिजनेस बढ़ाने के लिए उतनी आजादी नहीं दी गई। नेहरू की इस ‘सोच’ को ही ग्रोथ की धीमी रफ्तार के लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।

नेहरू की इकोनॉमिक पॉलिसी इतनी गलत थीं कि देश लगभग हमेशा खाद्यान संकट से जुझता रहा। इतना ही नहीं, उनकी छोटी सोच ने उन्हें नदी के बांधों को ‘मॉडर्न इंडिया के मंदिर’ कहने पर मजबूर किया। नेहरू की पॉलिसी को फिर उनकी बेटी इंदिरा गांधी ने आगे बढ़ाया, जिन्होंने बैंकिंग, टेक्सटाइल, कोयला, स्टील, कॉपर जैसे सेक्टर्स का राष्ट्रीयकरण कर दिया। ये पूरा कार्यकाल ही ‘हिन्दू रेट ऑफ ग्रोथ’ कहलाया।

रघुराम राजन ने 2023 में कहा ‘हिन्दू रेट ऑफ ग्रोथ’

आरबीआई के पूर्व गर्वनर रघुराम राजन ने 2023 में ‘हिन्दू रेट ऑफ ग्रोथ’ शब्दावली का इस्तेमाल किया था। उन्होंने सरकार को चेतावनी दी थी कि कमजोर निवेश, उच्च ब्याज दर और धीमी वैश्विक विकास के कारण भारत ‘हिन्दू रेट ऑफ ग्रोथ’ के करीब है।

राजन ने कहा था कि नेशनल स्टैटिस्टिकल ऑफिस (NSO) द्वारा जारी नेशनल इनकम का अनुमान चिंताजनक है। 2023 के फ़ाइनेंशियल ईयर की तीसरी तिमाही (अक्टूबर-दिसंबर) में ग्रॉस डोमेस्टिक प्रोडक्ट (GDP) दूसरी तिमाही (जुलाई-सितंबर) के 6.3% से घटकर 4.4% हो गई थी। पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में यह 13.2% थी।

उन्होंने कहा था कि भारत को कोविड से हुई आर्थिक मंदी से उबरने में कई साल लगेंगे, लेकिन भारत एक साल में ही अपनी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में कामयाब रहा। उन्होंने कभी माफ़ी नहीं माँगी।

उन्होंने आर्थिक विकास में मंदी के लिए ‘हिंदू ग्रोथ रेट’ शब्द का इस्तेमाल किया है। रघुराम राजन 2013 से 2016 तक RBI के गवर्नर थे। यह समय स्थिर फॉरेक्स रिज़र्व और कई दूसरे विवादों से भरा रहा। उनके पद से हटाए जाने के बाद, RBI का फॉरेक्स रिजर्व बढ़कर 600 बिलियन+ के ऑल-टाइम हाई पर पहुँच गया। राजन पिछले 5 सालों से लगातार भारत के लिए ‘गंभीर आर्थिक संकट’ की भविष्यवाणी करते हैं और मुँह की खाते हैं।

फिर भी ऐसे लोग भारत-विरोधी ‘हिन्दू रेट ऑफ ग्रोथ’ से चिपके हुए हैं। वे आंकड़ों का बचाव नहीं कर रहे हैं। वे एक ऐसे विश्वदृष्टि का बचाव कर रहे हैं जो एक आत्मविश्वासी, सुधारवादी, आत्मनिर्भर भारत को स्वीकार नहीं करना चाहता।

ये लोग देश की ‘आत्मा’ को नहीं जानते, अर्थव्यवस्था के विकास को गाँव के रास्ते पर बढ़ते नहीं पहचान पाते और सरकार की आलोचना विदेशी मापदंडों के आधार पर करते हैं। आज भारतीय अर्थव्यवस्था तेजी से आगे बढ़ रहा है।

दुनिया की चौथी अर्थव्यवस्था 2023 तक तीसरी अर्थव्यवस्था बनने की राह पर है। ये न सिर्फ खुद बढ़ रहा है, बल्कि वैश्विक गति को भी आगे बढ़ा रहा है। दुनिया में भारत का महत्व दिन प्रति दिन बढ़ता जा रहा है। सरकार की नीति, उद्यमशीलता और सुधार लगातार देश को ऊँचाई दे रहे हैं। ये झूठा प्रचार नहीं बल्कि वह सच्चाई है, जिसे पूरी दुनिया मान रही है।

36 जगह, 400 ड्रोन… तुर्की का ‘माल’ लेकर भारत से लड़ने आया था भिखमंगा पाकिस्तान, सारे हुए फुस्स: राडार स्टेशन उड़ाकर सेना ने दिया जवाब, प्रेस कॉन्फ्रेंस में वीरांगनाओं ने बताया

पकिस्तान ने तुर्की के ड्रोन भारत पर चलाए, यह जानकारी विदेश मंत्रालय ने दी है
पाकिस्तान ने 8-9 मई, 2025 की रात को भारत के कई शहरों पर हमला किया था। इसके लिए पाकिस्तान ने तुर्की के ड्रोन इस्तेमाल किए थे। पाकिस्तान के यह ड्रोन भारतीय सेनाओं ने नाकाम कर दिए। भारत ने भी जवाब में पाकिस्तान में 4 जगह हमला किया है। भारत ने पाकिस्तान में राडार भी उड़ा दिया है। यह सभी जानकारी विदेश मंत्रालय ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में दी हैं।

