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अस्वस्थ आडवाणी और बलिदानी कारसेवकों का अपमान, बाबरी सोच के सबसे बड़े पैरोकार बन गए हैं राहुल गाँधी, ये कैसा घमंड? आखिर कब तक हिन्दू कांग्रेस को गले पाले रखेंगे? शर्म करो!

जिस तरह राहुल गाँधी द्वारा हिन्दुओं का मजाक बनाया जा रहा, उसे देख शर्म आती है उन हिन्दुओं पर जो कांग्रेस को वोट देते हैं। कांग्रेस और इसको समर्थन देने वालों को मालूम होना चाहिए कि सनातन धर्म 4+ अरब वर्षों प्राचीन है, जिसे समाप्त करने आए असंख्य राक्षसों का वध करने अनेक देवी-देवताओं ने भिन्न-भिन्न रूपों में अवतार लिया और सनातन की रक्षा की।  
राहुल के इस अराजक अभियान में गूगल भी शायद अपना समर्थन दे रहा है। कल(जुलाई 6) शीर्षक 

"8 कैमरामैन और डायरेक्टर लेकर स्टेशन पहुँचे राहुल गाँधी, 'नकली' लोको पायलट वाले वीडियो के लिए पहले से तय थी स्क्रिप्ट: रेलवे अधिकारी ने बताया – नहीं था कोई ‘असली’ कर्मचारी; राहुल के खिलाफ एक्शन की तैयारी" को मेरे फेसबुक और groups से भी हटा दिया। क्यों? सिर्फ इसलिए कि राहुल की अराजकता के विरुद्ध है। https://nigamrajendra.blogspot.com/2024/07/8.html  

Jul 6, 2024
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Rajendra Nigam
Jul 6, 2024
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राहुल गाँधी की हिन्दू-घृणा थमने का नाम नहीं ले रही है, वो लगातार जगह-जगह जाकर इसका प्रदर्शन कर रहे हैं। अब राहुल गाँधी ने गुजरात के अहमदाबाद पहुँच कर गलतबयानी की है। उन्होंने कहा कि जो आंदोलन लालकृष्ण आडवाणी ने चालू की थी, जिसका केंद्र अयोध्या था, उसे I.N.D.I. गठबंधन ने अयोध्या में हरा दिया है। हिन्दुओं को इस समझना होगा कि बीजेपी फैज़ाबाद सीट हारी है, अयोध्या नहीं। बल्कि अयोध्या क्षेत्र से बीजेपी जीती है। राहुल गाँधी ने झूठा दावा किया कि राम मंदिर प्राण-प्रतिष्ठा में अयोध्या का एक भी व्यक्ति नहीं था। 

उन्होंने इस दौरान झूठ बोला कि अयोध्या के लोगों को जमीन के बदले मुआवजा नहीं मिला। जनता में इस कदर झूठ परोसा जा रहा है, जिसे देख लगता है कि कुर्सी के भूखे नेताओं का कोई चरित्र ही नहीं। कुछ ही दिन News18 के लाइव शो 'भईया जी कहिन' में एक युवती ने इसी मुद्दे पर बोलने पर एंकर ने उस महिला से नाम, पता, मकान लिखकर दीजिए, ताकि बीजेपी वालों को बोलकर मुआफजा दिलवाया जा सके। देखिए वो बेशर्म महिला आधा-अधूरा पता देकर गायब हो गयी, यानि सनातन विरोधियों द्वारा किस तरह झूठ परोसा जा रहा है।     

राहुल गाँधी सोच-समझ कर राम जन्मभूमि आंदोलन को हराने वाली बात कही, क्योंकि उन्होंने खुद कहा कि वो ‘बड़ी बात’ कह रहे हैं। अयोध्या में समाजवादी पार्टी के नेता अवधेश प्रसाद की जीत में उन्होंने कांग्रेस कार्यकर्ताओं के योगदान की बात करते हुए इन कार्यकर्ताओं को ‘बब्बर शेर’ कहा। उन्होंने इस दौरान एक रहस्यमयी भाषा सांसद के हवाले से ये भी दावा कर दिया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी वाराणसी की जगह अयोध्या से चुनाव लड़ना चाहते थे, लेकिन 3 बार सर्वे से पता चला कि वो यहाँ से लड़ेंगे तो उनका राजनीतिक करियर हार के बाद चौपट हो जाएगा।

