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ममता बनर्जी के ‘दखल’ से चर्चा में आया 49 साल पुराना किस्सा : CBI का छापा, सोनिया का पास्ता मेकर और इंदिरा गाँधी

                                   बंगाल मुख्यमंत्री की दखल से चर्चा में आया इंदिरा गाँधी वाला किस्सा
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कॉन्ग्रेस के चुनावी प्रबंधन का काम देखने वाली I-PAC कंपनी पर प्रवर्तन निदेशालय (ED) के छापे के दौरान जो ड्रामा हुआ, उसे ऑन टीवी हर किसी ने देखा। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी खुद कंपनी के मालिक के घर पहुँची और जरूरी फाइलें, लैपटॉप और अन्य दस्तावेज लेकर निकल गईं। उनका यह रवैया देख हर कोई हैरान रह गया कि मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए ऐसा कैसे किया जा सकता है।

यह पहली बार नहीं है जब किसी बड़े राजनीतिक नाम ने जाँच एजेंसियों से बचने के लिए असामान्य कदम उठाए हों। इतिहास में ऐसा एक बड़ा उदाहरण 1977 का है जिसका जिक्र कैथरीन फ्रैंक की किताब- इंदिरा- द लाइन ऑफ इंदिरा नेहरू में पढ़ने को मिलता है।

                             फ्रैंक कैथरीन की किताब, जिसमें घटना का जिक्र है (फोटो साभार: अमेजन)

जब इंदिरा गाँधी के घर पड़ी CBI की रेड

ये वो समय था जब 1977 में आपातकाल के बाद जाँच के लिए शाह आयोग का गठन किया गया। आयोग का उद्देश्य इमरजेंसी के दौरान हुई ज्यादतियों और दुरुपयोग की जाँच करना था। आयोग ने इंदिरा गाँधी को कई बार पूछताछ के लिए बुलाया, लेकिन वह हर बार अपने वकील फ्रैंक एंथनी की सलाह पर आयोग के समक्ष पेश होने से इनकार करती रहीं और इसे असंवैधानिक और गैरकानूनी भी ठहरा दिया।

एक तरफ इंदिरा गाँधी लगातार शाह कमीशन से बचने की कोशिशों में लगी हुईं थीं। दूसरी तरफ जाँच एजेंसियों की पड़ताल शुरू थी। किताब में लिखे अंश के अनुसार, 3 अक्तूबर 1977 का दिन आया। उनके घर 12 विलिंगडन क्रेसेंट पर सीबीआई की रेड पड़ी। उनके बेटे संजय और बहू मेनका लॉन पर बैडमिंटन खेल रहे थे। दो सीबीआई अधिकारी उन्हें गिरफ्तार करने आए और इंदिरा गाँधी से कहा कि वे हिरासत में ली जाती हैं। हालाँकि, इंदिरा ने ऐसा होने की उम्मीद लगाई हुई थी और शायद इससे निपटने की उनकी रणनीति भी तैयार थी।

सीबीआई अधिकारियों से उस समय इंदिरा गाँधी ने पैकिंग के लिए समय माँगा और घर के भीतर चली गईं। करीबन 5 घंटे वह घर में रहीं और शाम के 8 बजे वह सफेद साड़ी (हरी बॉर्डर वाली) पहनकर भीड़ के आगे आईं। बताया जाता है कि इन पाँच घंटों में इंदिरा गाँधी ने घर के भीतर बहुत कुछ किया। उन्होंने अपने समर्थकों को बुलाया, प्रेस को सूचित किया, परिजनों से बात की और सामान बाँधा, जिसमें सबसे हैरान करने वाली चीज थी सोनिया गाँधी का एक पास्ता मेकर।

                                                 कैथरीन फ्रैंक की किताब में लिखे अंश का स्क्रीनशॉट

किताब में एक अफवाह के तौर पर ही सही, लेकिन ये बताया गया है इंदिरा गाँधी के सामान में उस समय पास्ता मेकर मिलने की कोई वजह नहीं थी सिवाय इसके कि उन्होंने इससे उन दस्तावेजों को नष्ट किया जो उनके लिए समस्या बन सकते थें।

                                           कैथरीन फ्रैंक की किताब में लिखे अंश का स्क्रीनशॉट

इसके बाद क्या सब हुआ ये इतिहास में दर्ज है। इंदिरा गाँधी ने तब इस गिरफ्तारी को अपने पक्ष में माहौल बनाने के लिए भुनाया। बाद में सुनवाई हुई। मजिस्ट्रेट कोर्ट ने ठोस सबूत न मिलने पर उन्हें रिहा कर दिया। और ये चर्चा कभी नहीं हुई कि वो कागज क्या थे जिन्हें इंदिरा गाँधी ने पास्ता मेकर में डालकर काट दिया।

आज जब मीडिया में ममता बनर्जी से जुड़ी खबरें आई है तो ये किस्सा और भी प्रांसगिक हो गया कि कैसे इंदिरा गाँधी ने चालाकी से न केवल 5 घंटे में अपने लिए समर्थन बटोरा बल्कि अपने खिलाफ रखें सबूतों को भी नष्ट कर दिया। ये सच है कि उस समय इंदिरा के पक्ष में जैसे लोग आए 1978 में उन्हें उसका सीधा फायदा हुआ, मगर बंगाल में स्थिति ऐसी नहीं देखने को मिल रही। लोग ममता बनर्जी की हरकत पर सवाल खड़ा कर रहे हैं। ईडी उनकी हरकत के खिलाफ हाई कोर्ट चला गया है। वहीं बंगाल सीएम ने भी इस मामले में अधिकारियों के विरुद्ध शिकायत दी है। देखना यही है कि इस घटना को बंगाल की जनता कैसे लेगी?