शुक्रवार (9 मई, 2025) को विदेश मंत्रालय ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया है कि पाकिस्तान ने 8-9 मई की रात को भारत के भीतर 300-400 जगह पर ड्रोन के माध्यम से घुसपैठ किया। भारत ने बताया है कि इसका उद्देश्य खुफिया जानकारी इकट्ठा करना और भारतीय सैन्य ठिकानों को नुकसान पहुँचाना था।

कर्नल सोफिया कुरैशी ने इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताया कि ड्रोन के मलबे की जाँच की गई है। उन्होंने बताया कि यह तुर्की में बने हुए असीसगार्ड सोंगर ड्रोन हैं। भारत ने कहा है कि पाकिस्तान ने जम्मू-कश्मीर से लेकर गुजरात में सर क्रीक तक हमला किया है। उन्होंने यह भी बताया कि पाकिस्तान ने भटिंडा के सैन्य अड्डे को भी निशाना बनाया है।

कर्नल कुरैशी ने बताया है कि इन हमलों के जवाब में भारत ने भी पाकिस्तान के 4 एयर डिफेन्स सिस्टम पर हमले किए हैं। उन्होंने बताया कि इन 4 में से 1 जगह पर किया गया ड्रोन हमला सफल रहा है और पाकिस्तान के एक राडार को तबाह कर दिया है। पूरी प्रेस कॉन्फ्रेंस को आप नीचे लगे लिंक में देख सकते हैं।

भारत ने यह भी स्पष्ट किया है कि पाकिस्तान की हरकतें इस इलाके के हवाई क्षेत्र में खतरा पैदा कर रही हैं। भारत ने इसमें एक फ्लाईट का उदाहरण भी दिया है। भारत ने साफ़ कर दिया है कि पाकिस्तान ने जानबूझ कर भारत पर हवाई हमले किए हैं जिसके जवाब मिल सकते हैं।

इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में स्पष्ट कर दिया गया है कि पाकिस्तान की हरकत का स्पष्ट जवाब दिया जाएगा। इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में विदेश सचिव विक्रम मिसरी भी मौजूद थे। उन्होंने बताया है कि पाकिस्तान के हमले में जम्मू कश्मीर में एक गुरुद्वारे के ग्रंथी की मौत हो गई है।

उन्होंने स्पष्ट किया है कि पाकिस्तान लगातार हमलों को लेकर भ्रामक सूचनाएँ फैला रहा है, जिसका भारत लगातार जवाब दे रहा है।


आंध्र प्रदेश : जगन सरकार में हुई तिरुपति मंदिर के प्रसाद से छेड़छाड़, लड्डू में मिलाई जाती थी जानवर की चर्बी: चंद्रबाबू नायडू, मुख्यमंत्री

                 तिरुपति के लड्डुओं में इस्तेमाल होता था गंदा घी (फोटो साभार: इंडिया टुडे और टाइम्स नाऊ)
आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू ने विपक्षी पार्टी YSRCP पर निशाना साधते हुए ऐसा खुलासा किया है जिसे सुन सब हैरान हैं। सीएम नायडू ने दावा किया है कि पहले की जगन सरकार में तिरुपति मंदिर में प्रसाद बनाने के लिए जानवरों की चर्बी वाला घी इस्तेमाल होता था।

उन्होंने ये खुलासा एनडीए विधायक दल की बैठक को संबोधित करने के दौरान किया। उनके दावे को सुन सब हैरान रह गए। उन्होंने कहा कि तिरुमाला तिरुपति देवस्थानम (TTD) और भगवान वेंकटेश्वर को आंध्र प्रदेश के लोगों की सबसे बड़ी धरोहर है। एनडीए सरकार मंदिर की पवित्रता बनाए रखने के लिए कई कदम उठा रही हैं, लेकिन पिछली सरकार ने भोजन की गुणवत्ता खराब कर दी है। उन्होंने भगवान वेंकटेश्वर के लड्डू के लिए घटिया सामग्री इस्तेमाल की।

उन्होंने बताया कि YSRCP सरकार ने अपने कार्यकाल के दौरान, एक निजी ठेकेदार को घी की आपूर्ति का ठेका दिया था। बाद में लड्डू की गुणवत्ता को लेकर कई शिकायतें मिलीं। पता चला कि लड्डू बनाने में जो घी इस्तेमाल हो रहा था उसमें जानवर की चर्बी थी। लड्डू की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए अब एनडीए सरकार ने 29 अगस्त को कर्नाटक मिल्क फेडरेशन के नंदिनी ब्रांड को घी देने का कॉन्ट्रैक्ट दिया है। जिसके बाद अब मंदिर में शुद्ध घी प्रयोग होता है।

तिरुपति मंदिर में भगवान के प्रसाद के लिए हर दिन लगभग 10 हजार किलो घी उपयोग होता है जिससे करीबन 3 लाख लड्डू बनते हैं। हर श्रद्धालु के लिए इस प्रसाद के बहुत मायने हैं। ऐसे में उसकी गुणवत्ता से हुए खिलवाड़ में खुलासे के बाद अब इस मुद्दे पर जोर-शोर से चर्चा हो रही हैं। पूर्व की जगन सरकार लगातार सवालों के घेरे में हैं। वहीं सीएम नायडू के बयान को YSRC द्वारा खारिज कर दिया गया है। उन्होंने इस आरोप को दुर्भावनापूर्ण बताया है।

मालूम हो कि जगन मोहन रेड्डी को सरकार पर एक तरफ जहाँ हिंदुओं की भावना आहत करने का आरोप लगा है तो वहीं दूसरी ओर उनपर ईसाई धर्म के प्रचार के आरोप लगते रहे हैं।