ये पहला मौका नहीं है जब राहुल गाँधी ने इस तरह की बातें की हों। लोकसभा चुनाव 2024 के प्रचार अभियान के दौरान उन्होंने ‘शक्ति के विनाश’ की बात कहीं थी। उन्होंने कहा था कि उनकी लड़ाई शक्ति से है। जबकि भारत में शक्ति पूजा की परंपरा रही है, माँ दुर्गा को शक्ति कहा जाता है। असम में कामाख्या हों, कश्मीर में शारदा, तमिलनाडु में मिनाक्षी हों या फिर गुजरात में अम्बा और समलेश्वरी, माँ शक्ति की विभिन्न रूपों में भारत के कोने-कोने में उपासना की जाती है।

543 में 99 सीटें मिलने से उत्साहित राहुल गाँधी ने तीसरी मोदी सरकार के पहले संसद सत्र में बतौर नेता प्रतिपक्ष अपने पहले भाषण में भी उत्साहित होकर हिन्दुओं को हिंसक बता दिया। उन्होंने इस दौरान भगवान शिव को लेकर भी अनर्गल बयान दिया कि वो अपने त्रिशूल को जमीन में एक तरफ गाड़ देते हैं। उन्होंने शिव के अभय मुद्रा को कांग्रेस के चुनाव चिह्न से जोड़ दिया। सदन में टोके जाने के बावजूद वो बार-बार भगवान शिव की तस्वीर दिखाते रहे।

राहुल गाँधी ने एक तरह से हिन्दू घृणा का लहू चख लिया है, जैसे कोई जंगली जानवर किसी आदमी का खून चख लेता है तो वो मनुष्यों को मार कर खाने के लिए ही खोजता रहता है। कई बार ऐसे जानवरों को या तो पकड़ कर हमेशा के लिए कैद करना पड़ता है, या फिर उसका काम तमाम करना पड़ता है। राहुल गाँधी ने अब राम जन्मभूमि आंदोलन को हराने की बात कही है। राम मंदिर के निर्माण के साथ ही जो आंदोलन सफल हो गया, अब उसे कौन हरा सकता है?

शायद राहुल गाँधी को पता नहीं है, राम जन्मभूमि आंदोलन को हराने वाले कितने आए और कोशिश कर के धूल में मिल गए। मुलायम सिंह यादव ने कारसेवकों पर गोलियाँ चलवाई, लालू यादव ने लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार करवाया और मनमोहन सिंह ने सुप्रीम कोर्ट में एफिडेविट देकर कहा कि भगवान श्रीराम काल्पनिक थे। जब ये तीनों नहीं कर पाए, राहुल गाँधी को लगता है कि उनसे हो पाएगा? अब तो रोज लाखों की संख्या में लोग राम मंदिर में दर्शन भी कर रहे हैं।

असल में ये सारा घमंड कांग्रेस के 99 या सपा के 37 सीटें जीतने का नहीं, बल्कि अयोध्या जीतने का है। फैज़ाबाद लोकसभा क्षेत्र, जिसके अंतर्गत अयोध्या आता है, वहाँ से समाजवादी पार्टी ने जातीय गणित बिठा कर मिल्कीपुर से 9 बार विधायक रहे अवधेश प्रसाद को खड़ा किया, जिन्होंने भाजपा के 2 बार के सांसद लल्लू सिंह को हैट्रिक लगाने से रोक दिया। इस तरह 54,567 वोटों से ये सीट I.N.D.I. गठबंधन के खाते में चला गया।

इसके बाद से ही संसद में बार-बार भाजपा को अवधेश प्रसाद का चेहरा दिखा कर चिढ़ाया जाने लगा। कभी राहुल गाँधी उन्हें अपने बगल में बिठाते हैं तो कभी अखिलेश यादव। अवधेश प्रसाद एक तरह से इन दोनों नेताओं के लिए एक मेडल हो गए हैं जिन्हें वो हमेशा गले में पहन कर रखना चाहते हैं, या यूँ कहें कि एक ट्रॉफी हो गए हैं कि जब चाहो दोनों हाथों में लेकर ऊपर उठा दो वाहवाही लूटने के लिए। भाजपा को नीचा दिखाने के लिए उन्हें एक कड़ी मिल गई है।

चूँकि अयोध्या भाजपा की राजनीति का एक केंद्र रहा है, इसीलिए वहाँ से पार्टी की हार को लेकर उसे बार-बार चिढ़ाया और हतोत्साहित किया जा रहा है। राहुल गाँधी ने ये बयान ऐसे समय में दिया है जब 96 वर्षीय पूर्व उप-प्रधानमंत्री लालकृष्ण अडवाणी बिगड़ते स्वास्थ्य के कारण दिल्ली के अपोलो हॉस्पिटल में भर्ती हुए थे। 7 दशक से भी अधिक समय तक राजनीति में सक्रिय रहे एक नेता और उसके योगदानों का अपमान करने के लिए राहुल गाँधी ने ये समय चुना है।

छद्म धर्मनिरपेक्ष नीतियों के खिलाफ लालकृष्ण आडवाणी सितंबर 1990 में राम रथ यात्रा निकाली थी, जिसे अयोध्या पहुँचना था लेकिन रास्ते में बिहार के समस्तीपुर में लालू यादव की सरकार ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया। लालकृष्ण आडवाणी ने ये रथयात्रा सिर्फ राम मंदिर के लिए नहीं निकाली थी, बल्कि इसका उद्देश्य था देश की सांस्कृतिक पहचान को पुनः पुष्ट करना। उनका स्पष्ट मानना था कि बाबरी मस्जिद के पक्ष में अभियान चलाने वाले श्रीराम के सामने बाबर को खड़ा कर रहे हैं।

सन् 1527 में बाबर के सेनापति मीर बाक़ी ने अयोध्या में राम मंदिर को ध्वस्त कर वहाँ बाबरी मस्जिद का निर्माण करवाया था, जिसे दिसंबर 1992 में हिन्दुओं ने कारसेवा कर के ध्वस्त कर दिया और नवंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद यहाँ मंदिर निर्माण शुरू हुआ। हिन्दुओं ने इस मंदिर के लिए प्राचीन काल से लेकर अब तक कई युद्ध लड़े, कभी हथियारों से, कभी राजनीतिक, तो कभी न्यायिक। अब जब मंदिर का निर्माण पूरा होने वाला है, रामलला की प्राण-प्रतिष्ठा हो चुकी है, अनेक बलिदानों का उद्देश्य पूरा हुआ, आंदोलन सफल हुआ।

लालकृष्ण आडवाणी ने राम जन्मभूमि आंदोलन को केवल राम मंदिर को पुनर्स्थापित करने के लिए नहीं खड़ा किया था, बल्कि उन उद्देश्य इससे भी बड़ा था। वो मोहम्मद अली जिन्ना के द्विराष्ट्रीय सिद्धांत को हमेशा के लिए जमींदोज करना चाहते थे। वो चाहते थे कि देश के हिन्दू-मुस्लिम सभी स्वीकार करें कि उनकी पहचान राम से है, विदेशी आक्रांता बाबर से नहीं। आज घमंड देखिए कि फैज़ाबाद से जीतने वाले सांसद को ‘अयोध्या का राजा’ कह दिया जाता है, जबकि ये वो राज्य है जहाँ भरत ने भी अपने बड़े भाई श्रीराम की पादुका को सिंहासन पर रख कर उनकी अनुपस्थिति में शासन किया।

न तो अवधेश प्रसाद ‘अयोध्या के राजा’ हैं, और न ही राम जन्मभूमि आंदोलन असफल हुआ है। गुजरात के गोधरा में महिलाओं-बच्चों समेत 59 रामभक्तों को ट्रेन में ज़िंदा जला दिया गया था। मुलायम पुलिस की गोलीबारी में दर्जनों कारसेवक मारे गए। आज राहुल गाँधी ने ‘राम जन्मभूमि आंदोलन की हार’ की बात कर के उन सबका अपमान किया है, ये सिर्फ हिन्दू धर्म का ही अपमान नहीं है। राहुल गाँधी ने शायद गुजरात के 10% मुस्लिमों के वोट के लिए ये किया है।

जब लालकृष्ण आडवाणी ने 1990 की "राम रथ यात्रा" के बाद 1993 में निकाली ‘जनादेश यात्रा’

कालचक्र जब घूमता है उसका अनुभव 2014 से लिया जा सकता है। 2014 चुनाव से पूर्व राम नाम लेने पर साम्प्रदायिकता नज़र आती थी, लेकिन आज चुनावों में 'जय श्रीराम' के नारे लगते हैं। चुनावों में कोट पर जनेऊ पहन, हनुमान चालीसा पढ़ अपने आपको और अपनी पार्टी को हिन्दू बताने का ठोंग किया जाता है।   
भारत सरकार ने पूर्व उप-प्रधानमंत्री एवं भाजपा के अध्यक्ष रहे लालकृष्ण आडवाणी को ‘भारत रत्न’ से सम्मानित किए जाने का निर्णय लिया है। खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसकी घोषणा करते हुए कहा कि उनके साथ काम करना और सीखना उनके लिए सौभाग्य की बात है। लालकृष्ण आडवाणी 96 वर्ष के हैं, उनका राजनीतिक और समाजिक करियर कई दशकों का रहा है। 8 नवंबर, 1927 को सिंध (अब पाकिस्तान में) के कराची शहर में जन्मे लालकृष्ण अडवाणी विभाजन के बाद विस्थापित होकर भारत आए और 90 के दशक में यहाँ की राजनीति के शिखर पुरुष बन कर उभरे।

अगर केंद्र में मोदी सरकार नहीं बनती और लालकृष्ण आडवाणी को अगर ‘भारत रत्न’ न मिलता, तब भी देशसेवा में उनके योगदान का प्रभाव कम नहीं होता। आपातकाल के दौरान भी इंदिरा गाँधी की तानाशाह कॉन्ग्रेस सरकार ने उन्हें 16 जून, 1975 से लेकर 18 जनवरी, 1977 तक जेल में बंद रखा। 1977 में इंदिरा गाँधी के खिलाफ जनता पार्टी सरकार के गठन में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका थी, तभी इस सरकार में उन्हें सूचना एवं प्रसारण मंत्री बनाया गया।

लालकृष्ण आडवाणी को ‘भारत रत्न’ दिया जाना इस सम्मान का भी सम्मान है। मात्र 14 वर्ष की उम्र में उन्होंने RSS की सदस्यता ले ली थी और जिस साल भारत को स्वतंत्रता मिली, उस साल वो कराची शहर में संगठन के सेक्रेटरी बन चुके थे, शाखा संचालित करते थे। भारत की आज़ादी के बाद उन्हें राजस्थान की जिम्मेदारी मिली, जहाँ उन्होंने 1952 तक अलवर, भरतपुर, कोटा, बूंदी और झालावाड़ में बतौर प्रचारक काम किया। 1967 में हुए ‘दिल्ली मेट्रोपॉलिटन काउंसिल’ के अध्यक्ष बने।

राम रथ यात्रा देश में लेकर आई सांस्कृतिक पुनरुत्थान का युग

लालकृष्ण आडवाणी को सामान्यतः सितंबर-अक्टूबर 1990 में आयोजित राम रथ यात्रा के लिए जाना जाता है। इस यात्रा ने न सिर्फ भारतीय राजनीति को बदल दिया, बल्कि हर एक हिन्दू के भीतर स्वाभिमान जगा दिया। ऐसे ही पीएम मोदी ने उन्हें ‘भारत रत्न’ मिलने की बधाई देते हुए देश के सांस्कृतिक पुनरुत्थान में अद्वितीय योगदान देने वाले नहीं बता दिया। बिहार के समस्तीपुर में लालकृष्ण आडवाणी की गिरफ़्तारी के बाद पूरे देश की राजनीति में भूचाल आ गया था, केंद्र में सरकार तक गिर गई थी।
हालाँकि, बिहार के समस्तीपुर में यात्रा के पहुँचते ही तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू यादव ने तब के प्रधानमंत्री VP सिंह की सलाह पर लालकृष्ण आडवाणी को गिरफ्तार करवा दिया। मुस्लिम वोटों के लिए ये सब किया गया। उधर यूपी में मुलायम सिंह यादव की सरकार ने कारसेवकों पर गोली चलवाई। डेढ़ लालः लोग गिरफ्तार किए गए। ‘समाजवादी’ कहलाने वाले नेताओं में मुस्लिम तुष्टिकरण की होड़ लग गई थी। आडवाणी की गिरफ़्तारी से भाजपा के लिए लोगों के मन में सहानुभूति बढ़ी और 1991 के आम चुनावों में वो दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी, उसी साल यूपी में भी पार्टी की सरकार बनी।

जनादेश यात्रा: ‘अधर्म’ के खिलाफ लालकृष्ण आडवाणी की हुंकार

लालकृष्ण आडवाणी ने अपने राजनीतिक जीवन में कुछ अन्य यात्राएँ भी निकाली, लेकिन राम रथ यात्रा के आगे उनकी अधिक चर्चा नहीं होती। जैसे – सुराज यात्रा (मार्च 1996), स्वर्ण जयंती रथ यात्रा (मई 1997), भारत उदय यात्रा (2004), भारत सुरक्षा यात्रा (अप्रैल 2006) उन्हीं में से एक है – ‘जनादेश यात्रा’। असल में तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव की सरकार 1993 में 2 बिल लेकर आई थी – 80वाँ संविधान संशोधन और ‘रिप्रजेंटेटिव्स ऑफ पीपल (अमेंडमेंट) बिल।’
उन्होंने कहा, “हम ईश्वर भक्ति को धर्म का नाम देने के सख्त विरोध में हैं – सभी भारतीयों के लिए, चाहे वो हिन्दू हों, मुस्लिम हों, सिख हों, या ईसाई हों। उनका धर्म उन्हें सही कार्य करने के लिए प्रेरणा देता है। राजनीति को अगर धर्म से हटाया गया तो इससे जनता के जीवन का नैतिक आधार कम हो जाएगा। राजनीति से अधर्म को हटाया जाना चाहिए, धर्म को नहीं। राजनीति से भ्रष्टाचार और अपराध को हटाइए।” भाजपा का आरोप था कि इन विधेयकों के जरिए कॉन्ग्रेस सरकार देश में चुनावी प्रथा समाप्त कर अन्य दलों की मान्यताएँ रद्द करने की साजिश रच रही थी।
अतः, 11 सितंबर, 1993 को स्वामी विवेकानंद की जन्म-जयंती पर 4 यात्राएँ शुरू की गईं। मैसूर से स्वयं लालकृष्ण आडवाणी, जम्मू से भैरों सिंह शेखावत, पोरबंदर से मुरली मनोहर जोशी और कोलकाता से कल्याण सिंह यात्रा लेकर निकले। इन यात्राओं के जरिए 14 राज्यों और 2 केंद्रशासित प्रदेशों को कवर किया गया। 25 सितंबर को भोपाल में एक विशाल रैली हुई, जिसमें चारों यात्राओं का मिलन और समापन हुआ। ‘जनादेश यात्रा’ ने कॉन्ग्रेस की चूलें हिला दीं।
जो तेलंगाना (तब आंध्र प्रदेश का हिस्सा) नक्सलियों के कारण कुख्यात हो चला था, वहाँ लालकृष्ण आडवाणी को तगड़ी प्रतिक्रिया मिली। कोलकाता में कल्याण सिंह का ऐसा स्वागत हुआ कि ‘इंडियन एक्सप्रेस’ ने ‘लाल शहर हुआ भगवा’ वाले शीर्षक के साथ खबर छापी। इसमें लिखा गया कि शायद ये शहर अब पहले जैसा नहीं रहेगा। पंजाब में भैरों सिंह शेखावत की यात्रा से खालिस्तानी आतंक से पीड़ित इलाके में प्रशासन को मजबूती मिली, काम करने के लिए प्रोत्साहन मिला।
इसका नतीजा ये हुआ कि दोनों ‘अधर्म’ वाले बिल संसद में पास नहीं हुए। अगर वो विधेयक कानून बन गए होते तो शायद राम-राम कह कर एक-दूसरे का अभिवादन करने पर भी जेल हो जाती। लोकतंत्र की रक्षा और धर्मचक्र के परिवर्तन के क्रम में इस यात्रा ने हिन्दुओं को अपने ही देश में अपराधी बनाने से बचा लिया। आज भी राम मंदिर के खिलाफ ‘राजनीति को धर्म से अलग रखने’ की बातें की जाती हैं, लेकिन ऐसा कहने वाले ये भूल जाते हैं कि धर्म के हिसाब से न चलने वालों का पतन हो जाता है, धर्म है तभी नीति है और नीति है तभी सुराज है।
मोदी ने उनके इस कार्यकाल को भी याद किया है। इसका कारण है कि जिस भाजपा को मीडिया विरोध कह कर कोसा जाता है, उसी के संस्थापक ने प्रेस की स्वतंत्रता के लिए मंत्री के रूप में कई कदम उठाए। जब लालकृष्ण आडवाणी ‘जनादेश यात्रा’ निकाल रहे थे, उसी दौर में नरेंद्र मोदी भी एक कुशल संगठन प्रशासक के रूप में उभर रहे थे। राम रथ यात्रा के आयोजन और मीडिया कवरेज में भागीदारी निभा कर उन्होंने खुद को साबित कर दिया था।
तभी उन्हें 1993 में गुजरात में पार्टी का महासचिव बनाया गया। जब कुछ विधायकों ने विरोध किया तो लालकृष्ण अडवाणी उनके समर्थन में खड़े हुए। अटल बिहारी वाजपेयी अगर प्रधानमंत्री बन पाए, इसमें भी लालकृष्ण आडवाणी का बड़ा हाथ था। 1995 में मुंबई में हुए भाजपा के अधिवेशन में उन्होंने ही वाजपेयी को पीएम उम्मीदवार घोषित किया, वरना दोनों नेता ‘आप पीएम प्रत्याशी’ की रट लगा कर एक-दूसरे का सम्मान किए जा रहे थे।
लालकृष्ण आडवाणी उस समय 90 के दशक में अटल बिहारी वाजपेयी से अधिक लोकप्रिय थे और अधिक सक्रिय थे, लेकिन उन्हें पता था कि पार्टी को एक रखने के लिए और गठबंधन बनाने के लिए अटल बिहारी वाजपेयी का चेहरा आवश्यक है। 1986 में वाजपेयी की जगह आडवाणी ने कमान ली और अपना काम कर के एक दशक बाद कमान फिर उन्हें सौंप दिया। 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने। उस दौरान कार्यकर्ताओं का अभिवादन करते हुए वाजपेयी ने नरेंद्र मोदी को गले भी लगाया था, जिसका वीडियो भी है।



96 वर्षीय लालकृष्ण आडवाणी को भारत रत्न: PM मोदी बोले – राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक पुनरुत्थान की दिशा में उनका प्रयास अद्वितीय

भाजपा के 96 वर्षीय लालकृष्ण आडवाणी को देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित करने का फैसला किया गया है। राम मन्दिर के लिए जनमानस को जागृत करने का श्रेय आडवाणी को ही जाता है। इन्होने ही पाञ्चजन्य-आर्गेनाइजर की संयुक्त सम्पादकीय मीट में कहा था कि "जब तक केंद्र और उत्तर प्रदेश में बहुमत में भाजपा नहीं आती अयोध्या में श्रीराम मंदिर शायद स्वप्न ही रहेगा। क्योकि तथ्यों को छुपाने और सच्चाई सार्वजनिक होने से रोकने वाला कोई नहीं होगा।" वास्तव में आज हुआ भी वही। जिन डाक्यूमेंट्स को अनुवाद करने में उत्तर प्रदेश सरकार केंद्र सरकार के सहयोग से टालती रही, जिस कारण कोई भी कोर्ट निर्णय देने में असमर्थ होने के कारण तारीख-पर-तारीख देने के अलावा कुछ नहीं कर सकती थी। उत्तर प्रदेश में बहुमत वाली भाजपा सरकार बनने के बाद निर्णय में अवरोध कर रहे सबसे बड़े रोड़े को ठोकर मारते ही निर्णय सबके सामने है। 

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सोशल नेटवर्किंग साइट एक्स पर इसकी घोषणा करते हुए उन्हें बधाई दी है। प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत के विकास में उनका योगदान अविस्मरणीय है। उन्होंने एक्स पर लालकृष्ण आडवाणी के साथ अपनी दो तस्वीरों को शेयर करते हुए लिखा है कि मुझे यह बताते हुए काफी खुश हो रही है कि श्री लालकृष्ण आडवाणी जी को भारत रत्न से सम्मानित किया जाएगा। मैंने उनसे बात की और इस सम्मान से सम्मानित किए जाने के लिए उन्हें बधाई दी। वह हमारे समय के सबसे बड़े और सम्मानित राजनेताओं में से एक हैं। देश के विकास में उनका योगदान अविस्मरणीय है। उनका जीवन जमीनी स्तर पर काम करने से शुरू होकर देश के उप-प्रधानमंत्री के रूप में सेवा करने तक का है। उन्होंने गृह मंत्री और सूचना एवं प्रसारण मंत्री के रूप में अपनी एक अलग पहचान बनाई। उनके संसदीय कार्य हमेशा अनुकरणीय रहे हैं और समृद्ध अंतर्दृष्टि से भरे रहे हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने अगले ट्वीट संदेश में लिखा है कि उन्होंने दशकों तक देश के लोगों की सेवा की। पारदर्शिता, अखंडता और राजनीतिक नैतिकता के मामले में आडवाणी जी ने कई अनुकरणीय मानक स्थापित किए हैं। उन्होंने राष्ट्रीय एकता और सांस्कृतिक पुनरुत्थान को आगे बढ़ाने की दिशा में अद्वितीय प्रयास किए हैं। उन्हें भारत रत्न से सम्मानित किया जाना मेरे लिए बहुत भावुक क्षण है। मैं इसे हमेशा अपना सौभाग्य मानता हूं कि मुझे उनके साथ काम करने और उनसे सीखने के कई मौके मिले हैं।

पद्म विभूषण से सम्मानित लालकृष्ण आडवाणी का जन्म 8 नवंबर, 1927 को पाकिस्तान के कराची में हुआ था। विभाजन के बाद उनका परिवार पाकिस्तान छोड़कर भारत आ गया था।

आडवाणी जी बीजेपी के अकेले राजनेता हैं जो तीन पार्टी पार्टी के अध्यक्ष रह चुके हैं। आडवाणी एनडीए की अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में उप प्रधानमंत्री भी रह चुके हैं। वे चार बार राज्यसभा और पांच बार लोकसभा सांसद रहे हैं।

अयोध्या में श्रीराम मंदिर निर्माण अभियान में इनकी अहम भूमिका रही है। 1990 में उन्होंने सोमनाथ से अयोध्या तक रामरथ यात्रा निकाली। वैसे यात्रा के बीच में ही उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।